असली सुख प्राप्त करने का क्या है साधन | 01 Nov 2006 | Ahmedabad | Srila Gopal Krishna Goswami

The lecture delivered by Srila Gopal Krishna Goswami in Ahmedabad emphasizes that true happiness (असली सुख) cannot be attained through material pursuits alone but through spiritual realization as taught in the Bhagavad Gita and the Vedic tradition. The speaker references the ancient saint Pralād Maharāj, whose divine knowledge from the womb exemplifies innate self‑knowledge, and explains how the Gita’s teachings—especially the concepts of karma‑yoga, jñāna‑yoga, and the distinction between material and spiritual knowledge—provide the roadmap to real bliss. He stresses that the essential practices in the current age (Kali‑yuga) are the chanting of the holy name (हरि नाम), the observance of the three immutable duties of yajña, dāna and tapa, and sincere service (भक्त‑संगत) in spreading the Gita worldwide. The talk also critiques modern comforts, technology‑driven anxiety, and mental illness as symptoms of drifting away from divine instruction, urging listeners to adopt name‑chanting, selfless service, and scriptural study as the simple, universal means to attain lasting joy and societal welfare.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय, नम भगवते वासुदेवाय। आप सब भक्तों का हार्दिक स्वागत। तो अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावना मित संघ के द्वारा पूरे मानव समाज को ये शिक्षा दी जाती है जिसके द्वारा वो असली खुशी प्राप्त कर सके। आज हम सब भौतिक जगत में खुशी चाहते हैं, आनंद चाहते हैं। सच बात है। आज से हजारों साल पूर्व 1 महान संत थे जिनका नाम था प्रलाद महाराज। आप सब शायद उनसे परिचित हो। प्रलाद महराज से तो प्रलाद महाराज की शिक्षा हमें भागवतम के सातवें स्कंध में प्राप्त होती है। प्रलाद महाराज का सौभाग्य था कि जब वो माता के गर्भ में थे, उन्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ था और इस कारण बचपन से ही आत्म ज्ञान ही थे। प्रलाल महाजी ने कहा है आज लोग ये नहीं जानते कि असली सुख प्राप्त करने का क्या है। साधन आज हम उस वातावरण में पल रहे हैं जहाँ के हमें यह शिक्षा दी जाती है कि इंदिरा चिपती जीवन का लक्ष्य पर, शास्त्र के अनुसार जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। भगवत प्राप्ति यह शिक्षा हमें वैदिक साहित्य में प्राप्त होती है। वो इसका सार हमें भगवत गीता में प्राप्त होता है। भागवत गीता से आप सब परिचित हो। भागवत गीता में वैदिक साहित्य का सार है। और ये जो शिक्षा है, यह पूरे मानव समाज के लिए है। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि गीता का उपदेश केवल हिंदुओं के लिए है, ये भारतवासी के लिए है, भारतवासियों के लिए है। भगवान ने कहा हम बीज प्रदा पिता मैं, सब यूनियन का पिता हूँ। स्वामी जो कि संस्था के हैं, उन्होंने भागवत गीता का नुवाद किया था अंग्रेजी भाषा में और आगे इसका अनुवाद विश्व की लगभग हर प्रतिशत भाषा में हो चुका है। और आज सारे विश्व में लोग गीता के सन्देश का लाभ उठा रहे हैं। अपनी समस्या को हल करने के लिए गीता के द्वारा हमें असली ज्ञान प्राप्त होता है। इसलिए गीता के 9 वे दहाई में भगवान ने कहा राज, विद्या, राज, गोयम, ये जो ज्ञान है, ये सब ज्ञानों से में सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान है। 2 प्रकार के ज्ञान होते हैं। 1 भौतिक ज्ञान दूसरा है। आध्यात्मिक ज्ञान, भौतिक ज्ञान हम प्राप्त करते है। 