शुद्ध भक्ति के क्या लक्षण होते है || 29.10 2001|| SB 01.04.03 || Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja

Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja explains pure devotion: the Lord becomes servant to the devotee through selfless service alone. Arjuna's chariot and Nanda-Maharaj's sandals show this reciprocal love. A true devotee seeks only to serve, never liberation.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय नम भगवते वासुदेवाय। परम सकंद चौथा अध्याय से हम ने किन तुना संचोधित कृष्णा तम मुनि पिछले। 2 लोकों में हमने पढ़ा है कि सोना मुनि जी श्रोता स्वामी जी को बहुत देर करते हुए बधाई दे रहे हैं और उन्होंने यह कहा है कि सूतक स्वामी अत्यंत भाग्यशाली तथा सामान्य है और उन्होंने इस भागवत ज्ञान को महान संत शुक्रदेव को स्वामी द्वारा प्राप्त किया था। जब परीक्षित महाज को सूचना प्राप्त हुई कि 7 दिन के पश्चात आपका अंत आ जाएगा। 1 ब्राहमण श्रिंगी ने उन्हें श्राप दिया था कि 7 दिन के पश्चात उनका अंत आ जाएगा। तो परीक्षण में आज इस श्राप से घबराई नहीं प और उन्होंने अपने अंत की तैयारी की। शास्त्र में कहा गया है अनंत नारायण स्मृति के व्यक्ति को इस रूप से तैयारी करनी चाहिए की अंतिम समय में नारायण की स्मृति भगवान की स्मृति कर सके। और भागवत गीता में कहा गया है यम वापी स्वर्ण भवा जहाँ व्यक्ति की बुद्धि होगी, मृत्यु के समय उसी प्रकार का दे हमें स्वीकार करना पड़ेगा। उदाहरण के लिए अगर मृत्यु के समय हम किसी भौतिक विषय का स्मरण कर रहे हैं तो उसी रूप में जन्म ग्रहण करना पड़ेगा। और अगर मृत्यु के समय भगवान का स्मरण कर रहे हैं उनके कार्य कलापों का, तो फिर हमें में जन्म प्राप्त होगा। भागवत में हम महाराज भारत की कथा पढ़ते हैं पांचवें स्कंद में जिसमें ये देखते हैं कि महाराज भारत ने सब राज्य, सुन्दर, पत्नी, बच्चों, धन, संपति सब को त्यागा जंगल में गए। वह वहाँ 1 हिरन के प्रति आकर्षित हो गए थे और 1 समय उस हिरन को खोज रहे थे। और खोजते समय खोजते के दौरान मैं की मृत्यु हो गई। जिसके कारण उन्हें उस हिरन के रूप में जन्म ग्रहण करना पड़ा। तो ये बहुत अवश्य है कि हम मन के द्वारा भगवान का चिंतन करें, ये नहीं कि केवल मृत्यु के समय ही चिंतन करना चाहिए। प्रयास से यह रहना चाहिए कि हम भगवान का चिंतन सदा करें। परीक्षित महाराज का सौभाग्य था कि मृत्यु के समय वो श्रीमद भागवत का उपदेश सुन रहे थे और ये देश सुनने से इतना अधिक लाभ उठा रहे थे, इतना अधिक आनंद अनुभव कर रहे थे की उन्हें बिल्कुल भूख भी नहीं लगी और प्याज भी नहीं लगी। 7 दिन के लिए, परीक्षमहाजने 1 बूंद पानी का भी स्वीकार नहीं किया। वो उनका भाग्य था कि शुकदेव के स्वामी के द्वारा उन्हें भागवत का उपदेश प्राप्त हो रहा था। तो सूत स्वामी जी न मिश्रान के बन में संतो को उपदेश देते हैं। न मिश्राना में हजारों संत उपस्थित थे और 1 बहुत बड़ा यज्ञ का प्रबंध किया था उन्होंने जिसका मूल उद्देश्य ये था 1 सिद्धांत की स्थापना करना जिसके द्वारा कलियुग की प्रजा का उद्धार हो सके। जो संत महात्मा है वो सदा समाज के शुभ चिंतक रहते हैं। पर वो ये जानते है कि समाज का सुख समाज को सुख केवल आध्यात्मिक शिक्षा के आधार पर प्राप्त हो सकता है। तो इन संत महाता ने सूतक स्वामी को अपने नेता के रूप में चुना और सुदर स्वामी ने देश भी प्राप्त किया था, उपस्थित थे। जब वो भागवत का उपदेश शुक्रदेव को स्वामी जी दे रहे थे, तो यहां मुनि कहते हैं उन्होंने स्वामी को बड़ा आदर दिया और कहा कि हमें कृपा करके वो भागवत का उद्देश्य जो जो कि शुकदेव को स्वामी जी ने दिया था। और ये भागवत के उदेश्य में क्या है केवल शुद्ध भक्ति का ज्ञान। जैसे कि पापाजी इस लोक के तार पर समझा रहे हैं कि श्रीमद भागवत का जो ज्ञान है, ये बिल्कुल दिव्य है, और किसी भौतिक कार्य से इसका कोई सम्बन्ध नहीं, जैसे कि श्रीमद