भगवान की शरण लिए बिना मुक्ति संभव नहीं | BG 08.07 | 14 Jan 1996 | Mumbai | Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī teaches that liberation requires taking refuge in God through the Hare Krishna maha-mantra, sixteen sacred words that bring the devotee into the Lord's protection. He explains how to use all five senses for divine remembrance and assures that householder life is no barrier to spiritual progress if one chants the divine name and abandons impure thoughts.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमो भगवते वासुदेव, म नमो भगवते वासु। देवाय। आज हम आपके समक्ष भगवत गीता के सार को रखेंगे। भगवत गीता में भगवान अर्जुन को बोलते है की वो ज्ञान उनको दे रहे हैं क्योंकि अर्जुन उनके भक्त हैं और भगवान कहते है इस कारण तुम इस ज्ञान को समझ पाओगे। तो अगर हम भगवत गीता के महत्वपूर्ण संदेश का लाभ उठाना चाहते है तो ये अवश्य है कि इस ज्ञान को हम भक्त द्वारा स्वीकार करें। जैसे की अगर आप डॉक्टर के नुक्से को, डॉक्टर के आदेश के आधार पर लोगे दवाई को फिर तो उसका प्रभाव पड़ेगा और अगर आप अपनी मनमानी कर कर दवाई को ग्रहण करोगे तो उसका कुछ असर नहीं पड़ेगा। तो भगवत गीता में भगवान कहते हैं पारित नया साधु, नाम, बिन, दुष्काम, धर्म नार्थ समवामियोगयोगेकी वो अवतरित होते हैं। धर्म के नियम की स्थापना करने के लिए। मानव जीवन और पशु जीवन का अंतर यह है कि मानव जीवन की प्राप्ति के पश्चात धर्म के नियमों का पालन व्यक्ति कर सकता है और पक्षों के जीवन के द्वारा ये धर्म के नियमों का पालन नहीं किया जा सकता। जैसे की आज इस बैठक में हम आपके समक्ष गीता का सार रख रहे हैं और आप सब सावधानी के साथ ये शहर को सुन रहे हो। प्रिय सम्भव नहीं हो सकता कि पशुओं को आगे बिठाया जाए और वो सावधानी के साथ इस सन्देश को स्वीकार करे। आप जानते हो की मानव जीवन के द्वारा जो सुविधा प्राप्त है वो पशुओं के द्वारा प्राप्त नहीं होती। जैसे की अगर आप सड़क में लाल बत्ती के होते हुए सड़क की दूसरी तरफ जाओगे तो आपका पुलिस वाले पकड़ लेंगे और अगर कोई कुत्ता लाल बत्ती के होते हुए और दूसरी तरफ सड़क के जाता है तो पुलिस उसको पकड़ती है। नहीं पकड़ती सरकार रोज कानून बनाती है, आप लोगो के लिए, प पशुओं के लिए नहीं। क्यूँ। क्यूँकि ये उम्मीद किया जाता है कि जो पशु हैं वो नियम का पालन नहीं कर सकते। पर मानव जीवन के द्वारा ये धर्म के नियमों का पालन किया जा सकता है, सरकार के नियमों का पालन किया जा सकता है। इस कारण विधान सत्र में कहा गया है। अर्थात ब्रह्मा जिज्ञासा की अब ये मानव शरीर प्राप्त हुआ है। मानव शरीर के द्वारा ये जिज्ञास करना चाहिए के हम हैं कौन? हम किधर से आ रहे हैं और हम किधर जा रहे हैं। अगर आप किसी विदेश में जाओ तो सबसे पहले उस देश के इमिग्रेशन वाले लोग आपको पूछते हैं कि आप हो कौन? फिर वो पूछते हैं, आप इधर से आ रहे हो और फिर वो पूछते हैं कि आप किधर जा रहे हो? तो उसी प्रकार हमें भी इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करना है। अगर हम आपसे पूछे की आप हो कौन? तो आप शायद उत्तर में कह दोगे आप मेसे शिव दसानी हैं, मिर्चंदानी है वगैरह हम कहते हैं आप नहीं हो ये शरीर। अगर हम आपसे पूछे की आप किधर से आ रहे हो तो आप कहोगे हम मलास नगर से आ रहे हो, है और आप कहेंगे पूछेंगे आप किधर जा रहे हो? तो आप क्या दोगे, रिश्तेदार या किसी