पहली सेवा है हरि नाम में रूचि बढ़ाना | 2016 Vyasa Puja | Delhi | Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

इस भाग में दो वक्ता एक आध्यात्मिक कथा और कई प्रेरणादायक संदेश प्रस्तुत करते हैं। पहले, एक सन्यासी को लस्सी पीने के बाद एक भारी मटका मिलता है, जो अंदर हीरे‑मोतियों से भर जाता है, जिससे यह दर्शाया जाता है कि भगवान की सेवा में अनपेक्षित लाभ होते हैं। इसके बाद, भगवान की सेवा करने से कोई नुकसान नहीं होता, बल्कि जिम्मेदारी उठाने और उसका पालन करने की महत्ता पर बल दिया जाता है। वक्ता रजविलास (संभवतः रजविलास जी) के ज्ञान, चैतन्य महाप्रभु की दया, और उनकी भविष्यवाणी कि हर कोने में हरि का नाम पहुँचेगा, तथा एक दिन सभी विश्व के लोग मायापुर धाम में एकत्रित होकर नाच‑गाएंगे, का उल्लेख करते हैं। वे श्रोताओं से ग्रंथों के वेतन बढ़ाने, प्रचार‑प्रसार में सहयोग करने, और प्रपाद जी (श्रील प्रभु गोपाल कृष्ण गोस्वामी) के कार्यों को सराहने का अनुरोध करते हैं। अंत में, पिता के शब्दों को उद्धृत कर गुरु के भार, 70 वर्ष की आयु में विदेश यात्रा, और समाज को सुखी बनाने की इच्छा पर चर्चा की जाती है, तथा सभी को हरे कृष्णा मंत्र का उच्चारण करके कृष्णा भक्ति अपनाने का आह्वान किया जाता है।
Chapters
हाई कृष्णा, आप सब भक्तों का हार्दिक स्वागत सबको सुनाई दे रहा है। तो जैसे आप जानते हो ये साल इस्कॉन के भक्तों के लिए बड़ा महत्वपूर्ण सवाल है।
क्या कारण है
यह साल? हम इस कान की सुवर्णा जयंती ये गोल्डन जुबली मना रहे हैं।
आज से
50 साल पूर्व जुलाई तेरा, नाइन सीसी। सिक्स को में पापाजी ने इस कॉनसंसका की स्थापना की थी और इस कान का पहला केंद्र खुला था नियाक शेयर में। चेतन महान प्रभु जी, जो स्वयं भगवान हैं, उनकी भविष्यवाणी थी कि पृथ्वी के हर कोरे में ये हरीराम पहुँचेगा और हमारे जो महान अचारियां थे, उन्होंने प्रयास किया। इस भविष्य वाणी को सफल बनाने के लिए। खासकर के सचिन ठाकुर भक्त विनोद, जो कि भौतिक दृष्टि से बहुत ऊँचे पद पर थे, अंग्रेजों के राज्य के समय बेसिक मैचसे थे, साथ में बहुत ऊंची कोटी के संत भी थे। उन्होंने लगभग सौ ग्रंथो की रचना की और उड़िया, बंगला और अंग्रेजी भाषा में ग्रंथ को प्रकाशित किया। तो उनकी विश्वानी थी कि बहुत ही जल्द 1 महारथी प्रकट होगा। जो कि चेत ने महाप्रभुजी के संदेश को सारे विश्व में पहुंचाएगा। उनके प्रतिनिधि भक्ति सिधांत सार्थवती ठाकुर उन्होंने भी प्रयास किया। चेत ने महाप्रभुजी की भविष्य वाणी को सफल बनाने के लिए भक्ति। सिनाधाजी ने अपने सेना सी शिशु को भेजा था विदेशों में, और उन्होंने 1922 में पापा जी को खास आदेश दिया था। तुम पढ़े लिखे युवक हो ले जाओ। चेतन्य महाप्रभु जी के संदेश को पश्चिम देशों में तो प्रापा जी ने प्रयास किया और बहुत प्रयास और संघर्ष के पश्चात प्रापा जी भारत से चले जल।
