श्रील भक्ति विनोद ठाकुर आविर्भाव विशेष | 27 Jun 2014 | New Delhi | Srila Gopal Krishna Goswami

Srila Gopal Krishna Goswami speaks about Bhaktivinoda Thakur, a 19th-century judge in British India who wrote nearly a hundred texts on Krishna devotion and established institutions to restore authentic spiritual teachings. As a magistrate, he famously resolved cases in five minutes; he also imprisoned a fraud claiming to be Vishnu's avatar. Thakur predicted the spread of Krishna consciousness worldwide and the gathering of people in Mayapur, prophecies he said have come true.
Chapters
भक्त 1 महान सं थे उनका प्रणाम मंत्र इस प्रकार से नाम भक्ति वरदाय शक्ति पाय रूपगा बुलाए थे। मैं भक्ति मन ठाकुर को प्रणाम करता हूँ जो कि क्षेत्र महाप्रभुजी की देवर शक्ति है और ठाकुर भक्त रूपगुस्वामीऔर दूसरे गोस्वामियों के शिक्षा के आधार पर चलते हैं। तो ठाकुर भक्ति विनोद 1 रूप से इस संस्था के संस्थापक चाय है। बाबा ने कई दफा कहा ठाकुर भक्ति वॉचलीदफाउंडरऑलिज कृश्न कांटेसमूमेंट ठाकुर भक्ति का जन्म हुआ था। 1 बड़ी धन धनी खानदान में, पर शुरू से ही उनके शरीर को अनेक प्रकार के कष्ट भुगतने पड़े पर हालांकि कष्ट भुगतने पड़े वो बिल्कुल घबराए नहीं, दीर्ध होकर भगवान की सेवा में, के के जन्म में धनी खानदान और धार्मिक खानदान में हुआ था उनके जो दादाजी थे उनके पास योग्यता थी भविष्य की बातों का वर्णन करने का, ठाकुर भक्ति विनोद चेतना महाप्रोबुजी की जो असली शिक्षा है उसकी स्थापना की। 1 समय ठाकर भक्तिन बंगाल में चेतिनेचरतमिता की कॉपी को ढूंढ रहे थे और ढूंढने पर भी उन्हें नहीं मिला तो देख सकें उन्हें समझ आ गया कि महाप्रभु जी की जो असली शिक्षा है वो गलत हाथों में आ गई थी सहजिया के हाथों में, तो भक्ति ठाकुर ने फिर से ठीक शिक्षा की स्थापना की आपने प्रॉपर्ली के लेक्चर में सुना की। 1 समय उस समय 1 ढोंगी व्यक्ति था जो ये दावा कर रहा था कि मैं महा विष्णु का अवतार हूँ और ये ढोंगी व्यक्ति दूसरों की माताओं बेटियों बहनों के साथ कल काम कर रहा था ठाकुर भक्त नोजी को पता था ये गलत व्यक्ति है और अंग्रेजों का राज्य था अंग्रेजों के राज्य के समय भारतीयों को सबसे ऊँचा पद जो मिलता था वो था डिस्टिक मैजिस्ट्रेट का, उसके ऊपर किसी भारतीय को जिम्मेदारी नहीं दी जाती थी तो क्योंकि ठाकुर ने अच्छी शिक्षा प्राप्त की थी और बड़ी अच्छी अंग्रेजी भी जानते थे तो अंग्रेजों के राज्य के समय उन्हें डिस्टिक मैजिस्टेट बना दिया था। और इस विषय में कहा जाता है कि ठाकुर भक्तियों ने इतने तेज थे कि जो केस 1 साधारण जज 2 महीने में समाप्त करता था ठाकुर भक्ति ने 5 मिनट में सुनकर निर्णय दे दे देते हैं जिसके कारण जो दूसरे अंग्रेज जज थे उनके हृदय