तपस्या और शुद्ध भक्तों की सेवा करना क्यों जरूरी है? | 09 May 2008 | New Delhi | Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

यह व्याख्यान गोकुल के स्वामी जी (गोपाल कृष्ण गोस्वामी) द्वारा शुद्ध (शुद्ध) भक्तों की सेवा के महत्व को स्पष्ट करता है। मुख्य बिंदु यह है कि शुद्ध भक्त वे होते हैं जो सभी भौतिक आकर्षणों से मुक्त होते हैं और निष्काम भाव से भगवान की सेवा करते हैं। उनकी संगत और सेवा करने से श्रोताओं में भगवान के प्रति आकर्षण, भक्ति‑भाषण सुनने की इच्छा, और आध्यात्मिक उन्नति बढ़ती है। व्याख्यान में भागवत के पाँचवें स्कंध के श्लोकों, गीता, और अन्य शास्त्रों के उद्धरणों के माध्यम से शुद्ध भक्तों की विशेषताओं, उनके प्रति आदर, और उनके साथ तपस्या‑परायण जीवन जीने के लाभों को स्थापित किया गया है। यह बताया गया कि शुद्ध भक्तों की संगत (साधु‑संगत) से मन के नकारात्मक प्रवृत्तियों (काम, क्रोध, लोभ) का नाश होता है तथा भजन‑जाप, सेवा‑भाव, और शास्त्र‑अनुसार तपस्या को अपनाने से आत्मा का शुद्धिकरण होता है। व्याख्यान में व्यावहारिक सलाह भी दी गई है कि यदि कोई शुद्ध भक्त न मिले तो भी ऐसे व्यक्ति की संगत को अपनाया जा सकता है जो शुद्ध भक्तों के सिद्धांतों को पालन करता हो। अंत में श्रद्धा, भजन‑क्रिया, और शुद्ध साधु की संगत के परिणामों को स्पष्ट किया गया, जिससे श्रोताओं को आध्यात्मिक परिवर्तन के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन मिलता है।
Chapters
हाई कृश्णा श्रोता को स्वामी जी कहते हैं कि शुद्ध भक्तों की सेवा करके और शुद्ध भक्तों का क्या लक्षण है कि वह हर प्रकार के भौतिक आकर्षण से मुक्त हैं। आप शुद्ध भक्तों की सेवा करके भगवान के प्रति आपका आकर्षण बढ़ता है और भगवान का सन्देश सुनने में रुचि बढ़ती है। और कि जो भगवान के शुद्ध भक्त हैं जो की निष्काम भाव से सेवा कर रहे हैं अगर हमें उनकी सेवा का मौका मिले तो उसके द्वारा का आध्यात्मिक आकर्षण बढ़ सकता है। और आगे प्रापर्जीइसलोकेतारपरी में ये भी कह रहे हैं कि भगवान के जो शुद्ध भक्त हैं उन्हें परम भगवान जैसा आदर दिया जाता है यह महात्मा हैं पर इसका यह अर्थ नहीं कि ये दावा करते हैं को स्वयं भगवान है। हालांकि आप भगवान के शुद्ध भक्तों का आदर 2 कभी ये स्वीकार नहीं करते की वो भगवान के अवतार हैं। तो इस विषय चर्चा भगवान भक्त हैं वो इस पृथ्वी पर आते हैं भगवान के सन्देश को आगे बढ़ाने के लिए। इस विषय में रूपक गोस्वामी जी ने कहा है 5 वेगम मनसक्रोधवेगम जीव, वेगम उदार वेगम रूपक गो स्वामी जी उपदेश देते हैं कि किस प्रकार शुद्ध भक्त वह है जिसमें हर प्रकार के मन और इंडिया पर पूरा तो प्रपोज का यह प्रवचन आरम्भ होता है पांचवें स्कंद के स्लो के उपयोग के द्वारा महत् सेवन देवम हुम मुक्त। तो ये श्लोक है भागवत के पांचवें स्कंद के पांचवे दिखाई से जिसमे भगवान विश्व देव जी शिक्षा दे रहे हैं। विश्व देव जी ने अपने सौ पुत्रों को दिव्यज्ञान प्रदान किया और पाजी ने अनेक समय देव जी की शिक्षा के ऊपर उपदेश दिया है। महाशिव तो विश्व देव जी कह रहे हैं इससे पहले 1 श्लोक था आयम देहा देहा बाज लोग के उस लोक में रिशलदेवजीनेयथापित किया है कि हमें एस का उपयोग इसका उपयोग करना चाहिए लिए तपो दिव्यम पुत्र का यह सम हमें इस जीवन का उपयोग करना चाहिए। तपस्या की प्राप्ति तपस्या के पालन के लिए। और तपस्या का क्या अर्थ है कि वो कार्य जो