कृष्ण को माखन चोर बुलाने पर कृष्ण को बहुत आनंद आता है | 29 Oct 2023 | Pune | Gopal Krishna Goswami

Gopal Krishna Goswami explains why Krishna delights when called the butter thief, then urges devotees to join Pune ISKCON's annual book-distribution marathon starting November 1st, aiming to distribute over 7 lakh Vaishnava texts across routes between Mayapur, Delhi, and Pune.
Chapters
हरे कृष्णा आज हमारा परम स्वभाग्य है। हमारे बीच में हमारे पूना के दोनो जी बी सी ने गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज और स्वामी महाराज दोनों पद आ रहे हैं। मुझे याद है बहुत सालों के पहले श्री राधा कुंज बिहारी मंदिर में ऐसे अद्भुत दीक्षा का समारोह हुआ जिसमें परम महाराज, महाराज, राजा महाराज तीनों लगभग 500 को दीक्षा दी। बहुत सालों के पहले। इस तरह आज हमारे बीच में दोनो जी बी सी उपलब्ध है। पर गोपाल महाराज के बारे में 2 शब्द बोलना चाहता हूँ। नाइनटीन सिक्स्टी फोर में, मारे दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे, उसके आगे फ्रांस और जर्मनी ऐसे प्रदेशों में जाकर बिजनेस। मैनेजमेंट मैकगिल यूनिवर्सिटी में कर रहे थे और वो 1 वैष्णव परिवार से उनका जन्म हुआ है। पंजाब में तो बचपन से उनको भगवान कृष्ण की ओर आकर्षण थी और 7 महात्माओं की ओर श्रद्धा थी।
ऐसे वो ढूंढ रहे थे।
मुझे 1 वैष्णव गुरु मिले जिनका आश्रय में ले सकता हूँ। इस तरह ढूंढते हुए गए। तो जब कनाडा में थे माटी में तब सिटी सेवन में वो कनाडा के इस मंदिर से परिचित हुए तो भक्तों को मिला महाराज को बहुत अच्छा लगा। दोपहर को संडे फीस प्रोग्राम में जाते थे और रात तक जब ब्रह्माचारी लोग दूध पीते थे सोने के पहले कुछ समय तक ठहरते थे, अनेक सेवाएं करते थे। तो 1 बार नाइनटीन सिक्टी सेवन में। भक्तों ने बोला कि शेर प्रोपाजी आने वाले हैं उस मंदिर में और उनको 1 सेवा दी। प्रपा जी के कमरे को सफाई करके देने की 1 सेवा दी थी उन्होंने की थी। और पापा जी को पहली बार मुलाकात हुई उनकी। प्रोप जी बहुत प्रसन्न हुए। महाराज को मिलकर। उन दिनों में ज्यादातर लोग पश्चात देश के लोग ही जुड़ते थे। ये भारत को सही लड़का आया है और जो बहुत श्रद्धापूर्वक जुड़ा है। प्रोप जी ने अध्यक्ष और बाकी लोगों को बोला कि इसके ऊपर ध्यान देना तो नाइनटीन सिक्स्टी एट में। उसके बाद महाराज जी को प्रपा जी से दीक्षा हुई और प्राजी अनेक सेवा दी। महाराज जी को खास करके उन्होंने बी बी टी के ट्रस्टी बनाया उनको और भारत में उन दिनों में परमपुर गोपाल, क्ष महाराज और परमपुर जयपुर स्वामी महाराज। ये दोनों बहुत वरिष्ठ भक्तों के बड़े जिम्मेदार थे। सारे भारत का जिम्मेदार था। जैसे महाराज जी कानपुर दिल्ली, मुंबई, गुजरात मायापुर से मद्रास हैदराबाद के सारे स्थानों का देखभाल करना। उसकी जी बी सी थे महाराज जय से और साथ साथ रशिया में। प्राजी ने जब सोचा की किताबें जाना चाहिए तो उनको ही नियुक्त किया। सोवियत में जाकर इन किताबों को छाप कर इनका वितरण करने की जिम्मेदारी। तो प्रभा जी ने बोला था कि तुम अलग अलग भाषाओं में इसको अनुवादित करके छापो। तो इस जिम्मेदारी को महाराज ने हृदय पूर्वक स्वीकार करके अनेक भाषाओं में प्रपज के किताबों को छाप कर उसका वितरण करने के काम चाल की प्रचुर मात्रा में की किताबें वितरण हुई। यह सब प्रपज के समय में हुई। आगे जाकर महाराज जी दिल्ली में ग्लोरिया ऑफ इंडिया प्रोजेक्ट। आप लोग जानते हो गुदरी चालू की आजकल लगभग 20 मंदिर हैं दिल्ली में और पूना के महाराज जी जी बी सी नाइनटीन ईटी टू से। तो महाराज जी इस मंदिर को शुरुआत से लेकर इसको डेवलप करने में महाराज का बहुत बड़ा हाथ है। तो नाइनटीन नाइनटी टू, नाइंटी थ्री में महाराज जिन्हें राजनाथ स्वामी महाराज के साथ बातचीत करके कुछ भक्तों को बुलाते थे। क्योंकि पूना का मंदिर उन दिनों में जुहू मंदिर के बक्तलोगीआते थे, इधर बस पार्टी में आते थे और लक्ष्मी नारायण मंदिर में प्रोग्राम चालू की थी। इस तरह उसके बाद काम का मंदिर आया तो इस तरह पर गोपरक्शमहाराजऔर राजनाथ महाराज दोनो कोलाब्रेटिव ली नाइनटी नाइन नाइंटी थ्री सी चालू किया। अनेक वक्त लोगों ने इसमें योगदान दी है। और पूना के जिस मंदिर में हम लोग इधर अभी गार्डन में बैठकर सम्मिलित हुए है यह मंदिर लगभग 5 साढ़े 561 का जमीन है। इसको लाने में बड़ा हाथ था बनर्जी नाम के 11 वृद्ध व्यक्ति था कैंप मंदिर के निकट उसको महाराज ने पर्सनली कल्टिवेट की प्रेरणा दी उसको उसके पास 1 बड़ा बालाजी का डेटी था। तो महाराज से प्रेरित होकर उन्होंने महाराज को बोला की आप बालाजी के डेट को भी ले लीजिये साथ साथ मेरे घर को भी मैं दान में दे देता हूँ। तो उनके बाद में उनके देह बेच उसमे ऐसी डेढ़ करोड़ मिला उसे जमीन जमीन प्रात होने के बाद हमारे दोनो महाराज बनाया। कैसे मंदिर का गोप्रम कैसे होना चाहिए का नाम क्या होना चाहिए, किस तरह का मंदिर हमें बनाना चाहिए, क्या क्या डेली होने चाहिए। 1 बार दोनो मरीीसीसाथमेनहोे प्लानिंग की। तो इतना सुन्दर मंदिर के कंस्ट्रक्शन में, इसके फंडरेजिंग में, प्रेजिडेंट को लाने में और इस मंदिर को चलाने में गोपाल महाराज का बहुत बड़ा हाथ है साल में लगभग 4 बार 5 बार आते हैं पूना में। इस तरह आ कर रहना देखकर। पूना में पूना के बारे में ज्यादा बोल रहा हूँ क्यूंकी पूना में महाराज बहुत बड़ा डेवलपमेंट हाथ था। इसी तरह महाराज रशिया में ही नहीं लेकिन दुनिया के कोने कोने में जाकर प्रचार करते हैं। अभी लुधियाना में तीसरा मंदिर खोला है। इस का भी बहुत बड़ा मंदिर
