श्रील प्रभुपाद का संघर्ष और गुरु पर अटूट विश्वास | 9 Aug 2017 | Delhi | Srila Gopal Krishna Goswami

The lecture recounts the early hardships faced by Srila A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada as he endeavored to bring the teachings of Krishna consciousness to the West. It details the logistical obstacles of securing a cargo‑ship passage, the financial constraints, the support of disciples and benefactors (such as Mrs. Mona, Mrs. Moni, and various secretaries), and the health crises (multiple heart attacks) that Prabhupada endured while translating the Bhagavata and Bhagavad‑Gītā. The narrative also covers his arrival in the United States, the organization of press conferences, interactions with American locals (e.g., Sally Aggarwal), the establishment of the first ISKCON centers, and the broader spiritual lesson of unwavering faith in the guru’s instructions. Throughout, the speaker emphasizes perseverance, self‑service, and the importance of following the guru’s command despite adversity.
Chapters
om namo भागते भागते वासुदेव हाई कृष्णा बाबा जी गए थे। अगस्ते नाइंटीन सिक्सटी फाइव जल्द दूर जहाज द्वारा अमेरिका पर कल आपके मंदिर में इस विषय पर यहाँ चर्चा नहीं हुई थी, सिर्फ 2 मिनट के लिए चर्चा हुई थी। तो मैंने सोचा की पहले इस विषय की चर्चा करेंगे और अगर समय बन जाए तो लोग लिखा बोर्ड में उसकी भी चर्चा करेंगे। ठीक है आप प्रॉपर कथा सुनना चाहते
हो
के तो वेस्टन कैलेंडर के अनुसार एने होगी। ऑगस्ट 13 को। पर दीदी के अनुसार ऑगस्ट 13 नाइनटी सिक्सटी फाइव कौन था। और जैसे आप सब जानते हो, 9 बजे सुबह जरा दूध जा निकला था, पोर्ट से पापाजी क्यों गये। जरा दूध द्वारा। 1922 में प्राबाजी के प्रापा जी मिले थे। भक्त प्रापा जी का जनम बढ़ेदहातिगवातर में हुआ था। उनके पिता का नाम था घोर मोहने। और उनकी इच्छा रहती थी संतों की सेवा करना, हर प्रकार के संत को घर बुलाते थे, देखभाल करते थे। और जब संत घर से जा रहा होता था तो उसे कहते थे मेरे बेटे को आशीर्वाद। 2 कि राधा। रानी जी का बड़ा प्रसिद्ध भक्त बने। और जो प्रभा जी की माता थीं। उनकी क्या इच्छा रहती थी कि मेरा बेटा इंग्लैंड में पढ़कर इंजीनियर बनके आय। छोटी आयु से ही बाबा जी को उनके पिताजी ने हर प्रकार की आध्यात्मिक शिक्षा दी। मृदंग बजाना सिखाया संस्कृत की शिक्षा दी। 6 संग ध्यान का महत्व सिखाया उनके नाम ही लिया था। तो और चोट की योजना करते थे और कई बार पूछते रहते थे। अगली गाड़ी वृंदावन कब जाएगी, अगली गाड़ी पूरी कब जाएगी। आज फ़ोन द्वारा पूरे विश्व का टाइम टेबल मंगा सकते हो। नहीं थी तो। और फिर पापाजी स्कॉटिश कॉलेज कैलकटा में पढ़ाई कर रहे थे। उन दिनों में स्कॉटिश कॉलेज सबसे प्रसिद्ध कॉलेज माना जाता है। और सारे प्रोफेसर वह इंग्लैंड से आते थे। 1922 में प्रापा जी के 1 मित्र थे। मलिक जिसने प्रापा जी से कहा, यहाँ 1 खास संत है। कैलकटा में। मैं चाहता हूँ कि तुम मुझसे मिले, फिर चल कर। मिलो पापाजी ने कहा मैं तो कई संतों को मिल चुका हूँ। मैं किसी से भी प्रभावित नहीं हुआ। पर इस मिशन ने जिद की। पापा ने इलेक्शन में कहा वोर्ली ड्रैग मी टू सी माई, स्पेशल मास्टर, लगभग मुझे खसीरकरलेगएमखती को मिलने के लिए। और चेतन मा। पबूजी भविष्य ने क्या दी थी। 