Akshaya Tritiya Special Lecture | 25 Apr 2020 | Zoom | Srila Gopal Krishna Goswami

In this recorded Zoom lecture delivered on Akshaya Tritiya, Srila Gopal Krishna Goswami recounts the legendary origin and contemporary practice of the Chandan Yatra – a 21‑day pilgrimage in which devotees apply sandalwood paste to the deity. The narrative begins with a devotee named Manpur (also referred to as Maanpur) who, guided by his guru Ishwarpuri, receives a divine dream instructing him to install a Krishna (Gopal) idol that had been hidden during the period of Muslim rule when many temples were destroyed. The story describes the collective effort of villagers to locate the site, restore the 56‑year‑old idol, and perform a rapid, community‑wide consecration, offering cows and other gifts. The lecture then details the ritual of daily sandalwood application for twenty‑one days, emphasizing its symbolic purpose of honoring the deity and cultivating selfless service. Throughout, Srila Goswami weaves moral lessons about overcoming the “comfort zone,” embracing difficult service, and maintaining devotion despite external challenges. Historical references to the destruction of idols, the protection of sacred images, and the broader mythic tapestry—including episodes of the Pandavas, Rama, and other Vedic figures—are used to illustrate timeless principles of bhakti. The talk concludes with a call for devotees to internalize these teachings, apply them in modern life, and continue the Chandan Yatra as a living tradition.
Chapters
चंदन यात्रा 21 दिनों के लिए और इस कॉल के सारे मंत्रों में भगवान को चंदन के साथ सजाया जाता है। व चंदन यात्रा का उत्सव बड़ा प्रश्र उत्सव है। और ये सब शुरू हुआ था अक्षय तृतिया के दिन, तो संक्षेप में इतिहास इस प्रकार का है मान पूरी बहुत ही ऊंची कोडी के भक्त थे भगवान के वो, उनके शिष्य का नाम था ईश्वरपुरी और जिनके शिष्य का नाम था क्या जतिन महाप्रभु महाप्रभु के गुरु थे पर ईशापुर के गुरु थे। मानपुर महानंदपुर बहुत ऊंची कोटी के भक्त है। वो कभी किसी से कुछ गते अगर कुछ मिल गया खाने को तो खाते थे नहीं तो भूखा रहते थे। तो माल पुरी ने 1 दिन गोमापुरीनेएकदिन गोरधन परिक्रम समाप्त किया था और गोरधन परिक्रम समाप्त करके गो इंद कुन में विश्राम कर रहे थे। आप जब गोदान परिक्रम करते हो, गोविंद के गोला मटके में दूध लेकर आया, कहने लगा मुझे लगता है आप के हो आज दूध पियो, मैं थोड़ी देर में लौटता हूँ मटका लेने के लिए। वहाँ नरेंद्र पुरी ने इतना खुबसूरत कभी कोई बालक को नहीं देखा था उनका कंठ इतना मधुर था इतनी मधुर आवाज भी उन्होंने कभी सुनी नहीं थी, वो मदनपुरी राह देख रहे थे गोवाला आएगा मटका लेने के लिए कोई गोवाला आया ही नहीं और मदनपुर को हल्की सी नींद आ गई। नींद में वही गोला फिर सपने में आया और ग्वाले ने कहा मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत