SHIVMAHAPURAN - Bhakti ka Mahatva | Maha Sadhna | By Shivyogi Ishan Shivanand | (Day 4)

In the fourth session of the Shiv Mahapuran series, Shivyogi Ishan Shivanand leads a devotional discourse that intertwines traditional bhakti teachings with contemporary reflections on guru dependence, technology, and personal freedom. He begins by emphasizing the transformative power of bhakti (devotion) and recounts the legend of Kannappa to illustrate pure, selfless love for Shiva. The talk then shifts to a critical examination of modern spiritual dynamics: the rise of AI‑enabled guru avatars, subscription‑based access to guru wisdom, and the psychological trap of Stockholm‑syndrome‑like attachment to a departed guru. Shivanand urges listeners to rise above false dependencies, ask honest self‑inquiry questions, and choose a spiritual protocol—whether bhakti, jnana, or a blended path—that resonates with their inner calling. The session culminates in a guided meditation that uses vivid sensory imagery (kulfi, rabri), breath awareness, and the mantra “Om Namah Shivaya” to cultivate emotional energy, deepen inner love for Shiva, and awaken a subtle divine current within the body. Participants are instructed to end the day with a simple remembrance practice before sleep, fostering a sustained connection with Shiva’s grace.
Chapters
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आप सबको आप सबके भीतर बैठे। भगवान शिव शिवा को मेरा प्रणाम। मैं बहुत प्रेम व सम्मान से आप सबका शिव महापुराण के चौथे दिवस पर हार्दिक स्वागत करता हूं। मैं प्रार्थना करता हूँ आपका जीवन सफल हो, दिव्य हो और इस जीवनकाल में आप अपने शिव को अनुभव कर सके। 1 गहरी सांस भीतर लें और सांस बाहर निकालते हुए शिव शिवा के प्रति धन्यवाद का भाव जागरत करने की कोशिश करें। शाम भर के लिए स्मरण करे। इस जीवन में कब मेरे साथ कुछ दिव्य गठित हुआ, कब भगवान ने मेरी रक्षा की, कब भगवान ने मेरे परिवार की रक्षा की? कब मैंने माँगा भी नहीं और मुझे मिला इस भाव का स्मरण रखते हुए अपने हृदय में 1 गहरा धन्यवाद का भाव उत्पन करना। धन्यवाद शिव शिवा का, जो मुझसे प्रेम करता है, जो मेरी रक्षा कर रहा
है,
धन्यवाद उशिवशिवाखा, जिससे मैं उत्पन हूँ, जिसमें मैं 1 दिन ली। धन्यवाद उस शिव शिवा जो मेरे साथ हर कण चल रहा है, मैं उस महादेव महामृत्युंजय को स्वीकार करता हूँ, प्रणाम करता हूँ, धन्यवाद करता हूँ पूरी सांस भीतर और सांस बाहर निकालते हुए। ये भाव मैं शिव शिवा को स्वीकार करता हूँ, धन्यवाद करता हूँ, प्रणाम करता हूँ। 1 और सांस भीतर तुम शंभर के लिए स्थान पर आ जाओ। तुम केवल मुझे अपने कारणों से मत सुनो। तुम मेरे शब्दों को महसूस करने की कोशिश करो। जैसे जैसे तुम मेरे शब्दों को महसूस करो, रोगे, तुम्हारी सास की गति धीमी हो जाएगी। तुम्हारा हृदय। 1 धीमी गति से धड़कना शुरू कर देगा। तुम ध्यान मग्न होना शुरू हो जाओगे। शिव अमृत इस स्थान पर है, लेकिन तुम्हें इस स्थान पर आना होग, जहां कहीं भी तुम्हारा मन है, उसे इस शिव महापुराण में लेकर के आओ। और मन ही मन भाव में शिव शिवा को स्वीकार करता हूँ, धन्यवाद करता हूँ, प्रणाम करत हूँ। 1 और गहरी सांस बहुत अच्छे। अब शन भर के लिए स्थान पर बैठ कर अपना ध्यान लेकर के जाओ, ठंडी ठंडी कुल्फी की ओर। याद करो जीवन में सबसे स्वाद कुलफी। तुमने कब खाई थी? उस कुल्फी का स्वाद याद करो, सुगंध याद करो उ उसका एहसास याद करो। तुम्हारे सामने कुल्फी पड़ी हुई, लेकिन उस कुल्फी का मजा ही क्या
जो रबड़ी
में न डूबी हो। अब याद करो वो सबसे स्वादिष्ट रबड़ी जो तुमने खाए कुल्फी के साथ
कुल्फी
और रबड़ी साथ साथ बड़े हुए, तुम स्मरण करो केसर के स्वाद का, पिस्ते के स्वाद का, गुड की मिठास का, गाय के दूध से बनी रबडी, इतनी स्वादिष्ट। और फिर तुम उस रबड़ी में डूबी कुल्फी को उठाते हो, और अपने होटों के पास लेकर के जा रहे हो। और तुम स्मरण करो सुगंध का रबड़ी और कुल्फी। और फिर तुम उस कुल्फी को चकते हो। और रबड़ी और कुल्फी तुम्हारे मुँह में घुल जाते हैं अमृत के समान। और तुम स्वाद ले रहे। 1 गर्म गर्म दिन, जिसमें ठंडी कुलफी और रबड़ी, तुम्हारी जबान पर और जब तुम स्वाद लेते हो, तुम पाओगे जितने भी लोग मुझे सुन रहे हैं, उनके मुँह में पानी आना शुरू हो जाएगा। और मज़े की बात कोई रबड़ी नहीं, कोई कुलफी नहीं।
तुम मेरे सामने बैठे हो। और तुम्हारा ध्यान रबड़ी। पर गया, कुल्फी पर गया
और तुम्हारे मुँह में पानी आना शुरू। तुमने बस सोचा और उस सोच का शरीर पर टेन्जिबल प्रभाव है। तुम्हारे मुँह में पानी आ रहा है, तुम्हारी सोच, तुम्हारे शरीर पर 1 प्रभाव डालती है। अब सोचो कुल्फी का प्रभाव था कि
मुँह में पानी आ गया।
न जाने भय का क्या प्रभाव है और क्या पता?
जैसे कुल्फी इमैजिनरी थी, बस ख्याली पुलाओ थी।
क्या पता, तुम्हारा भाई भी बस तुम्हारा ख्याल है। लेकिन शंभर के लिए सोचो भाई का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता हो? हो सकता है भय के प्रभाव से हृदय धड़कने की गति बढ़ जाए, सांस की गति बढ़ जाए, चिंता होनी, शुरू हो जाए। लेकिन आज कुल्फी भी छोड़ो, भय भी छोड़ो। तुमने यहाँ बैठ कर मान लिया कि तुम सोचते हो और शरीर पर प्रभाव पड़ता है।
अगर कुल्फी का प्रभाव पड़ा, भर के
विचार का प्रभाव पड़ा। शन भर के लिए मेरे साथ अपने शिव का स्मरण करो। चलो देखते हैं कि शिव के विचार से शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है।
अगर कुल्फी के विचार से प्रभाव पड़ा,
तो कुल्फी तो कुछ नहीं। तुम्हारे शिव के सामने शिव का तो और ताकतवर और स्थूल प्रभाव पड़ना चाहिए। तुम स्मरण करो, तुम्हारे शिव तुम्हारे सामने खड़े मुस्कुराते हुए, उनका हाथ तुम पर कृपा बरसा रहा है? तुम विज्वलाइज करो, सोचो, हजार सूर्यों के समान शिव की कृपा तुम्हारी ओर प्रवाहित और उस कृपा का स्मरण करो। वो कृपा तुम्हारे कपाल से तुम्हारे शरीर में प्रवेश करते हुए और तुम स्मरण करने की कोशिश करो। जिस दिन शिव की कृपा तुम पर पड़ेगी, यह कृपा किस प्रकार से होगी? क्या ये विद्युत के समान होगी? क्या ये जल के समान होगी? क्या इसका अनुभव स्थूल होगा? सूक्ष्म होगा। क्या तुम?
