Shiv Mahapuran Maha Sadhna - Day 2

In this extended segment of the Day‑2 devotional discourse, Aarti Samani (Speaker A) weaves mythic narrative, philosophical exposition, and contemporary analogies to guide seekers toward the realization of Shiva’s Avadhut (renunciant) essence. Central to the teaching is the principle that true liberation arises from embracing maun (silence) and Advaita, which dissolve ahankara (ego). The classic Indra‑Shiva‑Brihaspati story illustrates the clash between ego‑driven Indra and the silent guru, while Brihaspati symbolizes the inner guide urging surrender. Modern metaphors—high‑speed car journeys with emergency brakes, short‑form social‑media reels, and the concept of ‘toxic love’—are employed to depict mental distractions and egoic attachments that hinder spiritual progress. The discourse critiques atheistic postures, over‑reliance on empirical data, and sensory (indriya) agitation, arguing that such external validations distract from the eternal (sanatan) reality. A therapeutic dimension links Shiva meditation with trauma‑release techniques: breath awareness, mantra chanting, and expressive writing are presented as tools to transform personal pain and cut karmic debt. Detailed guided instructions for breath‑mantra integration are offered, emphasizing progressive muscle relaxation, focused inhalation/exhalation, and continuous internal chanting of “Om Namo Shivaya.” The speaker stresses listening to the inner guru (Brihaspati), offering sincere dana, and maintaining disciplined practice (prati‑prasav) despite its difficulty. Finally, a call to share the video across digital platforms underscores the role of community engagement in propagating dharma. The overall tone blends reverence, instructional guidance, critical social commentary, and compassionate encouragement toward inner silence as the gateway to realizing the Avadhut Shiva within.
Chapters
nmh आप सब को, आप सब के भीतर स्थित शिव शिवा को, मेरा प्रणाम। शंभर के लिए बिलकुल शांत हो जाए। और मेरे साथ महादेव के दिव्य दक्षिणा मूर्ति स्वरूप का स्मरण करें।
हम नमो भगवते। दक्षिणा मूर्ति
महेम
मैदाम प्रजन्म प्रय स्वाहा।
हे महादेव। शिव शिवा। हे महादेव। मुझे। आज दिव्य ज्ञान प्रदान करें। ज्ञान के साथ साथ let me with awerness। मैं जागृत हो सकूँ। मैं बहुत प्रेम से आपको पूर्ण समर्पण करता हूँ। यहाँ पे। जब आप स्वाहा कर रहे हो, आहुति आपके मन की है, आपके अहंकार की मानो। आप स्वयं को ही शिव शिवा को अर्पित कर रहे हो। शिवयोग द्वेत का नहीं, अद्वेत का मार्ग है। अद्वेत मार्ग में ही तुम महादेव को समझ सकते हो, प्राप्त कर सकते हो। अधवेत से ही तुम साधना में आगे बढ़ोगे। अधवे ही तुम है। इस जीवन से मुक्त करेगा। इसलिए शन भर के लिए तुम स्मरण करो।
ओम नमो भगवते दक्षिणा मूर्ति महिम मैदाम रगन्या प्रयच्छ स्वाहा। ओम नमो भगवते दक्षिणा मूर्ति महिम मैदाम प्रगन्या प्रयच्छ स्वाहा।
यह ज्ञान बहुत कीमती है। शिव महापुराण महादेव के अवधूत स्वरूप का वर्णन है। तुम स्मरण करो। महादेव को। अवधूत स्वरूप में शक्तिशाली तेजोमय, तपस्वी अग्नि के सामने बैठा हुआ, साधना मेंलीन, आँखों में तेज। लेकिन होठों पे हल्की मुस्कुराहट। महादेव अवधूत स्वरूप में बैठे, इतने में कहीं से इंद्र, उनके गुरु ब्रस्पति, चलते हुए आए, इंद्र अपने अहंकार में लीन, इंद्र अपनी उपलब्धियों में लीन। इंद्र अपनी ही माया। मेली तो यहाँ पे जागृती नहीं। और अगर जागरति नहीं तो शिव की समझ नहीं। इंद्र अवधूत स्वरुप में बैठे शिव शिवा को जान नहीं सका। और बहुत क्रोध में, आकर में। अब धूत स्वरूप से पूछा, शिव, शिवा कहाँ हैं? हम उनसे मिलने आये हैं। और अब धूत स्वरुप तो अपने मौन में लीन हैं, अपनी साधना में लीन है। वह सुन ही नहीं रहा, वो देख भी नहीं रहा, वह 1 नॉलेज ही नहीं कर रहा। जो अहंकारी व्यक्ति है, उसके चेहरे पर सबसे बड़ा तमाचा है। मौन। तुम चुप रहो, व टूट जाएगा, तुम एकनोलेज ही न करो, वो टूट जाएगा। यहाँ पे मारे बैठे अपनी साधना में लीन। अब दूध स्वरूप में खुश। और वहीं इंद्र चीखता