श्रील लोचन दास ठाकुर तिरोभाव दिवस | 8 Jan 2018 | ISKCON Juhu | Srila Gopal Krishna Goswami

In this Hindi devotional lecture recorded at ISKCON Juhu on 8 January 2018, Srila Gopal Krishna Goswami commemorates the Tirobhava day of Srila Lochana Das Thakur. The discourse weaves biographical anecdotes, scriptural references and vivid stories (e.g., the trials of Haridas, the king’s encounter, miraculous light manifestations) to illustrate the core bhakti principles taught by Lochana Das Thakur. Central themes include the supreme power of chanting the divine name (Hari/Krishna), the necessity of humility and total surrender (serving all as a servant), the futility of caste‑based discrimination, and the promise of eternal joy (nitya‑nanda) that arises from sincere devotion. Interspersed questions from an interlocutor guide the flow, prompting clarifications on how to take refuge, the role of the guru, and practical steps for devotees. The lecture culminates in a collective prayer for grace, urging listeners to adopt humility, chant the name, and serve the divine with unwavering devotion.
Chapters
तुम आज जैसे आप जानते हो महान सन लोग जना थाककीरबावतीतीहै हम लोग जना थाकुर की थोड़ी चर्चा करेंगे थोड़ा भाग गा लो tik है
mega cतनिamasm बंदे
हम श्री ग का पद कम नम
सर तो पहले हम लोग चेनराज ठाकुर
की चर्चा करेंगे और उसके पश्चात भागवत
लोग ठीक है
तो अविरभाव और तिरोभाव अविरभाव कारण है कि अमीर भाव वो दिन होता है जब कि महान संत पृथ्वी पर प्रकट होते हैं। और तिरोभाव का अर्थ है वो शुभ दिन जब कि महान संत अप्रकट हो जाते हैं। भौतिक वात में हम तीर भाव को कभी नहीं मनाते। मेरा ध्यानिक जीवन में विशेष हम अमीर भाव और तिरोभाव दोनों ही बड़े उत्साह से मनाते हैं और इन दिनों में महान संत की लीलाओं का स्मरण करते हैं। तो आज है किन का तेल बाल महान सं हमारी नजरों से अप्रकट होते हैं पर किसी और स्थान में प्रकट हो जाते हैं जैसे शाम के समय सूर्य डूबता है तो ये नहीं कि सूर्य और फाइनल से प्रकट हो गया पर किसी और स्थान में प्रकट हो गया। तो लोजनास्थाकोक्षेते महाप्रभु के प्रकट होने के 30 साल बाद प्रकट हुए थे और लोचना साको ने। वो नाराहरी सरकार के शिष्य थे और लोचना ठाकोर ने हमें अनेक रेसलाइन दिए है और 1 बड़ा प्रसिद्ध ग्रंथ दिया है जिसका नाम है चेतने मंगल। चेतने मंगल में
उन नीलां का वर्णन
है जिनका वर्णन चेतन भगवत और चेतना चरतिदमेंनहींहै चेतने मारोबरी के विषय में 3 प्रसिद्ध ग्रंथ हैं 1 है चेतना छरतमीताजिसकी
रचना किसने की,
1 हैं चेतन्या भागवत जिसकी रचना और तीसरा है चेतन्या मंगा जिसकी रचना लोचनदा ठाकुर ने। वक्ती सिधांत जी
बड़े प्रभावित थे चेतन
मंगल से और भगतीसीतांदाजी चेतन मंगल को छापकर बंगला भाषा में सबको फ्री बांटते थे चेतन मंगल में उननीलाओं का वर्णन हैं। इनका वर्णन चेतन भगवत और चेतन चेत्र चेतन मंगल में अनेक लेल आए हैं। 1 प्रेस लाये
1 दिन वहा पर
वो अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे नेमार और वह कई पिले थे पपी डॉग्स तो वहां प्रभु ने 1 पिल्ला उठाकर अपने घर ले आये उनके मित्रो ने कहा निमाई तुमने बडवानी करके सबसे खुबसूरत पिल्ला ले लिया है और वो पिल्ला घर में आया सच्ची माता ने कहा पिल्ला हमारे घर हम तो
ब्राह्मण हैं पिला कैसे घर में रख सकते हो।
मा ने कहा अगर आप पिल्ले को
घर में नहीं रखोगे तो मैं घर
छोड़ दूंगा तो माता ने का ठीक है। तो निमाई के मित्र शिकायत कर रहे थे सबसे खूबसूरत पिल्ला निमाई ने उठा लिया और बदसूरत पिल्ले हमें हमें दे दिया। 1 दिन निमाई गंगा में गए थे स्नान करने के लिए और उनका मित्र आया कहने लगा निमाई ने माई सुनो
तुम्हारी माँ ने पिल्ले को छोड दिया है।
निमाई ने पिल्ले को बांधा था और घर में छोड़ रहा था। निमाई ने माई छोड़ तू मां म्हारी माँ ने पिल्ले को छोड़ दिया है माई
तुरंत घर लौटे देखा कि पिल्ला
नहीं है अपने दोस्तों को कहा जाओ।
नव के घर गए और धूनो इस
पिल्ले को तो सब ने खोज करना शुरू किया पिल्ले के और फिर उन्होंने पिल्ला देखा शहर में क्या कर रहा था वो पिल्ला 2 वहां पैरों पर नाच रहा था। 2 हाथ उठाकर, वो बोल रहा था और उनकी आंखों से
आंसू बह रहे
थे और बाल खड़े हो रहे थे शुद्ध भक्ति के। तो जब निवासियों ने देखा, ये पिल्ला जो ने माई के पास था इतने
उत्साह से नाच और पिला जोर जोर से
पूरा साल शहर हो गया माई की संगत पिाशुधभागबनगया और फिर पूरी जमा देव की। प्रजा उस पिल्ला को देख रही थी। नाचते हुए वे सबके सामने भगवान का 1 रथ आया, वह कुंता एयरलाइन्स का हवाई जाज सबके सामने। वो पिल्ला एयरलाइन में बाई बाई बोलते बोलते हैं भगवान के धाम गया होगे।
माई ने पिला रखा तो हम क्यों नहीं पिल्ला रख सकते हैं?
