The Hindi devotional lecture presents an overview of the life and spiritual mission of the 16th‑century saint Rupa Goswami. It begins with his Brahmin family background, noting his parents, siblings (including brothers Sanatan, Anupam, and a sister) and early fascination with scriptures. As a youth he left his native region for Bengal, then under Muslim rule, where he sought guidance from a royal patron and expressed his desire for spiritual instruction. After receiving counsel, he returned home, later traveling to Vrindavan where he visited the Madhava temple and encountered large crowds drawn to his presence. The speaker emphasizes Rupa Goswami’s royal connections, his role in composing and preserving bhakti literature, and his directive to establish devotional centers and write texts that articulate the principles of Krishna devotion. The lecture intersperses devotional chants to Krishna, underscores the importance of bhakti as a transformative practice, and calls listeners to honor the saint’s teachings by studying the scriptures and engaging in devotional worship.
Chapters
आज जानते हैं महान सन रूपगोस्वामी का क्या है रूप को स्वामी और स्वामी में लगभग सबसे प्रसिद्ध है। तो कहा जाता है रूपक स्वामी के 3 भाई थे सनातन और अनुपम और भाई और इनके पिता और माता। उन्होंने जन्म लिया था ब्राह्मण खानदान में और जन उनका हुआ था कनाडा ब्राह्मण खानदान के थे। ये 1 बहन थी उनके माता पिता के 5 बच्चे थे 1 बेटी, 4 बेटे बचपन से ही की रूची थी शास्र में, बचपन से ही वो भगवान की विधाओं की चर्चा करते थे। और जो छोटे ही थे वो कनाडा का छोड़कर बंगाल में चलने गये रहने के लिए। उन दिनों में बंगाल में मुसलमानों का राज्य था, पर सनातन में बड़ा निमृत का भाव था। वो महा प्रमुख से मिले। उन्होंने कहा हम तो जगाए मधाई से भी ज्यादा पतित हे आप पिप के हमे शिक्षा दीजिये की हम हैं कौन क्या है हमारा कर्तव्य और हमें अपने साथ ले चलो। हाँ पुपो ने कहा अब मेरे साथ मत चलो वापस जाओ नौकरी में। और उन्होंने उदाहरण दिया और प्रॉपर्टी के उदाहरण का उपयोग करते हैं नीता की भूमिका में है। बहू ने कहा जिस प्रकार 1 विवाहित स्त्री अगर कोई प्रेमी हो तो बड़े ध्यान से घर में सेवा करेंगे तो मरने क्या सोचेंगे का में जाकर अपने को मिल सके। तो माँ पापा ने उधार लिया उसके द्वारा। रूपर सनातन समझ गए। माँ पापा हम उधर करेंगे। तो थोड़ी देर बाद रूपर स्नातन वापस लौट गए। पर उनकी रूचि नहीं थी माँ प्रो राजा की सेवा करने में, तो रूप गुस्वामीनेजब नौकरी प्यारी। राजा बहुत क्रोधित हुआ की राजा क्या करता था लोग भाई लोग भाइयों को पूरी जिम्मेदारी देती थी। वो राजा दूसरे देशों के साथ युद्ध करने के लिए बिना चिंता के कार्य करता था। तो पर स्वामी गए। वृंदावन उससे पहले पापा को मिले वहाँ वनासी में गए थे, वहाँ बिंदु माधव मंदिर गये थे। महा बाबू जहाँ जहाँ जाते थे लाखों लोग पीछा करते थे लाखों लोग और उनको देखते ही पूरी प्रजा हाई कचड़ा बोलना शुरू कर दे दे। तो रूप सनातन रे महा परपुलिस शिक्षा दी थी, उनको खास आदेश दिया था जाओ वृंदावन धाम। इसलिए उद्देश्य के साथ पहला उद्देश्य था मंजू का निर्माण करो, भक्ति सम्बंधित ग्रंथो की रचना करो और उन स्थानों को खोजो। यहाँ के भगवान कृष्ण ने अपनी दिली और जो भक्ति का जो सिद्धांत है उसका विचार करो।
तो इस प्रकार क्षेत्र महा बाबू ने सब्र ने सबसे पहले तो कहा आत्मा क्या है? माँ ने कहा कि कितने प्रकार की योनियाँ हैं ने कहा कि भारतीय बीज ने जन्म के पश्चात प्राप्त होता है। फिर आगे उपदेश दिया तू भी जुटेगा जवाब तुम से जल्द हो। और माँ को मैंने आगे कहा सावधान रह लेना और फेंसिंग बना के रखो की गलत अगर आप साधु सल में रहोगे तो यह आपने कुछ कमी भी प्रकट हो रही है। आप मुझे सुधार से आगे ने कहा ये भक्ति का बगीचा है,
ये नष्ट हो सकता है।
1 कार समिति ग्रंथ है, उनका अध्ययन किया जा रहा है। हर प्रसिद्ध भाषा में सोने के घंटों में अनुवाद लगभग हर प्रसिद्ध भाषा में हुआ है। विश्व के कोने में लोग घंटों को पढ़ रहे हैं। अपने जीवन को सुधार ने में हमें सो अवसर पर सनी के चरनकमल प्रणाम करते हुए भीख मांगनी चाहिए की हमारे अन्त नष्ट हो। हमारे में शुधभर्ती का भाव पड़े