श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर तिरोभाव दिवस | 07.12.2017 | ISKCON Delhi | Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

The video records a devotional ceremony held at ISKCON Delhi on 7 December 2017 to commemorate the tirōbhava (disappearance) of Śrī Bhaktisiddhānta Sarasvatī Ṭhākur, the great Gaudiya Vaishnava reformer. The speaker, Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī, opens with a Sanskrit‑Hindi mantra and explains the spiritual significance of tirōbhava – the moment a saint leaves the material world while his teachings remain eternally active. He recounts Bhaktisiddhānta’s life: his birth in 1874, his early mastery of scriptures, his role as a district magistrate under British rule, his reforms against fraudulent ‘fake saints’, and his establishment of a network of press‑houses that published over a hundred works in Odia, Bengali, English and other languages. The talk highlights his doctrinal emphasis on pure bhakti, the chanting of the holy name, and the propagation of Krishna consciousness worldwide. The speaker narrates the lineage that followed: the work of his son Bimala Prasad, the formation of the Gaudiya Math, the later emergence of ISKCON, and the spread of the movement to Europe, America and other continents. Anecdotes about Bimala Prasad’s childhood devotion, his strict dietary vows, and his scholarly pursuits illustrate the personal dimension of the tradition. The ceremony includes chanting, prayers for a future messenger to continue the mission, and a collective pledge to study scriptures, serve the community, and uphold the pure devotional principles taught by Bhaktisiddhānta. The overall tone is reverent, celebratory, and instructional, urging listeners to internalise the saint’s teachings and continue his legacy.
Chapters
om namo bagadiwasudivay, om namo bawadewasudiva, ओम नमो भगते वासु दिवा। somebody translating over there for the russian man, murad can se there home anaaaauaa i srीkrisnacेtana। हाई कृष्ण जैसे आप जानते हो, आज बहुत ही शुभ दिन है। आज है भक्तीसिदांदाजी का तिरोभाव अविरभाव और तिरोभाव अभिभाव करत है जो की महान संत प्रकट होता है। इस पृथ्वी पर और तीर भाव का अर्थ है जो अ प्रकट होता है भौतिक स्थिति में वो दिन जब कि इसका देहांत होता है, हम अफसोस करते हैं और आध्यात्मिक जीवन में अहुभाव और तिरोभाव दोनो का म लाभ उठाते हैं। संतों की महिमा का गुणगान करने के वो आज है हां सं भक्ती सिधान ठाकुर का या क्षेत्र या महा प्रभु को सब अफसानों में सबसे दयालु अवतार माना जाता है की कृष्ण क्षेत्र प्रदाय, तो वह बिना किए दयालु जगत आप सबसे दयालु हो और आप प्रकट क्यों हुए जिदों का उधार करने के लिए अध्वेदाचायप्रकट हुए थे। माह प्रभु से पहले। हालांकि वो, हालांकि वो भगवान के अवतार थे, उन्होंने प्रार्थना की भगवान स्वयं प्रकट हो। जेतिनमाप्रबु ने शुद्ध भक्ति की स्थापना की और हाई नाम की महिमा का प्रचार किया। उनके भविष्य वाणी थी क्या प्रचार, मा नाम। विश्व के हर कोने में यह नाम पहुंचेगा जितिन महाप्रभु के होने के 200 साल