राधा रानी की अद्भुत लीलाएं | राधाष्टमी उत्सव | 2 Aug 2014 | Juhu | Srila Gopal Krishna Goswami

Srila Gopal Krishna Goswami explains Radha's spiritual power and her intimate relationship with Krishna, using stories of the gopis and the queen to teach selfless service and devotion. The core message: approach Radha not for material desires but for pure love and humble service to Krishna.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम ने वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम ने वासदेवाय। उम्नमोभवदेवासुदेवा हे कृष्ण। तो आज बड़ा शुभ दिन है। शुभ दिन क्यूँ हैं? राधा रानी जी का जन्म दिन आता है। भगवान के जन्म दिन के पंद्रह दिन बाद। तो राधा रानी जी का जो विषय है, यह बड़ा गोपनीय है। साधारण व्यक्ति से नहीं समझ सकता। और साधारण व्यक्ति के मन में अनेक प्रकार की शंखाय रहती है। आप कई बार सुनते हो, लोग कहते हैं अगर भगवान नही कर सकते तो हम क्यों नहीं कर सकते। हम पहले आज आपको कई लोग पढ़कर सुनायेंगे जिनके द्वारा यह स्थापित किया जाता है कि राधारानी है कौन, जो सम्बन्ध है भगवान के साथ कितना पवित्र है? है। तो श्रीमद भागवत के दसवें सकेंगे 30 में 28 सौ लोग इस प्रकार से है। श्लोक बोर्ड में लिखा हुआ है। हम ये श्लोक पढ़ेंगे और फिर थोड़ी देर बाद चेतन चतरविताकेनएकस्लोक पढ़ेंगे। naya aditononanaiswras ya no haगoदाtय मनाया राह नया रादि 2 नो नाम भगवान हरि ईश्वर ारश्यन्नोबिहाया गोविंदा मनैया रहा या राल तो नो नाम भगवान हरि ईश्वर हरिनन्नोबिहाया गोविंद पढ़ोगे शो को 4 कोई करेगा ee शाह मातेजीज शब्द
शब्दर् अनया उसके द्वारा आराधिता भली, भांति पूजित नूनम निश्चयी भगवान भगवान हरि कृष्ण ईश्वर परम, नियंता, य इतना कि न हमको विहाय त्याग कर गोविंद भगवान गोविंद प्रीत प्रसन्न या जिसको अन्यता ले गए रह एकांत स्थान में अनुवाद तथा तात्पिरशलप्रोपाजी द्वारा अनुवाद। इस विशिष्ट गोपी ने निश्चित ही सर्वशक्तिमान भगवान गोविंद की पूरी तरह पूजा की होगी, क्योंकि वे उससे इतने प्रसन्न हो गए कि उन्होंने हम सबों को छोड दिया और उसे एकांत स्थान में ले आये। श्री विश्वनाथ चक्रवती ठाकुर की व्याख्या है कि आराधित शब्द श्रीमति राधा रानी के लिए आया है, उनकी टीका है। शुकदेव गोस्वामी ने उसका नाम गुप्त रखने का भरसक प्रयास किया है, किंतु उनके मुख रूपी चंद्रमा से वह स्वत प्रकाशित हो उठता है। उन्होंने राधा का नाम ले लिया। यह श्रीमती राधारानी की कृपा है। अतः आराधिता शब्द के सौभाग्य को सूचित करने वाला दुंदुभि घोष है।
ओम गया तिमरंदसिाज्ानंजनाश क्या बंदे हम श्री गुरु रतन सबलतम seraधkrshnकरुना सिंधू राधे winदanesa जय श्री कृष्णा शेहकेहकशा मेरा यार नून भगवान हरी ईश्वरा गoविnदaराकईबार। लोग पूछते हैं कि राधा रानी का वर्णन क्यों नहीं है? श्रीमद भागवत शुकदेvकस्ामiनेभागवत का उपदेश दिया। परेश महाजूर पृथ्वी के सम्राट थे। 1 दिन वह जंगल में थे, प्यार से भूखे पानी की खोज में थे सामने उन्होंने देखा 1 कुटिया से रोशनी आ रही है गए पानी की खोज में। वहाँ समीक मुनि नाम के रिषी थे और वो बड़ी गहराई से भगवान का चिंतन कर रहे थे। उन्होंने राजा का स्वागत नहीं किया, राजा की तरफ देखा भी नहीं और चिंतन कर दे गए। वैसे ासत में कहा गया है अगर शत्रु भी आपके घर आए तो उसका स्वागत करना चाहिए। तो राजा क्रोधित होकर जब घर से कुटिया से निकल रहा था तो मरवा शाम सने चढ़ा दिया। इस रिशी के गले में जब उसके बेटे ने देखा कि मेरे पिता के गले में राजा ने मरवा शाम चढ़ा दिया है। तो बड़े क्रोधित हो गए और उन्होंने श्राप दिया। वैसे जब साधारण व्यक्ति को सूचना मिलती है कि अंत आने वाला है तो हम घबरा जा रहे हैं। पर उन्होंने संतों को निबंधन दिया और शुकदेव गोस्वामी से निवेदन किया कि आप हमें शिक्षा दीजिए कि जिस व्यक्ति का अंत आने वाला है, उसे क्या करना चाहिए। उस सभा में व्यास देव और नेक और प्रसिद्ध संत उपस्थित थे। पर सबने निर्णय किया कि शुद्ध शुकदेव को स्वामी मांग दर्शन देंगे। तो शुकदेव स्वामी के पास केवल 7 दिन थे, कितने दिन की परीक्ष को 7 दिन की सूचना मिली थी। सार दिन थे, जिस में उन्होने पूरा भागवत का उपदेश देना था और स्वामी को भय था कि अगर मैं गोपियों का नाम लूंगा, अगर मैं सखियों का नाम लूंगा, अगर मैं राधा रानी का नाम लूंगा तो ऐसे भाव में आ जाऊंगा कि मैं 7 दिन के अंदर भगवत समाप्त नहीं कर पाऊंगा। तो विश्वनाथ चकती ठाकुर और महान संतो ने कहा है कि इस कारण भागवत में राधा रानी जी