In this Hindi monologue, speaker Aarti Samani (presented as a guru) addresses young seekers who complain that they cannot focus on meditation. She argues that meditation without a genuine guru and proper initiation (diksha) is like owning a vehicle without fuel or a driver. Using a vehicle metaphor—ranging from ordinary cars to Teslas and Ferraris—she explains that each practitioner needs the right “tool” matched to their inner capacity. The guru provides the fuel, identified as Shiva, the inner divine energy that powers the practice. Samani critiques reliance on pharmaceutical or non‑denominational, “agnostic” approaches, labeling them as diluted psychological medicine that fails to deliver lasting peace. She cites informal research showing that those who receive traditional, initiated practice experience greater mental calm, health, and success compared to those using non‑denominational methods. The talk culminates in an invitation to upcoming gatherings in Gujarat, Bengaluru, and Lucknow, where participants can receive Shiva‑yoga diksha and transform their lives.
Chapters
ने पत्थर को कितना भी चोर, 2 मुझ से तेल नहीं निकाल सकते, कितनी बार निचोड़ने की कोशिश करोगे। बहुत से नौजवान मेरे पास आते हैं। कहते है भैया मेरा ध्यान नहीं लगता और फिर मैं उनकी प्रक्रिया को देखने की कोशिश करता हूँ। तुमने 1 गाड़ी तो खरीद ली, लेकिन क्या तुमने उस गाड़ी को चलाना सीखा? क्या तुमने अपनी गाड़ी में तेल भरा? जिस प्रकार से वाहन का चालक है, उसी प्रकार से तुम्हारे गुरु जिस प्रकार से गाड़ी में पेट्रोल, उस प्रकार से तुम्हारे शिव। अब तुम कहते हो कि भैया मेरा ध्यान नहीं लगता, क्या तुम्हारे पास गुरु और शिव हैं? गुरु और शिव के बिना ध्यान, तो तेल और चालक के बिना गाड़ी। तुम कितनी सुंदर गाडी ले आओ, कितनी भी महंगी गाडी ले आओ और उस गाड़ी को घर के बाहर खड़ा कर। 2 और उसमें जा कर के बैठ जाओ और बोलो मैं कहीं पहुँच जाऊँ? असम्भव कहाँ है? तुम्हारे गुरु? कहाँ हैं तुम्हारे शिव? और फिर तुम बोलोगे। मैंने किसी को सुन लिया, वो मेरे गुरु हो गए। ये तो ऐसी बात हो गई। तुमने किसी कलाकार को यूट्यूब पर देख लिया और वो तुम्हारी पत्नी हो गई, ऐसा नहीं होता। प्यार, क्या तुमने अपने गुरु से दिक्षा ली? क्या तुमने अपने गुरु से प्राप्त किया? केवल सुनने से कोई सिद्ध तुम्हारा गुरु नहीं बन जाता। तुम्हे उस गुरु से साधना प्राप्त करनी होगी। तुम्हे उससे गाड़ी चलानी सीखनी होगी। बातें सुनने में अच्छी लगती हैं, लेकिन बातें प्रक्रिया नहीं है। बातों में विधि नहीं, बातों में रोमांच है, मजा है। जिस प्रकार से अभी मैं तुमसे बात कर रहा हूँ, मैं तुम्हारा गुरु हूँ। और क्या मेरी बात सुनने से तुम्हारा जीवन बदल जाएगा। तभी बदलेगा, अगर