बाद, उनका जो शुद्ध संदेश था वो सहाज्य के हाथ में आ गया और सहाज़ियों ने महा प्रबु के जो शू्धभक्ति का संदेश है उसको 1 रूप से डायल्यूट कर दिया और सहाजियापनबहुत फैल गया, इतना तक कि लोग शर्माते थे यह स्वीकार करने में वो वैश्या है। और ये जो सहज है वो वो हर प्रकार का गलत काम कर रहे थे। धर्म के नाम पर भगवान की भविष्यवाणी थी की ये है नाम हर जगह पहुँचेगा और इस भविष्य वाली को सफल बनाने के लिए भगवान ने भेजा महान सन। ठाकुर भक्त यूनो जिले की दिव्य शक्ति माना जाता है। और ठाकुर भक्त नोद जब पृथ्वी पर थे, उन्होंने प्रयास किया था चेतिनेचलतरमिदा की 1 कॉपी को प्राप्त करने के लिए। वो कहाँ भी प्राप्त नहीं कर सके और भक्तिन ठाकुर बड़ा दुख हुआ, यह देखा कि जो चेतन्य महाप्रभु का पवित्र संदेश है, आज गलत हातो में आ गया है। लोग धर्म के नाम पर हर प्रकार का अधर्म कार्य कर रहे हैं। महान संत थे जिन्होंने फिर से छेदने महाप्रभु जी को बिल से संदेश की स्थापना की और ठाकुर बक्तिनोधनेअनेक ग्रंथ लिखे, सौ से अधिक में, ओडिया में, बांग्ला में, जिसमें उन्होंने शुद्ध भक्ति का संदेश दिया है, लगभग सारे भजन गाते हैं। उनकी रचना जी ने की है और ठाकुर भक्तिनी ने काफी प्रचार किया। भौतिक दृष्टि से पड़े लिखे थे, धनी खानदान में जन्म लिया था और अंग्रेजों के राज्य के समय उनका बड़ा ऊंचा स्थान था, गवर्नर का नहीं। प्रापरली ने अपने इलेक्शन में कहा कि उन में गवर्नर के नीचे डिस्ट्रिक मैजिस्टेट होता था और डिस्ट्रिक मैजिस्टर के रूप में उन्होंने कई गलत हरकतों को रोका, जैसे जगतपुरी में 1 ढोंगी साधु थे। वे ये स्वीकार दावा कर रहे थे। मैं विष्णु का अवतार हूँ। लोगों की माता बहनों बेटियों से गलत कार्य कर रहे थे। अंग्रेजों का शासन था। ब्रिटिश सरकार को पता था कि ठाकुर भक्ति नोल धार्मिक व्यक्ति हैं, उन्हें जगनपुरी मंदर की देखभाल की जिम्मेदारी भी सौंपी थी और भक्त ठाकुर ने गलत हरकतें होनी थीं। सबको रोक दिया। तो ब्रिटिश सरकार ने। भक्त ने ठाकुर से कहा आप इन्वेस्टिगेट करो। भक्ति न अपने पुलिस के सिपाईयों को लेकर अपने साथ वो वो सलमान पुलिस ले गए थे। कोई हिंदू पुलिसवाले नहीं, हिंदू लोग डरते थे जोगी साधू के सामने आने के लिए तो जंगल में गए, जहां निवास कर रहा था औ। और इस व्यक्ति की पर योगिक सिलिया थी। उसने पा लिया कौन आया है केदार न दाता तुम जानते नहीं, मैं कौन हूँ, मैं विष्णु का अवतार हूँ। और जब मैं अंग्रेजों को यहाँ से निकाल दूंगा तुम्हें राजपाल बना बनाऊंगा। अगर भक्तों ने कहा अगर तुम विष्णु के अवतार हो तो इस जंगल में क्या कर रहे हो? आपको तो जंगलपुर मंडल में मेर जबान होना, मोरे जगन मूर्ति भगवान थोड़ी है, वो तो लकड़ी की है। सिवाय को आदेश दिया, फिर उसको वापस लेकर आए और काफी लंबा केस चला था। अंत में 1 ढोंगी यक्ति ने आत्मा जबकि यह ट्रायल हो रहा था। इस घटना के बाद के, पत्नी और बच्चे सब बीमार हो गए और पूरा शहर कहने लगा कर भक्ति ने अपराध किया है भगवान को कैद में जेल में डाला ये सब कहने 2 छोड़ 2 छोड़ 2 भक्त ठाकुर ने कहा मरने 2 पत्नी और बच्चों को ये व्यक्ति है। और जिस दिन उन्होंने जजमेंट लिखना था पूरा डांस साइन उनका प्यार लाइट हो गया। उन्होंने निर्णय दिया और अंत में इसने आत्महत्या कर ली। पत्नी, बच्चे सब ठीक हो गए। इस प्रकार भक्तजन शुद्ध सिद्धांत की स्थापना की और पूरे समाज में उनका बहुत उच्चा आदर था। और उन्होंने युगपत को खोजा जो कि माँ प्रभु की असली जन्म