भगवान का सबसे प्रिय कौन? | 03 Dec 2004 | New Delhi | Srila Gopal Krishna Goswami

In this devotional lecture Srila Gopal Krishna Goswami exhorts devotees to intensify the distribution of sacred scriptures, especially during the December Gita‑Jayanti period. He recalls historic precedents of door‑to‑door preaching initiated by regional mahaprabhu‑ji and Chaitanya Mahaprabhu, emphasizing that the divine encourages this service. The speaker narrates numerous global anecdotes—an Indian devotee on a Russian ship, a Russian prisoner’s daughter reading the Gita in jail, an American family receiving a copy, and many others—to illustrate how the Bhagavata and Gita spark spiritual awakening worldwide. He acknowledges the mixed reception distributors face—warm welcomes, indifference, or hostility—and urges perseverance, stressing that enthusiasm (utsaha) and steadfastness (dhirata) are essential for success. The talk repeatedly stresses that the purpose of distribution is devotional service, not material profit, and cites scriptural verses that the most beloved of God is the devotee who aids in spreading His message. Concrete targets are set (e.g., distributing 50,000 books this year) along with logistical advice on organizing distributors, collecting books, and maintaining zeal. The lecture concludes with a heartfelt call for all devotees to join the effort, invoking the names of Krishna and urging collective action for the spiritual upliftment of humanity.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय, नम भगवते वासुदेवाय। आज मैं खास कर के भक्तों से ये बुक डिस्ट्रिबयूशन के विषय में चर्चा करना चाहता था। जैसे आप जानते है दिसम्बर के महीने में सारे विश्व में इस के भक्त जुडते है। बुक डिस्ट्रीब्यूशन और प्रयास करते हैं अधिक से अधिक बल मेक इन ग्रंथों को बाटने के लिए। जैसे आप जानते हो। पापा जी ने प्रचार के कार्य पर सबसे ज्यादा बल दिया इसलिए इस कार्य पर बल दिया क्यूँकी परम भगवान स्वयं इस सेवा पर बल दे रहे हैं। अगर आप भागवत गीता पढ़ो तो भागवत गीता के 18 दहाई में भगवान कहते हैं अंत में क्या याद परम गोयम सब भक्तों में सबसे प्रिय कौन है जो की मेरे प्रचार में सहयोग देता है और उससे ज्यादा न कोई हुआ है न होगा। तो क्षेत्रीय महाप्रभु जी ने भी इस विषय पर बल दिया। जब क्षेत्रीय महाप्रभु जी ने अपना प्रचार का आरम्भ किया तो उन्होंने अपने सब साथियों को कहा था कि बंगाल के घर घर में जाकर प्रचार करो। और उन्हें केवल रक्त यात्रा के शुभ अवसर पर इजाजत प्राप्त हुई थी। वापस जगतपुरी में लौटने काले चेतन महाप्रभुजी ने लगभग 24 साल काटे जगनपुरी में और