क्या सच में कर्मों के आधार पर भविष्य तय होता है | 11 Dec 1994 | Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

In this extensive Hindi discourse, the speaker (identified as Speaker A) presents the Bhagavad Gita as a timeless, universal guide whose teachings transcend language, culture, and era. He notes that the Gita has been translated into more than a hundred languages, including Chinese, Russian and French, and is studied worldwide not only by devotees but also by secular students seeking knowledge. The core message of the Gita is described as a doctrine of karma: every action determines future outcomes, both in this life and in subsequent incarnations. The talk outlines the ancient chronology of yugas—Dvāpara, Kali, and earlier epochs such as Dvāra‑yoga and Trītya‑yoga—emphasising that the Gita’s wisdom is millions of years old, far older than the commonly cited 5,000‑year age of the Mahabharata. The speaker explains the nature of the soul (ātma) as an eternal, immutable essence that merely dons and discards bodies like clothing, using vivid analogies of trees, animals, and humans. He stresses that the soul is a fragment of the Supreme Lord Krishna, and that recognizing this identity leads to proper conduct. The lecture then moves to practical guidance: regular chanting of the divine name (Hare Krishna, Hare Ram, etc.) is presented as the most effective means to purify karma and attain spiritual progress. The speaker critiques contemporary skepticism, especially among Indian youth who claim the Gita has no place in modern life, arguing that its teachings are fundamentally educational—providing moral, philosophical, and psychological tools for navigating pleasure, pain, and duty. Throughout, the speaker interweaves stories of ancient sages, references to scriptural passages, and modern examples (e.g., the role of education, the impact of wealth, the illusion of Maya) to illustrate how the Gita’s principles apply to everyday decisions, health, social responsibilities, and the ultimate goal of reaching the divine realm. The talk concludes with a call to adopt the chanting practice, study the Gita earnestly, and recognize the divine presence in all aspects of life.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेव, ओम नमो भगवते वासुदेव, म नमो भगवते वासुदेवाय। गीता, खेतों आप सब का परिचय है। सारे विश्व में आज लोगों का गीता से परिचय है। भक्तिन स्वामी पापाजी ने भगवत गीता का नमन किया जिसको भगवत गीता के नाम से प्रकाशित किया गया है। और भगवत गीता का आगे विश्व की सौ से अधिक अंतरराष् भाषा में अनुवाद हो गया है। आज भागवत गीता को चीन भाषा में प्राप्त कर सकते हो, रूसी भाषा में, फ्रेंच भाषा में कोई भाषा नहीं है जिसमें आप नहीं कर सकते। और सब भाषा में लोग गीता को बहुत सावधानी से पढ़ रहे हैं। बड़े बड़े महा