श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी आविर्भाव दिवस | 14 Feb 2024 | ISKCON Juhu | Srila Gopal Krishna Goswami

The video records a devotional lecture at ISKCON Juhu on 14 February 2024, marking the appearance day (avirbhav divas) of the 19th‑century saint Srila Raghunath Das Goswami. Srila Gopal Krishna Goswami, assisted by a co‑speaker, recounts the saint’s lineage, early spiritual inclination, and key teachers such as Haridasa Thakur and Chetan Mahaprabhu. They describe his wealthy Bengal family, the financial scandal involving his father and uncle, and the subsequent confrontation with the Muslim Nawab. Raghunath Das’s repeated attempts to flee home, his eventual renunciation, and his service to the king are narrated, highlighting his use of personal wealth for devotional service, his establishment of simple prasadam, and his role as a secretarial aide to senior devotees. The discourse then shifts to the saint’s core teachings: avoidance of materialist discourse, exclusive focus on Krishna katha, consumption of plain food, and the importance of humility and devotion. A substantial portion of the lecture consists of a dialogic exchange emphasizing simplicity in prasadam and attire, the virtue of offering respect without expectation, the necessity of chanting the holy name (often cited as 100,000 repetitions daily), and the rejection of seeking material gain or status. The speakers narrate a crisis moment when Raghunath Das contemplated suicide, which was averted through divine counsel to engage in intensive chanting, leading to his renewed dedication. Miraculous episodes, such as Radharani providing a protective umbrella during intense japa, illustrate divine care for sincere devotees. The lecture concludes with practical instructions for devotees: maintain humility, dress simply, serve others without expectation of respect, continuously chant the Hare Krishna mantra, and observe the rituals of the appearance day with reverence and joy.
Chapters
red जैसे आप जाते हो। आज बहुत sud बहुत शुभ है। आज है में अनेक सीजन में सबसे अच्छा मौसम आजाता है। वसंत पंचमी है। मंच में पूजा सारे लिंग है। पहले तो मैं गनबोसवामीपचरचा करूँगा, फिर मुझे जाना है। सुना
पीछे आपको समझ में रहा है ा भाव आज बड़ा ही शुभ दिन है। आज 1 महान संत श्री रगुनातदासगोस्वामी का दिवस है।
2 नो को मनाते हैं।
हम अविरभाव और त्यरोभावदोनो को मनाते हैं,
क्या करते हैं,
हम क्या करते हैं। उन दिनों पर, उन आचार्यों की लीलाओं और शिक्षाओं पर ध्यान देते हैं।
रंग गोस्वामी गोस्वामी में सबसे पहले मिले,
रघुनाथ, दास गोस्वामी, सभी 6 गोस्वामी और सबसे पहले चेतन महाप्रोम से मिले थे, गोस्वामी हैं।
इन्हें नारी का अवतार माना जाता है।
लगुना 10 गोस्वामी को मंजरी का अवतार माना जाता है।
कि गोपियों का सहयोग देती है।
सेवा में मंजरियाँ वो होती है। जो गोपियों की सेवा करती है, भगवान गोपियों की सहायता करती है, भगवान की सेवा करने में। बहुत धनी खानदान में रगुनाथ 10 गोस्वामी का जन्म जो हुआ था बहुत धनी खानदान में हुआ।
उन दिन में 540 साल पहले उनके
पिता की आमदनी 20 लाख 540, 540 साल पहले रगुनदसगस्वामी के पिता की आमदनी थी 20 लाख रुपए। आज जिस दर से महंगाई बढ़ी है, आज तो करोड़ रूपए हो जायेंगे।
वो सो