और
कुरु क्षेत्र में कुरुक्षेत्र में ज्योतिसर नाम के जो स्थान है, कृष्ण भगवान ने अर्जुन को आत्म बोध दी उधर बहुत बड़ा मंदिर भी बन रहा है। इस तरह हर 1 चीज हम बोल सकते है। गवर्निंग बॉडी कमिशनेस में, वरिष्ठ हमारा जी। बहुत हर मीटिंग से अभी 1 हफ्ते का मीटिंग हुआ। महाराज अपनी तबीयत का प्रवाह न करते हुए आकर मीटिंग में भाग लिया। उन्होंने। और सबसे महत्वपूर्ण चीज यह है कि महाराज के लिए प्रपज के किताबों को छापना, उसका वितरण करना उनके लिए सबसे प्रिय सेवा है। पिछले 45 सालों से महाराज जी हर बार मरतन के पहले आते थे। इस तरह के प्रवचन देकर हम को प्रेरणा देते थे। भारत होने के बाद भेंट पुरस्कार सब भक्तों को देने के लिए वापस आते थे। जनवरी में ऐसे ऐसे जब से इनकी बुना आगमन, चालू हुई, रतन के टाइम भक्तों की पेरणा दुगुना 3 गुना बढ़ गया। और इस तरह हर बार हमारे जिला डिपार्टमेंट वर्ल्ड फर्स्ट रैंक लाते हुए। लगभग 4 बार ऐसा हुआ है। तो महाराज की बहुत बड़ी करुणा कृपा है पूना के भक्तों के ऊपर, अभी महाराज की तबियत ठीक न होने के बावजूद भी महाराज जी आज हमारे बीच में पद आ रहे हैं और हमको प्रेरणा देने के लिए और महाराज ने हजारों लाखों भक्तों के लिए प्रेरणा दायक है सारी दुनिया में और हमारे भाग्य सौभाग्य है कि हम इनके साथ संग कर पा रहे हैं, इनका प्राप्त कर रहे हैं और इनका ध्यान हमारे पूर्ण मंदिर के ऊपर है, भक्तों के ऊपर है। यह हमारा बहुत बड़ा सौभाग्य है। आइये का स्वागत करते हैं। रामचंद्र मंदिर में हरे कृष्ण महा मंत्रालय बोला है। कृष्ण, हरे कृष्णा, कृष्णा, कृष्णा, हरे हरे हरे राम, हरे राह
थोड़ी खराब है और रेशम की मैं थोड़ी देर बोलूंगा
राधे श्याम थोड़े समय महाराज की तबियत और गला गले की वजह से वो थोड़ी देर बोलेंगे और उसके बाद वह पूजा राधानाथ साई। महाराज बोलेंगे है कृष्ण
वा बहुत हल्की है। तो इसलिए बोलूंगा ठीक है,
महाराज करे, उनकी आवाज हल्की है। इसलिए जो वो बोलेंगे उसको रिपीट किया जायेगा। नमो भगवते वासुदेव, नम भगवते वासु दे देवा, ओम, नमो भगवते वा सुदेवा।
या जैसा आप जानते हो, वो शुभ अवसर है। आज क्या है कार्तिक महीने का पहला
आप जैसे जानते हो। आज बहुत ही शुभ अवसर है। आज कार्तिक महीने का पहला दिवस है
और कार्तिक के महीने में भक्तों का भाव होता है।
वह भक्ति बढ़ाए और कार्तिक महीने में भक्तों का भाव होता है कि वो भक्ति बढ़ाए।
कार्तिक के महीने में हमें प्रयास करना चाहिए कि हम श्रम के जनम बढ़ाये।
कार्तिक के महीने में हमें प्रयास करना चाहिए कि हम श्रवण कृत्रम में लगे।
कहा जाता है कि 12 महीनों में कार्तिक महीना सबसे उत्तम, ऐसा कहा जाता
है कि 12 महीनों में यह कार्तिक महीना सबसे उत्तम है।
और महीने में थोड़ी भी सेवा करोगे,
लाभ मिलेगा और कार्तिक महीने में आप थोड़ी भी सेवा करोगे तो उसका हजार गुना लाभ। मिलेगा।
और कार्तिक महीने में कई दिल लिलाये हुई है। भगवान के भक्तों भक्त की और कार्तिक
महीने में भगवान की और उनके भक्तों की कई दिव्य लिला हुई है।
कार्ति के महीने में दिवाली मनाते हैं,
जैसे कार्तिक महीने में दिवाली मनाते हैं।
हमारे गुरु और प्रकट हो गए कार्तिक
के महीने में और उनके गुरु महाराज ने शिलप्रउपाजजी अप्रकट हुए, वो भी कार्तिक
के महीने में, कार्ति के महीने में थोड़ी भी भक्ति करो, उसका लाभ है।
कार्तिक के महीने में थोड़ी भी भक्ति
करेंगे तो उसका लाभ है, वैश्य भक्त हैं, वो प्रयास करते है की कार्तिक के महीने में हम
जो वैष्णव भक्त है, वो प्रयास करते हैं कि कार्तिक के महने में हम हमारा चैंटिंग और
हेरिंग बढ़ाए, हमें यह नहीं सोचना चाहिए। सोला माला मैक्सिमम, हमे ये नहीं सोचना
चाहिए कि 16 माला मैक्सिमम है।
बाबाजी ने जब संस्था की स्थापना की, उन्होंने कहा 5 सौ न्यू यॉर्क में 64 माला करो।
दिन में जब भक्तजन सरस ठाकुर ने संस्था की स्थापना की तो उन्होंने 64 माला जप करने का विदान दिया था
भक्त ने, उस समय केवल अमेरिकन भक्त
है
समय केवल अमेरिकन भक्त थे, उस
समय केवल अमेरिकन भक्त थे। तो उन्होंने कहा कि स्वामी जी ये बहुत मुश्किल है,
20 माला करो।
तो प्रवुपाशजी ने कहा कि 64 नहीं तो फिर 32 माला करो। तो उन्होंने कहा कि यह भी कठिन है। तो प्रवुपाशजी ने कहा कि सिक्स्टीन और
9 ले जो कार्तिक के महीने में कई प्रयास करते हैं, चौसठ माला करना 32 माला, 16 से अधिक।
तो कार्तिक महीने में कई भक्त प्रयास करते हैं कि 64 माला करे या 32 माला करे, लेकिन 16 से आगे करे।