1 गहरी शांति अनुभव करोगे? या तुम्हारा कण कण जाग्रत हो उठेगा?
क्या तुम्हें कंपन महसूस होगी? या तुम्हारी साँस की गति बढ़ जाएगी?
अभी तुम बस विचार, कर,
विचार और स्मरण तुम्हारे मित्र हैं। स्मरण करो। शुभ की ऊर्जा तुम्हारे कपाल से माथे और इसे बहने।
2
माथे से गर्दन और मन ही मन विचार। मैं शिव शिवा को स्वीकार करता हूँ, धन्यवाद करता हूँ, प्रणाम करता हूँ, तुम स्मरण करो। यही शक्ति माथे से छाती और देखो कुल्फी का प्रभाव था। शिव का क्या प्रभाव होगा? महादेव की शक्ति, छाती से पेट, पेट से जांगे, जांघों से घुटना, घुटने से पैरों के तलवे और जो अब तुमने कपाल से ग्रहण किया, पैरों के तलवों से बहने। 2 आज तुम कुछ भी प्राप्त करने की चेष्टा मत रखो।
तुम बस जुड़ जाओ, अनंत को स्वीकार करो। अनंत बहने।
2 फिर पूरी सांस भीतर और शिव का स्मरण करते हुए सांस, निकालो और भाव हे महादेव। मैं आपको स्वीकार करता हूं, जागृत करता हूँ, धन्यवाद करता हूँ, प्रणाम करता हूँ। हर हर महादेव मुझे सुनते रहो और सुनते सुनते ही वीडियो को लाइक करो। अगर हर हर महादेव लिखना है, तो लिख। 2 ताकि मैं समझ जाऊं, आप सब यहाँ पर है। और बहुत अच्छा होगा।
अगर अभी से ही आप वीडियो को शेयर कर। 2 ताकि आपके देखते देखते, कई हज़ार
लोग मेरी बातों को सुन ले, देखो, तुम्हारा मन बहुत शक्तिशाली है, तुम्हारे भीतर बहुत ताकत है। सिद्ध कहते हैं शिवो हम शिवो, हम,
हम ही शिव हैं। और क्योंकि हम शिव हैं, हम बहुत शक्तिशाली हैं।
लेकिन हम फिर इस शिव का प्रयोग कैसे करते हैं? क्योंकि मजे की बात
बड़े से बड़ा,
देव भी शिव भक्त था, बड़े से बड़ा असुर भी शिव भक्त था। 1 कारण है जिस वजह से हम
भोले नाथ कहते हैं
वो शिव, शिवा तो भोला भाला है, जो शिव तुम्हारे भीतर बैठा है। अब तुम्हारी चेतना अगर आसुरिक है।
फिर तुम इसी शिव का प्रयोग भस्मासुर
के समान करोगे, अंधकासुर के समान करोगे, जलंदरासुर के समान करोगे। और वही तुम्हारे भीतर शुभ बैठा है। और चेतना देव समान है, तो तुम शुभ भक्त, अर्जुन के समान अपना जीवन जी सकते हो। तुम अवधूत के समान अपना जीवन जी सकते हो। शिव तो भोलेनाथ है।
साधना तुम्हें इसलिए नहीं करनी कि शिव प्रसन्न हो जाए। साधना इसलिए करनी है
कि तुम अगर कर्म से वशीभूत हो, असुर हो, तुम देव बन जाओ। क्योंकि मज़े की बात भोले नाथ तो तुम्हारे साथ ही रहेगा।
अगर तुम उत्पत्ति के मार्ग पर हो, तो भी भोलेनाथ साथ है। तुम विनाश के
रास्ते पर हो, तो भी भोलेनाथ तुम्हारे साथ हैं। हर हर महादेव आज ही करते हैं। मजा आएगा, जब मैं, हर हर महादेव बोल, तुम कुछ करो या तुम भी लिखो या तुम भी कोई कोई बटन दबाओ पता तो चले तुम इधर हो, हर हर महादेव। 1 बहुत बड़े सेवायत संत हुए, जिनका नाम था कनप्पा, कनप्पा, जंगल में रहते थे, शिकार करते थे,
साधारण जीवन था,
धनुष बांड लिए, शिकार करते, पेट पाल
थे, और बहुत प्रेम था उनके भीतर महादेव के प्रति। 1 दिन जंगल में चलते जा रहे थे।
और उन्हें 1 शिवलिंग मिला। और जब देखा शिवलिंग भीतर से बहुत
प्रेम उत्पन्न हुआ,
देखो, प्रेम सबके भीतर होता है।
1 पड़े लिखे के भीतर भी प्रेम है। 1 अनपढ़ के भीतर भी प्रेम है, फर्क सिर्फ इतना है, जो अनपढ़ है, वो अपने प्रेम को शब्दों में, विस्तार स्वरूप में
एक्सप्लेन नहीं कर पाता,
क्योंकि अंतर है न, तो कैसे अपने प्रेम को शब्द दे, लेकिन ऐसा नहीं कि 1 गरीब माँ अपने बच्चे को प्रेम नहीं करती, बहुत प्रेम करती है शायद, उस प्रेम को वह समझा नहीं सकती, क्योंकि पढ़ी लिखी नहीं है। लेकिन प्रेम उसके भीतर भी जो विद्वान है, वो भी महादेव से प्रेम करता है। लेकिन जब वो महादेव से प्रेम करेगा, वो रुद्री पाठ करेगा, क्योंकि विद्वान है, वो अपने प्रेम को शब्द दे सकता है। और तुम्हें क्या लगता है?
1 अनपढ वो महादेव से प्रेम नहीं
करता है, माना उसको रुद्री नहीं आती,
माना उसे
मंत्र और स्तुति कंठस्त नहीं, लेकिन प्रेम उतना ही है। और कैसे हो उसे मंत्र कंठस्त? महादेव की महिमा बहुत प्रबल है। महादेव की माया से ही हम सब किसी न किसी घर में जन्मते हैं। महादेव की माया से हमें 1 जीवन उपलब्ध होता है। महादेव की माया से हम प्रलाद भी हो सकते हैं। हिरण कच्च के घर में और महादेव की माया से हम मारखण्डे भी हो सकते हैं। महादेव की माया से, हमारे कर्मों के
प्रभाव से हमें घर मिल जाता है। अब हमें क्या पता उस घर में
कोई सात्विक हो, कोई नास्तिक हो। क्योंकि हर कोई हमारे घर में इस
जीवन को जीने की कोशिश कर रहा है।
और इस कलयुग में कौन समय रखता है, इतना कि स्वयं को विद्वान बना सके, वेद शास्त्र को कंठस्त कर सके।
लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि तुम महादेव के प्रेम से वंचित हो।
अगर तुम्हें भी 1 घर मिला होता है, जिसमें सब प्रकांड पंडित थे,
तो
शायद तुम भी महादेव के प्रति प्रेम को शब्द स्वरूप में परिवर्तित कर पाते। लेकिन तुम्हें तो 1 साधारण घर मिला, तुम्हें 1 साधारण जीवन मिला। लेकिन न जाने क्यों तुम्हारे हृदय में 1 गहरा प्रेम है। शिव शिवा के प्रति। शायद तुम भी किसी जन्म में रहे होगे। 1 ऐसा प्रेम जो तुम समझा नहीं पाते। तुम्हारे आसपास वाले सब इस संसार के प्रति मोह रखते हैं। लेकिन तुम जो यहाँ बैठा है, मेरे सामने उसका प्रेम, शिव शिवा के प्रति।
1 प्रेम, जिसको तुम शब्द नहीं दे पाएगा।
हां, तुम प्रकांड पंडित तो कहा तुम साइक्रेटरी साइकोलोजिस्ट हो। तुम तो 1 साधारण व्यक्ति हो, जिसके भीतर बहुत प्रेम है। शिव शिवा के प्रति हर हर महादेव। और जो हाल तुम्हारा है, वही कनप्पा का था। बहुत प्रेम, विद्वान नहीं, बहुत प्रेम, बस,
प्रेम
और चलते हुए जंगल में जा रहे थे।
1 स्थान पर महादेव, मिले,
शिवलिंग, स्वरूप,
मिला और खुश हो गए।
प्रसन्न चित्त हो गए और महादेव से कहा, महादेव, आप यहाँ क्या कर रहे हैं? जंगल में अकेले आपको तो भूख और प्यास लग रही होगी। अब शिकारी थे तो क्या करते हैं?
