साधना भक्ति है दवाई तो सेवाभाव है परहेज | 2009 | CC M 22.100 | Delhi | Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Goswāmī

This content was created by PRASAD RAVAL. This content was uploaded by PRASAD RAVAL. This is a YouTube video titled "साधना भक्ति है दवाई तो सेवाभाव है परहेज | 2009 | CC M 22.100 | Delhi | Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Goswāmī." The metadata indicates a recorded devotional/spiritual lecture or satsang (likely in Hindi) delivered by Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Goswāmī in Delhi in 2009, addressing topics around sadhana, bhakti, seva-bhāva and parhej (practice, devotion, service attitude, and abstinence). The file was created/posted on 2021-10-21 and is hosted on YouTube.
Chapters
ओम नमो भगवते सुरवाया बासुरेवायाओमनमो भागते वासुरिवाया ओम बासरवयाओमनमोभागते वासुदेवाय ओह नववतिबाददिमार। लगता है कि समय बहुत कम है। चेतन के मध्य के 22 दिहाई में आपको चेतन महारकी शिक्षा प्राप्त होती है जो कि उन्होंने सनातन गोस्वामी को दी थी। हम भक्तों को भागवत गीता तो पढना चाहिए, भागवत तम पढना चाहिए और चेतन छरतरमीताभीपढ़नी चाहिए। चेत्र मिता में चेतना महा शिक्षा और लीलाओं का वर्णन है। क्षेत्र के मध्य इलाके 22 दिहाई में आपको चेत्र ने महा प्रवति की शिक्षा प्राप्त होती है जो कि उन्होंने सनातन गोस्वामी को दी थी। हम भक्तों को भागवत गीता तो पढ़ना चाहिए, भागवत पढ़ना चाहिए और चेत्रनेचरतमीता भी पढनी चाहिए। चेत्र ने चरतनमीतामें, चेत्र, महापरब्जीकी शिक्षा और लीलाओं का वर्णन है। प्रापा जी ने क्षेत्र में मीता का अनुवाद अंग्रेजी भाषा में किया था और आगे इसका अनुवाद भारत की लगभग सब प्रसिद्ध भाषा में हो चुका है। अगर आप अंग्रेजी में नहीं पढ़ सकते तो हिंदी में पढ़ सकते हो। पर हमें चेतन महा पब्जी के विषय में पढना चाहिए। चेतन महा पब्जी के विषय में कहा गया है सब अवतारों में सबसे दया दयालु अवतार हैं जो कि प्रकट हुए थे। पतितों को धारण करने के लिए सनातन गोस्वामी रूप स्वामी, आप जानते हो गोस्वामी थे जो क्षेत्र महाप्रभुजी के सबसे प्रसिद्ध भक्त हैं। और वैसे तो इन गोस्वामियों को वंजारी का अवतार माना जाता है। वंजारी वो है जो कि गोपियों का गोपियों को सहयोग देती हैं। राधा रानी जी की सेवा में और राधा रानी जी का मूल भाव सदा 1 ही है। कृष्णा की सेवा। तो चेतना महारज ने बाइसवे दिहाई में जलील जिसका नाम है भक्ति योग शिक्षा दी है अनेक महत्वपूर्ण विषय पर। और आगे वो कहते हैं। इसी दिया में अनुकुल से संकल्प, पतिकयस, वजन, रक्षेसीदातिविश्वणम, गोपती, वर्ण तथा आत्म नक्षे पर कार्पन सद विधा शरणागति। तो शरणागति का अर्थ है भगवान के शरणागत होना। और हम सब जो इस काल के साथ जुड़े हैं, उन सब का मूल भाव होना चाहिए कि हम परम भगवान के शरणागत हो, चाहे आप