भौतिकवादी और अध्यात्मवादी में अंतर | 03 Feb 1996 | Mumbai | Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja

The lecture delivered by Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja in Mumbai (3 Feb 1996) explores the contrast between materialist and spiritualist world‑views, drawing heavily on the teachings of the saint‑poet Govind Dās. It begins with devotional chants and an introduction to the movement “Thakur Bhakti Virodh,” which advocated placing a free “Hari‑name shop” in every corner so that all people could receive the divine name without cost. The speaker recounts Govind Dās’s poem “Bāja Ho‑re Man” and his concept of “abhe‑chintan” – a state free of fear and anxiety – linking it to broader discussions on how fear, desire, and mental imagination generate suffering. References to Pralād Maharaj’s teachings on the illusory nature of pleasure and pain, and to the rarity of a human birth, underscore the urgency of seeking God‑consciousness. The talk emphasizes the importance of satsang (holy company) and the role of saints (sādhu‑sangat) in guiding devotees toward surrender (śaraṇagati) and spiritual transformation. Anecdotes about wealthy businessmen, political figures, and modern consultants illustrate how material pursuits coexist with, yet often distract from, true devotion. The lecture concludes with scriptural injunctions on proper conduct, the purpose of temples, and the necessity of continual chanting of Hari’s name as the path to purification and liberation.
Chapters
ओम नमो भगते बासुदेवाय ओम नमो भगते बासुदेवाय मनमो भागते वास देवाय। ओम जया रंदस्यानमजनानचलका चचुनमतमेनचसवा श्री गुरवे न महा चेतन्या मानो वेस्टम शापित मेन भूत दे स्वयं रुपकरामयमसुधाति स्वापदंपिकाम वंदेहम, श्रीगुरु श्रीयुत पदखंमम, श्री गुणुणबैशावंश, श्री रुखामसरजतम सहागनालगुनासंगतम कम सजेवम सर तम तम जन सातम कृष्णा चेतन्या देवम, श्री राधा कृष्णा पद सहलना, श्री विशाखा हे कृष्ण करुणा सिंधु भी बंद जगत गो पेस गोपिका कंद ते कंचन गोरांग भानु देवी में हरि जै, श्री कृष्ण चेतना हरे हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हमारे सम्प्रदाय में 1 बड़े महान कार्य थे जिनका नाम है ठाकुर भक्ति विरोध। हमने कई बार उनके विषय में चर्चा की है। ठाकुर भक्ती विरोध जी बहुत ही अच्छे उदाहरण थे। वो ग्रस्ता आश्रम में थे, गेहस्ताहशमेंरहते हुए उन्होंने भगवान की भक्ति में भी कोई छूट नहीं छोड़ी। तो ठाकुर भक्ती नदी ने कहा कि जिस प्रकार कोने कोने में बीड़ी सिगरेट शराब की दुकान प्राप्त होती है उसी प्रकार कोने कोने में ऐसा स्थान होना चाहिए जहाँ के लोगो को हरि नाम की प्राप्ति हो सके। उन्होने का नाम हर। कोने कोने में 1 दुकान होनी चाहिए। यहाँ की यह हरि नाम का वितरण हो मुफ्त में तो कोने कोने में तो हम अंदर नहीं खोल सकते, न इतनी योग्यता है, न धन है, न इतने भक्त हैं पर कोने कोने में आप ग्िहास्ता लोगों का घर है और आप सब के घर को आपको 1 हरि नाम की दुकान बना देगी। आपको अपने घर का उपयोग करना चाहिए। यह हरि नाम का वितरण करने के लिए हमारे परम गुरुजी भक्ति सिधांत सरस्वती ठाकुर सुनाते थे कि अगर इस विश्व में किसी चीज की कमी है तो केवल ये भगवान के ज्ञान की कमी है। जैसे विदेशों में लोग कहते हैं भारत गरीब देश है तो ये है ये देश की सबसे बड़ी समस्या। पर चाहे बहुत ही दृष्टि से गरीब हो, अमीर हो पर ये भगवान के ज्ञान की कमी जरूर है। 