आज भी आप जाओ तो अनेक सालों में जा सकते हो जहाँ की महाप्रभुजी ने अपनी दिव्य लीला, महाप्रभुजी ने अपना प्रचार का आंदोलन आरंभ किया तो उन्होंने अपने साथियों को घर घर जाकर प्रचार करो। और जैसे आपने सुना है 1 जोड़ी बनी थी नितिनजी हरिदास ठाकुर की, और हरिदास को पता था की क्षेत्र महाप्रभुजी स्वयं भगवान है, और उनकी इच्छा थी कि के जो सबसे प्रति व्यक्ति है उनका उद्धार किया जाए। और जब उन्होंने अपना प्रचार का आरम्भ किया तो कई घरों में जब वो गए, लोगों ने बड़े आदर से उनका स्वागत किया, उन्होंने कहा आइए बैठिए शिक्षा दीजिये, कई स्थानों में हो गए, यहाँ के लोगों ने दरवाजा भी नहीं खोला,
उनके लिए
कई घरों में गए जहाँ के लोगों ने यह आरोप लगाया कि लगता है ये लोग जासूस है हमारे
घर में आ रहे हैं देखने के
लिए हमने क्या क्या संभाल रखा है। जब भी वो प्रचार करते गए आज के भक्त जन में जब प्रचार के लिए जाते हैं, कई तो उनका स्वागत करते हैं, कई तो आपके बुलाने पर उनके घर पहुँचने पर भी आपका दरवाजा नहीं खोलते और कई दरवाजा खोलते भी हैं तो आप मान कर के आपको बाहर निकाल देते है, तो हमें इसका बुरा नहीं मानना चाहिए क्यूँ की यही अनुभव हुआ था किसका जी और हरिदास
ठाकुर का महा प्रभु जी 1 समय
जब हरिदास ठाकुर से मिले उन्होंने हरिदास ठाकुर से कहा की हरिदास ये बताए
की किस प्रकार मल्च का और यवनों
का उद्धार होगा या उन्हें कहा जाता है जो की मनुष्य जीवन प्राप्त करने के पश्चात भी शास्त्र के विपरित कार्य करते हैं।
तो हाय राज ठाकुर ने देखा की
चेतन महा प्रभु जी बड़े चिंतित थे ये देख कर की किस प्रकार का
उधार होगा तो हायर से क्या कहा कहा प्रभु हे मेरे स्वामी आप चिंता
मत करो, हा राम, हा राम बाली
से किसी न किसी रूप से अगर लोग हर नाम को अपनाये तो इसके द्वारा उनका उदार होगा। तो चेतन्या महा प्रबु परंपरा में हमारे जितने भी हुए हैं सबने इस प्रचार
के कार्य पर बल दिया और ठाकुर
जिले की चेतना शक्ति माना जाता है उन्होंने 1 ग्रंथ प्रकाशित किया था क्षेत्र महाप्रभुजी के जीवन के ऊपर, उन्होंने उन्होंने 1 ग्रंथ भेजा था विश्व के सब
बड़ी बड़ी महा विद्यालयों में।
इसके पश्चात जब भक्ति सिदजीचार्यबने तो उन्होंने भी इस विश्व पर बल दिया अपने शिष्य को भेजते थे ग्रंथों के वितरण के लिए और उन्होंने 1 समय जब प्रापा जी को मिले थे राजकुल में कुछ नम्बर समय का का महीना था, और भक्त हजारों भक्तों की ब्रज मंडल परिक्राम ले जा रहे थे, तो प्रापा
जी उन्हें मिले राजकुल में जहाँ की