1 दिन विश्व के हर कोने में हरी नाम पहुँचेगा और हमारे माचायों में पूरा विश्वास था कि भविष्यवाणी पूरी होगी। बाकी ठाकुर ने 1 ग्रंथ लिखा था चेतना के ऊपर और वो ग्रंथ। उन्होंने विश्व के प्रसिद्ध महा विद्यालयों में भेजा था। कौनसे साल जिस साल परबागी प्रकट हुए थे, पृथ्वी पर भर्ती सिन्हा सजती ठाकुर, जिन्होंने शिक्षा और आदेश ठाकुर से प्राप्त किया, उन्होंने भी कई सन्यासी 34 सन्यासियों को भेजा था इंग्लैंड में जर्मनी में कृष्ण भक्ति की स्थापना करने के लिए। पर बिना यारा सफलता के उन्हें लौटना पड़ा। 1 सन्यासी शिष्य इंग्लैंड में गये थे। यहां 1 हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य ने कहा कि हाँ, मुझे ब्राहमण बनाओ। जब उन्होंने कहा कि इन नियमों का पालन करना पड़ेगा। फिर उन्होंने कहा मैंने ब्राहमण नहीं बना। तो कई वैशस सोच रहे थे। हां मां प्रभु की भविष्य वाणी तो हैं पर यह सफल नहीं निकलेंगे। भक्ति शिधानदाजीको पूरा विश्वास था। पहली मुलाकात में ही भक्ति शीधानदाजीपचान गए की ये है वो युवक जो कि महा प्रभु के आदेश का पालन कर सकता है। पहली मुलाकात में उन्होंने कहा तुम पड़े लिखे युवक को अच्छी अंग्रेजी जानते हो, क्यों नहीं महा प्रभु के संदेश को पश्चिम देशों में ले जाओ प्रचार के लिए। और पापाजी ने कहा। क्योंकि उस समय पापा जी गांधी जी के स्वतंत्र के आंदोलन के स्टूडेंट लीडर थे। पापा ने कहा पहले हमें देश को स्वतंत्र बनाने 2 और फिर बाकी सादाजी े। कहा ऐसी स्वतंत्रता है। जन्म मृत्यु के बंधन से राजनीतिक स्वतंत्रता तो देशों को मिलती रहती है। जैसे बाराका इंडिपेंडेंट से पंद्रह तारीख को है। ये कौन सा इंडिपेंडेंट से है, नाइंटीन फोर्टी सेवन है, कौन सा सेवेंटी सेवेंटी। अमेरिका में कुछ हफ्ते पहले तो अमेरिका का साढ़े 300 इन इंडिपेंडेंट स डे मना रहे थे, कैराना में थे तो उस समय कैराना कैराना का निवोइजवीमनारेहै इंडिया का सेवेंटी, फॉर से। वो ये राजनीतिक इंडेपेंडेंस होते रहता है। परभाकीसीधारनदी ने कहा कि असली इंडिपेंडेंस क्या है जन के बंधन से, तो ये भाव आदेश पापाजी ने सीने में बिठा लिया था। और प्रापाजी की स्थिति ऐसी थी कि वो पूरे रूप से इसका पालन नहीं कर पाए। पापाजी को अलग अलग शहरों में रहना पड़ा पयागालाबाद में वहाँ उन्होंने 1 फार्मेसी खोली थी जिसका नाम था प्रयाक फार्मसी और वहाँ भक्ति सिनांताजीआए थे गुडिया मर के सन्यासी आए थे मंदिर खोलने के लिए। पापाजी उन दिनों में बड़े एक्टिव ली इनकी मदद करते थे मेरे प्रापाजी ने 1 बैंक गार्ड पर शिकायत शुरू की। वो केवल 4 पेज की पदक थे और उनके गुरु का आदेश था। 1932 में प्रापा जी बॉम्बे में थे कि बकीसिनजीने बाकी सिना नदी ने गुणियामंत की स्थापना की और उन्होंने 64 मंदिर खोले भारत में और कई विदेशों में और हजारों भक्तों को दीक्षा दे के कृष्ण भक्ति की स्थापना की। तो 1932 में भक्ती सिधाना जी ने अपने सन्यासियों को भेजा था बॉम्बे में बंदर खोलने के लिए, तो प्रभा जी ने बड़े एक्टिव ली इन बक्सों की मदद की। और जब भक्ति सिधानदाजीसबको सुनाई दे रहा है पीछे भक्ति सिधान्त जी बॉम्बे आए थे मूर्तियों की स्थापना के लिए, तो पर उनके शिष्यों ने कहा अबे बाबू ने इतनी मदद किए, हमारी उनको यहाँ का प्रेजिडेंट बना। 2 यहाँ वो हैं। 2 1935 में। 1935 में प्रापा जी ने 1 पत्र लगा था बाकी सिधानी जिसमे उन्होंने कहा आपके इतने सन्यासी शिष्य हैं जो आपकी इतनी सेवा कर रहे हैं। मैं आपकी ज्यादा सेवा नहीं कर पा रहा। आदेश दीजिये भगतीसिदादजीने इस पत्र में वो ही आदेश दिया जो कि उन्होंने पहली बार मुलाकात में दिया था। तुम पढ़े लिखे युवक हो। संदेश को तो ये भाव था प्रभाजी मन में और नाइंटीन फोर्टी फोर में। उन्होंने मैक मैगजीन शुरू की। 