ही खुश हूँ। उन दिनों में भारत के उत्तर भारत में मुसलमानों का राज्य था और कई प्रसिद्ध मंदर उनकी मूर्तियों को दबा दिया था। वृंदावन में कई मूर्तियां नष्ट हो गई थीं, कई मूर्तियों को ले गए थे जयपुर में जामुल हिंदू राजा था इसलिए जयपुर को खुब वृंदावन भी कहा जाता है। तो मान पुरी को सपने में भगवान ने क्या कहा मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत ही खुश हूँ। पर मुझे मुसलमानों की हत्या से बचाने के लिए पुजारियों ने दबाकर छुपा दिया था। मैं मुझे वहाँ बहुत गर्मी लग रही है। आप लोग को गर्मी लग रही है। आजकल मुझे बहुत गर्मी लग रही है मैं चाहता हूँ तो मुझे निकाल कर मेरी स्थापना करो। मानपुरी ने देखा वह बालक जिसने उन्हें दूध दिया था, यही बालक भगवान हैं। तो वो शर्मिंदा हो गए, क्यों शर्मिंदा हुए उन्होंने भगवान से सेवा ले ली, उन्होंने भगवान से सेवा ली, भगवान के हाथों में हाथों से दूध लिया जो उत्तम कोटी का भक्त है वो केवल भगवान की सेवा करना चाहता है, भगवान से लेना नहीं चाहता। हम तो जब जैसे वो जाग जाते हैं तो शॉपिंग लिस्ट बनाकर ले जाते हैं। ये खरीदना, ये खरीदना, ये खरीदना तो हम भी रोज भगवान को अपनी शॉपिंग लिस देते है। यह चाहिए, ये चाहिए, ये चाहिए। तो वो जो शुद्ध भक्त है उसकी 1 ही इच्छा रहती है सेवा और कुछ नहीं। तुम पुरी शर्मिंदा हुए, मैंने भगवान के हाथों से दूध पी लिया और दूसरी तरफ से दुखी थे, भगवान का दर्शन किया उन्होंने। चाना भगवान थे मान आप को, भगवान मिल जाए कोन परिकम करते हुए आप चना आपको दुख होगा कि नहीं। ये दुख था कि मानो पूरी सामने भगवान आये न्होंने भगवान को पहचाना ही नहीं। खैर अगले दिन सुबह वे पुरी ने अपना सपना सारे गाँव वालों को सुनाया की। भगवान ने सपने मे ये आदेश दिया। सारे भक्तों ने कहा चलो चल कर देखते हैं वो सपना सत्य था या नहीं। और बड़ी कैंची लेकर सबने झाड़ियों को काटा और खोदा और उसी स्थान पर जिस स्थान का वर्णन था सपने में और उसी स्थान पर उन्होंने देखा गोपाल का बिगड़ा। कहा जाता है कि इस विग्रह की स्थापना 5 साल पूर्व हुई थी, 56 साल पुरानी मूर्ति और फिर माल पुरी ने सब साथियों भक्तों को जोड़कर, सब ने बड़े उत्साह से मूर्ती की स्थापना की, योजना की। 2 दिन के अंदर पूरी योजना हो गई और ब्रज का हर या सब भक्त जुड़ा इसके साथ और सब सेवा में जुड़े और सब ने अपनी तरफ से पूरी सेवा की। कहा जाता है भगवान जो हैं वो असली मालिक हैं पृथ्वी के, तो सब ब्रिजवासियों ने अपनी गाय खेती, सब गोपाल को भेंट के रूप में अर्पण कर दिया और 2 दिन में पूरा प्रबंध कर लिया। तो हम लोग मंदिर खोलते हैं, हमें कई दिन लग जाते हैं मंदिर की तैयारी करने में और 2 दिन में मां पुरी ने सब भक्तों को जोड़कर सारी तैयारी कर दी, 900 लोटे पानी के लाये, कोई न कोई से और 2 दिन के बाद गोपाल का मसाज किया, अभिशेक किया और फिर उनकी स्थापना हुई तो पूरा ब्रज जुड़ गया था। ऐसे में तो इस प्रकार मानपुर ने मानपुर ने कुछ सेवा शुरू कर दी। रोज सारा दिन सुबह से शाम तक महान पूरी खुद सेवा करते थे और रात को भगवान को सुनाने के बाद रात को विश्राम करते थे। 