रगुनामातापिताहैरगुना 10 को स्वामी अकेले पुत्र थे। अपने माता पिता के पिता का नाम है गोरधन मजुमदार। उनके चाचा का नाम है हिरन मजुमदार। दोनों बड़े प्रसिद्ध थे।
वहाँ पर बंगाल में रगुणादासकी रूचि किसी भौतिक क्षेत्र में नहीं थी।
बचपन से पैदाइशी रगुनदासगोस्वामी की रूचि जो थी, किसी भी भौतिक क्षेत्र में नहीं थी। शुरू से आध्यात्मिक थे, देखते हैं कोई
धनी खाना न हो, बुरी बुरी हाजलिमबढ़जाती है।
आजकल हम देखते हैं कोई व्यक्ति धनी खानदान में जन्म लेता है तो उन्हें बुरी आदतें पड़ जाती हैं। प्रभात रगुनादासमें वो प्रभाव नहीं था।
छोटी आयु में उन्हें हरा ठाकुर की
संगत मे छोटी आयु में ही उनको हरिदास ठाकुर की संगत मिली।
हरिदास ठाकुर नाम छाया 3 लाख करते थे।
हरिदास ठाकुर नामा चरे है, जो डेली 3 लाख नाम जप करते थे।
सो, और और महाभुज के विषय में ज्ञान उन्होंने प्राप्त किया था।
सो, आध्यात्मिक भक्ति के विषय में रगुनादसगोस्वामी ने हरिदास ठाकुर से ज्ञान प्राप्त किया।
रघुलाल की कोई रूचि नहीं थी। घर में है।
रगुनत की कोई रुचि नहीं थी। घर में रहने के लिए
है मा
रगुनाथ गए थे। चेतन महारों को मिलने
बहाना बचाया बहाना
बना कर
सो मिले। रगुनादसमिलेचेतनमाप को मिले। रगुनादसऔरउनने ऐसी इच्छा पकड़ के मुझे े छोड़ना चाहता हूँ।
और रघुनाथ ने चेतन महा प्रो के सामने ऐसी इच्छा प्रकट की कि मैं घर से छूटना चाहता हूँ।
नहीं, मुझे छोड़ो वाली हो।
रघुनाथ को चेतन महापुरो ने कहा नहीं, अभी तुम घर में ही रहो। जैसे कि 1 तुम भौतिक वादी व्यक्ति हो।
गुना घर लौटे।
रगुनादस घर लौटे उनकी
घर छोड़ते थे। उनके साथ 10 सिपाही साथ होते थे तो भाग न जाए।
रगुना कहीं भी जाते थे तो उनके साथ 10 सिपाही साथ में जाते थे कि वो कहीं भाग न जाए, छोटी
आयु में भी
प्रयास करे, छोटी आयु में भी रगुनाथ जो है, वो घर से भागने का प्रयास करते थे।
माता के हमारे बेटे की कोई खास रूचि नहीं।
उनके माता पिता को पता था कि हमारे बेटे की कोई खास रुचि नहीं है। भौतिकता में, तो
माँ बाबू के कहने पर घर लौटे और हरे भरभारकरनेलगेससायिक व्यक्ति
है माता पिता के कहने पर वो घर लौटे और ऐसा व्यवहार किया माँ
बाप के कहने पर महा प्रभु के
कहने पर वो घर लौटे और ऐसा व्यवहार किया जैसे वे सांसारिक व्यक्ति हैं।
1 बार गुरु आये, खदानी गुरु,
1 बार रघुनाथ के जो कुल गुरु हैं, वो आये थे यदुनन्दन आचार्य, वो उनके
घर आये थे, और वो आये, उन्होंने पूरे गुलिका। उन्होंने कहा कि मैं या में जानना चाहता हूँ 3 सालों के, तो जब
वो आये, यदुनंदन आचार्य तो रघुनाथ ने कहा कि मैं तीर्थ सलोगी यात्रा पर जानना चाहता हूँ।
थोड़े समय के लिए थोड़े से उनके साथ गए, रगुनाथ उनके साथ गए।
थोड़े समय के लिए रगुनाथ उनके साथ गए।
उन दिनो में मुसलमानों का राज था,
उस समय मुसलमानों का राजा था, उनका शासन था, उनका शासन था।
जैसे आप जानते हो बोले सनातन गोस्वामी। 1 समय नवाब हुशेंशा जो कि आया था, उनके राज्य का शासन कर रहे थे।
आप लोगो को पता है। 1 समय रूपगोस्वामी स्वामी जो है वो बंगाल के राजा नवाब भुसंशावहाँ पर राज करते थे, उनके साथ सेवा करते थे।
तो कई बार लोग पूछते हैं कि वे गोस्वामी थे, ब्राह्मण थे, वो क्या? 1 मुसलमान राजा के राज्य में काम
करने लगे, कई बार लोग पूछते हैं कि वे भी दोनों गोस्वामी थे, ब्राह्मण थे। तो फिर क्यों? 1 मुसलमान शासक के यहाँ वो सेवा करते थे।
कहा जाता है की राजा मुसलिम था, उपजा थी लगभग हिंदू, राजा चाहता था की ऐसे व्यक्ति को सरकार का फेस बनाए, लोगों की श्रद्धा हो।
तो उस समय राजा तो वो तो मुसलमान था, लेकिन प्रजा लगभग हिंदू थी, तो राजा का सोचना था कि कोई ऐसा चेहरा हो सरकार का जिससे लोगो की श्रद्धा हो।
