श्री बलदेव विद्याभूषण तिरोभाव एवं श्रीमती गंगामाता गोस्वामी आविर्भाव दिवस| 12 Jun 2019 |Punjabi Bagh

A devotional gathering at Punjabi Bagh honors saints Baldev Vidyabhushan and Ganga Mata Goswami. Speakers connect environmental crises like California droughts and Indian water scarcity to collective karma, arguing that materialism and ego in temples erode true devotion. They offer practical guidance on managing temple committees, building genuine friendship among devotees, and using chanting and discipline to achieve spiritual progress.
Chapters
हमारा मराल hy krsna कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम रे हरे hy krsnकरिष्णा करृषणारे रे हरे राम रे राम rama rama sna हरे रामा रे हमरा रे रा रे हरे हरे हरे रामा रामा रामा रामा रे रा hare krishna रणारेरलेहरे रा मा रे रामा रामा रामा रामा हम हरे रामा रामा मा र rama ma am हाय हाय पाबो पारा पाबो पाला रागो पाला
गो पाता
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है
कृष्णा बैठा ओम नमो भगवते वासुदेवाय वासा ओम नमो भगवते वासुदेवाय हम वास् भगत हा कृष्ण, आप सब भक्तों का हार्दिक स्वागत। मैंने आपसे पूछा था, आपको क्या लगता है, गर्मी बढ़ती जा रही है और घटते जा रही है। है बढनी घटी हमने अखबार में पढ़ा था, पर सौ के 3 दिन पहले, पिछले सौ सालों में सबसे गर्म दिन था और यहाँ ही नहीं हुए। पूरे भारत में हर जगह गर्मी बढ़ती जा रही है और 1 रूप से पूरे विश्व में बढ़ती जा रही है। पर इतनी तेजी के साथ नहीं,
तो
इसका कारण क्या है?
और
आप देख रहे हो कि पानी बहुत मुश्किल से प्राप्त हो रहा है। मैं बॉम्बे में था 3 दिन पहले और हमारे भक्त वो पुरे महाराष्ट्र में जाते हैं, किताबों को बांटने के ले वो वापस आ गए थे। मैंने उनसे पूछा कि इतनी जल्दी वापस कैसे आ गए? करे थे पुरे महाराष्ट्र में पानी की कमी है और पहले वो मंदिरों में रहते थे। मंदिर वाले कहते हैं अपनी नई पारी ने आपको कहां से दें तो 1 तरह से आप देख रहे हो, गर्मी बढ़ती जा रही है और पानी की कमी। वर्षा बहुत कठिन है, बहुत देरी से प्राप्त हो रही है। तो इन सब का कारण क्या है? कौन बताएगा भगवान गीता में कहते हैं अन्न की प्राप्ति होती है, वर्षा, वर्षा की प्राप्ति होती है। यज्ञ करोगे, जब आप यज्ञा नहीं करोगे पिथ, पाप का बोझा बढ़ता जाएगा तो क्या अनुभव होगा जो आज अनुभव होना है। और यह केवल शुरुआत है, समाप्त ही नहीं, आज आपको गर्मी लग रही है तो 2 महीने बाद आप कहोगे, जून तो बहुत अच्छा था और अगले साल आप कहोगे 19, पिछले साल तो बहुत ही अच्छा था। क्यूंकि दिन पे दिन बढ़ती जाएगी इसका इस समस्या का अगर आप हल करना चाहते हो तो 1 ही उपाय है। क्या है के जब प्रापा जी पृथ्वी पर थे, आंध्रा में गए थे और उन आंदर में 67 सालों से बारिश नहीं आई थी। जब बाल पापा ने भक्तों को कहा जाओ हाय राम करो, भक्तों ने हरी नाम का 23 से, तो ये सबको पढना पड़ेगा हरेक तो करेंगे, जो भक्त हैं, उनको भी अपना जीवन सुधारना चाहिए। फिर यह तो आज बहुत ही शुभ दिन है। आज भूषण और मि का तिरोभाव है। हम संक्षेप में उनकी चर्चा करेंगे। अविर्भाव और तिरोभाव विभाव का अर्थ है जब कि कोई महान संत पृथि पर प्रकट होता है। और तिरोभाव का अर्थ है जब वो और प्रकट होता है। हम महान संतों के अभाव तिरवा दोनों को मनाते हैं और उनकी लीलाओं उनके जीवन के विषय में सुनते हैं। बलदेव मूसन बहुत ही ऊंचे कोटी के सन थे, उनके मन में केवल 1 ही भाव था। सदा भगवान की सेवा उनके विषय में बहुत कम सूचना है। क्योंकि हमारे जो वैश्व थे वो ये नहीं चाहते थे कि लोग उनकी प्रशंसा करें, वो चाहते थे की कोई उनका गुणगान करे जैसे आप पुरी की कथा में देखते हो। ये माधुरी को पता लगा है कृष्ण की भगवान ने प्याला चुराया है उनके लिए, वो तुरंत ही यमुना से निकल गये क्योंकि उन्हें डर था कि लोग आयेंगे उनका गुनगान करेंगे। तो ये है संतो का भाव तो पहले ठीक सा हाई कृष्णा, अरे कृष्ण
काफी वक्त बाहर खड़े हैं, मैं सबसे निवेदन करूँगा थोड़ा थोड़ा सब आगे आ जाइए। प्लीज भक्तों को बाहर धूप में खड़ा होना पड़ रहा है। प्लीज सब लोग थोड़ा थोड़ा जाइए।
स्पेस आगे बैठने की भी कोई टिकट नहीं है,
सब लोग थोड़ा थोड़ा आगे आ जाइए। माता जी लोग भी थोड़ा आगे। पीछे। माता जी से काफी खड़ी है बाहर। और जो भक्त लोग यहाँ बाहर खड़े हैं वो पीछे से अंदर आ सकते हैं।
न्यवाद
प्रकट हुए थे, जमुना ओडिशा के ने गए और छोटी आयु में ही उन्होंने संस्कृत का पूरा ज्ञान प्राप्त कर लिया था।
और
मान बचाया के शिष्यो के आश्रम में उन्होंने अधिक ज्ञान प्राप्त किया तो बालदेव विधूसन बहुत बड़े बदवाल मांगे थे और फिर वो जंगनातपुरीमें गए यहां की उन्होंने राधा दाम स्वामी से अधिक ज्ञान प्राप्त किया। जगस्वामी के ग्रंथों का उन्होंने अध्ययन किया और लगभग 24 पुस्तकों का अनुवाद किया। ग्रंथों का वलदविजबूसनआये थे जयपुर में। यहाँ के उन दिनों में हिंदू राजा था। बाकिस्तान भारत में मुसलमान राजा थे तो बाला देवी भुसन आए थे। जयपुर में वहाँ उनका संपर्क हुआ रामनुजा चाया के से से तो उन में राम ने चाय के जो की दादा गोवनजीकी पूजा कर रहे थे। उन्होंने कहा की ये जो गोडिया वैष्णव हैं उनको अधिकार नहीं होना चाहिए। गोविन जी का की उपासना करने के लिए। क्यूंकि उनके पास विधान दसुसरकेऊपर कोई कॉमेंट नहीं है विधान को ही। इसलिए उनको कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। गोविल जी की पूजा करने के लिए। तो यह सूचना राजा को प्राप्त हुई और राजा थे गुड़िया वैश्या के भक्त और वालादेवबुसरने भागवत की शिक्षा। विश्व राज शक्ती ठाकुर क्यूंकि बहुत ही उची कोटि के नावदा में उनसे प्राप्त की। तो राजा ने 1 प्रतिनिधि को भेजा विश्वराज चकरी ठाकुर को यह सूचना देने के लिए। राम मनुजा के भाग चाहते हैं कि जो गुडिया वैष्णव हैं उनको अधिकार नहीं हो गोविन जी की पूजा करने के लिए, क्योंकि उनके अनुसार वैश के पास कोई कमेंट्री नहीं थी। विधान विधान के ऊपर। जब बलदेव भूसे ने ये सुना, उन्होंने कहा ये श्रीमद भागवत हम जो कि सबसे उत्तम ज्ञान देता हैं, ये हैं विधाता की कॉमेंट्री। ये रामरुज सिकाने किया और हँस कर कहा तुम्हारे पास कोई कॉमेंट्री नहीं है इसलिए तुम्हें अधिकार नहीं दिया जाएगा। जी की पूजा कर। ठाकुर ने बड़ा अपमान महसूस किया और उन्होंने माला देवी मूसल से कहा कि तुम उनका स्वाद बहुत कमजोर था। उस समय में उन्होंने माला देवी पूजन से कहा तुम कॉमेंट्री लिखो। माला देवी भूसन घबरा गए थे। वो लेखक से लिख पाएंगे तो गोंविनजीकेमंदिर में थे और आज का जो सोने गए। गोविन जी ने शब्द में आकर कहा, मैं तुम्हारे माध्यम से कॉमेंट ही लिखूंगा, तुम स्वीकार कर लो। और 3 दिन के अंदर उन नोन बासिया। कॉमेंट्री की जो की हृदय में शिक्षा। उस हृदय में ध्यान दिया था किसने पर भगवान वाला मून बहुत बड़े बलवान थे। उन्हे भारत के सब को हरा दिया था। जब प्रतिनिधियों ने कॉमेडी सुनी वो हैरान हो गए थे, 3 दिन के अंदर दिया और यह प्रेरणा दी कि भगवान उनके हृदय में उनको पूरा ज्ञान दिया। क्या देखने के लिए। पापा जी भी कहते थे। इस बुक, विच, राइटिंग और पर्सन डिटेटेबाईकृष्णा। मा ने कहा था कि जो ये ज्ञान परम भगवान के हृदय में दे रहे हैं। तो बालदेव 24 परसेंट का अनुवाद किया और उन्होंने 9 सिद्धांतों का 9 सिद्धांतों का स्थापना की। सबसे पहले उन्होंने ये साबित किया की किशन भगवान जो हैं परम भगवान है। ईश्वर, पर, कृष्णा, गोविंदा, सराकर, आइये उन्होंने ये साबित किया, ये परम भगवान है। उन्हें अगर आप समझना चाहते हो तो वेदों के द्वारा ही समझ सकते हो, मन की कल्पना के द्वारा विक्शासरमेजञान हैं, जिसके द्वारा आप परम भगवान को समझ सकते हैं। फिर उन्होंने कहा, ये जो भौतिक जगत है, ये नकली नहीं है, जो माया वादी, विचार के लोग हैं, ये सब मिथ्या मिथ्या नकली है, नकली बन जाता है। जब आप इसका दुरुपयोग करो, अगर आप इसका सदुपयोग करो, ये माइक्रोफोन के द्वारा आपको उपदेश देना है, तो आप कहोगे माइक्रो
है?