की शास्त्र के अनुसार हो भगवत प्राप्ति के लिए। तो दिव्यम पुत्र का ऋि्रदेवजीनेबड़े सी कहा है की हमें तपस्या का पालन करना चाहिए और भगवान की खुशी के लिए प्रेशर देव जी ने स्पष्ट कहा है। तो दिव्य पत्रकार की यह तपस्या आपको करनी चाहिए भगवत प्राप्ति को लक्ष्य बनाये हुए है और इस के पश्चात रिशवदेव जी कहते हैं की हमें महात्माओं की सेवा करनी चाहिए। तो ये विचार कि हमें भगवान के शुद्ध भक्तों की सेवा करनी चाहिए, महात्माओं की सेवा करना करना चाहिए। इस पेशे की चर्चा अगर देखो ध्यान से तो नेक श्लोकों में की गई है। ये पहला श्लोक नहीं यहाँ की इस विषय पर बल दिया जा रहा है। और फिर आगे ये भी कहते हैं की देवी प्रकृति की जो महात्मा हैं वो सदा देवी प्रकृति के प्रभाव में रहते हैं। तो प्रश्न ये आप उठा सकते हो की क्या कारण है कि इस विषय पर बल दिया जाता है कि भक्तों की संगत प्राप्त करो उनकी सेवा करो। क्या कारण हैं और गीता में भी इस विषय की चर्चा है। भागवत में भी है। चेतन में इस विषय पर कहा गया है साधु संगत, साधु संघ सर्व लावा मात्र साधु संघ, सर्व सिटी के लावा मात्र लाभ मात्र 1 सेकेंड का चौदहवा हिस्सा। अगर आपको 1 सेकेंड के छोटे से हिस्से के लिए भी भगवान के शुद्ध भक्त की संगत मिले तो आपका जीवन सफल हो सकता। इसका अर्थ क्या है? इसका यह है अगर आप महात्माओं की सेवा में रहोगे तो महात्माओं का 1 ही विचार रहता है। वो क्या है दिन रात पर भगवान का गुणगान करना। और अगर किसी को मिलते भी हैं तो उनके मन में 1 ही भाव रहता है कि किसी प्रकार से दूसरे व्यक्ति को जोड़ा जाए। भगवान की भक्ति में में कहा गया है जैसे बादल से बारिश बरसती है, हर स्थान में चाहे पहाड़ हो, चाहे सागर हो, चाहे खेती हो, उसी प्रकार शुद्ध भक्त का यह भाव रहता है कि हर व्यक्ति को भगवान की सेवा में जोड़ा जाए। यह नहीं कि शुद्ध भक्त ये कहेगा, ये सोचेगा मुझे, इसे क्या लाभ। मिलेगा। मुझे फायदा उठाने 2 स्वामी जी, ग्रंथ में केवल 11 श्लोक है, बर हर श्लोक का बड़ा गहरा महत्वूर्ण संदेश है। इसलिए देखते हो की हर लोक के साथ 678 पेट का तार दिया। उपदेश जी कहते हैं की जो भी व्यक्ति हरी नाम ले रहा है, उसे तो कई बार लोग हरी नाम लेते हैं और शराब भी पीते हैं, नाम लेते हैं, सिगरेट पीते है, नाम ले रहे हैं और छापरुसीभारसेजुड़े हैं, कम से कम है, नाम तो ले रहे हैं। तो उन्हें आप आदर दीजिए और फिर आप देखते हो। कई लोग ग्रामीण दिक्षित हैं, सेवा में लगे हैं, उनको प्रणाम करो और संगत रखो। उनकी जो की निष्काम भाव से भगवान की सेवा में जुड़े हैं। तो आदर हम सबको देते हैं। ऐसे तो चीटी को भी देते हैं आदर और बरखासकरकेअगरकईहरी नाम का उ्चालनकररहाहैतो, उसे आदर 2 और नाम करो उसे जो ठाकुर सेवा कर रहा है। भगवान की सेवा में जुड़ के ऐसी संगत प्राप्त करो, सेवा करो उस व्यक्ति की जो की काम भर से भगवान की सेवा में जुड़ा है। तो प्रापा जी ये स्थापित करते हैं पांचवे स्कन्द के लोक के द्वारा। क्योंकि 5 इस श्लोक का संदेश और जो जो पढ़ रहे है तो मूल रूप से 1 ही संदेश है कि अगर आप आध्यात्मिक परिवर्तन करना चाहते हो तो शुद्ध भक्तों की संगत का लाभ उठाओ। कई बार भक्तों के मन में विचार आता है की हमे कोई शुद्ध भक्त मिल रहा ही नहीं है, मैं किसकी संगत लो। बेशक कोई शुद्ध भक्त स्वयं नहीं हो, पर अगर वो शुद्ध भक्त की शिक्षा का पालन कर रहा है, शुद्ध भक्त के संदेश को आगे प्रचार कर रहा है