तुम इस बात को समझ कर अपने जीवन में गुरु लाते हो। अगर तुम दिक्षा प्राप्त करते हो, क्योंकि दिक्षा में ताकत है। दर, इस साइकोलॉजिकल मेडिसिन a cognitive medisin a divine medisin, that the guru provides in the form of the transfor of energy, that the snatn, dharm, calls, visa और आज की तारीख में ये जो sicological मेडिसिन है, यह बहुत कीमती है, क्योंकि हमारा तनाव हमारे मन से है। तुम यह सोचो कि अगर समस्या तुम्हारे शरीर में और मैं तुम्हे बोलता हूँ किताबें पढ लूं, तो क्या शरीर ठीक हो जाएगा। if it is a physical problem, you need a physical medisin, if there is a sicological problem you need। साइकोलॉजिकल मेडिसन, तुम्हारे गुरु की साधना, तुम्हारे गुरु का ध्यान, तुम्हारे गुरु की शिक्षा और दीक्षा, वही फिर वो साइकोलॉजिकल मेडिसिन है, जिससे तुम अपने तनाव को दूर कर सकते हो। क्योंकि जब मानसिक असंतुलन की बात आती तो मनोविज्ञान बोलेगा के 2 तरीके हैं, 1 है फार्मसूटिकल राउट और दूसरा नॉन फार्मसूटिकल राउट। पूरी दुनिया में फार्मसूटिकल राउट अपना करके देख लिया अपने मन को शांत करने के लिए कितने लोग ठीक हो और अगर हो रहे हैं? तो क्यों मानसिक तनाव बढ़ रहा है? क्यों दुख बढ रहा है? क्यों अशांति बढ़ रही है? क्यों लोग आत्मघात की ओर बढ़ रहे हैं? क्योंकि कहीं न कहीं फार्मसूटिकल राउत की मानसिक शांति में और मानसिक खुशी प्राप्त करने में कुछ समस्याएं तेरा सम places the farmasuticalrah me not work and a dos times। हमे नonफार्मा चाहिए, हमें 1 लाइफ स्टाइल चाहिए, हमे 1 बिहेवियर चाहिए जो हमारे गुरु हमें प्रदान करते हैं, हमें शिक्षा देते हैं। क्यूंकि अगर समस्या मन में है तो साधना भी मन की करनी होगी। और हमारे गुरु हमें देखते है। और हमें बताते हैं किस किस प्रकार से भाग्य ने हमें कौनसी गाड़ी प्रदान की है। र इस गाड़ी को हमें कैसे चलाना है। क्योंकि देखो, तुम में से कुछ हो। उसको भाग्य ने 1 इलेक्ट्रिक वाईकल प्रदान किया, टेस्ला के समान, उसको तुम्हें अलग प्रकार से चलाना होगा। तुम्हारी रेस ज्यादा है, लेकिन बार बार तुम्हे री चार्ज करना पड़ता है। तुम में से कुछ हो फरारी के समान और तुम में से कुछ हो पुराने कोटा के समान थोड़ा ही दे 2 और तुम चलते रहोगे। और तुम्हारा गुरु तुम्हें देखता है। और जिस प्रकार से भाग्य ने तुम्हे बना करके भेजा है, तुम्हारा गुरु तुम्हें सिखाता है कि कैसे इस इस वाहन को तुम साक्षात्कार की ओर ले जा सको दीक्षा बहुत कीमती है। और फिर बारी आती है महादेव की शिव शिवा, वही तुम्हारा फ्यूल है, वही तुम्हारा पेट्रोल है, उसके बिना तुम्हारी गाड़ी चल नहीं सकती। हमने शोध करके देखा, बहुत बार योगा मोटल्स में क्यूंकि, बड़े नौजवान आये, कहते हैं हम तो वैज्ञानिक है, हम तो एगनोस्टिक हैं, हम तो एथिस्ट है, हमें हमें साधना चाहिए, सनातन चाहिए, लेकिन हमें नॉन डिनामिनेशनल चाहिए। मतलब कि देखो भगवान का नाम मत लेना। माना