कार्तिक के महीने में सेवा हजारों
और कार्तिक महीने में जो भी सेवा करेंगे उसका हजार गुना लाभ है।
दामोदर लीला भी कार्तिक महीने में हुई,
भगवान की दामोदर लीला भी कार्तिक के महीने में हुई थी, दम लीला
दिवाली के,
दामोदर लीला दिवाली के दिन हुई थी।
शीला भक्तों प्रिय है और दामोदर लीला
भक्तों के लिए बड़ी प्रिय है।
शोध मासा खूब बकाला कम्पेन्स, शोध मासा, यशोदा माता को कई लोग कम्प्लेन किया,
यशोदा माता को गोपियों ने कम्प्लेन किया
कि आपका बेटा हमारे घर में आता है
कि आपका बेटा राने के लिए, आपका बेटा हमारे घर में आता है माखन चुराने के लिए।
माता ने कहा बेटा तुम्हारे घर क्यों आये, हमारे पास 9 लाख गाय है।
तो यशोदा माता ने कहा की मेरा बेटा आपके घर क्यूँ आये, हमारे पास 9 लाख गाय है,
व्यक्ति की सम्पति थी गाय और खेती, तो उस समय
व्यक्ति की संपत्ति हुआ करती थी, गाय
और खेती अंदाजा लगाओ 9 लाख,
जरा अंदाजा लगाइए 9 लाख गाय है उन
20 गायें थी जिनके फ्लेवर्ड दूध देती
थी तो उनमें उनमें से 20 गाय थी जिनका दूध सुगंधित हुआ करता था, फ्लेवर हुआ जैसे जैसे आप वनीला डालते हो आपके तो उसी प्रकार से वो 20 गाय जो थी उनसे फ्लेवर दूध मिलता था।
भगवान शरारती थे, भगवान शरारती थे
और भगवान और भगवान बड़े शरारती थे।
माता के मन में चुराता है चोर।
तो ये श्रोता माता के पास अनेक कंपलेंट आती थी कि आपका बेटा जो है माखन चुराता है। भगवान के अनेक नामों में 1 नाम है माखन चोर आप कभी आपको कोई
चोर बुलाए तो आप सह लोगे, तो
आपको कोई चोर बुलाए तो आप सह लोगे
बड़ा आनंद लेते है तो आपको
बड़ा गुस्सा आएगा, लेकिन भगवान को अगर माखन चोर बुलाते है तो भगवान को बड़ा आनंद आता है।
तो
इस प्रकार यशोदा माता नहीं दही दही मत दीथी। तो उनका भाव था कि ये जो है में मेरे बेटे को खिलाऊं
भगवान माता प्रयास किया बांधने के लिए।
तो ये श्रोता माता ने प्रयास किया भगवान को बांधने के लिए माता भगवान
को ही देना चाहती।
श्रोता माता भगवान को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहती थी।
शोध माता ने सोचा ना तो नहीं है, बाँध लेते हैं।
तो ये शोध माता ने सोचा कि इसको मारना ठीक नहीं है लेकिन इसको
बांध के रखते हैं तो वो घर नहीं छोड़ दे, मानू तो घर नहीं छोड़ दे
तो उनको डर था कि अगर मैं उनको मारूंगी तो घर न छोड़ दे
भगवान के लिए, तो उन्होंने
रस्सी ली और रस्सी से प्रयास किया भगवान को बांधने के लिए, 1 उखल के साथ भगवान को बाँधने की चेष्टा
थी
बड़ा प्रयास किया माता ने हमेशा,
तो माता ने बड़ा प्रयास किया लेकिन हमेशा वो डोरी जो हुआ करती थी वो 2 उंगली छोटी हुआ करती, 1
दूरी सी 2357 दुनिया थी उन सबको
दिया पहले 1 डोरी से बांधने का प्रयास किया लेकिन वो 2 उंगली छोटी हुई, तो फिर 234-5678 शहर में जितनी भी डोरिया थी उसको जोड़ को बांधने का प्रयास किया तो फिर भी वो 2 ऊँगली छोटी हुआ करती थी।
तो भगवान ने देखा ये मेरी माँ जो है उसके ऊपर बाकी गोपियाँ हँसी हुई है देखो यशोदा माता में इतनी शक्ति नहीं है पर बेटे को बाल के लिए।
तो भगवान ने देखा कि बाकी गोपियाँ जो है मेरे माँ पर हँस रही है और कह रही है कि देखो यशोदा माता में इतनी भी शक्ति नहीं है कि वो अपने बेटे को बांध सके, बांध लो तो भगवान ने स्वीकार किया और कहा कि आप बांध लो,
मुझे दम लीला के गुनगान करते है
ये संक्षेप में दामोदर लीला थी और जो वैष्णव भक्त है उनके लिए ये बड़ी महत्वपूर्ण और प्रिय लीला है कि
महीने में 1 मंदिर था जिसमें 1
चूहा था, कार्तिक के महीने में 1
मंदिर था जिसमें 1 चूहा था चुआ्ादामंदिर
चखने के लिए, तो चूहा जो है वो मंदिर जाता था भगवान के गर्भ गृह में घी चाटने के लिए दिए गा इसकी आदत थी उसकी आदत थी।
तो ये जुआ ने देखा की 1 में थोड़ी सी पत्ती जल रही है कोने,
तो चोर ने देखा कि 1 बत्ती में घी है और उसकी जो बत्ती है वो बड़ी धीमी जल रही है।
तो उसने सोचा
तो उसने सोचा की मैं जाकर उस घी को चाहूँ, उसकी
जो थी
जो मूंज जो थी रुई वो वो रुई जो थी वो दात
में चिपक गई, प्रयास किया हटाने के
लिए, तो उसने प्रयास किया कि वो रुई को हटा सके हटाने के लिए प्रयास किया
प्रयास कर रहा था
तो वो जल्देजल्ते रूई लगी थी और प्रयास कर रहा था निकालने के लिए, लेकिन वो जैसे भगवान को दिया ऑफर कर रहा था उस प्रकार से
ज्यादा सरल भगवान का दर्शन दे सके प्रयास किया आप को निकालने के लिए बड़ा दिया था लोग भगवान का दर्शन ले सके
तो वो प्रयास कर रहा था की रुई जो फंसी उससे निकाले लेकिन वो धस गयी थी और जो जल रही थी उसके प्रकाश से लोगों को भगवान का दर्शन लेने में सहायता हुई और
सेवा मुक्ति प्राप्त हुई और इस कुछ
सेवा के लिए उसे मुक्ति प्राप्त हुई।
यह कथा पद्म पुराण में है।
तो ये कथा जो है पदम पुराण में है और ये कार्तिक के महीने में घटी थी।
तो आज के प्रो का मूल संदेश क्या है? कौन बताएगा?
तो आज के इस पर्व का मूल सन्देश क्या है?
कौन बताएगा आज का विषय क्या है?
आज का विषय क्या है?