विद्यालय है, पाठशालय है। आपको गीत प्राप्त होगी। तो क्या कारण है? गीता का जो उपदेश है पुरे मानव समाज के हैं। भगवान कहते हैं गीता में पिता मैं हूँ सब का पिता। तो जैसे की हर व्यक्ति के 1 माता और पिता होते हैं। और इन सब के पीछे भी किसी का हाथ होता है। तो भागवत गीता का जो उद्देश्य है, ये पुरे मानव समाज के लिए है। आप परसों हम लोग गीता जयंती मनाने जा रहे है। आपने सुना होगा। तो गीता जयंती का तो अर्थ यह है वो दिन जब कि गीता की शिक्षा ने जन्म लिया हो। ठीक है न, वही अर्थ होता है। कोई व्यक्ति जन्म लेता है तो हम सोचते है गीता के उपदेश्य ने जन्म लिया युद्ध में, आज से लगभग 5000 साल पूर्व, क्या ये सत्य है? हाँ सत्य है बस जाना नहीं क्यूँकी गीता का जो उद्देश्य है, यह तो सनातन उदेश्य है। अगर आप गहराई से देखो तो गीता भगवान कहते हैं मैंने ज्ञान सबसे पहले दिया था किससे विवाह स्वान, स्वामी, विवाह स्वान को, सूर्य स्वामी, विवाह स्वान को देश दिया था। साल पहले करोड़ साल पहले 12 करोड़ आप गिन भी नहीं सकते, 12 करोड़ सूर्य के देव स्वामी है। जैसे की हमारे देश में प्रधान मंत्री हैं, जिन्हें के नाम से बुलाया जाता है, विवान से सन्देश आया, से से। मनु के बड़े राजा थे और उनके खानदान में ही बाद में रामचन्द्र जी आये। भगवान के अवतार और महाभारत में कहा गया है कि महाराज को को यह संदेश दिया था इस पृथ्वी पर। लगभग 20 साल पहले मैं कल युग में जी रहे हैं और कल युग के लगभग 5000 साल बीत चुके हैं। पर कल युग से पहले 1 और योग था जिसका नाम था दवा योग जो लगभग 8 लाख साल तक चला था और उससे पहले 1 और योग था जिसे हम कहते हैं त्रित योग जो लगभग 12 लाख साल चला था। तो इस पृथ्वी में भी यह ज्ञान जो है 20 लाख साल से अधिक पुराना है। तो यह कहना की ये सोचना की गीता का उदेश्य केवल 5000 साल पूर्व है। यह सत्य है और सत्य नहीं भी है। गहराई से देखा जाए तो सत्य नहीं है क्यूँ की असल में गीता का जो उपदेश है 12 करोड़ साल पुराना है। तो गीता के उपदेश आज भी लोग क्यूँ पढ़ते है। हमारे इस देश के नौजवान लोग कहते हैं स्वामी जी आधुनिक युग में गीता के का कोई खास स्थान नहीं है। यह हमारी भूमि है। गीता का जो सन्देश है, विश्व के हर व्यक्ति के लिए है। यह केवल धार्मिक सन्देश नहीं, ज्ञान का सन्देश है, शिक्षा है। हम 5 साल में जाते है, महा विद्यालय में जाते हैं। किस लिए? शिक्षा स्वीकार करने के लिए। तो गीता का भी जो अध्ययन हो रहा है, सारे विश्व में केवल भक्तों द्वारा नहीं, लोग गीता को पढ़ते है क्यूँ? क्यूँकि गीता के द्वारा उन्हें शिक्षा मिलती है? क्या शिक्षा? सबसे पहले तो गीता के द्वारा हम यह समझते हैं कि सर्व श्रेष्ठ भगवान श्री कृष्ण है, ये सोचना की भगवान का कोई स्थान नहीं है, ये बहुत भारी फूल। भगवान के कारण ही श्रृष्टि का निर्माण होता है, श्रेष्ठी का पालन होता है आप और हम जीत सकते हैं आप और हम सास ले सकते है। तो गीता में कहा गया है जो देवता देवियां हैं वो भी परम भगवान के अधीन है और सर्वश्रेष्ठ कौन है परम भगवान श्री कृष्ण, आपके हरियाणा में तो सब हरी के ही भक्त है। लोग कहते है की हरियाणा का, हर की भूमि। तो यही बात गीता में स्थापित की जाती है की भगवान सुकेशन सर्व श्रेष्ठ है। फिर गीता में यह भी बताया जाता है