का स्थान था और अपने भजन को बनाए। गोदमीमेंभकतनोजी ने डोंगी प्रचार को बदला प्रभुजी की शुद्ध शिक्षा को स्थापित किया और उनकी सौ से अधिक ग्रंथ लिखे। और उनकी इच्छा थी कि उनके प्रकट होने के पश्चात भगवान ऐसा कोई व्यक्ति भेजे जो कि उनके आंदोलन को आगे बढ़ा सके उठाकर पखनोजीकीएप्रार्थना थी ही आपको विष्णु की किरण को भेजो जैसे कि अदवेदाचार्या प्रार्थना करते थे। भगवान अब स्वयं प्रकट हो पति दुंगा उद्धार करने के लिए उसी भाव के साथ भक्ति नोट ठाकुर प्रार्थना करने थे की भगवान आप किसी ऐसे व्यक्ति को भेजो जो की मेरे आंदोलन को इस आंदोलन को आगे बढ़ा सके। तो इस प्रार्थना के उत्तर में भगवान ने भेजा बिमला प्रसाद को वक्त सिलानदरसराधवदी ठाकुर का जन्म हुआ था पुरी में उस समय उनके पिता निस्ट मैजिस्टे थे और ये रिवाज था जो वो जन्म लिए थे, प्रगट हुए थे उनके शरीर में जो बत्ते सिमटम्स होते हैं महा पुरुष में वो सारे के सारे थे और उनकी जब जन्मपत्री बनी उन मेरी वाज था कि जब बचा मेरी वास था जब बच्चा पैदा हो उनकी जन्मपत्री बनाई जाए। और जब जोशियों ने उनकी जन्म पत्री देखी सब आश्चर्य हो गए थे। उन्होंने कहा ऐसी जनमपत्री हमने जिंदगी में नहीं देखी। और 1 जोशी ने कहा ये व्यक्ति यमेनिडीका मार्ग दर्शन बदल देगा, जबकि ऐसे धर्म की सामना करेगा जिसमें लाखों लोग जो जुड़ेंगे तो उन दिन में रिवाज था डिस्ट्रिक मजिस्टेट के घर के सामने, भगवान जगराज रत रुकता था। और इस साल रत में कोई प्रॉब्लम आ गया। इसे हमारी रात या में आता है। 3 दिन के रथ रोका था जिस मैजिसकदानादाता के हर के सामने, उनकी पत्नी ने भगवती देवी इस स्थिति का लाभ उठाया। और जब भक्ति सिदाना हुए थे नाली नाल नाल है। उनके शरीर के साथ ऐसे जुड़ा हुआ था जैसे ब्रामाल जेनू ब्रामण जनो के साथ, तो बगदी देवी ले गई अपने बेटे को। उनको नाम दिया था भक्ति न ठाकुर ने बिमला प्रसाद। और जब वह जगराज की अंतरंग शक्ति है तो भक्त सीदांदाजीकोमान भगवान जगना के चरणो में रखा। 1 हार जगना जी का गिर गया उनके ऊपर, और जो छोटा बेटा था अपने हाथ से, जगना जी के चरणों को छूने का प्रयास कर रहा था। तो अनेक लक्षणों के द्वारा भक्ति नोट ठाकुर समझ पाये ये जो बेटा है मेरा, यह उनका पांचवा बेटा था। ये जो बेटा है यह विष्णु की किरण है। जिस बच्चे की मैं प्रार्थना कर रहा था भगवान ने, वो बच्चा भेजा है उसके लक्षणों के द्वारा। भक्ति ठाकुर ने उन्हें बहुत खास ट्रेनिंग दी। और 3 साल की आयु में 1 समय विमला प्रसाद ने 1 आम खा लिया था। पिता ने ऐसी शिक्षा दी थी। पिता ने शिक्षा दी थी, कुछ नहीं खाना चाहिए। भगवान को भोग लगाये बिना और आम खा लिया, भोग लगाए बिना, पिता को पता लगा कि बेटे ने आम खा लिया, भोग लगाए बिना। पिता ने कहा ये ठीक नहीं था, भोग लगाए बिना नहीं खाना चाहिए। बच्चों को यह शिक्षा छोटी आयु से ही देना चाहिए। और भगिमनाप्रसाद ने इतनी गंभीरता से इस अपराध को स्वीकार किया कि जिंदगी भर उन्होंने कभी आम नहीं खाया। बुढ़ी आयु में भी जब कोई आम देता था, वो कहते थे मैंने बचपन में ही अपराध किया है। इस कारण में लगी भर आम नहीं खाऊंगा, आम नहीं खाऊँगा। तो ये 1 अच्छा उदाहरण है माँ बाप के लिए बच्चों को शिक्षा देने का। और इस प्रकार का दर्द भाव हमारे में होना चाहिए। अगर हम भक्ति के मार्ग में उन ती करना चाहते हैं। 