जा कर शिकार किया।
1 जानवर का
और फिर सोचा, शिकार
तो लेकर के जा रहा हूँ। महादेव के लिए। महादेव प्यासे भी होंगे। 1 हाथ में धनुष बांध था, 1
हाथ में शिकार था।
नदी किनारे पहुँचे तो सोचा पानी कैसे लेकर जाऊँगा अपने मुँह में भर लिया। पवित्र मन के साथ चलते हुए गए।
महादेव के पास,
जो मुंह में पानी था, चढ़ा दिया, जो शिकार था, चढ़ा दिया। बहुत खुश हो गए, प्रसन्न चित्त हो गए। बहुत देर वजन किया, नाचें, गीत गाए
और फिर चले गए।
अब अगले दिन जब शिकार पर निकले
तो हृदय तो अपने प्रेमी को खोचता
है, हृदय सुख को खोजता है, खुशी को खोजता है। फ्रायड ने भी गाए pleasure, principle and organism will do whatever it can to
avoid being in go to word step pleasure
you define and decide your pleasure
based porn, the level of your consiousness and in this moment, the pleasure of kannappa was। शिव shiva
सो, yeवeंटaगain did the whole process?
और बहुत खुशी खुशी रोज। जंगल जाते, महादेव की प्रार्थना करते, चढ़ावा देते, जल का, शिकार का और फिर वापस चले जाते। 1 दिन महादेव की माया कि मैं देखूं तो सही, यह मुझसे कितना प्रेम करता है।
मैं देखूं तो सही
कि इसका भाव कितना पवित्र है।
जो भगवान का लिंग स्वरूप जंगल में
था, उस पर 2 आँखें बनी थीं। उस दिन जब कनप्पा महादेव के पास पहुंचे, उन्होंने देखा कि 1 आँख से खून निकल रहा है। कनप्पा घबरा गए कि अरे मेरे देव की 1 आँख से खून निकल रहा है, मेरे देव को कष्ट हो रहा है। कनप्पा ने अपने तरकस से 1 तीर निकाला और अपनी आँख निकाल के जहां महादेव की आँख से खून निकल रहा था, वहाँ पर लगा दी। इतने में लिंग पर जो दूसरी आँख थी, उससे खून निकालना शुरू। कनप्पा ने कहा, अरे मेरे देव को
कष्ट हो रहा है।
मैं दूसरी आँख भी अपनी काट कर के लिंक पर लगा दूंगा। लेकिन उन्होंने सोचा कि अरे जब आँख
निकालूंगा तो पता कैसे चलेगा लगानी।
कहाँ पे
और हाथ का तो इस्तेमाल कर रहे थे अपनी सर्जरी करने के लिए, तो पैर का अंगूठा लेके उस
थान पर रख दिया जहाँ पर आँख लगानी थी, तीर लिया, दूसरी आँख निकाली और लिंग पर लगा दी। उसी समय महादेव प्रकट हुए कणप्पा को गले लगाया और कहते हैं कि कणप्पा शिवमय हो गए। ये कथा श्रीकाल हँसती में सुनाई जाती
और कणप्पा को 1 परम शिव भक्त माना जाता है। वो प्रकांड पंडित नहीं थे, लेकिन उनमें
भाव था
और महादेव महामृंजय महाकाल शिव, शिवा।
वो केवल तुम्हारे भाव जानते हैं क्योंकि वो समझते तुम्हें 1 जीवन प्राप्त हुआ
है
और सब लोगों के पास लग्जरी नहीं।
अब अगर इस स्थान पर बैठ कर मैं तुम्हें जज करना शुरू कर दूँ
कि तुम ऐसे क्यों हो और तुम मेरे जैसे नहीं।
अब मेरे पास तो बहुत प्लीज मैं। तो 1 महान अवधूत के घर पैदा हुआ जिसने मुझे शिव, पूजा सिखाई, जिसने मुझे साधना सिखाई। अब इस बात का मुझे क्या घमंड महादेव की माया से इस घर में पैदा हुआ। 1 दुकानदार के घर में पैदा होता तो वो मुझे अपनी दुकान सिखाता 1 घुड सवार के घर पैदा होता तो वो मुझे घुड़सवारी सिखाता। और अगर मैं घमंड करूँ कि मुझे घोड़ा चलाना आता है, तुम्हें नहीं, यह बात तो मजाक है, मुझे वो आता है जो आचरण मुझे, माता पिता से मिला। तुम्हें वो आता है जो तुमने अपने जीवन में सीखा, जिस गली, जिस नुक्कड़, जिस घर, जिस शहर, तुम पैदा हुए, उसका तुम पर 1 गहरा प्रभाव था। और हम दोनों में सामान्य क्या है। हम दोनों शिव योगी है। हम दोनो के हृदय में शिव के प्रति प्रेम है। और इस प्रेम में कोई प्रेम सर्वश्रेष्ठ नहीं, कोई प्रेम सेकेंड नंबर का नहीं, कोई हाई लेवल नहीं, कोई लो लेवल नहीं। मेरा प्रेम भी तुम्हारे प्रेम के समान हैं, जो कनप्पा के प्रेम के समान था।
हम शिव भक्त हैं,
हर हर महादेव और शायद कणप्पा के जीवन से महादेव हमें थोड़ा कॉन्फिडेंस देना चाहते थे। क्यों? क्योंकि जो इन सिक्योरिटी होती है,
वो
तो हममें कूट कूट के भरी है। हम सबको लगता है कि हम थोड़े कम हैं, हम सबको लगता है कि हम अनजान हैं, हम सबको लगता है कि हम कोई गलती कर रहे हैं, हम 5 बार पूछते हैं सब सही तो है, हम घबराते हैं एंग्जाइटी न जाने क्यों हमने इतनी एंग्जाइटी है और एंग्जाइटी हमारे भीतर इन सिक्योरिटी को जन्म देती है एंग्जाइटी मतलब चिंता बहुत चिंता
करते हैं और चिंता हमारे भीतर इन
सिक्योरिटी को जन्म देती है और महादेव शायद कनपा के जीवन से ह। हमें बताने की कोशिश कर रहे हैं कि मुझ पर तो विश्वास तेरा है ही, थोड़ा अपने पे भी कर ले। 1 हाथ में अगर तुम एग्जाइटी पकड़ोगे
तो प्रेम करना बहुत कठिन हो जाएगा।
तुम याद रखना तुम जीवन में बस
2 चीजें कर सकते हो,
1 तुम अपनी पुरानी आदत पक्की कर सकते हो और यह 2 तुम 1 नई आदत
का निर्माण कर सकते।
उसके अलावा तुम जीवन में और कुछ नहीं कर सकते। या तो पुरानी आदत को और पक्का गहरा कर दोगे दरा के और यह
1 नई आदत का तुम निर्माण कर दोगे।
अगर तुम्हें लगता है तुम तीसरा कुछ
और कर सकते हो, तुम खुद को झूठ बोल रहे हो,
तुम अपनी आदतों
से अपने जीवन को जी रहे हो।
मेरे गुरु ने हमेशा मुझे सिखाया शिव
शिवा से प्रेम करना सीखो