1 ही पुजारी थे आपके मंदिर में, अगर मैं पूछूं कितने पुजारी हैं तो आप कहोगे 67 पुजारी तो होंगे है कि नहीं प्रमाद पुरी का क्या स्टैलेट था, सारी पूजा खुद करते थे, खुद भगवान को भोग बनाना, खुद भगवान को भोग चढ़ाना, खुद भगवान की आरती करना, खुद भगवान को रात को सुनाना और भगवान को सुनाने के बाद थोड़ा सा दूध पीते थे और सोने जाते थे। ये थी उनकी खुराक देखो क्या भाव सुबह से रात भगवान की सेवा। अगर आपको ये सेवा दी जाए, आप राधा की सेवा करो और रात को खाने को मिलेगा आप तैयार करोगे, कोई करेगा शायद नहीं करेगा तो सुनाई दे रहा है थिंग क्लियर यो वॉइस डेफिनिट ओके। तो इस प्रकार 2 साल तक सेवा होती रही भगवान की और 2 साल बाद मादपुर को फिर 1 सपना या इस सपने में भगवान ने कहा मैं तुम्हारा आभारी हूँ कि तुमने भक्तों को जोड़कर मेरी स्थापना की है और मुझे अभी भी गर्मी लग रही है। और मैं चाहता हूँ की तुम जाओ जगनाथ पुरी और मेरे लिए चंदन लेकर आओ चन्दन। और माधुरी ने तुरंत भगवान से कहा ठीक है अगर आज आपको बोला जाए चन्दन लेकर आओ देश के लिए। पहले तो आप पूछोगे प्लेन टिकट मिलेगी ट्रेन तो ट्रेन टिकट तो मिलनी चाहिए। आपको खा जाए, नहीं पैदा जाना पड़ेगा। फिर क्या करोगे? यह तो संभव नहीं है। कई बार भगवान अपने भक्तों को बड़े कठिन चैलेंज देते हैं। जैसे मधुवेंदपुरी को भगवान मधुवद्रपूरीकी परीक्षा ले रहे थे, वो परीक्षा ले रहे थे। कितना त्यागा है। भगवान ने उन्हें बहुत कठिन सेवा दी। क्या जाओ, जगना पूरी तक वहाँ से मेने चंदन लेकर आओ। और ये भी यात्रा करो। पूरी यात्रा पैदल, ऑनफोटयेनहीकीटांग में जाओगे, उठा ले जायेगा। मानपुर, तुरंत तैयार हो गए। तो हमें भूलना नहीं चाहिए। हम भक्ति के मार्ग में जोड़ते हैं। ये नहीं कि हर चीज होगी। हमारी इच्छा के अनुसार इंग्लिश में 1 फ्रेस है। कम्फर्ट जोन आपने पहले सुना है। कम्फर्ट जोन डीजी गुरवार समझते हो। अर्थ ये है हम सेवा करेंगे। पर हमारी इच्छा के अनुसार हम सेवा दोगे, सुविधा दोगे। हमें चाहिए। फिर तो सेवा की उम्मीद है। अगर आप ऐसी कठिन सेवा दोगे। सौरी बैडलक ये कम्फर्ट जोन की सेवा तुम ने परीक्षा ली। यहाँ भक्तों को सेवा दी जाए। समाप्त करो द्वारका मंदिर जल्दी से जल्दी। तो जो श्रद्धालु है, जरूर क्या करना चाहिए। हमें पूरी 2 बंगाली पुजारी आए थे, उनको शिक्षा देकर, दिक्षा देकर। वो चले जंग पूरी की। और रास्ते में, वो शांतिपूर्ण में, रुके। शांतिपुर में दवेतचागा स्थान था। अधिवेद चाय, हिदाज ठाकुर। अधवेदाचाया को माँ विष्णु का अवतार माना जाता है। अधवेदाचायऔरभाईदा भगवान से प्रार्थना की थी आप प्रकट हो जाओ पतितों का उद्धार करने के लिए। वेद देखा। वे पुरी का भाव 24 घंटे जुड़े थे। भगवान के चिंतन में, गगन में आलवेदचानेपुरी से भी मांगा देखा। ली अधीक्षा लेकर। फिर मदनपुरी आगे बढ़े, शिक्षा देकर। तो वह फिर पहुंचे। यमुना में, यमुना में 1 बड़ा ऐतिहासिक मंदर था। असल में चेतन मा प्रभु। भगवान ने नंदा के साथ यात्रा करते करते गाँव, गाँव जाते जाते, पहुंचे रेमुना में। और हाँ प्रभु ने कहा, मैंने अपने गुरु ईश्वरपुरी से 1 बड़ी पिसल कथा सुनी थी इस मंदिर के विषय में, तो वो पहुंचे कहा रमुना। रमीना