ब्रह्मचारी हो या गृहस्थ। यह वानप्रस्थ या सन्यास, हम सब का भाव होना चाहिए कि हम परम भगवान के शरणागत होना चाहते हैं। गीता के अंत में भगवान कहते हैं सर्व धर्मान पड़ता जा मां मे। हम तो हम सब पाप से, शामी, मां से चाहा, सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आओ भगवान कहते हैं पूरे रूप से मेरे मुझे शरणागत होना चाहिए। तो हम सब का यह भाव होना चाहिए। और चेतन महाप्रभ समझाते हैं कि भगवान के शरणगत होने के 6 विभाग हैं। ये 6 अवश्य कार्यों का पालन हमें करना चाहिए जिसके द्वारा आप भगवान के शरणागत हो सकोगे। और सबसे के पैले कहते हैं अनुकल संकल्प कि जो कार्य भक्ति के लिए अनुकूल है, उसे स्वीकार करो और जो भक्ति के लिए प्रतिकूल है, उसे त्याग साधारण। समाज में अगर कोई सौदा लाभदारी हो, हम स्वीकार करते हैं और जिसमें लाभ की गुंजाइश नहीं हो तो हम स्वीकार नहीं करते। तो उसी प्रकार आध्यात्मिक मार्ग में जब हम प्रवेश करते हैं, हमे तैयार रहना चाहिए। उन चीजों को त्यागने के लिए, जो भक्ति के लिए प्रतिकूल है। अगर हम सोचें कि हमें भौतिक सुख भी चाहिए और आध्यात्मिक सुख भी चाहिए, तो यह असंभव है। हमें आध्यात्मिक मार्ग में सफलता प्राप्त करने के लिए जो प्रतिकूल कार्य हैं, उन्हें त्यागने के लिए तैयार रहना चाहिए। तो सबसे पहले क्षेत्र महारज ने कहा कि जो अनुकूल है, उसे स्वीकार करो। तो अनुकूल कार्य में क्या गिरोगे। सबसे पहला कार्य है ध्यान पूर्वक हमारा जॉब करना। हम रिक्शा लेते हैं। जब स्वीकार करते हैं कि हम लोग 16 माला का जॉब करेंगे, 25 माला का जाप करेंगे, शुभ दिनों, पर। और इस जॉब के विषय में आप पढ़ते हो कि आप ध्यान पूर्वक भी कर सकते हो। या लापरवाही के साथ परशस्त का निर्णय है। जितना इटेंटिवलीजॉब करोगे उतना ही अधिक लाभ आएगा। तो कई बार, कई बार भक्त पूछते हैं। ध्यानपूर्वक जॉब का क्या मतलब? सरल शब्दों में, इसका अर्थ है कि जब आप अपना 16 माला का कोटा करने को बैठते हो तो केवल इस कार्य पर ध्यान 2 यह नहीं कि अपना 16 माला का जॉब कर रहे हो और साथ में सेल फोन ऑन है और अनेक और कार्य कर रहे हो। और इस हरी नाम के उत्पादन का पहला लाभ क्या है? के दरपन हृदय की मैल दूर हो गई। पर कई बार भक्त कहते हैं हम तो इतने सालों से जॉब कर है, पर हमारा बहुत है। क्या कारण है तो क्या कमजोरी है। डॉक्टर मरीज में या डॉक्टर में या दवाई में कमजोरी है। मरीज में। जितने ध्यान से हमें जॉब करना चाहिए, उतने ध्यान से हम नहीं कर रहे। इसके साथ हमें बकायदा सासों का भी अध्ययन करना चाहिए। प्रापा जी ने बड़ी कठिनाई के साथ इन ग्रंथों का अनुवाद किया। पर हमने प्रापा जी का विभाव तिथि मनाया था और आप लीला मिता पढ़ो। तो उस पड़ोगे कितनी कठिनाई के साथ प्रापा जी ने इन ग्रंथों का अनुवाद किया। कितनी दूर दूर प्राप्त को यात्रा करनी पड़ती थी। चंदा इकट्ठा करने के लिए, ग्रंथों को प्रकाशित करने के लिए। तो इन ग्रंथों को हमें पढ़ना चाहिए। इस कौन संस्था