यह व्याख्यान श्रील गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज द्वारा 15 सितंबर 1995 को नई दिल्ली में आयोजित नरसिंह चतुर्दशी विशेष कार्यक्रम का भाग है। इसमें प्रलाद, उनके पिता हिरण्याक्षिपु, और नारद मुनि की कथा को पुनः प्रस्तुत किया गया है तथा उनके जीवन से निकाले गए आध्यात्मिक सिद्धांतों पर प्रकाश डाला गया है। मुख्य बिंदु: - प्रलाद के गर्भ में ही नारद मुनि द्वारा प्राप्त दिव्य ज्ञान और उसकी प्रारम्भिक शिक्षा। - हिरण्याक्षिपु द्वारा तपस्या का दुरुपयोग, शक्ति की लालसा और उसके परिणामस्वरूप देवताओं का दुःख। - तपस्या के दो पहलू – अच्छे कार्यों के लिये उपयोग और बुरे कार्यों के लिये दुरुपयोग – का आधुनिक विज्ञान एवं हथियार निर्माण के साथ तुलनात्मक विश्लेषण। - प्रलाद द्वारा नवधा‑भक्ति (दश प्रकार की भक्ति) का वर्णन, उसका महत्व और कैसे वह जीवन के कठिनाई‑पूर्ण स्वरूप को समझाता है। - भक्ति में दृढ़ता, त्याग, और निरंतर अभ्यास की आवश्यकता पर जोर, साथ ही यह बात कि आध्यात्मिक कार्य में समय न देने से जीवन पशु‑समान हो जाता है। - प्रलाद के शत्रु (हिरण्याक्षिपु) द्वारा किए गए अत्याचार, उनके द्वारा भक्ति‑भूत को हटाने के प्रयास, और प्रलाद की अडिग भक्ति का उदाहरण। - प्रलाद की शिक्षाओं को भागवद् गीता के श्लोकों से जोड़ते हुए, आत्म‑साक्षात्कार, सुख‑दुःख की समानता, और ईश्वर‑सेवा के सिद्धांतों की पुनरावृत्ति। - आधुनिक जीवन में व्यस्तता, धन‑लालसा, और भक्ति‑अभ्यास के बीच संतुलन स्थापित करने की व्यावहारिक सलाह। संपूर्ण व्याख्यान का उद्देश्य श्रोताओं को भक्ति‑मार्ग में दृढ़ रहने, तपस्या को नैतिक रूप से उपयोग करने, और भगवद् गीता व शास्त्रों के मूल संदेश को समझने के लिए प्रेरित करना है।
Chapters
सि हाय नम ओम माह सिं हाय नम सिhायनmaओममaहबलय न माह ग्रसिहायनमाओमदे बाय न महा, जैसिंह हा श्री नृसिंह हजयाजयन्रसिं हा प्रलाद महाराज कोई साधारण बच्चे नहीं थे, उन्हें हमारे शास्त्र में धर्म का अधिकारी या महाजन माना जाता है। सब सब कपिल मन। बलेसकेरबयशस्त्र में कहा गया है कि 12 महाजन हैं जिन के द्वारा हम धार्मिक शिक्षा पालन स्वीकार कर सकते हैं। तो प्रलाद महाराज का तो 1 भाग्य ये था कि जब वो अपनी माता के गर्भ में थे तो उन्हें ये दिव्य ज्ञान नारद मुनि जी के द्वारा प्राप्त हुआ। तो ये था उनका भाग्य क्योंकि उनके पिता दुष्ट बुद्धि के थे, हिराने काशीपु पर दुष्ट बुद्धि के होते हुए मैं हिराने काशीपु में 1 गुंद ये था कि उन्हें यह पता था कि अगर उन्हें कोई शक्ति भी चाहिए। उनकी क्या भावना थी कि वो मरे नहीं, उन्हें तपस्या उठानी पड़ेगी। तो हिलाने काशीपु तपस्या उठाने गए थे जब प्रलाद अपनी माता के गर्भ में थे और जो अनेक देवता थे इंदिरा वगैरा वो बड़े निराश हो गए