का नाम प्राप्त नहीं करते, डिरेक्टली नहीं। जैसे ये जो आज का श्लोक है, उसमें इन्डरेक्ट्ली आप राधा रायाण जी का नाम प्राप्त करते हो। यहाँ क्या क्या गया है? नया, गोपियां सब खोज रही थी भगवान को और भगवान को खोजते खोजते, हर जगह पहुँचे। फिर उन्होंने देखा फुटप्रिंट प्यार के निशाने, व समझ गए की प्यार के निशाने किसकी हैं, राधारानी की और राधा रानी जी गई हैं। भगवान के साथ लीला करने के लिए। तो रास लीला, जिससे हम सब सम्बंधित हैं। ये जो रास लीला है, यह कोई भौतिक संबंध नहीं है, ये हमें समझ जाना चाहिए। हमारे जो महान कार्य हुए हैं, उन्होंने खास करके इस विषय पर बल दिया है। यह समझाने के लिए राधा कृष्ण का जो सम्बन्ध है, कोई लड़के लड़की का सम्बंध नहीं, पर शुद्ध भक्ति का सम्बन्ध है। भगवान जब प्रकट होते हैं, उनकी भी इच्छा होती है कि मैं आनंद अनुभव करूँ। तो अपनी हलादिनी शक्ति के द्वारा। वो प्रकट होते हैं। किस रूप में में यही राधारानी प्रकट हुई थी। बाद में चेत ने महा प्रमुख रूप में भगवान ने देखा। भगवान ने देखा राधारानी का इतना गहरा स्नेह है। मेरे लिए। गोपियों को जो स्नेह था, त्याग था, उसकी तुलना इतिहास में कोई नहीं कर सकता। तो भगवान ने जब देखा, गोपियों राजधानी में ऐसा भाव है। सिर्फ मेरी प्रशंसा। तो वो समझना चाहते थे और गहराई के साथ। और फिर भगवान प्रकट हुए। किस रूप में? चेतन राजरानी का रंग था, सोनार गोल्डन, इन कॉम्प्लेक्शन और चेतन्य महाप्रभु का क्या कॉम्पलेक्शन था, सोनार रंग का था। तो चेतन चर्तमीताजिसका वर्णन कृष्णदास काविराजीने किया है, जिसमें चेतन महा प्रभु की लीलाओं का वर्णन है। आप बड़े सुन्दर श्लोकों में प्राप्त करते हो, असली उपदेश आप सुनना चाहते हो तो जरा ध्यान से सुनना। टू बचाने के लिए लोक नहीं पड़ रहे हैं।
गोपियों का प्रेम रूण भाव कहलाता है। यह विशुद्ध एवं निष्कलंक है। यह कभी भी काम वासना नहीं होता, जैसा कि पहले बताया जा चुका है। कृष्ण के साथ प्रेम व्यापार के मामले में गोपियों का स्थान दिव्य है। उनका भाव रूढ़ भाव कहलाता है। यद्यपि यह भौतिक काम वासना जैसा लगता है, किन्तु इसे संसारी काम वासना जैसा नहीं समझना चाहिए, क्योंकि यह शुद्ध तथा निर्मल भगवत प्रेम है। काम तथा प्रेम के लक्षण अलग अलग होते हैं। जिस प्रकार लोहे और सोने के स्वभाव भिन्न भिन्न होते हैं, तात्पर्य व्यक्ति को कामवासना और शुद्ध प्रेम के बीच अंतर करने का प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि उनके बीच अत्यधिक भिन्नता होने के कारण वे अलग अलग श्रेणी के हैं। वे 1 दूसरे से उसी प्रकार भिन्न है, जिस प्रकार लोहा सोने से भिन्न होता है। अपनी खुद की इंद्रियों की तृप्ति करने की इच्छा काम है, किन्तु कृष्ण की इंद्रियों को तुष्ट करने की इच्छा प्रेम है।
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काम का लक्ष्य अपनी खुद की इंद्रियों का भोग करने मात्र है। किन्तु प्रेम भगवान कृष्ण के सुख भोग का ध्यान रखता है और इसलिए यह अत्यंत शक्तिशाली होता है। सामाजिक, रतियां, शास्त्रीय, आदेश, शारीरिक, आवश्यकताएं, सकाम, कर्म, लज्जा, धैर्य, शारीरिक, सुख, इंद्र, तृप्ति तथा वर्णाश्रम धर्म का वह मार्ग जिससे छोड़ पाना कठिन है। गोपियों ने अपने परिवार के साथ साथ इन सबको त्याग दिया है और अपने परिजनों के दंड तथा फटकार को सहा है। यह सब उन्होंने भगवान कृष्ण की सेवा के लिए किया। वे उनके आनंद के लिए उनकी प्रेममयी सेवा करती हैं। गोपियों में श्रीमति राधिका सर्वोपरी हैं। वे सौंदर्य, सद्गुण, सौभाग्य तथा प्रेम में सबसे बढ़कर हैं।
आपने इन श्लोकों को ध्यान से सुना। बड़े महत्त्वपूर्ण श्लोक हैं। कृष्णदास कविराज जी के दिन छरतवीतामेंये स्थापित कर रहे हैं कि काम, वासना और प्रेम में अंतर है। सोने में और साधारण लोने में लोहे में अंतर है या नहीं? सोने का भाव वो लोहे का भाव 1 ही है, अंतर है। तो इसी प्रकार कृष्णदास कविराज समझाते हैं कि काम, वासना और प्रेम में अंतर है। भौतिक समाज में हम सब प्रेम प्रेम, प्रेम शब्द इस्तेमाल करते हैं। परसनी प्रेम केवल है भक्त और भगवान के विषय में बाकी जो जिसे हम प्रेम मांगते हैं, समझते हैं के काम, वासना। जब तक काम वासना की इच्छा रखोगे, आप भौतिक संसार में भटकते रहोगे। जब शुद्ध भक्ति का भाव होगा, शुद्ध भक्ति का पालन करोगे। जब आप जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करोगे तो इन श्लोकों के द्वारा हमने 6 स्लोक पढ़कर सुनाये थे। ये 68 लोगो के द्वारा कृषनाकावराज्ी 1 ही विषय को स्थापित कर रहे हैं। ये जो गोपियों का