नहीं है, इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। जगह असली जो जीवात्मा है, परम भगवान से जुड़ा है। यह नहीं कि हम भगवान है। मायावती, उनका विचार, जो जीवात्मा है, उनका असली कर्तव्य। क्या है? कृष हम सब क्या हैं? भगवान के क्या हैं, दास है। देव ने अनेक ग्रंथों का अनुवाद किया और उनके पश्चात के थे। वो समझ गए, वो उनके शरनागत हो गए और उन्हें फिर इजाजत मिल गई थी गुंजी की पूजा करने के लिए। तो आज पापाजी ने भगवत गीता लिखी है, अनुवाद किया है वो निर्बल केस पर बालादेव की रचना के ऊपर। जब प्रापा जी जब ग्रंथों का निवास करे थे, 4 का तादपुरीथाउसे रखते थे और उसके आधार पर प्रापा जी ने हमे तानपुरी में दिए, तो आज इनका तिरभावदिवस है। हमे माना भूषण से प्रार्थना करके यह भी मांगना चाहे क्या कि हमारे शुद्ध भक्ति का भाव बढ़े और हम उनकी शिक्षा के आधार पर क्या करें। भगवान की सेवा करें। माले भूसन की आज 1 और गंगा माता गो स्वामी जी उनका भी सिर भाव थे। ये गंगा माता गोस्वामी और थी राजा की बेटी थी। पर उनके मन में सदा 1 ही भाव था भगवान की सेवा। इसलिए उन्होंने विवाह नहीं किया। उनका नाम था महारानी सच्ची देवी और उनके पिता रनेश नारायण। ये बंगाल के राजा थे और उनकी बेटी की कोई भौतिक इच्छा नहीं थी, उनकी केवल 1 ही इच्छा थी दिन रात भगवान की सेवा की जाए तो पहले उन्होंने राज्य किया फिर उन्होंने राज्य भी छोड़ दिया और 1 अलाने गुरु स्वीकार किया गुरु का नाम था हरिदास मंदिर जो कि विंदावन में निवास करते थे और उनके शिक्षा के अनुसार उन्होंने भजन किया और बहुत सादा जीवन यमना नदी के तल पर रात को होती थी और सुबह भंगनातीसे पहले उठ जाती थी गोविनजीकामंदर साफ़ करने के लिए पहले साफ़ कर दी थी रोज तो मंगला पहले जाती थी मंदर को साफ़ करने के लिए और भगवत कथा सुनती रहती थी तो 10 शिक्षा के अनुसार दिन में रोज 3 लाख बार नाम जाब कर दीदी, 3 लाख बार मान न थी उनके हृदय में किसी भाग प्रकार का अंक नहीं था और 1 और उनके गुरु बहन थी लक्ष्मी प्रिया लक्ष्मी प्रिया के साथ सच्ची देवी घर घर जाकर भीख मांगी थी और दोनो रोज 3 लाख बार जाप पर दे दे और रोज गोदा का परिक्रम और राधकुनकापरिक्रम रोज तो इनका प्रचार बहुत फैल गया था और कई राजा और कई नेताओं ने उनसे देखी आज गंगा माता गोस्वामी के तिरोभाव दिवस है इनाम उन्हें कैसे प्राप्त हुआ जग पुरी में थी उन्होंने सब के घर में सुन्दर मंडल की स्थापना की थी और मंदिर में थी उनकी इच्छा थी कि गंगा का दर्शन मिले तो एकदम गंगा पानी वहाँ आ गया और पानी के प्रेशर के कारण गंगा मद गोसावी आगे पहुँच गयी जी के चरणों में तो सुबह जब दरवाजा खोला जगनपुरी के अधिकारियों ने उन्होंने देखा है, यहाँ बैठी है ये औरत उन्हें समझा ये कोई चोर है ये कहाँ से आ गया? सर भगवान ने ने कहा यह गंगा माता है। और फिर पूरी के राजा ने उनकी शरण ली, उनसे ली और माफी मांगा क्योंकि अधिकारियों ने उनके गंगा माता गोस्वामी जी का तेरा भाव, आमिर भाव जो उनका अमिर भाव हम जो आप में से कितने के गोल स्वामी मनने के लिए 3 लाख बार रोज जब जागना पड़ेगा राधा पर सर्दी के मंगल पहले और रोज गोदान का परिकर और गुन का पिक करने को तैयार से मांगो या भक्ती में आगे बढ़ सका भगवन के।
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got yeh shremtbgotam ससलिआएश्री भगवान ओवाचाबरम
वणिध्वम भद्रम वा युगम मैं निप नंदन सुहाना अपथ धरम तुष्ट अहम सौहरि देना व श्री भगवान ओवाचाबरंविधव द्रव युयममेरेपनंदना सोहाद्र ना प्रथक धरम दुष्टो। हम सोहिदेनवाश्री भगवान उवाच बरम ध्वं भद्रव युजममेरिपनंदना सोहा द्रेन पिथक धर्म तुष्टो हम सोहिदेनवहश्री भगवान वाचा बर वडिध्वंभद्रमवो योयममेंनेपनंदना सोहा दर न प्रथक धरमास दुष्टो। हम सोहे देनवा
मा सेरीज श
शब्दार्थ अनुवाद और दाद पर ऐसी भक्ति विदान स्वामी शिला प्रपात जी के द्वारा शिला की। श्री भगवान उवाच भगवान ने कहा वर वर आशीर्वाद वरिध्ुवममांगो भद्रम कल्याण वह तुम सब का यूएम तुम सब में मुझसे निपनंदनहाहिराजपुत्रों सुहागरैनामित्रता से धर्म कार्य, तुष्ट प्रसन्न अहम मैं सुहरदेनामित्रता से वह तुम सब का। भगवान ने कहा हे राजपुत्रों मैं तुम लोगों के परस्पर, मित्रता पूर्ण संबंधों से अत्यधिक प्रसन्न हूँ, तुम सभी 1 ही कार्य भक्ति में लगे हो। मैं तुम लोगों की मित्रता से इतना अधिक प्रसन्न हूँ कि मैं तुम्हारा कल्याण चाहता हूँ। अब तुम जो वर चाहो, मांग सकते हो। तात्पर्य चूंकि। राजा प्राचीन परिषद के पुत्र मिलकर कृष्ण भक्ति कर रहे थे। अत भगवान उनसे अत्यधिक प्रसन्न थे। राजा प्राचीन परिषद के सभी पुत्र प्रथक प्रथक जीव थे, किन्तु भगवान की भक्ति करने में वे सभी 1 थे। परमेश्वर को प्रसन्न करने अथवा भक्ति करने के लिए जीवों में एकता का प्रयास वास्तविक एकता है। भौतिक जगत में ऐसी एकता सम्भव नहीं है, भले ही आधिकारिक रूप से लोग एकमत होने, किन्तु उनके अलग अलग स्वार्थ होते हैं। उदाहरण, संयुक्त राष्ट्र संघ में सभी राष्ट्रों की अपनी अपनी विशिष्ट राष्ट्रीय आकांक्षाएं होती हैं, अतः उन्हें एकमत नहीं किया जा सकता। इस संसार में जीवों के बीच विविधता इतनी प्रबल है कि कृष्ण भावनामृत संघ में कभी कभी भिन्न मतों एवं विचारों तथा भौतिक स्वार्थों के प्रति झुकाव के कारण सदस्यों में विरोध पाया जाता है। वस्तुत कृष्ण भक्ति में द्वैत नहीं रह सकता। वहाँ 1 मात्र उद्देश्य है, यथाशक्ति श्रीकृष्ण की सेवा करना। यदि सेवा को लेकर कोई मतभेद होता है, तो उसे आध्यात्मिक समझना चाहिए। जो भगवत भक्ति में लगे हुए हैं, वे किसी भी परिस्थिति में विलग नहीं हो सकते। इससे भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों को कोई भी वर्ग प्रदान करने के लिए तैयार रहते हैं। जैसा कि इस श्लोक में इंगित किया गया है, हम देख सकते हैं कि भगवान राजा प्राचीन भरिषद के सभी पुत्रों को वर देने के लिए तुरंत तैयार हो जाते हैं। अनुवाद कृपया करके दोहराइए भगवान ने कहा, हे राजपुत्रों में, तुम लोगों के परस्पर, मित्र, मित्रतापूर्ण संबंधों से अत्यधिक प्रसन्न हो। तुम सभी 1 ही कार्य भक्ति में लगे हो। मैं तुम लोगों की मित्रता से इतना अधिक प्रसन्न हूँ कि मैं तुम्हारा कल्याण चाहता हूँ। अब तुम जो वर चाहो मांग सकते हो।