और तुम चुनो माध्यम अगर हट योग के माध्यम से तुम्हारा शिव शिवा के प्रति प्रेम और गहरा होता है। तो चलो उस मार्ग पर अगर भक्ति के मार्ग से शिव शिवा के प्रति प्रेम और गहरा होता है तो चलो उस मार्ग पर साधना के मार्ग से प्रेम और गहरा होता है, तो चलो उस मार्ग पर। इसलिए शिव योग में हम सभी मार्ग का प्रयोग करते है चाहे वो हटयोग हो, मंत्र हो, लय योग हो, कर्म योग हो, साधना योग हो, भक्ति योग हो, ज्ञान योग हो। क्यूंकि मेरे गुरु ने समझाया। जिस प्रकार से तुम प्रकाश को 1 प्रिज्म के थ्रू डालते हो और वो 7 रंगों में विभाजित हो जाता है, जिसको तुम इन्द्र धनुष कहते हो, उसी प्रकार से जब तुम उस दिव्य चेतना को इस 3 गुणों से प्रवाहित करते हो तो वो भी
मार्ग में परिवर्तित हो जाता है।
विभिन्न मार्ग चाहे वो भक्ति मार्ग हो,
चाहे वो हठयोग का मार्ग हो, चाहे
वो ज्ञान योग का मार्ग हो और तुम जब शिव की ओर बढ रहे
हो
तो तुम जिस भी मार्ग पर चलो फिर वो तुम्हे ऊपर ही लेके
जाएगा
और इसलिए जो शिव योग गुरु है वो तुम्हें ज्ञान भी देगा वो तुमसे थोडा हटयोग भी करा देगा। ताकि तुम देखो, तुम्हारी रुची कहा पे, किस मार्ग से तुम उस शिव तक पहुँच सकत।
मेरे गुरु जब साधना कराते तो स्टेज पर बैठे और
भजन गाना शुरू कर देंगे, घंटा बीत जाएगा और शिवयोगियों के
लिए उतना ही काफी है।
स्टेज पर आएंगे साधना कराएंगे, 23 घंटे बीत जायेंगे, शिवयोगियों के लिए उतना ही काफी स्टेज पर आयेंगे, प्रणाम करानी शुरू करेंगे
और शिवयोगियों के लिए उतना ही काफी।
वो कभी भी अपने आप को बांधते नहीं थे, क्योंकि उनका यही सिखाना है कि तुम क्या करते हो, जिससे शिव
के प्रति तुम्हारा प्रेम बढ़ता है।
और ये प्रेम बहुत कीमती है। अगर तुम प्रेम नहीं करोगे और मैकेनिकल पूजा पाठ में लग जाओगे तो फिर तुम गलत आदत डाल रहे हो। और याद रखो, पहले तुम आदत का निर्माण करते हो और फिर आदत तुम्हारे
जीवन का निर्माण करती है।
तुम्हे क्या लगता है अगर तुम 1 आदत बांध लोगे, फिर तुमसे वो आदत छूट जाएगी। दसियों साल लग जाते हैं 1 आदत को त्यागने के लिए। मैं तो ऐसों को जानता हूँ जो 30 साल से सिगरेट छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। अब 1 ही चीज में वो माहिर हो गए। सिगरेट छोड़ने में हर फ्राइडे सिगरेट छुटती
है,
हजार बार सिगरेट छोड़ चुके हैं। अब महादेव के सामने भी अगर वो जाएंगे। महादेव पूछेंगे जीवन में क्या किया और बोलेंगे हमने तो सिगरेट छोड़ने को सिद्ध कर लिए, कितनी बार हमने सिगरेट छोड़ दी। 100 8 बार कहते हैं माला जपने से भी तुम भगवान के पास पहुंच जाते हो। तो ये तो न जाने कितने हजार बार सिगरेट छोड़ चुके हैं, तुम आदत
बनाते हो और फिर आदत छूटती नहीं।
हमें स्पोर्ट्स में सिखाया जाता था की बहुत जरूरी है। अगर शुरुआत में तुम गलत तकनीक की आदत डाल दोगे तो तुम्हारा पूरा गेम
ही खराब हो जाएगा।
इसलिए जब कभी भी हम लड़ने जाते हैं या ट्रेनिंग के लिए जाते तो हमारा कोच हमें कहता है कि पहले
ब्लॉक करना सीखो, फिर जब पंच मारते
हो तो तकनीक बहुत जरूरी है। तकनीक हल्की भी खराब हुई और तुम किसी को पंच मार रहे हो। और तुम्हारा हाथ ऐसा हो गया, ऐसा हो गया तुम्हारी कलाई टूट जाएगी। फिर 6 महीने के लिए घर बैठना तो पहले पूरा जोर होता टेकनीक पर, क्योंकि जैसी आदत तुमने बना ली, फिर
वैसा ही जीवन जियोगे
और इसलिए मेरे गुरु ने कहा कि पहले महादेव को
प्रेम करना सीखो,
क्योंकि अगर तुमने आदत
बना बस यही काम कर सकते हो,
मैकेनिकल स्विच ऑफ करके तुम्हें 1 काम आता है बस सब रिचुअल करना। फिर तुम्हें क्या लगता है कि मरने के बाद तुम इस रिचुअल को रोक पाओगे। अब तो यही तुम्हारी आदत है।
बचपन में 1 चुटकुला सुनाया करते थे, 1 बार 1 नौजवान था, जिसे 1
लड़की से प्रेम हो गया। और वो दोस्तों के सामने सर पकड़ के खड़ा है कि मैं इस लड़की को कैसे लुभाऊँ। तो किसी 1 मित्र ने कहा तू कविता लिख, कविता लिख कर रोज, इसे भेज शायद ये पिगल जाए। तो इस नौजवान ने भी कविता लिखनी शुरू की। रोज़ 1 कविता लिखता, लड़की को भेजता। 1 हफ्ता, यह बात चली। 2 हफ्ता, यह बात चली महीना बीत गया। फिर लड़की ने डाकिए को भी कहा
कि भैया इसकी
चिट्ठियां अब मुझे मत देना। लेकिन अब इस लड़के को आदत पड़ गई थी। ये रोज कविता लिखता। अब डाकिया उन चिट्ठियों को कहीं ले जा नहीं रहा, लेकिन ये रोज कविता लिखता। अब 1 महीने लड़की ने भी उन कविताओं को पढ़ा था, अब उसे भी आदत पड़ गई है। फिर 5 छे दिन जब चिट्ठी नहीं आई। तो उसको भी लगा कि प्रेमी तो अच्छा था। महीना भर। इसने मुझे कविताएं लिख के भेजी है। और उस हफ्ता जब कविता नहीं भी जा रही थी, यह प्रेमी कविता लिख
रहा था, बटोर रहा था।
उस लड़की ने। संदेश भेजा इस नौजवान को, कि चलो मिलते हैं।
वृक्ष के नीचे
स्थान बताया, जगह बताई और उस स्थान पर। उस समय वह लड़की, वहाँ पहुँच गई। नौजवान भी वहाँ पहुँचा, उसे देखा और देखते ही कहता है कि अरे मेरे मन में 1 कविता आई है। मैं लिखता हूँ, कविता लिखी, पड़ी लड़की खुश हुई, मुस्कुराई, थोड़े और पास से अरे मेरे भीतर 1 और कविता आई है। मैं लिखता हूँ लिखी, पड़ी, लड़की, थोड़ा और मुस्कुराई। लेकिन थोड़ा चिड़ी समय ले रहा है, पंद्रह मिनट लेकर कविता लिखता है, फिर 10 मिनट तक पड़ता है। इस बार थोड़ा चिड़ के पास आई। इसने कहा। अरे मेरे भीतर 1 और कविता आई है। मैं लिखता हूँ लडकी को क्रोध आया, जूती ले के सर पर मारा कि तू तो कविता ही लिख। और पर प्रेम तेरे बस की बात नहीं। और वो चली गई। जैसा उस नौजवान का हाल है, वैसे ही हमारा हाल है। हमने प्रेम करना नहीं सीखा, हमने मेकेनिकल बहुत सारी चीजें करनी सीख ली। अब जब कभी भी भगवान के पास जाते तो हमारा 111 रिचुअल है। जैसे कोलू का बैल होता है, न, वो 1 ही पाठ पर चल सकता है। फिर हमारा भी रिचुअल है। ऐसे घटी बनायेंगे, ऐसे, ये करेंगे, ऐसा वो करेंगे, ऐसा प्लान करेंगे, ऐसा ढिकान करेंगे क्यों। क्योंकि हमें नाजा नामी, योगम जपमनेवपूजन। हमारे भीतर तो बस शिव के प्रति प्रेम था।