आज का विषय है, ग्रंथो का वितरण,
आज का विषय है ग्रंथों का वितरण, ग्रंथों का वितरण।
आप जैसे जानते हो पापा जी ने वो ही बल दिया है इस सेवा के ऊपर।
तो जैसे आप जानते हो की प्रौपाजी ने बहुत बल दिया है इस सेवा के ऊपर।
मैं अक्सर भक्तों को कहता हूँ की सबसे पहले बुक डिस्ट्रीब्यूटर से ठाकुर,
तो
मैं भक्तों को हमेशा कहता हूँ की सबसे पहले बुक डिस्ट्रीब्यूटर जो थे वो थे ठाकुर भक्त विनोद
से पहले प्रिंटिंग डेवलप नहीं हुई थी, वो छाप नहीं सकते थे।
तो ठाकुर भक्त विनोद के पहले प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी नहीं थी, तो वो छाप नहीं सकते थे, ग्रंथों को,
ठाकुर आचार्य थे,
ठाकुर भक्तिनों जो थे वो बड़े ही महान आचार्य थे। और उन्होंने चेतन्य महाप्रभु की शुद्ध शिक्षा
की स्थापना की, उन्होंने ग्रंथ लिखा था चेतन महा प्रभु के जीवन के ऊपर,
तो उन्होंने 1 ग्रंथ लिखा था चेतन महाप्रभु जी के जीवन के ऊपर, और
उन्होंने विश्व के अनेक प्रसिद्ध विद्या में
11 कॉपी भेजी और उन्होंने विश्व के अनेक प्रसिद्ध महाविद्यालयों में और पाठशालाओं में उसकी 11 कॉपी भेजी थी।
मुझे कैसे पता मोनट्रियल कनाडा में मैकगिल
यूनिवर्सिटी है मोंट्रियल कैनाडा में मैगिल यूनिवर्सिटी
और मैगिल यूनिवर्सिटी की लाइव में, प्रापा जी का 1 शिष्य रिसर्च कर रहा
था मैगिल यूनिवर्सिटी के लाइब्रे में प्रापा जी के 1 शिष्य जो हैं वो रिसर्च कर रहे थे ओह, तो वो
देख रहा था क्या किताबें हैं लाइबरेरी
में, तो वो देख रहे थे कि लाइब्रेरी में क्या क्या किताबें हैं और
वहाँ उसको पुस्तक मिली और वहाँ उनको
भक्त ठाकुर की ये पुस्तक मिली अंदाजा
लगाओ, एई टीन नाइनटी नाइनटीन नाइनटीन सिस्ट सेवन तक को,
तो अंदाजा लगाइए एटीन नाइन टी सिक्स में प्रोप जी प्रकट हुए थे, और वो किताब नाइनटीन सिक्टी सेवन तक उस लाइब्रेरी में पड़ी थी
ये जो किताब है भारत से, वे पोस्ट पता किस रूप से भेजा, वो भेजा था टीन नाइंटी सिक्स में, तो
ये किताब जो है भारत ऐसी पोस्ट से या फिर किस तरीके से भेजा था पता नहीं लेकिन वो एटीन नाइंटी
सिक्स में भेजी थी आम सौरी ठाकुर ने मैगी यूनिवर्सि को भेजा था ये किताब।
तो भक्तिन ठाकुर ने मैगी यूनिवर्सिटी भेजी
थी ये किताब इससे अंदाजा लगा सकते हो की किताबों का कितना प्रभाव है
तो इससे अंदाजा लगा सकते है की किताबों का कितना प्रभाव है।
तो भक्ति के परम गुरु थे, उन्होंने भी इस सेवा पर बल दिया।
तो भक्ति सिद्धांत सर्वत्र ठाकुर जो की प्रोपज के परम गुरु है, प्रोप जी के गुरु महाराज है, उन्होंने भी इसके ऊपर बल दिया।
चास में अनेक श्लोक हैं जिनके द्वारा 4 की सेवा महिमा बताते हैं।
तो शास्त्रों में ऐसे अनेक श्लोक हैं जिनके द्वारा प्रचार की महिमा को उजागर किया गया है और उसकी महिमा पता चलती है।
4 की सेवा को बहुत बल दिया
ेतरमहापरुजी ने प्रचार की सेवा पर बहुत बड़ा बल दिया है।
क्या कहा उन्हों को उपदेश, उन्होंने कहा
जा रे देखो तारे कहो कृष्ण उपदेश
कृष्ण का उपदेश 2 आप जिससे भी
मिली है उसको कृष्ण का उपदेश 2
तो कृष्ण का उपदेश का अर्थ क्या है?
तो कृष्ण उपदेश का अर्थ क्या है?
गीता भागवत का सन्देश, गीता भागवत का सन्देश। तो भगवान गीता के वे में कहते हैं सब भक्तों में सबसे प्रिय कौन है? जो मेरा प्रचार करता है।
तो भगवान गीता के अठारहवें अध्याय में कहते हैं कि सब भक्तों में सबसे प्रिय कौन है जो मेरा प्रचार करता है।
हर भक्त प्रयास करता है।
तो हर वक्त प्रयास करता है कि की हम कोई प्रसिद्ध व्यक्ति के प्रिय बने है।
तो भगवान कहते है वो है जो की प्रचार करता है।
तो भगवान कहते हैं कि सब भक्तों में वो प्रिय हैं जो की प्रचार करता है
को कहा तुम भगवान को प्रसन्न करना चाहते हो कर दिया है।
तो भागवत के चौथे सिकंदर में नारद मुनि जी ने प्रचेता कहा की दया सर्वभूतेशु संतुष्ट है या न के नवा। अगर आप भगवान को प्रसन्न करना चाहते हो तो आपको प्रचार करना चाहिए।
दया दया की भावना होनी चाहिए, दया
दया की भावना होनी चाहिए। यह बहुत आवश्यक है, यह बहुत आवश्यक है।
वैष्णव भक्त है वो इसके ऊपर बहुत आदर देता है।
जो वैष्णव भक्त है वो इसके ऊपर बहुत ज्यादा बल देते हैं।
हमें दया की दया प्रयास चाहिए।
तो दया की भावना हमें विकसित करने के लिए प्रयास करना चाहिए।
तो भगवान को पीला देव भी कहते हैं दया की भावना।
तो कपिल मुनी भी कहते हैं कि जो भक्त हैं उनका 1 लक्षण है उनमें दया के भाव न हो।
सी ठाकुर ने इस सेवा को बहुत बहुत बल दिया।
तो भक्तजन ठाकुर जी ने भी इस सेवा पर बहुत बड़ा बल दिया, उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस खोली, उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस खोली
और जाते थे को बाटने के लिए दादाजी होते है।
तो जब उनके भक्त जाते थे कलकत्ता में ग्रंथों को बाटने के लिए, तो बक्से ठाकुर बड़े प्रसन्न होते थे।
1 समय बाबा जी के साथ थे, भक्ति से जी के साथ थे राजापुर 1900 पैतीस में
तो प्रवपजजीबकसिंस ठाकुर के साथ राधा कुंड में 1935 में