की हम जीव, आत्मा कौन है आप और हम कौन हैं? हम हैं भगवान के अंश। जिस प्रकार हमारे शरीर में अनेक अंग है, हाथ, पाव कान नाक नहीं। और ये सारे जो अंग हैं, उन्हें शरीर के भाग्य माने जाते है, माना जाता है। तो उसी प्रकार हम सब जो हैं परम भगवान के अभिन्न अंश हैं। और हमारा असली। स्वरुप यह है की आत्मा जिससे सनातन माना जाता है। और अगर आप किसी भौतिक वस्त्र द्वारा देखना चाहो, मापना चाहो तो ये सदा असम्भव रहेगा। पर आत्मा का अंदाजा से माप है, जो है की आपके बाल के कोने का 10 हजार स और गीता में बड़ा सुन्दर उदाहरण दिया गया है। वो यह है कि जिस प्रकार आप अपने पुराने वस्त्रो को त्याग कर नए वस्त्र स्वीकार करते हो, उसी प्रकार यह है। इसी प्रकार यह आत्मा 1 देह को त्याग कर नया दहेज स्वीकार करती है। तो आत्मा सनातन है, शरीर उसको ढक रहा है। या सर्दी के मौसम में अब ज्यादा वस्त्र पहनते हैं शरीर को ढकने के लिए, तो उसी प्रकार शरीर आत्मा को ढकना है। शरीर जो है इसके अनेक नमूने हैं। आप जानते हो की जो पेड़ है वो भी 1 शरीर है। और इस पेड़ में भी आत्मा है, पेड़ जो है, नंगा खड़ा है, उसका जो शरीर है, उसको आप ढगते भी नहीं। तो अनेक यूनियन हैं, अनेक प्रकार के दे है, कई हैं जो जल की योनी में रहते हैं, जल में रहते हैं, लगभग 9 लाख योनियां हैं, फिर कई हैं जो पृथ्वी पर रहते हैं, पर चल नहीं सकते। कौन पृथ्वी में रहता? जो चल नहीं सकता, पेड़, पौधा, फूल, उन सब में आत्मा है, जीवन है और वो चल नहीं सकता। आगे कीड़े की दुनिया है पक्षी की की और इन सब की योनियों में गुजरने के पश्चात मानव यानी प्राप्त होती है। इसलिए शास्त्र में कहा गया है हे मानव, शरीर प्राप्त हुआ है, इसका तुम दुरुपयोग मत करो और इसका तुम सदुपयोग करो। दुरुपयोग का अर्थ है कि यह जीवन का उपयोग करते हैं। परसों के समान। आप सब घर में बेशक परशु नहीं पालते। सड़क में तो पर्चों को देखते ही हो। और अगर आप ध्यान से देखो तो पी के जीवन में यह अनुभव होता है। क्या सारा सारा दिन चले जाता है खाने की तलाश में, जो कुत्ते विदों को रास्ते में देखते हो, सारा दिन घूमते रहते हैं, उनकी कुछ भोजन की तलाश में खाना पीना, सोना, भोग विलास के लावा, उनकी बुद्धि आगे काम ही निकलती। तो उसी प्रकार अगर हम मानव जीवन की प्राप्ति के पश्चात यही 4 प्रकार के कार्य में लिए हो जायेंगे। तो शास्त्र की दृष्टि से, इस देह में और पक्ष की देह में कोई अंतर नहीं माना जाता। तो इसलिए भागवत गीता का निर्णय यह है की हमें बड़े सावधानी से के साथ हर कार्य करना चाहिए। क्यूँकी हम हमारे भविष्य की तैयारी कर सके? जिस प्रकार विद्यार्थी पढ़ता है भविष्य में अच्छे नंबर के साथ पास होने के लिए, तो हम सब की परीक्षा ली जाती है। मृत्यु के समय। क्यूँकी ये मानव जीवन तो 1 जंक्शन के बराबर है, क्षेत्र जंक्शन स्टेशन नहीं है, है ना? तो जंक्शन नहीं है पर बाला, अमृतसर, दल्ली ये सब जंक्शन है। जंक्शन में क्या होता है? 