उन्होंने 1 की तस्वीर बनायी और कहा की अगर भगवान तुम्हें सुविधा दे तो ग्रंथ को प्रकाशित करना और बांटना। और उन्होंने कहा की 1 मृदंग की तस्वीर बनाने के पश्चात ये सेवा है जिसका नाम क्या है दंगा स्ाधारणमृदंगाकी आवाज़ थोड़ी दूर तक पहुँच सकती है और जब आप गंद को बाटते हो उसकी आवाज हज़ारों मील दूर जा सकती है। जैसे की 1 उदाहरण है कि 1 समय हमारे भक्त 1 रशियन भक्त, 1 पानी के जहाज में काम कर रहा था तो पानी के जहाज ऑस्ट्रेलिया में गया, जब ऑस्ट्रेलिया गया तो वो सेलर था तो बाहर निकाला जहाज से, तो किसी ने उसे 1 ग्रंथ बेचा इजी जोनी टू अदर प्लानेट उसने ग्रंथ पढ़ना शुरू किया, वो पानी का जहाज़ पे चला ऑस्ट्रेलिया से उड़ाया इंग्लैंड में, इंग्लैंड में जब पहुँचा तो गए इस कौन के मंदिर में, भक्तों को मिलने के लिए, वहाँ गए प्रसाद ग्रहण किया 12 और किताबें उन्होंने खरीदी फिर वो वहाँ से पानी का जहाज निकला उनके देश रूस के लिए रूस में पहुचे तो के भक्तों को मिले और उसके 50 ने अपना जीवन समर्पण कर दिया और ये परिचय कैसे हुआ 1 छोटे सी के द्वारा 1 खानदान है जो पहले अमेरिका में था, बहुत बड़े डॉक्टर थे उनके पति पर, वो रिटायर हो के मायापुर में निवास कर रहे हैं और उन्होंने लगभग 6 करोड़ रूपए शिषीरादमवादवकी सेवा के लिए अर्पण किया समर्पन किया तो पिछले हफ्ते वो मेरे से बात कर रही थी भारी, तो मैंने उनसे पूछा की आप इस कॉल से जुड़े कैसे आप, पहले भक्त कैसे बने? तो उन्होंने मुझे कहा की 35 साल पहले जब उनकी शादी हुई थी वो अमेरिका गई थी तो 1 दिन वो अपने पाती के साथ घूमने के लिए और वहाँ उन्हें 1 ब्रह्मचारी मिला जवान अमेरिकन ब्रह्मचारी कोई 18 19 साल की उम्र थी और उसने उन्हें 1 ग्रंथ दिया। उन्होंने बैक टू गोटे मैगजीन थी। उन्होंने कहा तो बैक टू गॉड मैक्जिम ले गए और 2 साल के लिए। उन्होंने बिल्कुल पढ़ा नहीं मैगजीन ले ली और अपने घर में रख ले। 2 साल बाद उन्होंने वो बैक टू गॉड मैगजीन खोली 1 दिन और फिर उनको पता लगा की इस का के अनेक मंदिर हैं और 1 मंदिर उनके घर के पास, तो फिर उन्होंने मंदिर गए, वो मंदिर गए और ग्रंथ लिए और ग्रंथों को पढ़ने लगे और इसके द्वारा उनका इस से सम्बन्ध जोड़ा, उन्होंने कृष्ण भक्ति को स्वीकार किया, जब करना शुरू किए और अब पूरे जीवन की कमाई ने भगवान के चरणों में अर्पण कर दिया। तो इस प्रकार हजारों उदाहरण है। सारे विश्व में कैसे लोगो के हृदय में आध्यात्मिक जागृति उत्पन हुई है इन ग्रंथों के द्वारा, ये समझना भक्तों के लिए आवश्यक है। क्यूकी जाओगे इन ग्रंथो के वेतन का महत्व? तो फिर आप हृदय से करोगे है की नहीं अगर केवल आपको कहा जाए, जाओ, डिस्ट्रीब्यूटर बॉक्स जाओ, गंध को बाटो तो आप जाओगे, पर अगर आप इसके पीछे जो भाव है उसको समझोगे तो फिर आप हर परिस्थिति में आपकी इच्छा रहेगी, आप इस सेवा में जुड़े रहो। पापा जी कह रहे थे की जब
भगवान का भक्त है अगर उसे कुछ कठिन स्थिति में भी रहना पड़ता है तो भी वो सेवा करना चाहता है और सेवा करता है किसकी ग्रंथ, भागवत और भगवत। जैसे की पापा जी ने उदाहरण दिया था की जब पार्वती ने शिव जी से पूछा तो शिव जी ने कहा की सबसे बड़ी उपासना है उनके भगवान विष्णु की सेवा करना, सबसे बड़ी सेवा बड़ी सेवा है उनके शुद्ध भक्तों की सेवा करना। तो इन ग्रंथों में हमें भगवान की वाणी प्राप्त होती है और