भागवत के आदर में ही कहा गया है धर्म परोजतकतपरमो निर्मम सता। ये जो श्रीमद भागवत है यह उस सिद्धांत का विरोध करता है जिसके द्वारा यह सोचा जाता है कि धर्म का पालन करना चाहिए किसी प्रकार की भौतिक सुविधा को प्राप्त करने के लिए, जैसे कि कई बार, यह अक्सर हम धर्म के मार्ग अपनाते हैं। इसलिए क्यूंकि ये उम्मीद है कि धर्म के द्वारा, धर्म के नियमों के पालन के द्वारा, अर्थ बहुत ही सुख सुविधा पर होगी। धन और धन। क्यों चाहिए हमें? क्यूँकि धन 1 साधन बनता है इन के विचारों को पूरा करने के। और जब हम अनेक प्रकार के भौतिक कार्यों में जुड़ने के पश्चात भी संतोष प्राप्त नहीं कर सकते, प्रस हमें क्या चाहिए? इस लिए कहा गया है बिल्कुल आज मै ही के धर्म और प्रो, और ये जो श्रीमद भागवत है में प्रॉपर जी समझाते हैं कि ये श्रीमद भागवत के सन्देश को हमें स्वीकार करना चाहिए किस के द्वारा, भगवान के शुद्ध भक्तों के द्वारा, उनके द्वारा नहीं, जिन्होंने 1 धंधा बना लिया है भगवत की कथा करने के लिए, धन कमाने के लिए, पर उनके द्वारा भागवत के सन्देश को स्वीकार करना चाहिए जो कि भगवान के शुद्ध भक्त हो और जिन जिन का आचरण भी बिल्कुल शुद्ध हो। तो व्यास देवी ने जैसे की प्रॉपर्टी पर समझा रहे है कि व्यास से श्रीमत भगवत की रचना की। और जैसे की हम पढ़ते है भागवत में, व्याज से, देव जी ने तो पहले 1 वेद को 4 भागों में बांटा, फिर उन्होंने महाभारत की रचना की। विधानसभा सत्र की रचना करने के पश्चात भी प्याज से संतुष्ट नहीं थे। तो सरस्वती नदी के किनारे के तट पर बैठकर वो यही विचार कर रहे थे कि मैंने सारे शास्त्रों की रचना की है। उनके अनेक शिक्षक के सहयोग से 1 वेद का विभाजन किया, 4 भागों में महाभारत की रचना की, जैसा कि कहा गया तापरी में की साधारण व्यक्ति भी उसे समझ सके बुद्धि के लोग भी संतोष नहीं थे। तो उन्होंने सोचा कि शेर मेरी निराशा का कारण है। क्या मै शुद्ध भक्ति को सन्देश नहीं दिया जो कि हर व्यक्ति और परम भगवान दोनों को ही प्रिय है। व्यासदेव ने कहा ने सोचा, क्यूंकि मैंने केवल शुद्ध भक्ति का ज्ञान नहीं दिया जो कि सधारण व्यक्ति और भगवान दोनो की जैसे ये सोच रहे थे, साजवादी नदी के तट पर बैठकर। तो वहाँ कौन पहुँचे muni और फिर मुनि जी ने यही कहा और फिर उन्होंने श्रीमद भागवत को सन्देश दिया। यही श्रीमद भागवत का संदेश से पहले ब्रह्मा जी ने प्राप्त किया था। ब्रह्मा जी के द्वारा। हार मुनि जी को ये सन्देश आया। नारद मुनि जी के द्वारा ये संदेश बिहार सदेव के पास आया। तो इस प्रकार ये दिव्यज्ञान परम्परा में आ रहा है और परम्परा द्वारा हमें इसे प्राप्त करना चाहिए। श्रीमद भागवत गीता में भी भगवान क्या कहते है? तो ये जो श्रीमद भागवत का ज्ञान है, इन श्लोकों में श्रीमद भागवत की प्रशंसा पढ़ रहे हैं। और ये कहा गया है बड़े स्पष्ट रूप से जो श्रीमत भगवत का जो ज्ञान है, ये बिल्कुल दिव्य है। और इस ज्ञान को हमें स्वीकार करना चाहिए किस के द्वारा भगवान के शुद्ध भक्तों के द्वारा भक्ति समृतसमेरपस्वामीजी शुद्ध भक्ति के अनेक लक्षणों का वर्णन करते हैं। क्यूँकि श्रीमत भगवत में प्रथम से 12 स्कन तक हमें 1 ही विषय का ज्ञान मिल रहा है। क्या है वो विषय शुद्ध भक्ति? तो शुद्ध भक्ति को हम क्यूँ अपनाए? रूप गोस्वामी जी इस विषय की चर्चा करते हैं। रूप गोस्वामी जी को क्षेत्र या महा प्रभु जी ने आदेश दिया था कि भक्ति सम्बंधित ग्रंथों की रचना करनी चाहिए। रूप स्वामी जी अपने भाई सनातन के साथ नवाब हुसैन शाह के राज्य की देखभाल कर रहे थे। पर मजबूरन उनकी इच्छा नहीं थी। पर मजबूरन उन्हें यह सेवा स्वीकार करना पड़ा। और जैसे ही मौका मिला उन्होंने त्याग पत्र दे दिया। और जब वो क्षेत्र ने महा प्रभुजी से मिले राम केली में तो महा प्रभु जी ने ने क्या आदेश दिया जाओ ब्रंदावन। वहां जाकर उन्होंने उन स्थानों की स्थापना की जहाँ की भगवान ने अपनी दिव्य लीला पकड़ की थी और अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की