5 सालों में महाविद्यालयों में सरकार कानून बनाती है, वो भी 1 प्रकार का भौतिक ज्ञान है। और संतों ने कहा है के बहुत ही ज्ञान में 4 प्रकार के दोष है, कमियाँ हैं, हम सब में चलने की इच्छा रहती है, पूण गलती करते हैं, भ्रम में आते है। और ये जो अध्यात्मिक ज्ञान है, यह दिव्य ज्ञान है। इस में कोई अपूर्णता नहीं, कोई कमी नहीं। भागवत गीता के चौथे अध्याय में भगवान ने कहा कि मैंने 1 ज्ञान दिया था भागवत गीता का, सबसे पहले सूर्य के देवता विवान को, जिनसे ज्ञान पहुँचा, मनु मानवता के पिता को और फिर 1 शाक को, जो जिनका राज्य था इस पृथ्वी पर। सेतु के आरंभ में, लगभग 20 लाख साल पूर्व। तो अर्जुन ने ये पूछा भगवान से कि कैसे मैं स्वीकार करूँ की आपने ज्ञान सूर्य के देवता को दिया था। जब कि वो आपसे पहले प्रकट हो चुके हैं। और भगवान ने कहा कि बहुत बहुत बात, तुमने और मैंने जन्म लिया है और मैं सब जन्मों का स्मरण कर सकता हूँ। और तुम और ये ज्ञान मैं तुम्हे क्यूँ दे रहा हूँ। क्यूँकि तुम हो मेरे प्रिय, भक्त और मित्र। इसलिए तुम इस ज्ञान के दिव्य रहस्य को समझ पाओगे। तो इसके द्वारा हमें यह सूचना प्राप्त होती है की अगर हम गीता का ज्ञान ग्रहण करे तो हमें किसी भक्त और भक्त के द्वारा प्राप्त करना चाहिए। पिछले साल हम प्रचारक के आश्रम में गए थे। तो उसके आश्रम में जब हम पहुंचे तो उनके शिक्षा ने कहा ये है उनका नाम लेते हुए उनकी मां, ये है उनका महाभारत, ये है उनकी गीता। हम ने कहा कि गीता तो है भगवान श्री कृष्ण का सन्देश रामायण है। वह मेक जी रचना पर उन्होंने अपना सन्देश दिया और कहा ये हमारी गीता है। तो गीता का सन्देश अगर हम यथा रूप स्वीकार करें तो ही इसका हमें असली लाभ पहुंचेगा। इसलिए भक्त स्वामी पापाजी ने जब भागवत गीता को प्रकाशित किया, इसे भागवत गीता यथा रूप के नाम से प्रकाशित किया। गीता के द्वारा हम अपने स्वरुप के विषय में शिक्षा प्राप्त करते हैं। गीता के दुसरे देहाय में भगवान हमें यह शिक्षा देते हैं की आत्म और दे में अंतर है। हम सब देख सकते हैं कि हमारा शरीर जो है बदलते रहता है। कहा जाता है कि शरीर से अवस्थाओं से गुजर कर जाता है। पर आत्मा के विषय में भगवान ने कहा है न चाहते मृतेवाकदाचननइसका जन्म होता है, न ही इसकी मृत्यु होती है। हम खुद भी अनुभव कर सकते हैं की आत्मा सनातन है और आत्मा के कारण ही हमारे शरीर में चेतना रहती है। जब आत्मा शरीर को त्यागती है तो शरीर बेकार का हो जाता है। या हम जलाते हैं या हम दबाते हैं या पारसियों जैसे कुए में फेंकते हैं, जैसे चिड़िया खा लेते हैं, शरीर की कुछ कदर नहीं है। तो आत्मा जो है सनातन है। भगवान उदाहरण देते है जैसे की हम अपने पुराने वस्त्र को त्याग कर नए वस्त्र ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार की आत्मा 1 दे को त्याग कर नया दहेज से कार करती है। तो प्रश्न यह है कि किस प्रकार का दे आत्मा को प्राप्त होगा? ये निर्णय किया जायेगा हमारे कर्मों के द्वारा। इसलिए भागवत गीता के तीसरे और पांचवे दिखाए जिसका नाम है कर्म योग, उसमें भगवान हमें शिक्षा देते हैं कि हमें कार्य करना चाहिए। भगवान की खुशी के लिए। भौतिकवादी हो या ध्यात्मिकवादी, कार्य तो आपने करना ही है। ये नहीं कि अगर आप गीता के सन्देश को स्वीकार करोगे तो आपको कुछ करना नहीं पड़ेगा। भौतिक वादी व्यक्ति और आध्यात्मिक वादी में क्या अंतर है? भौतिक वादी अपने जीवन का उपयोग करता है, प्रयास करता है, परिश्रम करता है। भौतिक सुख इदिोकेतपटेकलिएअध्यात्मिक व्यक्ति हर कार्य करता है। प्रेस भावना से केस के द्वारा मुझे परम भगवान की सेवा करनी चाहिए। चेतन्य महाप्रभु जी स्वयं भगवान हैं। और चेतन महाप्रभुजी ने देते हुए कहा कि भाव यह होना चाहिए जो भगवत प्राप्त के लिए जो कार्य अनुकूल है उसे हम स्वीकार करें। वो जो प्रतिकूल है उसे हमें बचना चाहिए। जैसे कि साधारण समाज में जो