1 गाड़ी समझो कैलकड़ाऐसीदिल्ली आती है पर ये अवश्य नहीं की वो गाड़ी वापस कैल कड़ा जाएगी। वो स्टेशन मास्टर व आगे साइन बदल देता है। अब ये गाड़ी जाएगी। अमृतसर अब यह गाड़ी जाएगी। बॉम्बे अब जाएगी। असम ठीक है। जंक्शन में यह निश्चित किया जाता है। तो इसी प्रकार ये जो मानव देह आपने हमने प्राप्त किया, यह भी 1 जैक्शन है। इस देश के कार्य के द्वारा। ये निर्णय होगा कि किस आगे हम कहाँ जायेंगे। हम जायेंगे देवताओं के पास यह मानव सनी प्राप्त होगा। यहाँ वापस कुत्ते बिल्ली बनेंगे या कोई और योनी में जन्म प्राप्त करेंगे ये हमारे कर्मो के आधार पर निश्चित होगा। आप कहोगे स्वामी जी में, बेकार में सब साधु लोग ऐसे डरा देते हैं। बताओ क्या? क्या सबूत है कि आत्मा है क्या कोई मृत्यु के बाद लौटे आपको? ये बताने के लिए कहा गया है की ये ज्ञान हमें शास्त्रों द्वारा प्राप्त होता है। शास्त्रों का क्या अर्थ भगवान की वाणी आपकी, हमारी वाणी नहीं, भगवान की वाणी आपकी और हमारी वाणी और भगवान की वाणी में 1 महान अंतर है। क्या है हमारी वाणी में दोष है, पर दोस्त प्राप्त होते हैं। क्या है ये दोस्त? 12 यह है की हम सब गलती करते है में कहते है तो ह्यूमन गलती करना, ये तो वास्तविक कार्य है। हर व्यक्ति गलती करता है। आप चाहे प्रधान, मंत्री को लेलो, किसको लेलो, फिर सब दूध को छलने की प्रयास करते हैं। क्या समस्या का हल नहीं है हमारे पास, पर प्रवचन दे देंगे हम कल हमारी समस्या को हल कर देते है। हमारे विज्ञान भी कहते रहते हैं। हमें धन देते जाओ, रिसर्च के लिए समस्या का करेंगे तो ये दूसरे को छलने की इच्छा है। फिर हमारे पूर्ण है इतनी सूर्य की रोशनी के बिना आप और हम 1 दूसरे को देख भी नहीं सकते। तो भ्रम है हम शाम को री समझ लेते हैं, रस को शाम मान लेते है। हम सोचते हैं ये शरीर असली है आत्मा। और ये तो किसकी कल्पना है ये तो नकली कहानी है। तो परम भगवान की शिक्षा में कोई पुणता नहीं है। आप। क्या कोई इतिहास में कोई किताब है जो की 12 करोड़ साल से लोग पढ़ते आ रहे हैं। कोई शिक्षा है जो 12 करोड़ छोड़ो क्या जो 2000 साल से ज्यादा पढ़ते है रहे हैं? नहीं, कोई शिक्षा नहीं है। क्यूँकी साधारण शिक्षा जो है हम आज किताब पढ़ते है। आज बात पढ़ते है, कल वापस फेंक देते हैं। तो शास्त्र में कहा गया है के के आधार पर हमारा भविष्य निश्चित होता है। इसलिए कहा गया है की हमें सदुपयोग करना चाहिए। और क्या साधन है भगवान के भजन के द्वारा। 1 महान संत ठाकुर भक्ति विरोध के भक्ति संप्रदाय में 1 बड़े महान चार्य थे, ब्रिटिश सरकार के समय वो मैजिस्ट्रेट थे जब अंग्रेजों का राज्य था। भारतीय लोगों को ऊँची जिम्मेदारी नहीं दी जाती थी, सबसे ऊँची जिम्मेदारी जो प्राप्त होती थी वो थी मैजिस्ट्रेट की, तो उन 2 तो मै तो बरसात में भगवान के प्रसिध थे, उन्होंने 1 बहुत ही सुन्दर प्रार्थना लिखी है जिसका हम सुना बड़ा मधुर उपदेश है। मधुर खोले हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम घोर घोर से कुरंगा महाप्रभु चेतना महाप्रभुजी पर भगवान के और है भगवान दादा धर्म, नारी। भारत अलग अलग समय में अपसारित होते हैं। साधु धर्म के नियमों की स्थापना करे। तो इसी प्रकार भगवान 500 साल पहले के रूप में और उनका आदेश था क्या कलयुग में, अध्यात्म में अधिकतर लोग रुचि नहीं लेते। तो प्राप्ति का सरल साधन क्या है। ये हर नाम का करो। तो जी कहते हैं कि महाप्रभु जी बड़े मधुर रूप ऐसी हर नाम का उचारण करते हुए वो गुजर रहे है, जा रहे है। आगे कहते है ो वे जो प्रार्थना है सरल बंगाली भाषा में है। तो वे ठाकुर अरे भाई तुम प्रिया तो आश्रम में