हुआ, चिल्लाता हुआ कि तू मुझे देख बोल, शिव कहाँ है? तू समझता नहीं, मैं क्या हूँ, मैं कौन हूँ? क्यों? क्योंकि जो इन्द्रियों में लीन है, जो अहंकारी है, वो अपनी मौज में चल रहा है, उसका क्रोध, उसकी घृणा का तुम से कोई लेना देना नहीं, वो उसी के विकार हैं। और वह उसी विकार में अपने जीवन को व्यतीत कर रहा है। महादेव शांति से बैठे रहे, इंद्र अकड़ता रहा, क्रोधित होता रहा? और अंत में कहा, तूने मेरी बात नहीं सुनी, अवधूत तुझे मैं दिखाता हूँ बजर को उठाया प्रहार करने के लिए। और उसी समय महादेव की माया ऐसी थीं, जहाँ था इंद्र, वहीं वो स्तंभित हो गया, शरीर अकड़ गया, हाथ में, वज्र अब हिल नहीं पा रहा। उसी समय ब्रस्पति जो गुरु थे, वो समझ गए कि मेरे शिष्य के साथ अब क्या होने वाला है। उसी शणभ्रस्पति ने महादेव की स्थिति प्रारंभ कर दी। भ्रस्पति ने कहा, आप ही से सब कुछ उत्पन्न है, आप ही में सब कुछ लीन हो जाएगा। और ये मेरा शिष्य। इंद्र जो भी है, जितना भी है, जैसा भी है, यह भी आप का है। आप इसे स्वीकार करें, आप अपनी कृपा अनुकंपा, इस पर बरसाएं। मैं इसे भी आपको समर्पित करता हूँ। हे देवादिदेव, यह जो भी है, यह आपका। लेकिन महादेव ने जब तेज जागृत कर इंद्र को देखा तो महादेव के नेत्रों से ज्वाला उत्पन्न हुई और वो ज्वाला इंद्र की ओर बढ़ने लगी। वो ज्वाला जो सब कुछ भस्म कर सकती है, वो ज्वाला जिस ज्वाला से पूरी सृष्टि 1 बार फिर महादेव समेटते हैं। महादेव ने भ्रष्टपति को कहा, अब तो ये ज्वाला उत्पन्न हो गयी। अब तो विधि का विधान है। अब तो प्रकृति तो ये ज्वाला इंद्र को बस्म करेगी। तो उत्पन हो गई। अब तो तीर धनुष से चल गया। now it is going to happen, it is destiny। ब्रस्पति मुस्कुराये। और उन्होंने स्तुति की। उन्होंने कहा कि हे निर्गुण निराकार महादेव, महाकाल आप आपकी माया से करम है, आपकी माया से ही भाग्य, आपकी माया से ही सृष्टि, आप ही तो हो लिखने वाले। मैं आपको पूर्ण समर्पण करता हूँ और आपसे प्रार्थना करता हूँ। मेरे शिष्य की रक्षा करो। किस बात की? बीरोकर वेन यू आर, द वन न ल, द, आई डोंट नो, आप ही देखो, आप ही जानो, आप ही की माया। लेकिन मेरे शिष्य की रक्षा करो। महादेव मुस्कराये। और अब धत स्वरूप में ही उन्होंने अपनी ज्वाला जल में फेंक दी समुद्र में और आने वाले समय में उसी ज्वाला ने जला सुर का स्वरूप धारण किया। लेकिन हम आज बात महादेव के अवधूत स्वरूप की करेंगे। हम आज बात इंद्र और भ्रस्पति की करेंगे। हर हर महादेव, अवधूत स्वरूप बहुत कीमती है। अवधूत स्वरूप तपस्वी है। अवधूत स्वरूप तुम्हें अद्वैत की ओर लेकर जाता है। और इसलिए अवधूत स्वरूप मौन है। वह तुम से ज़्यादा बातचीत नहीं करेगा। इस कथा में इंद्रियाँ मतलब, तुम्हारा मन, भगवान, इंद्र और क्या है, राजा इन्द्र, तुम्हारा मन है, तुम्हारी इंद्रियाँ हैं, तुम्हारा अहंकार है और इंद्र को मौन नहीं समझ आता। मुझसे 1 नौजवान ने पूछा कि हम क्यों सुपरस्टीशन को जन्म देते? हम क्यों ठगियों को जन्म देते, जो धर्म के नाम पर न जाने क्या अनाप शनाप खान करा देते। हमें क्यों सिद्ध और सिद्ध की साधना समझ नहीं आती? क्यों भारतवर्ष सिद्धों के साथ साथ ढोंगियों को जन्म देता है? और उत्तर स्पष्ट है, सिद्ध मौन में रहेगा और तुम इन्द्र हो। जब तुम खोज में निकलोगे गुरु की, जब तुम खोज में निकलोगे शिव की, तो तुम समर्पण भाव से थोड़ी न निकलोगे। तुम तो मंत्री बने निकलोगे, तुम तो राजा इंद्र बने निकलोगे, तुम तो चिकित्सक बने, निकलोगे डॉक्टर इंजीनियर बने निकलोगे घर में। तुमने 2 छोटू पाल के रखे हैं, जो तुम्हारी चप्पल, दूध, रोटी, अचार का ध्यान देते हैं। और अब तुम शिव की खोज में निकले हो। तुम्हें तो हर कोई व्यक्ति छोटू समान दिखेगा। कि कौन मेरी सुने किसको मैं मदारी बन बंदर की तरह नचाऊ। और जो मेरे सामने शिव को ले आए, जो खूब मुझ से बातें करे। और बातचीत तो द्वैत है। बातचीत तो तुम्हें शिव से और दूर ले जाएगी। इसलिए तुम जब बैठोगे और तुम शिव को पुकारोगे मजे की बात शिव मौन रहेंगे। क्योंकि शिव कहेंगे बात का क्या फायदा, तुम आज मुझ में लीन हो जाओ। तुम बहो मेरे साथ प्रकृति में इकलौती स्थायी वस्तु है, बदलाव सब बदल रहा है, तुम भी बदल रहे हो। और जो बदल रहा है, उसके बारे में बातचीत क्या करनी है? शिव अनंत शिव कृपा, अनंता तुम्हें छलांग मारनी होगी, इस कमजोर डाल से, उस अनंत तक। और इसलिए शिव मौन में तुम्हारा इंतजार करते और तुम बातें