5 साल 6 साल की आयु में उन्होंने पूरी गीता कंटस् कर ली थी। पूरी गीता 7 साल की आयु में ठाकुर। भक्ति ने नरसिंगा मंत्र दिया देवजी की पूजा के लिए। और भगीन ठाकुर मकान बना रहे थे कलकता में मकान की डि खुदाई, खुदाई में उन्हें 1 कुर्मरशीला मिला। वो कुर्मर्शीला उन्होंने अपने बेटे को दिया पूजा करने के लिए। भक्ति सिदाना जी बौद्धिक शिक्षा प्राप्त की उन्होंने। और बहुत ही होशियार है। अगर आप उनकी अंग्रेजी पड़ो हमारे विदेशी भक्त भी उनकी अंग्रेजी आसानी से समझ नहीं पा रहे हैं। उन्होंने एस्ट्रोनमी का सिद्धांत सीखा, जिसके कारण उनका नाम होगा और अपना प्रचार शुरू करने से पहले मायापुर धाम में गए। आज तुम्हारा पुर धाम में आप बड़ी रौनक देखते हो। खास रौनक नहीं थी। एकांत के स्थान में जंग गंगा के किनारे 1 छोटी कुटिया बनाई उन्होंने निर्णय किया था यह प्रचार का कार्य शुरू करने से पहले 10 साल के लिए मुझे रोज। हरिदास ठाकुर के समान 3 अखबार जॉब करना चाहिए। वन नाइनटी टू राउंड रोड। उसके बाद प्रचार शुरू करेंगे। तो भक्ति सिधांत गए। मायापुर में कुटिया बनाई और अपना जाक शुरू किया। उनका उद्देश्य था 10 साल के लिए ये जॉब करूँगा 3 लाख बार दिन में जॉब वन नाइंटी टू राउंड रोज और जो छत थी। 1 समय बहुत तेजी के साथ बारिश बढ़ हुई थी। छत भी अंदर आ गई कोई भक्ती से जी ने अपने जॉब बंद नहीं किया। जॉब करते गए। 1 छाता खोल लिया माँ यहाँ से, छाता ऊपर रखा था लाइन यहाँ और इस प्रकार और खाने के लिए क्या सादा चावल जो की गंगा जल में भिगो के बनाया जाता था। बस ये था उनका भजन, यह था उनकी खुराक काला चावल और सारा दिन जाब। और जब बारिश आती थी सीलिंग को ठीक करने की, वजाय छाता खोल दे दे। पाए यहां से और जाप करते थे। इस प्रकार कई सालों के लिए जॉब किया महा प्रभु ने। सपने में आये महा प्रभु ने कहा न्होंने बहुत भजन कर लिया। अब जाओ प्रचार करो पतितों का उद्धार करो। जो कार्य भक्तिन ठाकुर ने शुरू किया था, उसको आगे बढाओ। मायापुर छोड़कर क्या में आये को 4 आरम्भ करने के लिए भौतिक शिक्षा उन्होंने प्राप्त की थी अपने पिता के द्वारा। भक्ति और ठाकुर 2 मोबाइल फोन बंद क्यों नहीं करते हैं किसका मोबाइल फोन है। भक्त ठाकुर, जगनदास बाबूजी और गोडकिशोदास बाबु जी कई मिलकर चर्चा करते थे ठाकुर के वजन। और अब दीक्षा का समय आया गोड़ के शो दास बाबु जी में। दा ने राजमान थे। और जब उन्हें पता लगा कि नव धाम में ठाकर जैसे संत जगनदजैसेसंथ्यािक चर्चा कर रहे हैं। ब्रज को छोड़कर वह आ गए नव देवधाम में। और भक्ति ठाकुर के साथ जुड़े तो जब दीक्षा का समय आया, भक्तिन ठाकुर ने कहा घोर के शोर दास बाबू जी से दीक्षा ग्रहण भक्ती सिनाद। पिता के आदेश के अनुसार गोल किशोदा बाबजी के पास गए। गोकेशोदsबाbुjी भौतिक दृष्टि से बिल्कुल अनपढ़ थे। नाम ही अपना नाम ही नहीं लिख पाते थे। और थे ऊँचे कोटी स जिनका गहरा आकर्षण था। नाम के पति और वो भजन करते थे। पब्लिक टॉइलट के अन्दर अपने आप को बंद करके क्यूँ क्यूँकि पब्लिक टॉयलेट के। वहां बदबू आती है आजकल के भारत के टॉयलेट। तो उनको पता था कि यहाँ कोई नहीं आएगा। मुझे डिस्टर्ब करने वहाँ पब्लिक में बैठ कर भोजन कर दे थे। दूसरे शब्दों में उनका इतना गहरा आकर्षण था। हरी नाम के बी इतनी गहरी रुची थी। दिन दाल हरिनाम करे बिना किसी डिस्टर् के। जो पब्लिक टॉयलेट में जॉब करते थे, उन्होंने पूरी गीता खंडे की हुई थी। हालांकि वह अनपढ थे। तो जब भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने पिता के आदेश के अनुसार उनसे निवेदन किया, कहा नहीं, मैंने तो निर्णय कर लिया है। मैंने कोई सेक्शन नहीं बनाना। और ने इनकार कर दिया। उन्होंने कहा मैं तो अपना नाम ही नहीं लिख सकता। तुम इतने बड़े विद्वान हो। ज का बड़ा गहरा ज्ञान था और पड़े लिखे थे। दूसरी बार फिर हो गये। और मैंने निर्णय किया कि दिक्शा नहीं देनी। किसी को। मुझे चाितिनीमहाप्रबु से पूछे, ो तुमे दिक्शा दू या ना? 