गया धान
चक्समेशीचेतालिया मनोगे सब जाए।
जिला
हिुेनजशिवबनसरजगम
कृष्ण
शिरा,
हे क्रिष्णा करना
सेंदोइरमजा
से
ji
हाय हरेकृष्णा कृष्णा हरे
राम राम राम राम श्री भगवान वाचाराम सो सो दिन हम सो देव। तो परम भगवान इस लोक का उच्चारन करने हैं। आप भगवद के चौतीसकनमें पति जस की कथा पढ़ते हो। परचेत राजा के बेटे थे और उन्होंने 10 हजार सालों तक बहुत गहरी तपस्या का पालन किया। जैसे आप शास्त्र में पढ़ते हो, अगर भगवान को प्रसन्न करना चाहते हो। क्या यह माध्यम तपस्या तपस्या परम ज्योति भागवत, अमर लोक, शुजा भागवत में कहा गया है। पर भगवान लोग शुजा है, उन्हें समझना बहुत ही कठिन है। पर तपस्या के माध्यम से आप उन्हें समझ सकते हो। तो प्रेत ने 10 हजार साल तक तपस्या की 1 मंत्र का उच्चारण किया, जिसकी रचना शिव जी ने की थी। जो देवता हैं प्रसिद्ध देवता, शिव, ब्रह्मा इंद्र। इस परम भगवान का गुणगान करते हैं। अगर हम के दसवे स्कल में आप गोवधानीलापढते हो। किस प्रकार भगवान ने वेजबाजियोंकी सुरक्षा की। आप देखते हैं, कि शिव जी की सुरक्षा हुई तो सारे देवता स्वीकार करते हैं। कृष्ण तो परम भगवान बड़े प्रसन्न थे, पर 10 की धरमराज छोटे बालक थे, 5 साल के, पर उनसे भी प्रसन्न हो गए ने मधुबन बन में जाकर बहुत गहरी तपस्या का पालन किया। इसलिए भगवान की भगवान को प्रसन्न करने के लिए उनका लक्ष्य था भगवान की प्रशंसा। तो परम भगवान को अगर प्रसन्न करना चाहे। तो ये हैं 1 साल और ये तपस्या होनी चाहिए सास की शिक्षा के आधार पर। 5 वेशक भगवान कहते हैं भगवान पुत्र
का,
तुम सब तपस्या का पालन करो और इसके दौरान आपको असली खुशी प्राप्त होगी। पर भगवान ने देखा बड़ी गहरी तपस्या की भगवान को पसंद करने और इसके पश्चात भगवान वहाँ आये उन्हें दर्शन देने के लिए। और परम भगवान क्या कहे? इस लोक में पर भगवान कहते हैं, हे राजा के बेटे, मैं तुम सब से अत्यंत प्रसन्न हूँ। क्यों? क्यों? क्योंकि तुम सब में मित्रता का भाव है, तुम सब भाइयों में मित्रता का भाव है। और आज तुम सब की, तुम सब का 1 ही मूल का है, 1 ही धंधा है। क्या है भक्ति योग सबकी यही इच्छा है कि भगवान की पूजा की जाए। और मैं तुम्हारे मित्रता के भाव से बहुत प्रसन्न हूँ। और अब भागो में से क्या वर्ड चाहिए? तो ये होना चाहिए। हमारा भाव यहाँ भगवान कह रहे हैं मैं तुम सब भाइयों से प्रसन्न हूँ में 1 ही भाव है मित्रता का भाव और ये किस लिए भगवान की सेवा के लिए। तो ये मित्रता का भाव हम सब में होना चाहिए, हम सब में मित्रता का भाव होना चाहिए और ये भाव हम सब भगवान की सेवा में जुड़े हैं। वो कहते हैं कि हम सब का 1 ही धंधा है। तो चाहे आप वियासा आश्रम में हो या ब्रह्माचारी आश्रम, हम सब का, हम सब में मित्रता का भाव लगा। मित्रता का भाव का अर्थ क्या, मित्रता के भाव का अर्थ है कि हम सब में ये इच्छा होनी चाहिए कि हम भगवान के स्वार्थ के लिए कार्य करें। अपने स्वार्थ के लिए भी। बौद्धिक समाज में अनेक दल हैं। पापाजी इस रात्रि में यूनाइटेड नेशंस की चर्चा कर रहे हैं। और ये जो बड़ी बड़ी सवा है, इतने अनेक सवा हैं कभी मीटिंग और इनका लक्ष्य क्या है? इनका लक्ष्य है अपना स्वार्थ। हर व्यक्ति भौतिक समाज में अपने स्वार्थ का सोच है, जैसे कि अभी इलेक्शन हुए, भारत में अनेक दल थे पर सब दलों का क्या उद्देश्य तक अपना स्वार्थ तो परम भगवान को अगर हम प्रश्न करना चाहते हैं, हम सब में मित्रता का भाव होना चाहिए और इस भाव में सबका 1 ही उद्देश्य होना चाहिए। हम भगवान भगवान की प्रशंसा के लिए कार्य करें और अगर हम इस भाव से रहेंगे की भगवान की सेवा करनी है, इसे आप भगवान को प्रसन्न कर सकते हैं, भगवान का क्या करें और इसके द्वारा जो वर चाहिए व वर प्राप्त हो जाएगा। तो प्रपर्जीने अनेक समय हम इस्कॉन के भक्तों को कहा, कहा कि मित्रता के भाव से हमें कार्य करना चाहिए और मित्रता के भाव से भगवान की सेवा कर ली जाए। रामाजी ने कहा लव फॉर मी व son हाव कॉपेप्राबा ने कहा तुम्हारा प्रेम मेरे लिए प्रकट होगा ये देखकर तुम किस प्रकार 1 दूसरे से जुड़कर कार्य कर दे। तो ये श्लोक 1 से बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि इस श्लोक के द्वारा हमें यह शिक्षा मिल रही है कि क्या भाव होना चाहिए हम सब का, हम सब। उदाहरण के लिए हम इस कौन संस्था में आते हैं, हम सब का भाव भी होना चाहिए जो भगवान की खुशी के लिए है वो कार्य कार्य ही हम करें और हर कार्य के पीछे यह भाव होना चाहिए। हमें इस कार्य से भगवान को प्रसन्न करें और अगर ये भाव रहेगा तो परम भगवान प्रसन्न होंगे। प्रापा जी ने 1 समय 1 छोटी छोटी लकड़ियों का बंडल दिया उन्होंने कहानी बताई 1 पिता ने छोटी बंडल लिया लकड़ियों का और बंडल को जोड़ दिया 1 साल रबरबैंड से और बोला तोड़ो देखते हैं आपने किसकी ताकत है तोड़ने सब भाइयों ने प्रयास किया को मंडल की लकडियों को कोई नहीं तोड़ पाया। फिर पापाजी ने कहा पिता ने 11 लकड़ी दी बेटों को और तोड़ो बड़ी आसानी से टूट गया ने बड़े आसानी से जिसे प्रापा ने क्या कहा तुम भाव से सेवा करोगे तो कोई किसी को तोड़ नहीं पाएगा। पर अगर अगर हम अपने स्वार्थ का सोचे अगर हम ये सोचें हमे क्या मिलेगा, हमारे लाभ के लिए कैसे क्या परिणाम होगा भगवान की कृपा को नहीं प्राप्त कर सके। हम सब का भाग होना चाहिए कि भगवान की प्रसंसा, उनका उनकी कृपा में प्राप्त हो तो ये मित्रता का भाव बहुत आवश्यक है। पापाजी ने 1 और उदाहरण दिया उन्होंने कहा कि 1 पिता के 23 बेटे थे और जो हमेशा 1 दूसरे से झगड़ा करते रहते थे 1 दिन पिता ने कहा बेटे को मसाज दें तो मसाज ले गये मसाज दे इतने जोर से करते थे और मसाज के खोजे पिता के शरीर को और जोर जोर से मारने लगे तो पिता ने कहा तो मुझे मारेगा या बरसात करे। तो पापा ने ये उदाहरण दिया था कि अगर हम के भाव से कार्य नहीं करेंगे तो फिर यह परिणाम हुआ आप लाख भी ज्यादा नुकसान पहुँचाओगे। तो मित्रता के भाव का पालन करने के लिए क्या आवश्यकता है? अमृता का भाव हम 1 दूसरे के संबंध, 1 दूसरे में या देखें गुणों को देखें अक्सर क्या होता है हम 1 दूसरे की कमियों को देखते हैं सच बात है हम सब सोचते हैं, हमारे में सारे गुण हैं और दूसरे में सारे गुण है, हम इतने अच्छे हैं और