में, जब पहुँचे, आप में से कितने भाग गए। और देविना के मंदिर में। हादि बड़ा। प्राचीन मंदिर है राधा गोपीनाथ का। कहा जाता है कि उस विग्रह को बनाया था भगवान राम ने। जब वो पृथ्वी पर थे, यह बताने के लिए कि द्वापर युग में इस रूप में मैं प्रकट होगा। तो यमुना का मंदिर है, प्राचीन मंदिर है। और यह बड़ा प्रसिद्ध मंदिर है। खास करके भगवान ने यहाँ खीर का प्याला चुराया था। मंदिर ने पूरी जगह इस मंदिर में पहुंचे। उन्होंने वहां के पुजारियों से पूछा कि क्या है? लोग भगवान को क्या भोग लगाते हो, किस प्रकार से पूजा करते हो? इत्यादि और रामचंद्र मानपुरी के मन में। ये इच्छा थी। अगर किसी प्रकार से मुझे यहाँ मिल जाए। टेस्ट करने के लिए। यहाँ जो भोजन महा प्रसाद, भगवान को चढ़ाया जाता है। मैं भी अब भगवान के लिए ऐसा प्रसाद बनाऊंगा। कहा जाता है कि जो प्रसाद व बनता था, उसको कहा जाता था क्या नाम था उसका। अमृतकेली वो प्रसाद सड़क में बनकर आता है। ये इच्छा प्रकट हुई जब कि भगवान को भोग लग रहा था आप में ग्रामीण दिखे। तो जानते होंगे नियम। यह होना चाहिए। जब भोग हम तैयार कर रहे हैं, हम सोचें भगवान खाएंगे। इससे पहले भगवान को भोग लगाने के बाद हम खाते हैं। यह नहीं, हम बनाते हैं और सोच रहे हैं। लगते ही हम खाएंगे। ऐसा भाव नहीं ना चाहिए। मानपुरी शर्मिंदा हो गए की मेरी इच्छा प्रकट हुई भोग चखने की, क्योंकि भोग लग रहा था तो बिना चखे हुए महान पुरी मंदिर छोड़कर चले गए बाजार में जॉब करने के लिए। पर हम भगवान के लिए कोई कार्य असंभव है। कई गम बुद्धि के व्यक्ति सोचते हैं। यह भगवान की मूर्ति तो पत्थर की है। पर वैश्ना क्या सोचते हैं? ये पत्थर की नहीं है। न? स्वयं मूर्ति में उपस्थित है। जो व्यक्ति ये सोचे, ये पत्थर की लकड़ी की है, मार्वल की मूर्ति है, उन्हें भगवान के विषय में पूरा ज्ञान नहीं है। अलवेदमुजूदेबनादी नंतर रूपम, अध्यम पुराना पुरुषों न भगवान प्राचीन है, देखते हैं सबसे युवक, तो भगवान ने क्या किया अपने बग की सुरक्षा के लिए, बग की इच्छा को पूरा करने के लिए। रोज शाम को इस मंदिर में बाला खीर के प्याले भगवान को भोग लगाए जाते थे। और भगवान ने 1 प्याला चुरा कर छुपा दिया किधर छुपाया पर्दे के पीछे और पुजारी को कहा मैंने खीर का प्याला चुरा कर छुपा कर रखा है पर्दे के पीछे। तुम उठाकर इन्हें भग को दे। 2 तो पुजारी को विश्वास नहीं हुआ। भगवान ने खीर का प्याला चुरा कर पर्दे के पीछे रखा है एम पॉसिबल। यह कैसे हो सकता है? तू खैर स्नान करके भगवान को जगाया रोज सुबह। भगवान को जगाते हैं मंगला से पहले, जब पर्दा बंद होता है रात को, फिर भगवान को सुलाती भी है। तो उनको जगाकर उंचाई ने देखा सचमुच ये सच है कि क्या था भगवान ने खीर का प्याला चुरा कर रखा था अपने भर के लिए, तो ये पुजारी सोच रहा था। कौन है है भाग्यशाली मानपुर जिसकी खुशी के लिए भगवान ने खीर का प्याला चुराकर रखा। कौन है सो गए बाजार में? यहाँ कोई मदन पुरी नाम का भक्त है। मदन पुरी ने सुना उनके नाम को पुकारा जा रहा है। उन्होंने कहा मैं हूँ। तो जी ने कहा तुम जानती हो कि कितने सौभाग्यशाली हो तुम्हारे लिए। भगवान ने खीर का प्याला चुराया था, पूरी