जिसमें हमें वैदिक शास्त्र का निचोड़ प्राप्त होता है। और इन अनेक ग्रंथों में भक्ति रसमता सिंधु बहुत ही महत्वपूर्ण है और प्रसिद्ध है। हम भक्तों को प्रयास करना चाहिए। रूप स्वामी जी के ग्रंथों को समझने के लिए ठाकुर जी ने अनेक सुन्दर रचनाएं की हैं जिनमें कि वो चेतन महा प्रबु की दिव्य स्थिति को स्थापित करते हैं। और 1 बड़ी प्रसिद्ध रचना गुरंगाबजीतेहदे कहते हैं रूप रगुनाथ पदेआयबेयकूती क्या वो दिन आएगा जब मैं रूपा को, स्वामी जी के ग्रंथो को पढ़ सकूंगा और समझ सकूँगा तो नरोतमदास ठाकुर भी तरस रहे थे कुछ सब दिन के लिए जब कि वो रूप को स्वामी जी के ग्रंथो को पढ़ सके और समझ सके। इ। इसलिए हम गोडिया वैष्णव जो कि रूप गो स्वामी जी की पीड़ी में संप्रदान आ रहे हैं, उन्हें रूप नुगा भी कहा जाता है। रूप नुगा का क्या अर्थ जो कि रूप गोस्वामी जी के सिद्धांत के अनुसार अपने जीवन को बिता रहे हैं। तो भक्ति रस मृत सिंधु में स्वामी जी शुद्ध भक्ति के विषय में भगवान ने गुणों की चर्चा करते हैं। फिर सबसे प्रथम वो हमें यह समझाते है कि शुद्ध भक्ति के क्या लक्षण होने चाहिए। इस लोक में हम भागवत की महिमा पढ़ रहे हैं और इस पूरे भागवत में केवल शुद्ध भक्ति के विषय की ही चर्चा है। पर शुद्ध भक्ति के लक्षण क्या हैं? क्या कारण है कि हमें शुद्ध भक्ति को अपनाना चाहिए? हम भक्ति को अपनाते हैं। क्योंकि हृदय में अनेक प्रकार के क्या है, अनर्थ है। हृदय में अनेक प्रकार की मेल है, गहरी मैल है। जैसे कि क्षेत्न महाप्रभुजी ने समझाया है छेत्र, दर्पण, माजन, ये हरी नाग के उच्चारण से हृदय की जो मेल है, ये दूर होती है। और महान संत। ठाकुर भक्ति विनोद ने समझाया है कि 4 प्रकार के अनर्थ है, जो दूर हो सकते हैं केवल शुद्ध भक्ति के माध्यम के द्वारा। और ठाकुर भक्तियों जी कहते हैं ये जो अनर्थ है 4 प्रकार के, उनसे हमें अवश्य ही बचने का प्रयास करना चाहिए। 1 तो है हिरदया। दोरबलियाहृदयादोड़बलिया का अर्थ है जो हृदय की टूटियां हैं। हृदय में अनेक प्रकार की टुटियाँ हैं। 1 है उन वस्तुओं के प्रति आकर्षित होना, जिनका भगवान से कुछ सम्बन्ध नहीं हो। जैसे कि इनजतितीकेकार्यो के प्रति आकर्षित रहना। फिर हरदेश दुर्बलियामें जाता है कि हमार में ये भावना रहती है। दूसरे को धोखा दे, चाप, रूसी करें, दूसरे की कमजोरियों को निकालें। यह भी हरदा गिना जाता है। फिर 1 अगला दोष है द्वेश का विचार द्वेश इर्शा से हमें बचना चाहिए। पर द्वेश इर्शा दूसरों की कमियों को निकालना। और फिर है अपराध, जो अपराध है। यह भी अनेक प्रकार के अपराध हैं। पहला तो अपराध है हरि नाम के प्रति अपराध रोज सुबह। हम हर मंडल में लगभग 10 नाम अपराधों का वर्णन करते हैं। 10 नाम अपराधों का वर्णन इसलिए करते हैं अपने आप को याद दिलाने के लिए। 1 दूसरे को याद दिलाने के लिए क्या कि हर नाम का पूरा लाभ उठाना चाहते हैं। तो हमें अपराधों से बचा है। बहु जन्मा करे। यदि श्रवन किते बुता, पाए, प्रेम माना, जैसे कि कृष्ण जी ने कहा है 12 नहीं। पर अनेक जन्म में नाम का उच्चार करते जाओ। नाम अपराधों से नहीं बचाओगे। तो हरी नाम का बुरा लाभ नहीं मिलेगा। तो अपराधों में जाता है। 1 है हरी नाम के प्रति, जो हम अपराध करते हैं। 10 नाम अपराध से बचना चाहिए। जिसमें दसवे नाम अपराध के 2 भाग हैं। 1 भाग है कि लापरवाही से जॉब करना या सावधानी से जाप करना चाहिए। फिर दूसरे प्रकार का अपराध है भक्त ठाकुर जी के अनुसार भगवान के विग्रह के प्रति अपराध। जैसे कि मायावादी लोग क्या कहते हैं? जब वो भगवान की आंच विग्रह को भी देखते हैं तो क्या कहते हैं? यह तो पत्थर की मूर्ति है। तुम लोग इसे भगवान मानते हो। ये भी अपराध है। भगवान अपने आप को अनेक रूप में प्रकट करते हैं, जिनमे से 1 और इस विग्रह और भगवान में कोई अंतर नहीं की है, जो भगवान के विधा को स्वीकार नहीं करते। और कई ये सोचते है कि भगवान इस पृथ्वी पर आते हैं। क्या साधारण व्यक्ति के समान बन जाते है? भगवान गीता में क्या कहते है? कितने प्रकार के व्यक्ति के? 