दूसरे से कमजोर हैं। पर फिर इस वातल में मित्र का भाव अनुकूल करना कठिन होगा। पर प्रापर जी ने कहा कि अगर हम 1 दूसरे के गुणों को देखें, 1 दूसरे के गुणों का लाभ उठाये तो फिर ये वतन स्थापित हो पाएगा। भक्ती सिना दादाजी जब देखते थे कि बक्सों में अनबन है तो वो उन्हें 1 कमरे में रख कर कहते थे गिनों देखो इसमें क्या क्या बोल रहे हैं? जब वो गुण लोग भगत सुनते थे वो देखते थे जो छोटा सा गुण है वो इतना बुरा नहीं है उनमें अनेक गुण भी है। तो हमें गुणों को देखना चाहिए। और निस्का भाव से जैसे सवेपूसपर्वधनो। यह तो भाव से भगवान की सेवा में जुड़ना चाहे। तो भगवान या कह रहे हैं कि मैं तुम सब बच्चों से, सब भाइयों से संतुष्ट हो। हमारा ये भाव है। हर कार्य के द्वारा भगवान को संतोष कर पाये। और यह होना चाहिए। हमारा लक्ष्य अगर ये लक्ष रहेगा की हम बोई कार्य करे जो अनुकूल है। फिर भक्ति के मार्ग में सफलता प्रात वर्ष होगा। चेतिलमाहप्रभुस्वामी को शिक्षा दे रहे थे भक्ति के विषय स्वामी। 1 समय वहाँ के बड़े प्रसिद्ध राजा के राज्य का शासन कर रहे थे, अपने भाई के साथ की रुची रही थी। इन कार्य में बड़ी कठिनाई से निकले। पहले तो उन्होंने 1 महीने के लिए घर बैठे और दफ्तर ने गए। भगवत पड़े थे। 30 के संग में राजा ने अपने भेजे को भेजा था, देखो क्या हो रहा है? भाई छोड़ गया लापरवाही लापरवाही, लापरवाही मन के अभी। ये भी उसकी दया ने देखा, यह तो भागवत पड़ रहे हैं। ब्राहमण के संघ में। जाकर। राजा बिल्कुल ठीक है, भगवत हमको को पढ़ रहे हैं। और राजा ने मंच दिया सनातन को कहा की तुम्हारे भाई ने लापरवाह बन कर अपनी जिम्मेदारी छोड़ दी। और अभी तुम भी छोड़ रहे हो अपनी जिम्मेदारी को। संभालो। सुनाता ने कहा अब मेरे ले, ये सम्भव है। तो उसे जेल में दाल बड़े। मुष्कों से, जेल से निकले। तो चेतन स्वामी को शिक्षा देते हुए कहते हैं जो भक्ति के लिए अनुकूल है, उसे क्या करो। जो प्रतिकूल है उसे दिया लो। तो इस लोक के अनुसार ये भाव जो कि इस लोक में प्रस्तुत हो रहा है, यह भाव है। अनुकूल। तो हमें हमेशा यह सोचना चाहिए जो अनुकूल कार्य है वो हम करेंगे। जो प्रतिकूल हैं नहीं करेंगे। जैसे कि अगर आपको पता लगे कोई भोजन इसी इलाके में खतरा है तो आप जाते हो, नहीं जाते। तो जो प्रतिकूल कार्य है उन्हें या गो जो अनुकूल कार्य हैं में स्वीकार करो और भक्तों में गुणों को देखो सदा। अब गुणों को नहीं और गुण को देखोगे। आप के मन में यह भाव होगा। आदर का। हमेशा आदर देखो। ये कमी है, यह कमी है, यह कमी है। इस में ये कमी है। तो हम 1 रूप से अपराध भी करना शुरू कर देंगे और अपना स्थान वो ऊंचा मानेंगे। जैसे हमने कुछ समय पहले कहा बलदेव वितेभूसनउनकी इच्छा थी कि कोई उनकी प्रशंसा नहीं करे, अगर कोई भी उनकी प्रशंसा करता था तो वो वहाँ से हट जाते थे। ये होना हमारा मन भाई, समाज, उदहारण के लिए कृष्ण का राज, कृष्ण का विराज क्या कहते है? मेरा नाम ही मत लो, मेरा नाम ही लोगे। तो तुम्हारे सारे गुण समाप्त हो जायेंगे, मेरा नाम ही मत लो। तो भाला देव। उनका यही भाव था, उनकी इच्छा थी कोई उनकी प्रशंसा नहीं करे, कोई उनका गुणगान नहीं करे। हम ये नही कह रहे की आपको बाद के समान बन जाना चाहे। बन सको तो बहुत अच्छी बात है। पर हमारे वश का उददेश्य है कि विनम्रता से सेवा करे। वन ये विनंरता का भाव, ये मित्रता का भाव अनुकूल होगा। अगर आप इस श्लोक का ध्यान करो। क्योंकि अगर विनता का भाव होगा तो वहीं का भाव आएगा। नहीं। तो मालिक समाज में हम क्या प्रयास करते है? सदा यह स्थापित करने के लिए मैं तुम्हारे से इतना अच्छा हूँ, मैं तुम्हारे से धारा धनी हूँ, मैं तुम्हारे से ज्यादा सफल हूँ, मैं तुम्हारे से ज्यादा बुदिमान सच बात है। तो ये भाव से बचने के लिए क्या लगा? भाव आवश्यक। तो परम भगवान स्वयं कहते हैं मैं तुम भाइयों से प्रसन्न हूँ। क्योंकि तुम सब में मितरदगाभाव है। अंग्रेजी में 1 स्टेटमेंट है। यूनाइटेड, विटेन सुना है। आपने यूनाइटेड वी स्टैन, हिंदी में क्या हुआ? यूनाइटेड वीस्टेनदिवाइडेड बी फॉर। तो अगर हम 1 मित्र के भाव से रखते रहेंगे तो फिर हम इकट्ठा देंगे सदा। और यनाइटेड, वाइज, रिपोर्ट और का अलग अलग स्वार्थ हो। तो क्या आप ज्यादा देर। 1 साथ ही रह सकोगे, प्रापर कैते इस कौन संस्था में जब तक ये मित्रता का भाव होगा, कोई कुछ नुकसान नहीं पहुँचा सकेगा। जब तक के भाव होगा, ये मित्रता का भाव रखना बहुत आवश्यक है। दूसरे शब्दों में इस कम भाव से सेवा में जुड़ना चाह। और भगवान क्या कहते है? इस भाव से चलोगे, तुम सब में 1 ही भाव आयेगा। भक्ति योग गणना है, सेवा में जुड़ना है। इसके द्वारा परम भगवान प्रसन्न होंगे, यह होना चाहिए। हम सब का लक्ष्य चाहे ब्रह्मचारी हो, चाहे गया हो, हम सबका लक्ष्य होना चाहिए। तो प्रबल कहते हैं असली यूनिटी है जो हम सब के मन में ये भाव हो। और बौधिक समाज में अनेक दल हैं। नाइट नेशन विद्यालय, पर वो क्या विश्व में शांति एकता प्राप्त की है कि वह सबका अपना स्वार्थ भाव है। तो ये मिस्र का भाव प्रकट होगा। इसको प्राप्त करने के लिए हमें थोड़ा प्रयास करना पड़ेगा। क्यूंकि ये निर्भर है? हमारे अध्यात्मिक ज्ञान के ऊपर अगर आप सांस से बोलोगे, बंदों का उच्चारण करोगे, फिर हृदय की महल में निकाल पाएगी। कई बार भक्त पूछते हैं, मार में ये गुण कैसे प्राप्त हो? चेतन चेतना बू ने 26 गुणों का वर्णन किया है। कई बार भक्त पूछते हैं हम दर्द कैसे बने? सैन शील कैसे बने हो? ये स्वभाव कैसे प्राप्त हो? रूपकभी कहते हैं श्रद्धा दादा की हमारे हृदय में ये इच्छा होनी चाहिए। यह भगवान की सेवा में जुड़ना चाहते हैं। और अगर ये इच्छा है तो परम भगवान कोई हृदय में विराजमान हैं। हमें वैसी स्थिति रखेंगे कि आपको साधु साधु, का की संगत प्राप्त हो। साधु की संगत प्राप्त होने के 2 माध्यम हैं। 1 है ग्रंथ, साधु, दूसरा है भकसन। जैसे कि आप सब जानते हो कि प्रचार के कार्य पर बल दिया जाता है। क्यों? क्योंकि इन ग्रंथो के द्वारा लोगों का जीवन सुधर सकता है, सुधरा है और सुधर सकता है। कुछ 2 महीने पहले मैं 1 भक्त को मिला था, मैंने उससे पूछा या भक्त कैसे बने? ये पंजाब में थी। तो उसने कहा कि इस व्यक्ति का अलमारी के पेड का धंदा था। तो उसने कहा कि मेरे दुकान में किसी ने 1 अलमारी दी थी रिपेयर करने के लिए। और जब उसने मारी खोला रिपेयर करने के लिए, उसने अन्दर देखा की प्रॉपर की 3 किताबें थीं, तो उसने किताबों को पढ़ना शुरू किया। मे मंदर पहुँचा, वो, पत्नी, बच्चे सब पूरा खानदान 16 माना करता है।