करते। तुम्हें सवाल जवाब करने। तुम्हें पूछना है कि हे भगवान, मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? मेरा शरीर बीमार क्यों पड़ा? अरे क्यों न पड़े? तुम्हारा शरीर बीमार तुम हो ही कौन? जो कोई भी इस प्रथ्वी पर आता, उस अनंत ने भी जब अवतार स्वरूप धारण किया और वो अनंत भी इस प्रथ्वी पर आया, तो उस अनंत को भी जो कुछ भी इस पंच भूत के शरीर के साथ होता है, अनुभव करना पड़ा। उस अनंत ने भी अनुभव किया उन्हीं दुखों को जो तुम अनुभव करते हो। it is the law of the third dimension। किस बात का अहंकार है? भगवान मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? शरीर है, अगर है तो शरीर जाएगा भी इसमें चौंकना कैसा? हम सबको पता है, मृत्यु 1 दिन आनी है, लेकिन हम सब चौंकते हैं मृत्यु को देख के। तुम समझते ही नहीं कि यह महादेव की माया है। मुझे 1 स्थान पर जाना था
और
मैं शांति से गाड़ी चला रहा हूँ। मेरे बगल में 1 साधक बैठे हैं। अब उन साधक को न जाने क्यों बहुत करता भाव है। गाड़ी में चला रहा हूँ, उन्हें करता भाव है। ऐसे लोग तुम जानते होगे जब तुम गाड़ी चला रहे हो। और वो इमेजिनरी ब्रेक के पैडल को दबा रहे हैं। तुम गाड़ी चला रहे हो, लेकिन न जाने क्यों वो अपने हाथ पैर हिला रहे हैं। जैसे न जाने उनके हाथ पैर हिलाने से गाड़ी की दिशा बदल जाएगी, ब्रेक लग जाएगी, ऐसा हो जाएगा, वैसा हो जाएगा। अब मैं हूँ हाइवे पर गाड़ी की गति लगभग सौ किलोमीटर प्रति घंटा और मैं शांति से गाड़ी चला रहा हूँ। ध्यान मग्न हो, साँस में भगवान का नाम लिए हो। शादकघबराभटकेक्यारे गाड़ी बहुत तेज गति से चल रही है। इमैजिनरी ब्रेक पर पैर दबाते हो। अब आजकल की गाड़ियाँ आधुनिक हैं। जब मैं छोटा था तो हैंड ब्रेक का लीवर होता था, बटन दबाओ, की करके खींचो वो सब नहीं। अब 1 बटन होता है, बटन दबाओ और एमरजेंसी ब्रेक चालू हो जाएगी। मैं शांति से गाड़ी चला रहा हूँ। इतने में मैंने इंडिकेटर दिया कि लेफ्ट लूंगा और न जाने क्यों इस साधक की इन्द्रियों में ऐसा उचनीछुईकीइन्होंने करके अपनी कुर्सी पकड़ ली। न जाने क्या होने वाला है और वो खुद डरे हैं। मेरी गाड़ी बहुत अच्छी चल रही है, गाड़ी के चलने में कोई खराबी नहीं प्रकृति प्रकृति की गति से चलती खराबी इनके दिमाग में थी। अब जब इन्होंने धम करके अपना हाथ नीचे मारा तो इनका हाथ हैंड ब्रेक पर पड़ा। अब सोचो हाइवे पर गाड़ी सौ किलोमीटर प्रति घंटे से जा रही है। और इन्होंने एमरजेंसी ब्रेक पर अपना हाथ मार दिया। गाड़ी झटके से रुक गई और पीछे बड़े बड़े ट्रक चल रहे थे। महादेव की माया है, न जाने कैसे वो ट्रक चलाने वाले भी पूर्ण जागृति के साथ अपना ट्रक चला रहे थे। उन्होंने देखा, सामने छोटी सी गाड़ी रुक गई, दोनो तरफ। 1 इस तरफ से निकला। 1 इस तरह से निकाला और मैं हाइवे के बीचों बीच ओनवशवाहोनआकीभैया गाड़ी को क्या हुआ। साधक को देखो रे भैया अपने दोनो के दोनो हाथ अपनी जेब में डालो और मुझे शांति से गाडी चला लाने। 2 उस दिन महादेव की माया से मैं बच गया। अब तुम्हें भी इस बात को समझना होगा। यह जीवन है। तुम शांति से गाड़ी चला रहे हो, लेकिन तुम नहीं जानते कि तुम्हारे साथ कौन बेवकूफ बैठा है। और न जाने इस प्रकृति, इस सृष्टि में किसकी बेवकूफ़ी का प्रभाव तुम्हारे जीवन पर पड़ेगा। कुछ भी हो सकता है, तुम्हारी कोई गलती भी नहीं। मेरी तो कोई गलती थी ही नहीं। मैं तो शांति से गाड़ी चला रहा हूँ। कई घंटे बीत गये, मैं चलता रहा, कोई समस्या थी ही नहीं। लेकिन मैं अपनी गाड़ी में अकेले थोड़ी न बैठा हूँ। मेरी गाड़ी में कुछ और बेवकूफ भी है और तुम्हारे जीवन में भी। 1 शोल ग्रुप है, उस शोल ग्रुप में कुछ विद्वान भी होंगे और कुछ निहायती बेवकूफ भी होंगे। और हो सकता है किसी न किसी बेवकूफ की कोतूहल से कभी न कभी तुम्हारी गाड़ी पर एमरजेंसी ब्रेक लगे। और मेरे पास तो साधना का फल था, तो मैं बच गया। लेकिन हो सकता है ट्रक तुम्हारे मूलाधार में घुस जाए। अब इस बात का कोई कारण नहीं। अब गाड़ी में बैठे हो, गाड़ी चल रही है, गाड़ी में विद्वान भी है, गाड़ी में बेवकूफ भी हैं। अब सोचो उस समय तुम अवधूत स्वरुप के पास जाओ और बोलो, मेरे साथ ऐसा क्यूँ हुआ? भैया तुम जन्मे हो, ये हुआ, तुमने गाडी चलाई इसलिए हुआ, तुम इस पृथ्वी पर आये इसलिए हुआ। अब क्या बोले, अवधूत, तुम्हें अब दूध भी अपनी शांति में मगन रहता है, साधना में मग्न रहता है। क्योंकि इंद्र से कोई बातचीत नहीं हो