हो। यह सन्यास आश्रम या ब्रह्मचारी आश्रम कुछ फर्क नहीं पड़ता। हर नाम को दी के साथ जरूर जोड़ो। समाज का विभाजन चल वरना और 4 आश्रमों में किया जाता है। कि ब्रह्मचारी सन्यास, इसे तो आश्रम बुलाया जाता है और ब्रामण उन्हें कहा जाता है। वरना तो जैसा की आप सब गृहस्थ आश्रम में हो, लगभग 2 यहाँ उपस्थित हो। तो कहते हैं ठाकुर भक्ति अगर तुम गरिहस्ताआश्रममें भी हो, कुछ पानी नहीं है। हर नाम हर नाम का तुम उच्चारन करो, चाहे किसी भी आश्रम में क्यूँ न हो। सुखे दुखे बोले न सुख में और दुख में दोनो स्थिति में तुम हरी नाम को जरूर अपनाओ। अक्सर हमारा ये अनुभव है की जब हम सुख स्थिति में होते है तो हम भगवान का स्मरण नहीं करते। ठीक है न, बहुत धन आ जाता है तो भगवान के लिए समय नहीं रहता। क्यूँ धन हमें अंधा बना देता है? कैसे हम धन से जो हमें चाहिए प्राप्त हो जाएगा। तो हमें क्या चिंता है। सुख में हम भगवान को भूल जाते है। इसलिए कहा गया है डिक रिच मैन टू गो टू द किंगडम ऑफ गॉड एलिपेंटटोपासटो दी गई। बाइबल में कहा गया है जैसे सी नहीं सकते उसी प्रकार धनी भगवान के लौटना बहुत मुश्किल है। क्यूँकी हम सब में होते है तो हम भूल जाते हैं। भगवान को न जी कहते है। दुख दुख में या दुख में दोनो ही स्थितियों में भगवान का स्मरण जरूर करो। भगवान के नाम को आप जरुर रखना। इसलिए भगवान के जो भक्त होते हैं जब सुख अनुभव करते हैं तो क्या कहते हैं यह तो भगवान की दया से ही रहा है। तो हमें इस सुविधा का उपयोग करने 2 भगवान की सेवा में और जब दुःख भुगतना पड़ता है तब ये नहीं कहते। अरे भाई देखो भगवान, हम आपका नाम मिला, हमें भुगतना पड़ रहा है। हमारे बच्चे भी फेल हो गए, ना भी ठीक नहीं, हमें भूलना नहीं चाहिए। हम भगवान ऐसी सावधानी करते है जो हमारे कर्मों का परिणाम है। वो तो आपको भुगतना ही पड़ेगा, ये जरूर है। जब भगवान के सनगत होते हो तो परिणाम घट जाता है। जैसे की समझो आपके कर्मों के अनुसार आपको बहुत गहरी बीमारी होनी चाहिए थी तो आपकी उंगली उंगली कट जाए। पर खर्च तो थोड़ा बहुत ना ही पड़ेगा। जैसे आपको हाई कोर्ट सजा देती है। 20 साल के लिए अपील करते हैं। सुप्रीम कोर्ट को तो कम कर दे दिया। सजा और सजा भी तो सुख में और दुःख में दोनो ही स्थितियों में हर नाम को मत भूलो, हर नाम असली धन है। आगे कहते हैं जल बदाह। आज मे कदा लोय हे मूर्ख व्यक्ति, तुम माया के बंधन में फंस गए हो और माया के बंधन में फस कर तुम अपने स्वरूप को भूल रहे हो। और बेकार में इतना परिश्रम करना पड़ रहा है। अगर आप भौतिक जीवन को देखो इतना परिश्रम करना पड़ता है। सोचते है क्या की हम परिश्रम से घर वालों को खुश करेंगे को खुश करेंगे, रिश्तदारो को खुश करेंगे। और अंत में लोग क्या कहते हैं कुछ किया नही। आपने भी सुना ही है। ऐसे में कहते हैं लोग अपने क्या क्या है मालिक वो तो सब करते है। आपने क्या किया? कोई भी संतोष नहीं है। कितना भी परेशान कर लो, मालिक। मालिक सोचता है। हाँ मैं अपने नौकरों का तमगा दे रहा हूँ, क क्या दे रहे हैं, दूसरा सेट ज्यादा देता और कितनी भी मेहनत कर लो, भाई कुछ नहीं कर रहे। तो यही है बहुत जीवन, कोई किसी से खुश नहीं है। तो माया जो है हमें अनेक सती है। माया का अर्थ है जो चीज असली न हो, नकली चीज़ है। तो मतलब दूसरे शब्दों में