जहाज में
नाइनटीन सिक्टी।
फाइव में
17 को बाबाजी कारगुरशिपमें गए
40 रुपए के साथ।
कई ने ने कहा था स्वामी जी,
आप 70 साल की उम्र में जाओगे, वह इतनी बरफ है, अ मर जाओगे,
जिन्दा भी वापस नहीं आओगे।
पराजय के मन में।
1 भाव था गुरु महराज के आदेश का पालन करना।
महान सह ठाकुर भक्त मनोज जी ने कहा है जिस प्रकार हम अपने आत्मा को देर से जुदा नहीं कर सकते, उसी प्रकार शिष्य को अपने जीवन को गुरु के आदेश से जुदा नी करना चाहिए। दूसरे शब्दों में शिष्य का प्रयास है गुरु के आदेश का पालन करें।
पापा जी श्रीमत भगवत हमें समझाते हैं
कि 3 प्रकार के शिष्य होते हैं। सबसे उत्तम कोटिक शिष्य वो है, जो कि गुरु के भाव को समझता है और बोले बिना उस भाव का पालन करता है। जैसे गुरु का भाव है। अच्छी तरह माला का जॉब करो, सास
से पड़ो साधु संघ में रहो।
4 करो तो बोले बिना यही कार्य का पालन करता है। दूसरे श्रेणिका शिष्य यह है, उसे आदेश दिया जाता है। ये सेवा, करो और शिष्य कहता है। ठीक है, मैं करूंगा। और तीसरे श्रेणिका शिष्य है।
चाहे आप कुछ भी बोलो करेगा, वही
जो मन में आए तो ये हमारे ऊपर निर्भर है। हम किस प्रकार के श्रेणी का शिष्य बनना चाहते हैं, यह भूलना नहीं चाहिए। जैसे व्यापारी भाषा में कहते हैं, जैसा
दाम भरोगे वैसा माल मिलेगा है,
जितने कम होंगे, उसी मात्र में भगवान की सुरक्षा सुरक्षा भी प्राप्त होगी। इसलिए पापा ने सौ प्रतिशत गुड के आदेश को स्वीकार किया। उनका दिन रात यही चिंतन था। इस आदेश का पालन कैसे किया जाए? और अत्यंत संघर्ष के पश्चात 1965 में अगस्त 13 को वो भारत से चले ज्यादा दूर जहाज में 37 दिन की यात्रा के पश्चात अमेरिका पहुंचे अमेरिका पहुंचे थे। प्रापा 2 महीने के वीजे के साथ
2 महीने का वीजा।
प्रापा जी को अमेरिकन सल्तान ने 2
महीने का वीजा दिया था।
और प्रापा जी का ये भाव था 2 महीने के अंदर इस का संस्था की स्थापना करने। पहला महीना, उनका कल बीत गया। बटलर पेंसिलवेनिया में तो 1 ही महीना बचा था, जिसमें पापा जी इस पंथ की स्थापना कर पाए। पापाजी ने प्रचार शुरू किया, हालांकि रहने का कोई ठिकाना नहीं था, सोने का कोई ठिकाना नहीं था, जब भी उन्होंने अपना प्रयास नहीं छोड़ा। 1 न्यू यॉर्क में 1 अमेरिकन सर्जन मिला था, जिसने प्रापा जी से पूछा कि आप क्या करते हो?
अमेरिका में?