में आपका पूरा सिद्धांत प्राप्त है और इन ग्रंथों के बाहर जाने की कोई आवश्यकता नहीं। श्रीमद भागवतम बाला स्कंद में प्रकाशित हो गई है। चेतन, अमृता, भाग, अनेक और ग्रंथ। इन्हें हमें पढ़ना चाहिए। हम ग्रंथों के वेतन की सेवा पर बल देते हैं और इसके साथ पढ़ना भी चाहिए। ये नहीं कि हम केवल ग्रंथों का वेतन करें और पढ़े नहीं। शास्त्र में है भगवान की वाणी। भगवान प्रकट हो गए थे, पर शिक्षा छोड़ गए हैं। गीता भागवत। इन ग्रंथों में, जो हमें नियमित रूप से प्रयास करना चाहिए। कमीन ग्रंथों को पढ़ें, साथ में साधु संगत, साधु संगत की आवश्यकता है। आजकल अधिक भक्त घर में रहते हैं और भक्ति का पालन करते हैं तो मंदिरों का लाभ उठाओ। आपके। दिल्ली में कई मंदिर हैं। इस कौम के नोइडा में पंजाबी, बाग, सद नगर, गाजियाबाद, फरीदाबाद और पंजाब, हरियाणा में धियाना, यमुनानगर, चंदीगढ, कुरु क्षेत्र। इन मंदिरों का लाभ उठाओ और प्रचार के कार्य में जुड़े किसी न किसी रूप से माध्यम बना, जिसके द्वारा चेतन महाप्रब्यजीका संदेश आगे फैल सके। आज आप देख सकते हो समाज की बड़ी गंभीर परिस्थिति है और अगर हम सुख शांति चाहते हैं तो यही 1 उपाय है। भगवान श्री कृष्ण का संदेश। तो क्षेत्र मे महारपुर ने कहा जो अनुकूल है उसे स्वीकार करो। तो साधु संगत अनुकूल कार्य है। शास्त्रों का अध्ययन करना अनुकूल क्या कार्य है। ध्यान पूर्वक जाप करना अनुकूल कार्य है। और अगर आप इन का लाभ उठाओ तो बिना शंका के आप आध्यामिक मार्ग में परिवर्तन कर पाओगे। आगे महा प्रभु ने कहा जो प्रतिकूल कार्य है उसे त्यागो। इस विषय में महान संत रूपा गोस्वामी जी ने कहा है कि हे मेरे मित्र जो कीमत भी भरने पड़े भरो कृष्ण भक्ति को हाथ से मत फिसलने 2 तो प्रतिकूल कार्य में क्या गिना जायेगा। ध्यान पूर्वक जापनी करना हम सोना माला करते हैं, पर सुबह शुरू करते हैं और रात के 10, 11 बजे खत्म करते हैं और मोटर चलाते, चलाते, स्कूटर चलाते चलाते हैं। 10 साल काम करते करते हरी नाम का लाभ तो हर स्थिति में पहुँचेगा और पूरा लाभ चाहिए तो ध्यान पूर्वक करना चाहिए। फिर शर्तो को नहीं पढ़ना भौतिक वादियों की संगत उतना रखो, जितना की आवश्यक है, उससे अधिक अधिक नहीं। सतसंग त्याग हुआ। क्योंकि आप धन ना करते हो, नौकरी करते हो, पढाई करते हो। तो अगर हम ये कहें कि बिल्कुल, भौतिक, वलियों की संगत त्याग हो तो यह संभव नहीं हो पाएगा। उतना ही उनकी संगत रखो। जितना कि आवश्यक है, उससे अधिक नहीं। जो दिक्षित भागते हैं, जो दीक्षा लेने के उच्छा रखते हैं, उन्हें टी वी सिनेमा इन सब ाकर्ष से भी बचना चाहिए। जो हम देखेंगे वोही विचार हृदय में बैठेगा वो विचार को सफल बनाने का प्रयास करोगे। आपने भागवत में, छठे में आज मिल की कथा पढते हो। जी मेल का जन्म ब्राह्मण खानदान में हुआ था। सब विधियों का पालन करते थे, जंगल में गए थे, पूजा के लिए, फल लाने के, फूल लाने के लिए। कोई सिनेमा देखने नहीं गये थे। और आते उन्होंने 1 