1 महान संत गोविंद दास से उन्होंने 1 बड़ी सुन्दर रचना लिखी है जिसका नाम बाजा होरे मन तो इस रचना में वो कहते हैं बजाहुरेमनाशीनंद नंदना अभे चरना। वो कहते है हे मेरे प्रिय मन तुम किसी न किसी रूप से अभे चरना रविन्द्र। हे अभे मतलब वो स्थिति जिसमें कोई चिंता नहीं हो, जो हम चिंता से रहित हो जाए। अगर आज आप ध्यान से देखो कौन है चिंता से रहे। गरीब व्यक्ति यह सोचता है कि मुझे तो परीक्षण करना पड़ता है रोटी कमाने के लिए प्रो कोठियों में से लोगो की कोई चिंता नहीं है। अगर आप सेट लोगो के पास जाओ तो उनको भी अपनी चिंता रहती है। 3 दिन पहले हमें 1 बहुत बड़ा व्यापारी भारत का मिलने आया था। दिल्ली में तो उसके साथ 1 मशीन गन वाले आदमी थे, तो कह रहा था मुझे ऐसे फ्रंट ने मुझे मेरे बच्चे को धमकी दे दी, मुझे धमकी दे दी तो वो बेचारा जा जाता। 2 आदमी साथ लेकर जाता है, फिर प्रधानमंत्री है जब उसकी गाड़ी गुजरती है दिल्ली में किसी सड़क से पूरी सड़क को बंद कर देते हैं। पूरी सड़क क्यूँ भाई है, कोई कुछ कर नहीं दे। ठीक है। पर क्योंकि वो धनी व्यक्ति हैं, तो उनके साथ हो सी पाइए। प्रधानमंत्री का 1 बेटा है डॉक्टर रंगराव, उसका हमारी संस्था से बहुत अच्छा निकट का सम्बन्ध है। हमारे कई प्रोग्राम में आता है दिल्ली वृंदावन हैदराबाद में, तो जब वो आता है क्यूंकि वो प्रधानमंत्री का बेटा है। तो साथ में 20, 25 व ब्लैक कैट भी आते है। हमारे वृंदावन में आया था पिछले साल जन्म स्मि के लिए भागवत। सप्ताह में तो 20 पचीस ब्लैक कैट भी आए थे। सब जगह तो हरेक के मन में भय है। 1 व्यापारी के मन में भय है। दूसरा व्यापारी हमारा धंधा नहीं छीन ले। 1 व्यक्ति के भय में है कि दूसरा व्यक्ति हमारी नौकरी नहीं ले रहे हैं। तो जब तक हम भगवान से स्वतंत्र प्रयास करते हैं, जीवन को निभाने के लिए सदा भय रहेगा। बेशक बिरला के घर चले जाओ, टाटा के चले जाओ, किसी के चले जाओ, भर से सब हँसते हैं। और अंदर सबके मन में भय रहता है, यह शास्त्रों का निर्णय है। तो इससे यह सत्य अवश्य ही है। सो गोविंद दास जी कहते हैं पर भई आता कहाँ से है? भय था, मन में ही बनता है। ठीक है न। जैसे प्रलाद माजी कहते हैं सुख दुख हम अपने को सुखी कब से मानते हैं। हम अपने आप को सुखी मानते हैं। जब धंधा, अच्छा, चले, आमदन आये, ठीक है। तो प्रलाद महाराज जी कहते हैं यह सुख और दुःख जो है, ये तो केवल 1 मन की कल्पना है। आपको कोई आदर दे, कहे? आप? कितने अच्छे हो? हार चढाये ताड़ी मारे। तो मन कहता है, देखो, सब तुम्हारी कदर करते हैं। और अगर आपको जो आदर चाहिए, नहीं मिले तो आपका मन ही आपको दुखी बना लेता है। तो ये मन ही आपको आज सुखी बनाता है, कल दुखी बनाता है? आपका? स्वरूप तो वैसे का वैसा ही रहता है। तो गोविंद दास जी कहते हैं कि हे प्रिय मन, तुम अभैछनारविंदहै हमारे गुरु जी का नाम, हमारे गुरू जी के, गुरू पिता जी जो थे, उनका नाम था गोल। मोहन भी तो शुरू से ही बड़े धार्मिक विचार के थे। उन