भाव है, क्या है क्या स्पेस? इसमें कोई कलंक नहीं, कोई कमी नहीं, कोई दोष नहीं। सोचे की ये गोपियां भगवान की सेली थी। वे महान अपराध है। अगर कोई सोचे कि राधारानी भगवान की सहेली थी। यह महान अपराध है। गोपिया और राधा ने क्या है भगवान की सबसे उत्तम कोटि की भक्त जिनके मन में सदा 1 ही भाव रहता है। क्या भगवान की पसंद। तो शास्त्र के द्वारा अगर आप शिक्षा ग्रहण करोगे तो ये ज्ञान मिलेगा। जैसे की बड़ी प्रसिद्ध कथा है। भगवान द्वारका में थे। भगवान की सिर दर्द हो रही थी। नारद मुनि जी वहाँ पहुँचे। भगवान ने कहा नारद से नारद मेरी बड़ी गहरी सिरदर्द हो रही है। अगर तुम चाहते हो, ये सिरदर्द दूर हो जाए तो मेरे भाग के चरणों की धूल लाके 2 मुझे बाम लगाते हो। और मन ने कहा, इसमें क्या कठिनाई? आपके तो करोड़ों शिष्य हैं। सब खुशी से चरणों की धूल देंगे आपके माता में लगाने के लिए लौटता हूँ। नादमलीचे। सबसे पहले सत्य बामा के पास। भगवान की अनेक पत्नियों में 1 है। सत्य बामा ने जब सुना कहा, आप चाहते हो मेरे चरणों की धूल भगवान के माथे पर लगे। ये महा अपराध है। इसका बड़ा भयंकर परिणाम है। पर भगवान की उपासना सारे देवता। शिव जी, इंदिरा जी, ब्रह्मा जी कर रहे हैं। उनके माथे पर मेरे चरणों की धूल नहीं, नहीं, नहीं, यह तो महान अपरहान हो जाएगा। रुकमिनी के पास। रुक। मिनी ने भी यही भाव प्रकट किया। फिर गए कई और योगियों के पास। सब भेजे गये। सामने का ये तो बड़ा अपराध होगा। फिर हो गई शिव जी और ब्रह्मा जी के पास। उन्होंने भी इनकार कर दिया। उन्होंने भी कहा, हमारे चरणों की धूल अगर भगवान को लगेगी बड़ा भयंकर परिणाम होगा। मुनि निराश हो गए। उन्होंने कहा, मैंने तो सोचा था, लाखों लोग तैयार हो जायेंगे, चरणों की धूल देने के लिए इनकार कर। सब लोग को मैंने। आज मुनि ने यात्रा कर ली। सब जगह। सब ने यही उत्तर दिया, हमारे चरणों की धूप नारदमुनी लौटे। भगवान के पास कहने लगे है, बड़े दुख की बात है। मैं तो सब लोगों में घूम आया। नारदमुनी बहुत तेजी के साथ यात्रा करते हैं। और सब ने कहा, हमारे चरणों की धूल अगर भगवान के माथे में लगेंगे तो बड़ा अपराध होगा। उसका बड़ा भयंकर परिणाम है, जो हम अनुभव नहीं करना चाहते। तो भगवान ने पूछा, तुम ब्रज में भी गए थे कि नहीं? नहाता ने कहा, सब जगह गया, ब्रज में जाना, भूल गया। ब्रज में जाओ और मेरी गोपी उनसे पूछो। भगवान की अरबो गोपियां हैं। इन अरबो गोपियों में 6100 8 ज्यादा प्रसिद्ध है। 6100 8 प्रसिद्ध गोपियों में 100 8 ज्यादा प्रसिद्ध है। इन 100 8 में 8 ज्यादा प्रसिद्ध हैं। अ्ससकीचेत्रा, ललिता, वीर, शाखा, हंदुलेगासुदेवी, रंग देवी 8, 80 है। जैसे हमारे मायापुर धाम के मंदिर में राधा, माधव और सकीइसकाबिगराहै। तो इनमें 100 8 में 8 गोपियां ज्यादा प्रसिद्ध हैं। इन 8 में 4 और ज्यादा प्रसिद्ध है। कौन हैं 4, राधारानी, छन्दवाली, ललिता, विशाखा। इन 4 में 2 और ज्यादा प्रसिद्ध है। राधारानी और 2 में राधारानी सबसे प्रसिद्ध है। तो भगवान की करोड़ो गोपियों में राधा, रानी सबसे प्रसिद्ध हैं। तो राधारानी नानी ब्रज। वे ब्रज, मे देखा राधा, रानी और गोपिया बैठी हैं किस तरफ द्वारका की तरफ बैठे हैं। ब्रज में चिंतन कर द्वारका का। जब भगवान उपस्थित थे, उस डायरेक्शन में यही कहा भगवान की बड़ी गहरी सिर होरी है। मैं सब लोकों में घुमाया हूँ। सब भक्तों ने इनकार कर दिया। चरणों की धूल देने के लिए। क्या आप धूल? दोगे। पहले राधा रानी जी से पूछा। राधा रानी ने कहा, क्यूँ नहीं हमें हमारे भविष्य की चिंता? नहीं, हमारे मन में तो 1 ही भाव है कृष्णा की खुशी और कोई भाव नहीं सिर्फ कृष्णा की खुशी हमारे मन में भाव है नो हमारे चरणों की धूल। तो फिर राधानी ने पूछा भगवान से नारदमुनी से। पर तुम ये धूल उठा कर कैसे ले जाओगे? ना मुनी ने कहा भक्ति के बल
पर
मैं इस धूल को उठा कर ले जाऊंगा। और हम भगवान के भक्त तो नहीं हैं। आप समझते हो कि हम भक्त हैं तो हमारे चरणों की धूल ले लो। उन्होंने यह नहीं का के हम भक्त हैं, भक्त नहीं हैं। पर अगर आप समझते है की हम भागते हैं तो हमारे चरणों की धूल खुशी से ले लो। रानी ने पहले चरणों की धूल दी, जिसके पश्चात सारी गोपियों, निधि और मुनि धू लेकर पहुँचे भगवान के पास। भगवान ने कहा नारद, मुनि तुमने देख लिया भी अंतर क्या है? गोपियों के भाव में और दूसरे भक्तों के भाव में, जब तुम दूसरे भक्तों के पास गए, सबको चिंता थी उनके भविष्य में क्या होगा? पर गोपियों ने और गोपियों का 1 भाव यह है। वो सोचते ही नहीं कि वो भगवान के भक्त हैं। हम जब ऐसे सोचते हैं, हम इतने