यह है की हम नकली चीज को असली समझ लेते हैं और असली चीज को नकली समझ लेते है। जैसे की आध्यात्मिक, शिक्षा। ये महत्वपूर्ण है पर हम इसकी आवश्यकता नहीं समझते। तो माया में अनेक रूपों से भगवान को भुला देती है। और 1 न चेत न बोलो कहते हैं आज तुमने यह मानव जीवन प्राप्त हुआ है जिसमे पूरी चेतना है। यह तो आप मानोगे की हमारी हमारी चेतना और पशु की चेतना में थोड़ा अंतर है। आ जात लालबत्ती के होते हुए सड़क की दूसरी तरफ जाते हो, पुलिस वाले आपको पकड़ लेते है और जब कुत्ते भी ले जाते हैं उनको कोई पकड़ता है नहीं, आप बीमारी होती है सीधा डॉक्टर के पास जाते हो, कोई पशु तो तड़पते रहते हैं, कोई भाग्यवान हो तो अच्छा मालिक मिलता है पशु को ऐसा तो उनको रास नहीं पड़ता है। सर्दी में आप हाई ले लेते हो, हीटर चला लेते हो, 23 कम्बल ले लेते हो और बच्चों को ये सुविधा मिलती है क्या ठंड में ही उन्हें घूमना पड़ता है। तो इसलिए कहा गया है आप ये मान प्राप्त हुआ है जिसमें तुम्हारी बहुत घेरी चेतना है। अब इसका 2 उपयोग मत करो इसका सावधानी से उपयोग करो। इसलिए कहते हैं अब तुम हरी नाम राधा माधव भगवान की शर्त हो। भगवान जब अनेक नाम है जिनमे से राधा माधव 1 नाम है तो कहते है की ह पूरी चेतना प्राप्त हुई है। तो इसलिए अवश्य ही किसी न किसी रूप से भगवान के संग हो जाओ। जीवन से बाज रिशिकेश मनुष्य जीवन है। किसी समय भी समाप्त हो सकत किसी समय भी समाप्त हो सकता है। ये जीवन उदाहरण दिया जाता है। जैसे की कमल के फूल में पानी का बूंद हो, वो पानी का बूंद किसी समय में निचे गिर सकता है। ठीक है आपकी कोई इंशोरेंस कंपनी नहीं कहेगी हमें प्रीमियम भरम गारंटी देते 10 साल नहीं गिरेगा, कोई नहीं करेगा। तो जिस समय जिस प्रकार पानी का बूंद किसी समय भी नीचे गिर सकता है कमल के पद्दो से उसी प्रकार यह जीवन जो है किसी समय भी समाप्त हो सकता है। हमें भूलना नहीं चाहिए। सब रोज अखबार में पढ़ते हो, रोज अचानक हो गया। क्या कहते हैँ अफसोस करते हो, अरे कैसे हो। हम भूल जाते है की अंत किसी समय भी आ सक। आज से हजारों साल पहले याम राज। ये जो मृत्यु के देवता हैं, उन्होंने प्रश्न पूछा महाराज ऐसी ये बताओ में आश्चर्य की क्या सबसे बात लगती है ने कहा यमराज जी हर व्यक्ति देख रहा है, उसके माता पिता दादा दादी हो गया। वो क्या सोचता है उसका नहीं आएगा। वो आएगा भी खटखटाएगी दरवाजे को नहीं चाहिए। वो अंदर दरवाजा नहीं खोलेंगे। हम से पूछे वे तो मृत्य में नहीं छू सकते। हमारा खास व्यस्त है किसी समय है जो इसलिए कहते हैं हमने अपनी हिंदियों को की सेवा की है, भगवान की सेवा नहीं की है। तो इसलिए कहते हैं कि के हरि नाम को अपनाओ, हरी नाम का रस महसूस कर। आज अंतर राष्ट्रीय कृष्ण भावना संघ के सारे विश्व में केंद्र है। विश्व का कोई देश नहीं है। लंदन चले जाओ, चले जाओ, चले जाओ, चले जाओ, चले जाओ, चले जाओ, चले जाओ। कोई देश नहीं है। यहाँ की इस काम के केंद्र में है या इस काम के भक्त में ही है। आज जो आप देख रहे हैं छोटा सा नमूना, आपके शहर में, ये भक्त अमेरिका से, योग से, रूस से, यूरोप से, सब देशों से, तो ये ऐसी है क्यूँकि इनके माँ, बाप सब भक्त हैं, इसलिए वो बच्चों को भी वो अच्छी शिक्षा दे दे। तो क्या कारण है की लोग हर नाम को अपना रहे हैं, गीता को पढ़ रहे है, कुछ रिश्ता हम उनको दे रहे नहीं है। हमारे भारत देश में लोग जब आते है, लोगो को प्रभावित करने के लिए रहता है। 