अपने बेटे का नाम क्या रखा? अभेचढ़अभेअभेकाअर्थ है जो भय से रहित हो, भय से रहित कौन हो सकता है? करोड़पति व्यक्ति देश का राज्य है। प्रधानमंत्री राष्ट्रपति। भय से रहित केवल वो व्यक्ति हो सकता है, जो किसी न किसी रूप से और हम भगवान के शरणागत हो जाए। क्यूँ? क्यूंकि? जब आप भगवान के शरणागत हो जाओगे, तो आप ये समझोगे को, आपके हाथ में कुछ है ही नहीं। आप अगर सोचते हो कि आपके हाथ में कुछ है, तो यह बहुत बड़ी भूल है। भौतिक वादी और आध्यात्मिक वादी में क्या अंतर है? मुख्य अंतर यह है कि भौतिकवादी व्यक्ति यह सोचता है, वो है। हर चीज का भोक्ता, वो है हर चीज का स्वामी। और जो सफलता प्राप्त हुई है, उसकी बुद्धि और परिश्रम के द्वारा प्राप्त हो रही है। अध्यात्मिक वादी, यह सोचता है, की पर हम भगवान है हर चीज के स्वामी और भोक्ता। और हम तो केवल निमित मात्र है। और भगवान की इच्छा के बिना 1 घास का पता सकते। और क्यूंकी वो है हर संपत्ति, पृथ्वी के स्वामी, हर चीज का उपयोग होना चाहिए उनकी सेवा। तो इसलिए ये कहा गया है गोविंद दास जी के द्वारा, की। अगर आप किसी न किसी रूप से अभय चलना। मैं कहा था गोल गुरुजी के पिताजी थे। उन्होंने उनके बेटे का नाम रखा अभय और रहुपाजी, कभी नहीं डरे। आप लोगों ने उनके जीवन के विषय में पढ़ा होगा। किस प्रकार उन्होंने संघर्ष किया। लगभग 25 साल के लिए यहाँ विले पाले में रहते थे। कई समय, बहुत समय के लिए हाँ विलेपालेअंधेरी में ठहरे थे। 1 सिंनकेशनकंपनी का कोई व्यक्ति था उसके घर में, 1 छोटे से कमरे में आप। अगर हमारे मंडल में प्रापर जी के कोटर में जाओ पांचवे। फ्लोर में वहाँ 1 कुर्सी पड़ी है जो हमें अंधेरी सी मिली, जिसमे प्रापत बैठते थे पुरानी कुर्सी। पर प्रापा जी घबराए नहीं, अमेरिका भी घबराए नहीं। उनके मन में पूरा विश्वास था क्या क चेतन्य महाप्रभु जी की भविष्य वाणी सत्य जरूर बनेगी। क्या थी चेतन्य महाप्रभु जी की भविष्यवाणी पृथ्वी के आचिदतनगरदीजितने विश्व में नगर है, गाँव है। वहाँ। मेरे नाम का प्रचार जरूर है। और उनके गुरु बना जी ने यह आदेश दिया था क्या ले जाओ क्षेत्र महा प्रभुति के उपदेश्य वो प्रयास करते गए, इस विश्वास के साथ कि ये भविष्यवाणी जरूर सत्य बनेंगे। तो ये भावना कैसे आती है हृदय में की हमें भगवान कृष्ण के शरणागत हो जाना चाहिए। कैसे कोई ड्रग्स में जाकर दवाई मांगो हम को यह दवाई 2 की हम भगवान कृष्ण की हो जाए तो आपको दवाई नहीं मिलेगी। पर दवाई का मिलेगी ये भी कोबलदासीआगेकहते है। क्या दुर्लभ मानव जन्म सत्संग जो मानव जीवन है। ये तो बहुत ही दुर्लभ है। ये तो हमने कई बार सुन लिया है कि मानव जीवन बहुत ही दुर्लभ है। अब सोच की बात तो यह है कि ये सब सुना है लाखों बार, पर हमारा मन इतना भी है कि वो उसे समझ नहीं पाता। जैसे शराबी व्यक्ति रोज सुनता है। पत्नी बच्चों के द्वारा। शराब छोड़ 2 कम कर। 2 आ रोज रोज सोचता है, हाँ कम कर दूंगा, पर फिर काम करना पड़ता है। तुम्हारा मन भी उसी प्रकार का ढीट है। रोज हम सुनते हैं। मानव जीवन दुर्लभ है। किसी समय समाप्त हो सकता है। यदि जी ने पूछा यमराज से बताओ इस विश्व में क्या है? सबसे बड़ा चमत्कार की बात क्या कहा यूनिस्ट ने? हर शाम, हर पल में हम देख रहे हैं। क्या? 