भोजन आपके स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है, उसे स्वीकार करते हो। ठीक है, जो भोजन सुहास को नुकसान पहुंचाता है उसे आप किसी स्थिति में स्वीकार नहीं करते। इसी प्रकार हम सबका ये लक्ष्य होना चाहिए की हम उसी कार्य को स्वीकार करें जो कि जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनुकूल है। वो जो प्रतिकूल है उसे त्याग। हमें भूलना नहीं चाहिए कि ये मनुष्य जीवन जो आज हमें प्राप्त हुआ है, ये प्राप्त होता है लाखों लाखों योनियों में, गुजरने के पश्चात साधारण जीवन में भी अगर कोई चीज आपको कोई वस्तु कठिनाई से प्राप्त होती है तो आप क्या करते हो? उसकी कदर करते हो? सच बात है। और अगर कोई चीज आसानी से प्राप्त होती है, त सकी आप कदर करते हो? अब अखबार खरीदते हो और गुजरात समाचार अखबार खरीदते हो, आपको चिंता नहीं रहती, कोई चोरी करेगा या नहीं? है की नहीं। और आपके जो हीरे मोती हो या सोना हो, उसकी आपको चिंता रहती है। तो आप सावधानी से छुपा कर रखते हो। दूसरी परखा हम सब को भूलना नहीं चाहिए कि ये जो मनुष्य दे प्राप्त हुआ है, यह कठिनाई से प्राप्त हुआ है। और इसलिए हमें इसका सुदुपयोग करना चाहिए। जिसका अर्थ है भगवान के शिक्षा के आधार पर हमें इस जीवन को बिताने का प्रयास करना चाहिए। तो तीसरे और 5 से दहाई में भगवान कह रहे हैं की यज्ञ के बिना ये जीवन जो है बेकार है। इसलिए भगवान गीता के अठारहवे दहाई में, जिसमें गीता का सार दे रहे हैं, भगवान कहते हैं ये 3 चीजें हमें किसी हालत में नहीं त्यागना चाहिए। वो क्या हैं यज्ञ, दाना और तपस्या। भगवान ने कहा कि आत्मज्ञानी व्यक्तियों को भी इन तीज कार्यों का पालन नहीं त्याग देना चाहिए। तो यज्ञ धाना और तपस्या। तो क्या है यज्ञ। इस कलियुग में शास्त्र में कहा गया है कि कलियुग का 1 लक्षण है के लोग दुर्भाग्यशाली हैं, आध्यात्मिक कार्य के लिए आलसी हैं। सच बात है बहुत ही कार्य के लिए निमंत्रण। 2 लोगों को हजारों की संख्या में लोग आयेंगे, यह बहुत ही क्रिकेट मैच होता है। तो लाखों की संख्या में हम उसके साथ जुड़ जाते हैं। सच बात है अखबार खरीदा 456 पेट अखबार में सब 1 ही पर होगा। और आध्यात्मिकता की का है, चर्चा है, कुछ है नाम के लिए थोड़ा सा। तो आज हमारा दुर्भाग्य यह है की जो स्थायी कार्य हैं, उनमें हमारी अधिक रुचि है, जो महत्वपूर्ण विषय है उसमें बहुत कम लोग रुचि ले रहे हैं। तो श्रीमद भागवत में हम परीक्षित, महाराज और शुक्रदेव को स्वामी का वर्तल पढते हैं। शुकदेव स्वामी जी ने परे्शमहाजकोयेज्ञान दिया था। जो ज्ञान आगे स्वामी जी ने के बन में संतों को दिया। तो इस श्रीमद भागवत में महज ने 1 प्रश्न पूछे थे, जिनमे 1 प्रश्न यह था कि कलयुग में लोगों का उधार कैसे होगा? संतों में संतों का यह भाव रहता है कि वो कार्य किया जाए जिसके द्वारा समाज सुखी बने। जैसे की इस महीने पिछले महीने और इस महीने के पहले हफ्ते में हमारे इस कॉल अमदाबाद के भक्त वो सारे विश्व के भक्त जुड़े हुए थे। ग्रंथों के वितरण की सेवा में है ना जिससे हम गीता मैराथन के नाम से बुलाते हैं। आज में अनेक भक्तों को मिला गीता में जिन्होंने सहयोग दिया तो क्या कारण है की हम इस कार्य पर बल देते हैं। यह प्रयास करते है की अधिक से अधिक मात्र में लोगो को गीता का ज्ञान मिले क्यूंकि ये ज्ञान है समाज के सुख के लिए, सुधार के लिए अनेक घटनाएं है सारे विश्व में कि किस प्रकार लोगों के हृदय में आध्यात्मिक जागृति। उत्पन हुई गीता के अध्ययन के द्वारा तो वैष्णों की भावना रहती है की सूर्य पूरा समाज सुखी बने। जैसे की आज का यह कार्यक्रम किया जा रहा है के घर में इस कार्यक्रम में मंदिर के भक्त उपस्थित हैं और उनके रिश्तेदार, पड़ोसी इत्यादि उनको मंत्र दिया। वो भी उपस्थित है तो क्या कारण है यह कार्य किया जाता