जी 1 बड़ी यात्रा को लाये थे ब्रज में उस समय दादा जी बड़ी यात्रा को लेकर आये थे।
तो उस समय बक्सें बड़ी यात्रा को लेकर आये थे।
राधा कुंड में जो की जी ने 1 मृदंग की तस्वीर बनाई तो बक्से
ठाकुर ने 1 मृदंग की तस्वीर बनायी।
भगवान कुछ दे सुविधा दे ग्रंथो को अनुवाद करो प्रकाशित करो तो उन्होंने कहा
कि अगर आपको भगवान सुविधा दे तो ग्रंथों को प्रकाशित करो और उसको वितरित करो सुबक्ीसिधाजीने।
1922 में पापा जी के 1 मित्र थे इसने कहा चलो यहाँ 1 बड़ा प्रसिद्ध संन्यासी है।
तो 1922 में प्रोप जी के 1 मित्र थे। उन्होंने प्रोप जी से कहा की चलो यहाँ पर 1 बहुत प्रसिद्ध संन्यासी आये है।
पापा अनेक संतो को मिल चुके थे
तो प्रोप अनेक संतों को मिल चुके थे।
उनके े हर प्रकार के साधु की
देखभाल करते थे तो उनके पिता गौर मोहन, डे हर प्रकार के साधु की देखभाल करते थे।
और परिचय हुआ था अनेक संतों के
साथ, तो प्रपा जी का अनेक संतों के साथ परिचय हुआ था, किसी से
प्रभावित नहीं हुए, लेकिन प्रपात किसी से
भी प्रभावित नहीं हुए।
जब साधु है पाजी ने कहा बहुत साधु का हूँ।
तो जब उनके मित्र ने कहा कि 1 साधु आये हैं, चलो मिल लो। तो प्रोपज ने कहा कि मैं बहुत साधुओं से मिल चूका हूँ,
चाहता तुम्हें
मिलना नहीं चाहता हूँ
बोला फिर से, और फिर प्रॉपर जी मिले,
तो उनके जो मित्र थे, उन्होंने बड़ा आग्रह किया। तो फिर प्रपज मिले बक्सा ठाकुर से
उस पहली मुलाकात में जी समझ गए। ये है वो युवक जो की हवा के सन्देश को, देश को,
तो पहले ही मुलाकात में प्रापा जी समझ गए कि ये है वो युवक जो चेतन महाप्रभु के संदेश को सम्पूर्ण पृथ्वी पर प्रचार करेगा पर
सदा रहता है।
तो प्रोप जी के हृदय में सदा ये भाव रहता था कि मैं मेरे गुरुमाराज जी के आदेश का पालन करूँ।
पापा जी कहते थे गुरु को कहते है स्ट्रक सदा गुरु के आदेश का पालन करने का प्रयास किया।
तो प्रपज ने भागवतम का पहला स्कन्द जो है अपने गुरु महाराज को समर्पित किया है और उन्होंने सदा अपने गुरु के आदेश का पालन करने का प्रयास किया है।
जैसे
तू जैसे स्क संस्था, जैसे इस्कॉन संस्था बढ़ रही है, वैसे पुस्तक वितरण भी बढ़, तो जैसे ही इस्कॉन संस्था बढ़ती गई वैसे ग्रंथों का वितरण भी बढ़ते गया,
किया क्यूंकि प्रोपाजी को उनके
गुरु महाराज का ये आदेश था।
तो पापा जी विदेशों में जाने से पहले भी उन्होंने ग्रंथों का आयाम कर दिया था।
तो प्रोपाजी विदेश जाने से पहले उन्होंने ग्रंथों का अनुवाद जो है वो प्रारंभ किया था।
प्रापा जी जाते थे राधा में आते थे अपनी किताबों को,
तो प्रोप जी राधा दामोदर मंदिर, वृंदावन में रहते थे, पर दिल्ली आते थे अपने किताबों को छापने के लिए और वितरित करने के लिए गए। तो प्रपा जी फिर आ गए छिपिवाडा में, जहाँ पर वो रहते थे
आर, आज कल का सुन्दर मंदिर है, उस
साल में आज एस्कॉन का 1 बहुत ही सुंदर मंदिर है, उस स्थान पर
कोई धन नहीं था, लेते थे, आते थे, साल पर पहुँचते थे।
तो प्रोपर जी तांगे से आते थे, वृंदावन से मथुरा और मथुरा से दिल्ली ट्रेन के थर्ड क्लास डिब्बे में प्रवास करते थे और दिल्ली आकर अपने स्थान पर पहुंचते थे और
करने के लिए,
तो दिल्ली में दिल्ली में प्रोप जी ने बहुत समय बिताया क्योंकि वो प्रथम स्कंध का अनुवाद करना चाहते थे और उसको छापना चाहते थे।
3 भागों में प्रकाशित किया।
प्रोपाजी ने फर्स्ट कैंट जो है भागवत 3 भागों में प्रकाशित किया इस। तो उससे पहले प्रहुपाजीबैकटोगोर्डेड मैग्जीन छापते थे,
वो बैकटूगॉरडेडआजकी बैक्टोगॉरडेडके लिए समान नहीं था,
1 टेबल था, वो बैक्टोगॉ्डेड आज के बैक्टोगोडेडकी तरह नहीं था, लेकिन 1 सिम्पल पेपर हुआ करता, उन्होंने लिखा
नो टाइम
1 लेख, उन्होंने लिखा था बैक्टोगॉर्डेड में, जिसका शीर्षक था सौरी नो टाइम, उसे
बताया है प्रोप कहते हैं मैं इस व्यक्ति को मिलने गया था स्वामी जी
ने
तो उस आर्टिकल में प्रोपर जी लिखते हैं कि मैं 1 बड़े प्रसिद्ध व्यक्ति को मिलने गया था लेकिन उसने कहा कि स्वामी जी अब जानते हो मैं कितना व्यस्त हूँ आई हैव नो टाइम फॉर आल दीज थिंग।
अगले दिन उसका हार्ड हो गया और
अगले दिन उनको हार्ट अटैक हुआ तो प्रहपाजी ने ये आर्टिकल लिखा और उसको शिक्षक दिया सौरी नो टाइम। तो प्रहपाजी इस प्रकार ऐसे इशूज पर
लिखते थे तो पापा जी ने जब वो भारत से निकल गए थे तो
प्रहपाजीजब भारत से निकले जल जहाज में तो अपने साथ भागवतम का प्रथम स्कंद लेकर गए।
पापा जी ने जहाज में डिस्ट्रीब्यूशन किया
तो प्रपा जी ने उस जहाज पर भी बुक डिस्ट्रीब्यूशन किया तो इस प्रकार परोपा जी के मन में सदा होता था कि वो अपने गुरु के आदेश का पालन करे ापरेथेप्रोपाजी पहले बैकटोगोरडेड छोटी पत्री का छापते थे
मोटी किताब मो
छापो तो प्रोप
का अनुवाद करो।
तो प्रपा जी को 1 व्यक्ति ने कहा कि आप छोटी छोटी पत्रिका की छापते आप बड़े ग्रंथों का अनुवाद करो
और उसको
तो प्रउप जी ने भागवत का अनुवाद करके उसका प्रचार शुरू किया।
तो you want to please मी डू डिस्ट्रीब् करना चाहते हो क्या करो?