12 नहीं, लाखों व्यक्ति मृत्यु की गोद में जा रहे हैं। पर हम क्या सोचते हैं? हमारा नंबर नहीं आएगा। आएगा भी तो हमारे से पूछ कर आएगा न। हम लोगों में कई बार आप लोगों ने सुना होगा शमशान राज्या शमशान घाट में जाते हैं तो वे राज्ञा की भावना आती है। क्या संसार में सब झूठा, सब 2 दिन के साथ ही है। हमने भी ऐसे ही जाना है। कल हमे जरुर भजन करना चाहे। भगवान कृष्ण नगर है और शमशान घाट से थोड़ी देर बाद घर लौटते हो। मीठे मीठे शब्दों के साथ पत्नी बच्चे आते हैं। आगे फिर सब भूल जाते हैं। क्या? नहीं? नहीं, यही स्थिति हमारी रहेगी, हमें शमशान घाट नहीं, जाना। नहीं, हमारे घर वाले किसी ने जाना। तो शमशान से 12 घंटे के लिए ज्यादा। ऐसी यादयाद 12 दिन या 13 दिन के लिए चलता है। वो तेरे बदन के बाद सब सारा जीवन वैसे है, वैसे ही लौट जाता है। ठीक है, अपने सपने देखा होगा। तो ये है हमारे मन की स्थिति। असली चीज को भी हम नकली मानते हैं। और जो नकली चीज है, उसको असली मानते है। असली चीज क्या है? भगवान के शरणगत होना, उसको तो हम समझते हैं। यह नकली है। और नकली चीज क्या है? ये भौतिक जीवन और उसको हम सोचते हैं। यह असली है। तो ये है हमारी समस्या। हमारे में वो योग्यता नहीं है। यह परखने ले की स्थाई और स्थाई में क्या अंतर है? असली और झूठ, सच और झूठ में क्या अंतर है, ये हमारी योग्यता में है। तो इसलिए गोविंद दास जी कहते हैं दुर्लभ, मानव जन्म, सत्संग, तुम, साधु की संगत लो। साधु की संगत के द्वारा आपको क्या संदेश मिलेगा? साधु का क्या लक्षण है? साधु का ये लक्ष्य नहीं कि वो दलाल गिरी करे। जैसे आप अखबारों में पढते हो, वो स्वामी, उसका नाम हम नहीं लेंगे बड़ा। जो दलाल गिरी करता है, ये करता है, वो करता है, हथियार बेचता है। वो वो नहीं, वो नहीं है, साधु का लक्षण नहीं। ये साधु का लक्षण है कि वो कुर्सी के पीछे बैठे ही लक्षण। वगैरह में ले। साधु का ये लक्षण हैं की वो भगवान के सन्देश के लावा और किसी विषय की चर्चा नहीं करता। जब वो आप से मिलता है तो ये नही पूछा कितना कमा रहे और धंधा क्या? कौन सा शेर पर जा रहा है, कौन सा नीचे जा रहा है? वो केवल यही सोचता है कि किस प्रकार से आपको भगवान कृष्ण का उपदेश पचाया जाए। कोई और। इसके अलावा उसका जो अपना जीवन है, वो शास्त्रों पर आधारित होता है। यह नहीं कि हम दूसरों को बोले हरी का नाम लो और हम नाम के लिए माला रखें। केवल गले में। वो ऐसा काम नहीं चलेगा। शास्त्र में कहा जाता है आचार्य चेतन महाप्रभुजी ने कहा कि हर भक्त को अपने व्यवहार के द्वारा, धर्म का, उद्देश्य को प्रकट करना चाहिए। अपने व्यवहार के द्वारा मतलब कि, हमले का व्यवहार वैसा होना चाहिए कि लोग समझ जाए। हाँ, ये व्यक्ति दुनिया दारी भतिवाधियोसे जुदा है। तो साधु का लक्षण क्या है? कृष्णा की चर्चा करना हमारे गुरु मान जी को मिलने। धनी व्यक्ति आते थे, गरीब व्यक्ति आते थे, उन्होंने कभी ये नहीं देखा। कौन, अमीर, कौन, गरीब सबको यही कहा हरी का नाम लो, कृष्णा के हो जाओ। और भागवत गीता को तो साधु संग, साधु, संगत, भुत अवश्य है। आप सब का व्यास होगा कि जब आप लोग इन सत्संग प्रोग्राम में आते हो, आप जब प्रेरणा बढ़ जाती है, ठीक है न? और ये जरा असर 12 दिन तक रहता है। फिर जरा फिर से अस्त अस्ते कम हो जाता है। सच बात है इसके लिए वे आप लोगों को जानना चाहिए मंदर या उद्देश्य सुनने के लिए, जैसे ये जो मंदिर है, इन मंदिरों का क्या उद्देश्य है? 