है। क्यूंकी भक्तों की इच्छा है कि सब सुखी बने इसलिए वो हाथ जोड़ कर घर घर जाते हैं ये निवेदन लेकर के आओ इस शिक्षा को ग्रहण करो। चेतन। प्रभु जी जब पृथ्वी पर थे उन्होंने अपने साथियों को आदेश दिया था घर घर जाकर प्रचार करने के लिए और जब उनके साथी नीति नंदा जी हरिदास ठाकुर जी घर घर जा रहे थे कई जगह उनका स्वागत अच्छी तरह किया जाता था, कई जगह लोग दरवाजा भी नहीं खोलते थे उनके कई जगह उनका अपमान किया जाता था। जब भी उन्होंने कहा उनकी इच्छा के अधीन प्रचार किया जाए। प्रचार के दौरान 1 समय 2 शराबी भाइयों को मिले नीति नंदा जी जिनके कारण प्रचार के कारण नीति नंदा को माथे पर मां ने पत्थर से लिया की भावना के इन सब का तो इसी विचार के साथ वैष्णव भक्त प्रयास करते है लोगो को ये ज्ञान देने के लिए तो परीक्षण महाज भी ऊँचे कोटी के वैष्णव थे, उनका भी यही भाव था किस प्रकार भविष्य में कलियुग की प्रजा का उधार होगा सुधार होगा। तो उन्होंने पूछा शुकदेव स्वामी जो कि ब्याज देव जी के पुत्र थे की किस प्रकार समाज का उधार होगा। जिसके उत्तर में कहा शुकदेव को स्वामी जी ने कल भागवत का 1 बड़ा प्रसिद्ध श्लोक है जिस से आप में से कई परिचित होंगे। उन्होंने कहा कलयुग में दोष ही दोष है देखा जाए हर दिन के बीतने के साथ समाज का वातारण तेजी के साथ बिगड़ते जा रहा हैं। सच बात है। 1 जमाना था अगर आपने गन्दी फिल्में वगैरह देखने होती थी आपको सिनेमा वगैरह में जाना पड़ता था। आज तो आप इन्टरनेट में सब कुछ देख सकते हो। कहा जाता है कि 70 परसेंट इन्टरनेट का जो है इन में आप देख सकते हो वो पोनोग्राफी है और लाखों की संख्या में लोग देखते हैं। तो देखा जाये का कार्य बड़ा सरल बन गया है। आज आप सब के पास मोबाइल फ़ोन है। 1 जमाना था जब टेलीफोन करने के लिए आपको 5 मिनट चल के जाना पड़ता था, सच 1 जमाना था की टेलीफोन प्राप्त करने के लिए आपको लाइन में खड़ा होना पड़ता था। भारत आज सबके पास टेलीफोन है, मोबाइल टेलीफोन में भी आजकल हर प्रकार की सुविधा है, कैमरा है, विडियो है। अब अगले साल पोर्ट जेनरेशन टेलीफोन्स में आपके पास टीवी की सुविधा भी आ जाएगी। हर प्रकार की सुविधा जब बढ़ती जा रही है। और क्या आप इसे कह सकते हो की लोग ज्यादा सुखी है। आज आज लोग ज्यादा बेचैन हैं, निराश हैं, मन की बिमारियाँ मेंटल डिजीज इतनी तेजी से बढ़ रही है, उसका मूल कारण क्या है? मूल कारण यह है कि हम भगवान की शिक्षा से दूर जा रहे हैं। जैसे की अगर आप मछली को जल के बाहर रखोगे तो मछली क्या जी पाएगी नहीं जी पाएगी। आप 1 चिड़िया को सोने के पिंजरे में रख 2 और खाने के लिए कुछ मत 2 क्या वो चिड़िया जी पाएगी। उसी प्रकार अध्यात्म के बिना आप सुखी नहीं बन सकते। चाहे आपके पास कितनी भौतिक सुविधाएं प्राप्त हो जाए। इसलिए भगवान कहते हैं यज्ञ दान, तपस्या नहीं त्याग हो। तो स्वामी जी ने कहा कलयुग में दोषी दोष है, प्रे गुण है। इस कलयुग में, वो क्या है? भगवान के क्या है भगवान के लिए, इस संस्था के द्वारा ये हरि नाम का प्रचार हो रहा है। सारे विश्व में केतना महाप्रभुजी की भविष्यवाणी थी कि विश्व के हर कोने में जितने नगर है, गाँव हैं, सब जगह क्या होगा, दिव्य नामों का क्या उज्चालन होगा। 45 दिन पहले टाइम्स ऑफ निया कबार ने 1 बड़ा अच्छा एडिटोरियल लिखा था, आपने पढ़ा किसी ने ये एडिटोरियल जो है बड़ा प्रस्टिज होता है। तो टाइम्स ऑफ निया ने लिखा कि कृष्णा, रीत, कृष्ण, भगवान फिर से जन्म ले रहे हैं, इस कौन इस इन ओवर लुक ग्लोबल फैक्टर ऑफ़ इंडिया का की इस कौन जो है। आजकल भारत में सब लोग कह रहे हैं हमारी भारतीय कंपनियां सारे विदेश में जा रही हैं, हमारी भारतीय कंपनी विदेश की कंपनियों को खरीद रहे है। तो आज कल भारत के व्यापारियों का क्या भाव है। तो गो ग्लोबल हम काली भारत में व्यापार नहीं करना चाहते, हम