में बड़ी इर्शा थी क्योंकि ठाकुर भक्तिन बहुत ही तेज थे लीगल मामलों को समझने में निर्णय देने में, तो अंग्रेजों के राज्य के समय 1 ढोंगी व्यक्ति था जो की यह दावा कर रहा था कि मैं विष्णु का अवतार हो और इस कारण वो दूसरों की माताओं बहन बेटियों पत्नियों के साथ कल काम कर रहा था कहीं उन्हें शिकायत की अंग्रेजी सरकार को और अंग्रेजी सरकार को पता था कि अगर ये समस्या हल करना है तो हमें भक्तिन ठाकुर को ये प्रॉब्लम देना चाहिए। भक्तिन ठाकुर को पता था ये ढोंगी व्यक्ति है तो वो अपने पुलिसमैन को लेकर पहुँचे जंगल में यहाँ की ये ढोंगी व्यक्ति निवास कर रहा था। इस ढोंगी व्यक्ति के पास योगिक शक्तियाँ थी। तो अब बेचान गया कि ठाकुर भक्ति लाये हैं और इनका बौदिक नाम था किदाणनाथदाता तो उस रोगी क्ति ने कहा केदार नाथ दाता, मैं जानता हूँ तुम क्यों आई हो पर तुम कुछ मत करो मुझे मैंने अंग्रेजों को भारत से निकाल देना है और तुम्हें मैं फिर भारत का राज्यपाल बनाऊंगा तुम जानते नहीं मैं कौन हूँ मैं विष्णु का अवतार हूँ। तो जाकर। वकील जी ने कहा अगर आप विष्णु के अवतार हो तो आप इस जंगल में क्या कर रहे हो आपको तो जगना पुरी के मंदिर में निवास करना चाहिए। तो ढोंगी वकील में कहा जगनपुरी का मंदिर वो तो लकड़ी की मूर्ति है भगवान थोड़ी है असली भगवान मैं हूँ। जैसे उसने ये कहा भक्ति मनोज जी ने अपने सिपाहियों को कहा गिरफ्तार कर, लो गिरफ्तार करो और सब डर गए किसी में हिम्मत नहीं थी उनको छूने की सारे सिपाही डर गए तो ठाकभकीनोजीने खुद हथकड़ी लेकर इस ढोंगी व्यक्ति को के हाथों को बांध दिया फिर के कहने पर जोगी व्यक्ति को पूरी लाई जहाँ ट्रायल हुआ था 18 दिनों के लिए और इस योगी व्यक्ति के पास योगिक शक्तियां थी तो पूरा शहर कहने लगा की भक्तिन ने गलती करी है वहाँ विष्णु को जेल में डाल दिया है और साथ साथ भक्तिन ठाकुर की जो पत्नी थी उनको 100 5 बुखार हो गया ठाकुर वकीलों जी के 10 बचे थे साढ़े 10 के 10 भगवान के शोध बने और ठाकुर वकीलों के सारे 10 बच्चे सब बीमार हो गए और उनकी पत्नी कहने लगे भगवती देवी कहने लगी क्यूंकि तुमने भगवान को जेल में डाला है। ये है सजा भागने ठाकुर ने कहा मेरे बच्चों को पत्नी को मरने 2 पर ये जो व्यक्ति है ये झूठा व्यक्ति है इसे जेल में डालना चाहिए। और जिस दिन वकील जी ने अपना निर्णय या जजमेंट देना था उस दिन भगिन ठाकुर का पूरा दायां साइड पैरालाइज हो गया हाथ हिला पैर नहीं हिला तो जब भी उन्हें पता था ये ढोंगी व्यक्ति है और दिर्द होकर उन्होंने जजमेंट दिया और जब इस व्यक्ति को जेल से बाहर जा रहे थे वहाँ 1 अंग्रेज वकील था जिसने पढ़ा था ये जो योगी है वो अपनी शक्ति रखते हैं अपने सीखे में तो उसने पीछे से आकर सीखा काट दिया और इस व्यक्ति ने आत्महत्या कर लिया जेल में और मन और ठाकुर के सारे बीवी बच्चे सब ठीक हो