1950 के करीब 4 शुरू किया जान सी में थे। यहाँ की उन्होंने निगोडी संस्था की स्थापना की और जिसके प्रभाजी वृंदावन में जी के मन में 1 भाव था, क्या व कैसे ये सन्देश को पश्चिम देशों में ले जाया जाए। वैसे भक्ति सिदांदाजीबड़े प्रभावित हुए थे। प्रापा जी की का उत्साह देकर और भक्ति सिदांदजीकेशब्द में प्रापा जी बड़े ध्यान से सुनते थे। 1 समय भक्ति सदा हजारों भक्तों के साथ यात्रा कर रहे थे और भक्तों के पास ये छूट थी या वो भक्ति सीदा। यहाँ 30 के स्थानों की यात्रा करते। लगभग सबने चुना कइयों ने यात्रा करने के लिए सन्यास नहीं चुना का उपदेश सुनेंगे। और जो वो सुनते थे, बड़े ध्यान से सुनते थे। ध्यान से सुनना आवश्यक है। तो बाबा जी ने फिर रहने गये, जैसे आप जानते हो। वहाँ उनके बाद 1 पुराना टाइपराइटर था। बिल्कुल पुराना वो इस टाइपराइटर के ऊपर ग्रंथों का अनुवाद करते थे। पहले प्रापा जी छोटे अखबार छापते थे। गोल 1 लाइबरेरी ने कहा स्वामी जी या छोटे अखबार छापते हो, अखबार तो लोग पड़के फेंक देते हैं। आप के ताबक्नीछापेपराबाजी ने सोचा, यह संदेश भगवान द्वारा आ रहा है, जिसके पश्चात जी ने यह निर्णय कर लिया। अब मुझे ज्यादा बल देना चाहिए। किताबों की छपाई के ऊपर बहुत ही कठिनाई से उन्होंने पहले श्रीमद भागवत का पहला भाग छापा। पहले स्कन को उन्होंने इन भागों में छापा था जो पहला स्कन छापा और दूसरे स्कन के लिए दूसरे भाग के लिए धन की आवश्यकता थी। उस समय पापा जी के पास कुल मिलाकर कोई 140 रुपए थे। उनकी पूरी सम्पति 140 रुपए की थी और दिल्ली में धनी बिजनेसमैन थे, जिनका नाम द दालमिया जो, कोरी दानी भी थे। पापा जी उनके पास गए। ये विनती लेकर मैं सीमन भगवा छापना चाहता हूँ। आप से योग 2 जामिया ने कहा आप अपनी मैने स्किप्ट हनुमान प्रसाद पोदार को दिखाओ हनुमान प्रसाद पोदार गीता ब्रेस की स्थापना की थी और बड़े धार्मिक वैशनवारसंजन थे। ब्रापाजीयने मिलने गए थे। इस कारण स्थापना के पश्चात तो 40 रुपए खर्च कर पापा जी को लखनऊ जाना पड़ा। लखनऊ से गोरखपुर और हनुमान प्रसाद प्रधान इतने प्रभावित हुए थे। पापाजी का मैंने स्किप देख कर के उन्होंने 6000 पर रिलीज कर दिए। भागवत तो इस प्रकार भागवत का पहला भाग छप गया। तीसरे भाग के लिए किसी ने पापा से कहा क्या बॉम्बे जाइए। वहां बड़ी धार्मिक औरत है जिसका नाम है, जो संतों की सेवा करती है। वो गोडियामांदकीभी सेवा कर चुकी थी। बाजी मॉम में गये, वो मॉम में पहुँचे। श्रीमती मोरारजी के सेक्रेटरी का नाम था चोकसी गुजराती थे तो उन्होंने पापाजी को मिलने नहीं दिया की बड़ी वियस औरत है, समय नहीं है। प्रापा जी ने सोचा निकलना तो श्रीजी मुरारजी ने इसी रास्ते से है। तो 5 घंटे के लिए सीढ़ियों में बैठकर। प्रापा जी जॉब कर रहे थे। और शाम के समय श्रीमद मुनार जी घर जा रही थीं। तो उसने 1 सन्या स्वामी को देखा। बैठकर जॉब कर रहा है। उन्होंने अपने सेक्टर से पूछा हो कौन रही है? तो उन्होंने कहा कि वे वृंदावन से 1 स्वामी आये हैं वो चाहते की आप, उनका सहयोग 2 भागवतम को छापने के लिए गोद, 2 भाग और छाप चुके हैं। प्रापा मराठ जी से। और उसने कहा कि आप तो काफी देर हो गई है, कल सुबह आना मेरे दफ्तर में? वो प्रोपज से मिली बड़ी प्रभावित हुई। उन्हें मैने स्केल बड़ी अच्छी लगी। उन्होंने सोच कहा