कौन है उसके राज्य में जो लोग बोल श्रद्धा से मानते है ये खोज कौन है उनके राज्य में लोगों का विश्वास है।
तो राजा ने यह खोजना चालू किया कि कौन हैं उनके राज्य में जिनको प्रजा बहुत मानती है।
2 भाइयों के में सूचना प्राप्त हुई,
तो राजा को इन 2 भाइयों के बारे में सूचना प्राप्त हुई।
राजा जबरदस्ती
राजा ने उनको जबर्दस्ती अपने साथ सेवा करने के लिए मजबूर किया
तो उस समय जो हारा के रघुनाथ के पिता और चाचा थे, उन्होंने सरकार की बहुत बड़ी की जिम्मेदारी उठाई थी।
उस समय जो रगुनाथ के पिता और चाचा थे हिरनी मजुमदार और गोवर्धन मजूमदार सरकार की जो बहुत सारी जमीन थी उसकी जिम्मेदारी उन्होंने उठाई थी और
जो कर सरकार को देना था पूरा नहीं
दिया और उन्होंने जो कर सरकार को देना था वो पूरा नहीं दिया, तो
वो गिरफ्तार कर लेंगे, राजा भर जाएगे
जाके तो मुसलमान काजी ने कहा कि इन दोनों को गिरफ्तार करके राजा के पास लेा, अरे राजा के पास ले तुम्हारे पिताजी। रघुनाथ ने कहा मुझे तो पता नहीं कहाँ है तुम्हारे चाचा। उन्होंने कहा मुझे पता नहीं है,
हम भी तुम्हे पकड़ कर, गिरफ्तार कर।
राजा के मंत्री ने कहा अभी हम तुम्हे पकड़ के गिरफ्तार करके ले जाए।
पिता
हाथ में आयेंगे, जब तुम्हारे पिता हमारे हाथ में आयेंगे तब हम तुमको
छोड़ेंगे होगा, घबराया नहीं। वो राजनीतिक कार्यों में भी तेज थे। वो जो भाई राजा के सामने, राजा ने कहा कहो का है तुमारे पिता और चाचा ने इतना बड़ा पैसा घोटाला किया है समय वो बीच में से उनकी रकम,
तो राजा के सामने जब रघुनाथ को लाया गया तो राजा ने बोला कि कहाँ है तुम्हारे पिता, तुम्हारे पिता और चाचा ने जो है बहुत बड़ा घोटाला किया है। सरकारी पैसों का अभी कहाँ हैं
जो घर में माँ बेटे अमन हो जाती है। 1 ही है।
तो रघुनाथ ने इतना पवित्र और मधुर वाणी से कहा कि बहुत फर्क पड़ा। राजा को। राजा से कहा कि कभी चाचा भतीजा में, कभी भाइयों में झगड़ा हो जाता है, वो तो होता है फिर वो साथ में हो जाते हैं।
ह गुना ने इतनी मिठास से उस राजा को उपदेश दिया वो राजा की आँखें पिघलने लग गए, न निकलने लगे।
रघुनाथ ने इतना मिठास से उनको उपदेश दिया कि राजा का ऋदय पिगल गया और उनकी आँख से आंसू निकलने लगे।
तो छोड़ 2 इसे निर्दोष है।
राजा ने कहा छोड़ 2 इसे, ये तो निर्दोश है।
और अपने पिता और चाचा को लेकर। और
फिर रगुनाथ अपने पिता और चाचा को लेकर राजा के प्रतिनिधि से मिलाने
ले आया और उन्होंने सेटलमेंट कर दिया
और उन्होंने फिर सेटलमेंट कर लिया।
आपस में तो प्रौपालेलीलाके कहते हैं जो भक्त हैं हर शेर में तेज रहता है।
रोपा जी इस लीला के तातपरेमें कहते हैं जो भक्त है वो हर क्षेत्र में तेज रहता है।
भक्त को पता है कि समस्या का हल कैसे किया जाता है।
भक्त को पता है कि समस्या का हल कैसे किया जाता है।
और थे रघुनाथ ने अपनी बुद्धि लगाई उनका उद्धार करने के लिए, जैसे की
जब रघुनाथ के पिता और चाचा मुसीबत में थे तो रघुनाथ ने बुद्धि लगाई अपने पिता और चाचा का उद्धार करने के लिए।
भक्त को आध्यात्मिक क्षेत्र में तेज रहना चाहिए और भौतिक क्षेत्र में रहना चाहिए
तो भक्त को आध्यात्मिक क्षेत्र में और भौतिक क्षेत्र में दोनों में तेज रहना चाहिए।
स्वामी का विवाह कर दिया था उनके
माता पिता ने रघुनाथ गोस्वामी का विवाह कर दिया था उनके माता पिता ने,
उन्होंने सोचा कि हमारे चौकीदार से रोक नहीं सकते। 1 लड़की से शादी कर हैतो फँस जाएगा।
तो उनके पिता ने सोचा कि ये चौकीदार तो इनको रोक नहीं पा रहे हैं, अगर 1 सुन्दर लड़की से इनका विवाह कर दिया जाए तो फिर रघुनाथ फंस जाएगा।
10 10 चॉक उनके साथ जाते थे,
उनका मन नहीं भरा, 10 चौकीदार उनके साथ जाते थे फिर भी वो रघुनाथ क मन को घर पर नहीं लगा।