4 प्रकार के व्यक्ति के दिन भगवान 4 प्रकार के व्यक्ति भगवान के नहीं होते। तो पहला 1 अपराध है। हर नाम के प्रति अपराध, 10 नाम अपराध, जिसे आप सब परिचित हो। दूसरे प्रकार का अपराध है भगवान के विग्रह भगवान के प्रति अपराध करना। भगवान के भगवान के दिव्य रूप को नहीं समझा। भगवान गीता में कहते हैं जन्म कर्म च। मे दोनो ही बिल्कुल दिव्य है। हम इसे नहीं मानते, हम सोचते है, बहुत संस्थान में आते है तो हमारे समान बन जाते हैं। यह 1 दोषी विचार है। फिर भक्तों के प्रति अपराध करना, भक्त के प्रति अपराध से भी हमें बचना चाहिए। भक्तों के प्रति अपराध को क्या बोला जाता है? वैष्णव अपराध छेतनहाबबुजी जब सनातन गोस्वामी जी को दिव्य शिक्षा दे रहे थे तो उन्होंने कहा किस प्रकार भक्ति का बीज प्राप्त होता है, साधु संगत के द्वारा, बीज उगता कैसे हैं, शबनम और कितना के माध्यम के द्वारा। जिस प्रकार बगीचे में आप 1 बीज को बोल सकते हो, पर पानी पिलाने से ही बीज उगेगा। और जब ये भक्ति का पेड़ उगता है तो फिर फल पैदा करता है। और इस फल को, भक्ति के फल को कोई भी खाये, जमाये, वो जन्म मृत के बंधन से फिर मुक्त हो सकता है। पर ये जो बगीचा, जो भक्ति का जो सुन्दर बगीचा है, ये नष्ट भी हो सकता है, नहीं हो सकता। कैसे वैष्णव अपराध के द्वारा। इसलिए वेक्षण अपराध से बचना चाहिए, वैष्णव से बचना चाहिए। महाप्रभु जी ने इसकी तुलना की की है किसके साथ पागल हाथी के साथ पागल हाथी को पकड़ना बहुत मुश्किल है। पागल हाथी सुन्दर बगीचे को नष्ट कर देगा, हर चीज को खराब कर देगा। उसी प्रकार जो वैष्णव अपराध है, उसके द्वारा भक्ति का जो लाभ है, वो मिल जाता है। इसमें वैषणअपराध से बचना चाहिए और चौथे प्रकार का अपराध है। दूसरी जीव, आत्मा के प्रति अपराध करना, जो भक्त है, उस सब के प्रति मित्रता प्रकट करता है। और किसी योनि को कष्ट नहीं देना चाहता है। और वैसा जो है हर अपराध से अपने आप को बचाना चाहता है। फिर अपराध असरा। उसका ये अर्थ है कि अनेक भौतिक सुविधाओं की इच्छा रखना, यह सोचना कि हमें स्वर्ग का सुख प्राप्त हो जाए। कई लोग स्वदंत जानना चाहते हैं क्यों स्वरग में इस भौतिक जगत से ज्यादा अधिक मात्र का सुख प्राप्त हो सकता है। फिर कई अध्यात्मिक वादियों की इच्छा होती है की हमें 8 प्रकार की योगिक सिद्धियां, बारी सिन्धु में स्वामी जी 8 प्रकार की यौगिक सिद्धियां की भी चर्चा करते हैं। कृष्णदास कविराज कहते है? krishna भुक्ति मुक्ति सिद्धि कामी सकाली अशंता कृष्णा का भी राज कहते हैं कि कृष्ण भगवान के जो की निष्काम भाव से इस मार्ग में प्रवेश करें, वो सदा शांत रहेंगे। और इसकी तुलना में जो दुसरे आदियातिकवादी हैं, जिन्हें योगिक सिधिया चाहिए या स्वरा का सुख चाहिए, वो सदा अशांत रहेंगे। इसलिए भगवान के जो भक्त हैं, वो इन विषयों में ज्यादा रूचि नहीं लेते। तो 1 चौथे पदार्थ अपराध है। संक्षेप में आपको समझा रहे हैं कि विभामाकीआध्यात्मिक विश्व के विषय में ठीक ज्ञान नहीं रखा। जैसे की ये नहीं समझना कि हमारा स्वरूप क्या है, हमारा वास्तविक स्वरुप क्या है? यह नहीं समझा। महा बुजी ने क्या कहा? इस विषय पर जरेसरुपकृष्णनेया स्वाभाविक स्वरूप यह है के भगवान की सेवा में जुड़े रहे। पर ये नहीं समझना कि हमारा असली स्वभाव, स्वाभाविक, स्वरूप क्या है? फिर पर भगवान के दिव्य रूप को नहीं समझना। आगे साधना भक्ति के विषय में क्या नहीं रखा? साधना भक्ति के विषय भी रूप स्वामी जी चर्चा करते हैं। साधना भक्ति का अर्थ है अनेक विधियों का पालन करना और इन नियमों के पालन के द्वारा हृदय में जागृति उत्पन्न होगी। भगवान को समझने के लिए, भगवान की सेवा में जुड़ने के लिए, भागवत गीता के बारे में भगवान ने सबसे में कहा, सदा मेरा चिंतन करो। और फिर आगे यह भी कहा कि यह इतना सरल नहीं है। पर अगर तो वह भी भारत के नियमों का पालन करोगे। तो मुझे समझने की इच्छा प्रकट