भगवान की इच्छा को कैसे समझें | 2013 Vyasa Puja Evening Lecture | Delhi | Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

The lecture delivered by Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī (referred to as चेतन्य महाप्रभु) explores how to comprehend and align with God’s will through the practice of bhakti. It begins with stories of two spiritual teachers, रूप and सनातन, who renounced government jobs, distributed their wealth, and received instruction from चेतन्य महाप्रभु. The core teaching emphasizes distinguishing between activities that are conducive to bhakti (such as japa, scriptural study, and sadhus’ association) and those that hinder it (neglect of study, material indulgence, improper offerings). A special focus is placed on performing one’s worldly work mindfully (ध्यानपूर्वक जॉब) as a means to purify the heart and attain true enjoyment. The speaker outlines a daily regimen: dedicated time for scripture, regular temple or community gathering, and offering prasada with the attitude of serving God rather than personal gratification. He then explains how to discern God’s will by following three steps: seeking a qualified guru, receiving initiation, and asking what must be relinquished for devotional progress. Humility, seeing God as the ultimate protector, and offering service through spreading the teachings are presented as essential attitudes. The lecture also warns against maya’s distractions, urging devotees to use bhakti’s “weapons” to stay focused, and calls the community to share scriptures, organize events, and support institutions, thereby fulfilling the guru’s directive to propagate the message worldwide.
Chapters
el megan anjana shala srega चेतन्य महाप्रभु ने सनातन गोद स्वामी और रूप के स्वामी दोनों को शिक्षा दी। भक्ति के विषय में 1 समय रूप और सनातन 1 समय 1 समय रूप। सनातन भारत के सबसे प्रसिद्ध राजा के राज्य का शासन कर रहे थे। उनकी रुचि नहीं थी, पर जबरदस्ती उन्हें राजा की सेवा में जोड़ना पड़ा। पहले रूपक के स्वामी ने सरकारी नौकरी त्यागी। जब उन्होंने सरकारी नौकरी त्यागी तो उनके पास इतने सोने के सिक्के थे। ठीक पूरी ना भर गयी थी सोने के सिक्कों के साथ। और उन्होंने आधा बाँटा ब्रामण को, 25 पसरे बांटा रिश्ते को और 25 प्रतिशत रखा। भविष्य की आवश्यकताओं के लिए। थोड़ी देर बाद सनातन गोस्वामी ने भी सरकारी नौकरी त्याग। सनातन गोस्वामी को नवाब ने जेल में डाल दिया था, कि स्वामी सनातन गोस्वामी ने इनकार कर दिया नौकरी करने के लिए। और जेल से बड़ी, कठिनाई से निकले वो महाप्रभु जी को मिले वरणासी में। और फिर आगे जाकर चेतन्य महाप्रभु जी ने रूपक स्वामी को 2 महीने के लिए भक्ति सम्बंधित शिक्षा दी, जो कि आप चेतन में बड़ी