जो वह नचारियों का तात्प्रिय है, यह व्याख्या है। भगवान की वाणी के विषय में वो भी पढ़ने को मिलता है। जैसे की मैंने अनेक समय आपको बताया है की पापा जी जब इन तातरियो को लिखते थे तो अपने सामने सारे प्रसिद्ध 4 के तातपरियोंको रखते थे और उनके तातरियों के महत्वपूर्ण विषयों का निचोड़ लेते थे, साथ में फिर अपने विचारों को जोड़ते थे और फिर उन्होंने सरल भाषा में प्रस्तुत किया है जिसके द्वारा हम भगवान की व्याख्या को, भगवान की वाणी को समझ सके। तो जब हम इन ग्रंथों को बांटते हैं वो लोग पढ़ते है। तो जो है उनके हृदय में आध्यात्मिक जागृति होती है। और फिर साधु संगति के द्वारा और गहराई के साथ भक्ति के नियमों का पालन करते हैं। जैसे की स्वामी जी ने कहा है और पापा जी ने इस उदाहरण का उपयोग किया था। आज के प्रवचन में की में श्रद्धा होती है, श्रद्धा के द्वारा आपको संगत, साधु संगत प्राप्त होता है। साधु संगत के द्वारा भक्ति के विषय में ज्ञान मिलता है और उसका जवाब पालन करो तो इसे कहा जाता है भजन क्रिया और भजन क्रिया के पालन के द्वारा जो अनर्थ है या ध्यान शत्रु वो कमजोर होने लगते हैं। जैसे की बीमार व्यक्ति दवाई लेने के द्वारा अपनी बीमारी को दूर करता है। तो अनेक पत्र हैं, अनेक स्टेटमेंट है प्रापा जी के ग्रंथों में जिसमे प्रापा जी ने स्पेशल प्रभाव दिया की हमें अगर तुम मुझे प्रश्न करना चाहते हो तो क्या करो? मेरे ग्रंथों का वेतन को इस भावना से नहीं किनके द्वारा कुछ आर्थिक लाभ प्राप्त होता है। इन ग्रंथों को बांटा जाता है 1 रूप देखा जाए लगभग नुकसान में इस भावना से कि जो जो लोग इन ग्रंथों को पढ़ेंगे इसके द्वारा उनका उधार होगा। कई बार हम सोचते हैं हाँ ग्रंथो को बाट देते। कोई पढ़ता नहीं, ये गलत है। अगर 1 व्यक्ति भी 10, 10 किताबें बाते पड़ेगा उसके हृदय में आवश्यक ही अध्यात्मिक जागृति उत्पन्न होगी। और सारे विश्व में भारत में खास कर के लोग ज्यादा आदर देते हैं इन ग्रंथों को क्यूँ की इन ग्रंथों का महत्व उन्हें पता है। और विदेशो में भी यह अनुभव है कि जब लोग इन ग्रंथों को लेते हैं और पढ़ते हैं इसके द्वारा उनकी ध्यान जागृति। जिज्ञासा जो है वो बढ़ती है।
तो
हम सब भक्तों का प्रयास रहना चाहिए। गीता जयंती के उपलक्ष जो दिसम्बर के महीने में हम लोग बुक करते है, हम सब को प्रयास करना चाहिए। इस मेल में जुड़ने के लिए। पापा जी से किसी ने पूछा था की मेरा जौन शब्द का अर्थ क्या है? तो पापा जी ने कहा की मन का अर्थ है सोना कम करना और खाना कम करना, और ज्यादा समय लगा किस में, ज्यादा समय लगाना प्रचार की सेवा में। तो आज इस महीने सारे विश्व में इस के जो भक्त हैं में जुड़े हैं।
सब की सब का यह प्रयास है
की अधिक से अधिक मात्र में ग्रंथों को बांटा जाए और इस विषय में सफलता प्राप्त होगी, यह सफलता निर्भर होगी। हमारे उत्साह के ऊपर। जैसे की लूप को स्वामी जी ने कहा है उत्साह नष्ट धरि, संग त्यागे। तो सबसे पहले रूप समझे क्या कहते है की भक्तों में उत्साह होना चाहिए।