करोगे। तो 1 और प्रकार का नर है कि सादा भक्ति के विषय में ज्ञान रहना। हम जब अंतराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत में जुड़ते हैं, जहाँ सादा भक्ति के विषय पर बल दिया जाता है, क्यूँ? क्यूंकि साधना भक्ति का अर्थ है नियमों का पालन करना और नियमों के पालन के द्वारा ही हृदय के जो मैल है, ये दूर हो सकती है। कई बार सुनने में आता है कि हमें नियम इत्यादि पसंद नहीं आते, पर नियमों के पालन के बिना किसी प्रकार से भक्ति में आगे नहीं बढ़ सकते। फिर चौथे प्रकार का अपराध या दोष या कि जो कार्य भक्ति के लिए प्रतिकूल है उस विषय पर अज्ञान कहना? ये बहुत महत्वपूर्ण है कि हम यह समझें कि भक्ति के लिए क्या किस प्रकार का कार्य अनुकूल है, का कार्य केवल ज्ञान में पलना पलने से हम जीवन को सफल नहीं बना सकते। तो इसी प्रकार हमें शास्त्रों के सहयोग से ये भी समझना है कि किस प्रकार का कार्य भक्ति के लिए अनुकूल है और कौन से कार्य प्रतिकूल है। जैसे की जब महाबली स्वामी को शिक्षा दे रहे थे तो उन्होंने भगवान के गत होने के छे माध्यम बताए। जिसमे सबसे पहले क्या था जो अनुकूल है उसे स्वीकार करो और जो प्रतिकूल है उसे प्यार। साधारण जीवन में भी हम यही अनुभव करते हैं। जैसे कि हम सब बहुत जीवन में सब अपने स्वार्थ का ही सोचते हैं। तो अगर हमें लगे कि किसी दोस्त या रिश्ते से कुछ लाभ हो सकता है तो हम उसे जोड़ते हैं। और अगर हमें लगे कि किसी दोस्त या लाभ नहीं होगा की परवाह नहीं करते। अगर आपको पता रहे कि किसी खाने की वस्तु ऐसी सेद के लिए अच्छा है तो हम से स्वीकार करते हैं। अगर सेट के लिए खराब है तो हम स्वीकार नहीं करते। धंदे में अगर कोई सौदे में नफे की सम्भावना है, कार करते है, अगर नुकसान की संभावना है तो हम स्वीकार नहीं करते तो उसी प्रकार क्षेत्र है। प्रभु ने कहा की जो भक्ति के लिए अनुकूल है उसे स्वीकार करो, जो त्याग हो तो वे ब्रा इस के द्वारा। इसमें 1 इसका यह है कि जो भक्ति के लिए प्रतिकूल है उस विषय में अज्ञान रहना स्वामी जी ने हमें भक्ति रस के लावा 1 और बड़ा प्रसिद्ध ग्रांट दिया है, जिसे हम श्री उपदेश रमित के नाम से। तो श्री उपदेश्वर्मितमें रूपा को समझे क्या कह रहे हैं? सबसे वो कहते है कि कौन योग्य है? शिष्य बनाने के लिए? है की नहीं? और क्या कहते हैं इस विषय में वह जो वेग मन, क्रोध वेगम जीव, वेगम उदार सबसे पहले स्लॉट में स्थापित करे है क्या कि वो ही व्यक्ति योग्य है जो कि मन और इंडिया को वर्ष में ला। सके। और बिल्कुल प्रथम श्लोक में स्थापित कर रहे हैं। अगर कोई व्यक्ति अध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करना चाहे तो उसे भी यही करना पड़ेगा। बिल्कुल श्लोक मे स्वामी जी कहते है की उन्हें भी प्रयास करना पड़ेगा। मन को पक्ष में लाने के लिए। बिल्कुल स्पष्ट रूप से समझाया गया। उपदेश मे ग्रंथ के हर श्लोक के साथ 11 श्लोक हैं, केवल पर हर्ष लोक के साथ। प्रॉपर जी ने लगभग 8, 9, 10 पेजों का तात्प्रिय लिखा है, जिससे हमें क्या सूचना मिलती है कि हर्ष लोक इतना महत्वपूर्ण है की हमें बड़े ध्यान से हर श्लोक के हर शब्द को समझने का प्रयास करना चाहिए। तो बिल्कुल प्रथम श्लोक में ही रुक गोस्वामी जी स्थापित कर रहे हैं कि मन और इंडिया को वश में लाना महत्वपूर्ण है। और आगे क्या कहते हैं। फिर अगले श्लोक में क्या हरा जनसंगाचलोलियमसदवी भक्ति, विनिति, विनश्यति का अर्थ है जिसके द्वारा भक्ति नष्ट होती है। तो बिल्कुल नहीं समझकर। क्या? क्या कार्य भक्ति के लिए प्रतिकूल है? तो ठाकुर भक्त जी ने भी कहा है कि यह ज्ञान नहीं रखना कि कौन से कार्य भक्ति के लिए प्रतिकुल है, यह भी अनर्थ है। अब समझ कई बार हम सोचते हैं जिसे इंग्लिश मे कहते है। न, हम सोचते हैं कि हम अज्ञानता में रहेंगे और उसी में आनंद है। हमें ज्यादा ज्ञान नहीं चाहिए। तो छात्र भक्ति जी कह रहे हैं कि ज्यादा ज्ञान नहीं रखना। उन कार्यों का जो भक्ति के लिए प्रतिकूल