सब संतोष है, रिषियों से है। लेकिन बहुत अच्छी बात हमें वैसा 2 जैसे वेस्ट में हो रहा है, खूबसूरत बना कर के भगवान को हटा 2, मिटा 2 बस हमें विधि सिखा 2 और जब हमने शोध किया, हमने पाया के जब तुम नॉन डिनोमिनेशनल तरीके से साधना को अपनाते हो, ठीक है, लाभ होता है, लेकिन 50 से 7 प्रतिशत कम क्यों? क्योंकि तुमने अपनी साइकोलॉजिकल मेडिसिन को डायल्यूट कर दिया, फिर जो तुम्हारा पेट्रोल है, बहुत कमजोर है, तुम्हें माइलेज मिलेगी नहीं। और वही हमने शोध किया कि जो डिनामिनेशनल तरीके से सही माइने से जैसा सिद्धों ने सिखाया और विज्ञान सिखाया, शिव भगवान नहीं, शिव विज्ञान है, शिव तुम्हारे कणकंडमेंहै, शिव तुम्हारे एटम्स हैं, शिव तुम्हारे सेल्स हैं। और जब तुम उस शिव को अपनाते हो। और जब तुम उस विधि, शिव योग की उस ज्ञान को सीखते हो जो तुम्हें तुम्हारे शिव से जोड़ेगा कब तुम्हारे भीतर पेट्रोल है। और ऐसा पेट्रोल जो तुम्हें साक्षात्कार की ओर ले जाएगा। और हमने पाया। जिन नौजवानों ने शिव को अपनाते हुए नोमिनेशन साधना को पकड़ा, कम समय में उन्हें कहीं ज्यादा लाभ उत्पन हुआ, उनका मन ज्यादा शांत हुआ, उनके भीतर खुशी उत्पन्न हुई, वो अपने जीवन में सफल हो पाए, वो अपने शरीर को स्वस्थ कर पाए। क्योंकि देखो 1 बात तो तुम्हें समझनी होगी, चाहे तुम 1 ऑन कॉलेजिस से बात कर लो या किसी भी 1 जनरल फिजिशियन से बात कर लो। स्ट्रेस बीमारी को बढावा देता है। अगर तुम्हारी बीमारी आग है तो तुम्हारा स्ट्रेस उस आग में घी जितनी चिंता जितना भय तुम्हारी बीमारी बढ़ जाएगी, तुम अपने आप को और जल्दी मार दोगे और अगर शिव को अपना लो तो तुम निडर हो क्योंकि तुम जानते हो देवादिदेव देवेश सर्व प्राण व्रितामबरहे महादेव हे देवाधिदेव, जिस दिन तुम उन्हें स्वीकार करते हो, फिर किस बात का डर, किस बात की चिंता फिर जो मेरे गुरु कहते हैं हर हाल में खुशी और जब खुशी होगी, जब शांति होगी तो तुम्हारी बीमारी उस आग के समान है जिसको तुम अपना ही दे रहे हो, न लकड़ी दे रहे हो, अपने आप सुलग के बुझ जाएगी। और 1 दिन तुम पाओगे तुम स्वस्थ हो गए और तुम कहोगे हीलिंग हो गयी, चमत्कार हो गया हीलिंग नए प्यारे ये विज्ञान है तुम बीमारी की आग को या तो घी दे सकते हो या बुझा सकते हो और अगर शिवामृत की पश्चात तुम्हारे भीतर हो गई तो अपने आप जो भी तुम्हारा कष्ट है खत्म हो जाएगा। और इसलिए हे नौजवान अगर तुम्हारे जीवन में गुरु है, अगर तुम्हारे जीवन में शिव है तो तुम ध्यान नहीं करते, तुम साधना करते हो और जो कोई भी मुझसे पूछता है भैया ध्यान नहीं लगता तो देखो गाड़ी तो खरीद ली, चलाना भी सीख लो और अगर चाहते हो सीखना तो मैं आ रहा हूँ तुम्हारे पास बहुत जल्द मुलाकात होगी, तुम से गुजरात में है बेंगलुरु में और खासम खास लखनऊ, मेरे महाकाल का स्थान, मेरे योगियों का स्थान और वहाँ बैठ के जब हम साधना करेंगे और तुम शिवयोग की दिक्षा प्राप्त करोगे तो तुम्हारा जीवन अवश्य बदलेगा स्यू अवश्या।