गए तो सबने कहा कि भक्ति और ठाकुर का निर्णय ठीक था जिस समय ठाकुर बक्तजमेजिसबने 1 पेड़ था जहाँ की बहुत लोग 1 भूत की पूजा कर रहे थे और कई गलत काम हो रहे थे किनोट ठाकुर जी ने वहाँ भागवत का अध्ययन करवाया और 1 महीने बाद वो पेड़ गिर गया और बहुत सब गुप हो। तो इस प्रकार भक्तिनोट ठाकुर ने जो ढोंगी व्यक्ति थे उनको भार किया जब ठाकुर बिजी मैजिस्टे थे उस समय जगनाथपुर मंदिर में कई कमियाँ थी भोग ठीक समय नहीं लग रहा था तो चुड़ाहुआआताथावो चड़ा हुआ पुजारी लोग चोरी वगैरह करते थे अंग्रेज सरकार ने यह जिम्मेदारी दी भक्तिन और ठाकुर को जगनपुरी मंदिर की देखभाल करने के लिए तो भक्ति ठाकुर ने मंदिर की देखभाल की जो जो कमियां थीं, सब को सुधार दिया उसके पश्चात भोग टाइम में लगने लगा। वो जो चंदा आ रहा था उसको ठीक रूप से जोड़ा जा रहा था। तो ठाकुर भक्ति नो शुद्ध कृष्ण भक्ति या महा प्रभु जी की शिक्षा आम की। भक्ति को सातवां गोस्वामी भी कहा जाता है। 6 गोस्वामी हैं वृंदावन के और सातवे गोस्वामी। किसे कहते हैं भक्त? अपने प्रापाजीकेमेसुना प्राओपाजी ने कहा अगर कोई व्यक्ति ग्रियासा है तो भी गुरु बन सकता है। अगर वो शिक्षा को अपनाये अगर उसके पास सिद्धांत का ज्ञान है। तो ठाकुर भक्त रोज जी ने शुद्ध रूप से क्षेत्न महाप्रबल शिक्षा की स्थापना की। उन्हें पता था के 1 दिन चेतने महाप्रभुजी की भविष्य वाणी सत्य होगी। ठाकुर ने 3 मेन पॉइंट्स बताए अपनी रचना में 1 उन्होंने बताया कि बहुत ही जल्द 1 सेनापति प्रकट होगा जो की चेतना महाप्रभुजी के सन्देश को विश्व के हर कोने में पहुचाएगा और कौन था वो सेनापाति। आगे उन्होंने कहा कि 1 दिन पृथ्वी के हर कोने में ये हरिराम पहुँचेगा। उनकी तीसरी भविष्यवाणी थी कि 1 दिन आएगा जब कि सारे विश्व के लोग मायापुर धाम में आयेंगे और बंगाली भक्तों के साथ नाचेंगे और गाएंगे तो भक्त ठाकुर की तीनों भविष्य वाणी सत्य निकल गयी है। ठाकुर भक्त युनो ने अंग्रेजी सरकार से निवेदन किया था कि मुझे नवदीप में रखो आलम में अंग्रेजी सरकार ने उन्हें कृष्णनगर में ट्रांसफर नहीं किया। तो फिर ठाकर वकीलों जी ने त्याग पत्र दे दिया। रिजाइन को अंग्रेजी सरकार ने फिर उन्हें कृष्णनगर में ट्रांसफर किया कृष्णनगर से वो हर हफ्ते इतवार को गोदाम दीप आ जाते थे, लोग कह रहे थे न बुदेबहापराबू का जन्म सान है, ठाकुर ने इसे स्वीकार नहीं किया, उन्हें पता था ये नहीं है जन्म का सान और व्यापार के कारण लोगों ने कह दिया है की ये है स्थान और 1 दिन जब ठाकुर भक्त ठाकुर सुरारी कुंज में थे अपने गोल मकान में, आप में से कितने भग गए हो में सभी, तो वो जब अपने बनाने में जब कर रहे थे तो सामने देखा 1 रोशनी जिसे उन्होंने देखा कि महा बाबू नाच रहे हैं। तो नन्हे आगे जाकर। खोजा ये कौन सा स्थान है जलंगी के पास और उन्हें पता लगा कि ये जमीन दर