है, वो भी अपराध है। और उस अपराध के कारण आप भी भक्ति में आगे फिर नहीं बन सकोगे। दूसरे शब्दों में हमें भ बड़े स्पष्ट रूप से यह समझना है। शास्त्र गुरु के सहयोग से की क्या कार्य भक्ति के लिए अनुकूल है, क्या प्रतिकूल है? तो रूप स्वामी जी यह स्थापित कर दे की भक्ति के लिए क्या क्या? क्या कार्य प्रतिकूल है? और फिर आगे कहते हैं क्या अनुकूल है। जैसे उत्साह, निश्चयत, धर्य, तत, तत, कम, प्रवर्तन, संग, त्याग, भक्ति सिद्ध। तो ये भी समझना चाहिए की क्या अनुकूल है, क्या प्रतिकूल है। अब ठाकुर भक्त जी ने इन अनर्थों की चर्चा की। हमने आपको संप समझाया है। अभी सारे अनर्थ जो है नष्ट, हो सकते हैं शुद्ध भक्ति के द्वारा। और ये श्रीमत भगवत जिसकी महिमा हम पढ़ रहे है। ये श्रीमद भागवत ने केवल शुद्ध भक्ति पर बल दिया गया है। और शुद्ध भक्ति के क्या लक्षण हैं। इस विषय की चर्चा स्वामी निकालते हैं। कौन से ग्रंथ में, भक्ति सिन्धु के बिल्कुल प्रथम अध्याय में। तो सबसे पहले वो कहते है की शुद्ध भक्ति के द्वारा समझ प्रकार के जो बहुत क्लेश है, उनसे हमें छुटकारा प्राप्त हो सक। तो शुद्ध भक्ति के द्वारा समस्त प्रकार के बहुत ही क्लेश से छुटकारा प्राप्त हो सकता है। पर पुराने समझाया गया है कि जो कष्ट क्लेश भुगत रहे हैं, ये किस का परिणाम है, पापों का परिणाम है। कई पापों का परिणाम हम भुगत चुके हैं, कई पापों का परिणाम हम भुगत रहे हैं, कई पाप का परिणाम अभी तक भुला नहीं है, पर समय के साथ उगेगा और कई पाप अभी हैं, और समय के साथ उनका परिणाम भी हमें भुगतना पड़ेगा। जैसे की कई बार लोग पूछते हैं और कहते हैं वो व्यक्ति तो इतने प्रकार का प्रात कर रहा है, बदमाशी कर रहा है, ये दोष कर रहा है, मांस खाता है, और इतनी सुख सुख का जीवन बिता रहा है। बड़ी मोटर, बड़ा, मकान सब और हम साधु महात्मा का जीवन बिताते हैं, भगवान की शिक्षा का पालन करते हैं और हमें साधारण जीवन बिताना पड़ता है। इतने कष्ट की स्थिति में लोग कहते हैं, कई बार लोग पूछते हैं जब आप प्रचार करने जाओ, देखो विदेश में पश्चिम लोग, देश के लोग सब गाय का मांस खाते हैं, सब खाते हैं, और वो बड़े सुख का जीवन बिताते हैं। और हम देखो, ये सब नियमों का पालन करते है। और हमें न कठिन जीवन बिताना पड़ता हैं, पूछते हैं क्या? इसका क्या? आज जो सुख व्यक्ति भुगत रहा है, भुगत रहा है पूर्व जन्म के अच्छे संस्कारों के कारण, पर जो हम अपराध कर रहे है, वो सब सब का परिणाम भुगतना ही पड़ेगा, ये अवश्य नहीं, क्या हर अपराध का परिणाम तुरंत भुगत, यह अवश्य नहीं, जैसा में ये अवश्य नहीं, अपराध उसका परिणाम तुरंत ही भुगतना पड़ेगा। आरोप भविष्य में अवश्य ही भुगतना पड़ेगा। तो कई पापों का परिणाम हम भुगत चुके हैं, कई का भुगतने वाले हैं, कई थोड़ी देर बाद भोग देंगे और कई अभी तक लाइन में नहीं आये, पर लाइन में जरुर आयेंगे। थोड़ी देर के बाद तो जैसे की पिछले हफ्ते, जब हमने यह म्यूजियम खोला था उसमें पहले दिन तो बहुत लम्बी लाइन थी न। तो कइयों को तो आपने मकान बिल्डिंग के बाहर रखा, कह अन्दर लाए, फिर कहियो को सिक्योरिटी के पास रखा। तो इसी प्रकार कई पाप हैं जो अभी सो रहे हैं, पर थोड़ी देर बाद जगह जायेंगे और वो भी लाइन में आ जाएंगे। अंत में भुगतना पड़ेगा सब का परिणाम। पर स्वामी जी कहते हैं कि समझ प्रकार के बहुत ही क्लेश से छुटकारा प्राप्त हो सकता है। अगर हम इस शुद्ध भक्ति के मार्ग पर प्रवेश करे, जैसे की कितना भी खास हो, अगर आप तेल फेंकोगे तो जल जाएगा तो इस प्रकार चाहे कितने भी पापी हो, सब पापों को हम मिटा सकते हैं शुद्ध भक्ति के द्वारा। जैसे की 1 समय प्रापी 1 भक्त को दीक्षा दे रहे थे जो अपने भक्त बनने से पहले कसाई का काम करा था। पापा जी ने कहा अब पाप जो है बिल्कुल बंद करो, ये अवश्य है। जैसे परीक्षा 7 वर्क जल्द से पानी तो उसी प्रकार हमें भी वर्त रखना है। और किसे पाप के कार्य से, तो रूप को समझे। पहला लक्षण ये कहते हैं कि सम बहुत ही क्लेश