SHIVMAHAPURAN - Art of Dying | Maha Sadhna | By Shivyogi Ishan Shivanand | (Day 3)

In this third‑day lecture of the Shiv Mahapuran series, the speaker (Shivyogi Ishan Shivanand) guides listeners through the experiential and philosophical dimensions of death, urging a conscious transition from the ordinary ‘death door’ to the true ‘moksha door’. He describes the physical sensations that accompany the dying process—cold limbs, loss of breath, and the gradual shutdown of neural activity—followed by the inner perception of the soul as it witnesses its own corpse, grieving relatives, and the inevitable arrival of Yama’s messengers. The discourse then moves to the emotional reckoning that arises when one confronts unfinished tasks, ego, and attachment, emphasizing that true liberation requires surrender of the ego and acceptance of impermanence. The speaker critiques modern distractions—materialism, social media, and false gurus—arguing that they keep seekers trapped in samsara. He stresses the necessity of an authentic guru who can impart genuine pranayama, meditation, and the knowledge of Shiva’s various forms (Mahadev, Bhairava, Mahakaleshwar) to prepare the aspirant for death. Practical instructions for deep breathing, breath‑control, and inner silence are offered as tools to purify the mind. The lecture culminates in a call to action: sharing the teaching, invoking Shiva’s name, and committing to the remaining two days of intensive sadhana to ultimately merge the seeker, guru, and Shiva into one.
Chapters
sco sbke ber bete bagan shiv shiva mera pranam बहुत प्रेम व सम्मान से आप सबका शिव महापुराण के इस तीसरे दिन पर स्वागत करता हूँ। ब्लेयू बिल्कुल शांत हो कर के बैठे और शन भर के लिए अपना ध्यान उस समय की ओर लेकर के जाए जब पूरा जीवन पीठ पीछे है और सामने 1 द्वार वो द्वार। मृत्यु द्वार के उस पार क्या है, आप नहीं जानते, लेकिन आपको उस द्वार तक चलना तो होगा देखो कि क्या आप उस द्वार तक चलते हुए जा रहे हो और या यम दूत आपको खींच रहे हैं। और जैसे जैसे वो द्वार आपके और पास आता है, तो भीतर कैसे भाव उत्पन्न हो रहे हैं। क्या क्या छोड़ के जा रहे हो। आप उस द्वार की ओर ऐसे कौन कौन से काम हैं जो अधूरे रह गए। ऐसे कौन कौन से प्रियजन हैं जो आपने पीछे छोड़ दी। लेकिन वो बात तो बात की है, अभी तो 1 ही द्वार और वो द्वार मृत्यु। जैसे जैसे आप उस द्वार के और पास आते, शरीर कमजोर पड़ जाता है। मृत्यु का आभास सबसे पहले आपको अपने हाथों और पैरों में होगा, आपके हाथ पैर ठंडे होने शुरू हो जाएंगे। प्राणशक्ति सबसे पहले हाथ और पैर से ऊपर खींचनी शुरू होगी, आप बैठ जाओगे, गिर जाओगे, धीरे धीरे प्राणशक्ति और ऊपर उठेगी, फिर आपका हृदय चलना बंद कर देगा। और धीरे धीरे आपका 1 ही ओर्गन काम करेगा। और वो है आपकी ब्रेन, आपका दिमाग कहने का मतलब आप कुछ बोल नहीं पाओगे, कुछ सुन नहीं पाओगे, लेकिन समझ सब कुछ आएगी आपको दिखेगा। धीरे धीरे कैसे, दिल धड़कना बंद करता है, धीरे धीरे कैसे सांस का प्रवाह रुक जाता है। आपको समझ आएगी कौन, आपके आसपास खड़ा है, कौन रो रहा है, चीख रहा है, चिल्ला रहा है। और आप किसी के आंसू पोछ नहीं पाओगे। आप समझ पाओगे कब चिकित्सक, आपको मृत बता देगा और आप लड़ना चाहोगे। आप उसको कहना चाहोगे। मैं अभी भी हूँ, मैं शरीर में अभी भी हूँ। लेकिन