हमें क्यों रोकते हो? का आपने पिला रखना तो आपको 1 गारंटी देनी पड़ेगी क्या क्या वो इस पीले को शुद्ध भक्त बनाओगे। इसी प्रकार 1 भक्त हैं। शिवनंदरसेन नाम में आ रहे थे। 1 पिलाने के पीछे 1 कुत्ता पिलानी, कुत्ता पीछे पीछे आ रहा था। पर 1 दिन शिव सन के नौकर ने कुत्ते को छोड़ दिया तो खो जा तो क्या देखा? वो कुत्ता बैठा था वहाँ प्रभु के पास। प्रभु नारियल फेंक रहे थे, खा रहा था वो पीला भी भगवान के धाम चले गया। तो भगवान के भग तिते दयालु है, मैं इसकी नकल नहीं कर सकते। शिवनंद सेन की या या निमाईगीपीइसीलगा मंगल में 1 और बड़ी परसिर लीला है। निमाई जब सन्यास लेकर जगनपुरी जा रहे थे तो रास्ते में उनको प्यास लगी। 1 व्यक्ति लसी बेच रहा था। निमाई ने उसकी पूरा मटका खाली कर दिया, सी पी ली। और फिर उसने कहा पैसा। निमाई ने कहा मेरे पास तो पैसे
नहीं है और मेरे पीछे मेरे साथी आ रहे हैं।
वो पैसा देंगे। जब साथी वहां पहुंचे साथी देने थे और दूसरे तो उस ली। उस व्यक्ति ने कहा तुम्हारे 1 सन्यासी
आए थे न्होंने, पूरा मटका खाली कर
दिया और कहा तुम पैसे दोगे। भगवान ने कहा हमारे पास भी पैसे नहीं है। फिर उस व्यक्ति ने कहा लसी वाले ने ठीक है।
उसने जी को बोल देना हमने वो लसी दान में दिया।
अभी मैं घर चलता हूँ तो वो
मड़के को उठा कर घर जाने की
तैयारी कर रहा था। जब उसने मटका उठाने का प्रयास किया तो देखा मडका इतना भारी था कि
उठाई नही सका तो वो आश्चर्य चकित हो गया।
कुछ समय पहले तो मटका खाली था, बिल्कुल हल्का मैं एकदम भर गया। उसने अंदर देखा और क्या देखा मटके
में हीरे मोतियां थीं।
मटका हीरे मोती से भर गया था। तो उसने निमाई को सी दी। बदले में क्या हुआ? पूरा मटका भर गया। भगवान की सेवा करके कभी आप नुकसान प्राप्त करते हैं। जैसे 1, समय 1, व्यक्ति, 1 और फल भेजी थी।
फल किसे चाहिए?