और
यह आम कैसे हुआ? ग्रंथों के मन में इस प्रकार के हजारों उदाहरण है किस प्रकार ग्रंथ के माध्यम से लोगों का जीवन सुधरा है। तो भक्त साधु गंद साधु की संगत में आने से आप अपने अनंत को दूर कर सकते हो। अनर्थ निवृत्ति और फिर निष्ठा भी प्राप्त होती है। तो दूसरे शब्दों में, मित्रता का भाव ये भाव कि हम हर कार्य करें, भगवान की खुशी के ले। यह प्राप्त होगा। जब हम निष्काम भाव से सेवा में जुड़े वैसे तो भगवान गीता के सातवें अध्याय में भगवान कहते हैं 4 कारण हैं, लोग मेरी शरण में आते हैं, चातिरविदाबजानते हैं क्या? ये 4 कारण, 1 इसे धन चाहिए, लोगो को नहीं चाहिए। दूसरा रोगी पीड़ित इस ज्ञानी और चौथा यानी 44 के 4 पूरी आत्मा हैं। सर्वशेष कौन है ज्ञान, ज्ञान के आधार पर में चाहे कुछ भी कारण हो, भगवान ने जो वर देवता, दे, ते हैं, वो वर भी असल में मेरे से आ रहा है। तो धरमराज तपस्या आरम्भ की थी, इच्छा थी। 1 महान राज्य प्राप्त हो, पर भगवान की भगवान का गुणगान करने से, चिंतन करने से, तपस्या पालन करने से। ऐसा भाव इतना परिवर्तन आया। जब भगवान ने कहा मांगो ध्रुव क्या, जे ने क्या कहा, मैं निकला था, शीशे शीशे को ढूंढने के लिए। मुझे ही हो। अगर आप मुझे वर देना चाहते हो। त ऐसा वर दीजिये कि मुझे उन भक्तों की संगत मिले। क्यूंकि उनके शिक्षा के द्वारा में भक्ती मे आगे बढ़ सकूँगा। ये होना चाहिए हमारा भाव प्रलाद। मनाज। भगवान ने कहा था जो वर चाहिए, प्रात मेरे भाग लो। तुमने मेरे कार ने इतनी तपस्या का पालन किया। राजा ने कहा जो शिष्य सेवा के बदले में कोई बलि सुख चाता है, वो क्या है, वो पारी है। मैं कोई व्यापार या धंधा आपके साथ नहीं करने जा रहा है। पर अगर आप मुझे वर देना चाहते हो तो ये वर दीजिये कि मेरे हृदय में जो काम वासना की इच्छा से इच्छा बिल्कुल समाप्त हो जाए, वे इच्छा बिल्कुल समाप्त, हम ज्ञान के कारण जुड़े रहते हैं। भौतिक सुख को प्राप्त करने के लिए, इंडिया से जुड़ने के लिए, आप भाग में भागवतम, स्कल में मा ययाति की कथा पढ़ते हो माँ थी, राजा थे पर काम बधिक कार्यों में जुड़ने की बहुत इच्छा थी उनके। उन्हें शुक्राचार ने श्राप दिया था की तुम बुरे व्यक्ति बन जाओ। क्यूंकि उनका सम्मान था? 4 की बेटी जो पत्नी थी रल के साथ, ये भी वर दिया था कोई बुरा व्यक्ति, जवान व्यक्ति अभी जवानी को बदल दे। आप के बढ़ावे पन के तो 1000 सालों के लिए पूरी पूरी पूरी सुविधा थी जाति तो 1000 साल के पश्चात होने का, 1 साल, 1000 साल प्रयास करने के बाद भी अपनी इंडियम को। संतोष नहीं कर पाये। तो श्रीमद भागवत में अनेक लीलाएँ हैं जिनके द्वारा हमें यह शिक्षा प्राप्त होती है। क्या की भौतिक कार्यों के द्वारा आप कभी भी अपने आपको संतोष नहीं कर पाओगे। तो जो बुद्धिमान व्यक्ति है वह क्या कहता है मुझे जुड़ने। 2 भगवान की सेवा में और भगवान की सेवा में जुड़ना है। ये भाव हमें रखना चाहिए मृदा का भाव तो भगवान के नाम का उचारण इस कलयुग में जैसे आप जानते हो दोषी दोष है बर 1 गुण है क्या क्या है 1 गुण 2 राजन प्रयास हमें नाम का उच्चारण करे और हमारा प्रयास है हम निष्काम भाव से भगवान की सेवा में जुड़े और हम निष्काम भाव से जुड़े गए। फिर ये मित्रता का भाव होगा। अगर हम सब में ये अपने स्वाद के ले, हमें ये मिलना चाहिए, हमें ये मिलना जाए। फिर मिस्र का भाव अनुकूल नहीं कर पाओगे। और अगर आप गुणों को देखो और ये भाव रहे। हमने। 1 दूसरे का सहयोग देना है भगवान के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए हम सब का लक्ष्य क्या है? विष्णु की प्रशंसा, अपनी प्रशंसा न, ये है शुद्ध भक्ति का संदेश बिहार सुदेव देव अनेक सास की रचना की थी, यह भी उन्हें लगा था में कुछ कमी रह गई है मुझे भी विचार कर रहे थे तो गुण नारदमुनी पहुंचे जिन्होंने क्या कहा हमने शुद्ध भक्ति का के ऊपर बल नहीं दिया है जिसके पश्चात उन्होंने श्रीमद भागवतम दिए। तो श्रीमत भागोतम द्वारा में शुद्ध भक्ति का संदेश मिल रहा है। हम सब में मृत का भाव होना चाहिए और ये सब का ये भाव हो जाए भक्ति योग में जुड़े और अपनी योग्यता के अनुसार हम भगवान की सेवा करें। किस में कम योग्यता है किसी में ज्यादा है भगवान गीता में क्या कहते है पत्र पुष्प, फल सोया तो आप कुछ नहीं कर सकते तो तुलसी का पता मुझे बंद कर। 2 ज्यादा बन कर। 2 पर प्रेम और भक्ति के साथ तो परम भगवान का जो संदेश है, बहुत महत्वपूर्ण है। खासकर के संस्था में हम सब का, मित्रता का भाव होना चाहिए। हम सब का लक्ष्य होना चाहेगा, भगवान को की सेवा करेगा और मित्र का भाव रहेगा और निस्काम भाव से हम सेवा में जुड़ेंगे क्या लाभ होगा। भगवान का जश्न देश है पोती के साथ फैलेगा, हवा का संदेश, इजी के साथ फैलेगा और संस्था भी एजी के साथ आगे बढ़ेंगे। इसलिए पापाजी ने कई दफा का यूनिटी यूनिटी लव, मी, शो कॉर्पोरेट। तो ये भाव हम सब को अनुकूल करना चाहिए। और ये सब सम्भव है कि
यह
संभव है अत्यंत सेंशल होना, पेड़ से भी ज्यादा सेंशल और गाय से भी ज्यादा पति। यह सम्भव है, कठिन है, पर संभव है आप? 1 कदम उठाओ भगवान की तरह भगवान। 10 कदम उठायेंगे जब हम थोड़ा भी प्रयास करते हैं, इन गुणों को अनुकूल करने के लिए भगवान और सहयोग देते हैं। इधर मे भगवान क्या कहते है जो प्रयास करते हैं? मुझे कुछ कमी भी हो, तो मैं क्या करता हूँ विश्वास होना चाहिए तो यह होना चाहिए। हम सब का भाव हम जिसका भाव से, सेवा से जुड़े, अपने स्वर के की सोचे पर भगवान की खुशी का सोचे और इस भाव से हम करेंगे। तो सचमुच वखुदताकबतनरएगा पापा जी कहते थे ये जो अनेक मंदन हैं, ये वह मे देली लंदन। न्यूयॉक में नहीं है। ये कहाँ है कुंदर का। वास का अर्थ है जहाँ केवल परम भगवान का गुणगान हो रहा है। कुंतर जगत का अर्थ है जहाँ क्लेश क्लेश है। वा। कुंदर का अर्थ है यहाँ भगवान का गुणगान हो और किसी प्रकार का क्लेश नहीं। कुंते धम वातन होना चाहिए। वो संभव है। अगर हम इस श्लोक का, कि संदेश का लाभ उठाए। ये रहना चाहिए। हम सबका प्रयास क्या, क्या विचार है, आपका रहना चाहिए। प्रयास करें तो हर कार्य सफल हो सकता है। और इस क्षेत्र में हमें प्रयास करना चाहिए। हां, कृष्णा का प्रश्न है हमें सोजाता। इस विषय पर कई लोग प्रश्न पूछेंगे। और इतना ज्यादा समय तो नहीं है जोर से कोर्डलेस माइक है कोई
