In this Hindi lecture, the speaker (Ishan Shivanand) presents ‘undivided attention’ as a core spiritual practice, urging listeners to give full, wholehearted focus to every activity—whether work, conversation with a spouse, or prayer. He links this mindfulness to the ancient Gurukul tradition, contrasting it with the contemporary Kali‑Yuga mindset that glorifies relentless money‑making and 24‑hour work. The talk critiques how modern Indian society has internalised a boss‑centric, profit‑first identity, leading to loss of health, peace, and divine connection. He calls for a shift back to holistic values: dedicating weekends to family, engaging in spiritual disciplines, and even physically challenging oneself (e.g., climbing mountains) to reconnect with inner divinity. The speaker uses vivid cultural observations (late‑night markets, always‑open shops) to illustrate the pervasive work‑always‑on culture, and he proposes practical steps—listening attentively, maintaining eye contact, and allocating time for family and spiritual practice—as pathways to true happiness and Shiva‑yoga.
Chapters
अगर प्रेम कमा रहे हो, तब इसको अपना मंत्र बनाओ। अनडिवाइडेड अटेंशन तुम्हारा सारा ध्यान, उस समय तुम्हारी पत्नी भी तुमसे बात कर रही है। यह भी 1 साधना की प्रक्रिया है। west mesto mindfulness or ye mindfulness shivyogsecuri toe to ji on pak sales sal se है, जो करना है टू हंड्रेड। परसेंट यही माइंडफुलनेस का सार है कि जो कुछ भी कर रहे हो, पूरा दिल लगा के करो, पूरा मन लगा कर करो। चाहे। तुम्हारी पत्नी से भी बात हैं। अगर वो कुछ कहती है, अरे सुनते हो, उसको देखना शुरू कर। 2 हाँ सुनाओ आँखों में आखें, तब तक जब तक वो शर्मा ना पड़े। अरे क्या हो गया, तुमने ध्यान ही नहीं दिया, सामने वाले की आवाज पर गई। और फिर तुम साधना में आके रोते हो। सब चिल्लाते क्यूँ है? क्यूँ कि तुम बहरी हो, कोई बुलाता है देखो तो सही। और जो स्थूल है उसके प्रति तुम माइंड फुल हो गए। तो 1 दिन जो सक्षम है, उसके प्रति भी माइंड फुल हो जाओगे। तुम्हारे भीतर अंदर से आवाज आएगी बेटा और तुम कहोगे कौन? और वो बोलेगा मैं शिव शिवा, तब पूरा ध्यान उस पर भी डाल देना। लेकिन अगर स्कूल कोई नहीं सुन पाये तो सुक्ष्म को कहाँ सुन पाओगे। अगर सुक्ष्म को ही नहीं सुन पाये। तो तुम्हे क्या लगता है? जो दिव्य है उसको कैसे सुनोगे खुशी का मतलब तुम कमाना जान गये है। केवल पैसा ही नहीं, समस्या क्या है। कलयुग में केवल 1 ही चीज हमे करना सिखाते हैं, पैसा कमाना। इसलिए आज की तारीख में पैसा आ जाता है, स्वास्थ्य चला जाता है, शांति चली जाती है। दिव्यता, चली, आती और शांति की जगह बेहोशी आ जाती। सत्युग में अलग था, बच्चे को गुरुकुल में सब सिखाना कमाना सिखाया जाता था, प्रेम भी कमाना सिखाया जाता था। सर्व गुण, संपन्न, कलाएं सिखाई जाती थी। बोलो मानते हो, हाँ जी, न जी। उनको बताया जाता था कि ये यह 1 हिस्सा है, जीवन का, यह जीवन नहीं है। और क्योंकि भारत गुलाम था इसलिए अभी तक शायद वो 1 माइंडसेट रह गया कि बॉस के सामने जितना अच्छा काम करोगे वही जीवन है। तब बॉस गोरे हुआ करते थे। अब अब हम भूल ही गए की बस गए, अब अब हमें बस के लिए नहीं जीना, हम अपने लिए जी सकते हैं। वह जो गुलामी में 200 साल पीट पीट के, हमको सिखाया गया कि तुम जी रहे हो केवल काम करने के लिए और तुम्हारे जीवन में कुछ है ही नहीं। तुम देखना। भारत शायद इकलौता देश है जहाँ पर रात के 2 बजे भी अगर तुम्हे साड़ी खरीदनी हो, तुम्हे मिल जाएगी क्योंकि कोई 1 भोंदू काम कर रहा है। रात के 2 बजे तक। भारत शायद इकलौता देश है, जहाँ पर 3 बजे भी तुम्हे डाबली खानी हो, तुम्हे मिल जाएगी, क्योंकि कोई बंद काम कर रहा है। कमान कमान है कमान कमान कमाना, जो जितना देश सफल हो जायेगा, तुम जा कर देखना। 45 बजे सब अपनी दुकाने बंद कर देते हैं। क्यों क्यूंकि उनको है कि अब अपना जीवन तुझे पैसा कमा लिया। अब हम कुछ और कमाएंगे सैटरडे संडे को काम नहीं करता, सैटरडे संडे लोग अपने परिवार पर ध्यान देते हैं और सब चीजों को कमाने पर ध्यान देते, दिव्यता पर धयान देते। कोई 1 पहाड़ चढ़ जायेगा। अकेले मजे की बात। हमारे शास्त्रों में लिखा है की हमारे पूर्वज पहाड़ो पे जा के साथ करते थे भारत में, मैंने आज तक किसी को पर चढ़ते नहीं देखा। जब पहाड़ चढ़ने भी जाता हूँ तो हिमालय में मैंने देखा की बेस कैंप पर खूब सारी भांग मांग लगी हुई है। जो बच्चे घर बता के आते हैं, पहाड़ चढ़ने जा रहे है वो बेस कैंप से ऊपर नहीं जाते। बहुत दुख की बात है और बाहर के देशों में देखता हूँ हर सैटटिसंडेलोगट्रैक करने जाते हैं, पहाड़ चढ़ते हैं, अकेले बैठते है वहाँ पे साधना तो शायद नहीं जानते लेकिन अगर जानते होते तो शायद फिर सिद्ध भारत से नहीं किसी और देश से आते। बहुत घबराने वाली बात है ये तुम खुद सोचो। अगर हर समय काम करने का माइंडसेट होगा तो यह माइंडसेट हर चीज पर परफोरेटकर जाएगा। जब किसी बाहर देश में जाता है तो दुकान के सामने लिखा होता है हम केवल काम करते हैं। सुबह 9 बजे से 4 बजे तक सैटरडे संडे हम काम नहीं करते। अगर तुम कोई काम है या 9 से 4 बजे तक आना या फ़ोन कर। 2 हम तुम्हे खुद फोन करेंगे भारत में हम काम करते हैं 12 से 12 बजे तक, हर समय और क्यूँकी काम भी 12 से 12 बजे करते हैं। तो तो अगर लड़ाई भी करनी हो, कोई हमारे पास आता है आओ लड़े तो हम कहते हैं हमारी दुकान तो हमेशा खुली है, आज लड़ते सोचो कितना अच्छा हो जाए। अगर हम ये सक्सेसफुल माइंड सेट रखे है की कोई हमसे लड़ने भी आये, हम बोले हम लड़ते हैं 9 से 4 बजे तक से डे संडे हमें लड़ना नहीं पसंद, यह परिवार का समय है। अगर तुम्हे लड़ना है कृपया मेसेज दे। 2, वनडे 9 बजे हम खुद फोन करेंगे तुमको जिंदगी कितनी सरल हो जाए कितनी आसान हो जाए तुम समय बांधना सीखो, तब तो खुशी है, तब तो शिव योग है, तब तो जीवन है। a।