है स्वामी जी, आप 2 जो भी खर्चा होगा, मैं दूंगी। बाबा जी बड़े खुश हुए। तो जब सीमा भागवत, प्रथम स्कंध 3 भागों में प्रकाशित हो गई। फिर पापा जी ने सोचा अब मेरे पास हथियार हैं। विदेश जाने के लिए। पापा जी सोचते रहते थे, विदेश जाना पक्का नहीं था। और पापा जी ने कहा मैं सोचते रहता था, में जाऊँ कौन से रास्ते े टोक्यो के द्वारा, यूरोप के द्वारा, यह एशिया के द्वारा, टोक्यो के द्वारा। उन दिन में तो वैसे भारतीय लोग सबसे पहले इंग्लैंड जाते रहे। और परवाज ने कहा कि मेरे इंग्लैंड जाने की रुची नहीं थी। तो पापाजी ने प्रयास करना शुरू किया कि किसी प्रकार से क्या हो विदेश जाने की योजना बनाई जाए। पापा जी ने कहा कि कई बार मैं सोचता था, मैं न्यूयार्क पहुँच चुका हूँ थे, वृंदावन में, मैं सोच में न्यूयार्क पहुँच गया हूँ। और मेरा प्रचार शुरू हो गया है। 1 समय 1 सजन मिले थे प्रापा जी से, तो पापाजी ने बुकलेट छापा था। अंतर्राष्ट्रीय प्रचार के विषय में। पापा ने उससे कहा मंदिर हैं, सब भक्त हैं, सिर्फ समय का भाव है। 1 दिन यह सब प्रकट हो जाएंगे। जो बाबा जी के 1 मित्र थे, इतने गहरे मित्र भी नहीं जिनका नाम था। अग्रवाल वो मथुरा में वयापारी थे। तो प्रौपाजी उनसे मिले और यह प्रौपाजी को पता लगा कि उनके बेटे अमेरिका में रहते हैं। मटलरसवेनियामें। तो पापाजी ने अग्रवाल जी से कहा आप अपने बेटे के द्वारा मुझे स्पोंसरशिप की ना आप लोग स्पॉंसरशिप मानते हो। विदेश जाने के लिए, घूमने के लिए पापा जी का स्पोंसरशिप चाहिए थी। प्रचार आरम्भ करने के लिए। पापाजी ने बड़े हल्के तरीके से मांगा था। और पापा जी के शब्दों में उन्हें बिल्कुल ध्यान नहीं था कि ये कुछ करेंगे। बाबूजी ने ऐसे हल्के रूप से अग्रवाल को कह दिया। अग्रवाल ने तुरंत अपने बेटे को लिख दिया। बेटे का नाम था गोपाल। अग्रवाल की इस भक्ति विंदा स्वामी अमेरिका आना चाहते हैं। संदेश प्रचार आप उनको स्पोंसर करो स्पोंसर करने का मतलब है। 1 पत्र दिखाओ बैंक के प्रमाण के साथ कि जो भी व्यक्ति आएगा उतना, खर्चा, पानी सब आपकी जिम्मेदारी होगी। तो गोपाल। अग्रवाल ने बैंक का स्टेटमेंट लेकर इंडियन कांस्लेट न्यू यॉर्क को पत्र डाला कि मैं भक्ति नंद स्वामी को स्पोंसर करने को तैयार हूँ। तो 3 महीने बाद अचानक पापा जी के बाद 1 पदर कि यह पका स्पोंसरशिप ब्लैडर आया है। अमेरिका से। रामा जी आश्चर्य हो गए थे, क्योंकि उनको 1 पर्सेंट उम्मीद बनी थी कि आगा का बेटा भेजेगा स्पोंसरशिप लैडर आ गया। तो बाबा ने सोचा कि भगवान प्रेरणा दे रहे हैं, भगवान का कोई लक्षण है इसमें। फिर आगे ट्रांसपोर्ट बनाया। उन दिनों में भारत से जाना। आना काफी लंबा रास्ता था जाने के लिए 1 सर्टिफिकेट चाहिए होता था। जिसे कहते थे पी फॉर्म, वो पी फॉर्म आजकल नहीं लेना पड़ता। पी फॉर्म का मतलब है। इस व्यक्ति का कोई कर्जा नहीं है। भारत में यह विदेश जा सकता है। तो प्रॉपर ने स्टेट बैंक में बी फॉर्म के लिए अप्लाई किया। बाबाजी वो अधिकारी को मिलने गए। उस अधिकारी ने स्वामी जी है बैग नज फॉर यू में आप के लिए बुरी खबर है। मेरे पास ये जो निमंतन आया है, आपका अमेरिका से, इसका कुछ वैल्यू नहीं। पापा ने कहा क्यूँ ये निमंतन आया है। पर इनविटेशन के लिए। आप तो जा रहे हो धर्म का प्रचार करने के लिए तो आपको इंस्टीट्यूशनल स्पोंसरशिप मंगाना चाहिए। इंस्टीट्यूशनल स्पोंसरशिप मतलब की कोई संस्था अमेरिका में कहे हम आपका खर्चा पानी देंगे तो परा हवाजीने कहा दिस इज नॉट कनेक्ट? i want a speaker bos