In this Hindi recitation, the speaker introduces a poem titled “Door Kahin Koi Rota Hai,” written by former Prime Minister Atal Bihari Vajpayee during the Emergency period when he was hospitalized at AIIMS Delhi. He describes how Vajpayee, while recovering, would hear the cries of dying patients each morning, which inspired the poem’s mournful tone. The speaker connects the poem’s themes of loss, grief, and mortality to the unprecedented hardships of the COVID‑19 pandemic year, noting that many have lost loved ones. He urges listeners to observe Diwali with compassion, to make small gestures that can help those affected, and to keep the memory of the departed alive. Throughout, he clarifies that he is merely a reciter, not the poet, and frames the poem as a relevant reminder of shared humanity during times of sorrow.
Chapters
धन्यवाद सीजिताजी। पहली बार तो मैं थोड़ा सा सुधार करना चाहूंगा। मैं अभी कभी नहीं हूँ और मैं अभी कविता वाचक हूँ यह मेरी अपनी कविता नहीं है और शायद आप लोग को पता भी हो कुछ लोगो को यह कविता लिखी गई थी अटल बिहारी वाजपेयी हमारे ये कविता उन्होंने लिखी थी। जब वो इमरजेंसी के टाइम पे जेल में थे और की तबियत थोड़ी खराब हो गई थी तब उनको एम्स दिल्ली में शिफ्ट किया गया था उस टाइम पे वो हॉस्पिटल में थे और कई बार जब सुबह सो के उठते थे तो उनको बहुत सारे लोगो की रोने की आवाज सुनाई देती थी और ऐसा होता था कि हॉस्पिटल में जिन पेशेंट्स की डेत हो जाती थी सुबह सुबह उनके को पता चलता था वो काफी विलाप करते थे। जब मुझे यह कवी सम्मेलन का पता चला और मुझे पता चला कि यह दीवाली का मौका है बट ये 1 ऐसा वर्ष है जो कि अभूतपूर्व रहा है। हमारे बहुत सारे साथियों ने बहुत सारे परिजनों को खोया है। मुझे यह कविता बहुत ही प्रासंगिक लगी तो मैं यही कविता दूर कहीं कोई रोता है बोलना चाहूँगा दूर कहीं कोई रोता है, दूर कहीं कोई रोता है तन पर पहरा भटक रहा, मन साथी है, केवल छ बिछड़ गया क्या स्वजन किसी का कंदन सदा करोड़ होता है दूर कहीं कोई होता, जन्म दिवस पर हम इठलाते क्यों न मरण त्यौहार मनाते अंतिम यात्रा के अवसर पर आंसू का सुकुन होता है दूर कहीं कोई लता अंतर रोये आँख न रोए, अंतर रोये आँख न रोए खुल जाएंगे सप्नसजोएछर्ना भरे विश्व में केवल सपना ही तो सच, पर कहीं कोई इस जीवन से मृत्यु भली है। आतंकित स आतंक की जब गली के लिए मैं भी रोता आसपास जब कहीं कोई नहीं होता, दूर कहीं कोई रोता है, दूर कहीं कोई होता है। मैं आप सब से प्रार्थना करना चाहूंगा कि दीवाली का बहुत ही अच्छा पर्व आ रहा है तो हम अच्छे से बनाए। लेकिन हम ये भी 1 छोटी सी कोशिश करे कि हम किसी और का दीवाली अच्छा कर सके। बहुत सारे लोग दुसस्वीपदा के कारण प्रभावित हुए हैं। हम अपनी तरफ से 1 छोटी सी पहल कर सके ताकि उनके जीवन में जो भी आनिया हुई है उसकी थोडी बहुत भरपाई कर सके। और इसी संदेश के साथ मैं आप लोगों से प्राथना लेना चाहूँगा।