तो प्रपा जी ने हमेशा ये कहा है अगर आप मुझे प्रसन्न करना चाहते हो तो आप ग्रंथों का वितरण करो
क्या कारण है पापा जी ने तो
क्या कारण है कि प्रोप जी ने ग्रंथों की महिमा को इतना अधिकत किया
क्यूँ की इन ग्रंथों में दिव्य ज्ञान जो की परम भगवान दे रहे है हमारे भलाई के लिए, क्यूँकि ये ग्रंथों
में दिव्य ज्ञान है जो कि परम भगवान दे रहे हैं हमारी भलाई के लिए।
आज के समाज में अनेक पुस्तक प्रकाशन हुआ और बात है के विषय में
तो आज के समाज में अनेक पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है लेकिन ये बड़े दुख की बात है कि उसमें केवल इंद्र तृप्ति के विषय ही लिखते
हैं सो जैसे स्कोर बड़ा कॉम्पटन
बो तो जैसे ये इस्कॉन संस्था बढ़ती गई वैसे यह ग्रंथ वितरण भी बढ़ता गया और फिर प्रपा जी ने 1 ट्रांस कॉम्पिटिशन का बीज बोया
ट्रांस कॉम्पीशन
तो
प्रपा जी कहते थे की डिस्टांट कॉम्पिटिशन
विल लीव मेल आती थी। सबसे पहले वो कहते थे
तो प्रपा जी को कभी भी कोई मेल आती थी। तो सबसे पहले वो कहते थे कि
छुट्टिया देते थे जो पोस्ट आई है
तो उस समय ये ईमेल वगैरह नहीं था तो प्रपा जी को जो भी कम्यनिकेशन होता था वो बाय पोस्ट आता
था, सबसे पहले वो कहते थे रीड
बुक कोल्स, तो जब भी कोई रिपोर्ट आता था तो वो सबसे पहले कहते थे कि रीड बुक डिस्ट्रीब्यूशन कोर्स
की सेवा और बहुत बल दिया प्रोप जी
ने ग्रंथों के वितरण की सेवा पर बहुत बल दिया।
हर भक्त को ज्ञान है, हर भक्त का यह ज्ञान है,
इस कौम में, हर भक्त के पास है, ये ज्ञान
है वितरण
ग्रंथों के वितरण के महिमा
का, तो आपका पूरा मंजर भारत में बड़ा कॉम्पिटिशन होता है मंदिरों के बीच,
तो भारत में कई मंदिरों के बीच में बड़ा कॉम्पिटिशन होता है, बड़े मायापुर
है,
बड़ी सेना के साथ सौ से
भी ज्यादा तो मायापुर है और अनेक ऐसे सौ से भी ज्यादा। मंदिरों के बीच में ये कॉम्पिटिशन होता है।
आपका पूरा मंदिर वो भी पहले 3 या 4 में आये।
तो आपका पूना मंदिर जो है ये पहले 3 या 4 में आता है मंदिर
के लिए।
तो जो बड़े मंदिर है वो सब प्रयास करते हैं, जैसे बॉम्बे है प्रयास करते है की ग्रंथों को अधिक से अधिक बाँटा जाए।
पिछले साल आपके मंदिर में प्रयास से 6 लाख महा बुक किया तो पिछले
साल जो है आपके मंदिर ने प्रयास करके 6 लाख महा बुक्स का वितरण किया था,
5 लाख
सो उससे उसके पहले साल जो है 5 लाख महा बुक्स का वितरण हुआ
ये साल का क्या कोटा करे।
तो मैं सब से पूछ रहा था कि ये साल का क्या आपका टारगेट
और कोटा है पूछ रहे थे क्या है?
तो मुझसे पूछ रहे थे भक्त की इस साल हमारे लिए क्या टारगेट है,
पिछले साल किया था उसे पिछले साल 5 लाख 1 1 लाख से बढ़ा
हो, हर साल तो पिछले साल 6 लाख किया, उसके पहले 5 लाख किया, आप हर साल 1 1 लाख से अपना टारगेट बढ़ा रहे हो।
तो उन्होंने कहा की 7 लाख होना चाहिए तो
इस साल 7 लाख का
टारगेट होना चाहिए, हर साल समय भक्त चिंता में आ जाते हैं।
तो हर साल मरतन के समय भक्त जो है वो चिंता में आते हैं।
वो कहते हैं हम लोग सब व्यक्ति को मिल लिया, सब कंपनियों को मिल लिया
तो उनमे चिंता होती है की हम सब व्यक्तियों को मिले, हमारे जो भी पहचान के हैं हर को हर 1 को पुस्तक वितरण किया इस साल
किसको करे और आप मानोगे नहीं भगवान कोई न कोई नया साधन देते हैं
तो आप मानोगे नहीं लेकिन भगवान कोई न कोई नया साधन दे ही देते हैं।
मैंने देखा है जो ो में बड़ा उत्साह है आपके फुल टाइम ब्रह्माचारी में और दोनो मिलकर करते हैं, आपके पुना
के भक्तों में बड़ा उत्साह है, आपके ब्रह्मचारी भक्त और कांग्रिगेशन दोनो मिलकर बुक
डिस्टिपयूशन करते हैं और लगभग भारत के हर में हो रहे हैं। भारत के हर मंदिर में किसी प्रकार से बुक डिस्ट्रीब्यूशन हो रहा है और
भारत के हर मंदिर में इसी प्रकार से बुक डिस्ट्रीब्यूशन हो रहा है।
और करते हो आपको प्रकार सम्भव है
आप जब प्रचार करते हो तो 3 प्रकार से इसे करना संभव है
क्लास जाओ घर घर लो घर जाकर निवेदन करो इस शिक्षा को स्वीकार करो। तो हरिदास ने महाप्रभु के आदेश का पालन किया क्या सा अनुभव तो चेतना
महा प्रभु जो है वो हरिदास ठाकुर और नित्यानंद प्रभु को उपदेश दिए की जाओ घर घर और कृष्ण की शिक्षा का प्रचार करो और नित्यानंद प्रभु। हरिदास ठाकुर ने उसका पालन किया।
साधु जी क्या है आपका आदेश तो
1 घर में गए तो उनका स्वागत हुआ और उनको कहा गया। कि आओ साधु जी क्या है आपका आदेश बताइए तो वो कहते थे कि बोलो कृष्ण, भजो कृष्ण, करो कृष्ण शिक्षा
पर, कई घरों में उन्होंने कहा क्यूँ हमारा टाइम वेस्ट कर रहे हो? तो कई कोई रूचि नहीं है, तो
कई घरों में उनको उत्तर मिला कि क्यों हमारा समय बर्बाद कर रहे हो, हमें कोई रुचि नहीं है।
और घर में गए, लोगों ने कहा हम जब आये थे तुम्हारे का दर्शन लेने के लिए आपने दिया, तो कई
घरों में गए, तो लोगों ने कहा की हम जब आये थे और महाप्रभु जी के संकीर्तन का दर्शन करने के
लिए, तो आपने हमें रोका था सालगा,
तो महा ब्रुज ने श्रीवास आंगन में 1 साल तक नित्य कीर्तन किया
और जब वो घर घर जा रहे थे, किसी ने कहा ये तो चोर है, साधु के कपड़े आये हैं देखने के लिए, हमारे घर में क्या है?