गहराई के साथ पढ़ सकते हो। और आगे उन्होंने सनातन गोस्वामी को भी शिक्षा दी। सनातन को स्वामी को शिक्षा देते हुए स्वामी ने महापगुनेछे अवश्य विधियों की चर्चा की, जिसके द्वारा अपना भगवान के शरणागत हो सकते हो। हम सब भक्ति में जुड़े हैं और हम सबका लक्ष्य होना चाहिए। परम भगवान के शरणागत होना और परम भगवान के शरणागत होने के लिए क्या भाव होना चाहिए? इस विषय का वर्णन चेत्र महाप्रभु जी ने किया। सबसे पहले चेत्रय महाप्रभु ने कहा भक्ति के लिए जो अनुकूल है, वो कार्य त्यागो। और भक्ति के लिए जो प्रतिकूल हैं, उस कार्य को त्यागो। तो को अनुकूल के विश्व में हमने सुबह के लेक्चर में कहा था कि ध्यान से जाप करना, शास्त्र का अध्ययन करना, साधु संगत में रहना, ये सब अनुकूल कार्य माने जाते हैं। जिस प्रकार सालन जीवन में स्वास के लिए जो अनुकूल हैं, वो भोजन अब स्वीकार करते हो, जो प्रतिकूल है, उसे आप त्यागते हो। तो हम सबका लक्ष्य होना चाहिए। भगवत प्राप्ति और इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हम सबको, हमारे आध्यात्मिक जिम्मेदारियों पर विचार रखना चाहिए। तो केवल जॉब करना काफी नहीं है। हमारा प्रयास होना चाहिए ध्यान पूर्वक जॉब करना, जिसका संक्षेप में अर्थ यह है की जब आप जॉब करना बैठते हो, केवल जॉब कीजिये और कोई कार्य नहीं, ये नहीं के 1 हाथ से जब माला कर रहे हो, दूसरे हाथ से टेलीफोन में बात कर रहे हो और दूसरा कार्य कर रहे हो। और जितने ध्यान से जॉब करोगे उतनी तेजी के साथ शेर तो दमन मार्जन होगा। मारे हृदय में बहुत गहरी मैल है। और इस मैल के कारण हम भगवान के नगर नहीं होते। रगड़ेस्मैलको दूर करना है तो हमें बड़े ध्यान से जॉब करना चाहें। चेतना महा ने कहा। जॉब करने का 1 और लाभ है। इसके द्वारा आपको असली आनंद प्राप्त होगा। फिर शास्त्रों का अध्ययन। शास्त्र में भगवान की वाणी। केवल शास्त्र को घर में रखना काफी नहीं है, पर इनका हमें उपयोग भी करना चाहिए। हमें इस प्रकार की योजना बनानी चाहिए। कम से कम रोज आधा घंटा, 1 घंटे के लिए शास्त्रों को पढ़ सके। और फिर साधु संघ माया का प्रभाव इतना तेज है के भक्तों की संगत बहुत ही आवश्यक है। अगर हम धार्मिक जीवन को बचाना चाहते हैं। इसलिए हमारा प्रयास होना चाहिए कि हर वार को हम मंदिर जाएं। अगर आप किसी शहर में हो, यहाँ के मंदिर नहीं है तो आप भक्ति वृक्ष नामहर के जो कार्यक्रम हैं उनमें जा सकते हो। पर प्रयास होना चाहिए। साधु संघ का लाभ प्रयास होना चाहिए कि हमें भक्तों की संगत किसी न किसी माध्यम से प्राप्त हो। फिर चेतन महाप ने कहा जो प्रतिकूल कार्य है उसे त्याग हो तो ध्यान से जाप नहीं करना। यह प्रतिकूल कार्य बन जाता है। शास्त्रों को नहीं पढ़ना, यह प्रतिकूल बन जाता है। भौतिक वाद्यों की संगत आवश्यकता से अधिक रखना यह प्रतिकूल बन जाता है। भगवान को भोग लगाए बिना खाए, ये भी प्रतिकूल हो जाता है। भगवान कहते हैं स्पर के जो भोग लगाए बिना खाएं वो केवल पाप खा रहा है। तो हम सब का उद्देश्य होना चाहिए। खाएं तो कृष्णा प्रसाद, कृष्णा प्रसाद त्यार करना