ऊँचे कोड़ी के भक्त हैं। मेरे से अच्छा कोई है ही नहीं, न कोई होगा कभी सबके मन मे भाव है न। हम सबसे अच्छे है, सबसे। पर राजरानी और गोपियों का क्या भाव रहता है, उनका भाव रहता है कि हमारे में कोई गुण है ही नहीं। गोपियों ने क्या कहा नारद मुनी से, हम तो भगवान के भक्त है ही नहीं। पर अगर आप सोचते हो की हम भक्त हैं तो हमारे चरणों की धूल ले लो। और रानी का सदा क्या भाव? तो भगवान ने कहा नारद मुझे देखे नारद मुनी तुमने भी अपने चरणों की धूल मुझे नहीं दिया। पर गोपियों ने तुरंत दे दी। ये है गोपियों का भा। तो ये जो गोपियां हैं, व राधा रानी। आप गोपियों की चर्चा राधा रानी के बिना नहीं कर सकते। सब गोपियों में सबसे प्रसिद्ध गोपी कौन हैं? राधारानी। तो राधा रानी जो है, उनके मन में क्या भाव रहता है। या तो भक्त हुई नहीं। सारे भग मेर से अच्छे हैं। राधा रानी क्या सोच है? सारे भाग मेरे से अच्छे है। ये भाव हमारे होना चाहिए। यही राधा रानी। फिर बाद में छेतनीयमहापरछेतन महाप्रभु ने हमें क्या दिया दि सुने चेना रोड़पीसनाअमानिना बना देना किरतनदीसदाहनी अगर तुम सदा हरि का नाम लेने की इच्छा रखते हो तो क्या करना चाहिए? नम्रता? दासमी के शुभ अवसर पर हम सब की यही इच्छा नहीं होनी चाहिए। हाँ, आज हम राधा रानी जी से हमारी भौतिक इच्छाओं को पूरा करने के लिए मांगे। हमे यह चाहिए, ए चाहिए, वो चाहिए, वो चाहिए। हमें राधा रानी जी से क्या मांगना चाहिए? क्या उनके भक्तों के भक्त बने? भगवान कहते हैं अर्जुन से जो व्यक्ति यह सोचे की वो मेरा भक्त है, वो मेरा भक्त नहीं है। जो सोचे कि वो मेरे भक्त का भक्त है, दास दास है, दास है, वो है। असली भक्त। तो हमें चेत या महाप्रभुजी की नजरों से राधारानी को समझना चाहिए। राधारानी और महा प्रभु में को अंत नहीं तो राजरानी की पिता माता का नाम था, किरतिदापिता का नाम था रिशव बानू। तो रिशु बानो और कृतिदा कई साल हो गए थे उनके विवाह को, पर उनकी कोई उलाद नहीं थी। तो दुखी थे की कोई उलाद नहीं है। तो 1 देवी काशवाणी दालों ने सूचना मिली हरी नाम का जाप करने के लिए। तो 1 दिन भगवान श्वानु, भगवान महाराज वृषभानु यमुना नदी में चिंतन करते थे भगवान का जब 1 बड़ा कमल का फूल जिसमें हजार पेटल थे, पैटल क्या कहते है हिंदी में हजार पंखुड़ी थी, वो बृशबानोकेपास आ गया से थी लड़की छोटी सी न्यू बॉन जोवी पैदा हुई थी। बानू ने इसे देखा तो उसे उठाया और घर ले गये। पत्नी कृतिदा के पास, माता पिता बड़े खुश हुए और उन्होंने यह देखा की लड़की अंधी है। 1 दिन मुनि भगवान कोई लीलाओं को देखना चाहते थे। वो ब्रज में आये, वो ब्रज में आये, उन्हें सूचना मिल गई थी कि भगवान प्रकट हो चुके हैं। नारद मुनी सबसे पहले नंद मराज के घर में गये। नंद मराज के घर में उन्होंने देखा भगवान लेटे हुए हैं सोने के बिस्तरे में, तो नारद मुनि ने कहा जो भी इस बालक के सम्बन्ध में आयेगा उसका जीवन आनंद में भर जाएगा। जो भी भगवान की शरण लेता है वो असली आनंद अनुभव कर सकता है। पर नारद मुनि यह भी समझ गए की भगवान प्रकट हुए है तो राजा रानी भी प्रकट हो गयी होगी। कान का नारदमुनी ने निर्णय किया ब्रज के हर घर में जाकर देखूंगा राजा रानी प्रकट हुई की नहीं तो हर घर में ब्रज के नारदमुनि जाने लगे। महाराज बृशिबानूके घर में पहुँच गए। मराजमृषयबालू कौन थे के घर में पहुँचे। महाराज ने अपने बड़े बेटे से परिचय करवाया से मुनी ने कहा ये बालक क्रिष्ण बलराम के साथ बहुत खेलेगा, उनके साथ पलेगा। जैसे दराज मुनि बृश्यबानुके घर छोड कर जा रहे थे। महाराज दृश्य बानु ने अपनी बेटी जो कमल के फूल के द्वारा प्राप्त हुई थी उसे उठा कर ले आये और कहने लगे आप इस लड़की को जरा आशीर्वाद 2 कि इसका अंधापन दूर हो जाए। क्योंकि राजरानी जब पैदा हुई थी आंखें बिल्कुल बंद थी, बहरी थी, गुंगी थी। नारद मुनी ने जब इस लड़की को उठाया इतना आनंद आया उन्हें वो समझ गई। ये राधारानी है मुनि ने उनसे विनती की, राधारानी ने अकेले पन में बच्चे ने अपने की चोरी 14 साल की लड़की का रूप प्रकट किया, विदामुनिजयने प्रणाम किया तो वापस राजरानी छोटी लड़की का रूप हम करने लगा है। नई न्यूली बॉल नंदमनाजऔडिसोदा माता अपने बेटे को लेकर भरा ऋष्य बानो के घर में आये। इनका बड़ा अच्छा सम्बन्ध था किसका किसका मराज रषयबानूऔरकृतिदा और ननद मनाज और यसोदा रोज उठना बैठना 1 साथ था। यशोदा माता आई उनके घर में ह कृष्णा को लेकर और वहाँ ऋिशवानो की बेटी भी थी। तो फिर यशोदा माता ने दोनों बच्चों को उठा लिया अपनी गोद में। 