2 अगले दिन बाकी सिला फिर आये। कब ने महा प्रभु से पूछा मुझे दिक्षा दे सकते हो या नहीं? भूल गया, पूछा हो गया। पुल 3 ठाकुर को जब पता लगा इतने दिन हो गए हैं। पर अभी तक गोल के शोर ने दिक्षा नहीं दी। तो उन्होंने कहा अपने बेटे से, अगर तुम्हें दिक्षा नहीं मिले, वापस घर मत आना तो गोल के शो दास को बकती सिधारे मिले। 1 पूल में ब्रिज के ऊपर। उन्होंने कहा कि अगर आप मुझे दिक्षा नहीं दोगे। मैं। फिर गोल के श्रोता दाजी ने उन्हें दीक्षा दी। उनके 1 शिष्य थे भक्त भक्ति सिधादाजीने ये प्रचार किया जो कि उनके पिता ने शुरू किया था। ये व्यक्ति ब्राह्मीण बनता है। गुणों के आधार पर, जन्म के आधार पर ने 1 समय कारकला में ब्रामणी सभा में अति ठाकुर को निमंत्रण दिया था। लेक्चर देने के लिए। ठाकुर का स्वाद ठीक नहीं था। उन्होंने भक्ती सिधांत को भेजा ब्राहमणों की सभा थी। बड़े विद्वान ब्राह्मण उपस्थित थे। बकती सिधांत ने अपना आम किया। यह कह कर कि ब्राहमणों के गुणों का वर्णन किया। ब्राह्मण के बिना समाज का दुघरामानाजातासच बात है, ब्राहमणों की तुलना की जाती है। सेल के साथ। तो ब्राह्मण बड़े खुश हुए। उन्होंने कभी इतनी प्रशंसा सुनी नहीं थी कि ऐसे छात्रों पर आधारित प्रशंसा ब्राह्मण बिना समाज अधूरा है। और ब्राह्मणों का गुणगान किया। उसके पश्चात उन्होंने ये श्लोकों के द्वारा स्थापित किया। व्यक्ति ब्राह्मण बनता है। मन बड़दायनेक्यूकि ब्राहमणों को अच्छा नहीं लगा। तो भगती सिनाद ने स्पर्श प्रचार किया था बिहारी नाम ही 1 साधन है और गुणों के आधार पर व्यक्ति ब्राहमण बन रहा है। तो ये जो ने ब्रेक राम ब्रेक करते हैं, ये भी आरम्भ हुई थी मकसीसिदांदाजी के द्वारा। मक्सी सिदांदाजी ने नाव प्रेग्राम की स्थापना की और ब्रज मंडल परेरा 1 समय भक्ति श्रीद्धांत जी जब भक्तों को लेकर नवदपरिकरामकररे थे, हो गई। साजिया ने निर्णय किया था हमने बाकी धान को मारना है। तो कइयों ने पत्थर फेंके। बहुत वे परिक्रम के भक्तों के ऊपर उनका टार्गेट था बकतीसीधाथा तो वो उनके जबर्दस्त उनको ले गए। अंदर कमरे में। भक्ती सिनाद सैफरन कपड़े में थे। सन्यास के उनके 1 सिर थे, जो सफेद कपड़े में थे। वो सफेद कपडे सेर गुरु जी को दे दिया। और वो उनके सैफरन कपड़े उन्होंने पहन लिया। और वो पत्थर फेंके थे। बग्धी जो पत्थर फेंके। इसी प्रकार कलकता में 1 समय है जब ग्रामीणों ने देखा की भगती से हमे खुला प्रचार कर रहे हैं। जोर से व्यक्ति ब्राहमण बंधन गुणों के आधार पर उन्होंने योजना बनाई थी। इनको मार लेने के लिए वो पुलिस वाले के पास गये थे। हम कुछ करेंगे। पर तुम कुछ करना। मत। पुलिसवाले ने आकर सूचना दे दी की सिनादजीकातोइनदउदरण के द्वारा हम क्या देखते हैं। घबराए। उन्होंने अपने भक्तों को भेजा था डाका में। उन दिनों में बंग्लादेश इंडिया का भाग्य अपने भक्तों को भेजा था दाखा में प्रचार के लिए। और जब वहाँ के भक्त साजन को पता लगा, इनका क्या प्रचार है। उन्होंने सबको बोला, इनको कुछ दान मत देना। भक्ति सिना पता लगा कि समाज में यह कहा जा रहा है। उनके शिष्यो को कोई दान मत देना। घबरा गए होने का हम कैसे प्रचार करेंगे। बक्त। सिद्धांत जी ने कहा, मिट्टी खाओ नहीं बदलो। इस प्रकार वक्ती सिद्धांत जी शेर जैसे प्रचार करते थे। लायन खास करके मायावादी इसके विरोध है। सड़क में चलते थे और कोई माया वाली को पकड़ कर और जो मायावती थे, भक्ति देखते एकदम सड़क के दूसरी तरफ चले जाते थे। बड़े स्परूप सी मायावादियों का मायावादियों को गा के तुम गलत कर रहे हो। वकील सिधांत जी ने गोली मत की स्थापना की थी। 