जैसे की मैंने देखा है आपके दल
दली जो के भक्त प्रचार में जाते हैं, बड़े उत्साहित रहते हैं। इस है की अगर हम उत्साह के साथ प्रयास करेंगे तो भगवान हमें अवश्य सफलता देंगे। जैसे भागवत गीता में भगवान क्या कहते हैं जो प्रयास करते हैं मेरी सेवा करने के लिए, अगर उनमे कुछ कमी भी हो तो उसको मैं दूर कर दे। जो गुण है उसे रखता हूँ। जैसे 1 समय नाइनटीन सेवंटी सेवन में हमने बॉम्बे में 1 बहुत बड़े बुक, शॉप, इंटरनेशनल बुक, हाउस जो फ्लोरा फाउंड में है वह 1 महीने के लिए पापाजी के ग्रंथों का डिस्प्ले रखा था, आगे डिस्प्ले अन्दर डिस्प्लेय, खिड़की में डिस्प्ले, पर 1 महीने के बाद ये अनुभव था की जितने ग्रंथ हमने सोचे थे म बिकेंगे दुकानों से नहीं थे। तो पापा जी ने कहा की मेरे ग्रंथ बिकते हैं, मेरे शिष्यों के उत्साह के कारण आप सबका अनुभव है। अगर प्रचार करने जाते हो, किसी ऐसी चर्चा करते हो, उत्साह के साथ करते हो तो उसका अलग प्रभाव रहता है। तो इसलिए स्वामी जी ने भी कहा है भक्ति में आगे बढ़ने के लिए उत्साह नष्ट। 1 उत्साहित होना चाहिए। दूसरा हमें दीर्ध होना चाहिए। यही नहीं की भक्ति के माग में थोड़ी कठिनाई आई या कुछ असुविधा
नही,
ये सेवा बहुत मुश्किल है, यह सेवा हम नहीं कर सकते और हमें सेसिल होना चाहिए। जब ग्रंथों बाटने को जाते हो, कहीं आपका स्वागत करेंगे, कहीं आपका अपमान करेंगे, कहीं आप से बात भी नहीं करेंगे और हमें सेंशीलरेनाचाहिए और बिल्कुल दर्ज होकर इस सेवा में जोड़ना चाहिए। तो हर साल आपके दिल्ली के भक्त और जैसे मैंने कहा इस के हर मंडल में, हर कोने में ये समय किया जा रहा है तो हर साल आप भक्त जन प्रयास करते हो अधिक से अधिक मात्र ग्रंथों को बाटने के लिए। हमारे जो लाइफ मे छिप के भक्त हैं वो गीता गीता दान करवाते हैं, गीता की स्पांसरशिप कराते है और उसके द्वारा हम अलग अलग स्थानों में गीता बाटते है और जो आया के लड़के हैं और मुक्त इस्ट्रिब्यूटर्स है वो अलग अलग स्थानों में जाते हैं। इन ग्रंथों को बाटने के लिए तो मैं यह निवेदन करना चाहता था की आप सारे भक्त कर के मेरे थन में जोड़ो, ये मेरा तन भी शुरू हो गया है न चलेगा महीने के आखिर तक। पिछले साल भक्तों ने कितने गीता बाटी थी। और 1 रन जो आप बाटते हो उसे कम से कम 34 व्यक्ति पड़ते है। अगर आप 50 हजार गीता बाटोगे तो मतलब कम से कम 2 लाख व्यक्ति भगवान की वाणी को पढ़ेंगे और 2 लाख व्यक्ति पढ़ेंगे तो कम से कम 10 20 हजार लोग हरिनाम का जॉब शुरू करेंगे। यह तो आवश्यक है की जो भी यक्ति ग्रंथों को पढ़ता है वो महा महा मंदर का जॉब शुरू करता है, पाप के कामों से दूर रहता है। 1 अनुभव था मेरा पिछले 6 महीने पहले 1 औरत थी जो की हमारे मंदिर में आ रही थी, रेली में सोना बना कर रही थी तो मैंने उससे पूछा भक्त कैसे बने? तो उसने कहा की पिछले साल वो 1 रद्दी की दुकान में गयी थी। जैसे में दी के पुराने कागज सेकंड बुक स्टोर है। 1 सेकंड बुकस्टोर में गयी थी जहाँ की से 1 बहुत पुरानी भागवत गीता जो मुड़ी हुई थी। खरीदी बहुत सस्ते भाव में तो गीता इतनी मुड़ी हुई थी की वो पढ़ भी नहीं सकती थी, लड़की थी घर ले गयी गीता को उसने स्त्री किया