1 कृष्णा दूसरे थे और भगवान ने राधारानी को हाथ लगाया। जैसे ही हाथ लगाया। राधा रानी जैसे लोग अन्दा मान रहे थे, राधा रानी अपनी आँखें खोल दी, क्यूंकी वो अंधी थी? क्योंकि वो चाहती थी कि सबसे पहला व्यक्ति जो मैं देखा वो कुछ न हो। इसलिए वो माता दोनों बच्चों को उठाया, दोनों बच्चों को उठाया। भगवान ने जैसे ही राजधानी को छुआ, उनकी आँखें आ गए और उनकी आँखें आ गई। और यह भी कहा गया है कुछ आचार्यों के द्वारा जब भगवान ने निर्णय किया था कि मैं प्रकट हूंगा, कलियुग में, द्वार प्रयोग में, तो राधारानी से भी निवेदन किया था। राधा रानी ने कहा, मैं तो प्रकट होना नहीं चाहती, पर अगर आप मुझे ये यकीन दिलवाओगे। सबसे पहला व्यक्ति जो मैं देखूंगी, वो आप हो गए, फिर हत्या। तो सबसे पहला व्यक्ति जो राधा रानी जी ने देखा, कौन थे? तो इस प्रकार भगवान के तुम्हारे मन में किसी हालत में ये भाव नहीं होना चाहिए कि यह कोई भौतिक रिश्ता है। राधा रानी जी भगवान की अंतरंग शक्ति हैं, लादिनी शक्ति जो की प्रकट हुई है, भगवान के आनंद को बढ़ाने के लिए। भगवान को आनंद आता है राधा रानी का दर्शन लेकर। राधा रानी जी को आनंद आता है भगवान का दर्शन लेकर। और ये आनंद बढ़ता जाता है। राधा रानी का प्रभाव इतना तेज है, जब भगवान उनके साथ खड़े होते हैं तो भगवान का रंग भी गोल्डन सुनार बन जाता है। राजरानी ने 1 बार गई, दरवाजा मुनि के पास, गोपियों के साथ और राधा रानी ने निवास मुनि के लिए भोजन तैयार किया, निवास मुनि थे उस भोजन से। राधा रानी जी को 1 वर दिया, क्या था। और फिर जो भी तुम प्रसाद बनाओगे, इतना अच्छा टेस्ट होगा, जो भी खाएगा उसकी आयु लम्बी हो जाएगी, खूबसूरती बढ़ जाएगी, सुख भर जाएगा। तो ये बढ़ दिया था। तो ये शो दबाता कि हमेशा इच्छा रो रहती थी। राधा रानी हमारे बेटे के लिए भोजन बनाये। तो राधा रानी का भाव क्या है? भाव यह है कि मेरे में कोई भक्ति भावना नहीं है, मैं सबसे निकमी भक्त हूँ। तो आप कहोगे? ये कैसे हम राजा की भीख मांग रहे हैं। राजन के मन में क्या भाव रहता है, सब जो हैं, मेरे से ज्यादा अच्छे हैं। और चेतन महान क्या भाव प्रकट किया। 1 राजा थे, महाराज पद है, पुरा, उनके प्रयास कर रहे थे भगवान का दिव्य दर्शन प्राप्त करने के लिए। पर भगवान इनकार करते गये। फिर रथ यात्रा के समय उन्होंने देखा कि राजा राजा होते हुए सड़क को साफ कर रहा है झाड़ू के साथ। और फिर उस सड़क को धो रहा है गुलाब के पानी के साथ। भगवान का रथ निकलने वाला। भगवान से। तो चेतन महा प्रभु। इतने प्रसन्न हुए, उन्होंने अपना दिव्य दर्शन दिया। तो चेतना महाप्रभु का सिद्धांत क्या है? चेतना महाप्रभु का सिद्धांत है। शुद्ध भक्ति भागोतम का क्या है निचोड़ शुद्ध भक्ति, राधारानी जी ने हमे क्या भाव दिया है। शुद्ध भक्ति का। राधा रानी जी के मन में सदा 1 ही भाव रहता है। कृष्ण की सेवा, हमारे मन में भी वही भाव रहना चाहिए। और विनम्रता के कारण द्वारा आप भगवान को आकर्षित कर सकते हो। चेत ने महाप्रभु ने अपने शिष्य को तो कहा भक्ति सम्बंधित भक्ति सम्बंधित ग्रंथ की रचना स्वयम चेत ने महा प्रभु। केवल 8 लोग छोड़ ग क्या कहते हैं न धन, न जन सुन्दर कविता जगदीश कम रही भगवान मुझे धन चाहिए संगत न आदर से मुझे 1 चीज चाहिए। क्या आपकी सेवा का भाव? तो इस सेवा का भाव हमें प्राप्त होता है। राधा रानी जी के उदाहरण से सेवा का भाव हमें प्राप्त होता है। चेतन महा प्रभु के उदाहरण से। तो आज जैसे शुभ दिन में हमें राधारानी जी से क्या प्रार्थना करनी जाए। यह नहीं हाँ आप हमारी ये इच्छा पूरी करो, यह इच्छा पूरी करो, ये इच्छा पूरी करो। राधा रानी जी से हमें मांगनी चाहिए भी हमें शुद्ध भक्ति प्राप्त हो, हम आपके भक्तों के दास बने। भक्तों के दास केवल भगवान के दास नहीं। जैसे हमने थोड़े समय पहले कहा, भगवान ने अर्जुन से कहा जो व्यक्ति ये कहे केवल मेरा दास है और मेरा दास नहीं, जो कहे कि मैं सेव सेवा भक्त के भक्त का भक्त का दास हूँ वो है मेरा भाव राधा रानी जी हैं भगवान के सबसे उत्तम कोटी के भक्त। और अगर आप कहो हम तो केवल राधा रानी के भक्त हैं तो आप भक्त महीं
हो