सकती। इंद्र को तुम क्या समझाओगे? अहंकार को तुम क्या समझाओगे? वो तुम्हें बोल भी दे, तुम्हें जवाब दे भी दे। तुम काटने को। तोड़ो इसलिए भगवान मौन में रहता है, भगवान मुस्कुराता है, भगवान आशीर्वाद देता है। लेकिन अगर अहंकार ज्यादा होगा। फिर भगवान के प्रति क्रोध आएगा? गुरु के प्रति क्रोध आयेगा कि तुम कैसे गुरु हो? तुमने मुझसे बातचीत नहीं की। तुम मुझसे वार्ता लाभ नहीं कर रहे। तुम्हें तो मैंने इतना दिया। तुम्हें तो मैंने दान दिया, तुमने दान गुरु को दिया या दान अपना कर्म काटने के लिये दिया। और तुम्हारे दान से, कौन से। तुम्हारे गुरु ने हेलीकॉप्टर खरीदा, तुमने अगर दान दिया। दान भी इसलिए कभी गलती से गरूर पुरान पढ़ ली होगी। और जब कभी भी, कुछ भी गुरु को दिया, तो अपने कर्म इकट्ठे कर ही अपने गुरु को दिए हैं, यही सोच कर दिया है कि जो मैं गुरु को दे रहा हूँ, उससे मेरा कर्म कट जाएगा। और आज अहंकार क्या कहता है कि तुझे मैंने दिया, बात कर, मुझसे मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? लेकिन जो सिद्ध है, जो अवधूत है, जो अवधूतेश्वर है, जो महादेव है, वो मौन मे बैठा होगा। और जो इंद्र है, फिर उसे बहुत क्रोध आता है। फिर इंद्रिया बोलेंगे कि अरे, अब तो इस भगवान का मैं अपने वज्र से नाश कर दूँगा और तुम्हारे पास वजर क्या है? तुम्हारी बातें तुम्हारा वजर क्या है, तुम्हारी सोच, फिर तुम महादेव में भेद करना शुरू कर, फिर तुम भगवान में भेद करते हो, कौन? भगवान बड़ा कौन, भगवान छोटा, कौन स्वरूप? अच्छा, कौन स्वरूप? खराब। फिर तुम द्वेत के मार्ग की ओर जा रहे हो, वेद के मार्ग की ओर। अगर कोई तुम्हें दिखे, जो तुम्हें भगवान के नाम पर, शिव के नाम पर, भेद बता रहा है कि ये भगवान यहाँ और वो भगवान, वहाँ तुम्हें टीयर बता रहा है, तुम समझ जाना, ये पिटा हुआ इंद्र है, ये पिटा हुआ, खीजा हुआ, सड़ा हुआ इंद्र है। ये भी कभी गया था अवधूत स्वरूप की ओर, और अवधूत स्वरुप के मौन में, इसके अहंकार को चोट पहुंची। तो अब इसलिए इसने भेद का निर्माण कर दिया क्यों? क्योंकि इंद्र को समर्पण थोड़ी आता है, इंद्र को झुकना थोड़ी आता है, इंद्र को अद्वैत समझ नहीं आता, इंद्र को अगर मैं बोलूं मौन में बैठ साधना कर, तो इंद्र घबरा जाएगा, क्योंकि साधना में इंद्र की मृत्यु है। जब हम प्रतिप्रसव साधना करते हैं, तो प्रति प्रसव में इंद्र की मृत्यु है। we inwoksivsiवaviसिट we go through our thoughts, how r emotions our tramas and as we go through them in front of shiv, shiva slowly, they start to get released to hamare ps vagञaniकttय है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जब तुम अपने ट्रोमा को लिखते हो या अपने ट्रॉमा को रिलीव करते हो, वो रिलीज प्रोसेस में तुम्हारी सहायता करता है। क्योंकि मनोवैज्ञानिक का कहना है कि अगर तुम अपने ट्रॉमा को आज रिलीव कर रहे हो, लिख रहे हो, तो तुम्हें 1 नया पर्स्पेक्टिव मिलता है। अगर 14 साल की बच्ची के साथ कभी कोई हादसा गठित हुआ, तो मन में वो अभी तक 4 साल की बच्ची है। जब तुम लिख रहे हो, तो अब 1 40 साल की महिला उस 4 साल की बच्ची के ट्रोमा को देखती है। और 1 40 साल की महिला का ज्ञान उस 4 साल की बच्ची को उससे बाहर निकाल सकता है। और सोचो अगर यही प्रक्रिया शिव और गुरु के साथ की जाए, तो कितना लाभ होगा? अगर यही प्रक्रिया प्रति प्रसव स्वरूप में की जाए। फिर तो तुम अपने सभी दुखों को त्याग दोगे, फिर तो तुम अपने अहंकार को त्याग दोगे, फिर तो तुम क्रोध को त्याग दोगे। और इसलिए हर व्यक्ति प्रति प्रसव नहीं कर सकता। डर लगता है लोगों को, क्योंकि जब प्रति प्रसव साधना होती। तो जो आदमी बैठा है, वो रो रहा है, चीख रहा है, चिल्ला रहा है। तो जो इंद्र है, जो दूर बैठा देख रहा है, वो बहुत घबराता है की भैया क्या कर रहे हैं। यहाँ पर ऐसी कौन सी साधना करा रहे हैं। क्योंकि बाहर से अगर तुम सुनोगे तुम्हें लगेगा की मै लोगो को लाठी से पीट रहा हूँ। अन्दर मैं कुछ नहीं कर रहा, वो इंद्र की मृत्यु है। और इंद्र मृत्यु से पहले जरूर शोर मचाए। और तुम इस बात को जान लो, इंद्र की कभी न कभी तो मृत्यु होनी है। अगर इंद्र की मृत्यु शरीर की मृत्यु से पहले हो गई तो साक्षात्कार है। और अगर इंद्र शरीर के बाद भी जीवित रहा तो फिर तुम नरक को भोगोगे। और मैं यह नहीं कह रहा कि स्वर्ग और नरक है। मैं ये कह रहा हूँ कि इन्द्र नरक का निर्माण कर सकता है। तुम्हारी ही इन्द्रियां नरक का निर्माण करती है। पृथ्वी तो बहुत अच्छी, तुम्हारे, आसपास सब कुछ बहुत अच्छा है, देश तरक्की कर रहा है। लेकिन इंद्र से पूछो इंद्र रोने के चीखने चिल्लाने के सौ कारण ढूंढ लेगा। मेरे पास। 