पढ़ सके तो पढ़ने के बाद उसे
शुरू कर दिया मंदिर आने से पहले उसे पता भी नहीं था की है उसने गीता को 2 बार पढ़ा, 2
बार पढ़ने के बाद उसने 16 मन
का जाप शुरू कर दिया था से गीता पढने के द्वारा 1 समय रशियन
थी रशिया में तो उसकी बेटी जेल में थी तो उसने अपनी बेटी को
जेल में रूसी भाषा की गीता भेजी पढने को तो बेटी ने जेल में पढ़ना शुरू किया उसने दूसरों को पढ़ाया और वो जेल में 3 या 4 और भक्त बन गयी थी गीता पढ़ने
के द्वारा तो इस प्रकार अनेक अनेक
उदाहरण है पूरा ग्रंथ लिख सकते हो
भक्तों के इस विषय में अनुभव के विषय में तो आप सब भक्तों से
निवेदन है की आप गीता शुरू कीजिये लोगो को इस विषय, इस ज्ञान की आवश्यकता के विषय में समझा।
खास कर के आज की स्थिति में जहाँ माया का इतना तेज प्रभाव है।
अगर आप लोगो की सुरक्षा चाहते हो, सुख चाहते हो तो ये गीता का
उपदेश सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।
आप आजकल देखते हो की इसाई प्रचारक
आपके लोगो के घर घर में जाने
दिल्ली हरियाणा पंजाब में बाईबल लेकर तो
अगर हम लोग घर घर जाए गीता
का उपदेश लेकर तो इसमें क्या लज्जा की बात क्या भगवान खुद के रे
मेरे को प्रिया भागता है उसे मेरा प्रचार करना चाहिए और आपका प्रयास लेना चाहिए अधिक से अधिक मात्रा में ग्रंथों को बाटने के लिए। और ये साल सारे ग्रंथ छप गए है जैसे आप जानते है ये छपते हैं दिल्ली में तो दुसरे शहरों में, कई बार इन वहाँ पहुँचने में देर लग जाती है दिल में पूरा स्टॉक आपके पास है इस समय तो आप सब जुड़िये इस मत में और यह साल हमें 50 हजार से ज्यादा करना चाहिए पिछले साल कितना किया था 50 हजार तो ये साल आपको 50 हजार से ज्यादा ग्रंथ प्रयास करना चाहिए। पापा जी ने 1 स्लोगन दिया था इस काम की शुरुआत में और लोग क्या था कैसे पता है डबल कहते थे हर साल पिछले साल के मुकाबले में दुगना प्रयास तो ये साल वैसे डबल एट की दृष्टि से तो हमारी योजना होनी चाहिए 1 सब महान हो इस मंदिर में कई महान थी है जो की हर साल चमत्कार दिखाते हैं। मैं आप भक्तो से निवेदन करना चाहता हूँ की आप सब बड़े उत्साह के साथ जुड़िये में और प्रॉपर जी के ग्रंथों को बांटिये और जैसे आप जानते है ये साल खास है क्या खास है इस साल प्रॉपर 100 8
तो
ये साल इसका बॉडी ने ये निर्णय किया की हमें प्रॉपर की महिमा बनाने के लिए अधिक से अधिक मात्रा में प्रयास करना चाहिए इन ग्रंथों को बाटने के लिए साफ़ साफ़ के पकड़ के जुड़िये इस मेराथन में हरे कृश्ण,
हरे कृष्णा, हरे कृष्णा कृष्णा, हरे, हरे
हरे
ramरधलहaले।
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