पापा जी ने कहा मैं प्रचार करने आया हूँ, मेरे मंदन हैं, भक्त हैं, केवल समय का अंतर है। और पापा जी ने कहा कि पापा जी के बाद ना कोई पता था, रहने का ठिकाना था, कुछ भी सुविधा नहीं थी, उन्हें पूरा विश्वास था चेतन महाकवी विश्वानी सफल होगी। तो अत्यंत प्रयास के पश्चात, पहला केंद्र खोला न्यूयॉक शहर में, दूसरा खुला सैन फैंसिस्को में, तीसरा मािलमेंपरसीहसे संसा बढ़ती गई। आज प्रावपाजीकी कृपा से इस कान संसा के साढ़े 600 मंदिर हैं। सारी दुनिया में, आज शहर ही कोई
कोना है विश्व का।
यहाँ की आप इस कॉल के मनों को नहीं प्राप्त करोगे। कल? 1 मुंशी जी आये थे मुझे मिलने मंसी का बड़ा सनातन धर्म में बहुत बड़ी श्रद्धा थी। तो चर्चा कर लेते हैं हम कैसे सनातन धर्म का प्रचार करें। तो मैंने उन्हें कहा कि आप शायद जानते नहीं। पर इस कौन संस्था का प्रचार विश्व
के कोने कोने में है।
चाहे व्यक्ति मुसलमान समाज के हो, इसाई समाज के, हर जगह प्रचार हो रहा है। सच तो मैंने हमारे यहाँ भक्त थे, जो कि 1 मुसलमान देश के सदस्य हैं। उन्हें बुलाया जब उन्होंने देखा इन भक्तों को धूदीकुरतरसाड़ी में और बच्चों को गीता के लोगों का उच्चारण करते हुए, तो वो आश्चर्य चकित हो गए थे। उन्हें सचमुच मैंने कहा ऐसे लाखों उदाहरण हैं। तो बाबा जी ने असली चमत्कार दिखाया जब उन्हें कहा कि आप हमारे भक्त सुबह 4 बजे जागते हैं, हमारे मंदर में मंगलाआरती रशिया के समंदरों में मंगलाआरती सवा 4 बजे होती है, साढ़े 4 ने बाकी बंदरों में साढ़े 4 होती है और रशिया में मंगलाआरती समंदर में सवा 4 बजे होती है। तो जब ये सुनते है की सवा 4 बजे आरती 4 नियम का पालन। जैसे की कल भी जो सज्जन आये थे, उन्हें कहा गया की हमारे चाय
पी थे,
वो आश्चर्य हो गए थे। तो पापा जी ने हमें शोध सन्देश दिया है, बनावरी सन्देश नहीं। यह प्रापा जी अमेरिका पहुंचे थे। कइयों ने उनसे कहा स्वामी जी, आप जो संदेश लाए हो, यह कोई स्वीकार नहीं करेगा। पर पापाजी ने यथारूप असदी संदेश प्रस्तुत किया तो आज साढ़े 600 केंद्र हैं। सारे विश्व में प्रापा जी ने लगभग 90 ग्रंथों का अनुवाद किया था। अंग्रेजी भाषा में विदेश जाने से पहले पापा जी ने श्रीमद भागवतम के को का पहला स्कन 3 भागों में प्रकाशित किया था। पर विदेश जाने के पश्चात 11 साल के अंदर प्रभाजी ने 14 दफा विश्व का भ्रमण किया और दूसरे स्कंध से 10 तक भागवत का अनुवाद किया। चेतन, चतरत, गीता, इत्यादि खूब भी अनुवाद किया तो आज आपको खुशी होगी जानकर। इन ग्रंथों का अनुवाद 80 से अधिक भाषा में हुआ है और 5 सौ से ज्यादा करोड़ किताबें अनेक भाषा में बढ़ती हैं। सारे विश्व में आज गोविंद रेस्टरेंट लगभग 120 हैं। कोई 70 गोलशाला है इस संस्था के, सारे विश्व में, इस में, हमारे रशिया देश में कोई 15 गोशाला खुल गयी है। जिस देश में लोग, देश में लोग मास के फिगर कुछ खाते नहीं, कोने कोने में सन के भक्त गोशाला खोल रहे। तो पापा जी ने हमें जो संदेश दिया है और प्रपात की इच्छा थी कि हम सब गंभीरता के साथ इस शिक्षा को अपनायें। चेतने। मा। कहते हैं भगवान जी, गुरु कृष्ण कृपा, भगतिलादबी अनेक जन्म के पश्चात उभाग्यशाली व्यक्ति है, जिससे भक्ति का बीज प्राप्त होता है। भक्ति का बीज का अर्थ है भक्ति का ज्ञान। भक्ति का महत्व समझ में आता है। ये जो भक्ति का बीज है, ये योग ेगा केवल अगर हम अरे वो चुप रहो। ये भक्ति का जो बीज है, ये उगेगा अगर हम शवनम और किरतन करेंगे। कभी कभी लोग सोचते हैं, हमारी दिक्षा हो गई। अब तो हमें किसी चीज की आवश्यकता नहीं। न गुरु की न साधु संग का ये भूल है। शिक्षा के। पहला कदम है यह फर्स्ट स्टेप। अगर हम आगे शासन इस शिक्षा का पालन करेंगे। फिर आपको शिक्षा का लाभ होगा। इसलिए चेतन महाप्रभुने है। साधु संग पर। बहुत महत्व दिया है। ध्रुव मनाज से। भगवान बड़े प्रसन्न थे। भगवान ने ध्रुव मना से कहा ध्रुव मराज मांगो मेरे से जो तपस्या चाहिए भगवान को प्राप्त करने के लिए। धुर मराज ने बड़ी गंभीर तपस्या का पालन किया। पहले महीने 3 दिन में 1 बार खाते थे। क्या फल, सूखा खाद, फिर फल, 6 दिन में 1 बार फल। ये सेव और आम नहीं, जो फल, जो जानवर खाते हैं। तीसरे महीने उन्होंने कुछ खाना, सब बंद कर दिया कि वो जल 1 बार पीते थे। 