10 हजार अभी तो बढ़ जाएगा महंगाई का जमाना पंद्रह हजार रूपए दे देते है और मुर्गी दे देते हैं, बादल को धन नहीं दे रहा है, लोगों की इसको स्वीकार कर रहे हैं, क्यूँ क्यूँ की ये सुख दे रहा है, सुरक्षा दे रहा है, आनंद दे रहा है तो हर व्यक्ति खुशी चाहता है, आप सब भी चाहते हो। हाँ आप हरियाणा में रहते है में रहते हो, हम कान में रहते थे काफी समय पहले 1 साल पढाई के लिए तो आप लोग हर व्यक्ति खुशी चाहता है सुख की तलाश में। पर ये सुख प्राप्त करने का साधन क्या है? हम सोचते है बस सब सोचते हैं, अमेरिका पहुँच जाए, सब ठीक हो जायेगा, पर हमारे भारतीय भाइयों को अमेरिका में भी मिलते है और अमेरिकन लोगों को भी कोई खुश नहीं है। भौतिक संसार में 7 प्रकार के कष्ट है, बिमारी, वन सताता है, दुसरे व्यक्ति सताते हैं, प्रकृति सताती है। आप धनी हो। आप ही नहीं चाहते की कभी यह धन आपको छोड़ना पड़े। आपने चने। पंडित जी का नाम सुना है के पंडित जी ने बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है यहाँ यह धन आपको छोड़ देगा। यह आपको धन को छोड़ना पड़ेगा सत्य है न। यह धन आपको छोड़ देगा, यह आपको धन को नमस्ते कहना पड़ना पड़ेगा पर ज्यादा देर नहीं उठा सकते, जवान सब आपके पीछे भाग रहे हैं। देखो इतना खुबसूरत व्यक्ति और कब तक ये खबसूरती साथ रखो। 10 फीस 30, 40 है। बस इतिहास में आप देख सकते हो कितने प्रसिद्ध फिल्मी कलाकार आये, कितने प्रसिद्ध धनी व्यक्ति आये, कितने प्रति लोग राजा बने। आज कहाँ है? वो केवल इतिहास की किताबों में है। 1 समय था तो 1 समय था। आपके बारे में भी आपके बच्चे कहेंगे हमारे वगैरह तो हमें भूलना नहीं चाहिए, ये शरीर, ये रिश्तेदार, ये रहने का ठिकाना मकान के साथ आपको भविष्य की तैयारी का अर्थ यह है की आपको आपके को त्यागना पड़ेगा। हमारे हिंदुस्तान में 1 बहुत बड़ी समस्या यह है कम सब के मन में 1 भ्रम है, क्या ब्रह्म है, पूरी छूट मिली हुई है किससे क्या छूट कुछ भाई नहीं है। और थोड़े दिन पहले हम भगवान के हमारे से पूछते हैं, कौन से शाहपुर में आपने पढ़ा है? भगवान तो कहते हो जाओ। मैं तुम्हें बचाऊंगा कहा भगवान, भगवान तो नहीं कहते, काली सन्यासी लोगों के लिए कहते हैं। भगवान ऐसे सबको कहते है। तो आप सब भक्तों से 1 छोटी सी निवेदन है। हम आपको यह कहने नहीं आया की सब अपना घर छोड़, 2 नौकरी छोड़, 2 आओ आपको बस में, हमारे मंदिर में ले जायेंगे रहने के लिए रहना चाहो तो भी जगह नहीं है। हमारे इतने आम लोग, हम लोग यह कहने आये हैं, घर हो। हम आपको यह कहने आये हैं की नौकरी करो। 1 चीज बनाओ अपनी चेतना को बदला सोचो की आपका कर्तव्य। क्या है वो है की आप बहुत के साथ अपनी अध्यातम को भी निभाओगे, अपनी धातमिजिम्मेदारी को नहीं निभाओगे। ये मानव जीवन अधूरा रहे। तो हमने प्रभुजी का वर्णन किया था। थोड़े समय पहले महाप्रभु जी ने हमें 1 बहुत ही सरल मार्ग दिया है भगवत प्राप्ति का। उन्होंने खास कर के शिक्षा दी है। भक्तों को क्या है ये शिक्षा। सबसे पहले वो कहते हैं हर ना करो। शास्त्र में लाखों मंत्रों का वर्णन है। आप जानते हो हमारे वैदिक शास्त्र में 12 मंत्र नहीं है, लाखों मंत्र है। पर इन सब मंत्रों में सर्व श्रेष्ठ, ये हर कृष्ण मंत्र को माना जाता है। हे कृष्ण मंत्र अनाज का। ऐसे लोग इसका उच्चालन करते आ रहे हैं। और महा भविष्यवाणी थी 1 दिन विश्व के कोने कोने में हर नाम का उच्चारन नाम के उच्चारण के द्वारा। क्या। हम भगवान को क्या प्रार्थना कर रहे हैं। ये प्रार्थना करते है भगवान से की आप कृपा करके हमें भक्ति। 