सारे विश्व में करना चाहते हैं। तो टाइम्स ऑफ इंडिया ने कहा इस कॉन इज एन ओवर लुक ग्लोबल फैक्टर मतलब की इस्कॉन जितना पौंच गया है विश्व में उसकी हम लोग कदर भी नहीं कर रहे। और आगे उसने आर्टिकल में कहा एडिटर ने के आज हम भारत के किसी कोने में जाओ, आपको बॉलीवुड की फिल्म नहीं मिलेगी, आपको भारतीय संस्कृति का कोई निशाना भी नहीं मिलेगा और आपको हरेक का इस का मंदिर जरूर मिलेगा। तो इस प्रकार फिर उन्होंने इतिहास दिया किस प्रकार इस संस्था की स्थापना पा जी ने की थी और किस प्रकार आज विश्व के हर कोने में इस काम का प्रचार फैल गया। तो महा भविष्यवाणी थी कि हर नाम जो है विश्व के हर कोने में पहुचेगा। और आज हम देख सकते हैं की सरल साधन है भगवत प्राप्ति का, आप सब का सौभाग्य है कि आपका जन्म भारत भूमि में हुआ है, गुजरात में हुआ है। जहाँ बचपन से ही आप कृष्ण राम की महिमा सुनते आ रहे हो, उन स्थानों में भी जहाँ की कृष्ण राम का नाम कभी किसी ने सुना भी नहीं था। आज हजारों की संख्या में लोग इसका उच्चारण कर रहे हैं। तो अलग अलग युगों में अलग अलग साधन थे। यज्ञ के जैसे सत्य। उदाहरण के लिए लोग व्यक्ति भगवान का चिंतन करते थे। कहा जाता है वाल्मिकी ने 60 हजार साल तक चिंतन किया था। यह सम्भव था क्योंकि उन दिनों में लोगों की अवधि थी। लगभग 1 लाख साल प्रेस कलयुग में क्या है। अब ज्यादा से ज्यादा सौ सौ देखा जाए। 80 साल के बाद इतनी बीमारियां होती हैं, हम जीते भी है तो लगभग सब्जी जैसे रहते है। तो कलियुग में यह है यज्ञ का साधन। क्या है वो भगवान के नाम का उच्चारन। इस विषय में महाप्रभु जी ने कहा है की भगवान के नामों के उच्चारण से जो हमारे हृदय में जो बैल है, ये मैल हम अनुभव करते हैं। काम, क्रोध, लो, बोल के प्रभाव से ये जो मैल है, ये मैल निकालती है। हर नाम के उच्चारण से जो भय है, हमारे हृदय में, वो भी दूर होता है। 1 बड़े प्रसिद्ध भक्त गोविंद दास जी ने कहा है हे मेरा मन, तुम चिंता से भरे हुए हो। ध्यान से देखा जाए हम सबके मन में 1 प्रकार की चिंताएँ हैं। सच बात है। 1 व्यापारी को चिंता देती हैं, दूसरा, व्यापारी हमारा धन नहीं ले ले। 1 देश को चिंता है दूसरा देश के पास हमारे से ज्यादा हथियार नहीं प्राप्त हो जाए। तो हर व्यक्ति भय में जीता है। आज तो कहते है की अगर तुम भय से रहित होना चाहते हो तो क्या है, उपाय न हो। और भगवान के शरणगत होने का क्या है साधन इस कलयुग में भगवान के नामो का उच्चारण। आगे महाप्रभु जी यह भी कहते हैं अनंद बुदी भगवान के नामों के उच्चारण का। 1 और लाभ यह है कि आपको असली आनंद प्राप्त होगा। ये जो भक्ति का सागर है, इसका जो जल है, वो मीठा है, नमकीन नहीं। भौतिक स्थिति में आप किसी चीज को प्राप्त करते हो। पहले थोड़ा आनंद आता है, उसी चीज को फिर से खाते हो, सुनते हो, फिर बाद में कम आनंद आता है, कम आनंद आता है। फिर आप क्या कहते हो? और नहीं चाहिए। और आध्यात्मिक क्षेत्र में जितना नाम लो, उतना ही ज्यादा आनंद। आएगा भौतिक स्थिति में कोई गाना हो, फिल्म, गाना कुछ भी हो, 123 बार गाओगे, फिर थक जाओगे। 1 महान संग थे, जिनका नाम था हरिदास ठाकुर, वो दिन में 3 लाख बार जॉब करते थे, वो 3 लाख बार जॉब समाप्त किए बिना न कुछ खाते थे, न पीते थे, न कुछ बोलते थे। कई बार जब व्यक्ति हरी नाम को स्वीकार करते हैं, उच्चारण शुरू करते हैं। लोग कहते हैं अरे वो ब्रेन वाश हो गया, वो साधु लोगों ने उसके दिमाग में जादू कर दिया। नाम का साधु लोगों ने कोई जादू नहीं किया। हरी नाम के द्वारा ही नाम के उचारण। ऐसी हम असली आनंद अनुभव करते हैं। इसलिए हम इसका उच्चारण दिन रात कर सकते हैं। साधन इस युग में क्या है भगवान के नाम का उच्चारण? और भगवान आप इतने दयालु हो की आपने पूरी शक्ति डाली है। इन दिव्य नामों में 1 महान सम थे। हमारे संप्रदाय