है। भगवान की शिक्षा के अनुसार प्रसाद याद कर रहे हो। आपके मन में ये भाव नही होना चाहिए कि हमने चखा। आपके मन में यह भाव होना चाहिए के भगवान के लिए भोजन बनाया जा रहा है। और फिर जल्पा से बचना। रूप कहते हैं अत्यापरजपनियमाग रहा है बहुतिक चर्चा जिसका कृष्ण से कुछ सम्बंध नहीं हो। और आजकल सेलफोन की कृपा से। पर जल पावर भी सरल हो गया है। पर हमें प्रजल्प से बचना है और भक्तों के संग में रहना है। फिर ये स्वीकार करना कि परम भगवान हमारे सुरक्षक है, परम भगवान हमारी सुरक्षा है। जैसे सवा के लोक में कहा था, भगवान जो हैं अत्यंत दयालु हैं अपने भक्तों के प्रति। तो परम भगवान हमारे रक्षक हैं। और जितनी मात्रा में आप भगवान की शरण में आओगे, उतनी मात्रा में ही भगवान की हमारी सुरक्षा करेंगे। हमें यह नहीं सोचना चाहिए सुरक्षा के लिए देवताओं की कृपा की आवश्यकता है। देवता प्रसन्न होते हैं। जब वो देखते हैं कि हम परम भगवान के शरणगत हो रहे हैं तो भक्तों के मन में भाव है। 1 ला, ईश्वर, कृष्ण, आर, सभ्तया कृष्ण भगवान, परम भगवान हैं। बाकी सब जो 33 करोड़ देवता देवियां हैं उनके अधीन है और उनके सेवक हैं। और भागवत के दसवें स्कल में है। भागवत के में आप पढते हो कि देवता भी बड़े प्रसन्न होते हैं। जब हम भगवान के कृष्ण के शरणगत होते हैं। फिर आगे चेतन महापुर ने कहा, हमारे हमें भगवान की इच्छा और आदेश को अपनी इच्छा माननी चाहिए। अक्सर हमारे मन में यह भाव रहता है की हमारी इच्छा भगवान की इच्छा बने। तो जो जो चीजें की हमें चाहिए वो वो चीज भगवान को पूरा करना चाहिए। अगर भगवान पूरा नहीं करे तो किसी कारण हम उस मार्ग को धन त्याग देते हैं या किसी और संस्था के साथ जुड़ जाते हैं। पर शास्त्र में कहा गया है क्या कि भगवान की इच्छा को हमारी इच्छा समझना, भगवान की क्या इच्छा है या उनके श् ो जाए। हम उनकी सेवा में जुड़े। हम इन दिव्य नामों का उच्चालन करे और हम सब का प्रयास ना चाहे कि हम भगवान की इच्छा के अनुसार चलें भगवान की इच्छा क्या है? ये कैसे समझेंगे। इसके लिए गुरु साधु शास्त्र 3 मार्ग है जिनके द्वारा हमें ज्ञान मिलता है। चेतन्य महाप्रभु जी ने इस विषय में कहा पहले कदम में हमें किसी प्रमाणिक गुरु की शरण में न चाहिए। प्रामाणिक गुरु के विषय में रूप को स्वामी जी कहते हैं। वाचवेगमनसकोधवेगम जीव, वेगम, उदार, पस्त, वेगम की मानो, इंदियों पर पूरा वर्ष होना चाहिए। फिर आगे रूपको स्वामी जी कहते हैं। चितिनमापुम ने कहा कि चलन लो, दिक्शा लो, दीक्षा के पश्चात, ये पूछो मुझे क्या त्यागना चाहिए? भक्ति के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए। जिस प्रकार अगर आपको कोई बीमारी हो जाए, अगर आपको किसी चीज का शौक भी हो, आपको त्यागना पड़ता है। अगर आपको डायबिटीज हो जाए तो आपको चीनी मिली चीजों का शौक है। जब भी आपको त्यागना पड़ता है तो जो त्यागना है उसे त्यागो पर भगवत प्राप्ति में सफलता जरूर प्राप्त करो। और फिर आगे रूप ने कहा पूछो मुझे क्या त्यागना चाहिए? और रूपसी कहते है जो कीमत भी भरने पड़े भरो कृष्ण भक्ति