धीरे धीरे फिर न्यूरॉन्स भी काम करना बंद कर देंगे। और फिर आप अपने शरीर के सामने खड़े हो और स्मरण करो। कैसा लगता है जब आप ही के सामने आपका, मृत शरीर है। अब शरीर में कोई जीवन नहीं। अब आपकी आँखें खुली तो खुली, बंद तो बंद, मुंह खुला तो खुला बंतो, बंद 11 मांस पेशी, ढीली पड़ी और देखो कौन कौन प्रियजन है आपके आसपास जब शरीर की मृत्यु हो गई, अभी तक आपने वो द्वार पार नहीं किया, अभी भी आप इसी लोक में हो। लेकिन अब क्योंकि शरीर चला गया तो आप केवल अनुभव कर सकते हो, कुछ कह नहीं सकते, कुछ कर नहीं सकते। अब केवल यातना शरीर है। और यातना का मतलब अगर दुख हो रहा है। अगर क्रोध है? मृत्यु के प्रति तो बस क्रोध ही रहेगा, दुख है तो दुख ही रहेगा। और स्मरण करो। क्या भाव उत्पन होता है जब आप अपने बुजुर्ग, माता पिता को देखते हो। आप ही के मृत शरीर के सामने आपके छोटे बच्चे, रोते, चीखते, चिल्लाते, आप ही के शरीर के सामने आपकी पत्नी, आपका पति, आप ही के शरीर के सामने। और याद रखना, कितना भी चीखें, कितना भी चिल्लाएं, इससे पहले कि आप अपनी मृत्यु को पूर्णता स्वीकार करो, आपके प्रियजन, आपकी मृत्यु को स्वीकार कर लेंगे। आपको क्या लगा था कि वो टूट जाएंगे टूटेंगे शन भर के लिए। लेकिन अहंकार किस बात का आपको मुर्गे न बना, जिसको लगता है कि अगर मैं कुकड़ू कू नहीं करूंगा, तो सवेरा नहीं होगा। टूटेंगे, सब, प्रियजन, टूटेंगे, लेकिन शंभर के लिए। और इससे पहले कि आप अपने शरीर की मृत्यु को स्वीकार करो, उन्हें स्वीकार करनी पड़ेगी, वो प्रैक्टिकल हो जाएंगे। क्योंकि घर में कौन म्रत शरीर रखना चाहता है। वो जानते है, यही शरीर सड़ जाएगा। यही शरीर बस मारे। और इससे पहले शरीर सड़ना शुरू करें। अब उन्हें तैयारी करनी है आपके देश संस्कार की। जीवन भर। आपने बहुत आभूषण धारण किए होंगे, बहुत ब्रैंड पहनी होंगी। आज देखो आखिरी जोड़ी कपड़े को जो आपके शरीर पर बिना आपकी चॉइस के डाले जा रहे हैं। और कैसा लगता है यह मृत शरीर। उन कपड़ों में कितना समय व्यर्थ गंवाया आपने कि ये शरीर कैसे दिखे। आपको पता था कहीं न कहीं अंतर्मन में कि ये शरीर उधार का है। लेकिन फिर भी आप व्यर्थ ही इस शरीर को निहारते रहते। और कर भी क्या सकते थे। जीवन को तो सिद्ध किया नहीं, इसलिए शरीर पर ही पूरा काम था। पूरा जोर था। 2 किलो कम हो जाए, 2 किलो बढ़ जाए, 3 किलो कम हो जाए, 3 किलो बढ़ जाए। थोड़ा और अपने चेहरे को निकाल लो, निहार लो। कितना समय आईने के सामने, व्यर्थ ही आपने गवा दिया, कितनी सेल्फियां, व्यर्थ खींचे। अब ये शरीर पड़ा है। आपके आखिरी जोड़ें और देखो। कैसे आपका परिवार इसी शरीर को उठाकर लेकर के जा रहा है। अपनी अंतिम यात्रा में। आप भी चलोगे, अपने यात्रा शरीर को धारण कर, आखिरी बार देख लो, अपने घर को, तुम्हारा बिस्तर, आखिरी बार देख लो अपनी वस्तुओं को और स्मरण करो। कैसा होता है क्या भाव उत्पन होता है। क्योंकि अंत में बस भाव को ही स्मरण कर पाओगे। और तो कुछ बचा ही नहीं स्मरण करने के लिए। आपको क्या पता? कौनसा आखिरी भोजन? क्योंकि जिस क्षण पता चलेगा, मृत्यु आ गई। फिर बहुत देर है भोजन की, प्रेम की या कुछ और करने के लिए। फिर फिर केवल अनुभव कर सके। और ये होना है आपके साथ कुछ और। सत्य हो या न हो, ये परम सत्य है कि आपका परिवार, आपके मृत, शरीर को आप ही के घर से उठाकर के ले जाएगा। और फिर देखो अपने शरीर को शमशान में, लकड़ी के ढेर के ऊपर आपका खूबसूरत। शरीर आपके प्रियजन और स्मरण करो। फिर कौनसा प्रियजन, अग्नि लेकर के आएगा। अंत में कोई दुश्मन नहीं, आप ही के प्रियजन आपके शरीर को आग लगा देंगे, अनुभव करो, वो चिंगारी अनुभव