मुसलमानों की है। और आगे खोजने पर यह पता लगा कि पहले यहाँ हिंदू लोग रहते थे। तो महा प्रभु भक्त ठाकुर को यह विश्वास हुआ की ये हैं 6 दिन महा प्रबु का असली जन्म पर वो चाहते थे की उनकी शिक्षा गुरु जदाजबाबीउन्होंने दीक्षा ली थी। विपिन बिहारी से पर शिक्षा ग्रहण की। जगना दास बाबाजी से जगना दास बाबा जी बहुत ही ऊँचे कोटी के भक्त हैं और उन फोर्टी टू इयर्स के थे उन्हें वो देख भी नहीं सकते थे और उनको उनका सेवक टोकरी में उठा कर ले जाता था। ठाकुर जगनदास बाबाजी गोड़ बाबाजी और बाद में भक्ती बकैदा शराबी कुंज में बैठकर शास्रों का अध्ययन करते थे जी ने निवेदन किया जगनदास बाबाजी से की वहाँ के देखें कि जन्म का स्थान सच जगनदास बाबाजी को टोकरी में उठा कर लाये थे। जैसे ही जगन दास बाबाजी पहुँचे, मायापुर के उस स्थान पर यहाँ की डाकू वकील सोच रहे थे। ये है जन्म सा जगनदास बाबाजी चल भी नहीं पा रहे थे, अभी टोकरी से छलांग मारकर नीचे जाओ नाचने लगे। यह है, यह है, यह है महा प्रभु जी का। तो भक्तो की कृपा से हमें असली ज्ञान प्राप्त हुआ है, क्या किसका की महाप्रभुजी का असली जन्म स्थान का है। ठाकुर भक्ति नो जी को पूरा विश्वास था की महा प्रभु जी की जो भविष्य वाली है। आज से ज्यादा नगरादि, ये सत्य जरूर निकलेगी तो एटी नाइन सिक्स में की पापा जी प्रकट हुए थे। इस पृथ्वी पर महा भक्त ठाकुर ने 1 किताब लिखी थी क्षेत महाप्रभुजी के जीवन के ऊपर, तो ये किताब उन्होंने विश्व के जितने प्रसिद्ध महाविद्यालय थे, सब जगह भेजी और पापाजी संस्था की स्थापना के पश्चात भी। भक्तों ने ऑस्ट्रेलिया में, कैनाडा में इन किताबों को लाइब्ररी में प्राप्त किया। तो ठाकुर भक्त विनोद जी की प्रार्थना थी भगवान से की। भगवान ने कोई ऐसी उलाद भेजे जो की आगे इस आंदोलन को ले जा सके। और ठाकुर जी की प्रार्थना के में भगवान ने कैसे भेजा बाकी सीधा साली। ठाकुर। भक्तिन ठाकुर को शुरू से पता था कि भक्ति सिधांदाजी प्रकट हुए हैं उनकी इच्छा को पूरा करने के लिए। इसलिए शुरू से ही उन्होंने उन्हें पूरा ज्ञान दिया। तो जैसे मैंने कहा आलम में भक्तिन ठाकुर को अनेक प्रकार के शरीरिक कष्ट थे, बचपन से, बचपन से ही। हालांकि उनका धनी खानदान में जन्म लिया था। बहुतिक शिक्षा बुतिक तालीम प्राप्त की थी, पर शरीरिक रूप से उन्हें हमेशा कोई न कोई कष्ट रहता था, कोई बीमारी। पर जब दर्द होकर उन्होंने शुद्ध रूप से कृष्ण भक्ति की स्थापना की। तो जैसे आप जानते है, ठाकुर ने अपनी जिंदगी में लगभग सौ ग्रंथों की रचना की। लगभग सारे भजन गाते हैं। इनकी रचना किसने की है, ठाकुर, जाय, राजमद, श्रीराम, विजा गोरानी, इन सबकी रचना भक्ति न ठाकुर ने की है। थोड़े समय में ही उन्होंने उड़िया, बंगला और अंग्रेजी भाषा में सौ ग्रंथों की रचना की औरतों की और रचनाओं के इं सब में 6 दिन महा प्रबुध के संदेश