राबजी। उसके बॉस को उसके बॉस ने भी राह, बाबाजी। वेट कर रहे थे। राव आया अपने दफ्तर से भार पर लगे स्वामी जी, मैंने आपका काम कर दिया। घबराओ मत मिल गया। अब क्या बच गया। विदा टिकट टिकट के लिए। पापाजी कहियों के पास गये, कहींयो के पास। सब ने कहा इस उम्र में अमेरिका जाना। सिटी नाइन 70 साल के होने वाले थे। और कहीं ने कहा स्वामी जी, अमेरिका जाना तो बहुत महंगा है, हम सहयोग नहीं ले सकते। फिर किसी ने प्रौपर्जी को सूचना दी थी कि वो श्रीमति मरारजी जिसने आपके सहयोग दिया था, भगत छापने के लिए। उसके पानी के जहाज भी चलते हैं। फिर पहुँच गए उनकी। सैक्टरी ने कहा वो स्वामी जो पहले आया था, भागवत लिए। अभी उनको अमेरिका जाने की टिकट चाहिए तो श्रीमती मोना जी ने कहा स्वामी को बोलो इस उमर में अमेरिका जाने का कुछ फायदा नहीं जायेंगे। तो जिंदा वापस भी लौटे उनको भारत में ही रहकर अनुवाद करने। 2। तो चोकसी ने ये संदेश दिया, नहीं नहीं नो नो। i musk muskot मा गुरु ऑrdrश्ीममनाजी को मिले श्री जी को कह रही थी, कभी विदेश नहीं गए, कभी ठंडे मौसम में ले गए। आप कैसे जाओगे। हाँ। पापाजी ने कहा नो नो नो आई, मस्क को गुरु का आदेश है। उसने कहा आप शायद जिंदा।
मिली
ने कहा कुछ घबराने की ा। अंत में जब शीमदीमुरारजीे देखा कि बाबाजी का इतना गहरा भाव है गुरु के आदेश को पूरा करने के लिए। अंत में उन्होंने कहा अच्छा मैं आपका सहयोग दूंगी पर आप कारगोलशिप में जाइए कार्गो शिप, मत में कितने मके, पानी के जहाज की यात्रा की है, कार्गो शिप है, मालगाड़ी माल, गाड़ी में अब यात्रा करते हो। भारत में तो कार्गोरशिपमें 1 ही कैबिन था, पुरे जहाज में 1 ही कैबिन और वो कैबिन उन्होंने किया था। तो इस समय जी के 200 भागवत से 3 भागों में तैयार हो चूका था। ब्रपाजिन्होंने कोचिन भिजवाया दूध चला था, क्या करा से मे गया था, श्रीलंका श्रीलंका से गया था। कोचीन और कोचीन में जाकर उन्होंने पापा उन्हें उठाया, तो श्रीमती मोना जी धार में कौन थी और प्रबंध के लिए हर प्रकार का प्रबंध किया। 500 रुपए दे अपने सेकेट्री चोकसी को, स्वामी जी को गरम कपड़े खरीद के 2 और यहाँ आज का कैप्टन कौन था। अरुण पांडे उनसे कहा स्वामी जी का का ध्यान रखना। तो पापा जी कैरकरा पहुँचे की यांचा से चलने से 2 हफ्ते पहले पापाजी ककरा पहुँचे। उनके पास कोई याने का ठिकाना नहीं था, हालांकि 1 समय निवास करते थे, कोई रहने का ठिकाना नहीं था। 1 मिस्र भारिया था जिससे उनकी बेचान थी क्यूकी जब पापा जी राधा राम मंदिर में थे, तो 1 समय यूपी का गवर्नर को पापाजी ने निमंत्रण दिया था। और उस गवर्नर ने लखनऊ में राजधानी में राज भवन में पापा जी को निमंत्रण दिया था। जहाँ पापाजी गए थे वहाँ उनका पद परिचय हुआ। 1 भटाचार्य के साथ ये जो बटर चारिया है संगीत कार था, तो प्रभा जी का उसका परिचय हुआ लखनऊ में प्रभा जी बटाचारियाको मिले, फिर प्रावा जी गए मायापुर धाम बागी के समान में, उनको प्रणाम करके आशीर्वाद मांगे। फिर पराबाजीकाकरा वो सारे अखबारों के पास गए। प्राप पत्रिका छापी थी my mision, जिसमें उन्होंने भागवत भगवद चर्चा की थी और कहा था श्री बी द होल। वो तो भटाचार बाबा जी को लेकर प्रभाजी चोटी 5 पोरसाइसफोडो थी सारे अखबारों के पास गए, कोई छापे कि अमेरिका जा रहे हैं, किसी ने कुछ नहीं छापा, केवल 1 छोटे माली पेपर में छापा अमेरिका जा रहे प्रचार करने के लिए भागवतम को लेकर। तो सुबह 9 बजे 13 तारीख बाबा बाबा जी जालजाला। अगर वो जला दूर जहाज आज होता तो उसके के अगर