करो। अग्नि लकड़ी के ढेर को जलाते हुए। सबसे पहले आपके बाल जलेंगे, फिर आपके कपड़े आग पकड़ेंगे, फिर आपकी चमड़ी काली पड़नी शुरू हो जाएगी। यह होना ही है। ये होगा, ये इकलौता परमसत्य है, कब? वो महादेव के हाथ में। लेकिन यह तो होना है जब चमड़ी काली पड़ेगी, तापमान बढ़ेगा, फिर आप का खून आप के शरीर के भीतर उबलना शुरू हो जाएगा। और फिर फटने की आवाज आएगी जगह जगह से शरीर फटना शुरू हो जाएगा। बाप शरीर को छोड़ेगी और फिर धीरे धीरे आप शरीर को पहचान नहीं पाओगे। और फिर केवल अगनी रह जाएगी। और फिर केवल अंगार है। और जब अंगारे सुलग रहे होंगे, आपके परिवार के जाने का समय आ जाएगा, न जाने कितनी बार आप जीवन जी चुके हो, न जाने कितने परिवार अपने पीछे छोड़ दिए, ये कोई नई बात नहीं। फिर आप ही के बच्चे आप ही को शमशान में जला करके चले जाएंगे। आपसे पहले आपकी मृत्यु को वो स्वीकार करेंगे और अंत में बस आपको अपने परिवार की पीठ दिखाई पड़ेगी। जाते हुए आप कितना भी चीख लो, चिल्ला लो यातना शरीर में, कोई नहीं रुकने वाला। और देखो अपने परिवार को जाते हुए। और अब इस शमशान की सुलखती अंगारों के बीच आप अकेले हो और आपके सामने बस ये भस्म रह जाएगी। महादेव शिव शिवा के भस्म अब और कुछ भी नहीं। और अभी तक तो आप मृत्यु के द्वार तक पहुंचे ही नहीं। क्योंकि जिसको आप मृत्यु का द्वार समझ रहे थे, वो मोक्ष का द्वार है। मृत्यु तो बस आपके शरीर की होती है। आत्मा को तो आपने मुक् द्वार तक शायद पहुँचाया ही नहीं। आत्मा को न जाने कब से इसी भूलों पर व्याकुल हो भटक रही है। कभी। 1 शरीर से दूसरे शरीर पर, न जाने कितनी बार 84 लाख योनिया आप भोग चुके हो, न जाने कितने जन्म आपने देख लिए। आपने इस भूलोक पर कृष्ण को भी चलता देखा, राम को भी चलता देखा। शायद आप खुद राम या रावण की सेना में युद्ध कर रहे थे। लेकिन आपने कभी मोक्ष को प्राप्त नहीं किया। क्यों नहीं किया? क्योंकि आज भी आप यहाँ खड़े हो अपनी ही भस्म के सामने, राख के सामने। जिस राख को कभी आपने शरीर कहा था, अब ये जीवन भी चला गया, ये परिवार भी चला गया और आप स्थान पर खड़े हो। और देखो अपने जीवन को। क्या ये जीवन पूर्ण जीवन था? क्या मैं इस जीवन में सफल हो सका? या ये जीवन भी मैंने व्यर्थ गंवा दिया। वहीं विकार में, वही है, काम। क्रोध लोग कुछ नया तो है नहीं, कुछ नया कभी। करते भी कहा। इस समय पर मैं पैदा हुआ। महादेव ने बहुत कुछ दिया, राजा के समान। मैंने खाना खाया, पहली बार जादू जैसी टेक्नोलॉजी मैंने अनुभव की। लेकिन किया क्या? क्या उस टेक्नोलॉजी का भी उपयोग मैंने इसलिए किया कि अपने क्रोध को, लोगो को, अहंकार को और प्रचलित कर सकू। फिर फर्क ही क्या है? जब राजा भी बना तो अहंकार की पूर्ति की। आज पैदा हुआ। तो भी अहंकार की पूर्ति थी। क्या इस बार तुम मोक्ष द्वार तक चल पाओगे? या आज भी अपनी ही यात्राओं के बोझ से दबे पड़े बैठे हो इस राख के ढेर के सामने, जिसको कभी तुमने जीवन कहा था। और ये परम सत्य, ये परम सच्चाई कल भी हो सकती है, पर सो भी हो सकती है। क्या पता आज ही हो। तुम शिवयोगी हो, तुम शिव के हर स्वरूप को जानते हो, स्वीकार करते हो। और शिव तुम्हें हीलिंग देने वाला महामृत्युंजय भी है। और शिव महाकाल भी है, शिव भैरव भी है। वहीं भैरव जो अगर तुम पुकारोगे तो इसी शमशान में तुम्हें लेने आएगा। जिस भेरव के सामने सभी यमदूत नतमस्तक हो जाएंगे। और तुम अपने आप से ये सवाल पूछो। क्या इस जीवन में तुमने शिव को अनुभव किया और शिव तक तुम पहुँचते? कैसे? क्या तुमने गुरु को माध्यम बनाया? क्योंकि याद रखो, जो छोटा बालक पैदा होकर अपने माँ बाप को खो देता है, उसे हम अनाथ कहते हैं। और 1 अनाथ के लिए जीवन बहुत कठिन है। उसी प्रकार से जो निगुरा है, बिन गुरु का व मृत्यु के बाद अनाथ है। 