तेज छुटकारा दिला सकता है। क्या यह शुद्ध भक्ति का माध्यम, फिर ये जो शुद्ध भक्ति का जो मार्ग है, ये शुपाल सबके लिए, यह जो भी इसके समझमें सबको सबके लिए है। जैसे की हम लोग हरी नाम में जाते हैं। जब आप हरिनाम करने जाते हो, शायद आप यह नहीं सोचते कि हरि नाम किरन में इतनी शक्ति है कि जो भी हरि नाम को सुनेगा उसके द्वारा शुभ हरम लाभ प्राप्त करेगा। जब आप हरिनाम जाते हो, जो पेड़ है, व्रिक्ष है, उन्हें भी लाभ पहुंचता है। क्यूँ? क्यूँकि भगवान के नाम को सुनकर? तो यह शुद्ध भक्ति का जो मार्ग है, शुभ आरम्भ करता है सबको, फिर ये शुभ भक्ति का जो मार्ग है, दिव्य आनंद प्रदान करता है। हर व्यक्ति को लुभस्वामीइसविषय पर 3 प्रकार के आनंद के साधन की चर्चा करते हैं। 1 आनंद का साधन क्या है? इंडिया के बहुत कार्य, दूसरा साधन क्या है? min, लॉट और तीसरे प्रकार के आनंद का साधन क्या है? शुद्ध भक्ति? सुबह को स्वामी जी कहते हैं देव आनंद का प्रदान करता है। शुद्ध भक्ति। तो कहते हैं आनंद प्राप्त करने के 3 साधन हैं, 1 साधन है जिससे कि अक्सर लोग जुड़े रहते हैं वो है इंडिया ट्रिप्टीका साधन, दूसरा है मो क्ष प्राप्त करने का विचार तीसरा है। शुद्ध भक्ति द्वारा जो आनंद प्राप्त होता है तो रूपा को स्वामी जी कहते है कि जो आनंद भौतिक कार्य के द्वारा प्राप्त होता है वो तो किसी समय भी समाप्त हो सकता है। सच बात है किसी समय में चाहे आप के बन जाओ या बानी बन जाओ, सब किसी समय भी समाप्त हो सकता है। यह बात तो सच है। और जो आनंद भगवान से ब्रह्मा द्वारा प्राप्त होता है उसको अगर आप करोड़ो गुना पढ़ाओ तो भी शुद्ध भक्ति के आनंद की तुलना में बिल्कुल कुछ माना जाता है। और जो आनंद हमें भक्ति द्वारा प्राप्त होता है। प्रभुजी ने क्या कहा? आनंद बुधी पदम, तुम नाम रतवा, ये जो आनंद है केवल बढ़ते जाता है। तो हमारे मन में, हृदय में कोई शंका नहीं रहनी चाहिए कि अगर हम शुद्ध को के साथ स्वीकार करें तो इसका यह परिणाम होगा कि हमें असली आनंद की प्राप्ति होगी जो केवल बढ़ते ही जाएगा। इसी विषय की स्थापना भगवान वृष देव करते हैं। कौन से स्कंद में में भगवान रृषणदेवजी ने हा धपोदेवयमपुत्र का ये न सत व दमशोखयमनंतहे मेरे प्रिय पुत्र। अगर तुम भगवान की प्रशंसा के लिए तपस्या का पालन करोगे तो इसके बदले में तुम्हे टीवी आनंद प्राप्त होगा जो केवल बढ़ते ही जायेगा। और कभी कटेगा नहीं तो इस विषय की स्वामी जी भी करते हैं। फिर। और ये जो जिस व्यक्ति ने हरि नाम को प्राप्त किया वह हर स्थिति में संतोष रहता है। कथा पढ़ते हैं की महा प्रभु जी जब संस्कृत के अध्यापक थे तो उन्होंने 1 पाठशाला खोली थी जहाँ की संस्कृति का ज्ञान दिया जाता था। तो रोज जो वो अपने पाठशाला में जाते थे। 1 उनके भक्त थे जिनका नाम था खोला बेज। श्री खोला श्री दृष्टि से बहुत गरीब थे। उनका धंधा था क्या केले के छिलको को प्याले बनाना और फल बेचना। भगवान माँ प्रभुजी उनकी दुकान में रोज आते थे, उनसे सौदा करते थे। छोटी सी आमदन का आधा हिस्सा खुला बैचशीधरपाटते थे गंगा नदी की सेवा में, उनके पास रहने के लिए। 1 कमरा था, पहनने के लिए 1 धोती और उनके कमरे में छत भी नहीं थी। और वो सदा दिन रात, दिन रात, हर जॉब करते थे। दिन को, रात को उनके जो पडोसी है, वो कहते थे अरे, ये तो होता ही नहीं है। आदमी, यह भूखा है, खाता नहीं, कुछ तो भूत सवार हो जाता है। इतनी जोर से हरे कृष्ण का जप करता है। तो 1 समय जब महाप्रभु जी ने श्री ठाकुर के आंगन में अपने दिव्य रूप को प्रकट किया अपने 5 प्रसिद्ध भक्तों के प्रशंसा के लिए, तो उन्होंने सब से पूछा क्या? क्या वर्ल्ड चाहिए तुम्हे? जब खोला भेज श्रीधर से पूछा क्या वर्ल्ड चाहिए? मांगो साधारण व्यक्ति का धन दे। 2 खोलो भेज श्रीधर ने कहा आप मुझे वर देना चाहते हो, तो यही वर्द क्या? हर जनम में मैं आपका सेवक हूँ। श्री भगवान के नाम में ही बिल्कुल सनातन गोस्वामी के पास। 