को प्रस्तुत किया। भक्त अनेक ग्रंथ दिए हैं, जो भक्त पढ़ते हैं। पर शरणागति ग्रंथ में छात्र भक्तिनोजी हमें इस प्रकार का उपदेश दे रहे हैं, कह रहे हैं you should all absorb your mind। इन इटंटलीचेिकsnबोniज अपने मन के द्वारा सदा ध्यान पूर्वक क्या करो भगवान के नाम होगा उचार। तो जैसे भगवान ने गीता में कहा। और पापाजी ने आज लेक्चर में भी कहा था मन मन बाबा मन हो। तो मन के द्वारा सदा भगवान के नाम की महिमा गुणगान रखो और परफॉर्मिंग क्रिश्ना किर्तन यूल गीन मास्टर ऑफ द माइंड क्रिष्णा का किर्तन करने से मन को वश में ला सकोगे। भक्त अक्सर कहते हैं मन की समस्या है, मनदामंडोलहोते रहता है। तो क्या हैं उपाय उपाय है भक्त। ठाकुर जी कह रहे हैं ध्यान पूर्वक जॉब करना। तो भक्त ठाकुर कह रहे हैं कृष्णा का किर्तन करोगे तो उसके द्वारा मन को क्या वर्ष में कर। पाओगे इस का कहना है, ध्यान से हमें जॉब करना चाहिए। आगे भक्ति ठाकुर कहते है गेवफोल्सप्राइड जो नकली अहंकार है, इसे त्यागो। इसलिए चेतना महा प्रभुजी ने हमें क्या उपदेश दिया है कि नाद भी मन माना देना कितना दिया? तो जो झूठा अहंकार है उसे त्याग। झूठे अहंकार के कारण हम भगवान के शरणागत नहीं होते, गुरु के शरणागत नहीं होते है। भक्तों से अच्छा व्यवहार नहीं रखते। क्यूँ अहंकार हम जानते है क्या ठीक होना चाहिए। हमें कुछ मत कहो। तो भक्त ठाकुर क्या कह रहे है जो झूठा अहंकार है उसे त्याग हो। les थिंक yourself to be wotlesdestitूt लो and more mb स्ट्रॉंग इंडस्टरी आगे वो कहते हैं कि आप सोचो की तुम बिल्कुल निकम में हो, हम कभी ऐसा सोचते हो कि तुम निकम में हो। हम अक्सर सोचते है की हम सबसे बुद्धिमान व्यक्ति है, सबसे सुन्दर, सबसे ज्ञानी। उठाकर भक्त कहते हैं शरणागति में तुम यह सोचो कि तुम बिल्कुल बेकार के हो। निकम में, तुम्हारे में किसी प्रकार की योग्यता नहीं है। और अपने आप को घर से भी ज्यादा पति। मान के चलो कि आप से भी ज्यादा पदिर्थहो। इसलिए महा प्रभु ने कहा ना सुनी। practis for gives like the तो चेतन महा प्रभु भी सुनी चेन। स्लोक में कहते हैं हमें अत्यंत शैल शील होना चाहिए। पेड़ के जैसे। तो यही भाव ठाकर। भक्ति कहते हैं पेड़ जैसे क्षमा की भावना रखो। पेड को लोग काटते हैं, तो भी पेड़ उनका सहयोग करता है। तो अगर कोई आपको कष्ट में भी डाले, आलोचना भी करे तो भी आप अपनी तरफ से ठीक व्यवहार रखना। कि वाइलेंस व लिविंग। बींस। दूसरे जो व्यक्ति हैं, उनके प्रति वाइलेंस कष्ट मत? 2 किसी को कश मत? 2 कर भक्ति। 