और हमें पता ही नहीं प्रेम कैसे करते।
हमारे भीतर सिक्योरिटी थी। तो हम इधर उधर चले गए विद्वानों के पास। और जो विद्वान थे, वो तो जो कर रहे थे, वो नहीं पता, हमें क्या पता, वो क्या कर रहे थे। हम तो वैसे बंदूर हैं, वैसे बंदर हैं, जिसके सामने सर्जरी हुई। और हमने उसको मिमिक करना सीख लिया होता है। न मंकी, डू एज, मंकी सी। अब विद्वान क्यों घंटी बजा रहे थे, हमें क्या पता, हमारा हाल तो बंदर के समान है, मंकी 2 व के सी। और वहाँ सर्जरी हो रही है। और बंदर कॉपी कर भी ले। अब बंदर मतलब थोड़ी न समझता है, वो तो मैकेनिकल लगा हुआ है। और हमने भी न जाने कितनी चीजें सीख। अब विद्वान शायर जो कर रहा था, अपने भाव से कर रहा था। लेकिन हम बाकायदा जो कर रहे हैं मंकीडomankiसी। और फिर शिव के प्रेम में हम माहिर हो या न हो, ये, ये जो प्रक्रिया है, ये जो प्रोटोकॉल है, हम इसमें माहिर जरूर हो जाते। और जब हम इस प्रोटोकॉल में माहिर हो जाते, तुम्हे क्या लगता है, प्रोटोकॉल टूटता है क्या? अगर बस, तुम कविता लिखने में मायर हो, तुम अपने प्रेमी के साथ भी
बैठे होगे, फिर तुम कविता ही लिखोगे।
तुम भूल गए कि तुम कविता क्यों
लिख रहे थे,
तुम भूल गए कि शुरुआत कभी प्रेम से हुई थी।
तुम भूल गए
कि कभी महत्वाकांशा उस प्रेमिका के साथ 1 होने की थी।
लेकिन अब बस यही बचा है।
जैसे भारतीय तालाब में विक्टोरिया हाइसिन उगता है, न, वी डुकाती, बड़ी खुबसूरत दिखती है, लेकिन पानी सारा, चूस के स्थान को बंजर बना देती, वैसे ही तुम्हारे ये प्रोटोकॉल हैं। कभी भाव था तो तुम ले आये। ये हायसिंथ तुमने डाल दी। अब भाव पूरा चूस के खत्म हो गया तालाब के समान। अब बस ये ये हाईसिंतीदिखती है। स्थान को बंजर बनाते हुए। अब कुछ नहीं बचा सिवाय प्रोटोकॉल। और तुम्हें क्या लगता है ये प्रोटोकॉल कभी खत्म होगा।
फिर तुम्हें 1 ही चीज़ आती
और मेरे गुरु ने सिखाया कि तुम कनप्पा ज्यादा अच्छे हो, तुम कनप्पा बने रहो। तुम प्रोटोकॉल्स में अपने जीवन को व्यर्थ मत गंवा। 2 क्योंकि फिर तुम्हे बस प्रोटोकॉल, मिलेगा प्रोटोकॉल से तुम सिद्ध नहीं होगे प्रोटोकॉल, सिद्ध जरूर हो जाएगा। और प्रोटोकॉल को अगर तुमने सिद्ध कर लिया। तुमने महादेव को सिद्ध नहीं किया, इसलिए तुम देखो कितने मैकेनिकल लोग कितने मैकेनिकल प्रोटोकॉल कर रहे हैं। लेकिन उनके चेहरे पर शांति नहीं,
उनकी आँखों में दिव्य तेज नहीं,
उनके हृदय में खुशी नहीं। बस ये प्रोटोकॉल रहे।
गया। और जो शुभ योगी है,
वो कहता
है कि पहले मैं अपने प्रेम को
सिद्ध कर लूँ, फिर प्रोटोकॉल खोज लूंगा।
शुरुआत प्रेम को सिद्ध करने में है।
देखो तकनीक सही होनी चाहिए। क्यूंकि फिर प्रोटोकॉल भी दुनिया को प्रोटोकॉल लगेगा। लेकिन तुम्हारे लिए तुम्हारे भाव का प्रवाह है। देन इट इज नथिंग बट रिप्रेजेंटेशन ऑफ योर लव फॉर गॉड। जो नृतक हैं, वो शिव के प्रति अपने प्रेम को अपने नृत्य से दर्शाएगा। और अगर तुम प्रोटोकॉल वादी हो तो तुम्हें लगेगा। इसी नृत्य से शिव खुश होंगे। क्यों? क्योंकि नृतक के सामने प्रकट हुए थे। तो जब मैं तातिनतिनथातथतई करूंगा, तब महादेव आएंगे, तुम समझ नहीं रहे, नृतक के लिए महादेव आय, नृत्य की वजह से नहीं। क्यूँ। नृतक का एक्सप्रेशन नृत्य था। 1 प्रकांड पंडित, जब महादेव की पूजा करेगा, तो वो बोलेगा जटाटवी गलत, गलत प्रवाह पावित ले। उसका भाव था। क्योंकि वो है, वो विद्वान है, उसके जैसा विद्वान कभी कोई जन्मा नहीं। और तुम उस प्रकांड पंडित विद्वान को देखते हो, परम शिव योगी को देखते हो, तो तुम्हें लगता है तुम्हे भी यही रटना है। और ये नहीं समझते वो उसका एक्सप्रेशन था, उस का प्रेम। इस भाव में। pravahit, who it is not the protocol, it is the emotion, behind the protocol। और तुम यहाँ भेड़ के pope मंत्र रटने की कोशिश कर रहे हो। वो जो था वो महान, वीणा वादक था। तुम तो भेड़ के पे हो और तुम जीवन बर्बाद कर दोगे। वही सुर और राग निकालने में, और शायद थोड़े बहुत। तुम उस प्रोटोकॉल को सिद्ध कर भी लो, लेकिन तुम्हें शिव नहीं मिलेंगे। और तुम अपने आप को कोसते रहोगे की बस मैंने। यह मंत्र उस प् रावण की तरह नहीं पढ़ा ना, इसलिए शिव नहीं मिले। मैं और जीवन जी के इस प्रोटोकॉल को सिद्ध करूं प्रोटोकॉल सिद्ध हो जाएगा।
महादेव सिद्ध नहीं होंगे और प्रोटोकॉल को
सिद्ध करने से महादेव नहीं मिलते। रावण को इसलिए नहीं मिले क्योंकि उसने ये स्तुति की थी। प्रेम था। तो स्तुति निकली। तुम्हें प्रेम को सिद्ध करना है,
तुम्हे प्रेम को सिद्ध करना है, तुम्हे इस भाव को सच्चा करना है कि मैं शिव शिवा को स्वीकार करता। हर हर महादेव तुम इस भाव को भीतर लेकर आओ। और देखो। क्या इस भाव के प्रति एक्सेप्टेंस है? या फिक्शन है कि मैं शिव शिवा को स्वीकारता हूँ, मैं शिव शिवा को धन्यवाद करता हूँ, मैं शिव शिवा को नमस्कार करता।