भक्त के भक्त के भक्त के हैं। फिर राधा रानी जी प्रसन्न होती है तो यह भाव होना चाहिए। हमें ये शिक्षा हमें प्राप्त होती है। राधा रानी जी के उदाहरण से और चेतन महाप्रभु के उदाहरण से की किस प्रकार हमारे में विनम्रता का भाव होना चाहिए। अगर हम भक्ति के मार्ग में आगे बढ़ना। चा और गोपियों का जो भाव है, गोपियों का जो त्याग है उसकी तुलना कोई नहीं कर सकते। चेतन्य महाप्रभु की पर भगवान हैं श्री कृष्ण चेतन्या, राधा कृष्ण नयानया, राधा कृष्ण प्रकट हुए चेतन्य महाप्रभु के रूप में 1 दिन भगवान ये भाव प्रकट करते थे गोपी गोपी, गोपी, गोपी, गोपी, गोपी, गोपी, गोपी, गोपी, गोपी गोपी गोपियों का जो भाव है सबसे तुम कोई संस्कृत के विद्वान थे लड़के बालक के लगे क्या गोपी गोपी गोपी बोल रहे हो हरे कृष्ण बोलो को इतना क्रोध आया उनके पीछे भागे और ये लड़का भाग गया दूसरे मित्र के साथ और कहने लगे तुम लड़ने को तैयार हो गए थे ने देखा की आज वातारण में लोग इतने पतित हो गए हैं वो गोपी भाव को समझ नहीं पा रहे है। महाप्रभु ने निर्णय किया मुझे क्या लेना चाहिए, सन्यास लेना चाहिए, सन्यासी का आदर किया जा सकता है। तो राधा रानी जी का जो भाव है उसके द्वारा हमें विनम्रता की सेवा का मौका मिल रहा है और राधानी का जो भाव है वो ये कि हम निष्काम भाव से भगवान की सेवा करें। श्रीमद भागवतम का क्या है उपदेश धर्म प्रोजित श्रीमत भागवतम द्वारा शुद्ध भक्ति का ज्ञान मिलता है। ब्यास देव ने सारे वेदिक सासों का निर्णय का उच्चारण किया था पर जब भी उन्हें लग रहा था कि मेरे उच्चारण में कुछ कमी रह गयी है। जब उनके गुरु स्ना मुनी पहुंचे। उन्होंने क्या कहा? तुमने केवल शुद्ध भक्ति पर बल दिया। फिर उन्होंने हमें कौन सा ग्रंथ द या श्रीमद भागवत? तो राधा रानी जी के द्वारा हमे शुद्ध भक्ति का ज्ञान प्राप्त होता है। तो राधा रानी जी और भगवान की अनेक लीला है। सांसों में राधा रानी के गुणों का भी वर्णन किया गया है। राजधानी के अनेक गुण हैं जिनमें 25 गुन सबसे प्रसिद्ध है और राधा रानी जी की निकली लाये हैं। भगवान के साथ 1 समय नारदमुनी ब्रज में आ रहे थे। बार बार भगवान ने राधारानी को कहा नाद मुनी, तुम्हारे घर में बहुत आ रहा है, संभल के रहना झगड़ा करवा देगा किसी के साथ। राधा रानी ने कहा मेरा झगड़ा आप से कौन करवा सकता है? तो जो गोपियां थी, उन्होंने तैयारी की थी। राधा कृष्ण का स्विंग फेस्टिवल करने के लिए झूलन यात्रा जैसा करे। तो सब कुछ तैयार हो गया था। और राजधानी तैयारी कर थे। तो नारद मुनि वहां पहुंचे। भगवान बीना बजाते हुए बड़े मधुर स्वर में गाते हैं। भगवान ने ऐसे बड़े प्रसन्न थे। भगवान ने पूछा कोई वर मांगो जो वर्ड चाहिए मेरे मांगो। मैं ने कहा अब नहीं चाहिए। जब मैं मांगूगा तो थोड़ी देर बाद मुनी पहुंचे आपने। मुझे कहा था न, जो वर्ड चाहिए। 2 गए तो मुझे ये वर्ड चाहिए। मैं देखना चाहता हूँ कि आप ललिता के साथ झूलन करो राधा नाधीजीतैयारहोरी थे। जब ललिता को कहा गया, आप भगवान के साथ झूलन करो लगा नहीं झूलन, केवल रात रानी करेगी, मैं नहीं करो। भगवान ने कहा नहीं, नहीं सपने, कहा करो। तो ललिता फिर भगवान के साथ झूलन करते थे। वो दीदी मुनि चले गए। राजा रानी के पास। राधा रानी तैयार हो। भगवान मुनि तुम तैयार क्यों हो रहे हो? झूलन के ले जाना। भगवान भगवान ललिता के साथ, झूलन के सच के साथ झूलन करे। तो राधा रानी या देखने के लिए देखा, ललिता झुलन कर रही है। राधा रानी को बड़ा क्रोध आया? भगवान ऐसी बात करना इनकार कर दिया। राजा रानी उदास थी तो भगवान राह देख रहे थे। राधा रानी जी नहीं आई तो भगवान ने कहा कुछ घटना बीत गई होगी, भगवान दुरी है तो समझ गए न ादमुजीनेईशरारत की होगी। तो भगवान गए। राधा रानी के बाद राजरानी से कहा मैं झूलन की करने के लिए राय देख रहा हूँ। राधे रानी ने कहा आप तो ललिता के साथ झूलन कर रहे थे। तुम मेरी तरफ क्यों आ रहे हो? भगवान ने नारद मुनी से बच के रहना। नारदमुनी ने मेरे से वर मांगा कि ललिता के साथ में झूलन करू। नाना। दुमनी को खुश करने के लिए मैं झूलन कर रहा था। उसने तुम्हे उलटी कहानी तो फिर राजरानी समझ गई। ना मुनी से सावधान रहना चाहिए समय ये जो गोपियां हैं, इनकी इच्छा थी कि यमुना पाठ जाए। दुरवास मुनि को भोजन खिलाने के लिए, उनसे वर प्राप्त करने के लिए। क्या ह कि हम भगवान कृष्ण के बड़े प्रसिद्ध भक्त बन जाए। और ये नहीं, यमुना नदी पानी से भरी हुई थी। तो कैसे जाते दरिया के पार तो गोपियों ने पूछा, कैसे भगवान से हम दुर्वास स उन्ही के बाद जाना चाहते हैं। यमुना के पार भोजन खिलाने कैसे जाएं ये यमुना नदी तो पानी से भरी हुई है। भगवान ने कहा, तुम जा कर नदी को कहो कि अगर कृष्ण भगवान असली ब्रह्माचारी है तो हमें रास्ता। 2 हम द्वाजहमुनीकोबजाना चाहते हैं। गोपियों ने सोचा, भगवान हमारे साथ रहते हैं, दिन रात तो असली ब्रह्मचारी कैसे है? खैर उन्होने जाकर बोल दिया। भगवान असली ब्रह्मचारी है तो तुम रास्ता। 