1 निगुरे के लिए मृत्यु बहुत कठिन है। कहीं तुम निगुरे तो नहीं? अगर निगुरे हो तो मृत्यु में तुम अनाथ हो। और जो अनाथ है, फिर पूरी प्रकृति उस पर आक्रमण करती है। फिर यमदूत भी आएंगे, ब्रह्म राक्षस भी आयेंगे, फिर तुम जानते नहीं, तुम्हें क्या करना है? जैसे जीवन में तुमने सड़क के किनारे बहुत नाथों को देखा होगा, रेलवे की पटरियों पर बहुत नाथ को देखा होगा, जो जानते ही नहीं, क्योंकि कोई है ही नहीं, ऊंगली थामने वाला कोई है ही नहीं, समझाने वाला, सिखाने वाला, ले जाने वाला। कहीं इस जीवन में तुम निगुरे तो नहीं रह गए? कहीं इस जीवन में भी तुम ने गुरु को भी 1 कमोडिटी समझ लिया? कमोडिटी का क्या मतलब है? आभूषण मैं ऐसा क्या आभूषण ग्रहण कर लो, जिससे सब पड़ोसी मोहल्ले वाले मुझे देख कर के बोले वाह, तुम तो बड़े महान हो। कहीं ऐसा तो नहीं कि इस जीवन में तुम्हें लगा कि जब मैं संत महात्माओं के पास जाता हूँ तो ये भी 1 आभूषण समान है। इंस्टाग्राम पर फोटो डाल देंगे इनके स। और फिर यह हमारे गुरु हो गए। जैसे हीरो हिरोइन चलते हैं, कुछ साल वैसे इंस्टाग्राम पर भी कुछ गुरु चल रहे होते, तो मैं वहाँ चला गया। थोड़ी बहुत सुन ली, फिर आ गया। और मुझे लगा मैंने गुरु बना लिया। क्या तुमने दिक्षा ली? क्या तुमने अपने गुरु से ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया? 2 कहने से थोड़ी न कोई गुरु बन जाता है। ऐसे तो कहने से हरा नाथ का बाप अम्बानी उस बच्चे को बच्चे लाना है। सड़क की पटरी पर बैठ मेरा बाप, अम्बानी मेरा बाप अम्बानी, तो क्या अम्बानी उसका बाप हो गया? ऐसे थोड़ी न होता। क्या तुमने ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया? अपने गुरु से? क्या तुमने दिशा ली? क्या तुमने जाना? क्या तुम्हें सच पिता नंद की शांति की अनुभूति हुई? क्या तुम्हें तुम्हारे गुरु ने मृत्यु सिखाई? क्या तुम्हें तुम्हारे गुरु ने तुम्हारे ग्रंथियों का ज्ञान दिया? और किस प्रकार से तुम ग्रंथि वेदन करो? क्योंकि अगर ज्ञान नहीं दिया। फिर तो रह जाओगे। और तुम्हें क्या लगा था? कथा सुनना गुरु का ज्ञान है। याद रखना, जिस हिसाब से जिंदगी चल रही है, जिस हिसाब से टेक्नोलॉजी जा रही है। तुम सब के घरों में कोई न कोई रोबोट बैठा होगा। ए आई, जो जिस आवाज में तुम सुनना चाहो, उस आवाज में तुम्हे शास्त्र दर्शन करा देगा। फिर तुम उस एआई से बोलो, आज हम भागवत शाहरुख खान की आवाज में सुनेंगे और सुना देगी। फिर तुम उसे बोलो, आज उदितनारायण की आवाज में सुनेंगे और तुम देखो। ए आई। तुम्हे चौपाइयाँ सुना रही है, लेकिन उससे ब्रह्मज्ञान तुम्हें नहीं मिलेगा। गुरु वो, जो तुम्हें साधना सिखाए, तब जो तुम्हे सिखाए कि सुशला से किस प्रकार अपनी चेतना को तुम्हें उठना होगा। और अगर इस ज्ञान से तुम अनजान हो, तो तुम फिर मृत्यु से अनजान हो। फिर न जाने कितनी बार तुम कथाओं को सुन। इसी भूलोक पर अपने जीवन को व्यक्त गंवा रहे हो। और तुम स्मरण करो। कहीं? तुम निगुरे तो नहीं? और अगर निगुरे तो अंधकार बढ़ता चला जाएगा। फिर इसी अंधकार में तुम्हें दुख की अनुभूति होगी। कष्ट? ऐसा कष्ट जो जीवन में कभी तुमने अनुभव नहीं किया? क्यों? क्योंकि जीवन में तुम्हारे पास वस्तुएं थीं, स्वयं को मूर्छित करने के लिए। जब दुख बढ़ता, तुम 2 पैग लगा लेते, तुमने कभी दुख को जीता नहीं। तुम बस दुख के प्रति स्वयं क को नंब करने में दिग्गज बन गए। तुम्हे क्या लगता है, तुम खुश हो, तुम खुश नहीं हो, तुम जीवन के प्रति गांधी जी के बंदर बने, बैठे हो। आँखें बंद कान बंद। मुह बंद, तुम्हे भी पता है तुम्हारे हृदय में कितना दुख है। तुम्हे भी पता है कितना भार तुम लेकर के चल रहे हो। और आज तक ये दुख तुमने किसी को नहीं बताया किसको बताते कभी कोशिश की थी। और कोई तुम से कितना भी प्रेम क्यों न करता। 