थे। हिना ने कशिपु की कार्य के द्वारा, क्यूंकि हिलाने का शिप ने अपनी तपस्या के द्वारा बहुत शक्ति प्राप्त कर ली थी। तपस्या के द्वारा। अब शक्ति अच्छे कार्यों के लिए भी प्राप्त कर सकते हो और गलत कार्यों के लिए भी। तो जैसे हमारे आजकल के विज्ञानी हैं, आजकल के जो विज्ञानी हैं, बहुत बहुत मेहनत करते हैं, दिन रात 1 करके काम करते हैं क्या बनाने के लिए एटम जिससे दुनिया का नुकसान हो। आज जितने हथियार बन गए हैं कि नहीं। आज अब इधर बैठे हो, बटन दबा 2 और बॉम उधर जाएगा। तो मेरा कहने का मतलब था कि हम तपस्या का उपयोग अच्छे काम के लिए भी कर सकते हैं, गलत काम के लिए भी। तो हेरान काशीपु की बुद्धि यह थी कि सारे देवता सब मेरे वर्ष में आ जाए और मुझे मिट्टी के सामने भी कभी झुकना नहीं पड़े। तो देवता बहुत ही दुखी थे हिरानी काशीपुर से। और जब उन्होंने देखा कि प्रलाद अपनी माता के गर्भ में है, हिरानी वहाँ नहीं है। तो 1 दिन वो प्रलाद की माँ को घसीट कर ले जा रहे थे, इस विचार के साथ कि जैसे ही बच्चा पैदा होगा, हम उसको मार देंगे, कहते हैं अंग्रेजी में लाइक फादर लाइक सन जैसा बाप वैसा बेटा। तो वो उन्होंने सोचा 1 खाने कशिपुने नाक में दम कर दिया है, अभी दूसरा पैदा हो जायेगा फिर तो बिल्कुल ही जीना असंभव हो जाएगा। तो जब प्रलाद की माता को घसीट कर ले जा रहे थे, वहाँ नारद मुनि जी पहुँच गए। और उन्होंने जब इस घटना को देखा तो उन्होंने कहा क्या कर रहे हो तुम लोग? इस निर्दोष औरत को घसीट कर कहाँ ले जा रहे हो? तो देवताओं ने कहा आप जानते नहीं कि औरत कौन है? हिम्मत दी हिरानी काशीपु और उसके उसके घर में 1 और हिरानी कशिपु है? तो मुनि जी ने कहा छोड़ 2 चिंता मत करो, इस औरत के घर में 1 महान संत है। तो उनके कहने पर देवता ने प्रलाद की माँ को छोड़ दिया। और फिर नारद मुनि जी ने प्रलाद की माँ को दिव्य शिक्षा दी जो कि प्रलाद ने भी स्वीकार की। तो प्रलाद महाराज तो माँ की गर्भ से निकलते ही उन्होंने अपने साथियों को दिव्य उपदेश देना आरम्भ कर दिया। उन्होंने अपने साथियों से कहा दुर्लभ मान सुम जन्मा दुर्लभ। 1 संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है बहुत ही कठिन। तो प्रलाद महराज ने कहा कि जो मानव जीवन है ये तो बहुत ही दुर्लभ है, बहुत ही कठिनाई के साथ प्राप्त होता है। तो हमें इस मानव जीवन का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए पर इसका उपयोग करना चाहिए जन्म मृत्य के चक्कर से छुटकारा प्राप्त करने के लिए। तो प्रलाद हाजी ने कहा अरे भाई। तुम इतना प्रयास परिश्रम क्यों करते हो सुख को प्राप्त करने के लिए? जैसे आज आप देखते हो समाज में सब सुबह से रात तक व्यस्त हैं। किस लिए? धन कमाने के लिए है न? कई बार आप अपने मित्रों को निमंत्रण देते हो। आपके भजनों के प्रोग्राम में वो क्या कहते हैं? अ वेरी बजी मैं बहुत ही व्यस्त हूँ तो लाज हाजी ने कहा कि जिस प्रकार जो खाता है बिना मांगे उसी प्रकार सुख भी आता है बिना मांगे। अब समझे। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार दुख दुख की तो कोई भीख नहीं मांगता, अब तो भगवान से यही प्रार्थना करते हो हमें सुख मिले है और आप चाय प्रार्थना करो तो दुख थोडा दुख तो भुगतना ही पड़ेगा। जो प्रलाद महा ने कहा कि जिस प्रकार आपको दुख प्राप्त होता है बिना मांगे उसी प्रकार जितना सुख आपके कोटा में है उतना ही आपको मिलेगा, उससे ज्यादा 1 बूंद भी नहीं मिलेगा 1 बूंद में नहीं। तो उन्होंने कहा परलामहाजीनेकीइस जीवन का विवेकान में उपयोग मत करो। जो शो मिलता है वो मिलेगा ही समय निकालो। अध्यात्मिक कार्य केले क्यूंकि? जब तक आप अध्यातमिक कार्य के लिए समय नहीं निकालोगे, ये जो जीवन है पशु के जीवन के समान है। तो प्रलाद महा जी को कितना कष्ट भुगतना पड़ा। कई बार हम लोगों को भी थोड़ा बहुत कष्ट भुगतना पड़ता है। और प्रलाद महा जी के कष्ट का को सुनो तो आप आश्चर्य चकित हो जाओगे। उनके पिता ने उन्हें क्या नहीं प्रयास किया उनकी भक्ति को रोकने के लिए। जैसे की आप लोग भी जब भक्ति में जुडते हो तो कई लोग आपके दुश्मन बन जाते हैं, बुरा नहीं माना है, कई बार घर वाले ही दुश्मन बन जाते हैं। क्या हो गया देखो हमारे पाती को भूत सवार हो गया भक्ति का कहा इस कौन के भक्तों के साथ फंस गई है, जा फिर यही योजना बनाते है, कैसे इनको भक्ति से खींचा जाएगा। कई बार सोचते हैं शादी अगर शादी नहीं हुई है तो शादी करा। 2 अगर ये नहीं है तो किधर और भेज? 2 हाँ यही प्रयास करते कि भक्ति से इसको दूर ले जाए। तो प्रलाद के पिता की भी यही इच्छा थी हिरानी काशीपुर ने देखा कि मेरे बेटे में भक्ति के विषय में बहुत रुची है। तो हिलाने का शिपू ने पहले तो प्रेम से समझाया विष्णु को तुम भूल जाओ कि दुष्ट बुद्धि के थे। 1 दिन जब उनका बेटा स्कूल से लौटा तो उन्होंने उनको अपनी गोद में बिठा कर पूछा गोद में बिठाया बेटे को आखिर 5 साल के थे, 4 साल के थे, सिर में हाथ रख कर कहा अच्छा बेटा ये बताओ आज तुम्हारे अध्यापकों ने स्कूल में क्या सिखाया? तो? क्योंकि प्रलाद के अध्यापक जो थे शुक्रचार्य के बेटे, उनको हिलाने का शिपू ने खास ये आदेश दिया था। ये जो भक्ति का भूत मेरे बेटे में है न, इसे तुम निकाल। 