में, जिनका नाम था ठाकुर। भारतीय विनोद भौतिक स्थिति से पिस्ता आश्रम में थे। अंग्रेजों के राज्य के समय उन्हें बहुत ऊँचा पद दिया गया था। वो मैजिस्ट्रेट थे। जो के राज्य के समय हिंदुस्तानी यों को इससे ऊँचा पद नहीं दिया जाता था, पर सरकारी नौकरी भी कर रहे थे। साथ ही उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना भी की और उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा दी है जिसका हम सब लाभ उठा रहे हैं। तो 1 रचना में वो कहते हैं भी ठाकुर वाणी ठाकुर सदा। हरी बोले। आप गेस्ट हो या ब्रहमाचारी या सन्यासी, आपका कर्तव्य बनता है क्या? क्या, हर नाम को जरूर स्वीकार करो और हरि नाम कहाँ से आ रहा है? भगवान के धाम सेवा है। और यही नाम है इस कलयुग का साधन। फिर आगे वो कहते हैं भगवत गीता में यज्ञ दान, तपस्या दान। बहुत समाज में हम दान देते हैं स्कूल बनाने के लिए, कोई बहुत कार्य के लिए। हम ये नहीं कहते। वो दान मत 2 और सबसे ऊँचा दान क्या है ये ज्ञान का ध्यान? इस लिए आप सब जिन्होंने ग्रंथो के वितरण में सहयोग दिया, आपने सबसे ऊँचा दान दिया इस समाज को। ये दिव्य ज्ञान जिसके द्वारा वो सुखी बन सकते हैं। फिर तपस्या तपस्या का अर्थ है की उन कार्यों का त्याग हो जो की प्रतिकूल है जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए। और हम सोचते हैं कई बार तपस्या के बिना जीवन अधूरा माना जायेगा। और जब हम तपस्या करते हैं भगवान की खुशी के लिए, तो उसके बदले में हमें हमें असली आनंद प्राप्त होता है। तो तपस्या है पाप कार्यों से बड़े बचना। जैसे की हम लोगो से निवेदन करते हैं। महासननामच्छीमत खाओ। आजकल ऐसी स्थिति हो गई है। भारत में, कोने कोने में मेकडोनल्स खुल गए हैं, न कोने कोने में डोमिनो पीजा, ये सब खुल गए हैं और कोने कोने में अंडे बिक रहे हैं। 1 समय था कि तीर के स्थानों में अंडे बेचने का अधिकार नहीं था। अब तीर के स्थानों में भी अंडे बेचने लोगों ने शुरू कर दिया है। याद है हम 10 साल पहले कुरुक्षेत्र में जाते थे, कोई अंडा नहीं देखता था। वहाँ आज जाओ कोने कोने में आपको अंडे की दुकान देखी है। किसी ने कहा हाई कोर्ट का जजमेंट था नहीं रोक सकते इन सुविधाओं से, तो बाप के का। अगर आप तपस्या का अर्थ ये नहीं की आप खाओ नहीं, पियो, नहीं, हँसो नहीं खाना है तो क्या खाओ। कृष्णा प्रसाद आज मैं अखबार में पढ़ रहा था। प्लेन में के इंग्लैंड में 1 नई स्टडी हुई है। और वह स्टडी का निर्णय यह था कि वेजिटेरिन डायट, इज, फार, हेल्दियर, देन, मी डायट। और ये स्टडी को हरी कृष्ण वालों ने नहीं की थी। यह स्टडी की थी। इंग्लैंड के रिसर्च लोगों ने आज के टाइम तो फलिया में आया। उन्होंने कहा कि फार्म और हेल्दी तो ये बात और लोगों को कब से पता है। पर आज मीट इंडस्टरी का प्रॉपर करना इतना है की वो लोगो तक ये सूचना पहुँचने नहीं दे दे। तो खाना तो क्या खाओ? कृष्णा प्रसाद खाओ। गीता में भगवान कहते है पसपमफलतोय, भगवान कहते है क्या खाना क्या नहीं भगवान। गीता में यह भी कहते हैं जो खाना है। पहले मुझे अर्पण करो, भोग लगाओ, फिर खाओ और भोग लगाए बिना खाओगे तो क्या खा रहे हो? और भोग लगाकर खाओगे तो क्या खा रहे हो? कृष्ण प्रसाद प्रसाद खाने से मन इंद्रियां शुद्ध बन जाती है। तो ये है 1 तपस्या हा कृष्ण प्रसाद खाओ गाना है तो गाओ कृष्णा का करो। जै से 31 दिसम्बर को सब लोग गए थे। बड़े बड़े होटलों में नया साल के स्वागत के लिए है की नहीं। सुना जाता है की बॉम्बे। दिल्ली में कई बड़े होटल थे, जिनमें 1 लाख रुपए का 1 टेबल था, 2 आदमियों का पति, पत्नी का खाने के लिए और नाच, निकाले और म्यूजिक सुनने के लिए 1 लाख रुपए। इन व्यक्तियों के बाद जाओ और भगवान के लिए भीक मांगने जाओ तो आपको 10 रुपए देंगे। मुश्क से नया स्वागत के लिए। 1 और सारे होटल 2 हफ्ते पहले बुक हो गए थे। 