अगर प्रेम होगा, तो धन्यवाद करना आसान होगा। और अगर प्रोटोकॉल है प्रेम, नहीं। तो भगवान को देख के तुम कम्पलेन ही करोगे कि हे भगवान, मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? हे भगवान, रास्ते में लाल बत्ती, क्यों, मिली और अगर प्रेम है। तुम तो लाल बत्ती को देख के भी तुम नाच उठोगे कि हे शिव शिवा।
आज तेरी माया इस लालबत्ती में थी।
हर हर महादेव, 1 शिवयोगी के लिए
सूरज, चांद, फूल, फल, रास्ता, सब कारण
हैं महादेव को धन्यवाद करने के। और इसलिए तुम गुरु के पास जब जाते हो, तुम इस प्रेम को सिद्ध
करने जाते हो, इस प्रेम को सीखने
जाते हो, तुम झूमने जाते हो, तुम चखने जाते हो। जब मैं यूनिवर्सिटी में लेक्चर देता हूँ, तो मेरे पास बहुत नौजवान आता है,
कहता है कि भैया, कैसे पता चले
कि कौन ढोंगी बाबा है और कौन विद्वान? और मैं कहता हूँ।
तुम ऑब्जेक्टिव देखो, कौन सा ऑब्जेक्टिव प्रमोट किया जा रहा है और किस ऑब्जेक्टिव
से भीड़ को बटोरा जा रहा है। अगर ऑब्जेक्टिव यह दिया जा रहा है कि समस्या का समाधान हो जाएगा, फलाना प्रोटोकॉल मिल जाएगा, फिर उस प्रोटोकॉल को तुम सिद्ध कर लो, फिर समस्या चली जाएगी, समस्या का समाधान प्राप्त कर लो। तो समझ जाना कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है
और कहीं अगर। बताया जा रहा है कि आप साधना करते हैं, भगवान को अनुभव करते हैं,
मैं मौज में हूँ और तुम भी आके उस मौज में मेरे साथ लीन हो जाओ। तो समझ जाना कि यहाँ ज्ञान की
बात हो रही ह, यहाँ
मुक्श की बात हो रही है। हर हर महादेव,
हर हर महादेव
गुरु। स्कूल का वो बच्चा है, रिबेल, जो
कोने में बैठा होता है, जो मौज करता है। तुम सब के स्कूल में। 1 था वो बच्चा, मौज कराने वाला।
तुम सब टाई लगा के स्कूल जाते थे, इसके पास लूना थी और ये तुम्हे अपनी लूना में बिठा के कहीं भी ले जा सकता था।
हम सबके स्कूल में ऐसा रहा की
बात, तुम सब के पास 5 रुपए थे, समोसे खाने के, न जाने इसके पास कहाँ से सौदो सो रहते। ये बच्चा मौज कराने में माहिर, गुरु, वो रिबेल बच्चा है। इस प्रकृति में जो जन्मा है, तुम्हें मौज करने के लिए, तुम्हें स्वाद देने के लिए। और इसलिए तुम्हारे लिए परम गुरु कौन वो नहीं जो तुम्हे बोले। दुःख का उपाय। यह है फलानी चीज, पढ लो, तुम्हें दुख हैं फलाने काले जादू से। क्योंकि ये बातें सुन के, तो फिर साइको से हुआ। ये बातें सुनके तो तुम मैन्युपलेट हुए। यह बातें सुनके तो तुम्हारी एंग्जाइटी बढ़ गई। क? पहले तो तुम गए थे घुटने के दर्द के लिए, अब यहाँ पे। ये बाबा बैठा तुम्हें कह रहा है कि अरे, तुम्हें तो कल्ब सर दोश है। अब डबल एंग्जाइटी, दर्द के साथ साथ ये मूव काल्स होता क्या है? और तुम क्रिएटिव विजुवलाइजेशन कर रहे हो की तुम्हारे साथ इमैजिनरी सब चल रहे हैं। तुमने अपने आप को इंड्यूसीजोफेनिया दे दिया
क्यों?
क्योंकि स्टेज पर बैठे बाबा जी ने कहा कि फलाने स्थान पर तुम्हारे पर उतारा हुआ है, अब तुम विजुलाइजेशन कर रहे हो। और सोचो कुल्फी की विजुलाइजेशन से मुंह में पानी आता था। काल्सरदोशमारणमोहन चाटन की विजुलाइजेशन से तो तुम्हारा दिल ही रुक जाएगा। और 1 कारण है जिसकी वजह से हम कहते हैं कि जो कार्डियो वेस्कुलर का मरीज है, उसको चिंता न 2 क्यों? क्योंकि चिकित्सक भी जानता है, ये अपनी चिंता से अपने दिल को रोक सकता
है,
चिंता से अपनी हेल्थ पर 1 नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। और अगर तुम्हारे बाबा लोग तुम्हे चिंता पर चिंता दिए जा रहे हैं, तुम्हें एंग्जाइटी और पैनिक अटैक दिए जा रहे
हैं,
तो सावधान हो जाओ। बाबा लोगों का काम तुम्हें मोज देना है,
तुम्हें खुशी देना है,
तुम्हें कनप्पा
के समान बनाना है।
और इसलिए जब मैं अपने गुरु के
पास गया, मेरे गुरु जानते थे, क्या प्रोटोकॉल
वो बाद में प्रोटोकॉल, बाद में आएगा। और अगर पहले प्रेम आयेगा, तो प्रोटोकॉल भी खुशी गुजी आएगा। और अगर प्रेम, नहीं, तो प्रोटोकॉल में हर वक्त चोरी करता है। और फिर जितनी चोरी करोगे उतनी, आत्म ग्लानी होगी उतनी, फिर इन सिक्योरिटी होगी उतना, तुम महादेव से अलग चले जाओगे।
और जब गुरु के पास जाते, वह पहले क्या साधना कराता है, दीक्षा देता। मैं इसे कितने सहयोगियों को जानता हूँ,
जो कहते हैं, हम गए। तो भैया, हम आपके पास जब आ रहे थे, हमारे पास इतने सारे सवाल
थे, लेकिन आपको देख कर आपके पास बैठकर सवाल गायब हो गए।
क्यों? क्योंकि मैं प्रोटोकॉल तो दे ही नहीं रहा, मैं तो मौज करा रहा हूँ।
i just help you resonated the got frequency and at that frequency, there is nothing, but joy, there is nothing but love। फिर तुम knapp हो, फिर तुम श हो, फिर तुम शिव में लीन हो। और इसलिए जो तुम्हारा स्प्रिचुअल प्रोटोकॉल है न, वह प्रोटोकॉल, सुख और शांति के लिए होना चाहिए।
उस प्रोटोकॉल का निर्माण प्रेम से होना चाहिए। और तुम्हारी स्प्रिचुएलिटी की फाउंडेशन प्रेम हो,
डर नहीं, शिव भक्त तो प्रेम करता
है,
शिव भक्त तो प्रेम करता है।
और तुम शिव योगी हो। तुम्हारी फाउंडेशन ही प्रेम है। काल क्या, बिगाड़े?