64 केंद्रों की स्थापना की भारत में और विदेश में। और उन्होंने दक्षिण भारत उन स्थानों की यात्रा की। यहां की महा बहु गए थे। कई स्थानों में। आपने देखा होगा चेतन मा प्रभु के चरण के निशाने हैं। लिखा है कि कवायद ये सारा कार्य चेतनीय मा, यह भक्ति से नानाजी ने किया था। आज जब नवदपरक्रमेंजाते हो, आपको पता लगता है ये लीला यहाँ हुई थी, यह लीला यहाँ हुई थी। सारा कार्य ने किया। जब ब्रज में जाते हो और आप इंसानों को पहचानते हो। यहाँ के भगवान ने अपनी लीला पकड़ी थी। और यह सारा कार्य व स्वामी ने किया था। गोस्वामी को आदेश था राज में जाओ उन स्थानों को खोजो। भगवान तो ये सीधा है। 1922 में 1 मित्र थे जिन्होंने प्रापा से कहा, यहां 1 खास संत रहता है। मैं चाहता हूँ कि तुम चलो उससे मिलने। गले। प्रापा जी के पिता गोरमाने बकयादा संतों की सेवा करते थे। और प्रापा इन संतों से इतने प्रभावित नहीं थे। बाबाजी कहते थे माई, फादर, डिड, नॉट, डिस्क्रिमिनेट, ऑन, असली, सादिक और नकली सब कोई भंग पीने वाले की भी सेवा करते थे। तो जब प्रौबाजीकेमितर ने कहा की चलो मैं तुम्हे 1 सं से मिलाना चाहता हूँ। प्रापा ने कहा, मैं कई संतों को मिल चुका हूँ। जब वे संत पाल के शब्दों में मुझे घसीट कर ले, घसीट कर ले गया। सेनादा भगती से दादा जी ने पहली मुलाकात में पहचान लिया। ये है वो युवक जो महाप्रभु आदेश को पूरा करेंगे। तो पहली मुलाकात में ही उन्होंने कहा तुम पड़े लिखे, युवक हो जाओ। पश्चिम देश में महाप्रभु के संदेश के प्रचार के लिए। बाबा ने कहा, पहले हमें हमारे देश को स्वतंत्र बनाने, 2 वे लोग देश हमारा संदेश सुनेंगे, गुलाम देश के सन्देश को गो। कौन। सुनेगा ने क्या कहा असली विजय है। जनमत से छुटकारा। पा जी कभी अपनी जिंदगी में डिबेट में हारे नहीं थे। और पापाजी ने कहा आई वाज डिफीटेड बाई माई गुरु। उन्होंने ऐसे आर्गूमेंट दिए की सिरंद सारस्वती ठाकुर ने अनेक ग्रंथो की रचना की। उन्होंने 1 सभा बनाई थी और गेस्ट असम्बली जिसमें सबने निर्णय किया था हम जिंदगी भर ब्रह्मचारी रहेंगे और समय के साथ सब ग्रास बनने से भक्ती सिधार ब्रह्मचारी रहे। वो बिल्कुल पक्के ग्रिहा थे पापाजी 1 लेक्चर में कह रहे थे 1 समय उनके गुरु भाई थे डॉक्टर कपूर उनकी पत्नी जवान थी वो आये थे भक्ती सिधानी मिलने और पत्नी लगा गुरूजी मैं आपके साथ अकेले बात करना चाहती हूँ, नहीं, अकेले नहीं सबके सामने बात करो। अभी भी किसी स्त्री के साथ अकेले नहीं रहे। हलक लगाते थे आईने में देखे बिना कभी उन्हें आईने का उपयोग नहीं किया। और जब वो बैठते थे हमेशा सीधा प्रचार को बढ़ाने के लिए कई इनोवेशन वो लेके आये। इससे आपका यांगो म्यूजियम है ये म्यूजियम की प्रेरणा ली थी वो अमेरिका में म्यूजियम बने थे फेट फर्स्ट अमेरिकन ही स्टिक, एग्जीबिशन लॉसेज और डेटाइन में बने थे। और वो फेद की जो प्रेरणा थी प्रॉपर ने दी से प्राप्त हुई थी बग्तीसीधानजीसे जिन्होंने म्यूजियम खोले। उनके बाद मूविंग डाइयनामस थे जो कि एग्जीबीशन करते थे अलग अलग स्थानों में जिसके द्वारा हमारा ध्यान दिया जाता है जैसे अगर