उनके पिता ने माता की थी बेटे को बांध देना चाहिए घर में।
रघुनाथ की माता उनके पिता को कहती थी कि हमको बेटे को घर में बांध देना चाहिए
ने कहा उसे कैसे बंद हो गया।
तो उनके पिता ने कहा की रघुनाथ को तो ये खूबसूरत लड़की भी नहीं बन सकी तो फिर हम कैसे रस्सी से बांध सकते हैं। रघुनाथ की पत्नी सबसे खूबसूरत स्त्री थी
पृथ्वी पर वो उसको घर में नहीं
रोक सके, वो भी उनको घर में नहीं रोक सके जो
धनी है और वो गए पास पानी हाथी में रगुनाथ
10 धनी थे और वे गए नित्यानंद प्रभु के पास पानी हाथी में
बैठे थे।
ऊँचे पत्थर पर नित्यानंद जो थे वो ऊँचे पत्थर पर प्लेटफार्म पर बैठे थे
ने देखा ये आ रहा है रगुनाथ।
नित्यानंद ने दूर से देखा कि रघुनाथ
आ रहा है को जोड़ दिया था
सरूप दामोदर के साथ रघुनाथ को चेतन महापुर ने जोड़ दिया था स्वरुप दामोदर
के साथ गुना माँ बहू ने खास जिम्मेदारी ली रूप दामोदर को रघुनाथ को
महा प्रभु की अनंत कृपा प्राप्त हुई और महा प्रभु ने खास जो है सेवा दी थी। स्वरुप दामोदर को रघुनाथ का ध्यान कौन थे? स्वरुप दामोदर कौन थे महा प्रभु के सेकेटरी महा प्रभु के सेक्रेटरी
थोड़ी देर के लिए उनके से बन गए और
रगुनाथ जो है वो सौरभ दाम बदर के सेक्रेटरी बन गए तो
रगुनाथ खड़ा
है
पेड़ के पीछे छुप रहे।
नित्यानंद ने कहा रघुनाथ कहाँ है वो
चुप क्यों रहा है वह आओ इधर और रघुनाथ के पाव रखा ने तो।
नित्यानंद ने कहा रगुनाथ को आओ इधर और फिर नित्यानंद प्रभु ने अपना चरण जो है वो रगुनाथ के सर पर
रखा तुम चोर हो तुम मेरे सामने आते नहीं हो।
नितिन ने कहा कि तुम चोर हो तो मेरे सामने आते नहीं हो
को
खाने को 2 तो अभी तुमको दंड दिया जाता है कि सभी ब्राह्मणों को यहाँ पे तुम खाने को 2
हा गया अपनी सम्बद्ध उपयोग करो वन की सेवा में हो गए।
रगुनाथ को जब यह कहा कि अपनी सम्पत्ति का उपयोग करो वैष्णव की सेवा में, तो बड़े प्रसन्न हो गए
या दूध शक्कर।
तो रघुनाथ ने अपने सेवकों से कहा कि जाओ बाजार में और लेके आओ दूध दही चिवड़ा शक्कर माया जितना का तो इतना इतना सामान था कि सबको उन्होंने वहाँ पर बैठा कर खिलाया।
सब को
जैसे ही पता पढ़ रहा था की यहाँ पर बड़ा फीस सदर रहा है तो और ब्राह्मण आने लगे,
दूर दूर से आने लगे, बराहमण आने
लगे
भी मनाते हैं, ऐसे हुआ तो
जो पानी आर्ट फेस्टिवल आप लोग मनाते हैं यहाँ पर भी मनाते हैं। वो इसी लीला के अंतर्गत है।
सो कितने उत्साह के साथ खा रहे हैं।
गुना 10 बहुत प्रसन्न हो गए। उन्होंने जब देखा की कितने उत्साह के साथ ये भक्त सब प्रसाद पा रहे
हैं, उन्होंने सबको खिला दिया, वो भी खत्म हो गया और फिर को लाइन में लगाकर जी ने प्रसाद खाना शुरू किया।
रगना ने जब देखा कि ब्राह्मणों ने जो है उनको जो प्रसाद दिया गया वो सब खत्म हो गया। तो उन्होंने और मंगाया वो भी खत्म हो गया तो फिर और मंगाया फिर नित्यानंद प्रभु लास्ट में सभी को 2 लाइन में बैठा है और अपने हाथों से प्रसाद जो है वो सेवन करना
बैठने की जगह थी वो भी समाप्त
हो गई, जो बैठने की जगह थी वो भी समाप्त हो गई गंगा तो लोग दूर दूर तक बैठे थे गंगा के तट पर स्थान जब खत्म हो गया तो गंगा में, नदी में भी जाकर बैठ रहे थे।
तो
1 दिव्य लीला प्रकट की नतानंप्रोनेफिर, 1 दिव्य लीला प्रकट की
प्रभु उनके सामने खड़े हैं है हर व्यक्ति के पास,
नित्यानंद बाबु ने चेतन महरोको प्रकट कराया और फिर वहाँ पर दोनों चेतन सभी भक्तों को खिला रहे थे प्रसाद को प्रकट करवाया पहले नित्यानंद प्रभु खिला रहे थे फिर उन्होंने अपनी आध्यात्मिक शक्ति से महाप्रभु को भी प्रकट कराया इस
लीला को व्यक्ति नहीं देख सके केवल चेतन महाप्रभु नित्य लीला को देख सके,
इस लीला को हर कोई नहीं देख सका चेतन को सिर्फ नित्यानंद चैन महाप्रभु ही देख सक। इस प्रकार नेतानंदजो है ये उन्होंने लीला