2 की हम दुर्वा सबुनी के बाद पहुँच। सके ने तुरंत ही उन्हें मुनि के पास, मुनि के पास पहुंचे तो दिवा मुनि को बहुत अच्छा प्रसाद, खिलाया प्रश्न किया। दिरवाहस्मुनि सरलता से प्रसन हो जाते है, सरलता से क्रोधित हो जाते हैं। और फिर गोपियों ने कहा, अब हम लौटना चाहते हैं। पर फिर उन्होंने देखा यमुना नदी जल से भरी हुई है, वो कैसे जायेंगे जब तक वो रास्ता नहीं देगी। दरवास मुनि के पास। दवा मुनि से कहा, हम अब वापस लौटना चाहते हैं। कृष्ण की सेवा करने के लिए। यमुना नदी इतनी भरी हुई है, पानी के साथ हम कैसे जाएंगे पार। मुनी ने कहा, जल्दी से कहो कि मुनी ने कुछ खाना नहीं खाया है तो फिर रास्ता दे। 2 हम कृष्ण। गोपियो ने कहा, हमने अपने हाथों से खिलाया, दुर्वा से कुछ खाया नहीं। उन्होंने कह दिया कह दिया था तुरंत ही उन्हें रास्ता दे दिया जाने के लिए। गोपी खुद रोटी खिला खिला और अमन ने विश्वास कर लिया की उन्होंने कुछ नहीं खाया। तुमने भगवान से पूछा तो भगवान ने कहा मैं चाहे तुम्हारे साथ दिन रात रहू, मेरी इंद्रियों पर मेरा पूरा बस है, जितेंद्र है और मैं कभी नहीं सोचता। कोई गलत भाव तो मैं हूँ। असली प्रभारी जरवासहमोनी उन्होंने जलक खाया भी उनको खाते हैं, बिल्कुल डिटैच डिटैच बना सकती। भाव से। वो आकर्षित नहीं होते, इसलिए खाते भी हैं और नहीं भी खाते। इस भगवान की है स्वामी। 1 समय जैसे आप जानते हो, समाज में उनका बहुत ऊँचा स्थान था। उस समय के सबसे प्रसिद्ध राजा नवा भुसेणशा के शासन को चिल्ला रहे थे। और दोनों भाई छोड़ कर कहाँ गये ब्रज में और दोनों भाई मधुकरी रह रहे थे नौकरी त्याग। उनके पास इतने सोने के सिक्के थे, पूरी नाम भर गयी थ। रूपक के स्वामी की इच्छा थी कि मेरे भाई को खीर खिलाया जाए, पर वो मधुकरी करके रह रहे थे, कोई सुविधा नहीं थी। राधा रानी को पता लग गया रूपा के स्वामी की क्या इच्छा है। तो 1 खूबसूरत गाली का रूप ग्रहण करके चावल, दूध, चीनी लेकर वो पहुँच गई रूपक गोसवामी के घर। रूपगगुसवामी ने कहा मैं आज खीर बनाने की सोच रहा था। मेरे भाई के लिए। आप भी इन बस्तों को ले आये हो। शुक्रिया और राजरानी ने बना भी दी खीर मिनटों में और चले गए उनका भाई सनातन आया खाने के लिए। सनातन ने देखा इतनी अच्छी खबर है जो खीर बनायी। राधा। रानी ने टेस्टी नहीं थी, केवल ऐसी खुशबू आ रही थी। यह खीर बन कर आई है। राधा रानी को दरबार से। मुनि ने वर दिया था न याद है की जो भी तुम भोजन बनाओगे किसी के लिए भी वो भोजन क्या होगा सबसे टेस्टी होगा और जो ये खायेगा उसकी आयु लम्बी हो जाएगी और कोई स्चिनेसनाताने पूछा ये सब कैसे की किसने बनाई। रूपा ने कहा 1 खबसूरत लड़की आई थी इन सब बस्तों को ले आये कहने लगी तुम ले लो सुना वर्णन सुना खूबसूरत लड़की कैसे उसने प्रसाद बताया वो समझ गए खबसूरत लड़की कौन थी सनातन गुस्से हो गए ने कहा भगवान से सेवा ली राधा रानी से सेवा ली यह महा अपराध है तो शुद्ध भक्त भगवान के उनके मन में यह इच्छा नहीं होती की सेवा ले मन में क्या इच्छा होती है कि हम सेवा यह भाव मानव पुरी की कथा में भी प्राप्त होना। रगुनादाजको स्वामी धूप में अपना जॉब कर रहे थे रगुणआदाज को स्वामी उस समय के सबसे धनी खानदान के इकलौते पुत्र थे और उन्होंने सब कुछ त्यागा ब्रज में जाने के लिए वहाँ प्रभु की सेवा में जुड़ने के लिए तो इतनी गहरी धूप में जॉब करते थे। राधा रानी जी आई दुपट्टा लेकर छाते के रूप में रख दिया रगना को स्वामी के ऊपर रगनाथ को धूप से बचाने के वहाँ से कौन गुजर रहे थे सनातन को स्वामी सनातन ने देखा राधा रानी धूप दुपट्टा लेकर सनातन की रक्षा वो बहुत गुस्सा हो गए रघुनाथ तुम राधा रानी से सेवा ले रहे हो। 1 और घटना बीती थी 1 दिन जब राधा जब रगुनदासेअनावजन कर ते थे तो शाम के गुण में 1 शेर था टाइगर था वो पानी पी रहा था पास के तालाब से राधारानी और खड़ी हो गयी की सुरक्षा करने के लिए और देवर सुनाता ने देखा ये राधारानी सेवा कर रही है बहुत गुस्से हो। उन्होंने रगुनाथ को कहा तुम बाहर धूप में जाप मत करो। उसके बाद फिर रघुनाथ के लिए भजन कुटीर बनी और मंजन कुटीर का आज शुरू हुआ इस प्रकार 1 बार राधा रानी और गोपियाँ नाम में जारी थी मानसी गंगा के पार जाना चाहते हैं। अब वृंदावन जाओ तो मानसी गंगा बहुत छोटा स्थान है पहले मानसी गंगा बहुत बड़ी थी राधा रानी और गोपियाँ गंगा के पार जाना चाहती थी अपना मक्खन बेचने के लिए तो नाव में बैठे नाव थोड़ी देर नाव आगे चली नाव चलाने वाले व्यक्ति के वोट मैन कहने लगा मुझे भूख लगी है जब से तुम कुछ खाने के लिए नहीं दोगे मैं आगे नहीं बढूंगा नादानी गोपियों ने जो थोड़ा मक्खन धई ले जा रहे थे बेचने के लिए थोड़ा वो दे दिया थोड़ी देर आगे अकेले लगे। बोटमेन ने कहा इस नाव में बहुत वजन