वैश्य को देखा, अपने प्रेमी के साथ। इस विचार को, इस तस्वीर को उन्होंने अपने हृदय में बिठा लिया और इस इसी का चिंतन कर दे गये। और हँसते हँसते उनका ध्यान जीवन नष्ट हो गया। तो जो हम देखेंगे वो ही करने की इच्छा भी प्रकट होती है। कई स्टडीज ने यह दिखाया है कि बच्चे जो वायलेंस देखते हैं, टीवी में बड़े होकर वायलेंट बनते हैं। तो इसलिए अगर आप आध्यात्मिक मार्ग में सफलता चाहते हो तो सिनेमा, टीवी, इन सब चीजों से आपने आपको बचना चाहिए क्योंकि देखोगे तो हस्ते हस्ते जो देख रहे हो, उसके आने के प्रति आकर्षित होंगे और वैचा पराध से बचना। आध्यात्मिक जीवन में हमें ध्यान सावधान रहना चाहिए और वैश्य प्रांत से हमें बचना चाहिए। चेतन मार प्री ने कहा व्यक्ति का बगीचा नष्ट हो जाता है। जब 1 पागल हाथी को भक्ति के बगीचे में छोड़ोगे, सुन्दर बगीचे में छोड़ोगे तो वैसा अपराध से हमें बचने का प्रयास करना चाहिए और कभी हृदय में कुछ शंका हो, ये कार्य करना चाहिए या नहीं? करना चाहिए? तो साधु संगत एडवांस डिवोटी से पूछो। इस काल में आपको गुरु के अलावा अनेक और प्रसिद्ध एडवांस डिवोटीज हैं। इस्कान में अनेक सन्यासी हैं, रावजी संस्था के कार्य हैं और अनेक सीनियर भक्त हैं, जो कि शिक्षा दे रहे हैं, उनका भी लाभ उठाओ। उनसे भी प्रश्न पूछो, ये हमारी शंका है, ये जिज्ञासा है। यह विचार ठीक है या गलत है। रुपगसामीजीने कहा है? किस प्रकार 6 प्रकार के संबंध होने चाहिए भक्तों में और 1 है रिवील माइंड, इन टेक स्ट्रक। तो अर्जुन ने भी अपने कई प्रश्न पूछे। भगवान से तो अगर शंका हो तो हमें एडवांस डी बॉडीज की संगत लेकर उनसे इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करना चाहिए। तो ये नियम मत भूलिए। हर कार्य जब आपके सामने आता है, यह भक्ति के लिए अनुकूल है, यह प्रतिकूल है। और अगर शंका हो तो फिर एडवांस भक्ति रिवाडी की संगत ले सकते हो। फिर ये विश्वास की परम भगवान आपकी सुरक्षा कर सकते हैं। 1 ईश्वर कृष्ण अर्सरभृतया कृष्ण भगवान, परम भगवान है, बाकी सब जो हैं, उनके सेवक हैं, वो दास हैं। तो हमे कृष्ण भगवान की भक्ति में ही लीन रहना चाहिए। यह सोचने की आवश्यकता नहीं कि अगर कृष्ण भगवान की भक्ति करेंगे तो देव देवता या देवी प्रसन्न ही होंगे। 1 परम भगवान है। 33 करोड़ देवता देवियां हैं और परम भगवान हमारे असली सुरक्षा है। ये ये तमाम पर ध्यान दें। जितनी मात्र में हम भगवान के शरणगत होने का प्रयास करेंगे, उतनी मात्रा में ही भगवान हमारी सुरक्षा करेंगे और हमें बुद्धि देंगे। उनके शरणगत होने के लिए तो हमारे में पूरा विश्वास होना चाहिए कि पर भगवान ही हमारे असली सुरक्षक हैं, वो ही हमारे सुप्रीम मेंटेनर और मास्टर हैं। भागवत गीता में भगवान कहते हैं कि जो देवता देवियां देते हैं, वो भी असल में मेरे द्वारा ही प्राप्त हो रहा है। आगे के महाप्रब ने कहा कि अपने विचारों को भगवान के विचारों पर निर्भर रखना। यह नहीं कि हमारे विचार भगवान के विचार