Ishan Shivanand uses the metaphor of a water droplet merging with the ocean to explain why you must leave your comfort zone. He describes the panic of falling out of safety, then introduces 'sanhaar', an intense period of upheaval that leads to 'nirvana', a state of renewal and growth.
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तुमने देखा जब बूंद बादल से गिरती है समुद्र की ओर समर्पण कर देती तो फिर बूँद भी सागर बन जाती है। जब ये पल गिरता है अपने अपने कंफर्ट जोन से, तुम्हारा कंफर्ट जोन होगा तुम सब लोग अपने जीवन में, हर कोई भारत में किसी न किसी का सा है। भारत एकलौता देश है जिसमें 1 धोबी का भी होता है और का होगा और उस धोबी का भी धोबी होगा। अपने गुच्छे में। सा है, गुरु क्या करता है? और कुछ फल गिरते है नीचे, और जब कंफर्ट जोन से गिर रहे होते तो बड़ी घबराहट होती है। अरे क्या हो रहा है, हम गिर रहे हैं, गिर रहे हैं। और जब गिरोगे 1 और बात बता 2 स्थिति के बाद संहार जब इतनी साधना करोगे न, तो तुम्हारे भीतर भी कुछ न कुछ होना शुरू होगा, होगा न? फल जब गिरता है पृथ्वी के ऊपर, तो पहले से का क्यूँ नहीं सड़ेगा तुम्हारे भीतर से बहुत कुछ निकलेगा, लेकिन तुम ये जान लेना कि संहार के बाद फिर आता है निर्वाण, क्या आता है निर्वाण बदलाव विकास।