1 आदमी आया, वो बड़ी गालिया दे रहा है कि अरे भारत को देखो कहाँ पहुँचा। देश का भला नहीं हो रहा, नौकरियां नहीं हो रही है, यह नहीं हो रहा, वो नहीं हो रहा। दुनिया जहान की मेरे को, उसने कहानी सुनाई क्यों? क्योंकि उसके उसके दिमाग में भारत कोई गेंद है जो गिर रही है त्रिशंकु के समान। और मैंने उससे बात की, मैंने आप कहाँ से ये वार्तालाप कर रहे हो, कहाँ से आ रही है। अगर हम फैक्ट्स को देखें तो अगर आप इंडिपेंडेंस से लेकर अब तक भारत को देखते तो कुछ कुछ चीजें हैं जो हम मेजर कर सकते हैं। अगर हम हेल्थकेयर की बात करें तो हम इन्फैंट मोटेलिटी रेट देखते हैं। अगर हम हेल्थकेर की बात करें तो हम चाइल्ड केयर देखते हैं, मदर खेर देखते हैं। और अगर इंडिपेंडेंस से लेकर अब तक हम देखें, we have मेट फिनोमिनल स्ट्राइड्स, हमारा मोटालिटी रेट। कई सौ गुना बेहतर हो गया। अगर हम इकोनोमी की बात करें, जी डी पी की बात करें, इंफ्रास्ट्रक्चर की बात करें, एवरी थिंग हैज, गॉन, अप, एवरी स्केल हैज, कम बेटर परफेक्ट, नो बट, इट हैज, गॉन बेटर देर, स्टिल स्कोप फॉर, इम्प्रूवमेंट, ये जो तुमने ट्राजेक्टरी बताई है कि यहाँ से हम यहां जा रहे हैं, अगर हम स्टेटिस्टिकल डेटा देखें तो हम यहाँ से यहाँ जा रहे हैं। और गति भी अच्छी है। अब उल्टा और बढ़िया हुई है कुछ सालों में और अगर इसी गति पर चलते रहे तो न जाने कहाँ से कहाँ पहुँच जायेंगे। न दीज, आर, द फैक्ट्स, जो अवधूत हैं, वो फैक्ट्स की बात करेगा, जो इंद्र हैं, वो इमोशन की बात करेगा, न जाने क्या फालतू। अनशन इन्द्र के दिमाग में तो यही है कि जो पहले था वो अच्छा था, क्योंकि इंद्र भी जानता है, जो पहले था वो था ही नहीं। वो हिरंदकालहैवो मर गया। और इंद्र को पता है अगर वर्तमान की बात करेगा, अगर स्टेटिस्टिकल डेटा की बात करेगा, फैक्ट्स की बात करेगा तो हार जाएगा। इसलिए इन्द्र पुरानी किसी माया में रहता है। और इस इंद्र की मृत्यु जीते जी बहुत कीमती है। क्योंकि जैसे फिर तुम्हारे भीतर इंद्र है, वैसे ही तुम्हारे भीतर ब्रस्पति भी है। और भ्रष्पति मतलब तुम्हारे भीतर का ज्ञान। अगर तुम किसी दिन शांति से बैठ हो तो तुम्हें भीतर गुरु की आवाज़ सुनाई पड़ेगी। ये वही आवाज़ है जो तुम्हें गलत काम करने से रोकती है, ये वही आवाज़ है जो तुम्हें शिव की ओर खींचती है, ये वही आवाज है जो तुम्हें यहाँ मेरे सामने बैठा कर के रखी। ये वही आवाज़ है जो तुम्हारा मस्तक झुका देती है, जब तुम शिवालय के सामने से निकल रहे हो। और मजे की बात, ये आवाज़ तुम सबके भीतर है। ये आवाज शाश्वत है। अगर तुम्हें सुनाई नहीं पड़ रही, इसीलिए नहीं की आवाज मर चुकी है। सुनाई इसलिए नहीं पड़ रही क्योंकि तुमने अपने आप को आदत डाल दी। जैसे 1 पति आदत डाल देता है, पत्नी को न सुनने में पत्नी बोलती रहती है, कुछ न कुछ, कुछ, न कुछ, कुछ, न कुछ और पति। अब पाती मजे से अखबार पढ़ रहा है, लेकिन शरीर को उसने ऑटोमेटिक कर दिया। क्यूँ? क्यूंकी, कौन सुने पत्नी की उसी प्रकार से जो भीतर का ब्रस्पति है, वो भी तुम्हे बोलता रहता है। और तुम्हारी इन्द्रियाँ कहते हैं, कौन सुने इसकी कौन करे, साधना कौन करे, ध्यान ओटीपी प्लेटफार्म। पे बिग बॉस देखते हैं, कुछ और देखते हैं, मजा करते है। और भीतर की आवाज बोलती रहती। जब हम साधना करते है तो हम 1 बार फिर इस आवाज को सुन रहे हैं। और ये आवाज़ तुम भी केवल मौन में सुन सकते हो। इस आवाज़ को तुम कोतूहल में नहीं सुन पाओगे। और इसलिए जब हम शिव योग में साधना करते तो तुम भी चौंक जाओगे। शिविर हो रहा है, हजारों की भीड़ आ रही है। और कुछ मिनट बोलने के बाद फिर हम सब चुपचाप साधना में चले गए, फिर गुरु कुछ न कुछ कह रहा है। और हजारों की भीड़ चुपचाप बैठी। अब देखने वाला चौके का, इन्द्र चौके का, कि चुप क्यों बैठे हैं? स चुप इसलिए बैठे हैं क्योंकि मौन में ही शिव है। और मौन का मतलब केवल यहाँ से चुप नहीं होना, मौन का मतलब अपने शरीर को शांत करना सीखो, मन को शांत करना सीखो, इंद्रियां तुम्हें व्याकुल करेंगी, इंद्रियां तुम्हें भ्रस्पति से दूर ले जाएंगे, इंद्रियां तुम्हें शिव के प्रति नासमझ बना देंगे। क्यों? क्योंकि इंद्रियां दौड़ेंगी स्वाद के पीछे इंद्रियाँ चटोरी जो सिद्ध हैं, वो इतना ग्लैमरस नहीं सिद्ध। तो शांत अपना बैठा अवधूत। अब तो स्पीचुएलिटी में भी ग्लैमर आ गया। अब तो क्यों? क्योंकि सोशल मीडिया है, रील्स बनाने है, शॉर्ट्स बनाने, शारटफार्मकंटेंट बनाना है, इंद्रियों को प्रलोभन देना है। अब सोचो शार्टफार्म कंटेंट में अगर अवधूत चुपचाप बैठा होता तो इंद्र को कितना गुस्सा आता कीजिए क्या बात हुई? कुछ तो मिले, कुछ तो आदान प्रदान हो, कुछ तो चूरन चटनी, गुरु निकाल के हमारे हाथ में रखे, क्योंकि इन्द्र खोजता है, इन्द्र को चाहिए। इसलिए मौन केवल मौखिक नहीं। यहाँ जब मैं मौन की बात कर रहा हूँ, मैं मौन शांति को कह रहा हूँ, मन से राजस्थान गौशाला की बात है। 1 हमारे मनेजर थे वहाँ पे और उस मैनेजर को साल में कुछ समय मौन, व रखता था। और जब उसे काम करना है किसी से तो अपने साथ पर्ची लेकर के चलेगा पर्ची पर लिखेगा। तो 1 दिन मैं चलता हुआ जा रहा था। मैंने देखा कि मनेजर वहाँ पे बहुत तेजी से कुछ पर्ची पर लिख लिख कर सबको दे रहा है। अब जरा सा रात को क्यारियाँ बनानी थी, ताकि पानी पहुँच सके। फसल तक तो जिसने बनानी थी, उसने अपना काम सही तरीके से नहीं किया, क्यारी, टूटी, पानी सब इधर उधर हो गया। तो मनेजर उसको पर्चियों में डांट रहा था। 1 पर्ची नीचे गिरी। मैंने भी उठाई पर्ची पर लिखा था उल्लू के पट्ठे। अब मुझे जोर से हंसी, आ गयी की कहने को तो इसने मोन कर रखा है, लेकिन ये बैठ कर लिख रहा है उल्लू के पट्ठे। और फिर मन ही मन में सोच रहा हूँ की अगर बोल दिया होता तो बोलने में तो इतने भीतर की आवाज नहीं आती, बोला तो सेरा मौके बोला। अगर तुम भी बोलते हो, उल्लू के पट्ठे। तुम बड़ा सोच के बोलते हो, वो तो भीतर से निकल ही जाता है, कहाँ से निकला, तुम्हे भी नहीं पता, पर सोचो अगर तुम्हे लिखना पड़ा तो तुम 11 शब्द महसूस करके लिखोगे के। फिर तो इसके पांचों शरीर ने महसूस किया गाली को, और जो बेचारा पढ़ने वाला है, उसको भी समझ नहीं। अगर इतना पढ़ा लिखा होता तो खेत में क्या री थोड़ी बना रहा होता। फिर वो भी पढ़ रहा है उल, हल, हल। और जो इंद्र है, जो पर्ची काट रहा है, उसको बड़ी चिढ़ मच रही है की तुझे मेरी परची नही समझ। इंद्र को बड़ा मजा आता है पर्चियाँ बनाने में, और वो पढ़ रहा है उल्लू उल्लू, उल्लू का क, और इतने में जो मौन है, उसने छलांग मारनी शुरू कर दी। उसकी मानो कुंडली जाग्रत हो गई कि तू पर ध्यान से मेरी पट्टी का मतलब समझ। जब पढने वाले ने पे शांति इसके मुंह पर इतनी शांति, ये मौन किस काम का? तुम बस कुछ कह नहीं रहे। लेकिन यह मौन भी नहीं है, यह भी इंद्रियों का खेल है। अभी तक तुमने भ्रस्पतिकी आवाज नहीं सुनी। अभी तक तुम बज उठा कर के खड़े हो। और जब तुम वज्र उठा करके खड़े हो तो तुम शिव पर, गुरु पर, सनातन पर प्रहार करोगे। फिर जो शिव है, तुम्हें वो सनातन नहीं दिखाई पड़ेगा, जो साधना है, तुम्हें वो सनातन नहीं दिखाई पड़ेगी। फिर जो रूरिवाद्यता है क, कट्टर पना है तुम्हें वो सनातन दिखाई पड़ेगा। क्यों? क्योंकि तुम इन्द्र हो। जो सही मायने में सनातन है, जो सही मायने में शिव है, वो मौन है। उस तक पहुँचने के लिए तुम्हें साधना करनी होगी, उस तक पहुँचने के लिए तुम्हें 1 कोने में बैठ गुरु का आवाहन कर, ब्रस्पति की आवाज़ सुननी होगी। क्योंकि ब्रस्पति तुम्हें समर्पण सिखाएगा भ्रस्पति तुम्हें वक्ति की ओर लेकर जाएगा। ब्रस्पति तुम्हारे भीतर 1 गहरा मौन उत्पन्न करेगा। और अगर साधना छोड़, अद्वैत छोड़ तुम द्वैत की ओर भागते हो, तो फिर तुम्हारा अस्त्र, शिव और अवधूत के प्रति उठ जाएगा। क्योंकि जो तुम सोच करके जाओगे, वो तुम्हें मिलेगा नहीं। और जहाँ तुम खीचे चले जा रहे हो, शायद वह तुम्हें शिव से और दूर ले जाए। क्योंकि तुम्हें अपने आप से ये पूछना है, क्या मैं सनातन को समझ पाया? और सनातन का मतलब ही वो शाशवत जिसका ना कभी जन्म, ना कभी मृत्यु, सनातन साधना है, सनातन उस अनंत से जुड़ना है। और इसलिए सनातन कई मार्ग हो सकते हैं। लेकिन वो सारे मार्ग साधनात्मक हैं, वो सारे मार्ग तुम्हें भीतर लेकर के जाते, वह भेद को खत्म करते हैं, वो अद्वेद की उत्पत्ति करते हैं, वो तुम्हें अवधूत से जोड़ते हैं। और ये प्रक्रिया तो तुम्हें करनी ही होगी। महिम मैदाम प्रगन्या वाह, शरीर के मरने से पहले इस इंद्र को तुम संभाल लो, वरना शरीर के बाद ये बहुत दंगल मचाएगा। तुम सोचो क्रोध? अभी तो केवल शिव तुम्हारी नहीं सुन रहे। और इतना गुस्सा आता है, नास्तिक