आप पुरुष जाओतो श्रवण में गोडियामदकामंदिर है और उसमें जा देखोगे एग्जीबीशन है। इस प्रकार के एग्जीबीशन भक्ती सिलानी अपने शिश्न को भेजते थे भक्ति सीदादाजीप्रापा जिसे ने थे 1935 में राध कुन में दादाजी हजारों सा है ब्रज थे उरादकुनमेंमग्दीसी दादाजी ने 1 दंगा की तस्वीर खींच कर कहा अगर भगवान हमें सुविधा दे तो क्या करो? तो को अनुमान और प्रकाश और इस सेवा का नाम क्या है। वह सादे मृदंग की आवाज थोड़ी दूर जा सकती हैं और 1 ग्रंथ को आप दिल्ली में बांटो का लियन बॉम्बे लंदन भी हो सकता है। भक्ति से दादाजी ने प्रचार के कार्य को बहुत बल दिया। उनके पिता, भक्ति और ठाकुर ने 1 ग्रंथ लिखा था खेती महा बाबुजी के जीवन के ऊपर गिर शिक्षा इतने लगा सार था जो कि उन्होंने विश्व के अनेक प्रसिद्ध महाविद्यालयों में भेजा था। कौनसे साल एटी नाइनटी से जब पापाजी प्रकट हुए थे पृथ्वी पर, तो भक्ति सिधांदाजीने 11 साल की उम्र में भक्ती सिधांत जी अपने पिता की जो राइटिंग थी उसको एडिट करते थे 11 साल की आयु में एडिट करते थे और उन्होंने सीख लिया किताबों को कैसे छापना प्रूफ फीलिंग कैसे करना। 11 साल की आयु में भक्ति से नाराजी ने भी पिता के आदेश के अनुसार ग्रंथों के अनुवाद पर बहुत बढ़िया। उन्होंने 60 से अधिक ग्रंथों की रचना की अंग्रेजी भाषा में, बंगला में, उन्होंने दक्षिण भारत के सिद्धांतों का अनुवाद किया बंगला भाषा में। और उन्होंने 4 प्रिंटिंग प्रेस खोले थे वो उनको बुला मद्रास में, 1 कटक में 3 खुले थे, 4 कई जगह 4 लगा वो अपने भक्तों को भेजते थे को बाटने के लिए और प्रापा जी कह रहे थे उनके शिष्य लौटते थे 2 पैसे के साथ, 4 पैसे के साथ वो खुश होते थे उन्होंने योजना शुरू करवाई और उन्होंने 7 पत्रिका थी जिनके वो एलिजर थे और अंग्रेजी में हार्ड मोनिस्ट सजन तोषी के नाम पर छपी थी अंग्रेजी में हार्ड निस्ट नाम पर। भक्ती सिधांदरसरधवती ठाकुर 1932 में आए थे बॉम्बे में बोरियम केंद्र की स्थापना करने के लिए और प्रापा जी ने उनके गुरु भाइयों की को सहयोग दिया था। वहाँ के मंदिर की स्थापना में भक्ति बॉम्बे आये। 1932 में उनके सन्यासी शिशु ने कहा अब बाबू ने इतनी मदद की है। हमें लगता है कि आपको यहाँ उनको का प्रेजिडेंट बना देना चाहिए। जहाँ वो है, समय आने पर वो ठीक करेंगे। तो इस पर भक्त ने अपने उन्होंने 3 केंद्र विदेश में भी खोले। 1 जर्मनी में, बर्मा में, इंग्लैंड में, ज्यादा देर नहीं चल पाए। उन्होंने अपने सन्यासी शिष्यों को भेजा पश्चिमी देशों में प्रचार करने के लिए और बिना सफलता के उन्हें लौटना पड़ा। उन्होंने युक्त विराजा का सिद्धांत की स्थापना की। स्वामी युवराज कहते हैं असली विराग्य वो है, जबकि आभारी योग्यता हर सुविधा का उपयोग करो भगवान की सेवा में। भक्ति सिधांत जी पहले महान कार्य थे हमारे सम्प्रदाय में, जो मोटर में भी बैठे हैं, मीन ठाकुर कभी मोटर में भी नहीं बैठे थे। पहले पहले आचार्य थे जिन्होंने अपने शिष्यों को स्टिच क्लोज सीओ। 1 कपड़े पहनने का अधिकार दिया। और पहले अचार्य थे जिन्होंने अपने भक्तों को सागर के पार भेजा। दिन में सागर के पास जाना भी बड़ा अपराध माना जाता था। विदेश जाने की योजना बनाते थे। भक्त स्वामी सागर के पास जाना चाहता है क्या अपराध और बाकी योगपेट खोजा और स्थापित किया भक्ति ठाकुर ने। और भक्ति सिधानदजीनेयोगापित में जो बड़ा मंदिर है, उन्होंने बनवाया और चौसठ मंदिर बनाये। पूरे भारत में। और भक्ती सिधानी इतना प्रभाव था की उस योग पीर मंदिर के उद्घाटन के लिए ब्रिटिश सरकार का वाइसरोय राज्यपाल कैलकटा में वो आया। मायापुर उस शुभ अवसर पर उपस्थित होने के। इस प्रकार भक्ति सिदादाजीनेउले जो पिता ने कार्य शुरू किया था, उसको आगे बढाया और शुद्ध कृष्ण भक्ति की स्थापना की। 