तो उसकी संगत प्राप्त करने से आप आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ सकेगे। मान लो कोई नया भक्त हैं, आपका गे है, नया भक्त, भक्त थोड़ी है, वो नया भक्त अपना आचरण बिल्कुल शासन के आधार पर रख रहा है। और जब प्रचार करता है तो वो ही सन्देश दे रहा है जो की पूर्व गुरु परंपरा में आ रहा है तो फिर उसकी संगत से भी आपको लाभ आ सकता है। दूसरे शब्दों में, भगवान के संदेश में पूरी ताकत है और किसी माध्यम से भी आपको संदेश शुद्ध रूप से प्राप्त हो और आप उसका लाभ उठाओ। आम का अध्यातिक परिवर्तन हो सकता है जैसे की आप भागवत में पढते हो की जब विष्णदेव शरीर को त्याग रहे थे, उन्हें यह वर प्राप्त हुआ था कि वो चुन सकते थे अपनी मृत्यु के समय और गुरु के पश्चात जब ये मारा राज्य बने, उसके पश्चात उन्होंने निर्णय कर लिया था और उनका क्या सौभाग्य था। भगवान स्वयं उनके समक्ष उपस्थित थे, केवल परम भगवान नहीं सारे देवता भाई और सबके चरण कमलों का दर्शन। भगवान के चरण कमलों का दर्शन करते हुए भीष्म देव ने अपने शरीर को त्यागा। तो अगर आप से पूछा जाए आप में से किन किन की इच्छा है के शरीर त्याग के हवे स्वयं भगवान आपके समक्ष खड़े रहे और आप को त्याग हो और मेरे ख्याल से आप सब हाथ उठा कर क्या कहोगे हमारी यह इच्छा है? और आप आगे पूछा जाय की आप में ऐसी कौन कौन सोचते हो की भगवान स्वयं जरुर आयेंगे पांडव भाइयों के साथ प्यार देवकेस कितने उठायेंगे पापा जी इस विषय की चर्चा करते हैं इस अध्याय में। और प्रॉपर जी कहते है यू कैन द सेम आपको वो ही लाभ पहुंच सकता है जो विषम देवजी को प्राप्त हुआ था। अगर आप शरीर त्यागते समय हरी नाम का श्रवण कर रहे हो और भागवत गीता का और भागवत का अगर हम शुद्ध भक्तों की सेवा करेंगे तो उसके द्वारा भागवत कथा सुनने में रुचि बढेगी। सेवा करने का क्या अर्थ? सेवा करने का अर्थ है उनके संदेश का भी पालन करना। यह नहीं कि हम केवल 1 अच्छी ना दे और संदेश का पालन नहीं करे। कई बार हम सोचते है की अच्छा कुछ गिफ्ट दे दे या हार चढ़ा दे तो भगवान कृष्ण भक्तों को के द्वारा हमारा उदाहरण असल में हमें उनके सन्देश का पालन करना चाहिए जैसे की हजारों लोग कहेंगे हाँ भगवान कृष्ण के भक्त हैं। पर अगर देखा जाए ध्यान से उनके सन्देश का पालन नहीं कर रहे। तो जब शास्त्र में कहा गया जाता है महज सेवा, शुद्ध भक्तों की संगत का लाभ उठाओ तो उसका यह अर्थ भी समझा जाता है कि आप शुद्ध भक्तों का जो संदेश है उसका पालन करोगे और उसका करोगे। तो फिर पूरा लाभ नहीं उठा सकोगे। तो प्रापा जी इसी विषय पर आगे कहते हैं कि किया वो जो श्रद्धा तथा साधु। तो पापाजी इस विषय की चर्चा कर रहे हैं। किस प्रकार हमारे हृदय में श्रद्धा होनी चाहिए? श्रद्धा का क्या परिणाम होता है? भगवान हरि के हृदय में विराजमान, सर्वोच्च ो माता ज्ञान, पाना हरे के हृदय में राज मन है। हमें बुद्धि दे रहे हैं हमारी इच्छाओं के अनुसार। और जब आपको शुद्ध साधु की संगत प्राप्त होती है तो साथ में क्या सन्देश मिलता है? भजकियबजनयकिया का अर्थ है नियमों का पालन करना, जाप करना, इत्यादि और जब आप भजन क्रिया का पालन करोगे, तो क्या प्राप्त होगा, क्या लाभ होगा। अनार्थ में वृद्धि, काम, क्रोध, लो, वो मन का जो प्रभाव है, वो घटता जाएगा। हाई कृष्ण, हारे क्रिश्ना, हारे किशना, क्रिश्ना, हारे, हारे, हारे हहहलेनमारहाल हरे।
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