की इच्छा थी इस खीर को चखने के लिए, क्योंकि रोज शाम को वाला खीर के प्याले वाहन को चलाए जाते थे। और शर्मिंदा होकर निकल आए की उनकी इच्छा प्रकट हुई का भोग लग रहा था। तुम्हानंपुरी बड़े खुश हुए और नाचने लगे खुशी में रोज 11 टुकड़े को चखते थे, पूरे शहर में, खबर फैल गई। यहाँ 1 संत है जिसकी खुशी के लिए भगवान ने की प्याला चुराया है। तो ली जाए गए बड़ी भीड़ हो जाती थी लोगो की, तो वैसे तो देखा जाए शदधालतोचाताहै उसका गुणगान है कि नहीं सच बोलिए शादी आप का गुणगान हो सबके और सब सबके आप कितने फर्स्ट क्लास डिवोटी हो, मारे जासा बोडी तो देखा नही हमने के उत्तम कोटि के भक्त हैं, वो सोचते हैं, हमारे में कोई गुण नहीं है, केवल अवगुन हैं। और मानो पूरी। उनको क्या डर था, उनको डर था। अभी सब को सूचना मिल गई है कि वो है वो भक्त जिनके लिए भगवान ने, वो है वो भक्त जिनके लिए भगवान ने खीर का प्याला चुराया है। तुम क्या भैया से भाग दे। 2 मुझे वो चाहते नहीं थे, लोग उनका गुणगान करे। हम तो चाहते हैं, हमारा गुणगान हो, हमारी तारीफ हो, हमारा नाम लिया जाए, ताडिया मारी जाए, हमें हार चढ़ाया जाए। है ना। और अगर गलती से नाम छुट गया तो फिर युद्ध शुरू हो जाता। पर मदन पुरी उनकी क्या इच्छा थी, किसी को पता नही लगे। ये कौन है? वो भाग गई जगतपुरी वहाँ उन्होंने जगनतपुरी के अधिकारियों से अपना परिचय दिया, कहा कि के इस प्रकार भगवान के आदेश को पूरा करने के लिए जलंदरऔजलपुरीआए हैं। चंदन इकट्ठा करने के लिए जंगल पुरी। मंदिर के अधिकारियों ने उनका सहयोग दिया है। एलिट पाउं चंदन और कैंफर 8 डाउन्स का इकट्ठा किया, साथ में 1 भग भग दिया और साथ में 1 सेवक भी दिया। उन दिनों में पूरे भारत में मुसलमानों का शासन था और चुंगी वाले थे, अक्सर मुसलमान थे। वो बकैदा हिंदुओं को बहुत तंग करते थे। तो माँ बगान ने आदेश दिया बड़ा कड़क। और उनकी परीक्षा ली। तो मा पुरी चले पुरी से गोर दल। वापस आने के लिए। रास्ते में फिर से उन्हें यमुना के मंदिर में आना पड़ा। और भगवान ने सपने में उन्हें फिर 1 आदेश दिया। भगवान ने कहा महानंद पुरी, तुम परीक्षा में पास हो गए हो। मैंने तुम्हें 1 बड़ा कठिन कार्य दिया था। चंदन लाओ, पैदल यात्रा करके। तुमने बोले, बगैर, इतनी लंबी यात्रा की और चंदन। घर या मेरे में और गोपीनाथ में कोई अंतर नहीं है। मेरे में। मतलब, गोपाल, विगहा, गोपीनाथ, मतलब, कि, न मंदिर की मूर्तियां हैं मेरे में और गोपिनाथ में कोई अंतर नहीं। तुम यही चन्दन लेकर गोपिनाथ की मूर्ति को सजा। 2 और जो खर्च आयेगा मैं लूंगा अगले दिन सुबह पुजारियों ने, मानो ने पूरी नहीं सपना सुनाया पुजारियों को, वो तो खुश हो गए थैंक यू वेरी मच, टी, टू पाउं चंदन मिल रहा है। आपके रुकवीदवारकेदेश के मन में कोई सुबह कह दे, ये सी चंदन तो खुश जाओगे। तो फिर 2 हफ्ते, 2 हफ्ते, 2 हफ्ते के लिए रोज। माने पूरी अपने हाथों से भगवान को चन्दन लगाते थे। ये उत्सव हम 21 दिनों के लिए मनाते हैं। युशोहगाकलहमाधनपुरी ने खुद 2 हफ्तों के लिए खुद चंदन लगाया और दूसरों को सिखाया। भगवान को चंदन कैसे लगाया जाता है। तो माधवपुरी को इस कथा में आप देखते हो। 