बने, हमारा नियम है। भगवान के विचार, भगवान की इच्छा हमारी इच्छा होनी चाहिए। तो परम भगवान की इच्छा हम शास्त्र में प्राप्त करते हैं। और जब शास्त्र पढ़ते हैं, अनुवाद के साथ हमें तात्प्रिय भी पढ़ना चाहिए। कई बार हम सोचते हैं, हम केवल अनुवाद पढ़ लेंगे। प्रापा जी ने जब इन ग्रंथों का अनुवाद किया तो ने समक्ष जो चालियों का तातप्रिय था, उसे रखते थे और अचारियों के दांत पीले में जो महत्त्वपूर्ण विचार थे, उनको उनको उन्होंने प्रस्तुत किया है। इन तात्परिय में तो तातपर्य परनामी बहुत आवश्यक है। तो हमे उन्ही विचारों को रखना चाहिए जो कि गुरु साधु शास्त्र पर आधारित हो। और छाता नियम महाप्रभुजी के अनुसार था, नम्रता, हिमलिटीपिसनीचेना, पी, सइसनमनमनदेनकृतनदी, सदा हरी, अगर हरी के नाम सदा उचारन करना चाहते हैं। तो चेतन महाप्रभुजी ने हम सबको बड़ा छा उदाहरण दिया है। कहते हैं पेड़ से भी ज्यादा सहनशील, घास के पत्ते से भी ज्यादा। पति। कृष्णदास कविराज जिन्होंने चेतन की रचना की। वो कहते हैं कि मेरा तुम नाम ही मत लो, मेरा नाम ही लोगे। तो तुम्हारे सारे गुण समाप्त हो जाएंगे। और ये विचार कौन प्रकट कर रहा है। भाग। तो आध्यात्मिक जीवन में, खास करके हमारे संप्रदाय में हमारे जो महान चार्य थे, वो बड़ी निर्मता के साथ सेवा करते थे। हमारे भी वही भाव अनुकूल होना चाहिए, जिन्हे कि हमें आज चाहिए, पद चाहिए, ये चाहिए। हमारे में यह भावना होनी चाहिए। क्या के हमे सेवा का मौका मिले तो आप सब बड़े भाग्यशाली हो कि आप इस कौन संस्था के साथ जुड़े हो। इस कौंध संस्था के साथ आपको शुद्ध संदेश प्राप्त होता है। कभी कभी सुनने में आता है कि कोई लोग प्रभावित हो जाते हैं। नहीं सर कोई और। रास्ते से भगवत प्रेम जल्दी प्राप्त होगा। प्रावूपाजी इस कलयुग के कार्य थे और भगवान प्रापा जी को भगवान ने शक्ति दी थी, जिसके द्वारा वो शुद्ध कृष्ण भक्ति को स्थापित कर पाए। कलयुग की प्रजा के उधार सुधार के लिए तो जो ज्ञान चाहिए, वो प्रपात के ग्रंथों में है। और इन ग्रंथों को हमें ध्यान से पढ़ना चाहिए। इस काल में कई कोर्सेस भी सारे विश्व में दिए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए भक्ति शास्त्री। व। हमारा प्रयास है कि देल्ली चंदीगढ, उत्तर भारत के कई शहरों में ये भक्ति शास्ती कोर्स हम शुरू करने लगे हैं। उन भक्तों के लिए भी जो कि फुल, टाइम, धंधा या नौकरी करते हैं। हम चाहते हैं कि आप सब ग्रंथों को पढ़ो, क्योंकि जितना पढोगे जाप करोगे, सेवा करोगे, उतनी ही तेजी के साथ अब भगवान के संगत हो सकोगे। हर रविवार को, इस काल के मंदिर में यह कार्यक्रम होता है। उसका लाभ उठाओ। हर इतवार को, हर भक्त को जाना चाहिए। मंदिर वहाँ सेवा करनी चाहिए। और जब हम मंदिर में जाए, मन भाव होना चाहिए। सेवा का। प्रापा जी कहते थे, बीमार व्यक्ति के इलाज के लिए 2 चीजों की आवश्यकता है। 