प्रकट to और उनके पिता ने भी प्रति देव को भेजा शिवरेंद्र सैन बड़े से तुम लोगो ने देखा है किसी ने रगुनाथ कहाँ है।
तो इसके बाद रगुनाथ जो है वो घर छोड़ के चले गए थे और उनके पिता जो चिंतित थे उन्होंने जो अपने बॉडीगार्ड सेना को भेजा शिवानंद सेन के पास शिवानन्द सेन भी। 1 त्तमकोटभक्तथेऔर उनसे पूछा कि तुम लोग में से किसी ने देखा है रगुनाथ
को रघुनाथ रहे हैं, विश्वास था पिता होंगे, वो पूरी आले थे उन पहाड़ों के रास्ते से आये, कोई उन्हें देख नहीं सके।
रघुनाथ को पता था कि उनके जो पिता है वो जरूर ढूंढेंगे सैनिकों को भेज के, तो इसलिए वो शहर से न जाकर पहाड़ों के रास्ते से जगननाथपुरी पहुँचे।
जगनपुरी में पिता ने पता लगा जगतपुरी में है, उन धन भेजना शुरू किया रघुनाथ की देखभाल के लिए।
जब रघुनाथ के पिता को पता पड़ा कि रगुनाथ जो है वो जगनपुरी में है। तो रघुनाथ के पिता धन भेजना चालू किया रघुनाथ की सेवा के लिए।
रगुनाथ कोई रूचि नहीं थी।
उस धन में, रघुनाथ की कोई रूचि नहीं थी उस धन में, उन कम
धन ऐसी कोन बनाया।
रगुनाथ ने उस धन से महाप्रभु के लिए भोजन बनाया 2 महीने के लिए, 2 महीने के लिए।
अब मुझे पिता के पैसे नहीं चाहिए।
तो रघुनाथ ने कहा कि जब मैंने सब कुछ त्याग दिया है तो मैं अपने पिता से पैसा क्यों लूं, उनका एहसान क्यों लूँ। अब मुझे अपने पिता के पैसे नहीं चाहिए।
पर आजकल रघुनाथ मुझे बुलाता नहीं है
प्रसाद के लिए, तो महा प्रभु ने सर से पूछा आजकल रगुनाथ मुझे बुलाता नहीं है प्रसाद के लिए।
पिता पैसे ले ले लेना बंद कर दिया।
स्वरुप दामोदर ने माँ प्रभु से कहा कि उनके पिता जो पैसे आते थे रगुनाथ लेना बंद कर दिया।
बहुत खुश हुए
महा प्रभु महाप्रभु बड़े प्रसन्न हुए। रगुनाथ के त्याग को देख कर हो।
गुना ने क्या किया से पैसा लेना बंद किया और फिर जगह पूरी मंदिर में जो दान मिलता था उसी को खाते दे।
जब पैसा लेना बंद किया रंगुन ने तो फिर जगनपुरी के मंदिर पर जो दान मिलता था उसको स्वीकार करना प्रारंभ किया।
दान करना बंद जो दाल को स्वीकार करे।
फिर उन्होंने वो भी बंद कर दिया और फिर दरवाजे के पास खड़े होते थे भगवान के मंदिर की ओर। जो लोग आते जाते दान देते थे वो स्वीकार किया
की भावना थी।
रघुनाथ में अत्यधिक त्याग की भावना थी।
और 1 समय माँ से दादरी में चेतन माँ प्रभु से पूछना चाहता हूँ।
तब रघुनाथ ने 1 बार स्वरुप दामोदर से कहा कि मैं चैतन्य महा प्रबु कुछ पूछना चाहता हूँ।
वैसे तो माँ प्रभु ने गुना पास हु जामदर के केयर में छोड़ा था।
वैसे तो महाप्रभु ने रघुनाथ स्वामी को स्वर दामोदर के पास भेजा था।
पूछना चाहता हूँ कॉनफिडेंशल बन?
रघुनाथ ने स्र्वदामोदरऐसी कहा की मैं महा प्रभु ऐसे अकेले में पूछना चाहता हूँ।
उन्होंने कहा अगुणादादयेबहुत महत्वपूर्ण है। मैं यह नहीं जानता कि क्या कर्तव्य होना चाहिए। जीवन में तो आपके के मुझे ये बताए आपके मुँह से क्या है। मेरा
तो रगुनाथ ने चदरमहाप्रुवऐसी पूछा की मैं अपना कर्तव्य अथवा जीवन लक्ष्य नहीं जानता। इसलिए आप कृपया अपने दिव्य मुख से मुझे उपदेश दे।
महा बहु हँसने। लगे पूछा बुरे काम आई हैव। आलरेडी पॉइंट सुदाम ने हा कि मैंने तुम्हारी जिम्मेदारी दे दी है। दाम को।
महाप्रभु ने हंसते हुए रघुनाथ दास से कहा, मैंने पहले ही सुर्भदामदऔरगोस्वामी को तुम्हारे उपदेशक के रूप में नियुक्त कर दिया है।
तो तुम स्रुभधामदाऐसी पूछो क्या होनी चाहिए?
जिम्मेदारी तुम स्वरुप दामोदर से अपने कर्तव्य तथा उससे संपन्न करने की विधि सीख सकते हो। मैं उनके जितना नहीं जानता,
नहीं जानता। उन्होने हा की शुरू से ज्यादा जानता है। फिर हा क्यूँकि तुम पूछ रहे हो?