2 तो हिलाने का शिप ने सोचा कि मेरा बेटा कहेगा आप हो? परम सर्वशेष्ठ उन्होंने बेटे को जब पूछा की आपने स्कूल में आज क्या सीखा? बेटा सिखा बताओ मुझे कभी कभी आप अपने बच्चों से पूछते होगे है कि स्कूल में आज क्या सीखे? तो बेटे ने कहा स्कूल में मैंने आज यह सीखा है क्या नवदा भक्ति का ज्ञान दिया, शव नाम कृतन विष्णु, स्मरण पाद सेवन आचनबंदमदसयमसख्यम आत्मनिवेदन। ये है नवधा भक्ति का वर्णन जो कि हमें श्रीमत भगवत में प्राप्त होता है। तो प्रदार महाराज ने नवधा भक्ति का ज्ञान जैसे ही दिया अपने बाप को, बाप ने बेटे को अपनी गोद से उठा कर जमीन में पटक दिया। और ये तो 1 ही उदाहरण उनको पहाड़ की चोटियों से भी नीचे फेंका झेरमींखिलाई और जभी भी प्रलाद ने अपनी भक्ति नहीं छोड़ी। तो इसलिए 1 और महान संत रूप को स्वामी जी ने कहा है उत्साह निश्चय धर्यतततकरमपरवरतनत, संग, त्याग सतोव्ेतेअगर। आप भक्ति के मार्ग में सफलता प्राप्त करना चाहते हो। तो बिल्कुल दृढ़ होकर आपको इस मार्ग में रहना पड़ेगा। बहुत बार हम देखते हैं और आप सब ने भी देखा होगा, लोग भक्ति में थोड़ी रुचि प्रकट करते हैं, आपके सत्संग में आते हैं। फिर थोड़ी देर बाद आने के बाद बंद हो जाता है। न कहते यह नुक्से तुम्हे, यह नुक्स है, ये नुक्से हम घर में ही ठीक है। क्यूंकि उनमें देव भावना जाग्रत नहीं हुई? जैसे की बौधिक जीवन में भी अगर आपको कुछ सफलता चाहिए तो परिश्रम करना पड़ता है, कुछ त्यागना पड़ता है तो ही आप सफलता प्राप्त कर पाते हो, नहीं तो नहीं कर पाते। तो उसी प्रकार भक्ति के मार्ग में भी यह ज्ञान प्राप्त कर के बिल्कुल दीर्ध होकर चलना पड़ेगा। तो ही हम इस ज्ञान का लाभ उठा सकेंगे। तो लाज महाराज ने अपने साथियों को यह शिक्षा दी। वही शिक्षा आपको भागवत गीता में प्राप्त हो रही है। फिर इसी प्रकार भागवत में रृशलदेवभगवान ने भी अपने पुत्रों को शिक्षा दी। वही शिक्षा हमें भगवत गीता में भी प्राप्त हो रही है। तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शास्त्रों की जो शिक्षा है, उसका निचोड़ हमें भगवत गीता में प्राप्त होता है। तो अगर हम भगवत गीता को ध्यान से पढेंगे, सावधानी के साथ पढेंगे। फिर इसका यह अनुभव होगा कि आप अपने स्वरूप को, असली स्वरूप को समझ सकोगे। जैसे कि आपको कभी सपना आ जाए कि आप करोड़पति बन गए तो सपने में 2 मिनट के लिए आप करोड़पति रहते हो। उसके बाद जब जाते हो तो आप जानते, वो तो सपना ही था। असली बात तो ये है कि हम जिधर थे उधर को उधर है, तो उसी प्रकार हमें हमारे असली शुरू को समझना चाहिए। जब सगदेव भगवान के द्वारा हिलाने का शुरू का वध हुआ और महाराज ने यही सब सुनाई थी। उसके पश्चात भगवान ने प्रधान से कहा मेरे कारण तुम्हें इतना कश्ती अनुभव करना पड़ा था। भगो मेर से क्या वर जो प्रलाद ने क्या कहा आप मुझे आकर्षित मत करो। मैं आप से कोई वर नहीं मांगना चाहता। और आगे उन्होंने कहा जो सेवक सेवा करता है, इस उम्मीद के साथ जिस के बदले में मुझे कोई लाभ मिलेगा, वो कौन है वो पारी। तो हमें यही प्रार्थना करनी चाहिए भगवान से हमारा भौतिक नष्ट हो और हम दीर्ध होकर भगवान की सेवा में जुड़े राज। म ज के भगवान की बहुत कृष्णा हर कण, हर हाहा नाम राहारेहाले।