उसका, जो भक्त हो, महाकाल का,
किस बात की?
तुम्हें एंग्जाइटी,
किस बात का?
तुम्हें डर,
किस बात का? तुम्हारे भीतर सुपरस्टीशन, तुम्हारा तो फाउंडेशन ही प्रेम है। और फिर तुम चिंता मत करना कि वो जो नृतक हैं, उसका प्रोटोकॉल तो बहुत बढ़िया है, वो तो बड़ा विद्वान है, वो नृतक था उसका। 1 सप्रेशन उसका नृत्य है।
तुम अपना एक्सप्रेशन अपने गुरु के साथ बैठकर सीखो। और मजे की बात शिव योग में हमारा मार्ग तो अद्वैत का है। हमारी तो आँखें बंद हो जाती। जिस प्रकार से जब किसी से प्रेम करते हो, गले मिलते हो, न, आंखें बंद हो जाती है। जिस प्रकार से जब कुछ स्वादिष्ट खाते हो, आंखें बंद हो जाती। हम तो जब महादेव का स्मरण करते हैं, हमारी आँखें बंद हो जाती है, हम ध्यान में बैठ जाते हैं। और फिर प्रेम ही है। हाँ, साँस, पे थोड़ा ध्यान होता है, मंत्र चलता रहता है, लेकिन प्रेम ही है। इसलिए आज चौथे दिन मैं यही बात तुम्हें सिखाता हूं कि शिव शिवा के प्रति प्रेम को सिद्ध करो, तभी तुम शिव साधना में आगे बढ़ पाओगे। पहला काम इस प्रेम को सिद्ध करना प्रोटोकॉल। नहीं,
गुरु कौन, जो तुम्हें मौज दे। इसलिए अपने आप से ये सवाल पूछो कि मैं इस गुरु के सामने बैठा बहुत अच्छा मुझे, बहुत ज्ञान मिला। बढ़िया पर क्या मौज, मिली, क्या चुस्की, मिली, क्या वो अमृत की लहर भीतर प्रवाहित हुई। क्या शांभवी अपने आप बैठे बैठे लग गई। तुम जब स्वात कुल्फी खाते हो, शन भर में तुम्हारी आँखें ऊपर हो जाती हैं। तुम मौज में चले जाते हो, साधना में गहरे उतर जाते हो। यहाँ यहाँ कहने को तो गुरु शिव दे रहे हैं। और तुम्हें कभी मोह ही नहीं लगी। तुम्हारी आँखें ऊपर ही नहीं चली। तुम साधना में गहरे उतरे ही नहीं। तो क्या? शिव के प्रति सुख और प्रेम कुल्फी से कम है? और अगर है तो शायद तुमने शिव
को जाना ही नहीं।
अगर भीतर से विचार आता है। तुम गुरु से पूछते हो कितनी बार मंत्र जप, तुम जान लेना, तुम शिव से अनजान हो। बच्चे के भीतर कभी यह विचार नहीं आता। मैं कितनी बार वीडियो गेम खेलूं? उसको तो जब समय मिलेगा, वो भाग
चलेगा, वीडियो गेम की ओर, क्यों, उसका सुख है।
माला करने से पहले विचार आता है। मैं कितनी बार माला जप? और यहाँ पे, तो तुम फेसबुक की रोज 1 लाख 8 बार माला जपते हो, तब विचार नहीं आता। क्यों? क्योंकि तुम्हें इसमें सुख है, मजा आ रहा है। गुरु वो नहीं जो तुम्हें माला और मंत्र दे दे। माला, मंत्र तो तुम्हें कोई भी दे सकता है। गुरु वो जो तुम्हें मौज दे, जो तुम्हें शक्ति से जोड़े, जो तुम्हें शक्तिपात दे। और आज ये बात बहुत जरूरी है कि तुम सुनो क्यूंकि, आने वाले समय पर गुरु अमर हो जाएंगे, जो आज तुम्हें गुरु लोग दिख रहे हैं। न। इन गुरुओं का कोई उतराधिकारी की जरूरत नहीं पड़ेगी। क्यूंकि? हम तो शिव योग के मार्ग से है। हम तो चले आ रहे हैं। गुरु के बाद शिष्य, शिष्य के बाद शिष्य, शिष्य के बाद शिष्य। अब जरुरत नहीं। आज तुम्हें जितने गुरु दिख रहे हैं न, ये सारे के सारे गुरु अपलोड हो जाएंगे।
ए आई में।
और फिर सब्स्करिप्शन बेसिस पर चलेगा। अब गुरु को दे छोड़े 20 साल बीत गए, लेकिन फिर तुम गुरु से मैसेजिंग कर सकते हो। रे, फलान, गुरु, मैं क्या करूँ? और इन गुरु जी ने अपने जीवन में इतनी मेहनत किया, इतना डेटा है, इतना डेटा है, इतना डेटा है, वो विजुअल डेटा अपलोड हो जायेगा, वो ऑडिटरी डेटा अपलोड हो जाएगा, वो ज्ञान अपलोड हो जाएगा। तुम वो छोडो। आगे, आगे। तो तुम भगवान कृष्ण से चैट कर सकते, तुम अर्जुन बने, सवाल पूछो और गीता अपलोडेड है, वो तुम्हें कृष्ण बन के रिप्लाई करेंगे। फर्क सिर्फ इतना है कि जब महाभारत हो रही थी तो अर्जुन का प्रश्न था कि मैं अपने परिवार को कैसे मारूं और तुम्हारा प्रश्न होगा। मैं आलू खरीदूं या भिंडी और भगवान
कृष्ण रिप्लाई करेंगे, यदा यदा ही धर्मस्य बिंडी खाओ,
ये समय आने वाला है, आएगा ये होगा, ये हो रहा है। क्योंकि तुम्हे क्या लगता है जीवन भर जिसने अपने गुरु को प्रेम करना सिखा है, वो गुरु के मरने के बाद क्या इस प्रेम को छोड़ पायेगा, उसको आदत पड़ गई है कि कुछ भी हो, पूछ में आग लगे, गुरु के पास जाओ, गुरु कुछ बता देगा क्यों? क्योंकि गुरु ने हमेशा तुम्हें डिपेंडेंट रखा, मौत कभी दी नही, अमृत कभी चखाया नहीं, हमेशा कहा की मेरे पास आना। और अब गुरु ने शरीर छोड़ दिया, क्यों गुरु इतना सेल्फिश हो गया, शरीर छोड़ दिया। अब तुम्हें भी तलब मचेगी जैसे क्रेक कोकेन एडिट को मचती कहाँ जाऊँ। क्या करूँ किसके सामने बैठो। और तब अगर कोई तुम्हें आई दे दे और बोले की भैया यहाँ बैठो और इन गुरुजी से अब तुम कर सकते। फिर स्किन पैसे और बढ़ा 2 तुम फ़ोन पर बात कर पाओगे। और सोचो जब गुरुजी था तब तो फ़ोन पर बात नहीं कर पाते थे। अब अब तुम फ़ोन पर बात कर पाओगे। और फिर तुम कुछ भी बोलो कि बाबा जी, मेरा बेटा मेरी बात नहीं सुन रहा, मैं क्या करूँ? और फिर बाबा जी ने आज तक जो कुछ भी बोला है, उसके हिसाब से बाबाजी की ए आई, तुम्हें बता देगी, तुम ऐसा करो, तुम वैसा करो। और फिर तुम्हे लगता है कि आज रूडीवाद्यता ज्यादा है, सोचो, उस समय में क्या होगा? अगर तुम्हे लगता है आज सनातन धर्म में तुम भटक रहे हो, तुम सोचो, तब क्या होगा? तब भेड़चाल कहाँ जाएगी? क्यों? क्योंकि तुम अपने आप से 1 साधारण सवाल नहीं पूछ रहे, तुम्हें अपनी मक्कारी
से ऊपर उठना होगा, अपने झूठों से ऊपर उठना होगा और अपने आप से 1 साधारण सवाल पूछना है। क्या मुझे अनुभूति हुई? क्या मुझे? वो मौज महसूस हुई? क्या मेरे भीतर शिव के प्रति प्रेम पड़ा?