छेतनमाप्रों ने कहा, फिर भी यदि तुम श्रद्धा तथा प्रेम पूर्वक मुझसे उप्देश्य लेना चाहते हो तो तुम सुनो मैं तुम्हें अभी बता रहा हूँ।
श्रद्धा से प्रेम से में सन्देश स्वीकार
करना और प्रेम से सन्देश स्वीकार।
कर ने कहा, मदर से शिक्षा लो, उनको जिम्मेदारी दी है। फिर कहा यह भी कहा के बाद मेरे से ज्यादा ज्ञान है।
पहले माप रो ने कहा की तुम स्वरुप दामोदर से शिक्षा लो और फिर कहा स्वरूप के पास मुझसे ज्यादा ज्ञान है।
अच्छा क्या तुम चाहते है। मै उत्तर 2 the son बाप।
रोहों ने कहा, अच्छा ठीक है। अगर तुम चाहते हो कि मैं उत्तर दूँ तो मैं देता हूँ।
to ye bola on things in a lower, than grass is more olvindanatreand, he doesnt expect personal on all par to respect to others and very easily chand the holy name of the god।
जो अपने आप को घास से भी तुच्छ समझता है, जो वृक्ष से भी अधिक सहिष्णु है, और जो निजी सम्मान की आशा नहीं रखता, बल्कि अन्यों को सम्मान देने के लिए उद्यत रहता है, वह सदैव सरलता पूर्वक भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन कर सकता है।
you my name, one a do not talk like people in gender, here what they have you away pavel fud and sud dress in a dress।
तो महाप्रभु ने कहा न तो सामान्य लोगों की तरह बोलो और न वे जो कहें उसे सुनो। तुम न तो स्वादिष्ट भोजन करो, न ही सुंदर वस्त्र पहनो।
बहुत संदेश दिया जा रहा है को सबसे पहले क्या कहा की भौतिक वादियों के सामने समान चर्चा मत करो, माहाप्रबुने
हा भौतिक वादियों के समान चर्चा मत करो।
दूसरे शब्दों में जल पा से बचो,
दूसरे शब्दों में प्रजल्प से बचो जलपा
करोगे तो भक्त नष्ट हो जाइए, प्रजलपर
करोगे तो भक्ति नष्ट हो जाएगी।
क्या कहते हैं प्रजलपाकरोगेतोआ भौतिकता में फसे
होगा, प्रजल्प करोगे तो आप भौतिकता में फंसे रहोगे।
प्रजा नहीं करोगे तो क्या करना चाहिए? कुछ तो करना पड़ेगा,
प्रजलपा नहीं करोगे तो कुछ तो करना पड़ेगा को बंद नहीं कर सकते, जीव को बंद तो नहीं कर सकते।
बोलेंगे मोत कई लोग, कई लोग, फिर
मौनव्रत रख लेते है।
कहा है केवल का नाम लेना।
पापा जी ने कहा हमारे लिए मौनव्रत है केवल कृष्ण का नाम लेना।
सबसे पहले तुम्हें भौतिकवादियों की बातों से बचना है।
सबसे पहले तुम्हें भौतिक वादियों की बातों से बचना है
और तुम्हे भौतिक बिल्कुल नहीं करनी चाहिए।
सुनो भी मत तुम्हे भौतिक चर्चा बिल्कुल नहीं करनी है और सुनो भी मत
कहा गया है कृष्ण कथा की चर्चा करनी चाहिए।
शास्त्रो में कहा गया है कि सिर्फ कृष्ण कथा की चर्चा करनी चाहिए और
शू नोट फूड और आप्रशोादभीखाओ सादा प्रसाद
का प्रसाद भी बहुत सादा खाना चाहिए। स्वादिष्ट भोजन नहीं।
कई बार भक्त वो फीस हो री है, हमें रसगुला चाहिए। समोसा कचौरी पकोड़ा गुलाब जामुन।
कई बार भक्त बोलते है की फीस हो रह है। हमें रसगुला समोसा कचौरी गुलाब जामुन चाहिए।
बंदर को कहता है फीस पांसर होती है तो उसे 45।
जिस दिन फीस सपोंसर होती है उसके बाद सादा खाना खाना है।
रोज चस्के वाला खाना खाओगे तो भक्ति
में चलाएंगे रोज, अगर चस्के वाला खाना खाओगे तो भक्ति में अड़चन आएगी।
तो गुना दास ने पूछा था क्या है मेरा कर्तव्य?
गुन दास ने पूछा था क्या है मेरा कर्तव्य?