भगवान छोटे से थे, अपने हाथों में कुछ अन लेकर फल लेने जा रहे थे। वहां पहुंचने तक लगभग सारा आनंद के हाथों से किया था। जब इस औरत ने भगवान की खुबसूरती के प्रति आकर्षित होकर मुफ्त में सेव
दे दिए, कुछ लिए बेटा और बाद
में जब मुरे देखा तो क्या देखा, उनकी टोकरी में क्या थे, क्या थे से भगवान की सेवा, भगवान को धन देकर, कोई गरीब ठाकुर। ये अनेक रचनाएं हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है चेतन्या मांगा। और उन्होंने कई भजन की रचना की है, जिनमें उन्होंने यह साबित किया है कि चेतन्या कौन है। परम भगवान उनकी अनेक रचनाएं हैं। पर खास कर के 1 रचना। परम करुणा। पर पापाजी ने इस प्रार्थना के ऊपर बड़ा गहरा लेक्शन दिया था। और प्रापा जी कई बार अंजन गाते हुए, उनके में से आंसू बहते थे। तो ये संक्षेप में इस रचना भजन का संदेश सुनाएंगे। परमा करुना पाहे दूर जाना। ताई गुर सारा ने केवल गाना करते हैं। परमा करूणा। परम करुणा का अर्थ है क्या है। परम करना कार्त है, करुणा कार्त है।
दयालु।
तो सब अस्पतालों मे
सबसे दयालु कौन है।
ये इस भाव का वर्णन ठाकुर भी करते हैं। कहते परम करना, जाना।
आप जो हो, सबसे दयालु हो और आप प्रकट हुए हो। भगवान नितेंद के साथ सब तारा सारा
ने केवल आनंद
जो व्यक्ति चेतना, महा प्रभु, भगवान निन्दा की शरण ले, वो
केवल आनंद आनंद अनुभव करेगा। क्योंकि वो इतने दयालु हैं। ये भाव नि ठाकुर जी के भाव से मिलता जुलता है। ठाकुर कहते हैं श्री कृष्ण चेतना प्रभु दया कोर मोरे तुम में न के दयालु
पति।
भगवान हेतु बता। समा पतिता प्रभु है। प्रभु सुखी कृपाकर भगवान निंदा। आप अत्यंत दयालु हो और आपकी शरण रहेंगे। सुख मिलेगा तो लाज। ठाकुर कहते हैं आप चेतने, मा, प्रभु
और नितेंद अत्यंत दयालु हो, सब अवतारों
में सबसे दयालु अवतार हो।
और जो व्यक्ति आपकी शरण लें, वो
केवल आनंद कंदा, आनंद आनंद अनुभव करेगा। तो अनेक प्रकार के आनंद होते हैं। 1 भौतिक आनंद और दूसरा है। आनंद प्रलाद। बराज कहते हैं
न दल, विदुमस्वरतकतेमें, विश्णु।
लोग ये नहीं जानते कि असली आनंद कैसे प्राप्त हो सकता है। भौतिक आनंद आलम होता है और समाप्त हो जाता है। सच बात है, चाहे आप कितनी भी सफलता प्राप्त कर लो। आर जी स्थाई है, हम प्रयास करते
हैं, धन कमाते हैं, बड़ा कहा खाना बनाते हैं।
पर फिर हम अब प्रकट हो जाते हैं। तो महा प्रभु की शरण लेकर असली आनंद प्राप्त करोगे। ये हैं शासन, निर्णय, बाजू, बाजू, भाई, चेतन।
विश्वास करो कि छेतिन महा प्रभु की शरण लेकर और भगवान नेतेनंदकीशरण लेकर तुम
असली सुख प्राप्त करोगे, यह विश्वास करो। कई बार जब आप आध्यात्मिक संदेश को सुनते हो, हम इतना विश्वास नहीं करते।
भगवान तो कहते हैं सर्व धर्मान पढ़ते मामेकम, हम सब धर्मों को छोड़कर, मेरी शहर में आओ मैं तुम्हारी सुरक्षा करूंगा।
पर ये हम विश्वास नहीं करेंगे।
पर जब कोई नौकरी देता है, आपको
कहता है, इतना माल, बेचोगे, इतना कमीशन मिलेगा हम विश्वास कर दे है। तो चेतन मा, प्रभु और नितिन की वो कह रहे हैं।
विश्वास करो। मेरे बच्चों में जो व्यक्ति वहाँ गोनिदकिशरणलेगा,
वो क्या असली आनंद प्राप्त करेगा साधारण। समाज में हमें हमेशा असली चीज चाहिए। पर भक्ति के विषय में नकली जिए। तो ये है असली आनंद का साधन विशा। चारिया सही रहे, मुखे बोलो हरी हरी विषया।
अगर आप भगवान, नंदा और चेतन महाप्रभु
लेना चाहते हो विशाया, तो भौतिक आकर्षण हमें त्यागना पड़ेगा।
ये नहीं कि आपको बहुत ही गिरियरटिप्तिभी
चाहिए और भक्ति भी चाहिए। दोनो सम्भव हैं, शास में लिखा है, जब भगवान कहते हैं सरवा, उसका क्या अर्थ है?
ये जो भौतिक आकर्षण है, उसे त्याग
मेजर लो, फिर मैं तुम्हारी सुरक्षा करूंगा। तो उसी प्रकार लोग चंदा ठाकुर। कह रहे? विषया शारिया।
ये जो विषय, जो भौतिक आकर्षण है, आपका ये बौद्धिक आकर्षण थियागो, बौद्धिक कार्यों को थियागो, तो उसके बदले में भगवान चेतन माह, प्रभु और नितिन की शरण लो। और शरण लोगे, तो क्या मिलेगा?