है इन्ही वजह से नाव आगे नहीं जाएगी नाव ढूंढने वाली है ये तुम्हारे पास वस्तु है सबको फेंको राधानी सबको अपना हीरा मोती गाने मक्खन सब फेंकना पड़ा थोड़ा सा रह गया था वो जाने दे बेचने के लिए मथुरा में ना बना के लगा लगता है नाव डूबने वाली है वो आंधी आ गई तेजी के साथ राधेरानी जब घबरा गई व आंधी आने वाली है उन्हें समझ आ गया वो बोटमैन कौन था? तो हमे भगवान की लीलाओं में रूचि लेनी चाहिए। भगवान कहते है। तो आज भक्तों के लिए। ऐसे भगवान के अनेक लीलाएँ हैं। पर मुझे अभी पूजा करना है। अभिषेक में आना है। सार 11 बजे भगवान की अनेक लीलाएं हैं। रस्मी के शुभ अवसर पर हमारा क्या भाव होना चाहिए। हमारा यह भाव होना चाहिए कि हम निष्काम भाव से भक्ति में आगे बढ़े। राधारानी। जब किसी को भगवान को कहती है, ये अच्छा भक्त है, इसे स्वीकार करो तो भगवान तुरंत ही स्वीकार कर लेते है। ऐसा है न भगवान, राज रानी कहती है। ये अच्छा भक्त अच्छी तरह जाब कर रहा है। ये मेरे भक्तों का भक्त है। फिर भगवान कहते है चलो इसको कृपा दे। तो राधा रानी जी की कृपा बहुत आवश्यक है। पापा जी के पिता घोर मोंडे बकायदा संतों की सेवा करते थे। तो संत जब जा रहे होते थे, तो वो कहते थे मेरे बेटे को आशीर्वाद। 2 कि राधा दादी का बड़ा प्रसिद्ध भक्त बने। किस का प्रसिद्ध भक्त। जब पापा जी ज्यादा दूर में जा रहे थे, जैसे ये साल मना रहे हैं, जुबली की जब पापा जी निकले थे। भारत से, पापाजी ने धान में 1 कविता लिखी। उस कविता में प्रापा ने कहा अगर राधा रानी जी की कृपा हो तो भी भक्ति में जुड़ सकता है। पापाजी। जब मैने कहा पहुँचे देखा वांग का किस प्रकार लोग इंडिया तेते कार्य में जुड़े हुए हैं। तो प्रावा जी सोच रहे थे कौन लेगा मैंने सन्देश को 4 नियम का पालन, हरी नाम पर। आगे उन्होंने कहा कि अगर राधा रानी जी की असीम कृपा हो तो हर कार्य संभव हो सकता है। तो हम सब को राधा रानी जी की कृपा की भीक मांगने चाहिए। और हम राधा रानी की कृपा की भी कैसे मांगते हैं। महा मंत्र के उच्चारण के द्वारा हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा। जब आप हरे कहते हो तब राधा रानी जी से प्रार्थना करते हो। कृपा करके मुझे भक्ति दी जाए। कृष्णा कहते हो, करते हो। उचारन भगवान कृष्ण से भी कहते है हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, हरे कहते हो, कृष्ण, भगवान बड़े प्रसन्न होते है, दादी का नाम ले रहे हो। और जब आप कृष्ण कृष्ण कहते हो तो राधा रानी बड़ी प्रसन्न होती है। अब कृष्ण का नाम ले। अगर आप दोनों को संतोष करना चाहते है तो क्या करना चाहिए? चेतन महा प्रभु ने राम से पूछा हमे कौन से गीत का उच्चारण करना चाहिए? रामणनद्ररोये ने कहा हमे उस गीत का उच्चारण करना चाहिए जिसके द्वारा राधा कृष्ण का गुणगान हो। वो है महामंत्र। हमे इस रश्मी के शुभ अवसर पर यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हम महा मंत्र का उच्चारन करे। दिन रात। यही नहीं हम भगवान की रासलीला की चिंतन करे। रास लीला का वर्णन चुके को स्वामी ने किया है। दसवे स्कंद में जाकर भगवान की बाल लीला का वर्णन करने के पश्चात। क्योंकि जब व्यक्ति वहाँ तक पहुंचेगा तो उसके मन में कोई शंका नहीं रहेगी की परम भगवान कौन है। तो हमें उसी प्रकार सबसे पहले हमें यह समझना चाहिए कि राधा कृष्ण का जो प्रेम है वो असली प्रेम है, भक्त का प्रेम है भगवान के लिए, ये जो गोपियां हैं, इनके चरित्र में कोई कलंक नहीं चाहे वो रात के समय हो, भगवान भगवान जो हैं जैसे हमने वो लीला में सुनाया असली ब्रह्मचारी हैं और राधा रानी जी से हम क्या भीख मांगते हैं की हमे शुद्ध भक्ति मिले, शुद्ध भक्ति मिले तो आप शुद्ध भक्ति चाहते हो, सबकी यही इच्छा है शुद्ध भक्ति तो शुद्ध भक्ति प्राप्त करने के लिए क्या करना पड़ेगा, महामंत्र और महामंत्र को चाहे जितना करो उतना ही कम है तो आप सब राशमी के शुभ अवसर पर राधा रानी जी की शुभ कामनाएं स्वीकार कीजियेगा राज रानी जी से यही प्रार्थना करो की हमें शुद्ध भक्ति मिले और हम सदा कृष्ण की सेवा करते रहे और निष्काम भाव से सेवा करे, शाका भाव से हे और अगर ये इच्छा रहेगी तो राजरानी जी और हम आपके केवल आपके दास नहीं, हम आपके भक्तों के दास, आपके भक्तों के, भक्त के, भक्त के, भक्त के, भक्तों के, भक्तों के दास हैं राजानी भाव, देखेंगी और कृष्ण भगवान को कहेंगे इनको स्वीकार कर लो और फिर भगवान कुछ देखे बिना स्वीकार कर लेते हैं रानी का ऑपरेशन कर सकते हो भक्ति के माध्यम से हरे कृष्ण र।
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