चर्चा से दूर रहो।
सो महाप्रभु ने कहा यदि तुम श्रद्धास्य और प्रेम से मेरा ये जो है उपदेश्य स्वीकार करोगे तो सबसे पहले भौतिक चर्चा से दूर रहो।
आपके आश्रम में लिखना चाहिए,
आपके ब्रह्मचारी आश्रम में लिखना चाहिए कि प्रजल्प मत करिए। सिर्फ कृष्ण कथा करिए।
दीवारों में लिखते है।
जैसे बाहर भी लोग दीवारों पर स्लोगन लिखते हैं। ऐसे हमारा स्लोगन होना चाहिए की प्रजल्प नहीं करो। फिर सारा प्रसाद खाओ, सादा प्रसाद खाओ।
सारा प्रसाद का यह मतलब नहीं की आप ज्यादा नमक डालो या कम नमक डालो, ठीक बनाओ और सादा।
सादा प्रसाद का मतलब यह नहीं है कि ज्यादा नमक डालो या कम नमक डालो। आप ठीक प्रसाद बनाओ। बट सादा ड्रेस नइस और अच्छे कपड़े पहनो
वस्त्र पहने सादे होने चाहिए।
हमारे वस्त्र जो पहने वो भी सादे होने चाहिए।
यह नहीं की हम
साथ ऐसा नहीं कि हम गहनों के साथ वस्त्र पहनें, सुझाएं गहनों के साथ वस्त्र सिलाएं, कई
बार हम सुझा दे, गहनों के साथ साथ पुरुष, स्त्री में सारा जीवन बिताना चाहिए।
पुरुषो या स्त्री हमें सादा जीवन बिताना चाहिए।
बाबाजी कहते थे pिloसफीसि,
सुप्रोवा जी कहते थे हमारा सिद्धांत है सादा जीवन, ऊँचा विचार आगे क्या काम, आगे सुनना चाहते हैं, क्या काम हम फिर आप कहोगे की बहुत बड़ा लेक्चर हो गया।
do not exec रिस्पेक्ट
कभी सम्मान की आशा मत करो किन्तु अन्यों को सम्मान।
2 always can the holy name of lord krishna।
सदैव भगवान कृष्ण के पवित्र नाम का
जप करो and will or mind and
a और अपने मन में वृंदावनवासी राधा तथा कृष्ण की सेवा करो, समझे का
आदर की उम्मीद मत करो।
क्या कहा महाप्रभु ने की आदर की उम्मीद मत करो।
मेने सोचो की थोड़ी सेवा की है। और अगले दिन आपका नाम के बाद
ये मत सोचो की हमने थोड़ी सेवा की है। अब लोग हमें प्रणाम करें
और सबको
आदर 2 और सबको आदर 2 वैष्णव
भक्त हैं, सबको आदर देते हैं, वैष्णव
भक्त है, वो सबको आदर देते हैं।
यही नहीं केवल ये व्यक्ति मेंबर बन जाएगा पैसे मिलेंगे उनसे प्रेम से बात
करें, ऐसा नहीं की ये व्यक्ति मेंबर बन जाएगा और पैसे देगा। तो इसलिए हम उससे प्रेम से बात करें।
कोई लगता है जान नहीं देगा सो मुह दूसरी,
ऐसा नहीं कि कोई व्यक्ति हमें लगे कि पैसा नहीं दे रहा है। तो मुंह दूसरी तरफ कर लो।
चाहे किसी प्रकार का बैगराम हो सबको
आदर 2 सबको आदर देने का भाव रखना चाहिए।
और सदा हरे कृष्ण मंत्र का उच्चारण
करो, सदा हरे कृष्ण मंत्र का उच्चारण करो।
यही नहीं की 16 माला हो गया तो आगे पाप है।
यह नहीं कि 16 माला हो गया तो आगे जब करना पाप है।
कई बार माला का है, आश्रम में,
कई बार आप भक्तों से पूछा तुम्हारा माला कहा है? तो कहेंगे की आश्रम में है।
आगे कहते है मन में सदा भगवान
की सेवा करते जाओ, मन में सदा भगवान की सेवा करते रहो, कृष्ण वृंदावन में राधा कृष्ण जो वृंदावन में है।
आगे उन्होंने कहा मैंने केवल तुम्हें संक्षेप में शिक्षा ली है,
मैंने संक्षेप में तुम्हें अपना आदेश दे दिया है।
और तुम फिर दादर के पास जाओ, वो गाय के साथ समझाएगा, इसके आगे
तुम स्वरुप दामोदर के पास जाओ। वो तुम्हे और गहराई से समझायेंगे है
समझाया और कहा और में तुम्हे चाहिए जाइए
महा प्रभु ने शास्त्रों का सार समझाया रघुनाथ को और हा की और विस्तार से सुनना है। तो फिर आप जाइए। स्वरूप दामोदर के पास
रगुनादासबड़ादुःख हुआ, जब मा पर भुआ प्रकट हुए,
रगुनादास को बड़ा दुख हुआ। जब महा प्रोव प्रकट हुए, वो सोच
रहे थे मुझे आत्महत्या कर लेनी चाहिए।
वो सोच रहे थे, रघुना सोच रहे थे की मुझे आत्महत्या कर लेनी चाहिए।
रूप और साधन का पता लगा की रघुनाथ सोचे है। आत्म हत्या करने की। बड़ी घबरा गए।
जब रूप सनातन को पता पड़ा कि रघुनाथ 10 जो है आत्महत्या करने की, सोच रहे हैं, तो बड़े घबरा गए,
कहा मेरा जीने का कुछ लाभ नहीं है।