1 है दवाई और दूसरा है, परेज जा हमारी दवाई है। चैंडिगहरेकृष्ण। ग्रंथ का अध्ययन साधना भक्ति और हमारा परेज हैं। सेवा और दोनों की आवश्यकता है। अगर हम भागवत प्रेम अनुकूल करना चाहते है तो ये ही आप सबसे विनती है। मैं भक्तों का आभार प्रकट करना चाहता हूँ, जिन्होंने मेहनत करके इस व्यास पूजा योजना को के कार्य में सहयोग दिया। और आप सब से यही निवेदन है कि आप अच्छे भक्त बनिए। शास्त्र में रूप स्वामी। चेतन ने कहा गुरु की शरण लो, गुरु की सेवा करो, गुरु से दिक्षा लो, गुरु से पूछो कि हमें क्या त्यागना चाहिए भगवान के शरणगत होने के लिए और अगर कुछ त्यागना पड़े, सुसे त्यागों पर कृष्ण भक्ति को हाथ से मत सोने। 2 सर, मेरी आप सब से यही विनती है कि आप लोग अंतर्राष्ट्रीय कीसंभावना मृत संघ के प्रचार को आगे बढ़ाने में सहयोग दीजियेगा। जितनी जितनी सेवा करोगे, उसका लाभ आपको ही मिलेगा और आप सब निमित मात्र बनो। इस प्रचार को आगे बढ़ाने के लिए हर साल हमारे भाग मंदिर, सारे विश्व में ग्रंथों की वेतन की सेवा में भी जुड़ते हैं। और मैं उन भक्तों का व्यवहार प्रकट करना चाहता हूँ। जो कि कई सालों से दिन रात मेहनत करके इस प्रचार को आगे बढ़ा रहे हैं। आज हमारे खास की दिल्ली में अनेक गृहस्थ भक्त हैं जो कि नौकरी भी करते हैं, धंधा करते हैं फिर श्याम उसे हफ्ते में 234 लेक्चर भी देते हैं और मैराथन के समय ग्रंथों को भी बांटते हैं जैसे पिछले मैराथन में सं नगर मंडल में हमारे रियास्त भक्तों ने कितने ग्रंथ बाटे थे। पिछले साल हमारे सं नगर के यास्ता भक्तों ने मिलकर 90 हजार गीता बाली थी और पंजाबी बाग के कितने स्कोर नोएडा का। हमारे जो गरिहास्ाभगते हैं, सो ग्जामपरीवोमंदर आते हैं, क्लास में आते हैं, प्रचार करते हैं, ग्रंथों को बाटते हैं तो आप सब अगर सेवा बढ़ाना चाहे तो बढ़ा सकते हो और कृपा करके हरी नाम को हो ध्यान पूर्वक जॉब कीजिये और इस प्रकार अपने जीवन को सफल बनाए। हर 1 र।
More from PRASAD

Rare Pastimes & Timeless Lessons of Guru Mahārāja | Stories Every Disciple Should Hear

ISKCON Legends- pure devotees meet-HH Jayapataka Swami, HH Gopal Krishna Goswami, HH Radhanath Swami

Jagannātha Ratha-yātrā Through Śrīla Prabhupāda's Mercy | 29 April 2006 | Nairobi, Kenya

Lord Jagannātha's Appearance Pastime | 21.07.2019 | ISKCON Calgary | Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

The Ācārya Teaches by His Own ExampleGuṇḍicā Mārjana by Guru Mahārāja #shorts

Guṇḍicā Mārjana – Lord Jagannātha's Pastime | 21.7.2019 | ISKCON Calgary |Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

H.H. Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī Mahārāja - Exemplary Sādhana and Deity Worship # shorts

भगवान की कृपा कैसे प्राप्त होगी ? | 11 Jan 2014 | Punjabi Bagh | Srila Gopal Krishna Goswami

Material Education vs Spiritual Education | Srila Gopal Krishna Goswami #shorts

