In this Hindi lecture, the speaker explores the root causes of human suffering through the lens of classical Indian philosophy. He begins by defining avidya (ignorance) as the fundamental lack of self‑knowledge – not knowing who we truly are. From this ignorance arises asmita, the false ego, which is constructed by attaching external labels such as nationality, caste, family, religion, or any socially assigned identity. The speaker illustrates this process with vivid anecdotes: a young man in a forest who fears losing his individuality in a crowd, and a monk who gives a balloon to tie to the man's foot, symbolising an external identity. When the balloon is later transferred to another’s foot, the original holder experiences a crisis, crying out that his identity has vanished. The metaphor demonstrates how external identities (the “balloons”) are fragile, can be taken away, and lead to conflict, attachment (raga‑dvesha), and violence. The talk concludes that living for one’s balloons rather than for the self perpetuates suffering, implying that liberation requires seeing beyond these external constructs.
Chapters
हमारे शास्त्रों में कहा गया है, अविद्या स्मिता, रागद्वेश, अपनिवेश कलिश और बहुत सरल सा मतलब है इसका कि तुम्हारे जीवन में कलेश हैं, समस्याएं हैं और समस्याओं का जड़ है। अविद्या अविद्या का मतलब तुम जानते ही नहीं। तुम कौन हो? तुम क्या हो? तुम क्यूँ हो? जैसे ही 1 बच्चा कंशियस होता है, सबसे पहले अपनी माँ से पूछने की जानने की कोशिश करता है। मैं कौन हूँ, हर बच्चे का वैसा हाल है जैसा 1 बेबड़े का 1 बच्चा भी जब उठता है पृथ्वी पर, उसको पता ही नहीं कहाँ से आया किधर है, कौन है, बोलो होता है नहीं, अपनी माँ से पूछता है। मैं कौन हूँ, माँ को भी नहीं पता है ये कौन है? जब अविद्या होती है कि जानते ही नहीं तुम कौन हो? फिर स्मिता का निर्माण किया जाता है, फोल्सइगोकितुमहे पता ही नहीं तुम कौन हो? माँ पूछती है माँ से, जब पूछते हो कौन हो? माँ भी कहती है तुम तुम, तुम फलाने देश के हो, तुम फलाने गोत्र के हो, तुम ये हो, तुम वो हो, चिपका देती है तुम्हें ज्ञान, अस्मिता, फाल्स, इगो। जब पता ही नहीं कौन हो तो 1 निर्माण करना पड़ता है न। आइडेंटिटी का बहुत जरूरी है 1 आइडेंटिटी का निर्माण करना। और दुनिया में सारी समस्याएं इसलिए है क्योंकि 1 फाल्स इगो है। और फाल्स इगो क्यों है, क्यूंकि मुझे पता ही नहीं है कौन हो मेरे गुरु। मुझे 1 चुटकुला सुनाते थे कि 1 बार 1 नौजवान चलता हुआ जा रहा था जंगल में और जंगल में उसको रात को डर लगा तो 1 आश्रम था, वहाँ चला गया। सोने देखा आश्रम में सौ लोग पहले से ही सो रहे हैं। बहुत घबरा गया तो आश्रम का साधु उसके पास आया, पूछा तू क्यों घबरा रखा? कहता है? सौ लोग सो रहे हैं। मैं भी अगर इन सौ के बीच सो गया तो सुबह जब मैं उठूंगा, मुझे क्या पता इन सौ में से मैं कौन सा