असली आनंद मिलेगा। और इस विषय में चेतन माह। प्रभु ने क्या कहा? शिक्षा आश्का के पहले इस लोक में अनंद बूदी। आ भाई नाम के उच्चारण का 1 और लाभ ये है कि जो आनंद है, वो केवल बढ़ते ही जाता है।
बौधिक समाज में
हमारा आनंद घटते जाता है।
आपको भूख लगी है।
पहली चपाती खाओ, आनंद आएगा, दूसरी खाओगे तो कम, आनंद आएगा, तीसरी खाओगे तो और कम। फिर कहोगे और नहीं।
पर अध्यात्मिक आनंद आप कभी ये नहीं कहोगे, और नहीं चाहिए।
हमें। जितना आप भगवान कृष्ण गत होगे, उतनी मात्रा में आध्यात्मिक, आनंद केवल बढ़ता ही जाएगा।
पर ये आध्यात्मिक आनंद अनुभव करने के
लिए हमे कुछ त्यागना पड़ेगा, कुछ कीमत भरनी पड़ेगी, मुफ्त में नहीं मिलेगा। भगवान भी कहते हैं न सब को
छोड़कर, फिर मैं तुमारी सुरक्षा करूँगा, मन मन भाव, मन भक्त।
मल्या जी को मेरा आज चिंतन करोगे, स्मरण करोगे तो मेरे धाम वापस लौटोगे,
विषय करो और मेरे धाम मे लौटा देखो। रे भाई बुना,
पशु पाकी कहते हैं। ठाकुर
के महा प्रभु ने पशुओं को भी भगत बनाया,
पशु पशु, पाकि जुड़े,
पशु को भी भगत बनाया।
कि
जंगल से गुजर रहे थे, तो जंगल में अनेक पशु थे।
हाथी, शेर, टाइगर, जैको डियर, सारे जंगल था। और बाप ने क्या किया, पानी फेंका, उन पर वाह चैंटहरीकृष्णा में जॉब करना शुरू कर दिया। तो लोचन कह रहे हैं, आप इतने
दयालु हो कि आपने पशुओं को भी नचाया और पर्स से भी क्या करवाया।
महामंत्र का उछाल। उसी प्रकार शिल प्रापा जी जब
विदेश
में गए अमेरिका में, तो उन दिनों में जब प्रापा, पहुंचे, अमेरिका सब जुड़े
हुए थे,
ड्रग कल्चर में, इंडिया डेब्दीकेकारियों में। और प्रापा जी ने उस वातरा में प्रचार किया और उस बात में लोगों को इनाम करवाया जा प्राजी। जहाज में
अमेरिका पहुंचे बोस्टन, जो बोस्टन,
पहुंचे जहाज का जो कैप्टन था, कैप्टन पांडे व प्रपज को शेयर की याद कराने ले गया था। पापा ने जब बॉस्टन का दर्शन किया तो उन्होंने देखा कि हर जगह इंडिया तिप्ती का निमंतन, इंडिया डिप्टी का पद। तो उन्होंने कविता लिखी प्रापा जी को कभी बुला दे दे। जिसमें प्रापा ने कहा, आप मुझे ले
तो इधर आये हो, मुझे पता नहीं
क्या मैं प्राप्त कर सकूँगा और कृपा से असंभव कार्य भी संभव हो जाता है। कहते हैं चेतीनेमहाप्रभूजी की कृपा से कठिन
कार्य सरल हो जाता है, वहाँ पर
की कृपा के बिना सरल कठिन हो जाता है। तो बाबा जी ने आगे कहा जो कृष्णा का राज कहते हैं के महा
बापूजी कृपा से अंदर देख सकता है,
व्यक्ति पहाड़ों के पार जा सकता है, गुंगा व्यक्ति बोल सकता है, बहरा व्यक्ति सुन सकता है। दूसरे शब्दों में असंभव कार्य संभव हो जाता है। तो
पाक जुड़े
सुने जा गुना। तो पापा जी ने अपने लेक्चर में कहा कि चेतन महाप्रभुजी के पर से
जो झारखंड जंगल के अनेक पशु थे,
सब ने आय नाम करवाया। और इस प्रकार चेतन महाप्रभु ने पशुओं को भक्त बनाया।
उसी प्रकार जब प्रपा जी अमेरिका गए
थे, जो व्यक्ति जुड़े हुए थे, बचपन
से पाप के कार्य में प्रापा जी