आप छोटे छोटे टुकड़े ऑक्शन करते तो मालिक उसके पति बन जाते। पर ही 30 40 साल पहले उन्होंने क्रश कर दिया था। जहाज प्राजी जहाज में गए तो उन्हें 2 हार्ट अटैक हाय पापा जी अपने साथ 1 छाता ले गए थे, और थोड़ा सा सामान और 1 बेंगाली चेतन पढने के लिए। और जब पापा जी को टिकट दी थी सिंधिया कंपनी ने तो 1 छोटी डायरी भी दी थी। पापा जी ने वो डायरी का उपयोग किया रोज का अनुभव लिखने के लिए। और थोड़े दिनों बाद हार्ड अटैक हुआ सी सिकनेस पानी के जाल में यात्रा करो। पहली बार बहुत उल्टियां आती हैं। जवान प्रापा गए थे उनके जन्मदिन से कुछ दिन पहले, जनमस्मीसे कुछ दिन पहले जन्मजी की योजना शिप में की थी। पापाजी ने धान में भंडारा बनाया, सबको खिलाया और जान में थे। 2 हांड टैक हुए थे। और जब हांड टैक हुआ, प्रभाजी ने सोचा और मेरी योजना सफल नहीं होगी, मुझे इंग्लैंड अमेरिका जा कर वापस आ जाना चाहिए। प्रभा जी को पास पुर के साथ अमेरिकन सरकार ने 3 महीने का वीजा दिया था, बाजी न्यूयॉर्क पहुंचते ही उन्होंने रिजर्वेशन कर लिया वापस आने के लिए। 1 महीने बाद। तो प्रभा जी को निमंतन दिया था किसने है। तो उन्होंने प्रमा जी का अपने प्रतिनिधियों के द्वारा स्वागत किया। मटरपसबेनियाछोटा शेयर था आजकल अमेरिका में तो बहुत भारतीय दिखते हैं, पूरे जमाने में बहुत कम दिखते थे, तो पेंसलवेनिया में प्राण रहने के लिए गए। गोपाल प्रापा जी गये थे, 3 महीने के वीजा के साथ, प्रापा जी की योजना थी 2 महीने में वापस भारत आ जाना। जैसे प्रापा जी न्यूयार्क पहुँचे, उन्होंने अपना रिटर्न का टिकेट बुक कर दिया। 2 महीने में वापस जाना है। तो प्राबाजीठहरे थे लगभग 1 महीने के लिए बटलर पेंसिलवेनिया में और 1 महीना वहाँ ठहरे थे। तो सब लोग ये गोपाल अग्रवाल की जो पत्नी थी उनका नाम था सैली अग्रवाल, वो थी अमेरिकन, औरत तो सब उसको फ़ोन करके पूछ रहे थे ये कौन है इंडियन साधु आपके घर में रह रहा है, क्या परिचय है इसका? तो ये साला आ गई इतने पडोसी सब लोग पूछे कौन है साधु? तो उसने पापाजी 1 प्रेस कॉन्फ्रेंस करो जिसमें सबको आपका परिचय मिल जाएगा। प्राबाजीको प्रेस कॉन्फ्रेंस की योजना बनाई जिसमें कई रिपोर्टर, आए और प्रॉपर्टी का परिचय दिया गया था संस्कृत कॉलर ट्रांसलेटर और श्रीमद भागवतम बिंगिंग इंडिया मैसेज पीस हारमनी। तो 1 कॉलेज व पड़ोस के शेयर में, जिसका नाम था sliprirocoleg slipriकॉलेज, ऐसे नाम आपको केवल अमेरिका में मिलेंगे और कहानी? तो स्लिपरी रॉक रॉक कॉलेज में 1 फिलोसोफी का प्रोफेसर था उसने पढ़ा कि 1 बड़ा प्रसिद्ध संस्कृत का विद्वान पड़ोस के शेयर में है। तो उसने मिसेज अग्रवाल को फोन कर के पूछा। आपके शेयर में ये भक्त स्वामी आये हैं, उनसे उन्हें हम निमंतन दे सकते हैं क्लास में लेक्चर देने के लिए, जैसे आप लोगो को कभी कभी निमंत्रण मिलता है स्कूल में जाने के लिए, तो सैलiगवाननेप्रॉपरज से पूछा samiti wi बी इंटरstediनgiving लेक्चर तो अमेरिकन स्टूडेंट्स, ये पैरा लेक्चर था प्रॉपर का अमेरिकन को। जब उन्होंने पूछा की आप तैयार और लेक्चर देने के लिए पापाजी की तो आंखें एकदम खुल गयी पापाजी मेरे लिए को पर करने के लिए। तो पापाजी ने अपना प्यारा लेकर अमेरिका में या स्लिप रॉक कॉलेज में और नेक्टर के बाद प्रावाद हमेशा पूछते थे क्वेश्चंस? एनी क्वेशन और विद्यार्थियों ने इतने अच्छे प्रश्न पूछे कि प्रापा जी बड़े प्रभावित हो गए थे प्राबाजीने सोचा अमेरिकी लोग कृष्ण भक्ति के लिए तैयार हैं, वे पापाजी पेंसिलवेनिया छोड़कर नियोक आये प्रचार शुरू करने के लिए। 