9 दिन के बाद तो भगवान की तपस्या से बड़े प्रकाशित हुए थे। अगर हम भगवान को प्रशन करना चाहते हैं, हमें तपस्या का पालन करना पड़ेगा। वह कुछ दिन पहले आप भक्तों ने जन्मस् उत्सव मनाया था वासुदेव देव की, जो भगवान के माता पिता थे। उन्होंने 12 हजार देवताओं के वर्षों के लिए बड़ी गहरी तपस्या की। केवल खाने के लिए। सूखे पत्ते, जो पेड़ से गिरते हैं, वो ही स्वीकार किया। 12 हजार सालो के लिए, देवताओं के वर्षों के लिए। अगर। आज हम आपको सूखे पत्तो गिरे हुए पत्तों की खुराक दे, राम मंदिर आना बंद कर दोगे, तो उनकी तपस्या की अभाव क्या था? सदा चिंतन यही था कि हमें भगवान प्राप्त हो। उत्सव के रूप में तो धर्मराज की प्रसंद तपस्या से भगवान प्रसन्न थे और अमराज को भगवान के दिव्य दर्शन भी प्राप्त हुआ। जब भगवान ने उनसे पूछा, धुव मांगों में से क्या वर चाहिए? धवन ने कहा कि अगर आप मुझे वर देना चाहते हो तो ऐसा वर दीजिये कि मैं हमेशा उत्तम संतों की संगत में रहूँ। इसलिए चेतन महाप्रभु ने आदेश में कहा है साधु संघ सबसे आवश्यक है। तो हम भक्तों को इस प्रकार की योजना बनानी चाहिए कि हमें बकैदा भक्तों के संग भी प्राप्त हो। आज शिलप्णउपाजेकी असीम कृपा से प्रयास है। आपके दिल्ली, पंजाब, हरियाणा में कोने, कोने में केंद्र हैं। आपके दिल्ली एनसीआर में। ये सादनगर का मंदिर है, नोएडा में मंदिर हैं, गाजियाबाद में है, साइबराबाद में है, गुडगाँव में है। गुडगाँव में अभी 22 मंदिर होने वाले हैं, फरीदाबाद में हैं, पंशील में हैं और काहे रोहिनी में, पंजाब भाग में बाद और कोई रहेगा। छिपी वाड़ा और छतरपुर और द्वारा देखा, ग्रुप से, भगवान की कृपा से कोने
कोने में मंदर है।
इसका लाभ उठाइए रविवार के कार्यक्रम में जाइए और भक्ति रक्षा और नाम महत के द्वारा भी आप को भक्तों का संग मिलता है। और भक्तों के संग में रहोगे। तो यह सुनोगे कि हर नाम सबसे महत्वपूर्ण सेवा है। हरी राम, हरि राम, हरि नाम के हेलो न सेव सेवा। 3 अन्य था। अगर हम भगवान को प्रश्न करना चाहते हैं, अगर हम भगवान की कृपा चाहते हैं तो हमें जीव के साथ सदा महामंत्र को जोड़ कर रखना चाहिए। दूसरे शब्दों में जो हमारी सोला माना की जिम्मेदारी है, उसका हमें पालन करना चाहिए। माला का, जॉब का लाभ तो हर स्थिति में है, पर प्रयास ही रहना चाहिए। अपराधों से बचें बहुत जन्म करे। यदि पाया कृष्ण, पद, पे, मदाना, अनेक
जन्म में नाम बोलते जाओ।
जब तक अब ना, हम अपराध से नहीं बचोगे, पूरा लाभ नहीं मिलेगा। तो हरी नाम पर ध्यान दीजिये। और कई बार लोग भक्त पूछते हैं महाराज हम क्या सेवा कर सकते हैं? तो हम कहते हैं कि सबसे प्रथम रोम सेवा है, हर नाम रुचि बढ़ाता। इस वक्त हमारी रुची हरिनाम में है या नहीं है, ज्यादा है या कम है, बहुत कम है। जब भी मौका मिले, हरी नाम लेते को नींद आ जाती है। पर परशान खाते को नींद नहीं आती। तो पशारे कर। ये अच्छी बात है। प्रसाद में तो रूचि है। तो हीना में हमें रूचि बनानी चाहिए। हीना में रूची बढ़ेगी नाम का जॉब करोगे। जब नहीं करोगे तो बौधिक आकश बढ़ते जाएगा, बौधिक आकश बढ़ते जाएगा। आपके मन में ये भाव आएगा ध्यान में था कि क्या जल्दी आप देख सकते हो। बौद्धिक समाज में चारो तरफ क्लेश क्लेश है
व्यक्ति?
