In this Hindi spiritual discourse, Ishan Shivanand explains how the practice of Shiv Yog creates a profound sense of belonging that transforms a practitioner’s life. He describes how attachment to the guru and to the community of fellow Shiv Yogis awakens inner healing powers, likening the guru to a divine father whose presence prevents the inner ‘cells’ from deteriorating. The talk then shifts to the idea that every individual must become the author of their own life narrative. Shivanand critiques the prevailing material‑centric narrative sold to today’s youth—success measured by cars, houses, and profit—showing how it leads to stress and emptiness despite outward achievements. He argues that adopting a sanātan (eternal) spiritual narrative, guided by a guru, rewrites one’s story toward inner happiness, health, and ultimately liberation (moksha). The speaker emphasizes that this path provides both material well‑being and the deeper joy of self‑knowledge.
Chapters
कुछ चीजें हैं शिवयोग के भीतर जो लोगों का जीवन बदल देती है। सबसे पहली चीज। उन्होंने कहा बिलॉन्गिंग बिलोंगिंग का मतलब, अपने आप। जब हम अपने गुरु को सुनते हैं तो हमें 1 अटैचमेंट अनुभव होनी शुरू हो जाती है। बिलोंगिंग का मतलब कितने मैंने ऐसे शिवयोगी देखे जो जब बाबाजी को सुन रहे हैं। उन लोगों को लगता है बाबा जी केवल और केवल उनके लिए बोल रहे हैं। वो लगता है कितने मैंने ऐसे शिवयोगी देखे जो जब बाबा जी को सुनते हैं। लगता है कि बस हम यही तो सुनना चाहते थे। हमें इंतजार था मानो तुम अपने गुरु को नहीं, तुम अपने भीतर के उस हिस्से को देख रहे हो जिससे कभी अलग हो गए थे। और अब 1 बार फिर जुड़ गए। और जब 1 व्यक्ति शिवयोग में आता है उसको केवल अपने गुरु से ब्लॉगिंग नहीं उसको बाकी सब शिवयोगियों ऐसी भी बिलॉन्गिंग होनी शुरू हो जाती ह। उसको लगता है कि उसको 1 दिव्य परिवार मिल गया। क्योंकि जब वो फोर्म में जाता है, जब वो शिविर में जाता है, न जाने क्यूँ अपने आप 1 कनेक्शन हो जाता है। मैंने कुछ शिविर में देखा। हर शिविर में 2 शिविर होते है। 1 शिविर जो मैं करता हूँ। और दूसरा शिविर जब ब्रेक होती है तो पुराने शिवयोगी नए शिवयोगी को करा रहे होते हैं। क्योंकि नए शिव योगी को तो समझ ही नहीं आ रहा होता। आधी बार क्या हो रहा है, मूलाधार क्या होता है। और पुराने शिव योगी। तू इधर आ मैं तेरे को बताता हूँ न मैं तेरे को समझाता। तुम्हें भी याद होगा कि जब तुम पहली बार आये थे और बाबा जी के फलाने पटल पे फलानी देवी, बिठा तुम्हें भी समझ नहीं आया, कौन? सा पेटल, कौन सी देवी। तो हर शिविर के बाद 11 मिनी शिविर, 1 सेंस ऑफ बिलांगिंग, आती मानो, 1 परिवार मिल गया, 1 दिव्यता मिल गयी, 1 पिता मिल गए। और गुरु 1 ऐसा पिता है जो थोड़ा अलग है। जो हमारे शरीर के पिता हैं, उन्होंने हमें बहुत बार सुधारा तो उनको देख के हमारे भीतर के जो सेल्स हैं, वो कंडीशंस हैं कि थोड़े तन जाए, लेकिन गुरु 1 ऐसा पिता है जिसको देख कर हमारे भीतर का कण कण तनता नहीं पिगल जाता है क्यों? क्योंकि प्रेम खुशी और जब 1 सेंस ऑफ़ बिलॉन्गिंग आएगी तब अपने आप शरीर के भीतर हीलिंग पावर्स जागरत हो जाएंगी। जिस व्यक्ति के भीतर सेंस ऑफ बिलांगिंग ही नहीं है, वो व्यक्ति ना तो कभी खुश होगा, न कभी स्वस्थ होगा। और अगर खुश नहीं है, स्वस्थ नहीं है तो सफल की तो हम बात ही न करें। सेंस ऑफ बिलांगिंग के बाद उन चिकित्सकों ने कहा कि जब 1 व्यक्ति शिवयोग में आता है उसका जीवन इसलिए बदलता है क्यों क्योंकी फिर नरेटिव 1 रास्ता 1 कहानी अगर हमारा जीवन 11 कहानी है तो कोई कहानी लिखने वाला भी होना चाहिए। और लिखने वाला जितना सक्षम होगा, जितना दिव्य होगा उतनी खूबसूरत हमारी कहानी होगी। आज की तारीख़ के नौजवान की कहानी कौन लिख रहा है, जितनी कंपनियां है वो लिख रही हैं, जितनी प्रोफिट मेकिंग ऑर्गेनाइजेशन्स हैं, वो लिख रही हैं। और क्या नेरेटिव दिया है उन्होंने नौजवान की कहानी को कि तुम्हारा जीवन सफल तब है, अगर 2 गाड़ी है, 1, बी भी है, बड़ा घर है, तुम, तुम सफल हो, ये नेरेटिव है, यही नेरेटिव सुनने में आता है, न, हाँ जी, ना जी। और जब मैं बड़ी बड़ी कंपनियों में जाकर साधना करता हूँ, ये नेरेटिव फेल हैं, फेल क्यूंकी बड़ी गाड़ी तो आ गयी, बड़ा घर तो आ गया, लेकिन साथ में 1 और चीज आ गई, चिंता स्ट्रेस। और अब कनफ्यूज है नौजवान की, हमने तो सब कुछ किया जो हमारी स्क्रिप्ट में लिखा था, हम कॉलेज भी गए, खुश ही नहीं आई, नौकरी भी की खुशी नि आई, पार्टी भी की खुशी नि आई, शो भी देखा, खुशी भी नहीं आई, पिक्चर देखी खुशी नि आई, चीजें खरीदी खुशी नी आई, हम स्टेस्ट हैं, टेस्ट गलत नेरेटिव है, गलत। जब 1 व्यक्ति शिवयोग में आता है, जब 1 व्यक्ति सनातन के मार्ग पर चलता है, तब उसका नरेटिव सप्तरिशी लिख रहे है। और शब्दऋषि जब नेरेटिव लिखता है, जब वो 1 रास्ता प्रदान करता है, तो वो रास्ता 1 ऐसा रास्ता है जिस रास्ते पर अगर आप चलोगे तो जीते जी आप मोक्ष को प्राप्त कर सकते हो, जीते जी आपको, वस्तुएं भी मिलेगी, लेकिन साथ साथ 1 जो खुशी है, खुद को जानने की समझ है, वो भी आएगी।