1 बार सुन लेगा, 2 बार सुन लेगा, तीसरी बार, वो भी बोलेगा बकवास बंद करो, बढ़ो आगे। और इसलिए तुमने अपना दुख छिपाना सीख लिया, अंदर से रोते हो, परिवार के सामने, मुस्कुराना सीख लिया, तुमने अपना क्रोध छिपाना सीख लिया। न जाने तुमसे काम में कितने गलत काम कराए गए। और तुम चीखना चाहते थे, क्रोधित थे कि ये गलत है, मैं नहीं करूँगा, लेकिन क्या करते? बच्चों को स्कूल भेजना था, जानते हुए, ये पाप है। तुमने न जाने कितने गलत काम किए, पेट भरना था, तब कहाँ थे तुम्हारे? शिव और गुरु तो तुमने बनाए नहीं, इसलिए तुम धोखेबाज बन गए, तुम झूठे बन गए, तुमने खुद को झूठ बोलना शुरू कर दिया, कि मैं खुश हूँ, दुनिया को झूठ बोलना शुरू कर दिया। मारी सिद्ध कर ली, तुमने इंस्टाग्राम पर, फेसबुक पर मुस्कुराते चेहरे, तुम खींच के डालते रहे, दुनिया को बताते रहे, तुम खुश हो, लेकिन केवल तुम जानते हो। तुम्हारे हृदय में विकारों के कितने भार है, जो तुम लेकर के चल रहे हो। और गुरु होता तो गुरु के सामने इस भार को, इस पोटली को, इस बोरी को तुम त्याग सकते। लेकिन गुरु तो बनाया नहीं। इसलिए जीवन भर धोबी के गधे के समान है। इन दुखों को पीठ पर लाद कर चलते रहे। और मारी सीख ली कि मुस्कुरा 2 जब कोई पूछे कैसे हो, हाँ, मैं तो बहुत अच्छा हूँ। तुमने जीवन भर 1 ही चीज़, सिद्ध की खुद से झूठ बोलना। और तुम जानते हो तुम्हारे भीतर कितने दुख हैं कितने कष्ट त मने भोगे, कितने ट्रामा तुम्हारे अंदर है। और अगर जीते जी, तुम इन्हें रिजॉल्व नहीं करते। अगर जीते जी तुम सुख और शांति को नहीं अनुभव करते। अगर जीते जी, तुमने बस अपने आप को नंब किया है, मुर्चित किया है, अपना ध्यान भटकाया है। और ध्यान में भटकाने में माहिर हो। तुम आज भी मुझे सुन रहे हो। लेकिन तुम्हारी उंगलियां मचल रही है कि बस इतना ही तो करना है। और ये शिव योगी अपनी बकवास बंद कर देगा। और कोई अपसरा नाच रही होगी, इतना ही तो करना है, बस इतना ही करना है। और ब्रह्मज्ञान खत्म। फिर 1 नाचती अब शराब को देख लूंगा, फिर कल कल? कल का सोचूंगा, बिना सोचे क्या पता? कल शरीर के स्थान पर तुम्हें बस्म मिले। 1 समय के बाद साक्षात्कार का मतलब है भागना बंद करना, मृत्यु से भागना बंद करना, जीवन से भागना बंद करना, गुरु से भागना बंद करना, शिव से भागना बंद करना। और सामने खड़े होकर बोला कि अब में तैयार हूँ, अब अब बस हो गया, अब मैं अपना ध्यान नहीं भटका सकता। क्योंकी? अगर इन असुरों को, इन विकारों को लेकर के मैं मृत्यु को प्राप्त होगा। तो मृत्यु के बाद यही विकार, फिर तांडव करेंगे मेरे सामने, फिर कैसे ध्यान भटकाओ ग, जब शरीर बस्म हो गया, फिर इंद्रियों से कैसे ध्यान भटकाओगे? और इंद्र तो हमेशा ध्यान भटकाता है इंद्र के पास और है ही क्या? 2 अब सराय नचा, दी, प्रलोभन, दे दिया। और मृत्यु शरीर की मृत्यु के बाद तो इंद्र भी साथ छोड़ देता है। फिर ध्यान नहीं पटक सकते, फिर देखना होगा, देखना होगा इन कर्मों को जिनको जीते जी तब के माध्यम से बस करना था, लेकिन तुमने नहीं किया। फिर ये तुम्हारे पास आयेंगे विकराल स्वरूप में। फिर तुम्हें अपने कर्म असुर के समान दिखाई देंगे। तुम्हारे पास आते हुए तुम्हें लगेगा, ये यमदूत है। तुम इनके दांतों को देखोगे, इनकी आँखों को देखोगे घबराओगे और फिर विचलित हो तुम। फिर कोई योनि देखोगे कि कहीं और किसी और