बन जाते हो। कहते हो की शिव मेरी नहीं सुन रहे है। जितने भी नास्तिक है, वो पिटे हुए इंद्र हैं, वो भी कहीं न कहीं बड़ी आस्तिकता से शुरू हुए होंगे नास्तिकता। इस टाइप ऑफ़ टॉक्सिक लव, टॉक्सिक लव, समझते हो, पिक्चर आई थी न। ककाककपकेरनकी पहले मैं तुम्हें प्रेम करने की कोशिश करूँगा, लेकिन अगर तुम मेरी नहीं, तो फिर तुम किसी की भी नहीं। फिर तो मैं तुम्हें द्वस्त कर। क्योंकि जो साधारण व्यक्ति है, उसे क्या, पढ़िए। वो बड़ा सम्यक है, बड़ा नेचुरल है, बड़ा रा है, बड़ा अपने जीवन को शांति से जी रहा है, उसको थोड़ी न है। नास्तिक को ओपसेशन होता है। जहाँ कहीं भी मैं शिव को देखूं, तोड़ने पहुँच जाओ। और ऑपरेशन कहा से आता है? it is a toxic love, it is love only, but it is toxic। वेरी टॉक्सिक। फिर ऐसा व्यक्ति कह रहा है कि अरे, हम तो नास्तिक, तुम नास्तिक नहीं, तुम पिटे हुए, इंद्र हो, तुम भी गए थे शिव से बात करने, शिव तुम्हें मौन में दिखे। और तुमने ये नहीं समझा कि तुम्हे उसकी आवाज़ सुनने के लिए, उससे जुड़ने के लिए खुद मौन में बैठना होगा, साधना करनी होगी। तुम्हें। तो बस यही दिखा मैं यहाँ पर खड़ा हूँ, अपने कोतूहल में। शिव तुम मेरे लेवल पे। आओ, सिर्फ तुम्हारे लेवल पर नहीं आएंगे, तुम्हे शिव के लेवल तक जाना होगा, तुम्हें उठना होगा, तुम्हे पहुँचना होगा। जो शिव योगी है, वो इस बात को समझता है। इसलिए 1 शिवयोगी अपनी साधना में बैठेगा और तुम उस शिवयोगी से पूछो, क्या महादेव ने तुमसे बात की? बोलेगा नहीं, लेकिन फिर भी वो साधना में बैठा है। तुम शिव योगी से पूछो, क्या तुम्हारे गुरु ने तुम्हारे सर पे हाथ रखा? वो बोलेगा नहीं। और जो इंद्र है, उसे समझ नहीं आएगी कि कैसे तुम साधना में बैठ सकते हो? फिर इंद्र पूछेगा, शिवयोगी से तुम्हारी गाड़ी में बेवकूफ नहीं, बैठे क्या हो? इमरजेंसी ब्रेक को चलती गाड़ी में नहीं दबा देते, शिवयोगी बोलेगा नहीं देखो, संसार है। 3 बेवकूफ तेरे, मेरे भी 2 बेवकूफ बैठे हैं, लेकिन 1 बात मुझे पता है, मेरे भीतर बैठे भ्रस्पति ने बताए, शिव सबसे बड़ के हैं। और जाने अनजाने में बेवकूफ ने ब्रेक दबा भी दी। तो अगर शिव मेरी रक्षा कर रहे हैं। जब तक शिव चाहेंगे, मैं पृथ्वी पर हूँ। और जिस दिन बुला लेंगे, मैं चला जाऊंगा। खुशी खुशी क्यों? क्योंकि इधर भी शिव में लीन रहना है, उधर भी शिव में लीन रहना है। मेरे जीवन में कुछ खास परिवर्तन नहीं। ya it is the same, while i live, and it will be the same, when the body will go away, i have reached to that लेवल ऑफ सनातन, the universal balance। और इसलिए हमें शायद सनातन की रक्षा नहीं करनी, हमें सनातन को अनुभव करना है। अगर हम सनातन को अनुभव कर ले, हम सनातन से जुड़ जाएं, तो शायद हमें देख किसी और को भी प्रेरणा मिल जाएगी। क्योंकि अगर तुम भारत का इतिहास देखते हो, बहुत कम है, जो सनातन को अनुभव कर सके, और सनातन से जुड़ सके, बहुत कम। जिन्हें तुम जानते हो, जो हिमालय से उतर के तुम्हारे बीच आए, ऐसे तो बहुत अवधूत हैं, जिन्हें तुम जानते नहीं, जिनका नाम तुमने कभी सुना नहीं, जिनकी खोज में तुम कभी निकले नहीं। और निकलते भी, तो शायद तुम जान नहीं पाते। क्यों? क्योंकि वो तो साधना में लीन थे और तुम इंद्र स्वरूप में पहुंचे थे। लेकिन फिर भी क्योंकि ये सिद्ध सनातन को अनुभव कर सके, तो इन कुछ लोगों की वजह से हजारों हजारों, हजारों वर्ष के बाद भी हमारे भीतर प्रेरणा है, क्योंकि हम इन्हें देखते हैं। जैसे 1 माउंटेनियर एडमंड हिलरी को देखता है, अगर ये एवरेस्ट के शिखर तक पहुँच गया, तो हम भी पहुँचेंगे। अगर महादेव ने इनका हाथ थाम कर इन्हें चोटी तक पहुँचा दिया, तो अगर हम भी यहाँ बैठे, अपने हाथ को ऊपर ले जायेंगे, महादेव हमें भी खींच लेंगे, इन्हें देख हमें प्रेरणा है। और हो सकता है हजारों साल बाद हमारी प्रेरणा थोड़ी कम हो गयी। और अगर आज भी तुम में से कुछ सिद्धत्व को प्राप्त करते है तो शायद तुम 1 बार फिर आने वाले समय के नौजवान के लिए प्रेरणा बन सकते हो। और शायद कई हजारों साल तक फिर यह प्रक्रिया चलती रहेगी, जैसे चलती आई है। इसलिए जब कभी भी जीवन में कुछ भी गठित हो, अगर सवाल जवाब करने, शिव तक पहुँचोगे, तो दुखी ही लौटोगे, सवाल जवाब करने, मत जाना, महादेव के पास तुम जाना, जैसे 1 बच्चा जाता है अपनी माँ के पास, अपनी माँ की गोद पर सर रखने, शांत होने, प्रेम को प्राप्त करने। क्योंकि जब जाता है तो रोता