यह सोचे मेरे पास ऐसी योजना है कि बौदिक समाज में सुख मिलेगा। यह बहुत बड़ी भूल है। तो सादे संग में रहोगे तुम्हारे नाम की महिमा का ज्ञान सुनोगे और नाम का जाप। हमें बड़े ध्यान से करना चाहिए। यह है शासन का निर्णय, आगे चेतन है माँ। आप लोगो ने कहा श्रीमद भागवत का उच्चारण करो अध्ययन करो। रापा जी ने श्रीमद भागवत का अनुवाद किया। प्रथम के पश्चात प्रापा जी अमेरिका गए थे। 200 सेट साथ लेकर अमेरिका पहुंचकर। प्रापा जी ने पान पुरषोतम श्री कृष्ण जो कि भागवत के दसवें स्कन्द का सार है, उसको प्रकाशित किया। कथा के रूप में क्यूँ प्रापा कह रहे थे, उन्हें पता नहीं था वो पृथ्वी पर कब तक रहेंगे। वो चाहते थे कि प्रामानिक कथा दी जाय जिसके द्वारा हम ठीक रूप से समझ सके हैं। भगवान श्री कृष्ण को तो हमें भगवत में सुनना चाहिए। जैसे भगवत में कहा गया है नास्ता भगवत, सेवा, भगवत, भक्ति, भागती अगर रोज, ध्यान से भागवत को पढ़ेंगे सुनेंगे। तो हृदय में जो मैल है, आपके हृदय में मैल है या नहीं? जवाब नहीं दे रहे आप थोड़ी या ज्यादा। कोई कह रहा था दिल्ली वालों के हृदय में मैल नहीं है, है मैल
सबके हृदय में मैल है।
तो ये शुकदेव को स्वामी का कहना है। भागवत सुनने से, पढने से यह मैल दूर हो जाएंगे। आप में से कितने भक्तों सभा में जिनके पास अपने घरो में भागवतम का सेट है, चाहे अंग्रेजी हो या हिंदी हो या मराठी हो? हा हा तो ऐसे लगता है लगभग सब के घर में हैं। अगला प्रश्न आप से कितने भक्त हो? भगवत को रोज पढ़ते हो या सुनते हो? क्यूँकि इंटरनेट में भी सुन। तो ऐसे लगता है कइयों के पास भगवत का सेट है। पर पढ नहीं पाते। हम क्यों नहीं पढ पाते? क्या कारन है, क्यों नहीं पढ़ पाते? व्यसन वेरी बिजी समय नहीं है।
पर यह बात सच हो भी सकती है। प्रयास करें तो पढ़ने का समय भी मिल जाएगा। भगवान कहते हैं गीता में जो प्रयास करते हैं, मुझे समझने के लिए, उनमें अगर कुछ कमी भी हो तो उसे में दूर कर देता हूँ। तो भागवतों को पढ़िए, गीता को पढ़िए और भगवान के आठचबिगराहा की उपासना कीजिये।
भगवान प्रकट होते हैं।
8 च विगरा के रूप में आप में से कितने भक्त हों? जिनके घरों में गोणेताएंयाराजा कृष्ण की मूर्तियां
हैं,
तो मूर्ति रखना आवश्यक नहीं है। अगर आप चाहो तो बड़ी सुंदर तस्वीरें भी रख सकते हो भगवान के विग्रह की। और अगर आप मूर्ति रखना चाहो तो वो भी रख सकते हो। और घर में अच्छा ऑल्टर होना चाहिए। अगर आप मसाज साढ़े 4 बजे मंगल हारती नहीं कर सकते तो 5 बजे कीजिये पर हमें हमारा प्रयास होना चाहिए। मंगल आदि में जो प्रार्थना हम बोलते हैं, समसरदधावासगरेव, तुलसी, पूजा, इन सब का उच्चारण हमें रोज करना चाहिए। पर हमारा भाव होना चाहिए। खाएंगे तो केवल कृष्ण प्रसाद खाएंगे। गीता के तीसरे अध्याय में भगवान कहते