2 सेवा, 2 जिस प्रकार 1 बच्चा जब रोता है तो माता उसको उठाती है, उसी प्रकार जब हम भर्ती की भी मानते है। जब भी हमें सेवा का अवसर प्राप्त होता है। तो महा ने कहा हर प्राणी मात्र को हरी नाम का उच्चारण करना चाहिए। 5 मिनट, 10 मिनट, पंद्रह मिनट, 20 मिनट। हमारे इस संस्था के हजारों भक्त हैं। जैसे की धंधा करते है, नौकरी करते हैं। 16 हमारा जब भी करते हैं, आप लोग अखबारों में पढ़ते होंगे। आजकल फल की इंटरव्यू वगैरह के बेटे वो भागते है। 16 माला का जप भी करते है और इत्यादि भी करते है। चेतन ने कहा कि भगवत गीता और भागवत को पढ़ो। भगवत गीता भागवत में बहुत गहरा ज्ञान है। यह ज्ञान आपको सुख बचाएगा। आप अखबार पढ़ते हो, टेलीविजन देखते हो, केबल टीवी देखते हो, गीत कभी नहीं खोलते हो। आप लोग सब केबल टीवी का चैनल खरीद लेते हो। आज 10, 10 चैनल रहे। हम गीता को कभी नहीं पड़ते। गीता पढ़नी चाहिए के द्वारा मन शांत होगा, गीता के द्वारा आप शांति की प्राप्ति कर सकोगे। आप समझ सकोगे की आपका हो और भगवान के पुषभ तुझे पत्ता, खिलाओ, फल, खिलाओ, जल्द, पिलाओ, प्रेम और भक्ति के साथ तो घर में जो भी आप खाओ, फल सब्जी त्यादी, सरकारी खाना खाओ, भगवान के चरणों में अर्पण करो। फिर ये प्रसाद बन जाता है। और जब मौका मिले भक्तों की संगत का लाभ उठाओ आपके करनाल में तो केंद्र नहीं है, पर कुरु क्षेत्र में है, चंदिका में है, दिल्ली में है। भक्तों की संगत का लाभ उठाओ। तो इस प्रकार आप जहाँ हो वहाँ रहते हुए अपने जीवन को सुधार सकेंगे। तो आप सब भक्तों से निवेदन है की आप हरे कृष्ण मंत्र को अपनाओ और कृपा करके भागवत गीता को पढ़ो और इस प्रकार अपने जीवन को सफल बनाओ। हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे िष्णाक्रिष्णाहरे हा रे, हर ह नमराधलहाले।
More from PRASAD

Rare Pastimes & Timeless Lessons of Guru Mahārāja | Stories Every Disciple Should Hear

ISKCON Legends- pure devotees meet-HH Jayapataka Swami, HH Gopal Krishna Goswami, HH Radhanath Swami

Jagannātha Ratha-yātrā Through Śrīla Prabhupāda's Mercy | 29 April 2006 | Nairobi, Kenya

Lord Jagannātha's Appearance Pastime | 21.07.2019 | ISKCON Calgary | Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

The Ācārya Teaches by His Own ExampleGuṇḍicā Mārjana by Guru Mahārāja #shorts

Guṇḍicā Mārjana – Lord Jagannātha's Pastime | 21.7.2019 | ISKCON Calgary |Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

H.H. Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī Mahārāja - Exemplary Sādhana and Deity Worship # shorts

भगवान की कृपा कैसे प्राप्त होगी ? | 11 Jan 2014 | Punjabi Bagh | Srila Gopal Krishna Goswami

Material Education vs Spiritual Education | Srila Gopal Krishna Goswami #shorts