घर जन्म ले लो, जल्दी से जल्दी किसी और पशु पक्षी के गर्भ में प्रवेश कर डालो। और फिर तुम दौड़ पड़ोगे जीवन की ओर। और फिर ये चक्कर शुरू हो जाएगा। पुनरपि, जननम, पुनरपि मरना। और अब तो कलयुग है, अब न जाने कौन सी योनी में जन्म लो, अब न जाने कौन से जीवन को अनुभव करो और क्या मतलब इस जीवन का? क्या मतलब? इन सुख का, सुबह का खाया पकवान शाम को तुम्हारी सोच बन जाता है। फिर वही सुगंध दुर्गंध बन जाती है। शरीर और करता ही क्या है? पकवान को सोच बनाने के सिवा है। जवानी का रिश्ता बुढापे में दुख देता है। अपनी साधु फोटो देखना, हंसते हुए, मुस्कुराते हुए और आज अपनी बीवी की गिजा के शकल देखो। न जाने कितनी बार उसने सपने लिए। तुम्हारे सर पर बेलन मारने शरीर और करता क्या है? सिवाय शोच बनाने के तुमने कितने रिश्तों को शोच बना दिया। अब तुम्हें सोचना है कि यह जीवन मुझे मिला है। इस जीवन में मुझे सनातन मिला है। इस जीवन में मुझे शिव की समझ तो नहीं, लेकिन पहचान है। मुझे गुरु की समझ तो नहीं, लेकिन पहचान है। साधना की समझ तो नहीं, लेकिन पहचान है। 1 गहरी सांस लो, 1 और गहरी सांस लो, 1 और गहरी सांस ल और 1 बार फिर स्थान पर आ जाओ। मेरे सामने अपने फोन को पकड़े हुए। महादेव की कृपा से तुम अभी भी जीवित हो। महादेव की कृपा से तुम्हारे पास अभी भी समय है, अभी भी समय है कि तुम गुरु बना लो। और गुरु बनाने का मतलब ये नहीं, अनाथ की तरह रेलवे पटरी पर बैठ अंबानी मेरा बाप, अम्बानी, मेरा बाप, गुरु बनाने का मतलब तुम अपने गुरु से दिक्षा लो, अपने गुरु से प्रणायम सीखो और प्राणायम गलती से भी। यह मत समझ लेना, सांस भीतर बाहर लेना है। प्रणायम का मतलब, प्राणों का संचार, तुम स्मरण रखो, ऋषि मुनी पहाड़ की चोटी पर बैठ कर साधना करते थे। या गुफा के अंदर और दोनों स्थानों पर ऑक्सीजन की कमी है। हाई, अल्टीट्यूट पर ऑक्सीजन लेवल लो है और गुफा के भीतर ऑक्सीजन लेवल लो है। यह बहुत बड़ा भ्रम है, जो तुम्हें सिखाया गया है कि जब प्रणाम होती। we are talking about occigenation of the blood, jab, occegnकecme, we are forced to focus on the flow of prana, insted of the breast, itself guru। कौन जो तुम्हे प्रणाम सिखा, सके, प्राणों का संचार गुरु? कौन जो तुम्हे नाडियों का ज्ञान दे सके, जो तुम्हे इंद्री जीतने का माध्यम दे सके, ग्रंथि भेदन की शक्ति दे सके, जो तुम्हारी ऊँगली थाम कर, तुम्हें महादेव के सामने ला खड़ा करे। गुरु। कौन जो तुम्हे सिखा है, हमसा शिवा सो, हम हम सा कि तुम ही शुभ हो, वो गुरु नहीं, जो तुमने और सिद्ध में भेद उत्पन करता है, वो चलाकी, क्योंकि ऐसे बड़े विद्वान मैंने देखे, जो तुम्हें सिखाएंगे। बुध अलग हैं, बुध सिद्ध थे, महावीर अलग है, महावीर सिद्ध थे, विवेकानंद अलग हैं, विवेकानंद सिद्ध थे, जो तुम्हें बताएंगे, तुम्हारा 1 ही काम है। इन सिद्धों की पूजा करना। गुरु ने वो पुजारी है। क्यूंकि? जहाँ तुमने केवल सिद्धों की पूजा करना सीखा, तो तुमने सिद्धों में और स्वयं में भेद उत्पन्न कर दी। फिर मनीमन तुमने स्वीकार कर लिया कि वो कुछ और है और मैं सामान्य हूँ। सामान्य होना बहुत बड़ी चालाकी है। सामान्य स्वयं को बोलना आलस का बहुत बड़ा प्रतीक है। मेरे पास भी लोग आते हैं, कहते हैं कि भैया कहाँ हम आपसे साधना सीखें, हमारे पास समय नहीं, हमारे 2 बच्चे हैं। और मैं मन ही मन सोचता हूँ। तो क्या मैंने बंदर जन में है? भैया, हम कहाँ साधना सीख सकते हैं? हमारी तो पत्नी है। भैया, तो हमारी भी प्राण वल्ल है। सब रशियों की थी। मैं शिव योग परंपरा से हूँ। और हम तो ग्रस्त होते हैं। जितनी माँ या तुम अनुभव कर रहे हो, उतनी माँ या मेरे भी जीवन में और शिव योगियों का काम ही रहा है। अनंत काल से ग्रस्तों को मार्ग दिखाना, ग्रस्तों को शिव तक पहुंचाना। क्योंकि सामान्य आदमी, चालाकी, खेलेगा और कहेगा की देखो अभी तो हम जीवन में संन्यास नहीं ले सकते। 