तो नित्यानंद प्रभु और हरिदास ठाकुर जब जाते थे तो कुछ लोग कहते थे की ये जरूर चोर है साधु के भेष में आये हमारे घर में देखने के लिए कि घर में क्या क्या
है वे रात को आयेंगे चोरी करने
के लिए, फिर रात को आएंगे, ये चोरी करने के लिए, वो ऐसा कहते
थे, वो हरिदास और नित्यानंद हँसते थे,
ऐसा कहते थे, तो हरिदास और नित्यानंद
हंसते थे, तो इसी प्रकार हमारा भी
अनुभव है, तो इसी प्रकार हमारा भी
अनुभव है, कई कान में आ जाओगे, लोकेंगे ओह थैंक यू गए
तो कई स्थानों पर आ जाओगे तो लोग कहेंगे बहुत बहुत धन्यवाद आप आये नि ग्रंथों को देने के लिए, कई घरो में
आओगे लोकेंगे क्या है क्या?
तो कई घरों में जाओगे तो लोग कहेंगे कि आपको और कोई धंधा नहीं
है क्या हमारा टाइम वेस्ट कर रहे
हो, हमारा टाइम वेस्ट नहीं करो, कर रहे हो, वेस्ट कर रहे हो तो
हमे डिस्करेज नहीं होना चाहिए तो हमें
इससे डिस्करेज नहीं होना चाहिए, हम प्रचार
करते है, शु भी एक्सपेक्टेड एक्सपेक्ट एनीथिंग प्रचार करते कुछ भी नतीजा प्राप्त हो सकता है।
तो जब आप प्रचार करते हो तो ये सब की अपेक्षा करनी चाहिए कि लोग आपको इस प्रकार से दुत्कार दे
तो गीता लेंगे और कहीं नहीं लेंगे,
कई आपके द्वारा गीता लेंगे और कहीं नहीं लेंगे?
भगवान देखते है, हमारे प्रयास को, भगवान
देखते है, हमारे प्रयास को और
उत्साह
बहुत आवश्यक है और ग्रंथ वितरण के लिए उत्साह बहुत आवश्यक है।
चाहे हो हो, हमें उत्साहित होना चाहिए
तो आप ब्रह्मचारी हो या ग्रहस्त हो, हमें उत्साह होना चाहिए ज्यादा सफलता प्राप्त
नहीं हुई तो डिस्करेज नहीं होना चाहिए
और अगर सफलता प्राप्त नहीं हुई तो हमें डिस्करेज नहीं होना चाहिए।
1 समय बॉम्बे में 1 बड़ी दुकान है, इंटरनेशनल बुक हाउस तो बॉम्बे में
1 नेशनल बुक हाउस करके 1 दुकान
है सो उसके मालिक हमारे मेम्बर थे,
तो उसके मालिक आये थे, हमारे मेम्बर थे, मालिक हमारे मेम्बर हैं सो मैंने
उनके द्वारा पापा जी के ग्रंथों को
बहुत डिस्प्ले किया तो मैंने उनके द्वारा प्रापा जी के ग्रंथों को डिस्प्ले किया
में और 1 महीने के बाद मैंने जाना किताबें नहीं बिकी तो काफी सारा
डिस्प्ले उनके दुकान में हो लेकिन 1 महीने के बाद देखा तो ज्यादा किताबें
वितरित नहीं हुई थी मैं पापा जी के पास गया बोला वी हैड द बेस्ट डिस्प्ले एवरीथिंग मेरी बुक व सोल
तो मैं प्रोपाजी के पास गया और मैंने कहा की हमारा बहुत अच्छा डिस्प्ले था लेकिन हमें इतनी सफलता नहीं मिली
ने कहा माई बोक्स सो
तो प्रोपाजी ने कहा की मेरे ग्रंत वितरित होते हैं मेरे भक्तों के उत्साह की वजह से
स्वामी कहते हैं। तो हमें उत्साहित होना चाहिए जहाँ हम इन ग्रंथों को
तो रूपों को स्वामी भी कहते हैं उत्साह निश्चय तो हमें उत्साही होना चाहिए जब हम इन ग्रंथों
को बाटने जाए असल में हमें उत्साहित होना चाहिए हर प्रकार की सेवा के,
तो असल में हमें उत्साहित होना चाहिए हर प्रकार की सेवा के लिए, खास
कर के जब आप बुक डिस्ट्र जाते हो आपको हमें उत्साहित होना चाहिए लेकिन
खास करके जब आप बुक डिस्ट्रीब्यूशन पर जाते हो तो हमें विशेष रूप से उत्साहित होना चाहिए।
तो हमारा लक्ष्य है ग्रंथों को बात है समाज के उधार के लिए, तो
हमारा उद्देश्य यह होना चाहिए की हम ग्रंथों को बाट रहे है दूसरों के
उद्धार के लिए स कितनी गिर गई है।
तो आज आप देखते है की समाज की स्थिति कितनी गिर गई है सब दुखी है सब दुखी हैं।
महा प्रभु की 1 भक्त था दुखी दासी, महाप्रभु के महा प्रभु के 1 बक्से
दुखी दासी तो महाप्रभु के 1 भक्त थे जिनका नाम था दुखी दास।
क्या है तुम्हारा नाम दुखी दासी।
तो आप लोगो ने उनको पूछा की क्या है तुम्हारा नाम तो उन्होंने कहा दुखी दासी
दुखी।
तो आप लोगों ने उनसे कहा कि दुखी दासी नहीं आज से आपका नाम है सुखी दासी।
सो ये है हमारा प्रयास दुखी दास और दासियों को सूखी दास और दासी।
तो ये हमारा प्रयास है दुखी, दास और दासियों को सुखी दास और दासियाँ
बनाना आप सब 1 से दुखी बात
दासी दासी से आप भी 1 समय शायद दुखी, दास और दासी थे।
आज आप सब बन गए हो सुखी
दास, दासी और आज आप बन गए हो सुखी दास और सुखी दासी।
लोगों की अज्ञानता को दूर करना हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है।
तो लोगों की अज्ञानता को दूर करना ये हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य।
पूना के भक्तों को, सब को जुड़ना चाहिए इस मन के प्रयास में, तो
आप पूना के भक्तों को, सब को जुड़ना चाहिए। इस मैराथन के प्रयास में
अमा 1 मनसब दिया ये दिये डबल मतलब की पिछले साल जितने ग्रंथ बाते हैं, ये साल उसका दुगना गुला करो।
तो प्रपात जी ने अमेरिका में ये भक्तों को ये निर्देश दिया था कि डबल इसका अर्थ है कि पिछले साल जितने ग्रंतबाटेहैं उससे दुगना इस साल ग्रं बाटो।
अगर मै आपको कहूँ डबल का कोटा बन जाएगा 12 लाख तो अगर मैं
आपको कहूँ की डबल ेट तो आपका कोटा बन जायेगा 12 लाख।
तो इसलिए हम आपको रेट इनक्रीज बता रहे हैं। इंक्रीज।