हरे कृष्णा महाराज 2, नोट प्रणाम महाराज 2 प्रश्न हैं मेरा, आज थोड़ी डाउटस्थे महाराज। 1 तो यह है कि जीव पहले ही आलरेडी इतने कष्टों में है, तो खालिया शाश्वत जैसे भगवान बता रहे हैं तो इतनी तरह के जैसे आधिदेविक कष्ट है देवी देवताओं के द्वारा। जीव का। यह जीव के कर्म हैं या प्रकृति के नियम है। जैसे अब हीट का आपने बताया इतनी गर्मी हो गई है और फ्लड आ रहा है। और अभी 1 दिन बाद गुजरात के लिए भी 1 अनाउंसमेंट हो चुकी है कि बहुत तेज, तूफान आएगा। तो ये सब किसलिए इतना जीव को
कष्ट में ये जो 7 प्रकार के कष्ट हैं, इनसे बचना मुश्किल है। और ये जो प्रकृति द्वारा सजा मिलती है। ये हमारे कर्मों का परिणाम है। पृथ्वी पर पाप का बोजा तेजी के साथ बढ़ते जा रहा है। सारे विश्व में केवल भारत में नहीं और प्रकृति द्वारा कष्ट हर जगह प्राप्त हो रहा है। जैसे अमेरिका में, कैलिफोनिया में कई साल बिल्कुल, बारिश नहीं आई। सो ये जो प्रकृति द्वारा कष्ट है, ये भी कर्मों का परिणाम है। भगवान कहते हैं जेल खाने से निकलो, क्योंकि यहाँ कुछ न कुछ होता रहेगा। पर आज समाज की स्थिति बहुत भयंकर है। मैं सुन रहा था, उस दिन 1 लेक्चर प्रापर का। प्राजी ने कहा 1 दिन आएगा, ये पानी नहीं मिलेगा, पीने के लिए फल नहीं मिलेगा, खाने के लिए सब्जी नहीं मिलेगी, खाने के लिए क्या मिलेगा? केवल खून, पत्थर और फ्लैश ये भी आएगा योग में, क्योंकि इतना पाप बढ़ता जा रहा है तो उसका परिणाम भुगतना पड़ेगा। आप खुद दिन, पे दिन देख सकते हो। समाज की स्थिति बिगड़ रही है। आज भारत के कई स्थान हैं, जहाँ आपको 1 बूंद पानी का नही मिलेगा। आज के भासन में, बिहार में, यूपी में कई स्थान हैं, यहाँ 1 दिन पानी नहीं मिलेगा। 10 साल पहले तो ऐसी स्थिति नहीं थी। 10 साल पहले तो हम लड़का खुलाई छोड़ देते थे, हम सोचते थे पानी की कोई सीमा नहीं है। आज 1 बूँद भी बचाना, 1 बूंद भी बचाने का प्रयास मुझे मम्मे में कह रहे थे कि महाराष्ट्र में 1 बोटल पानी 2 रुपए में बिक रहा। से टैंकर वालों का बिजनेस अच्छा जा रहा है। यह पापों का परिणाम है।
थैंक्यू महाराज ये कोशन है की जैसे हम लोग कई सेवाओं में होते हैं तो सेवा करते करते, कई बार कई भक्तों के साथ हम लोग द्वेश कर लेते हैं और द्वेश की भावना उत्पन हो जाती है। लेकिन अभी परपरमेकहेहैकिदिसइस स्प्रूचलस्प्रूचल है। हा तो स्प्रूचल दिस एग्रीमेंट दिस अग्रीमेंट इस स्प्रूचलतोये कैसे स्प्रूचलहुआ मतलब ये है
मैं समझाता हूँ जैसे ये संस्था है जी बी सी बोली मान लो पैंत सदस्य है। कई बार जब नीज का अलग अलग एंगल होता है तो ये नहीं कि अपना स्वार्थ व भगवान की सेवाई करना चाहते हैं। ऐसे करो तो ज्यादा कोई करे तो भक्ति के, जैसे आज के मन में सब पढ़े लिखे लोग हैं तो अगर उनका भाव हो, वे इस नहीं, एशिया से नहीं की यही काम ऐसे तरीके से ज्यादा अच्छा हो सकता है। तो उस दृष्टि से यह कहा जाता है है। और अगर हम यह सोच रहे हैं हम ऐसे बोलेंगे की हम चाहते है, वो व्यक्ति असफल हो जाए, वो अलग भाव है। अगर जैसे आपके मंदिर में पंजाब, भाग
में
अलग अलग विचार होगा। यह भाव है कि हमने अपना स्वार्थ नहीं सोच रहे, हम मंदिर की भलाई के लिए सोच रहे हैं, अलग है। शो देश के भाव में आकर हम कुछ कहें, फिर वो अलग भाव है।
थैंक यू,
येस
जैसा हम सेवा करते हैं।
टेम्पल में जोर से बोले जो भी
गुरु के प्रतिनिधि हैं, जब हमारी स्पीचर अथॉरिटी हैं, या फिर जो सेवा की अथॉरिटी है, तो कैसे उनके प्रति और हम अच्छा फ्रेंडली भाव डेवलप कर पाए। जैसे कि गुरु के प्रतिनिधि के रूप में जान के और ज्यादा कैसे करे रिलेशनशिप कर पाए।
अगर तो आपको ठीक संदेश दे रहे हैं। अच्छा आचरण दे रहे हैं, अच्छा उदाहरण दे रहे हैं, फिर ठीक है। अगर कोई आपको शिक्षा दे रहा है और ठीक उदाहरण नहीं दे रहा। वो फिर इतना अच्छा नहीं। जो प्रतिनिधि 4 करते उनको एक्जेम्प रखना चाहिए, उनका आजरनभी बिल्कुल सास से धारित होना चाहिए। फिर लोग मानेंगे, वे लोग कहेंगे? हां, ये जो कहते हैं वो करते हैं। वे लोग कहेंगे कहते, कुछ करते, कुछ जी ने अनेक समय कहा प्लीज एग्जांपल in a right,
no
yes, all go you know that story of the guru।
हरे कृष्णा, बहुत बहुत धन्यवाद। महाराज जी, महाराज जी, हम देखते हैं जैसे कुछ कुछ अवगुण दिखाई दे रहे हैं, अवगुण दिखाई देते है भक्तो में, तो उसको कैसे अवॉयड करे और कैसे अच्छे गुणों को देते है।
आप ने देखा है इस भक्त में, ये अवगुण आप आदर के साथ उस भग ऐसी कह सकते हो। बाबूजी मैं इशा से रहित नहीं हूं तो मुझे यह कमी दिख रही है। आपके आज कल में ये सुधार करो तो भक्ति में ज्यादा आनंद आएगा की, जितनी पता होगी उतना ज्यादा आना आएगा। कई बार हम कहते हैं हमें बक्ती में आना नहीं आ रहा उसका कारण क्या है? उसका कारण यह है कि हम ध्यान से जाप नहीं कर रहे हैं। या ये मौका पालन। और आप अगर चाहे तो अपनो को खुद सुना सकते हो। या अब मंदिर के अधिकारियों से कोई सीनियर भक्त को कह सकते हो और सीनियर भक्त उसे कह सकता है। ये अगन हमने सुना है। अगर आप सुधार लो तो ज्यादा सरलता से भक्त में आगे बढ़ पाओगे। क्या अगर कोई व्यक्ति कमजोरी को नहीं सुधरे तो वो उसका दुश्मन बन जाता है। कहा गया है कि अगर गुरु शिष्य को नहीं सुधारे, अगर उसमें कमी है और जानता है तो वो उसका दुश्मन है। तो असली मित्र वो है जो कि कमियों को सुधारने में सहयोग देता है। जल्दी ही जल्दी करना पड़ेगा।
अरे कृष्णा थैंक, यू महाराज, बहुत अच्छा महाराज। जैसे अभी बात कमियों की कर रहे हैं। पर कई बार ऐसा लगता है कि सभी विचार बहुत अच्छे हैं। पर अच्छे विचारों में से सर्वोत्तम विचार को कैसे समझ के? क्योंकि सभी डिोटीसकेअपनेपने विचार होते हैं, सभी लगते हैं। शास्त्र सम्मत है और कौनसा इम्प्लीमेंट करना है। अब जोन से होता है। बाकियों को लगता है कि हमारे वाला ज्यादा बेटर था या उसके वाला ज्यादा बेटर था। तो ऐसी परिस्थिति में क्या करे?