1 पर्स पत्थर था, कहाँ रखा था वो पल न्होंने कूड़े में, के के नीचे और वो असली पर पत्र था नकली, नहीं तो शुद्ध भक्ति का जो साधन है वो असली आनंद प्रदान करता है। और यही है स्वामी जी का निर्णय। फिर आगे कहते है शुद्ध भक्ति का 1 और लक्ष्य है की वो कठिनाई से प्राप्त होता है बड़ी सरलता के साथ। कई बार लोग कहते हैं हमें शुद्ध भक्ति चाहिए, पर हमें कोई नियम नहीं चाहिए। शुद्ध भक्ति कठिनाई से प्राप्त होता है। भगवान स्वयं कहते हैं क्या? क्या कहते है हाँ मनुष्य। और यह भी कहते हैं बहु नाम। तो शुद्ध भक्ति जो है कठिनाई से प्राप्त होती है। क्यूँ? क्यूंकी। शुद्ध भक्ति द्वारा आप भगवान को भी आकर्षित कर सकते। शुद्ध भक्ति द्वारा। भगवान आपके दास बन जाते हैं। जैसे पार्तसार्थिअर्जुन के रद्द को उन्होंने चलाया। आपने तस्वीर देखी होगी की भगवान नन्द महाराज के चप्पलों को अपने सिर में उठा कर ला रहे हैं कि नहीं। अपने भाग की चप्पलों को अपने शेर में उठा रहे हैं। अभी दाम का महीना आने वाला है। भगवान ने अपनी माँ तक उन्हें रस्सी से बांधने की भी इजाजत दे दी, सुविधा दे दी। तो शुद्ध भक्ति जो है प्राप्त होती है। प्रयास करने। पर यह नहीं सोचना चाहिए की प्राप्त नहीं होगी। और कठिनाई के साथ। दूसरे शब्दों में, जब भगवान देखते है की हम श्रद्दपूर्ण है, प्रयास कर रहे हैं, फिर यह प्राप्त होती है। और जो व्यक्ति शुद्ध भक्ति के मार्ग पर प्रवेश करता है वो किसी प्रकार की मुक्ति का विचार भी नहीं रखता। चेतना ने क्या कहा न न, न, न, न दे कविता जगदीश कमाए ममा, जर्मनी जनेश्वर। हे भगवान, मुझे हर जन्म में क्या चाहिए, केवल सेवा का मौका। क्या कहते है अगर अगला जन्म देना है तो दीजिए वह वैसा के घर में कीड़े के रूप में जो कीड़े चीटियां भी वैसा के घर में बड़े भाग्यशाली है क्योंकि उन्हें हर नाम तो सुनने का मौका मिलता है। तो जो व्यक्ति शुद्ध भक्ति के मार्ग में प्रवेश करते है वो मुक्ति के विचार भी नहीं करते है, यह विचार रहता है भगवान की सेवा में जुड़े है। और शुद्ध भक्ति 1 मात्र साधन है जिसके द्वारा भगवान को आकर्षित कर सकते है। भगवान को आकर्षित करने के लिए धन की आवश्यकता नहीं, बहुतिक तालिन की आवश्यकता नहीं, खुबसूरती की आवश्यकता नहीं। 1 मात्र साधन क्या है सेवा, शुद्ध भक्ति स्वीकार करने के लिए कोई भौतिक तालिन की आवश्यकता नहीं। भगवान कहते हैं पत्रम पुष्पम यो मे भक्त्या जो प्रेम और भक्ति के साथ मुझे जल्द ही अर्पण करेगा, पता दे उसे मैं स्वीकार कर लूंगा। तो संक्षेप में स्वामी जी के के लक्षणों का वर्णन करते हैं शुद्ध भक्ति के लक्षणों का, क्योंकि हम शुद्ध भक्ति क्यों अपनाते हैं यह भी हमें शास्त्र के द्वारा समझने का प्रयास करना चाहिए। तो श्रीमद भागवत का जो सन्देश है, बिल्कुल दिव्य है, इसका किसी भौतिक विचार से कोई सम्बंध नहीं और अगर हमें श्रीमद भागवत पढना है, समझना है तो भगवान के शुद्ध प्रतिनिधि के द्वारा समझना चाहिए। कई बार आप देखते हो कि कई लोग जो कृष्ण भागवत कथा करते हैं, सीधा पहुँच जाते कहा 10 से स्कंद में भगवान की रासलीला की चर्चा करने के लिए वो प्राजी कहते थे नहीं, अगर आपने 10 से स्कंद पर पहुँचा तो पहले तंत्र से शुरू करो। तो जब आप 10 वे स्कंद तक पहुँचोगे तो बिना शंका के आपके हृदय में ये विचार रहेगा कि परम भगवान जो हैं वो भौतिक गुणों के पार है। तो श्रीमत भगवत की महिमा जारी है। और व्यास देव जी ने श्रीमद भागवत की रचना की हमें शुद्ध भक्ति का ज्ञान देने के लिए और उन्हें यह प्रेरणा प्राप्त हुई थी नारद मुनि जी के द्वारा, नारद मुनि जी को ये प्रेरणा प्राप्त हुई थी ब्रह्मा जी के द्वारा, ब्रह्मा जी को यह ज्ञान प्राप्त हुआ था पर भगवान के द्वारा। तो अगर हमे शुद्ध गुरु, परम गुरु परंपरा द्वारा, ज्ञान मिले द्वारा, ज्ञान मिले द्वारा, ज्ञान मिले द्वारा, ज्ञान मिले द्वारा, ज्ञान मिले द्वारा, ज्ञान मिले हाय, कृश्णा हार, किशना क्रिष्णा हारे, हारे हम हाल।
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