हैं को मुझे भोग लगाई खाएं। केवल पाप खा रहे हैं। तो आप सब यहाँ उपस्थित हो क्योंकि आपकी आध्यात्मिक में रूची है। और आध्यात्मिकता में रुचि का अर्थ है आप अध्यात्मिकता का महत्व समझते हो। पर भौतिक संसार में माया का बड़ा तेज प्रभाव रहता है। सच या झूठ। और आजकल टेक्नोलॉजी की कृपा से माया का प्रभाव और भी तेज हो गया है। पर टेक्नोलॉजी का आप सुदुपयोग भी कर सकते हो। आप में से कितने भक्त हो जिनके पास स्मार्ट फोन है, यह प्रश्न क्यों पूछा? अगर आप चाहो तो आपके स्मार्टफोन में पापाजी के सब को डाल सकते हो। आप में से कितने भक्त हो जिनके मार्टफोन्स में बजे के सारे ग्रंथ हैं। बस लगता है कि आप लोग टेक्नोलॉजी में ज्यादा विश्वास नहीं करते हो, सारे ग्रंथ नहीं। तो कम से कम कई ग्रंथों को आप डाल सकते हो। और जब भी मौका मिले आप लोग आजकल जब हम क्लास देते हैं विदेशों में, बोर्ड में कोई स्लोक लगता ही नहीं है। सबकी जेब में स्मार्टफोन है। जो भी स्लोक पर उपदेश देना है वो 1 मिनट में निकाल देते हैं। ये ही स्मार्टफोन का दुरुपयोग भी हो सकता है। और कई लोग करते हैं। तो कहने का तातपर्य यह है टेक्नोलॉजी का उपयोग हमें करना चाहिए भगवान के शरणगत होने के लिए। तो भगवान ने आज विग्रह की उपासना करो और खाओ। तो केवल कृष्ण प्रसाद। भगवान कहते हैं गीता में जो मैंने भोग लगाये बिना खाये वो क्या कर रहे हैं, क्या कर रहे हैं? तो आप में से कितने भक्त हो? जो रोज पाप खाते हो? और कितने भक्त है, जो रोज प्रसाद खाते हो? ओके केवल प्रसाद और प्रसाद का। यह नहीं अर्थ 1 तुलसी का पता रख दिया, प्रशाद बन गया प्रशाद। ये जब बनता है जब आप भोग तैयार कर रहे हो। ये भावना रखो, ये भोग भगवान के लिए बन रहा है। बिना मंत्रों से इनको समझ भगवान के चरणों में समर्पन करो। गुरु मंत्र 3 बार, का मंत्र 3 बार, के महा, प्रभु का मंत्र 3 बार, भगवान श्री कृष्ण को मंत्र 3 बार, कृष्णा 3 बार फिर जाके। ये वैशणाप्रशाद बनता है। वैशणाप्रसादखाओगे केवल प्रसाद खाने से ही अशद मन, बुद्धि इंद्रिया शो हो जाएंगी। तो ये जो व्यास पूजा का उत्सव
है,
1 रूप से बहुत भारी उत्सव है। क्यूंकि कोई भी विष न हुआ, ये नहीं चाहता अपनी प्रशंसा सुनने के लिए।
पर ये
का उत्सव मनाते हैं कि सलिए इस शिक्षण को मौका मिले और गंभीरता के साथ भगवान कृष्ण नगर होने के लिए ये होना चाहिए। हम सब का उद्देश्य भगवान क्या कहते हैं। गीता में, शर्मा परिताला, माँ में से पाप ही मा पूर्व मेरी शरण में आओ। तो मेरी शरण में आने का अर्थ है उनकी शिक्षा का पालन करना और उनकी शिक्षा का पालन करेंगे। तो भक्ति में आगे बढ़ेंगे। साधु संग बहुत ही आवश्यक है। चेतन चेतन कहा गया है, सत संग त्याग है। वैषवाचाराअभग्तं की संगत उतना ही रखो जितना की आवश्यक है और उससे अधिक