1936 में पापाजी ने बॉम्बे से 1 पत्र लिखा। बाबा जी ने भक्ति से रानी को लिखा ये आपके इतने शिष्य हैं जो आपकी इतनी सेवा कर रहे हैं और मैं आपके लिए कुछ नहीं कर रहा। मुझे कोई आदेश दीजिये या सेवा करने को और वगदीसिरनानेउत्तर दिया उनके संसार से प्रगट होने से। 2 हफ्ते पहले ने कहा वही कहा जो की उन्होंने 1922 में पहली मुलाकात में कहा था कि तुम पड़े लिखे युवक हो, अंग्रेजी अच्छी बोलते हो ले जाओ चेतना सन्देश को पश्चिम देशों और उसके बच्चों से बाहर वो प्रगट हो गए। मेराबाजी किसी ने पूछा 1 समय आप भक्ति कुछ ही पापाजी ने कहा वट कैन आई से बाइकुंथामैनमैं क्या बोल सकता हूँ? तो प्रापी ने हमेशा गुरु के आदेश को अपने सामने रखा। रापाजीभागोदमको डेडिकेट करते हैं, उनके गुरु को कहते हैं बाई माइन इंस्ट्रक्शंस एंड फॉलो, लिलि वापू और वानी वापू से कहा जाता है। यह माना जाता है क्यूंकि मानसन प्रकट होता है, पृथ्वी पर रहता है, और वानी उनकी शिक्षा। जैसे पापाजी ने कहा है। वानी वापू से ज्यादा महत्वपूर्ण और बाकी सिनाद ने ऐसे आदेश को कई शि सब शीशों को दिया था। 1 गवर्निंग बॉर्डी कमीशन बनाओ और किस प्रकार संस्था को चलाना चाहिए। और ने कई कारण उसका पालन नहीं किया। पापा जी ने हमें भक्ति सिनाद शुद्ध सन्देश से परिचय दिया है। पापाजी ने वो ही सन्देश दिया कि उनके गुरु ने दिया। तो आज भक्ती सिनाद हमे इस शुभ अवसर पर उनके शरणागत होकर उनसे ये भीग मांगनी चाहिए या यह भी उनकी कृपा से उनकी शिक्षा का पालन करे। क्योंकि प्रापा द्वारा हमें प्राप्त हो रहा है। हमें देर होकर भक्ति में जुड़े और उनकी प्रशंसा के लिए अम्मी अधिक से अधिक मात्र में क्या करें। बड़े खुश होते थे, लौटते थे यह सूचना जब वो खुश होते थे 2 दिन से आप से, तो बहुत खुश होंगे आज उनका तिरभावसीथीहै, हम सबको उनके चरन कमल में प्रणाम करके उनकी कृपा की भी मांग अगतीसिदसधवदीठाकुर की अकी साधवदीठाकुर की कृष्णा है। okay कोई queston है इस गाड़ी पर किसका क्वेशन महाराज जैसे हम ये पास टाइम सुनते है महाराज का कि न्होंने, 10 साल तक जप किया, सौ करोड। तो कभी कभी हमारे मन में भी ऐसा आता है कि हम भी पहले अच्छा जप करे, अध्ययन करें, सारे, ग्रंथों को पढ़ लें और फिर हम जाके सेवा करें, अच्छी तरह से कर सकते हो। वैसे भी दोनों साथ साथ कर सकते हो, सेवा भी करो, अध्ययन में करो। पापाजी ने ऐसे कहा दोनों साथ साथ करो। जैसे आजकल लोग नौकरी भी करते हैं और पढ़ाई भी करते हैं। तो सेवा भी करो और शासन का अध्ययन भी करो। सुबह क्लास शाम को क्लास और दिन में सेवा। पापाजी ने कहा दिस इज डिवोशनल सेनवेट ओके ओके भक्ति सिनाद सरस्वती। ठाकुर की खुशी के लिए, प्रावाद की खुशी के लिये हमें मरतन करना चाहिए की सिनांदाजीकीइच्छा की थी परिदों का उधार हो, बाकि ने ठाकुर के इच्छा के आदि परिदों का उधारण हो, वहाँ प्रभु की इच्छा के आदि परिदों का उधार हो। और प्रावाजीकीगोई इच्छा थी ये जो प्रचार की सेवा है, रातों के वेतन की सेवा है। यह हमारे आचार्यों के आदेश के अनुसार उनकी प्रशंसा के लिए हम करते है। o g ha krishna हाई क्रिष्णा हाई क्रिस हाल हाल हाल नाम राहल हाल।
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