वाला हूँ। भीड़ है भीड़ में खो गया तो हंसना मत। ये डर बहुत सच्चा है कि अगर मैं भूली में खो जाऊं तो क्या होगा? हर नौजवान को 1 ही डर है के मैं खो गया तो भीड़ में हाऊ कैन आई? बी डिफ्रेंट, हाउ कैन आई? बी डिफ्रेंट। मैं किसी देश में जाता हूँ किसी इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में गया और वहाँ पर लेक्चर दे रहा था तो 1 नौजवान बैठा है उसने अपने बाल मुर्गे की तरह बना रखे। नाक में नथनी पहनी है कान सने छिदा के इतने लम्बे लम्बे कर दी पतलून उसने अपने घुटनों पर पहनी हुई है, क्यूँ? क्यूंकि उसको भी डर है। भीड़ में खो गया तो? तो वो हर तरीके की नोटंकी करेगा, क्यूँ ताकि मैं थोड़ा तो अलग रहूँ, कहीं मैं खो न जाऊँ इन सौ लोगों की भीड़ में, चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े होते ही है। तुमने भी देखे होंगे अपने आस पास, बहुत नमूने, हर तरीके के नमूने। तो ये आदमी भी उस संत को कहता है। मुझे डर है। मैं खो गया तो? तो संत ने कहा ये लो, ये लो। 1 गुब्बारा यह गुब्बारा लो अपने पैर पर बांध लो, सुबह जब उठोगे ढूंढना। जिस किसी के भी पांव पर गुब्बारा है, वही तुम हो। खुश उसने गुब्बारा लिया, बांध लिया। आइडेंटिटी एक्स्टरनल आइडेंटिटी संत भी मजाक किया था। रात को जब ये आदमी सो रहा था तो गुब्बारा लिया। उसके पैर से निकाल कर किसी और के पैर पर बांध दी। सुबह ये आदमी उठा फटाक, उठते ही अपने पैर पर देखा, आस पास देखा और जोर से रोना शुरू कर दिया। 4 लोग भागे भागे गए। जिसके पास पूछने भाई क्यों रो रहे हो, कहता है? 1 बात तो पक्की है की वो आदमी जिसके पैर पर गुब्बारा बनता है, वो मैं हूँ, पर अगर वो मैं हूँ तो मैं कौन हूँ आइडेंटिटी क्राइसिस जैसे ही हम पैदा होते है, अविद्या है पता ही नहीं हम कौन हैं? तो अस्मिता कोई गुबारा देता है, बाँध लेते है, धर्म का गुब्बारा, कोई गुबारा देता है, बाँध लेते हैं, नाम का गुब्बारा, फिर स्कूल का गुब्बारा, परिवार का गुबारा, कबूतर जैसे बालों का गुब्बारा, और जैसे जैसे बड़े होते है गुब्बारों का। 1 गुच्छा जैसे मेले में बेचने वाला चलता है, हम भी अपने गुब्बारे लेकर चलते है, बेचने को तैयार, जो हमें मिलता है, तुम हमारा गुब्बारा लो, हम तुम्हारा लेंगे एक्सचेंज आदान प्रदान करते हैं आइडिया। और हम यह नहीं समझते कि गुब्बारा है ठीक, लेकिन गुब्बारे की सबसे बड़ी समस्या यह है की अगर तुम्हारी पहचान गुब्बारे सी है तो गुब्बारे को कोई भी तोड़ सकता है। हाँ जी ना जी, कितना आसान है गुब्बारे को तुमने गुब्बारा पकड़ लिया। मेरा भगवान सर्वश्रेष्ठ है ना, तुम्हारी पहचान गुब्बारे से है, कोई बोले भगवान सर्वश्रेष्ठ नहीं। तुमारा गुबारा फूट गया और जहाँ गुबार फूटा, तुम्हारा अस्तित्व ही फूट गया, जहाँ अस्तित्व फूटा, फिर लड़ने मरने की जरुरत पड़ जाएगी, फिर राग द्वेश अविद्या से क्या उत्पन होता है राग और देश की, जिसने मेरे गुब्बारे की, सराहना की, वो मेरा मित्र, जिसने मेरा गुब्बारा फोड़ा, वो मेरा दुश्मन। और तुम ये नहीं सोचते, अब तुम अपने लिए नहीं जी रहे, अपने गुब्बारों के लिए जी रहे हो। too।