चिल्लाता जाता है। और अगर रो रहा है, चीख रहा है, चिल्ला रहा है, तो फिर तो वो इमोशन को प्रवाहित कर रहा है। अगर तुम इमोशन प्रवाहित करोगे, फिर तुम रिसीव कैसे कर सकते हो? सोचो अगर तुम उल्टी कर रहे हो, और मैं तुम्हारे मुंह में पकवान डालूं। उसी समय फिर पकवान का विश्वास। किरकिरा हो जाएगा। क्यों? क्योंकि वो उल्टी में लतपत है। या तो तुम उल्टी कर सकते हो, या तुम पकवान का सेवन कर सकते हो। दोनों साथ नहीं हो सकता। न जाने क्यों तुम शिव को देख शुरू हो जाते हो। और फिर कहते हो प्रेम मिला ने भैया तो मुल्टी करना तो बंद करो, तभी तो वो भीतर कूट डालेगा। तुम शिव के पास मौन में पहुँचो। और जब मौन में पहुंचोगे, फिर इमोशन का दूसरी तरफ प्रवाह होगा। फिर तुम से वहां नहीं जा रहा। फिर वहां से तुम्हारी तरफ नाव, यू आर, रिसीविंग नाऊ यू आर। resonating at the god frequency शन भर के लिए शांत हो जाओ। बिल्कुल शांत स्मरण करो महादेव के अवधूत स्वरूप का। और माना आज भी तुम्हारे भीतर इंद्रियाँ हैं, लेकिन शंभर के लिए भीतर के ब्रस्पति से जुड़ने की कोशिश करो। बिल्कुल शांत स्वयं को इस स्थान पर लेकर के आ। याद रखो चिंताएं या तो भविष्य की हैं या भूतकाल की। इस स्थान पर बैठे हुए स्मरण करो, अपनी श्वास का मन मन।
मंत्र, ओम नमा शिवा,
मंत्र के साथ, पूरी सांस भी ता। फिर mantr, ओ
नम शिवाय, पूरी सांस
बाहर मेरे मंत्र के साथ साँस लो और शांत होने की कोशिश करो। मैं और तुम दोनों उस अवधूत से जुड़ेंगे, उस शिव से जुड़ेंगे। अभी कोई उल्टी नहीं करनी। कुछ नहीं कि भैया ये हो गया, वो हो गया, जो होना था, हो गया। महादेव की माया। अब हम उस महादेव से जुड़ने के लिए बैठे हैं, अपने शरीर को शांत होने। 2 शुरुआत मासपेशियों से करो तुम्हारा, हाथ शांत, छाती शांत, पेट शांत, कपाल शांत, जांघे शांत और बिल्कुल शांत हो कर के, पूरी सास भीतर
होम, नामा शेवा,
पूरी सास बाहर।
ओम नम सेवा।
करते रहे, केवल साँस पर ध्यान, केवल मंत्र पर ध्यान, तुम उस बालक के समान जो अपनी माँ की ओर लौट रहा है। और तुम्हारी माँ, तुम्हारे परमपिता परमेश्वर महादेव। अवधूत ध्यान मग्न बैठे हुए।
ओम नम शिवाय, ओम नमा शिवाय, ओम नमा शिवाय, ओम नमा सेवाय, ओम नमा सेवाय, ओम नामा सेवा, ओम नमा सेवा, ओम नमा सेवाय, ओम नमा सेवा।
आज सोने से पहले तुम्हें केवल इतना करना है। ध्यान, सांस, पर और सास को मंत्र से जोड़। 2 मनही मन, मंत्र चलता रहे। और तुम भीतर के ज्ञान से जुड़ने की कोशिश करो। शिव के प्रति। 1 गहरा समर्पण भाव रखो, और हो सकता है इंद्र व्याकुल हो, लेकिन तुम ब्रस्पति बन इस इंद्र को समझा। 2 शिव से बढ़के और कुछ भी नहीं हो सकता है। फिर तुम्हें इंद्र बोले विधि का विधान जो होना है, वो होगा। तुम ब्रस्पति बन उस इंद्र को कहे। 2 शिव से बढ़ के कोई विधि नहीं, कोई विधान नहीं। उस विधि की उत्पत्ति महादेव की है। और इस विधि का संहार भी महादेव स्वयं नहीं करेंगे। और जब तुम भीतर बैठे भ्रष्टपति की आवाज को ताकत दोगे सांस पर ध्यान होगा, मन ही मन मंत्र होगा, तो तुम पाओगे तुम साधना में गहरे उतरते जा रहे हो। और इसी साधना में तुम योग निद्रा को प्राप्त हो जाओगे। और कल सुबह जब उठोगे मुस्कुराते हुए शक्तिशाली ताकतवर हो सके, तो कल सुबह। फिर तुम इस पर्वचन को सुनो, इस सत्संग को सुनो, क्योंकि हो सकता है चलती गाड़ी में, फिर तुम किसी बेवकूफ के साथ बैठे हो, जो हैंड ब्रेक दबा दे, फिर बड़ा मन करेगा शिव से चर्चा करने का, तब तुम फिर इस प्रवचन को सुन, ध्यान सांस की ओर ले जाना, ध्यान मंत्र की ओर ले जाना। और याद रखना, शिव मौन में है। और जब तुम्हारा दिन बहुत अच्छा व्यतीत होगा, फिर शाम को संध्या काल में मैं, और तुम शिव महापुराण के तीसरे दिन को प्रारंभ करेंगे। आज के लिये इतना ही जाने से पहले आप सबसे प्रार्थना है कि इस वीडियो को शेयर करें, चाहे, फेसबुक पर शेयर करें, चाहे व्हाट्सएप पर शेयर करें, चाहे, इंस्टाग्राम पे शेयर करें, जरूर से जरूर बहुत इंद्रों की सहायता होगी। और इस वीडियो पर लाइक करें ताकि जो अलगोरिथम है। फेसबुक को भी पता चले कि 1 शिव योगी शिव महापुराण की कथा कर रहा है, और साथ ही साथ 1 बहुत दिव्य। ओम नम शिवाय। तुम कमेंट सेक्शन पर लिखना, कब तक पर्चियों पर उल्लू का पट्ठा लिखोगे, आज कमेंट सेक्शन पर तुम नम शिवाय लिख, फिर ध्यानमग्न हो निद्रा की ओर, पढना, आप सबको, आप सब के भीतर बैठे, शिव शिवा को मेरा प्रणाम ब्लेसयूनामाशिवाय।