3 बार भगवान ने आदेश दिया। सच बात है। पहली बार जब वो गोविंद खुन में थे, दूसरी बार कब, जब मैंने कहा चंदन के लिए जाओ और तीसरी बार गोपीनाथ के मंदिर में आप पूछोगे या कहोगे हमें भी इस सपने में बहुत आदेश मिलते हैं, हमें भी उनको पूरा करना चाहिए। कल सपने में आदेश मिला था कि हमें फुटफॉल बढ़ा देना चाहिए। कोई दूसरा मुझे सपना है, मंदर बनाना चाहिए। पहले तो हम इन सपनों का विश्वास करते हैं। हाँ या ना। प्रापा ने कहा, यह तुम शुद्ध भगत बन जाओगे, जो अपने सपनो को वैल्यू दे। ना, जब तक शुद्ध भगत नहीं बनते, डोंट वैल्यू ड्रीप तो इससे अच्छा है। हम आदेश लें और भगवान ने परीक्षा ली। मां ने पूरी की चन्दन कर। 2 वो हालांकि मुस्लिम अधिकारी थे। हालांकि उन्हें इतनी गोदान से मीना कितने किलोमीटर होगा, किसी को पता है 2000 तो होगा तो इतनी लंबी यात्रा होगी। अकेले। तो इसी प्रकार हमारे में ये भाव और रज है। भगवान की खुशी के लिए। अगर हमारी परीक्षा ली जाती है तो हमें तुरंत तैयार रहना चाहिए। आप देखो प्रॉपर के जीवन में उन्हें कितना लंबा संघर्ष करना पड़ा। 1 समस्या दूसरी समस्या और जब अमेरिका पहुंचे, जब भी पहले 2 सालों के लिए इतनी कठिन समस्याओं का सामना करना पड़ा। न्होंने कभी यह नहीं कहा गुरुजी आम सौरी मैं नहीं कर सकता। गुरु का आदेश था ले जाओ महा प्रोप संदेश को। पश्चिम देशों में हमारे भक्तों में यह कमी दिखती है तो हमें चैलेंजिंग पद दिया जाए। कठिन कार्य हम पीछे हट जाते हैं। नोट फर्मी हमारे लेनी है। पर आप करोगे पर दे कृपा प्राप्त करोगे। तो इस कथा के काफी लंबी कथा है और और हमारे भगवान नसक यज्ञ हो रहा है। यहाँ भक्तों की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा नसंगययज्ञरोज होता है। आपको दिख रहा है। जी हाँ, हम चाहते हैं कि कोरोना वायरस का प्रभाव, उनकी ताकत जल्दी पंक्चर हो। जाए है क्योंकी काफी बक्त दुखी है। हमारे बुक सीविट कह रहे हैं, यह तो बहुत लंबी छुट्टी मिल गई, ऑफिस जाना चाहते हैं। मैंने उनको कहा शायद तुम को 1 और 6 तारीख को तो हमें प्यार रहना चाहिए भगवान के लिए, तपस्या का पालन करने के लिए। और तपस्या करेंगे तो भगवान की कृपा प्राप्त होगी। तो ये चन्दन यात्रा का उत्सव कल से शुरू होगा और 3 हफ्ते के लिए चलेगा। मेरे खयाल से मंदिर पब्लिक लि तो बंद है, पर भक्ष दर्शन ले सकते है। और कल है बड़ा शुभ दिन अक्षर और में 1 जो लीला है आज के दिन शुरू हुई थी। आज के दिन। प्रौपर ने जान सी में लीग डिवोटीज को भी रजिस्टर किया था। आप जानते हो कि प्रौपर ने जानसी में लीग आउ डिवोटीज की स्थापना की थी। इस कॉलम का पहला नाम था नीगआउडिबोडीज। और जानसी में पापा जी को 1 सान प्राप्त हुआ था। उन्होंने आज के दिन इस कॉल रजिस्टर किया था। नीगाउडिबोडीज के नाम पर वही लीग आउट बोडीज बाद में बन गई। इस कॉन इस कॉन बन गए। तो आज के दिन 1 और कथा है। वो कथा है पांडव भाइयों की। पांडव भाई जब जाते थे, एग्जाइनमेंअ जंगल जा रहे थे। बनवास में उनके साथ हजार और रिषी मुनी भी जा रहे थे। ये ने कहा कि सब रिशी बुनी, मेरे साथ आयेंगे। को भोजन में कैसे खिलाऊँगा। यह महल में था तो आतंकवाद है और जंगल में कैसे खिलाऊँगा। तो यूसर ने सूर्य के देवता