ने क्या किया, उन्होंने चाया और भग बनाया था। प्रापा जी का चमत्कार 1 समय किसी ने पापा से पूछा आप को चमत्कार कर सकते हो, आपको जादू कर सकते हो। क्योंकि भारत में सोचा जाता है कि जो अध्यात्मिक गुरु हो, सन्यासी मुझे कुछ जादू करेगा। प्रापा ने ही कोई जादू नहीं कर सकता।
पर 1 जादू मैंने किया है।
तो दूसरे व्यक्ति की रुचि थी, क्या जादू किया है? स्वामी जी ने मैंने हजारों मल्च को ब्राह्मण बना दिया है। तो बराबर ने हजारों पशुओं को ब्राह्मण बनाया है। और पशु में कोई खास अंतर नहीं। उसे कहते हैं जो पशुओं की बुद्धि
रखता है, पशु सम्मान कार्य करता है,
पशु सम्मान इंडिया में व्यस्त रहता है। तो उन लोगो को क्या बना दिया।
ब्राहमण शुद्ध ब्राहमण नाम।
पापा जी इस प्रादान लेक्चर में कहते हैं कि रोजना ठाकुर कहते हैं हे
मेरा मन, तुम भौतिक आक्शन में जुड़े हुए हो, इसे थियागो चेतेमहाप्रबुजकी स्वीकार करो।
तो आप कहोगे भोजराज ठाकुर का भौतिक आकर्षण था। ये हमारे संतों की विनम्रता है, हमारे संत क्या कहते हैं? हमेशा कहते हैं वह में भक्ति का 1 बूंद भी नहीं है, जैसा कि कृष्णा का विराज कहते हैं मेले में
इतने अवगुण हैं की अगर तुम मेरा
नाम भी लोगे तो तुम्हारे अवगुन समाप्त
हो जायेंगे तो मेरा नाम ही मत लो।
वह हमारी क्या स्थिति है? हम कहते हैं सदा हमारा नाम लो,
महान सन क्या कहते हैं? मेरा नाम ही मत लो।
नाम लोगे तो सारे गुण समाप्त हो जायेंगे। तो ये नोरदम ठाकुर भी कहते हैं कोई गुण नहीं है। तो ठाकुर कहते हैं कि अगर हमें मेरा मन
बहुत कार्यो में जुड़ा हुआ
है, बहुत कायों से बचना है और मेरा जो मन है उसको भगवान के चरणों में लगाना है। इस प्रकार रचना शाकुर की कई रचनाएं हैं और इन रचनाओं में यही स्थापित किया जा रहा है। क्या ये चेतना कौन है? पर भगवान भगवान कौन है? उनके 7 साथी और हमें कौन लेनी चाहिए भगवत प्रेम प्राप्त करने के लिए? इस कलियुग में भगवान प्रकट हुए। चेत ने महाप्रभु के रूप में और चेते महाप्रभु ने खुले रूप से ये
हैनाम का प्रचार किया।
सब प्रकार के व्यक्तियों को ये है नाम दिया।
जिस प्रकार बारिश बरसती है, यह नहीं
देखती कि पहाड़ में गिर जाए पानी या सागर में गिर जाए पानी। बिना भेद भाव के हर जगह पानी गिरता है। तो उसी प्रकार चेतन मापने क्या किया। बिना भेद भाव हई नाम का अंडोल आरम्भ किया। जब चेती ने मार पपुना अपना समगिदिनअंडोलन आरम्भ किया प्रचार तो
कई मुसलमानों ने विरोध किया।
मुसलमानों ने कहा कि अगर हम निवाई के समक डॉलर को नहीं रोकेंगे तो सारे मुसलमान हिंदू बन जायेंगे।
रोको रोको।
उन्होंने यह निमंत्रण दिया छन काजी को और जो हिंदू थे, उन्होंने भी इसका विरोध किया क्योंकि जो हिंदू स्मार्ट था, ग्रामीण थे, उनकी आमदन घट गई। तो यज्ञ करके लोगों से धन कमाते थे। और है नाम के लिए तो कोई धन है कि कीमत भरनी पड़ती। तो हिंदू ने भी शिकायत की दवाई
पन्डे जो संदेश दे रहा है वो हिंदू धर्म के विरोध में है।
रोग दूर से और 1 मुसलमान था
जो बार बार चांद काजी को जाकर
कहता था रोको रोको। तो 1 दिन चान काजी ने कहा तुम दिन रात आकर शिकायत करते हो,
रोको रोको पर भी मैं देखता हूँ,
तुम्हारे नाम कर रे हो, ये क्या पका क्या शिकायत करते हो? तो मुसलमान ने कहा ये बात सच
