Ishan Shivanand uses a mirror and window metaphor to explain inner transformation. A stained mirror reflects only darkness, but when cleaned through practice or a guru's guidance, it becomes a window revealing beauty and joy. The body stays the same; only the inner self changes into what he calls a Shiv Yogi, someone at peace in any circumstance.
Chapters
आईने में और 1 खिड़की में ज्यादा फर्क नहीं होता, दोनो काज की बनी 1 आईने में अगर आप देखो आपको अपनी ही परछाई दिखाई पड़ती है, 1 खिड़की के भीतर आप देखने की कोशिश करो तो आप खिड़की के पार देख सकते है और खिड़की के पार जब देखते हो, आपको सूरज दिखाई पड़ता है, आपको घास दिखाई पड़ती है, आपको चहचहाती चिड़िया दिखाई पड़ती है, आपको खेलते बच्चे दिखाई पड़ते और दोनो कांच है, दोनो कांच है, फर्क क्या है 1 खिड़की में और 1 आईने में मैं बताता हूँ, ये खिड़की साफ़ है और 1 आईने को अगर आप देखते हो तो 1 तरफ कालक होती है, अगर कालक पोत दोगे तो फिर खिड़की आईना बन जाएगी और फिर आप खिड़की के पार नहीं देख सकते हो, फिर आपको दुनिया नहीं दिखेगी, फिर आपको सुंदरता नहीं दिखेगी तो फिर आपको खूबसूरती नहीं दिखेगी, फिर क्या दिखेगा आपको अपना चेहरा और अपना चेहरा जैसा भी अगर भीतर गंदगी है, फिर आईने में गन्दगी दिखती है, अगर भीतर काला है तो फिर केवल कालक दिखती है, अगर भीतर नकारात्मकता है तो केवल नकारात्मकता दिखती है और अगर 1 आईना खिड़की में परिवर्तित हुआ, क्या? बदला कुछ भी नहीं, बहुत साधारण सा बदलाव था, छोटा सा बदलाव था, वो, जो कालक बची थी, वो मिट गई, वो साफ़ हो गयी, किसी ने मेहनत करके उसको साफ़ कर दिया। और अब वो आईना खिड़की बन गया, अब रंग दिखने शुरू, अब जीवन बदल गया, अब खुशी है, अब मुस्कराहट है, तो ज्यादा बदलाव नहीं होगा, कांच कांच ही रहता है। प्यारे, तुम तुम ही रहोगे, ऐसा नहीं है कि तुम्हारे 10 सर हो जाएंगे, 10 हाथ हो जाएंगे, 10 पैर हो जाएंगे, तुम तुम ही रहोगे, तुम वैसे ही देखोगे जैसे तुम हो। फर्क सिर्फ इतना है कि तुम्हारे भीतर 1 शांति की लहर और तुम्हारे चेहरे पर 1 खुशी जिसको मेरे गुरु कहते हैं। शिव योगी का मतलब हर हाल में खुश रे।