के मार्ग में सफलता जरूर प्राप्त करो। तो ये होना चाहिए। हम सब का भाव, जो भगवान की इच्छा है, उसे हम समझते हैं। गुरु साधु शास्त्र के माध्यम से शास्त्र का अर्थ है भगवान की मानी और छठा नियम भगवान के होने का है। विनम्रता विनम्रता से हमें भक्ति के मार्ग में जोड़ना चाहिए। चेतन महा प्रभु जी ने इस विषय में कहा है 20 करोड़ पीस न मना देना कितना ही अगर आप के ही नाम का पूरा लाभ उठाना चाहते हो तो क्या भाव होना चाहिए। विनम्रता का भाव पेड़ से भी, ज्यादा से, पत्ते से भी ज्यादा पति। और इस भावना में इस भाव से आप भगवान के नाम का 4 दिन दाल कर सकते हो। ये विनम्रता का भाव इतना आवश्यक है कि कृष्णराज कावराजी कहते हैं ये जो तीसरा श्लोक, शास्त्र, इससे हमें हमारे गले में सजा लेना चाहिए। दूसरे शब्दों में हमें सदा यह भाव रखना चाहिए कि अगर हम भक्ति के मार्ग में सफलता चाहते हैं, अगर हम भगवान की गत होना होना चाहते हैं तो हमें विनम्रता के भाव से भगवान की भक्ति करनी है। तो पापा जी ने हमे पूरा ज्ञान दिया है। इन ग्रंथों में हमें इन ग्रंथों को पढ़ना है और आगे किसी को दूसरों को बाटना है। मैं इस कोई 3 हफ्ते पहले 1 एटलांटा मंदिर में 1 ब्रह्मचारी से बात कर रहा था। अटलांटा अमेरिका में मैंने उससे पूछा भक्त कैसे बने? तो कह रहा था 1 दिन उसके 1 मित्र ने उसको लिफ्ट दी। मोटर में वह मोटर में बैठा बैठा था जो पीछे खिड़की में 1 भागवत गीता एजएटेसया बच्चों को कोई चुप करेगा खिड़की में भागवत गीता एजिटेसकीअंग्रेजी में 1 कॉपी थी तो इस भाग ने उसके मित्र से पूछा कैन यू लेट, मी दिस बुक? तो मुझे ये किताब उधार में दे सकते हो? सुन के मित्र ने कहा वाइलैंड गिव, इट यू ले लो। तुम। तो उनके मित्र ने कहा मैंने, 4 महीने पहले ये किताब खरीदी थी, 1 बड़ा मीठा ब्रह्माचारी मांग था, पर मैंने न खोला। किताब को 4 महीने में न खोलने का विचार है, तुम ले लो। तो इस लड़की ने किताब ले ली, पढना शुरू किया और किसी भक्त को मिलने से पहले सोना माला करना भी शुरू कर दिया। और और फिर थोड़ी देर बाद भक्तों को मिला। और अब संकृतन की जिम्मेदारी उठा रहा है। 1 प्रसिद्ध मंडल में तो इस प्रकार से हजारों उदाहरण है की जिसके द्वारा हम देखते हैं। इन ग्रंथों की, प्रचार की शक्ति तो प्रापर जी की इच्छा थी। काम के, हम इन ग्रंथों को पढ़े और बाँटे। तो आप सब की यह जिम्मेदारी होनी चाहिए। शासक को प्रण भी है और शासक को बांटना भी है। पिछले साल ग्रंथों के मैरथन में आप कौन कौन? जुड़े थे? तो जुड़े थे उनका भाव रहना चाहिए कि हम जुड़े रहे। जैसे मैं सुबह कह रहा था, सुबह कह रहा था, भगवान कहते हैं सब भक्तों में सबसे प्रिय क्या है जो हमारा प्रचार करता है। मुझे नहीं जुड़े थे, उन्हें यह प्रयास करना चाहिए की ये साल जुड़े। भगवान कहते हैं सब भक्त में सबसे प्रिय कौन है जो मेरा प्रचार करता है। जब आप प्रचार करते हो, कई स्थानों में आपका स्वागत किया जाएगा, कई स्थानों में आपका विरोध किया जायेगा, कई साल में कोई आपकी तरफ देखेगा भी नहीं। पर हम सह लेते हैं, क्योंकि हम सब चाहते हैं। क्या भगवान की इच्छा को पूरी या पूरा करे? भगवान ऋषवदेव कहते हैं। 