9 जी के विषय में हम पढ़ते हैं कि वो हमेशा सबके साथ प्रेम से व्यवहार करते थे। कोई व्यक्ति कभी उनके कमरे से नहीं निकला। यह सोचते हुए कि भक्तिन ठाकुर ने मेड से ठीक व्यवहार नहीं किया, सबके साथ चाहे, कोई उनकी आलोचना करे, सबके साथ बड़े। प्रेम के साथ वो व्यवहार रखते थे, कोई व्यक्ति कभी नहीं निकला, यह कहते हुए मेरे से उन्होंने ठीक व्यवहार नहीं किया। रावबाजी, कभी लोग मिलने आते थे, सब बड़े प्रभावित होते थे। हालांकि ये नहीं कि पापाजी उनकी बातों में, हाँ में हाँ मिला दे थे, पर सब व्यक्ति जब निकलते थे, कहते थे आई मेट जेंटल मैन। तो यही भाव यहाँ प्रकट किया जा रहा है। किसी के प्रति किसी को कष्ट मत? 2 और सबकी सेवा करो। सबकी पापाजी इच्छा थी कि जो व्यक्ति भी मंडल में आए, उसे कृष्ण प्रसाद दिया जाए। थ्रू आउट योर liv यू शू ने गव एंग्जाइटी तो अदर अपना विवाह ऐसे रखो कि तुम कभी भी किसी को कष्ट नहीं। 2 यह नहीं कि हमारे जीने के लिए हम दूसरों को कष्ट दे। भक्तों का भी ऐसा व्यवहार होना चाहिए कि हम किसी को कष्ट नहीं दे। यह नहीं कि जाप करना तो जोर से करें। कि दूसरा व्यक्ति सुर मे नहीं सके। तो भग का भाव होना चाहिए। किसी को उसके कारण कष्ट नहीं पहुँचाना। बट यू गुड टू दम मे दम hap्पीएंडफुटगेट न हैपन। दूसरों के लिए, दूसरों की भलाई का काम करो। सदा, यही सोचो दूसरों को सुख कैसे मिलेगा? अपने सुख का मत सोचो, क्या सोचो कि दूसरों को आप कैसे खुश कर सकते हो? अक्सर हमारा क्या व्यवहार रहता है? हमारे लिए क्या अच्छा है? जो चीज हमारे लिये अच्छी है, वो सबके लिए अच्छी है। तो यहाँ बक्ती ठाकुर कुछ और कह रहे हैं, वो कह रहे हैं, दूसरों को संतुष्ट करो और अपने स्वार्थ का मत सोचो। यह मत सोचो, आपको सुख कहाँ से मिलेगा? अब ये देखो कि दूसरे व्यक्ति कैसे सुखी बन सकते हैं। इसलिए भक्त जो हैं वो भगवान का प्रचार भी करते है क्यूँ? हालांकि प्रचार करना आसान नहीं है। धूप में जाना, सर्दी में जाना, अपमान मसूर, अपमान कई बार अपमान होता है, पर जाते है क्यूँ? क्यूँकि वो चाहते हैं, सब सुखी बने। become a pis good show posing god call, this you should give डिजा fam on। तो ये जो इच्छा रहती है कि हम बड़े प्रसिद्ध भक्त हैं, हमें इतना आदर मिलना चाहिए। और अगर हमें आदर नहीं मिले तो क्या क्रोधित हो जाते है ये भाव निकालो। तो ये जो आदर की इच्छा रहती है, मैंने इतनी सेवा की है, इतने ग्रंथ पाते हैं। यह भावना ठाकुर और क्या कहे? ये जो झूठी आदर इच्छा है, उसे क्या करो, क्या करो, क्या करो? तो ये जो भावना होती है, हमें इतना आदर मिलना चाहिए, हमें ये सुविधा मिलनी चाहिए। जब भगवान की भक्ति करते हो तो हमें कोई सुविधा की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। हम अहित की भक्ति करने को आये हैं, ये थोड़ी की हम भक्ति करेंगे और उसके बदले में हमें यह प्राप्त होना चाहिए, ये प्राप्त होना चाहिए। तो फिर वो भक्ति नहीं रहती, वो क्या बन जाता है? 