नहीं। अगर ये आपका भाव रहेगा तो आप भक्ति में आगे बढ़ोगे। और भगवान श्री कृष्ण अठारहवे अध्याय में कहते हैं सब भक्तों में सबसे प्रिय कौन है? कौन है सबसे प्रिय? जो प्रचार करता है, उससे ज्यादा प्रिय न तो हुआ है, न हुआ। तो हम ऐसे कितने भक्त हो? भगवान का प्रिय बनना चाहते हो, प्रचार भी करते हो सब। वैसे। तो मैराथन में आम भक्तों का बड़ा सहयोग रहता है। और यह साल भी मैराथन अभी कुछ महीनो में आने वाली है। पिछले साल मैराथन में किन किन भक्तों ने सहयोग दिया था। ये साल भी गए और आपने मायापुर मंदिर के विषय में सूचना सुनी। हमारे महान अचारियों की इच्छा थी कि मायापुर धाम यहाँ की कितने महाप्रभु जी प्रकट हुए थे, श्री कृष्ण चेतन्या, राधा कृष्ण, नयानया, भगवान प्रकट हुए, राधा कृष्ण प्रकट हुए। चेतन्या महाप्रभुजी के रूप में। हमारे अचारियों की इच्छा थी कि वो 1 अद्भुत मंदिर वहाँ बने जिसकी तुलना कोई और मंदिर नहीं कर पाये। जैसे कि क्रिया क्रिश्टियान का सबसे प्रसिद्ध मंदिर किधर है वैटिकन सिटी तो मायापुराम भक्त वैश्लंकावैटिकन हैं। बाबा जी चाहते थे कि सारे विश्व से लोग मायापुर धाम में आये भगवान का दर्शन प्राप्त करने के लिए। तो मायापुर धाम में कई साल पहले भक्तों के सहयोग से, अमरीश प्रभु के सहयोग से ये विशाल अद्भुत मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ था। और पिछले साल हमारे भक्त आये थे मायापुर से आम भक्तों को सेवा में जोड़ने के लिए। राम में से लगभग साढ़े 600 भक्तों ने 12 करोड़ की जिम्मेदारी उठायी थी और यह कहा था कि हम सहयोग देंगे इस मंदिर को समाप्त करने में। मेरा भक्तों से यही निवेदन है कि जिन भक्तों ने जिम्मेदारी उठाई थी वे जिम्मेदारी को निभायें साढ़े। 600 भक्तों ने जिम्मेदारी तो ली थी पर मुझे सूचना मिली है उनमें से सिर्फ ढाई सौ भक्तों ने अपना चंदा भेजा है ने फॉर्म भरा था, हाथ उठाया था और अभी तक सेवाएं शुरू नहीं की। आप में से कितने भक्त हो जिन्होंने सेवा की जिम्मेदारी ली थी और अभी तक सेवाएं शुरू नहीं की। वैसे तो इस्कॉन में रोज आप से निवेदन किया जाता है। सेवा के लिए मेरा यही रिक्वेस्ट था जिन्होंने जिम्मेदारी ली है वो जिम्मेदारी को निभायें और यह भगवान की कृपा है, यह को सेवा में जोड़ा जा रहा है। भगवान छोटे थे। 1 औरत फल बेच रही थी, वो कह रही थी फल खरीद लो जो खरीदना चाहता है। तो भगवान सुबह छोटे थे। 2 ढाई साल के उनके हाथों में थोड़ा अन लेकर फल लेने जा रहे थे पर वहाँ पहुँचने तक लगभग सारे बयान उनके हाथ से गिर गया जब भी उस औरत ने भगवान को सेव दे दिए बिना किसी लाभ के और जब उसने मुड़ के देखा तो क्या देखा, क्या देखा
टोकरी भर गई थी
