A spiritual teacher argues that Western psychology rediscovered what Hindu sages taught centuries ago: that self-improvement naturally leads to yearning for divinity. Without a guru's guidance through Shiva Yoga, this yearning becomes aimless. Even atheists turn to faith when suffering, he says, which is why blind faith spreads.
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कभी अगर आप वेस्टन मनोविज्ञान साइकोलॉजी पढते हैं तो साइकोलॉजी में ऐसा कुछ भी नया नहीं है जिसके बारे में हमारे संतों ने बात नहीं की, हूँ चाहे वो मैसलोस एक्चवलाइजेशन हो। हमारे यहाँ तो साक्षात्कार सैकड़ों सालों से सिखाया जाता है, चाहे वो सिगमन फ्लाइट की इगो सुपरइगो। हमारे यहां तो क्रियामन पार और संचित के बारे में बच्चा बच्चा जानता है और जरअसल मनोविज्ञान को भी अगर आप देखो तो जहाँ मनोविज्ञान खत्म होता है वहाँ पे सनातन की शुरुआत होती है। क्योंकि मनोविज्ञान की पूरी चेष्टा इतनी है की 1 व्यक्ति के भीतर 1 इच्छा जागरत हो जाए की मैं अपने आप को बेहतर करना चाहता हूँ। अगर वो इच्छा जागरत हो गयी थी। बहुत अच्छी बात बात खत्म, लेकिन शिव सनातन कहता है की देखो कभी न कभी तो बड़े से बड़े नाश्ते के भीतर इच्छा जरूर जागरत होगी जरूर समय। 2 कभी कभार कोई नौजवान मेरे पास आता है, तर्क करता है कि मैं तो नास्तिक हूँ और मैं कहता हूँ भाई तेरे पास अभी लग्जरी है, टू बी थिस। जब जीवन में समस्या आती है तो बड़े से बड़ा नास्तिक भी आस्तिक हो जाता है। जब खुद के बच्चे बीमार पड़ते है और पता ही नहीं क्या करें तब। 1 अच्छा पिता हर दरवाजे को खटखटाने के लिए तैयार हैं, चाहे वो भगवान का क्यों, भगवान छोड़ो शेतान का क्यूँ न। बहुत बार कोई मुझ से कहता है कि अंध विश्वास इतना क्यों फैलता है और बहुत सरल सा जवाब है कि अगर ज्ञान ही नहीं क्या करना है तो 1 व्यक्ति जो कष्ट में है, पीड़ा में है वो सब कुछ करके देखेगा। 1 बार बोलो मानते हो जीना, अगर गुरुओं ने 1 रास्ता ही नहीं दिया तो देखो जो पीड़ा में है वो तो वो तो तावला हो रखा है, वो तो कुछ भी करके देखेगा, 1 बार करूँ तो सही। तो सनातन कहता है की ये इच्छा तो जरूर जागरत हो जाएगी, तुम्हारे भीतर कि मैं दिव्यता की ओर प्रभावित हूँ, लेकिन उसके बाद क्या करोगे, उसके बाद का रास्ता शिव योग के गुरु बताते हैं, क्योंकि अगर वो रास्ता सामने नहीं तो फँस जाओगे। ouetoatu।