प्रौपर? प्रौपर ने स्किल मैनेजमेंट के लिए 1 स्ट्रक्चर दिया है। गे जी, बी, सी प्रेजिडेंट, वाइस प्रेजिडेंट। वगैरह। हमें जो मंदिर के अधिकारी हैं, उनमें थोड़ा विश्वास होना चाहिए। अंत में किसी ने तो निर्णय लेना है। यह नहीं कि हर व्यक्ति मनमानी करेगा। तो अगर आपके मंदर के अधिकारियों ने कहा है, इस रास्ते से चलना चाहे हमें साथ देना चाहिए। चाहे आपका विचार अलग हो, यह नहीं कि हर कार्य होगा। हमारी इच्छा के अनुसार कई ऐसे विचार रहता है। हम सहयोग देंगे, केवल अगर तुम हमारे इशारे से चलोगे। हमें दूसरों की बुद्धि को भी थोडा आदा देना चाहिए। ने हमें भगवान की खास कृपा। ओके और यस, यस
हरे कृष्णा महाराज महाराज मेरे को। ऐसा लग रहा है जैसे हमारे दिल में बहुत ज्यादा, बहुत इच्छा का बना रहा है। और लेकिन साथ साथ में आध्यात्मिक उन्नत करना चाहते हैं। लेकिन ऐसा लगा हुआ है कि जैसे बीच में लटके हुए हैं। नहीं तो बहुत ही सुख ले पाते हैं न। ये भी आध्यात्मिक सुख नुभूति हो पाती है। तो कैसे करे?
इसको नहीं, आध्यात्मिक सुख प्राप्त हो रहा है। अगर आपको अध्यात्मिक सुख नहीं प्राप्त हो। ता स साल थोड़ी जुड़े रहे। आप कब की छोड़ देते है की नहीं।
श्वास है महाराज की। यह प्राप्त होगा क्या? लेकिन अभी प्राप्त नहीं हो रहा। महाराज रिलाइजेशन नहीं हो रहा है।
लेकिन विश्वास है, पूरा रेलाइजेशन हो रहा है। यह आपकी गलती है। अगर रेलाइजेशन नहीं हो रहा होता। आप इतने सालो से क्यों जोड़ते आप रोज नाम का जाब क्यों कर दे। आप कब क्यों छोड़ देते हैं, कई लोग छोड़ देते हैं। आपको टेस्ट आ रहा है, भगवान की कृपा प्राप्त हो रही है। सब गुण प्राप्त होने से। और इसी इरादे पर जुड़े रहो सारे, गुण प्राप्त होते जायेंगे, हम गुन भरते जायेंगे।
हरे कृष्णा महाराज, थैंक यू वेरी मच। महाराज। मेरा प्रश्न है की आपने जैसे श्लोक में बताया की जो भक्ति के अनुकूल है, मित्रता का भाव और मित्रता का भाव जो है तभी डेवलप होगा जब हम निष्काम भाव से भगवान की सर्विस करेंगे।
हम 1 दुसरे के गुणों को देखेंगे कहते है।
तो शुरू में जब हम भक्ति में आते है तो हमारा इतना निष्काम भाव नहीं होता, कोई न कोई मैटरियल जैसे बताया डिजायर्स होती है। तो ऐसे में जो है हमें मित्रता की जगह चतुरता का ज्यादा अनुभव होता है। तो इसको कैसे जो है हम इनिशियल स्टेज पर, क्योंकि जब तक वो डेवलप करेंगे तो हमारे हमारे अपराध होंगे, अपराध होंगे तो हमारी भक्ति और उसमे
ऑप्स्ट्रिकल कहा जाता है। साधु संग में रहो। अगर आप साधु संघ में हो गए। और जैसे ध्रुमा ने कहा अगर आप मुझे देना चाहते हो तो उत्तम भक्तों की संगत 2 तो उत्तम भक्तों की संगत की इच्छा क्यों रखी जाती है? उत्तम भक्त हमें कहेंगे ये गलत है। इसे सुधारो मे सुधारने को तैयार हो जाना चाहिए। हमें यह नहीं सोचते। वो कह रहा है क्यूँ की उसके हृदय है। अभी हमें क्या स्थिति है। कोई भी हमारे सुधार के लिए कुछ कहे। हमें एकदम कह देते हैं। द्वेश रशिया ने कहा, सिन्हा की सुनी चाहिए, इसका अर्थ क्या है? इसका यह अर्थ नहीं है। आप हस्ते प्रणाम करते जाओ। सबको हाथ जोड़कर इसका यह अर्थ है। हम स्वीकार करते हैं, हवा में कमियां हैं, हमें शिक्षा चाहिए, डिरेक्शन चाहिए, सुधार चाहिए, तैयार होना। देखने को चेतिमाप्रभुसरस्वदी के साथ थे। उन्होंने कहा आप भाग जैसे हरी नाम करते हो, हमारे साथ बैठकर विधान अध्ययन कर दे। उन्होंने बड़ी नमृता से क्या कहा? मेरे गुरु ने देखा और कहा तुम तो मूर्ख हो, तुम्हारे में केवल नाम की योग्यता है और योग्यता है ही नहीं, यह होना चाहिए हमारे। हम मूर्ख हैं की संगत में रहकर सुधरने आये हैं। सोचेंगे हम सब सुधर गए हैं। दूसरे से सुधरने की किसी की शिक्षा लोग नहीं। येस ओके
धन्यवाद महाराज बहुत अच्छे ढंग से आपने समझाया महाराज हमारे पास 2 ऑप्शन्स हैं, मुझे टीम में काम करना है कुछ भक्तों के साथ, तो मैं वही टीम चुनना चाहूंगा जो मेरे लाइक माइंडेड लोग हों। ताकि प्रोजेक्ट अच्छे ढंग से आगे चले। और ऐसी टीम दी दी है जिसमें हर कोई स्वार्थ से चल रहा है। ओपरेट करो तो पूरा प्रोजेक्ट ही पीछे हो जाता है।
सौरी
हमारे पास 1 ऑप्शन ये है की टीम चुने भक्तों की जो सारे लाइक माइंडेड हो। ताकि मेरा जो प्रोजेक्ट अच्छे ढंग से चले। लेकिन मैं ऐसी टीम में डाल दिया जाता हूँ जहा सब का अपना अपना अलग अलग स्वार्थ है तो वो आपस में लड़ाई होती रहती है। आगे चलता नहीं। तो फिर कौन सा प्रेफर करना चाहिए।
हम सोचते है, सबका स्वागत है इसके हम क्या सोच रहे हैं। हम हंड्रेड प्रतिशत ठीक है, बाकी सब बुंदू है। यह सोचना भी गलत है।
अगर
अगर दूसरों को भी इस 2 क्वेशन क्या है तो ये बेहतर नहीं रहेगा।
हमारा लाइक माइंडेड लोगों का टीम बने
और ताकि हम सेवा और अच्छे ढंग से होती रहे।
हम सब को लाइक माइंड होना चाहिए। यही तो स्टॉक में कहा जाता है। मित्रता का भाव मीन लाइक सोचते रहेंगे, हम ठीक है, दूसरे गलत है फिर मित्रता का भाव होगा ये बात भी है। कई बार लोगों के अलग अलग उच्चारण होते हैं, आप अलग अलग टीम भी बना सकते हो। वो भी संभव है। we have to have faith in a managment structur। जो जो मैनेजर्स हैं वे हैव टू वेरी एग्जामपलली
no
oka none no question from the ladies।
अरे कृष्णा महाराज मैं ये पूछना जाता की जैसे जो अच्छे भक्त होते हैं जब वो उनकी प्रशंसा करते हैं तो उनको देख के बहुत भक्त उनको फॉलो करने की कोशिश करते हैं। तो भक्तों को अपनी प्रशंसा अच्छी क्यों नहीं लगती कि वो नहीं चाहते कि उनकी प्रशंसा हो तो ऐसा क्यों होता है बल्कि और भक्त उनको फॉलो करेंगे