1 दिन पापाजी नीक में 1 बेंच में बैठे थे और पापाजी के पास बेंच में 1 कंडक्टर बैठा था भारत में, तो बस कंडेक्टर के पास बैठा गए ने विदेश में कोई भेदभाव नहीं होता। हम मे राष्ट्रपति हो या सादे व्यक्ति हो। व कंडक्टर का नाम था लुबन लुबन वो बैठा था प्रभाजी के साथ, उसने ऐसे ही प्रभाजी को देखकर पूछा what यू डू वट य प्रोफेशन प्रभाजी ने कहा मैं प्रचार करता हूँ, मेरे मंदिर हैं और भगत हैं हजारों। और इस समय प्रकट नहीं हुए। suntewillbemenfsd ने प्रचार अपना शुरू किया और आप से जानते हो टॉम किम स्क्वेयर पार्क में को जानने किर्तन करने के लिए। इस प्रकार प्रचार शुरू हुआ। भक्तों ने पहला केंद्र खोला। न में 1 बूटी की दुकान थी और उस दुकान का नाम क्या था? मैं जल्द के वो गिफजिसकीकोईमकामना नहीं कर सकता। तो मैंने सोचा कि संक्षेप में आपको ज्यादा दूध। सम्बंधित कथा दी जाए। तो पापा जी ने बड़े परिश्रम के साथ प्रयास के साथ ग्रंथों का अनुवाद किया। बड़े ग्रंथ के साथ केंद्र खोले। और ने पूरे समाज को शुद्ध संदेश दिया। हमें भी बड़े उत्साह के साथ नियमों का पालन करना चाहिए, जैसे आप जानते हो। बाबा जी भारत से निकाले थे कितने रुपये के साथ, $4 के साथ 4 या $5 पर। प्रभा जी को पूरा विश्वास था गुरु का आदेश है, अगर प्रयास किया जाए तो जरूर सफल होगा। ये बात हमें भी रखना चाहिए। hykisnaanyquestions yes quik ज्यादा दूर जहाज में जा रहे थे, उन्हें कोई छोड़ने के लिए नहीं आया। 1 बडा 4 या टैक्सी में आया था राज को छोड़ने आता है, कोई स्वागत करने आता है को छोड़ने में लगभग कोई नहीं आया। अमेरिका में स्वागत करने में कोई नहीं आया। धन्यवाद आपका संग प्राप्त करने के लिए। महाराज जब मुरारजी देसाई, श्रीमती मुरार जी, श्रीमती मोरारजी देसाई जूनियर। प्रापा जी को एग्री किया देने के लिए। और चिंता भी कर रही थी कि प्रपात का ध्यान रखा जाए और पायलट को भी बोला। फिर उन्होंने कार्गो में क्यों दिया और दूसरा जब प्रपात को हाटटाकआयतोक्या कोई ट्रीटमेंट लिया। प्रोपाजीने खरगोश शेप में क्यों दिया। मेरे ख्याल से उनके पास पैसे थे, नहीं छोटी कंपनी थी। पापा जी बड़े खुश थे कारगो शेप में भी जाने के लिए। पापा जी ने ये नहीं सोचा। जब आप लोगो को आदेश दिया जाता है, इस सेवा करो वहाँ जाओ तो आप क्या सोचते हो? क्या सुविधा मिलेगी वहाँ पहुँचने में। भगवान ने सपने में मानद पुरी से कहा, मुझे गर्मी लग रही है, अभी भी चन्दन लाओ मेरे लिए। और मदनपुरी ने इतनी बड़ी यात्रा की गोदान से रेशा केवल चन्दन लाने के लिए। उन्होंने ये नहीं कहा। मैं कैसे पहुंचा आपको कहा जाए के लिए 1200 मिल की यात्रा करो। आपको गे ये कैसे सम्भव होगा पूरी बिना कुछ पूछे तुरंत चल पड़े चन्दन। उसी प्रकार यह प्रापाजीकोश्रीमति राजी ने कहा, आपको हम कारगोज जहाज में दे सकते हैं। स्थान प्रापा जी ने ये नहीं कहा कारगोज जाज उसमें यात्रा कैसे होगी? खारगोशझाज़ में कोई जाता है क्या? जो कैप्टन अरुण पांडे था, उनकी जो पत्नी थी, बाबाजी ने कैसे हुआ कहा, बड़ी थी और वो अच्छी स्टॉलेजरथीजोशी। उसने प्रभा जी का हाथ देखा था। मैंने पापा जी से कहा, आपकी ये घटना निकल जाए। जो हार्ड अटैक हुई थी, उसके बाद आपकी योजना आवश्यक सफल होगी। या प्रभाजी के 2 हार्ट अटैक हुए। मेरे ख्याल से कोई मेडिकल सहयोग नहीं था। पापा जी को रहा था की अब मेरी योजना सफल नहीं होगी, क्योंकि मेरा समाज ठीक नहीं है। भगवान ने क्या किया? अगले दिन पापा जी को 1 सपना आया, जिसमें भगवान कृष्ण नाव के पटवार थे और पूर्वी उस नाव में पापा जी और देवता थे। भगवान ने कहा अरे बाबू घबराओ मत तुम्हारी योजना सफल होगी। पापाजीने। इस सपने की चर्चा कोई कई सालों बाद भक्तों को सुनाया। प्रवाल ने पहले इस सपने के बारे में किसी को बोला भी नहीं था। कोई 10 15 साल बाद, 10 साल बाद शैल पापा जी ने सपना सुनाया तो आपने पूछा इलाज हुआ कि नहीं? तो इलाज था भगवान का सपना। ok,