सोने के फल के। के के दिन महाप्रभु से न्यास लेकर जगनाथपुर ी जा रहे थे भगवान का दर्शन लेने के लिए उन्हें रास्ते में बहुत प्यास लगी। गर्मी का मौसम था तो रास्ते में 1 व्यक्ति ली बेच रहा था और भगवान ने पूरी सी पी ली तो व्यक्ति ने कहा पैसे, भगवान ने कहा मेरे पास पैसा नहीं है और मेरे पीछे मेरे भक्त आ रहे हैं वो पैसा देंगे। थोड़ी देर बाद भगवान नीति नंदा पहुँचे वहाँ भक्तों के साथ। तो उस व्यक्ति ने कहा तुम्हारे 1
सन्यासी आये थे जिन्होंने मेरी सारी लस्सी
पी ली और कहा कि तुम पैसा भरोगे भगवान नितिन नंद ने कहा हमारे पास भी कुछ पैसा नहीं है
तो
उस व्यक्ति ने कहा चलो सन्यासी को क्या देना मैंने दान में दिया और मैं घर जाता हूँ तो वो अपना मटका उठा कर घर जाना जाने का प्रयास कर रहा था और मटका जब उठाने गया तो इतना भारी था कि वो हैरान हो गया उसने कहा यह मटका तो खाली हो गया था, सन्यासी ने पूरी लस्सी पी ली थी इतना भारी क्यों हो गया उसने देखा अंदर क्या है और अंदर क्या मिला पूरा मटका हीरे और मोतियों से भर गया था तो तभी आप सोचोगे ये तो अच्छा सौदा है हम भी जमाएंगे बंदर सौर पे चढा देंगे और ये उम्मीद रखेंगे कि हमारे बैंक अकाउंट में लाख
रुपए बढ़ जाना चाहिए।
खैर दूसरे शब्दों में भगवान की सेवा करके किसी का नुकसान नहीं होता तो अगर आपने जिम्मेदारी ली है तुम कृपा करके उसका पालन कीजियेगा और अगर आपने नहीं लिए जिम्मेदारी लेना चाहते हो तो वो भी आप कर सकते हो हा रजविलास आपको इस विषय में ज्ञान दे सकते हैं और यह अद्भुत मंत्र बनेगा तो इसके द्वारा आपके धर्म की महिमा बढेगी चेतन मा प्रभु जी अत्यंत दयालु है और आज उनकी शिक्षा विश्व के कोने कोने में पहुँच गई है उनकी भविष्यवाणी थी पृथ्वी के हर कोने में हर नाम पहुँचेगा और उनकी भविष्यवाणी थी कि 1 दिन आएगा जब कि सारे विश्व के लोग मायापुर धाम में आगे आयेंगे और नाचेंगे और गायेंगे तो आप
सब मायापुर गए हो
कितने भग गए मायापुर कोई भक्त है जो नहीं गया हो सब भक्तों का बहुत बहुत शुक्रिया शाम को भी कार्यक्रम आगे बढ़ेगा और आप से निवेदन है ग्रंथों का वेतन बढ़ाना चाहिए, प्रवर की महिमा बढ़ती है एवं प्रचार में सहयोग देते हो। आज सारे भारत में और विश्व में लोग समझते हैं जो कार्य प्रापा जी ने किया इतिहास में कोई नहीं कर
पाया है तो
पापा जी कहते थे
कि गुरु के प्रति जो भार है
कोई उसे उठा नहीं सकता पर प्रयास कर सकता है प्रयास करके तो पापा जी ने हमे शुद्ध संदेश दिया 70 साल की आयु में विदेश गए उनके मन में यही भाव था कि पूरा समाज सुखी बने और समाज सुखी बन सकता है। कृष्णा भक्ति के द्वारा आप सब गंभीरता से इस शिक्षक को अपनाइए और अपने जीवन को सफल बनाइए। बोलिए हरे कृष्ण हरे कृष्ण हरे हरे हरे रामा हरे रामा रामा रामा हरे हरे हरे कृष्णा
के र रेल ह हर हाल के ले।
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