रघुनाथ ने कहा कि मेरा तो जीने का कुछ है ही नहीं क्योंकि चेतन महाप्रभु और शुरु दामोदर दोनो प्रकट हो गए हैं।
सो हम रोज की कथा करेंगे।
तो रूप और सनातन ने रगुनाथ से कहा की हम रोज चेतन माप्र की कथा करेंगे।
रगुनाथ ने आत्महत्या का विचार छोड़ दिया
और इसी शर्त पर रगुनाथ ने आत्महत्या का विचार छोड़ दिया।
गुना रोज 1 लाख बार जप करते
थे रघुनाथ दास रोज 1 लाख नाम जप करते थे उनको मिलने दूर दूर
से लोग आते थे आदर देने के
लिए, उनको आदर देने और मिलने के लिए लोग दूर दूर से आते थे
और सबको प्रणाम करते थे और सबको
रगुनाथ प्रणाम करते थे।
1 दिन में हजार प्रणाम करते थे भगवान कृष्ण को और 2000 प्रणाम करते थे हर व्यक्ति जो उनके बस आता
था रघुनाथ दास रोज 1000 प्रणाम करते थे कृष्ण को और 2000 प्रणाम करते थे जो भी व्यक्ति उनके पास आता था
रघु रहे थे राधा कुंड में,
रघुनाथ दास भजन कर रहे थे राधा
कुंड में और बहुत धूप चल रही
थी और बहुत धूप थी बहुत गर्मी।
तो राधा रानी ने उनके दूरी दूरी पर 2 टाइगर थे
और उनकी दूरी पर 2 बाग थे और गुना 10 जप में लगे हुए थे रगुनाथ 10 जप में लगे हुए थे सो
लगे थे तो उधर से और राधा रानी ने देखा मेरा भक्त इन तेज धूप में जप कराई। धूप के अंदर राधारानी आ गई उन्हें पीछे से दुपट्टा को उनके रूप में
उठाया। जब राधा रानी ने देखा कि मेरा भक्त जो है इतनी धूप में जप कर रहा है। तो राधा रानी वहां पर आ गए और अपने दुपट्टे से उनके लिए छाता बना दिया।
ना से गुजर रहे थे
सनातन गोस्वामी
ने रघुनाथ से कहा स्वामी रहे थे। उन्होंने देखा राधारानी अपने भक्त रघुनाथ के लिए छाता बना रही है।
सनातन गोस्वामी वहां से जा रहे थे तो उन्होंने देखा राधा रानी जो है अपने भक्त क लिए अपने दुपट्टे से छाता बना रही है।
भगवान ऐसी सेवा नहीं लेता।
भक्त जो है वो भगवान ऐसी सेवा नहीं लेता।
रगुनाथ तुम राधा रानी की सेवा ले रहे हो।
तो सनातन ने कहा रगुनाथ तुम राधा रानी से सेवा ले रहे हो।
इसके पश्चात 1 कुटीर बनी जिसमें ने
किया इसके पश्चात 1 कुटिल बनायी गयी जिसमें रगुनाथ बैठ के जप करते थे
जो भजन कुटीर
जो भजन कुटिल वृंदावन में सबसे पहले आरम्भ हुई थी।
रगुनदस्वामीस्ाी बुझाए
रगुनाथ दास गोस्वामी 1 मंजरी
के अवतार थे और हमें उनके लियाउनका
स्मरण करना चाहिए, हमें उनके लीलाओं का स्मरण करना चाहिए। या कैसा हरे क्रिश्न
ट्रेन पकड़ना है
महाराज को अभी ट्रेन में जाना है तो ट्रेन स्टेशन से ट्रेन पकड़ना है।
सो जे महाराज ्रश्न है किसका किसी
का प्रश्न है है महाराज पूछिए
पीछे
पीछे नारायण चालू है। चा, hriकshnaमहाराज, थैंक यू फॉर द नाइस क्लास महाराज हम रगुनादास गोस्वामी की लाइफ से देखते हैं की आम सॉरी रगुनादासजी की लाइफ से, हम देखते हैं कि वेल्थ और वुमन और फूड स्पेशल फूड इनसे वो अट्रैक्टेड नहीं थे, सो हम उनके फुट शेप्स को कैसे फॉलो कर सकते हैं?
you can dlbteterminaton ta spekinsngati भक्ति में शरण लो तो माया का विरोध कर के माया का विरोध करना बहुत कठिन है, वो इसका विरोध कर सकता है।
तो प्रश्न यह है कि रगुनादसगोस्वामी स्त्री से, धन से और अच्छे खाने से बचे थे। तो हम कैसे पालन कर सकते हैं? है चैतन, शिक्षाओं का पालन करके और भक्ति की शरण लेकर हम भक्ति की जितनी दृढ़ता से शरण लेंगे हम माया को दूर रख सकते हैं। उ और किसी का यहाँ पर द लास्ट के लास्ट क्वेशन हरे महाराज महाराज नित्यानंद प्रभु ने रघुनाथ दास गोस्वामी को
चोर क्यों बोला मुझे बुखार
नेतान प्रभु रघुनाथ दास के साथ मजाक कर रहे थे।
तुम मे से दूर रहते हो, तुम इन सब मानों के लिए फीस का रेम से को बुलाया था,
प्रेम से बुलाया था
का हर 1 मिनट े
1 मिनट पर बोज गोपाल कृष्ण को स्वामी महाराज की
जा रगुनन्दन ठाकुर भी भाव जीत की प्रिया पूजा की। अब भक्तों की
एजिस गोपाल कृष्ण को में महाराज के श्रील प्रभुपाद के।
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