In this Hindi motivational monologue, a teenage daughter, overwhelmed by repeated failures, confides in her father, a renowned chef. He takes her to the kitchen and places three items—a potato, an egg, and coffee beans—in separate pots of boiling water. After the water has boiled for a while, he asks her to observe the changes. The potato, once hard, becomes soft; the egg, initially fragile, hardens into a solid shell; the coffee beans not only change themselves but also turn the water into coffee. The father explains that these three reactions symbolize three kinds of people in life: those who soften and give up like the potato, those who become rigid and unyielding like the egg, and those who transform the surrounding environment and create something new like the coffee. He challenges his daughter to decide which response she wants to embody, urging her to turn adversity into opportunity. The story ends with a broader reflection on current global challenges, urging listeners to choose the ‘coffee’ mindset.
Chapters
ये कहानी है 1 पुत्री और पिता की। पुत्री करीब 10 पंद्रह साल की थी। बहुत ही ज्यादा दुखी होकर 1 दिन अपने पिता के पास आई और बोली पिता जी, मुझे नहीं लगता की मेरे जिंदगी में कुछ भी हो सकता है, मैं बहुत परेशान हूँ, मैं 1 चीज करने चलती हूँ और वो बिगड़ जाती है। फिर मैं दूसरी करती हूँ, वो बिगड़ जाती हो। और मुझे लगता है मेरा कुछ नहीं हो सकता। जीवन में। पिताजी 1 मशहूर रसोइए थे जिसको हेडशे कहते है, अंग्रेजी में वो थोड़ा मुस्कराया और उसको बोले आओ बेटा चलते है। और वो उसको ले गए अपने किचन में यानि अपने रसोई में। पुत्री को कुछ समझ भी नहीं आया, ये कर क्या रहे हैं। लेकिन पिता जी थे उनके साथ चली पिताजी गए, उन्होंने 3 पॉट जिसको कहते हैं 3 पाले उठाये और उसको गैस पर रख दिया। पानी भर के गरम हो रहे थे। पुत्री को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है, मैंने इनसे पूछा है मुझे इतनी समस्याएं मुझे समाधान नहीं दे रहे हैं, यह कर क्या रहे हैं। फिर पिताजी लेकर आये। 1 बड़ा सा मोटा सा आदमी, उन्होंने उसको पहले प्याले में डाल दिया, प्यारा नरम भरा था। फिर उन्होंने उठाया 1 दूसरा अंडा मुलायम सा सफेद सा। उसको उन्होंने दूसरे प्याले में डाल दिया और फिर उन्होंने कॉफी की सीसी को खोला और 1 चम्मच कॉफी का 20 तीसरे पाले में डाल लिया। पुत्री को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि यह हो क्या रहा है। उसको लगा पिताजी को लगता है। आज भी होटल के काम के चक्कर में बिजी वो देख रही थी। समय बीतता जा रहा था, 5 मिनट, 10 मिनट, पंद्रह मिनट, 20 मिनट होगा। उसके बाद उसने पिताजी से पूछा पिताजी आखिर आप करना क्या चाह रहे हैं? पिताजी? फिर मुस्कराए और बोले जाओ बेटा तीनों प्यारे लेके आओ, वो गई, तीनों प्यारे लेके आई और बोली यह लीजिये। पिताजी बट मुझे अभी भी कुछ समझ में नहीं आ रहा कि यह हो क्या रहा है। पिताजी ने कहा तुम्हे क्या दिखता है, ये कैसा सवाल हुआ, इसमें आलू है, इसमें 1 अंडा है और इसमें यह कॉफी पड़ी हुई है। उसने तो पिताजी ने कहा नहीं तुम थोड़ा ध्यान से देखो, तुम्हें क्या दिखता है, आलू है, अंडा है। और काफी। तब पिताजी ने बोला अगर तुम ध्यान से देखोगे तब तुम्हें समझ में आएगा। ये जो पहला आलू हैं, वो जब पानी में गया था उस समय वो बहुत ही सख्त था, मोटा था। लेकिन अब 20 मिनट के बाद उबल के बहुत ही सॉफ्ट सा हो गया है। मुलायम सा हो गया है। ये जो अंडा है जो उस टाइम पर अगर ज्यादा जोर से दबाते तो टूट भी जाता। लेकिन अब अगर तुम इसके बाहर की बरत निकालोगी तो ये 1 अंदर से मजबूत ठोस चीज देखेगा। और ये जो काफी है, ये तो एकदम बदल ही गई है। न सिर्फ खुद बदलिए है बल्कि इसने पानी को भी बदल लिया। ये 1 तरह से हमारे जीवन को प्रदर्शित करते हैं। 3 तरह के लोग होते हैं जीवन में, ये हमारा उबलता हुआ पानी, ये है हमारे जीवन की समस्याएं, सबके पास अलग अलग बहुत बार सेम तरीके की समस्याएं आती है। कुछ लोग होते हैं जो आलू की तरह होते है क्योंकि बहुत ज्यादा उत्साहित होते हैं लेकिन थोड़ी देर समस्याओं से जूझने के बाद वो टूट जाते हैं वो होते हैं पहले प्रकार के दूसरे वो होते हैं जो बहुत डरे से होते हैं, बहुत से संकुचित से रहते हैं लेकिन जब वो समस्याओं का सामना करते हैं वो करते करते करते बहुत ज्यादा मजबूत, बहुत ज्यादा ताकतवर, बहुत ज्यादा उत्साहित रहते हैं। और ये जो तीसरे लोग होते है वो है कॉफी की जो कॉफी के बीच जब वो पानी गरम पानी में पड़ते है जब कि उन लोगों के जीवन में कुछ समस्याएं आती हैं तो न सिर्फ उसका वो अच्छ से सामना करते है बल्कि कुछ नया बना कर निकालते हैं, कुछ अच्छा बना के निकालते हैं। तो बेटा अब ये तुम्हें निश्चित करना है कि तुम 1 आलू बनना चाहती हो जो वो बहुत उत्साहित हो के समस्याओ से जूझना शुरू करो लेकिन फिर टूट जाओ कि तुम 1 कुम् अंडे की तरह बनना चाहती हो जो बहुत डरा रहे लेकिन समय बीतने के साथ साथ बहुत ज्यादा कठोर हो जाए या तुम उस कॉफी के बीच की तरह होना चाहती हो जो जब समस्याएं आए तो उससे कुछ नया कुछ अच्छा कुछ बेहतर कर सके और यही सवाल मेरा आप स। अगर हम इस समय दुनिया की परिस्थितियों को देखें तो इस समय बहुत सारी परिस्थितियां हैं जो नहीं होनी चाहिए हम सब जूझ रहे हैं अलग अलग चीजों से बट हमें यह निश्चय करना है की हम आलू हैं, अंडे हैं की कॉफ़ी के ै।