1 जेंटलमैन अगर किसी अंधे व्यक्ति को गलत रास् में चलते हुए देखता है तो उसे पकड़कर सीधे रास्ते में जोड़ देता है। तो आज लोग अज्ञानता में हैं, अज्ञानता के कारण अनेक प्रकार के क्लेश अनुभव कर रहे हैं। पर जो वैश्व भक्त हैं, उनमें दया असली दया की इच्छा रहती है। इसलिए वो प्रयास करते हैं दूसरों को भक्ति के मार्ग में जोड़ने के लिए। और यह यह भाव नहीं होता। तो आज हम सब इकट्ठे थोड़ी होते। भक्ति सिधांतजीनेप्रापाजी को आदेश दिया था 1922 में चेतन महा प्रजि संदेश को पश्चिम देशों में पहुंचाने के लिए और बुणिआयुमेंट्रापंजी अमेरिका गए, क्योंकि उनके मन में 1 ही भाव था गुरु के आदेश को पूरा करना, चेतन, महाप्रभुजी की भविष्य वाली को सत्य बनाना। तो आप सब का सौभाग्य है कि आप 1 शुद्ध संस्था के साथ जुड़े हो। आप सब से ये निवेदन है कि आप इस शिक्षा का लाभ उठाइए। माया का बड़ा तेज प्रभाव है। और जब आप भक्ति में जुड़ते भी हो, यह नहीं कि माया आपको विचलित करने का प्रयास नहीं करेगी। माया का सदा यही प्रयास रहता है। किसी किसी रूप से आपको विचलित कर दे। और अगर हम भक्ति के हथियारों का लाभ उठाएंगे, तो फिर हम अपने आप को माया से बचा सकेंगे। तो सब बड़े स्पष्ट रूप से समझाया है। उनके ग्रंथों में इन ग्रंथों को पढिए और निर्ध होकर भक्ति के मार्ग में जुड़ी है। और भगवान कहते हैं जो श्रद्धा से प्रयास करेगा, उसमें कुछ कमी भी होगी तो उसे मैं दूर कर दूंगा। और चेतन महाप्रभु कहते हैं, कृष्ण का विराज कहते हैं चेतना महा प्रभु की असीम कृपा से कठिन कार्य सरल बन जाता है और सरल कार्य कठिन बन जाता है। और चेतन महा प्रभु की कृपा से अंधा व्यक्ति देख सकता है, कुंग व्यक्ति बोल सकता है, लंगड़ा व्यक्ति पहाड़ों के पार जा सकता है, बहरा व्यक्ति सुन सकता है। तो आप सब चेतना महारज शिक्षा को अपनाए चेतन चरदनवृतकोपढ़ि। अगर चेतन ने चर्दनभीतकोनहीं पड़ सकते तो टीचिंग लॉ। चेतन्या 1 छोटी किताब है, जिसमें पापाजी ने पूरे चेतनेचरदनवृतकासाड़ दिया है, इसे पढ़िए और चेतन महापरनेध्यात्मिक जीवन बहुत ही सरल बना दिया है। उन्होंने कहा, पहला आदेश है जॉब, इसलिए हम जॉब करते हैं, क्योंकि यह शास्त्र का निर्णय है। हर नाम, हर नाम, हर नाम से, वन से, दूसरा आदेश था, गीता, भागवत पड़ो, तीसरा था। भगवान के अर्चा विग्रह की उपासना करो भगवान अपने आप को आर्च, विग्रह, मूर्ति के रूप में प्रकट करते हैं। उसकी उपासना करो चौथा था साधु संगत में रहो और पांचवा था। धाम वासी बन जाओ या अपने घर में ऐसा वातारण स्थापित करो की हर सदस्य भगवान की सेवा में जुड़े और अगर आप इन नियमों का पालन करोगे तो चेतन महा प्रभु ने कहा तुम सदा मेरे साथ रहोगे, मैं सदा तुम्हारे साथ रहूँगा, आप मेसे कितने भक्त हो, जो सदा भगवान, चेतन महा, प्रभु जी के साथ रहना चाहते हो, सब तुम ने बड़ा सरल उपाय दिया है, इसका लाभ उठाओगे सब उठाएंगे या हरे कृष्ण, हरे कृष्ण l।
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