है जब से ये है नाम मैंने
सुना है, ये ही ना में जीप से निकलता है ने वो दिन रात है नाम गलत। तो चेतिरमापरबने खुले रूप से है नाम का प्रचार किया और हर प्रकार के व्यक्ति को आकर्षित किया। यह हरी नाम के प्रति चेतना। मा प्रभु दक्षिण भारत की यात्रा में थे, तो जहां जहां जाते थे, दूर दूर से आते थे लोग उन्हें सुनने के लिए, देखने के लिए और उनको सुनकर ही हर नाम को आराम कर देते थे। और जब वो वापस लौटे थे अपने स्थानों में दूसरे व्यक्ति उन्हें देखकर वो भी हरी नाम का उचारन शुरू कर देते थे। इस प्रकार माँ प्रबु ने ही नाम का प्रचार हर जगा किया, सबको वैश्नव बनाया। माँ प्रबु ना सी आये थे और तपन मिश्रा नाम के 1 भक्त थे, जिनके घर और ठहरे थे।
तो
चंदर शेखर के घर में ठहरे थे, वो नीची जाति का था। तो माँ बुने चंदरशेखर, तपन मिश्रा 2 भक्त थे मा प्रभु के, उन्होंने हा
आपकी माया वाली सन्यासी इतनी निंदा कर रहे हैं
हमसे सहानी ज्यादा अब चलिए उन्हें मिलने के लिए। माँ प्रबु ने कहा था माया वाली की संघ से हमें दूर रहना चाहिए। प्रभु गये उस सभा में, या 10 हजार मायावती सियासी ऊँचे मंच पर बैठ कर विधान का अध्ययन कर रहे थे। वो मंच पर नहीं बैठे,
बैठे नीचे
यहाँ के लोग पाउंड होते हैं। मंदिर में प्रवेश करने से। पर उन्होंने वहाँ अपना, अपनी दिव्य लीला प्रकट की।
उन्होंने अपने चेहरे से इतना प्रकाश प्रकट
किया कि ऐसे देखा कि लाखों सूर्य का प्रकाश प्रकट हो रहा है। और जब ये उँची सन्यासियों ने देखा, ये इस प्रकाश को प्रकट होते हुए वो समझ गए।
ये कोई साधारण सन्यासी नहीं है।
तो प्रकाश अंदर सरस्वती उनके गुरु थे। मा प्रभु को पकड़ कर ऊपर ले गए। मंच। पर उनोने कहा, तुम इतने बड़े विद्वान हो। ये छोटी आयु में ही माह प्रभु संसद के विद्वान बन गए थे।
तुम हमारे साथ बैठकर
विदांता का अध्ययन क्यों नहीं करते? माँ प्रभु ने क्या कहा? क्या कहा? गुरु ने कहा,
तुम्हें और कोई योग्यता
नहीं है, केवल उनकी चर्चा के द्वारा। सामायवालीतोलोचिनाज ठाकुर कहते हैं चेतिया महा प्रभु, अत्यंत दयालु हैं और नरतमराजठाकुर कहते हैं आप सब सालों में सबसे दयालु हो। यही भाव रोजिनराजठाकुर ने भी प्रकट किया है। रोजाज ठाकुर कहते हैं भगवान नितनंदा। उनके सनातन साथी हैं। यही नंद भगवान नित, नंदा प्रकट होते
हैं, लक्ष्मण के रूप में, छोटे भाई के रूप में, फिर बलराम के रूप
में, बड़े भाई के रूप में और फिर नितनंदाफिरसे बड़े भाई के रूप में। ये हैं भगवान चेतना। सनातन साथी सो हमें चेतना की शरण लेनी चाहिए। उनकी शरन? कैसे लेते हैं? कैसे लेते हैं
उनके आदेश का पालन करके। और क्या था उनका आदेश घर घर जाओ। लोगों को ये कहा, कृष तुम्हारा प्लान है?
तुम्हारा असली जीवन है।
कृष तुम्हारा असली धन है?
हम असली धन को नहीं पहचानते। असली धन है। भगवान का नाम।
कृष्ण, तुम्हारा जीवन है।
ये था महा लोगों का संदेश। तो हमें आज के शुभ दिन पर रोचना ठाकुर से प्रार्थना करनी चाहिए कि
हमें कृपा दे कि हम भी हर नाम में रूचि लें।
उच्चेतिरमहाप्रभु भगवान नित्यनंदा की शरण ले। भगवान नीतियनंदानितिय।
अनंदा नित्य का अर्थ क्या है?