2 हफ्ते के बाद। इन होटल में ब्लैक मार्केट में टिकट मिल रही थी। तो लोग जा रहे थे नया साल। इस पत्र ने आरम्भ किया नया साल आता है। हम कहते हैं, हैप्पी नहीं। हाँ नया साल मा। हम सोचते है की अगर हम हँसते हुए नया साल शुरू करेंगे। अगर हजारों लोग हमें कहेंगे, नया साल में तो सारा साल हम खुशी में बिताएंगे। क्या यह वास्तविकता है? पिछले साल 2000, 5 में भी समने आपको बोला था, हैप्पी न्यू यर। और अंत में आप कितने खुश से कितना। हालांकि 50 सौ लोगों ने कहा और वही कश वोही पीडा वोही बढ़ावा तो हम सोचते है। अगर हम नया साल शुरू करेंगे, यह हमारा तो कोई खास सम्बन्ध भी नहीं। और आज उनका इतना तेज है की पूरा विश्व से नया साल मानता है। खैर मान लो, नया साल भी है। तो अगर आप ये सोचते हैं कि के साथ शुरू करेंगे नया साल तो सारा साल हँसते रहेंगे। जिनकी ध्यानित रुचि है। उन्होंने इस के कार्यक्रम में भाग लिया। लगभग हर केंद्र में 1 बड़ा विशाल कार्यक्रम किया जाता है, जिसमें हजारों लोग आते हैं, कीर्तन में भाग लेते हैं, उपदेश्य सुनते हैं। ये सुनते है की नया साल कैसे हमें बिताना चाहिए। भगवान कृष्ण नगर होते हुए। ये नहीं की आध्यात्मिक जीवन में अगर आप जुड़ोगे तो आप हंसोगे नहीं या नाचोगे नहीं, या अच्छा भोजन ही खाओगे। कृष्ण भोजन, कृष्णा प्रसाद के द्वारा लाखों लोग सारे विश्व में आकर्षित हुए हैं। भगवान श्री कृष्ण के सन्देश के प्रति तो पर अंतर है। भौतिक जीवन है, पाप का जीवन, आध्यात्मिक जीवन है। असली सुख का जीवन। भगवान की शिक्षा के आधार पर तो भगवान कहते हैं। 3 चीजों को मत त्यागो यह दाना और तपस्या तो कई बार लोग पूछते हैं की तपस्या के पालन की शक्ति कहाँ से आएगी आप? जब लोगो को कहो ये नहीं करो, ये नहीं करो, ये नहीं करो तो लोग डर जाते, कहते भाई कहाँ ऐसी शक्ति कहाँ से आएगी। तो ये शक्ति आती है भगवान के देव नामों के उच्चारण से। जब हरी नाम का कितन करते हो, जब माला आराम करते हो तो इसके द्वारा आपको शक्ति आती है। जैसे आज आज की सभा में देख रहे हो। 45 विदेशी भक्त भी हैं ये अलग अलग देशों से, रशिया से कोश सी, अलग अलग देशों से। इन देशों में कृष्ण भगवान का क्या नाम पहुँचा है स्वामी जी के प्रयास के पश्चात 40 साल पहले, उससे पहले कभी किसी ने कृष्ण का नाम सुना भी नहीं था, तो ये व्यक्ति बचपन से पले थे पाप के वातावरण में, पर आज वो ऊँचे कोडी के ब्राहमण बन गए हैं कैसे हरि नाम के बल पर। 1 समय हमारे गुरु जी यात्रा करते थे, तो किसी ने उनसे पूछा स्वामी जी आप चमत्कार कर सकते हो क्यूंकि आज हमारा ये भाव रहता है की अगर आप आध्यात्मिक वाली व्यक्ति हो साधु हो तो कुछ चमत्कार करोगे। साधु महात्मा चमत्कार करके लोगों को आकर्षित करते हैं, भगवान का संदेश नहीं देते, खाली चमत्कार करते रहते है। तो उन्होंने पूछा स्वामी जी से स्वामी जी आप को चमत्कार कर सकते हो। स्वामी जी ने कहा नहीं चमत्कार तो मैं जादू तो नहीं कर सकता, प्रेम जादू मैंने किया है उन्हों का क्या क्या क्या बड़ी जिज्ञासा थी। उन्होंने कहा की मैंने हजारों लच्चों को ग्रामीण बना दिया। तो जो जो लोग पाप के कार्य में जुड़े थे बचपन से आज उन्हें शुद्ध ब्राह्मण बना दिया। ब्राह्मण का यह अर्थ नहीं है कि ब्राहमण में लिया है। ये हमारा 2 पैसे हो, ब्राह्मण के गुण होने चाहिए। ब्राह्मणों के गुणों का वर्णन है। श्रीमत भगवत गीता में, तो के द्वारा हजारों व्यक्ति के काल में जुड़े थे। ब्रामण बना गया पिछले महीने ग्रंथ को यहाँ रूस जैसे देश में जहाँ के दिसम्बर के मौसम में अधिक है, माइनस 20 टेंप्रेचर। उस टेंप्रेचर में भी हमारे सुबह से रात तक जा रहे थे। सड़को में ग्रंथों को बाटने के लिए देखो, ऐसा नहीं है। और यह शक्ति कहाँ से आती है, ये दृ्धभावकहाँऐसी आता है। ये सब आया है हर नाम के