75 की उम्र में आयेंगे, आपके पास भैया सठियाए हुए व्यक्ति का मैं क्या करूँगा? 75 की उम्र में तो तुम्हारे न तो भेजे में कुछ बचेगा, न शरीर में कुछ बचेगा और न जाने कौन सी गोली खा के तुम जीवित रहोगे। अमेरिका में कई साल मैंने हॉस्पिस में काम किया होस्पिस। वो समय है जहाँ मृत्यु से पहले 1 बुजुर्ग को भेज दिया जाता है, और सारे वहाँ सठियाए हुए पहुँचते हैं। सारोह की कॉगनेटिव फेसिलिटी परम डिकलाइन में कॉगनिशन है ही नहीं। और कहने को होस्पिस में आ गए। अब मैं वहाँ पर उनकी मेंटल हेल्थ का डायरेक्टर। अब वो जिसको पता ही नहीं, वो कहाँ बैठा है। मैं उसको बोलूं आओ, मैं तुम्हें ब्रह्माण के ज्ञान का दर्शन 2 कैसे दे पाऊँगा? अब तो मैं बस प्रार्थना कर सकता हूँ। तब मैं बस चैपलिन का काम कर सकता। और तो कुछ किया जा भी नहीं सकता। अभी अगर तुम मुझे सुन पा रहे हो, तो इस बात को समझ लो। अभी भी समय है, क्योंकि अभी थोड़ी बहुत समझ है, तुम्हारे भीतर आते आते समय बढते, बढते तुम्हारा, उसके बाद क्या समझा पाऊँगा? मैं तुम्हें तुम खुद देखो, क्या अपने बाप को कुछ समझा सकते हो? अब 4 तो न्यूरॉन उसके भेजे में बचे हैं और वो भी ओवर टाइम कर रहे हैं, इस का कुछ नहीं समझ सकते। और ऐसे बुड्ढे तुम मेरे सामने बिठा 2 और बोलो की मैं इनका कुछ कर दूं। क्या करूँगा मैं? फिर मैं उन्हें प्राथना सिखा सकता हूँ, फिर मैं उन्हें भजन ही सिखा सकता हूँ। फिर मैं उन्हें यही कह सकता हूँ कि आओ राम राम कर ले। अब साधना पथ पीछे छोड़ दिया उन्होंने। अब कठिन है? और इसलिए तुम देखोगे, जब भजन हो रहा है। कीर्तन हो रहे है, बुड्ढों की भीड़ क्यों? क्योंकि साधना का समय होता है, साधना में शरीर को थोड़ा और तपाना पड़ेगा। इसलिए अगर तुम अभी नौजवान हो, बहुत अच्छी बात है। मैं तुम्हें बहुत आगे ले जा सकता हूँ, तुम्हारा गुरु, तुम्हें बहुत आगे ले जा सकता है, तुम्हारा गुरु, तुम्हें साधना में और गहरा उतर सकता है। और इसलिए अभी अगर तुम बुड्ढों की भीड़ के बीच बैठ कर कथा सुन रहे हो, तालियाँ बजा रहे हो, तो समझ जाना। यह अभी हॉस्पिस आने का समय नहीं है, ये शिवयोग का समय है, ये तब का समय है, ये जानने का समय है, यह समझने का समय है, ये स्वयं को सिद्ध करने का समय है। फिर तुम्हें जीवन भी और सुख देगा। क्यों? क्योंकि अभी जीवन जीते हो, अपना ध्यान भटका कर। क्योंकि तुम्हे भी पता है हृदय में कितना दुख का भार लेकर के चल रहे हो। साधना में हम क्या करते हैं? साधना में? सबसे पहले, हम स्वयं को शुद्ध करते हैं, हम अपने मन को सिद्ध करते हैं। साधना में, हम सबसे पहले स्वयं को मुक्त करते हैं। और फिर जब शांत हो, शुद्ध हो, मासूम हो, फिर तुम जीवन जीयो, फिर भगवत स्मरण में भी तुम्हें मजा आएगा क्यों? क्योंकि अभी तुम भगवान का भी इस्तेमाल अपना ध्यान भटकाने के लिए कर रहे हो, तुम्हे भी पता है 5 मिनट की आरती के बाद जब जीवन में लौटोगे, वही दुःख, तुम्हारा इंतजार कर रहा होगा, वहीं डिप्रेशन, वहीं एंग्जाइटी, तुम्हारा इंतजार कर रही होगी। तो फिर भगवान को भी हम 1 ड्रग की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए शायद नीची ने कहा है कि धर्म हफीम है, रeलiजoन, इस the ओपाइटfthe masses, रेलीजन isnopiाiट सही कहा है, लेकिन agar sadhna ke pricrsrnehethen religion is anopiart or agar sadhana ke prekrsarhathen relesion