हाँ, सनातन आनंद का अर्थ है। ये है असली आनंद। और आप देख सकते हो के तीरे
महा प्रभुजी की भविष्य वाली
आज सफल हो गई है।
आज आप विश्व के किसी कोने में जा सकते हो। और 12 नहीं, अनेक भक्त, मिलेंगे, यो,
कि हर नाम के माध्यम से अपने जीवन को सफल बना रहे हैं। यह हर नाम के उच्चारण के लिए
कोई तालीम की आवश्यकता नहीं।
जीव है। 2 गांधी है तो माने जीव ने। 2 गांधी है। इनका में उपयोग करना चाहिए। किस लिए? यह हरी नाम सारे विश्व में देखा है। हाई, नाम को बड़ी सरलता के साथ लोग स्वीकार कर सकते हैं। तो ठाकुर ने यह स्थापित किया है।
कि छेतिलमाबुसोयभगवान है श्री कृष्ण, चैतन्य राधा
कृष्ण नए आन्या, यही राधा कृष्ण प्रकट हुए किस रूप में चेतन महार और चेतन महापर प्रकट हुए हैं? किसलिए प्रीतो को उधार करने के लिए हम सब इस कलियुग में अत्यंत पतित हैं। और चेतन महावर हुए। सब पतितों का उधार पर नर्थ। अंदाज ठाकुर क्या कहते है? कहते है पतीत भावना, मौसम पति, प्रभु।
सब पतित में सबसे ज्यादा पति मैं हूँ। ये भाव हमें अनुकूल करना चाहिए। ये बहन संतों का भाव कि हम सबसे पतित हैं। यह विनम्रता का भाव।
चेतन महा प्रभु ने हमें संदेश दिया है। ना देपिसुनीचेनमनिन मना लेना। अगर तुम सदा हरी का नाम लेना चाहते हो तो विनम्रता का भाव अनुकूल करो और अत्यंत सेंसी हो। पेड़ से भी, ज्यादा सेशिल विनम्रता का भाव अनुकूल करेंगे। भक्ति में उन्नति कर, पाएंगे और गमन का गौरव भाव पर अनुकूल करेंगे। माई नाम को आनंद कर सकोगे।
फिर उतने आनंद के साथ नहीं, जितने
आनंद के साथ आप के भाव में कर सकते हो। इसलिए कृष्णा का इलाज करते हैं।
ये श्लोक न, सुनी, न इतना महत्वपूर्ण
है कि हमें गले में बांध कर सदा याद दिलाना चाहिए। तो ये है महाप्रभु का आंदोलन।
महाप्रभु का आंदोलन है।
हमे विनम्रता के भाव से यह भक्ति में जुड़ना चाहिए।
सबका दास बनना चाहिए।
दासनदास, दास, दास, दास, सबका दास बनोगे। तो कृपा प्राप्त होगी। और सेवा, भाव और सैंशीलबौद्धिक संसार में सुख, दुख, आदर, अपमान, सर्दी, गर्मी, ये सब सहना पड़ेगा, सैंशील बनो। महा प्रभु। क्या? कहते हैं किससे ज्यादा सैंशील बना, व्रिक्ष से भी ज्यादा सेशिल कई बार लोग पूछते हैं क्यू विक् जो है सर्दी गर्मी, हर स्थिति में आपकी सेवा करने को तैयार रहते।
न।
और जो पेड़ से हमे ठाकुर से प्राथना करनी चाहिए कि भक्ति की भावना हमारे में उत्पन हो, हमारे भाव हो। हम जब कहा जाता है, शास्त्र में चेती लो। इसका अर्थ क्या है कि हम उनके
आदेश का पालन करे। जब ये कहा जाता है कृष्ण भगवान
की शरण लो तो उसका क्या आप। कृष्ण भगवान के आदेश का पालन करो। तो चेतना का आदेश क्या है? यह है और हरिदास ठाकुर के उद्धरण में आप क्या देखते हो?
जब चर काजी राजा के पास गए और राजा से कहा इस व्यक्ति ने मुसलमान खानदान में जन्म लिया है और
वह नाम को अपना लिया है। तो राजा ने कहा लाओ भाई। राजा ने कहा तुम हिंदू भगवान का
नाम ले रहे हो। तुम्हारा जल म, तनी ऊँची को मे हुआ है। हम तो
हम अगर कोई हिंदू किसी
चावल के दाने को हाथ लगा दे। वो चावल का दाना भी नहीं खाते।
और तुम ने हर नाम को स्वीकार कर लिया है। हरिदास ने कहा कि भगवान के नामों में पूरी शक्ति है, कोई भी नाम
लो जो वही नाम नहीं माने। हरी नाम त्यागने के लिए कुशन कर दी, जो कि राजा के प्रतिनिधि थे। हा ले जाओ। इस बदमाश को बाजारों में हसीन पीटो।
उन दिन में सजा का माध्यम था। व्यक्ति को पीट, घसीटकर पीटना तो जानकारी के सिपाही इसको घसीटकर पीटते थे। हरिदास को अक्सर दूसरे बाजार में पहुँचने तक व्यक्ति का देहांत तो ज्यादा था
पर 22 बाजारों तक पहुंच गए। हर राज बिल्कुल चोट नहीं लगी, वो ही नाम करते गये और
उनको घसील कर े जा रहे थे। जब 22 बाजार पर पहुंचे और देखा कि हरिदास अभी भी जिंदा है।
अक्सर दूसरे बाजार में पहुंचने तक व्यक्ति
का देहांत हो जाता था। जो पीटते थे वो आश्चर्य हो गए। उन्होंने कहा अब ये राजा