thank you very much for imgeजingrेssoprops। मेरा प्रश्न है महाराज की, जिस जो समर्पण भाव शील परोपा ने हमारे लिए प्रस्तुत किया है। उदाहरण के रूप में इसको हम कैसे अपने जीवन में उतारे। हम भी गुरु परंपरा के प्रति किस
प्रकार समर्पण भाव बढ़ाए उदाहरण द्वारा हमें कई प्रकार के संदेश दिए हैं। 1 संदेश ये है की हमें घबराना नहीं चाहिए, प्रयास करते जाना चाहिए। 1 समय पापाजी ने पूरे भागवत गीता का अनुवाद किया था अपने हाथों से प्रपात के पास न कोई शिष्य थे, न कोई हथियार प्रॉपर वैज वन मैन आर्मी, वन मैन आर्मी समझते हो। 1 ही व्यक्ति हर काम कर रहा है। तो प्रापा जी खोज रहे थे कि कोई उनका सहयोग दे बड़ी कठिनाई से 1 सूचना मिली, 1 चिनाई में 1 आदमी है जो मैनेज देखना चाहता है और मेरे सहयोग भी दे तो भागे भागे क्या करा गए मे्किपकलानेके लिए। जब वहाँ घर पहुँचे तो क्या पता लगा किसी ने वो के रूप तो साधारण व्यक्ति तो डिस्करेज हो जाता। पापाजी ने कहा नहीं फिर से उन्होंने तो इस प्रकार का दर्द भाव होना चाहिए हमारे में और ट्राय ट्राइन अगेन प्राबाजी के उदाहरण से यह भी देखते हैं हमें प्रयास करते जाना चाहिए। पुरे प्रॉपर आदेश दिया था 1922 में ब्रहमाजी भारत से निकले 1900 पैसठ में कितने साल बाद फोर्टी वन फोर्टी, वन ईयर्स तक प्रयास करते गए? गुरु के आदेश का पालन करे गे in america पहुंचकर भी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। so you are asking now what points to n?
i was asking? how can be delap the same level of surendar to the guru parmpara that
propthedwitring everything is boswyeomakinefrd en provas, life? begin see how forty when years? he was never ing and i never stopedamaninis last days on the planet, when he was physically betting sick, i did not stop in translation work? ओके animo, अभी हम कोई भी स्टेज
लेना चाहते हैं अपनी लाइफ में, तो बहुत सारे प्रश्न हमें घेर लेते हैं कि इसके बाद क्या होगा, कैसे करेंगे, इसका रिजल्ट क्या होगा? लेकिन बात उस स्टेज में भी मतलब उस एज में भी जाकर 1 स्टेप लेते हैं और उनको कोई प्रबल प्रॉब्लम फेस करते हैं उनको कौन सी शक्ति थी जो आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती और मतलब हम कैसे उनसे सीख सकते हैं और अपनी लाइफ को भी आगे बढ़ा सकते हैं।
अगर हम अच्छी साधना रखोगे और प्रयास करते जाओगे, शासनकी, शिक्षा पर विश्वास कर तो आप भी सफलता प्राप्त कर सकते है ं we dont tray ट्राई वी वांट सी ट्राई करना हमारा फर्ज है, बाकी हमारे आदमी नहीं है। पापा जी प्रयास करते गये, करते गये करते गए हालां कि कहीं 1 बार जान सी में विंग ने बॉडी की स्थापना कर रहे थे, किसी ने चापलूसी करके वो स्थान ले लिए वापस बाबा जी जब भी कालेज नहीं हुए तो आम भक्तों में यह भाव होना चाहिए कि चाहे कितनी भी कठिन स्थिति हो, हमें सेवा से पीछे नहीं हटना, फिर आप सफलता प्राप्त करोगे। okay लारा मारले।
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