तो इतना तो हम आपके ऊपर नहीं करेंगे, लेकिन हम आपको मार्जनल इनक्रीज करने के लिए कह रहे हैं।
6 6 लाख की बजाय 7 लाख,
6 लाख के बजाय 7 लाख हो, सकेगा हो सकेगा
राजा स्वामी की कृपा हो तो जरूर हो जाएगा राधा स्वामी
महाराज की कृपा हो तो जरूर होगा डिस्ट्रीब्यूटर है वे भी बड़े बुक डिस्ट्रीब्यूटर
है सो e book distebutinmaraton 1 भक्त ने पूछा
तो ये बुक डिस्ट्रीब्यूशन मैरatoनहै 1 समय प्रो जी को। 1 भक्त ने प्रश्न पूछा कि वाट इज द मीनिंग ऑफ़ मैराथॉन मैरेथोन का अर्थ क्या है? तो प्रपज ने उत्तर दिया लेस ईटिंग लेस स्लीपिंग एंड मोर प्रीचिंग जो
है आज ऐसी कल से कल से फोर्ट फोर्ट नवम्बर से शुरू होगा तो ये
मेरेथोन जो है 1 नवम्बर से शुरू होगा।
और आप सबकी सफलता के पीछे राधे शाम बड़ा हाथ है तो आप सब
की सफलता के पीछे राधेश्याम प्रभु जी
का बहुत बड़ा हाथ है स्वयम जाते हैं, स्वयं जाते हैं भागवत के सेट्स
को बाटने के लिए, वे स्वयं जाते हैं भागवत के सेट्स को बाटने के
लिए और मेरे महीने में कम से कम सारे भक्तों का भाव होता है
तो मैरेथोन के महीने में कम से कम भक्तों का भाव होता है कि
वो भी उत्साहित हो जाते हैं।
तो मेरे तन के समय जो आलसी भक्त हैं वो भी उत्साहित हो जाते
हैं तो ये अध्यात में गुस्सा है बोधि वादों में भक्त का भाव है माल क्या है
तो ये आध्यात्मिक उत्साह है और भक्तों का भाव होता है कि हम दुखी को सुखी बनाएं और इसका माध्यम क्या है प्रोप जी के
ग्रंथों का वितरण जैसे कि लोग उनका ने, उनके प्रचार का बहुत गुस्सा रहता है
यस मैन।
1 भाव ऐसा है कि हम लोग सब को किशन बनाये।
तो जो ईसाई लोग होते हैं क्रिस्टन लोग होते उनका भाव होता है कि हम सब को ईसाई बनाये क्रिस्टन बनाये?
जो घर घर जाकर बाइबल दे देते
हैं तो वो घर घर जाकर बाइबल देते है।
तो उत्साह होना चाहिए तो हम वैष्णवों
में भी उत्साह होना चाहिए और यह
सम्भव है अगर आपकी साधना ठीक है और माला का जॉब कर रहे हो
और ये सम्भव है अगर आपकी साधना ठीक है और आप माला का जॉब
कर रहे हो तो आप सब से निवेदन है अपने हर साल मेसन करते हो, हमने प्रयास किया है यह साल भी प्रयास कीजियेगा तो आप सब से
निवेदन है कि आप हर साल मैराथॉन में पुस्तक वितरण का प्रयास करते हो तो इस साल भी प्रयास कीजिएगा।
मेरे खयाल से आप 7 लाख से भी ज्यादा कर दोगे
तो मेरे खयाल से आप 7 लाख से भी ज्यादा ग्रंथ वितरण करोगे लेकिन हम टारगेट के लिए 7 लाख जो है इसको मान कर चलते हैं,
होगा मायापुर
तो इस साल मैरेथोन का कॉम्पिटिशन होगा मायापुर और पूना के बीच में दी मायापुर, दिल्ली और पूना के बीच में तो
चाहे पोस्ट या लास्ट आय भाव होना चाहिए किताबों को बाटे तो जो कुछ भी
हम आय चाहे लास्ट। हाय लेकिन हमारा भाव होना चाहिए कि हम किताब जो लोगों तक पहुँचाए, कई
बार लोग कहते हैं आप फ्री क्यू नहीं, ते ते है लोग फ्री तो
कई बार लोग ऐसा पूछते हैं कि आप इन किताबों को फ्री क्यों नहीं बांटते हैं जैसे बाइबल को फ्री बाटा जाता है, पूछते हैं पूछते है से
लोग कहते हैं विदेशी
तो हम कहते है की क्रिस्टियन लोगों को विदेशी लोग धन देते हैं बाइबल को छापने के लिए अगर आप धन दोगे तो हम फ्री बाटेंगे
और 4 लोग प्रकट कर सकते हैं यह साल तुम्हारा ग्रंथ बहुत
महंगा है तो ऐसा 1 और शंका प्रकट हो सकती है कि ये ग्रंथ जो है ये बड़े बैंक हैं इतना
भाव क्यों बढ़ गया, इतना भाव क्यों बढ़ गया है तो क्या है उपाय
तो क्या है इसका उत्तर बड़ा है
क्यूकी, पेपर का भाव बहुत बढ़ गया
है तो ये बड़ा है क्योंकि बाजार में पेपर का भाव बहुत बढ़ गया
है, छपाई का, छपाई का भाव बढ़ गया, हम क्या करे तो आप क्या
कर सकते हैं सो
मेरे पास है
ऑलरेडी have बुक्स तो लोग और 1 ऐसा ओब्जेक्शन आ सकता है कि लोग कहेंगे कि हमारे पास ये ग्रंथ हैं
आइडिया दे सकते हो, आप इसे बांट सकते हो तो आप अपने रिश्तेदारों को
तो आप उनसे कहिए कि आप इसको लीजिये और आप इसको बाट सकते हो अपने रिश्तेदारों को, मित्रों को दे सकते
हैं मैंने देखा है की जो भक्त चिंता में होते है के भगवान यानी है कुछ न कुछ उपाय देते है
तो मैंने ऐसा देखा है की जब भक्त चिंता में होते है की हम इसको कैसे वितरित करे तो भगवान कुछ न कुछ उपाय जरूर देते है सो
बुक मन फ्रॉम नवंबर, स्टार्ट बुक तो
हम ये बुक मैरेथोन को 1 नवम्बर
से प्रारंभ करेंगे और हम किसलिए कर
रहे है मैराथोन किसलिए करते है तो ये मैरेथोन किसलिए करते है
4 को
करने के लिए, शील प्रपद और आचार्यों को प्रसन्न करने के लिए और परम
भगवान श्री कृष्ण को और परम भगवान श्री कृष्ण को प्रसन्न भगवान कहते है
करो तो भगवान अनेक श्लोकों में कहते है की प्रचार करो, प्रचार करो ये असली दया ये है असली दया तो
ये उम्मीद है की स्वामी पीपा सी जी के आशीर्वाद से सब प्रयास करोगे 7 लाख
तो मेरी अपेक्षा है की परम कृपा से और प्रऊपाजीकी कृपा से, अगर आप सब प्रयास करोगे तो 7 लाख एकदम संभव है
हे कृष्ण हरे कृष्ण।
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