1 प्रकार का वाण। तो भक्त ठाकुर कह रहे है की गुणों को अनुकूल करो। और ये जो इच्छा है कि तुम्हे इतना आदर मिलना चाहिए की तुम्हारा नाम पहले, हर जगह ये जो भाव है, उसे त्याग। एंड जस्ट, मेक योर, हम हृदय में विनम्रता का भाव अनुकूल करो। अगर आप भगवान को आकर्षित करना चाहते हो तो सबसे महत्वपूर्ण भाव क्या है? विनम्रता का भाव, अगर विनम्रता का भाव रहेगा तो आप शिक्षा लेने को तैयार हो, आप अपनी कमजोरियों को सुधारने को तैयार हो। यह नहीं कि अगर कोई कहे, यह सुधार हम कहे, तुम कौन हो, बोलने वाले मैं जानता नहीं हूँ, क्या? तो ठाकुर कह रहे हैं। oingthlsrecrishna lives with an all living beings you should respect in on a everyone had all time। ये जानते हुए के भगवान श्री कृष्ण हरि के हृदय में विराजमान हैं, हम सब यूनियन को आदर देते हैं। हम यह नहीं सोचते, हमारा सिद्धांत यह नहीं की पशुओं को हमें खा लेना चाहिए। नहीं, हम यह स्वीकार करते की भगवान हर 1 योनी में है, चीटी में भी। इसलिए हमें चीटी को भी कष्ट देने का अधिकार नहीं। otinwotyoebीinghmb सारे गुण आएंगे, अगर तुम विनम्रता का भाव अनुकूल करोगे, सबको आदर 2 और दया की भावना रखो मर्जी हो। अनेक प्रकार से आप दया की भावना प्रकट कर सकते हो। पर सबसे बेहतर है जब आप दया की भावना को प्रकट करते हो, प्रचार के माध्यम से, क्यूंकी, प्रचार के माध्यम से अज्ञान व्यक्तियों को अब ज्ञान दे रहे हो। अगर पापा जी ने की स्थापना नहीं की होती तो आज लाखों लोग जुड़े होते है। पापाजी के हृदय में यह भावना थी की मुझे पतितों का उद्धार करना है यह गुरु मनाज का आदेश। तो उन्होंने ये संस्था की स्थापना की, इस उद्देश्य के साथ कि हम लोगो को उपदेश देंगे सुखी बनने का इन such स्टेट rinotinरezs। तो फिर से कह रहे हैं ये जो इच्छा रहती है आदर और प्रशंसा ये भाव त्यागो। अगर कोई आपको कहे की आप में यह कमी है, तुम हमेशा आदर चाहते हो, तो आपको उस व्यक्ति को अपना मित्र मानना चाहिए, ये नहीं, ये इरा है, इसलिए वो मेरी कमियों को देख रहा है। in such state, you should seeing the glories of the supreme lord। तो अगर आप भी यह भाव रहेगा, विनम्रता का हमें आधा नहीं चाहिए, हमें ये सुविधा नहीं चाहिए। तो उस स्थिति में आप क्या कर? पाओगे भाई नाम का उछालन। इसलिए चेतन महापूर्व कहा कितनी सदा हरी ये विनम्रता का भाव रखोगे, तो उस स्थिति में सरलता के साथ क्या कर पाओगे हरी का नाम ले पाओगे। भगवान के चरण कमल में प्रणाम करते हुए कहते हैं कब आएंगे मेरे में ये गुण देखो उनकी विनम्रता वो कह रहे हैं इन गुणों की जो रचना की, ये गुण कब आयेंगे मेरे में? तो हम सब भक्तों का आज के इस शुभ अवसर पर यह निर्णय होना चाहिए। हम सब इन गुणों को अनुकूल करें। आप में से कितने भक्तों की इच्छा है कि ये गुण अनुकूल हो। तो इन गुणों को अनुकूल करने के लिए भक्त ठाकुर जी क्या कहते हैं, ध्यान पूर्वक जॉब करते रहो, ध्यान पूर्वक जॉब करोगे तो मन को वश्वि ला सकोगे और इन गुणों को अनुकूल पाएंगे ठाकुर