हमें जिंदा नहीं छोड़ेगा क्योंकि हमने हम हमारे कार्य में असफल थे।
हमने इन्हें घसीटा पर मरा नहीं। अब राजा हमें मार देगा। हरिदास का भाव हरदास ने सोचा मेरे
कारण इनको पीटा जायेगा।
दास ने उनके योगिक शक्तियां मिल थी।
सांस लेना बिल्कुल बंद कर दिया।
बिल्कुल तो जो पीठ रहे थे उन्हें लगा कि हरिदास की मृत्य हो गई
तो खुशी के साथ हो गए राजा के पास।
जानकारी के बाद हरिदास की मृत्य हो गई और हरदास को वहाँ ले आये। राजा ने कहा
मुस्लिम विधियों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार कर।
2 परशान काली ने कहा, नहीं, यह
तो हिंदू बन गया था। इसे ऊँचे संस्कार से अंतिम संस्कार ही।
ऊँची धर्म के संस्कार से उनका अंतिम संस्कार नहीं करना। जा।
फेंक दे।
इसे गंगा में, गंगा में फेंक दिया। जब गंगा में भेगा तो तैर कर गंगा के पास आकर।
पेड़ के नीचे बैठकर।
जब फिर से शुरू कर दिया।
जब राजा को सूचना मिली, ये हहीदादइसेबजायबाईस बाजार में पीटा था। वह मरा नहीं जिसे हमने देखा, आंखों से मरा हुआ था।
अब जीवित हो गया है। राजा समझ गए, ये हरिदा कोई साधारण पुरुष नहीं हैं। फिर राजा आकर उनके शरणागत हो गए। तो चेत ने महा प्रबुजेकेआंडोलन में अनेक सुन्दर लीलाएं हैं जिनका वर्णन जनराज ठाकुर ने चेतन, मंगल और अनेक कविताओं में किया है। आज के शुभ दिन पर हमें तोषीना ठाकुर के संगत होकर उनसे क्या प्रार्थना
करनी चाहिए कि हमारे में भी चेतन महा प्रभु और शिक्षा में
पूरा आकर्षण बढ़े। और यह आकर्षण को बनाने के लिए हमे पौधे का क्शन त्यागना पड़ेगा और हम त्यागने को तैयार है। क्यूँ? ये है असली आनंद का मार्ग?
लोचजागुरकीचजागु
नंदन हाई कृष्ण, कोई प्रशन है कैसे?
अरे कृष्ण महाराज जी, अच्छा हिंदू धर्म जो है। मैंने प्रूपाजीकेलेक्न में सुना था कि शास्त्र में हिंदु धर्म कहीं लिखा नहीं है। ये मुसलमामुसलमान का दिया हुआ नाम है। तो ये हिंदू धर्म शास्त्र में इसका
क्या मतलब समझा क्या करे?
हिंदू धर्म जो है न। हिंदू शास्त्र में से मैंने प्रूपार्जीके लेक्चर में सुना था कि हिंदू धर्म शास्परमाने
कहा कि हिंदू शब्द नहीं है।
हां सिंध नदी के पार जो रहते से सिन सिन से हिंदू बन गया। पर चेतन भगवत में राजा ने कहा कि जानकारी में हिंदू शब्द उपयोग किया गया है। जानकारी के हिंदुओं का नाम मत लिया। पर वेद शास्त्र में है, चेतन भगवत में है। ओके
महाराज आपने बताया की कैसे नम्रता से जब करेंगे तो ज्यादा आनंद होगा और अगर ऐसा जब नम्रता नहीं करेंगे तो फिर आनंद नहीं आएगा। तो सुनते है तो कई बार लेकिन इसका पालन नहीं कर पाते। फिर गलती कर बैठते हैं और क्या
आम, सौरी क्या जैसे आप ने बताया
कि अगर नंबर से जब करेंगे, गर कुछ अपराध करेंगे या किसी से झगड़ा करें।
नम्रता का व्यवहार रखेंगे की बुद्धि रखेंगे
मतलब कि 1 दूसरे से समन रखे। नम्रता का प भाव होना है। नम्रता से जब तो हम सब मिनमरमदासे करते ही है, जब गुस्से में कोई न करा जॉब करते होगे तो सब हम्बल हो जाते। पर हम्बल डीलिंग विदिच t ha okay
स हमारे जैसे हम शास्त्र में सुनते हैं कि हम भौतिक सारी हम जैसे शास्त्र में सुनते हैं कि भौतिक तिप्ती और आध्यात्मिक चीजें दोनों 1 साथ नहीं चल सकते। तो कई बार हम लोग कुछ बहुत कार्य स्टार्ट करते है ये सोचिए कि इसको हम भगवान की सेवा में लगायेंगे लेकिन ग्रेजुअली हमारा उससे आइडेंटिफाई करने लगता है और उसे हम अटैच हो जाते हैं। तो यदि हम लोग शास्त्रों में सुनते हैं कि हमें अटैच नहीं होना है, फिर भी हम उससे अटैच हो जाते हैं।
मानो आप कोई वे पाल शुरू करते हो। भगवान के चरना में उसके नतीजे को समर्पण करने में जमे हो जाएगा। का परनाम ही भुगतना पड़ेगा।
भगवान के करोगे
तो परी नाम से बच जाओगे। 1 पैसा भी आप कमाने जाओ, अनेक पाप करने पड़ते है। ओके के हाई कृष्णा
हर बार रे।
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