is the part to two nolegethenit is a tool। तो इसलिए अब हमें धर्म को भी अफीम की तरह इस्तेमाल नहीं करना, हमें साधना में गहरे उतरना है। और गुरु कौन जो हमें साधना दे सके। और अगर तुम्हे आज भी 5 मिनट आँखें बंद करके ध्यान नहीं लगता, सक्षम नहीं हो। तो शायद जो है वो गुरु नहीं है, विद्वान हैं, गुरु नहीं। गुरु कौन, जिसका ज्ञान और दीक्षा ले, तुम आँखें बंद कर, शांभवी लगा, घंटों घंटे, बैठ सको, नाद ब्रह्म सुन, सको, शिवामृत ग्रहण कर सको। कभी तुमने देखा है इक्षबयोगीको शिविर के खत्म होने बाद भी अपनी कुर्सी पर बैठे शिव अमृत को अनुभव करता रहता है, उसके नील बिंदु से रस टपकता रहता है। और तब अगर तुम उसके दिमाग का स्कैन निकालोगे, तुम पाओगे पूरा दिमाग इस प्रकार से फ्लेयर हो रखा है जैसे परम आनंद में फिर उसी के सेल्स उसको ही करना शुरू कर देते हैं। अगर किसी दिन हम डीएनए की स्टडी कर सके तो तुम उसके डीएनए को भी देखना और तुम पाओगे उसके डीएनए के भीतर भी बदलाव होना शुरू हो जाएगा, उसके टेलोमियर्स के भीतर बदलाव होना शुरू हो जाएगा, वो सिंगल न्यूक्लियटाइड पोलिमोरफिज्म को अनुभव करना शुरू कर देगा। जिस प्रक्रिया के माध्यम से भीतर जो स्वास्थ्य हैं, वो जागरत हो जाता है। और जो बीमारी है वो डार्मेंट होना शुरू कर देत। और इसलिए हे प्रिय, मैं नहीं जानता कौन मुझे सुन रहा है मेरे सामने तो बस नंबर लिख के आते कभी ढाई हजार, कभी 4000, कभी 10 हजार, फिर जब मैं रोज सुबह फेसबुक खोलता हूँ, तो मैं देखता हूँ। अच्छा लाख लोगो ने शिव मा पुरान सुन ली। बहुत बढ़िया बात है। वो लाभ कौन है, मैं नहीं जानता। पर तुम शिव को जानते हो, तुम शिव योग को जानते हो। और तुम इस ज्ञान को जानते हो। और आज शिव पुराण के तीसरे दिवस पर मैं तुम्हें बस इतना कह रहा हूँ, जाग जाऊँ। यही समय है जागने का, यही समय है गुरु बनाने का, यही समय है साधना में गहरे उतरने का, यही स समय है शिव को अनुभव करने का, इसी जीवन में तुम्हें मुक्त होना होगा, इसी जीवन में तुम्हें विकारों को त्याग ना होगा। और इसी जीवन में जब समय आये तो तुम उस मोक्ष द्वार तक चलते हुए जाओगे क्यों? क्योंकि तुम्हारे गुरु और शिव साथ होंगे। इसी जन्म में तुम उस द्वार को अब खोलोगे और जिस क्षण वो द्वार खुलेगा तो शिव, गुरु और तुममें कोई भेद नहीं। तुम तीनों 1 हो जाओगे। हमें सिद्धों की पूजा नहीं करनी। हमें सिद्धों के मार्ग पर चलना है। हमें भी सिद्ध बनना है। तुम सामान्य नहीं और सिद्ध खास नहीं। सिद्ध भी कभी तुम्हारी तरह सामान्य थे। तुममें और उनमें कोई फर्क नहीं। फर्क केवल मार्ग का है। तुम भी उस मार्ग पर चलोगे तो तुम भी सिद्धत्व तक पहुँच सकते हो। सिद्ध कौन जो शिव को जान चुका है। तुम कौन जो शिव को जानने वाले हो। ये मैं शिव योगी तुम्हें कह रहा हूँ। अब जाग जाना। शिव महापुराण के केवल 2 दिन बचे हैं। इन 2 दिनों पर हमारा सारा ध्यान साधना पर होगा। मैं तुम्हें कुछ साधना की विधि सिखाना चाहता हूँ जिस विधि का प्रयोग कर। तुम भी साधना के समुद्र में डुबकी मार सके। आज के लिये इतना ही जाने से पहले अभी मेरे सामने कुछ 3 4000 लोग हैं। मैं प्रार्थना करता हूँ ये 3 4000 लोग इस वीडियो को शेयर करें, लाइक करें और ओम नंबर शिवाय कमेंट सेक्शन पर लिखे। महादेव का नाम लेने से तुम शरमाना मत। हर हर महादेव महादेव ही है। जो बचेगा उस शमशान में महादेव ही तुम्हें मिलेगा। इस जीवन में महादेव ही परम सत्य है। बाकी सब कुछ मित्या। अब इस परम सत्य को स्वीकार करना शुरू कर। 2 आज से तुम्हारा जीवन बदल जाएगा। आप सबको आप सब के भीतर स्थित शिव शिवा को मेरा प्रणाम blesयoनमशुवाह।