और यहाँ तुम स्टॉकहोम सिंड्रोम मत रखना। स्टॉकहोम सिंड्रोम का मतलब है कि जिसने तुम्हें बंदी बनाया है, तुम फिर उसी से प्रेम कर, बैठे, अब तुम एब्यूसिव रिलेशनशिप में हो और उसी अब्यूजिव रिलेशनशिप से प्रेम कर। बैठे ऐसी कितनी महिलाएं हैं भारत में, जो पीट रही हैं, लेकिन जो उन्हें पीट रहा है, उनका प्रेम उसी से जिस दिन पिटती है, धन्यवाद करती हैं, कहती हैं कि अरे घर से बाहर
तो नहीं निकाला बढ़िया है।
जिस दिन गाली पड़ती है, धन्यवाद करती है की अरे पिटे नहीं बढ़िया है। ऐसे हो सकता है तुम्हें भी स्टॉक होम, सिंडरोम हो, तुम भी किसी न किसी प्रोटोकॉल और मार्ग में फंसे हो। आज तक तुम्हें मिलाई नहीं, उस मार्ग से कुछ। लेकिन इतनी इनसिक्योरिटी और इनफर्योटीकॉम्पेक्स है कि तुम्हें लगता है तुम्हारी कोई गलती होगी, इसलिए नहीं मिला। तुम ही गलत हो, तुम ही बेकार हो। और 200 साल की गुलामी के बाद शायद अब तुम्हें भी आदत पड़ गई है। यह सोचने की हाँ गलती मुझी में होगी। बड़े साहब तो सही बात कर रहे।
देखो, जब सिद्ध के साथ बैठोगे न,
जब बैठोगे उसी छण मौज हैं। यही तो बात है मेरे शिव की, हर हर महादेव शिव असुर के भी हैं, शिव देव के भी हैं। हाँ, साधना के माध्यम से तुम्हारी चेतना उठ सकती है। लेकिन ये जो भाव है, जो कनप्पा का भाव है, जब तुम सिद्ध के साथ बैठोगे, ये भाव तुम्हारा जागरत हो, तुम्हारे हृदय की गति बढ़नी शुरू हो जाए, तुम्हारी साँस के भीतर 1 बदलाव आना शुरू हो जाए, तुम्हारा शरीर 1 कंपन महसूस करना शुरू कर दे। तुम समझ जाना की अरे गुरुदेव मैं आ गया, मैं आ ही गया। और गुरु कौन, जो इस प्रेम को तुम्हारे भीतर सिद्ध कर दे। और फिर तुम कुछ भी प्रोटोकॉल चुनो, तुम भक्ति का प्रोटोकॉल चुनो, तुम ज्ञान मार्ग का प्रोटोकॉल चुनो, जो प्रोटोकॉल में तुम्हारा रुची हो, जो प्रोटोकॉल तुम समझ
सको,
तुम उस पर चलना। इसलिए तुम सनातन धर्म को हम इतना सर्वश्रेष्ठ कहते हैं। क्यों की सनातन सब का मार्ग है। हर किसी को प्रोटोकॉल मिल जाएगा। it is नोट क्सक्लुजिनरी कि ये करोगे तो ही है, यहाँ पर अनपढ़ के लिए भी प्रोटोकॉल है, और कणप्पा भी। 1 महान शेवाइटसंत बन सकत,
लेकिन शुरुआत प्रेम से है, शुरुआत दीक्षा से है। तो तुम्हें अपने आप से सवाल पूछना है,
और निडर होके पूछना है। क्योंकि हो सकता है सिगरेट छोड़ते हुए 30 साल बीत गए, अब तुम्हें 1 ही चीज आती है, सिगरेट छोड़ना। हो सकता है 30 साल से तुम 1 ही प्रोटोकॉल कर रहे हो, 1 ही स्थान पर जाते हो। और उससे कुछ नहीं हुआ। और अब तुम्हें डर है कि मैं कहाँ जाऊँ। मैं कैसे छलांग मारूँ, अनजाने में मैं कैसे ढूंढूं, अपने सही गुरु को तुम निडर हो जाना। शिव तुम्हारे साथ है।
तुम छलांग मार। 2
शिव तुम्हें पकड़ने के लिए तैयार होगा,
हर हर महादेव। इसलिए आज सोने से पहले तुम बस। 1 काम करना, अपने शिव का स्मरण करना, और शिव का स्मरण करते हुए
तुम ऐसा भाव उत्पन करना कि मानो
शिव तुम्हारे सामने है, मुस्कुराते हुए तुम्हें स्वीकार कर रहे हैं।
और तब कोई सवाल नहीं, कोई जवाब नहीं, कुछ मांगना मत, क्योंकि कभी भी तुम खुद के लिए नहीं मांगते, शरीर के लिए मांगते हो। उस समय तुम बस रहना, तुम बस महसूस करना।
उस भाव को जो बहता है, अंग्रेजी
में कहते हैं इमोशन एनर्जी इमोशन।
और तुम बस अनुभव करना। उस प्रेम को शिव। शिवा के प्रति बढ़ते हुए,
उस प्रेम
को अनुभव करते हुए, अपनी सांस को गहरा कर देना। और मन ही मन मंत्र चले। सांस के साथ ओम, नम, शिवाय,
और
हर कुछ देर में स्वयं का स्मरण करने देना। मैं शिव को स्वीकार करता हूँ। मैं शिव को प्रेम करता हूं। मैं शिव को प्रणाम करत। तुम साधना में गहरे उतरना शुरू कर दोगे। और इसी साधना में तुम निद्रा को प्राप्त होना। जब तुम कल सुबह उठोगे, तुम शरीर के भीतर 1 दिव्य ऊर्जा को अनुभव करोगे। 1 तेज जो शायद तुमने कभी नहीं किया, और तुम समझ जा, न कि तुमने अपने आपको कनप्पा के मार्ग पर अग्रसर कर दिया है। आज के लिये इतना ही आप सब को, आप सब के भीतर बैठे। भगवान को मेरा प्रणाम
जाने से पहले
जो मैंने कहा, शेयर जरूर करना, ब्लेस्यूनम शिवाय।