को की सेवा की। उन से पूछा सूर्य के देवता ने अक्षय पद दिया। अक्षय पद नाम सुनाया आपने वेरी फेमस इन स कॉन अक्षय पत्र मिला था सूर्य के देवता द्वारा, को रनिया में था गोरी द्रोपदी के खाने तक, अक्षय पत्र से लाखों क्या करोड़ों आदमियों को फूटफोहोजमिलजाएगा द्रोपदी ने खा लिया तो फिर अगले दिन तक किसी को नहीं मिलेगा। तो आई थिंक आपको ऐसा अक्षय पत्र मिल जाए तो आपका मंदिर जल्दी से बन जाएगा। तो दवा मुनि अपने 10 हजार शिक्षों के साथ आए थे। दुर्योधन के घर में मुनि के विषय में कहा जाता है आसानी से प्रसन्न होते हैं और आसानी से क्रोधित हो जाते हैं। तो रोज की बड़ी अच्छी देखभाल की और निकलते समय वास मुनि ने कहा आप ने इतनी अच्छी देखभाल की है, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ? बोलिए आप किसी घर जाते हो, वो अच्छा खातर करता है, आप पूछते हो मैं क्या कर सकता हूँ? तो दियोदर ने कहा जैसे आपने मेरे छोटी कुटिया को पवित्र बनाया है, मेरे भाई की कुटिया को भी पवित्र बना लो आ उनके घर जाइए उनके घर आ जाना। दोपहर को 12 बजे के बाद पता था 12 बजे तक लो दिखाना खाले। दोपहर को जब दासी पहुंचे घर यदेश उनका स्वागत किया में कहा जाता है अगर कोई शत्रु भी तुम्हारे घर में आये तो उसका स्वागत करो, अच्छी तरह स सु भी आए। तो ने स्वागत किया और कहा आ प्रसाद खाओ। तो मेने कहा ठीक है, हमें जाकर स्नान करने 2 तो पका स्नान करके आते हैं, फिर हम खाएंगे। तो यदेश द्रोपदी से कहा 10 हजार आदमियों के लिए प्रसाद तो द्रोपदी एकदम घबरा गई 10 हजार आदमियों के लिए। मैंने कभी दोपहर का प्रसाद खा लिया। अब कैसे यह संभव होगा? वो रोने लगी जो भक्त है सुख में और दुःख में, दोनों ही स्थितियों में किस को याद करता है किसको कृष्णा को सुदधोपरीनेभगवान से प्रार्थना की। अब बचाओ अभी विवाद ने आएगा घर में कुछ होगा नहीं खाने के लिए, तो हमें श्राप दे देगा। बचाइए बचाइए जैसे वो सोच रही थी, मन में प्रार्थना कर रही थी, बचाओ मुझे किसी ने आकर के दरवाजे में खटखटाया और भगवान ने कहा भगवान थे रो पाती कुछ खाने के लिए है नहीं, मैं खा चुकी हूँ, कुछ भी नहीं नहीं, जो कुछ न कुछ होगा। मुझे खुद देखने 2 हो गए रसोई में फोन ने क्या देखा 1 चावल सब्जी के साथ 1 दाल चिपका होता। भगवान ने कहा तुम क्या ते हो कुछ नहीं है। 1 दाना भगवान ने खाया तो सारे ब्रामणों का पेट भर गया और सबको लगा सबको अचकी आने लगे, अजी आने लगी तो द्वार स मनी समझ गए। आगे भगवान की लीला चल रही है क्योंकि अमरीश मनाज के साथ उन्होंने अनुभव कर लिया था। शुद्ध बत विरोध करने का क्या प्वाइंट है? तो भासा ने कहा अभी तो हम सब को भूख लगी थी और 1 दम पेट भर गया है, यहाँ जरुर कोई ले रहा है, वो वहाँ से भागे तो भगवान ने भीमसेन से कहा जाओ दवा ही सबको लेकर आओ। शाद खाने के लिए सो गए मिशन बुलाने के लिए। वहाँ साधु ने कहा अरे जिनको तुम पुकारते वो सब भाग गए यहाँ से थोड़ी देर पहले हमने देखा 11 करके सब भाग गए तो तो लौटकर वो सब चले से भगवान अपने भक्तों की सुरक्षा करते हैं। राके कृष्ण माने के आगे क्या माने कृष्ण, हाय राम, राम ले हरे।
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