उनकी इच्छा नहीं प्रशंसा करने की और दुसरे करना चाहते हैं। ये आपका प्रशन वैसे वह खुद भी जाता कोई प्रशंसा करे दूसरे वैश्ना की प्रशंसा करने में पचते नहीं हैं। वैश्ना नहीं चाहता उसका गुणगान हो पर कभी कभी अगर दूसरे वैश्ना उनका गुणगान करे तो सह लेते हैं। कठिनाई से कोई जाता नहीं, वैश्ना उनकी प्रशंसा हो, अगर होती हो तो निवृत भाव से उसे स्वीकार कर लेते। और ये नहीं सोचते वन वे है। मैं इतना अच्छा हूँ देखो सब मेरा गुणगान कर रहे है। वो सोचते है मेरे में कोई गुण नहीं है की कृपा है कि वो इतने दयालु बन रहे।
गुरु महाराज। मेरा प्रश्न है कि जैसे आज के स्लोक में हम सुन रहे हैं कि भक्तों से मित्रता होना चाहिए। तो जैसे 1 आश्रम में रहने वाला भक्त है और दूसरे भक्तों को जो आश्रम में रहने वाले उनके अंदर कमी न देखकर। गुणों गुणों को देख कर तो उनसे मित्रता स्थापित हो सकता है। लेकिन जैसे बाहर जब पारिवारिक रहते भक्त हैं उनसे अगर हमारा मित्रता होगा तो फिर हम उनसे आसक्त हो जाएंगे। फिर हम भक्ति से क्या बिजलि नहीं हो जायेंगे।
सबके प्रति मित्रता का भाव रखो पर इसका ये मतलब नहीं यह अपने आश्रम में सुधार की सुरक्षा नहीं करे जैसे की ब्रहमचारी को कहा जाता है सतियों की संगत से जुधार रहना मित्रता का भाव हम रख रहे है। हमें आश्रम को अपने आश्रम को बचाने के लिए सावधान भी रहना पड़ेगा मित्र का भाव का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए तो सब के प्रति मित्रता का भाव रखो और जो आश्रम है उसकी सुरक्षा की चिंता भी रहनी चाहिए। ओके हरे
हरे कृष्णा महाराज महाराज कई बार क्या होता है कि सेवा में अथॉरिटीज जैसे हमें कुछ आदेश देती है। लेकिन हमारे मत अलग अलग होते है। उसमें तो हम तो पालन कर रहे हैं। उसका साथ वाले भक्त जो है जिनके साथ हमारी सेवा है वो अथॉर्टी की निंदा पर निंदा किए जा रहे हैं। तो फिर हमें उसको कैसे लेना वैश्नव निंदा लेना चाहिए या फिर उसका ये सोचना चाहिए कि वो अपना हदय शेयर कर रहे हैं। उसको कैसे लेना चाहिए।
भारत
अगर कोई निंदा कर रहा है। दूसरे भक्तों की सबसे बेहतर यह है। आप वहाँ से जुदा हो जाओ। कहो? प्रभु जी, मैं तो पति बैठा हूँ, निन्दा नहीं सुनना चाहता। अगर कोई कमजोरी है तो आप विनम्रता से समझा सकते हो, उसकी चर्चा कर सकते हो। अनिन्दा से हमें बचना चाहिए, वो हमेशा अपराध बन जाता है।
महाराज कई बार पता की सेवा उनके साथ ही करना है, उनसे अलग होके कर ही सकते थे। उनके साथ में रहना ही रहना है। तो फिर क्या कर सकते हैं?
दे ही डूइंग। शेयरिंग इस हाड अगर आप कुछ अवगणों को देखो और विनम्रता से उन्हें सुधारने का प्रयास करो। ये देश नहीं है। अगर आप निंदा कर रहे हो। इसीलिए आप दूसरे व्यक्ति को पसंद नहीं करते हैं, या उसके सेवा को पसंद नहीं करते। वो ठीक नहीं है। पर हम ये नहीं कहते की अगर आप कोई सुधार सुधार देख रहे हो, सुधारना चाहते हो, म सुधार। जैसे कि प्रॉपर मंदिर में जाते थे, जब देखते थे, कोई कुछ कमी है, गंध है, तो वो सुधारने का प्रयास करते थे, तो वो वैसा अपराध नहीं होता। अगर आपको लगता है कि अथॉरिटी में कमियाँ हैं, हम कह चुके हैं, विनम्रता से सुना सकते हो, आप जो मंदिर के अधिकारी हैं, उनसे चर्चा कर सकते हो। पर एशिया देश का नही होना चाहिए। ओके 1 क्वेश्चन के बाद बंद करना पड़ेगा।
हाँ,
यह नाम
अरे कृष्णा राज ने बहुत बेनिफिशल स्पीच दिया, उसका बहुत लाभ हुआ।
स्लोक बिता सारा उमेश बोले क्या बोला
जी, बहुत लाभदायक था। महाराज गुरु। महाराज आपने बोला कि शुद्ध भक्ति पर ध्यान देना चाहिए। और भक्ति का 1 लक्षण है। अव्यर्थ कालत्व। तो इस प्वाइंट तक कैसे पहुंचे। जब यह आभास हो कि समय वेस्ट न और भगवान की सेवा में जाए, हर समय इस इस प्वाइंट तक कैसे पहुँच सकते हैं।
समय लगता है, प्रयास करना चाहिए। गॉड दोज उनका सहयोग करते हैं। जो खुद प्रयास करें, ये उम्मीद नहीं करते कि आप जुड़ते ही तुरंत ही पहले दिन से ये भाग प्रगड करोगे। ये हमारा उद्देश्य होना चाहिए, यह हमारा लक्ष्य होना चाहिए, हमें प्रयास करना चाहिए। इस सीरी तक पहुँचने के लिए। हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि जुड़ते ही हमारे सारे गुण आ जायेंगे, अगर प्रयास करते रहे। शासन विधि के अनुसार। फिर ये मा प्राप्त हो। सकेगा केन
गरम बहुत बहुत धन्यवाद, बहुत सुंदर प्रवचन, बहुत शिक्षा। आपने से बताया महाराज। जैसे आप। 1 कथा के दौरान 1 स्टोरी बता रहे थे कि 2 पुत्र, 1 पिता की सेवा करते हैं और 1 जो है दोनों आपस में लड़ते हैं और
पिता को नुकसान पहुंचा है, व मरने
मारने लग गए है। तो महाराज इसी प्रकार से जब 2 शिष्य आपस में लड़ते हैं, आपस में जो है, वाद विवाद करते हैं। तो क्या ऐसे गुरु को भी इसका रिएक्शन या उसका फल मिलता है? उनको भी इसका मतलब कष्ट होता है? गुरु को भी
कितना कष्ट होता है, वो मुश्किल है। गुरु चाहता है कि सब शासन के नाम पर प्रेम से आगे बढ़े। क्या कहा लफिशोनहकॉरपरेट प्रापा जानते हैं की कल युग में लोगों की आदत है। आर्गुमेंट करना, झगड़ा करना, यह करना। इसलिए उन्होंने कहा, हमें प्रयास करना चाहिए कि हम मित्रता से चले और झगड़ा कम करे, यहाँ माताजी। i think he ricsnagormharage ask if we
are following temple athoritiesandin some work, we
are getting hurdels from devoties, so i should be stop, or should be manane,
because if you mean esmt feels that we doing contedicti to some other devotes so, what should be do
we should be on us and try our best thats ell we should onushetritoto the right thing other people a credit the people are critic try to be on is ओके call you nothing is easy and easy no this so many complication, what we have to make in on us attemp and by hearing, what is the lord s are inspire try in followr? question can not be anseidinone?
कलास
सो बहुत बहुत धन्यवाद पर हम पूजनीय गोपाल साह महाराज जीक
लेहले लामरामाररे।
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