उच्चारण के द्वारा, तो आज हम आज ही इधर आये हैं। आप सबसे छोटा निवेदन लेकर। वो यह है की आप सब भगवान श्री कृष्ण के संगत होने का प्रयास करो। आप सब भगवान श्री कृष्ण की शिक्षा को स्वीकार करो। वैदिक साहित्य में स्पष्ट स्थापित होता है। क्या ईशड़ापलमाकृष्णसचि रह हम किसी काल्पनिक भगवान की उपासना नहीं करे, हम किसी काल्पनिक मंत्र का उच्चारण नहीं करते, हम किसी काल्पनिक ग्रंथ के सन्देश का प्रचार नहीं करे होता है। कृष्ण भगवान परम भगवान है, कहा जाता है 1 परम भगवान है और 33 करोड़ देवता देवियां है। और उदाहरण दिया जाता है भागवत में। जैसे की अगर आप पेड़ की जड़ में पानी डालो तो सारे पतन तक इसका प्रभाव पहुँच जाता है। सच बात है आपको भूख लगती है तो आपके सारे अंक कमजोर हो जाते हैं। आप पेट में खाना डालते हो तो सारे अंगों में तंदूरी आ जाती है। उसी प्रकार कृष्ण भक्ति द्वारा आप सारे 33 करोड़ देवता देवियों के प्रति जो आपका भार है उसको चुकाते हो। आप लोग बिजली का बिल भरते हो, भरते हो, पानी का भरते हो, प्रॉपर्टी टैक्स भरते हो, टेलीफोन का बिल भरते हो, हर जगह आपको अलग अलग जगह भरना पड़ता है। न पर देवताओं द्वारा भी अनेक सुविधा ले रहे हो। सूर्य के देवता द्वारा को रोशनी मिलती है। सारा दिन 4 घंटा बिजली इस्तेमाल करते आपको बिल आ जाते। इतना बड़ा सब चिल्लाते है। इतना बिजली का बिल इतना बड़ा आ गया। आपको अगर सर विव बिल भेजना शुरू करें तो कितना होगा? फिर अभी भी चंद्रमा की रोशनी प्राप्त कर रहे हो। वायु के देवता आपको वायु दे रहे हैं। इंदिरा जी आपको वर्षा के माध्यम से जल्द भेज रहे हैं तो इन सब के प्रति आपका कर्जा है। सब का कर्ज चुकाना है की नहीं तो 33 करोड़ देवता का कर्जा न देना है। सबको कर्ज चुका सकते हो। कृष्ण भक्ति के माध्यम के द्वारा तो आप सब इसका लाभ उठाइए के महा कृपा से इस कलियुग में भगवत प्राप्ति का बहुत सरल साधन है। हर व्यक्ति इसका लाभ उठा सकता है। चेतन ने संक्षेप रूप में कहा की हम सबको महामंदी जाब के साथ भागवत गीता का ध्यान करना चाहिए। साधु संगत का लाभ उठाना चाहिए। इसी कारण इस काम के भक्त में कार्यक्रम करते हैं। जहाँ आप सब आते हो, खास करके हर रविवार हर इसका केंद्र में कार्यक्रम किया जाता है। जिसमें कई लोग आप जैसे आते हो आते हैं। इसके इलावा हमारे भगत, कैदा, नाम, हाथ कार्य भी करते हैं। लोगों के घरों में, अलग अलग स्थानों में इस भावना के साथ कि आप सब अपने इलाके में ही मिलकर इकट्ठा होकर, भगवान का गुणगान करके, दिव्य सन्देश की चर्चा करके जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकोगे। तो साधु संगत का लाभ उठाइए। भक्तों का यही भाव है की आप सब भगवान श्रीकृष्ण के संदेश को स्वीकार करके अपने जीवन को सफल बनाओ। आप सब से यही निवेदन है और इसका लाभ उठाइए और असली सुख को प्राप्त कीजिये। इस माध्यम के द्वारा सुख शोक है और आप सब आसानी से प्राप्त कर सकते हो। पिछले हफ्ते में भक्त के साथ बात कर रहा था तो मैं पूछ रहा था कृष्ण भक्ति में खुश हो रहा था। वेरी हैप्पी न क्रिष्णा कांशसनेस। मैंने कहा, बड़ी कह रहे? जब से मैंने कृष्ण भक्त शुरू किया है, मेरा घर का खर्चा भी आधा हो गया है। मैं क्लब में जाता था, यहाँ जाता था, फिल्मों में जाता था, घर वाले यहाँ जाते थे। अब सादा जीवन है। कृष्ण प्रसाद दफ्तर, घर, घर मं बस तो अगर आप भौतिक दृष्टि से भी देखना चाहो। कृष्णा भक्ति स्वीकार करके आपको लाभ ही है, नुकसान नहीं। और हरि नाम के जाप से भी लाभ ही है, नुकसान नहीं। ज्ञान। से, ज्ञान से जो भी हरी नाम को लेगा, इसका लाभ ही पहुँचेगा। तो कृपा करके इस शिक्षा को स्वीकार कीजिये और अपने जीवन को सफल बनायेंगे। हरे कृश्ण हाई क्रष्णा हाई कृष्णा किशन हारे हारे हारे हारे हारे।
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