ठाकुर 24 घंटे में केवल 3 घंटा विश्राम करते थे, केवल वो लिखते थे लगभग दिन में, 9 घंटों के लिए, 9 घंटों में। जैसे मैंने कहा उन्होंने अंग्रेजी, ओली और बंगला भाषा में लगभग सौ ग्रंथो की रचना की। विश्राम करते थे 3 घंटे के लिए और जापान और शासन का अध्ययन 5 घंटे दिन में और कचरे का काम 6 घंटे दिन में। तो विश्राम करते थे से 3 घंटे लगूनादाजकोस्वामी विश्राम करते थे के वो थोडी तो बगिनो ठाकुर, र और भोजन क्या खाते थे सुबह के समय साढ़े 9 और 10 बजे के बीच में उनका भोजन था। नास्ता आधा लीटर, दूध, थोड़ा सा फल और 2 चपाती बस, आपको ये खुराक दी जाए थोड़ा सा दूध, थोडा उपर और 2 जवाबी और शाम के समय क्या आधा लीटर, दूध चावल और 2 चपाती बस। ये था उनका उनकी पूरी खुराक। ओह ठाकुर भक्तिन जीने, आप जब नवदेरधाम जाते हो और आप परिक्रम में जाते हो और आप कहते हो भगवान की यह लीला यहाँ प्रकट हुई, यह लीला यहाँ प्रकट हुई ये सब आप कर पाते हो क्यूँ भक्तिन ठाकुर जी ने स्वयं नवदेवधान में परिक्रम के और उन स्थानों को स्थापित किया। यहाँ की भगवान ने अपनी दिव्य लीला थी तो हम सब का बड़ा आभार है और ठाकुर जी ने ये नाम हट का कार्यक्रम शुरू किया हम नाम हट कहते हैं भक्त जी को पता था कि 1 दिन आएगा जब कि यह संभव नहीं होगा कि सारे भक्त मंदिर में रहे हैं तो शराबी कुंज में भक्ति ठाकुरजी ने नाम हद का केंद्र की स्थापना की थी और संक्षेप में नाम हज का सन्देश क्या है जिस प्रकार कोने कोने में दुकान है, यहाँ की आपको इन की सुविधा प्राप्त होती है। कोने कोने में स्थान होना चाहिए जहाँ लोगों को क्या प्राप्त हो, हरी नाम प्राप्त हो तो नाम की स्थापना भी भक्ति नोट ठाकुर ने की है। तो ठाकुर भक्ति जी ने भक्ति सीदांदाजिगशिक्षा दी, उनको पूरा विश्वास था चेतना महा भविष्य वाणी सत्य होगी और भक्ति नोट ठाकुर की इच्छा से, पवित्रता से। आज यह कृष्ण भक्ति का, ये कृष्ण भक्ति का आंदोलन विश्व के हर कोने में पहुँचा है। तो जाकर भक्त जी ने अनेक रचनाएं दी हैं। तो हमें आज के शुभ अवसर पर छात्र भक्ति नोजी के चरण कमलों में प्रणाम करते हुए उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि हमें शक्ति प्राप्त हो जिसके द्वारा हम उनके शरणगत हो सके। ठाकुर भाव हम वैसा सिद्धांत दोनों ही मनाते हैं। अमीर भाव का अर्थ है जबकि 1 महान सं प्रकट होता है। तीर भाव का अर्थ है जब वह प्रकट होता है तो भक्त ठाकुर हम सब के साथ हैं। उनकी शिक्षा और प्रा शिक्षा में कोई अंतर नहीं, उनके ग्रंथो का उदेश्य और प्रापाजीकेग्रंथो में कोई अंतर नहीं। पर हमें बल देना है कि हम प्रावपाजीके ग्रंथों को पढ़ें, क्योंकि उन्होंने संक्षेप रूप में आचार्यों का जो भाव है, उसे प्रस्तुत किया है। ठाकुर लगभग 3 न ठाकुर की हाई कृष्ण हमारा माल रे।
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