1 तो उद्देश्य है ठाकुर जी की सेवा करना, पूजा करना, ठाकुर जी की पूजा हम क्यूँ करते हैं? क्यूँकि ठाकुर जी हमें मौका दे रहे हैं उनकी सेवा में जोड़ने के लिए। फिर जब हम ठाकुर जी के सामने आकर प्रणाम करते हैं, झुकते हैं तो झुकने से ही आप आध्यात्मिक परिवर्तन करते है। अगर आप जिंदगी में कुछ मत करो रोज जा के भगवान के सामने प्रणाम करो झुको, उसी में आपका आध्यात्मिक जीवन बन जाएगा केवल भगवान के सामने जाकर प्रणाम करने के लिए। और जब आप भगवान के सामने जाते हो, भगवान का दर्शन प्राप्त करते हो, तो फिर भगवान का सुन्दर विग्रह देखकर आपका अशुद्ध हृदय जो है वो शुद्ध बन जाता है। तो इसके लिए कहा गया है के जो मंदिर है वहाँ वैसा वातावरण होना चाहिए कि वहाँ पहुँचते ही हमें ये याद आए कि जीवन का क्या लक्ष्य होना चाहिए। तो साधु संगत बहुत अवश्य है। कई बार हम साधुओं से डर जाते हैं असली साधुओं से हम सोचते हैं कि जाएंगे स्वामी जी, वही कहेंगे, ये ये बदमाशी छोडो, ये गंदी चीज छोडो, ये छोड़ो वो छोडो, हम छोड़ने को तैयार नहीं है। तो हम साधु से भागते हैं। आजकल बहुत से अमेरिकन बिजनेस, कंसल्टेंट आते इंडिया और वो लोग 10 10 हजार रुपए लगते हैं। 1 लेक्चर के लिए, आप लोगो को पता होगा बड़े बड़े आते हैं इसने उनका अमेरिका में नाम ही सुना पर इंडिया में देवता बन जाते हैं। तो यहाँ आते हैं बड़ी बड़ी कंपनीज अपने आदमियों को भेजती है 2 घंटे का लेक्चर सुनने के लिए। 1 हमारे बहुत बड़े वे पारी सदस्य हैं, दिल्ली में रहे थे वो, ऐसे 1 व्यक्ति को मिलने गए 10 हजार फीसदी आधे घंटे की मीटिंग के लिए, और कोई नई बात नहीं सुनी उनसे जो आता था वही उनसे सुना पर सब जाते बड़ी बड़ी कंपनी है, राजन होटल वगैरह में सेमिनार करते हैं बड़ी बड़ी कंपनियां अपने आदमियों को भेज दी है। तो हमारे उत्साह के साथ जाते हैं कुछ सीखने के लिए कि हम हमारे काम के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करे। तो उसी प्रकार अगर आप आपका भाग्य ये हो की आपको शुद्ध संतों की संगत मिल जाए तो आपके हृदय में ये विचार निश्चित रूप से स्थापित हो सकता है। तो आगे गोमंदेदासजी कहते हैं जाओ हरी पादा किसी न किसी रूप से तुम हरी के चरण, 2 हरी हरी के शरणागत हो जाओ। तो कैसे हो? शरणागत? 1 तो माध्यम है साधु संग के द्वारा। और गोविंद दास जी कहते हैं जिस प्रकार 1 कमल के पत्ते के ऊपर 1 पानी का बूंद हो तो पानी का बूंद किसी समय भी वो कमल के पत्ते से नीचे गिर सकता है। ठीक है न? आप यकीन से, तो यह नहीं कह सकते। 10 वाटर, विल, नोट, फॉल, फोर, टू हावर्स, किसी समय भी नीचे आ सकता है पानी उसी प्रकार गोविंद दास। कहते हैं ये जीवन किसी भी समय समाप्त हो सकता है। तो वो समझाते हैं हमें हरी के शरणगत हो जाना चाहिए। कैसे हो श्रम, कितना, विष्णु, स्पर, पल, सेवा, आश्रम वंधमदस्यमसखआत्म निवेदन। ये है नवादा भक्ति जिसका वर्णन सबसे पहले प्रलाद महाजन किया था। तो लाद महाजी से तो आप सब का परिचय है सलाद महा जी उनको शास्त्र में महाजन माना जाता है। वैसे तो आजकल भारत में महाजन 1 जात बन गयी है आप में भी कोई महाजन हो सकता है पर महाजन का संस्कृत में अर्थ है जो की धर्म का अधिकारी हो जिसके द्वारा हमें धार्मिक शिक्षा प्राप्त होती है तो हमारे वैदिक शासन के अनुसार 12 महाजनों का वर्णन है कमार।
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