दोस्त का पता। पर हम आपको यह बताना चाहते हैं कि आप ये शरीर नहीं हो, आज आप ये सोच रहे हो की आप ये शरीर हो, पर आप ये शरीर नहीं हो क्यूंकि ये शरीर तो बदलता रहता है। यह भौतिक शरीर जो की अनेक भौतिक तत्व के मिश्रण से उत्पन होता है, ये तो बदलते रहता है। जो शरीर है वो छ अवस्थाओं से गुजर कर जाता है। सबसे पहले तो यह जन्म लेता है, फिर यह बड़ा होता है, फिर यह ठहरता है, कुछ पैदा करता है, सीन होता है, अंत में नष्ट हो जाता है। और आत्मा जो है न तो कभी उसका जन्म होता है और न ही उसका देहांत होता है। और अगला प्रश्न यह था कि आप किधर से आ रहे हो, हम सब भगवान के धाम से आ रहे हैं। और अगला प्रश्न है की आप किधर जा रहे हो। और शास्त्र में यह खंडन किया जाता है की कर्म के आधार पर हमारा भविष्य निश्चित होता है। कार, मन, नेतन, जंतु देव, पते, स्त्री, पर आधार पर हमारा भविष्य निश्चित होता है। यह तो हमें जल की योनी में जन्म प्राप्त हो सकता है। यह हमें स्थावर योनी में जन्म प्राप्त हो सकता है। यह हमें पक्षियों की योनी, पक्षी की योनी, कीड़े की योनी, 84 लाख किस्म की योनियां हैं, जिनमे केवल 6 लाख योनिया ही मानव की योनियां हैं। जिस प्रकार का हम कर्म करेंगे, उसी के आधार पर हमारा भविष्य निश्चित होता है। इस कारण शास्र में ये बताया जाता है कि सावधानी के साथ इस जीवन का उपयोग करना चाहिए। क्योंकि कोई ये नहीं कह सकता कि भविष्य में किस प्रकार का दे हमें स्वीकार करना पड़ेगा। तो शास्त्रों का यह कहना है कि पशु के जीवन और मानव के जीवन में अंतर है। अंतर यह है कि पशु की बुद्धि में केवल ंदियतििकीभावना ही लिप्त रहती है। पशु जो है सुबह से रात तक केवल इंडिया चिप्टी का ही सोचता है। पशु जो है वो केवल यही सोचता है की किस रूप से इंडिया चिप्टी प्राप्त होगी। खाना, पीना, सोना, बहुत विलास। और अगर हम मानव जीवन की प्राप्ति के पश्चात इसी प्रकार के विचार रखेंगे तो इस जीवन में और पशु के जीवन में कोई भेद नहीं है, धन नहीं, नहीना, पशु भी समाना। तो कहने का अर्थ यह है भाइयों और बहनों की आपको। भूलना नहीं चाहिए कि आपके इस शरीर में और जानवर के शरीर में अंतर है। और यह भी भूलना नहीं चाहिए कि आज जो शरीर आपके पास है वो कठिनाई के साथ प्राप्त हुआ है। ये मत सोचिए कि यह मानव शरीर सरलता के साथ प्राप्त हो सकता है। तो वैदिक शास्त्रों का यह कहना है कि मानव जीवन के द्वारा विष्णु की प्रशंसा के लिए कार्य करना अनिवार्य है। विष्णु की प्रशंसा के लिए अगर हम कार्य करेंगे तो फिर ही हम ये जन्म मृत्यु के बंधन से अपने आप को मुक्ति प्राप्त कर सकेंगे। तो ही हम इसके द्वारा छुटकारा प्राप्त कर सकेंगे। तो भगवत गीता में भगवान अर्जुन को कहते हैं कि तुम इस युद्ध में लड़ो। भगवत गीता। कुरुक्षेत्र के युद्ध में ये देखा जाता है कि अर्जुन की इच्छा नहीं थी, इस युद्ध में लड़ने के लिए है की नहीं। जब भगवान ने कहा की तुम सक्रिया हो और तुम इस युद्ध में लड़ो, तो अर्जुन ने क्या कहा नहीं मैं नहीं लड़ सकता, मैं इस युद्ध में लड़ने को तैयार नहीं हूँ, क्यूँ की मेरे रिश्तेदार मारे जायेंगे। और भगवान ने क्या कहा युद्ध की मन के द्वारा मेरा चिंतन करो। और हे अर्जुन तुम इस युद्ध में जा कर लड़ो, तो उसी प्रकार ये जो आज हमने जन्म लिया है, ये जो भौतिक जगत है, यह 1 रूप से युद्ध का मैदान है। और अगर हम ये सोचे की हम ने इस युद्ध के मैदान में नहीं लड़ना, हम घर में बैठेंगे जंगल में जायेंगे, पहाड़ो में जायेंगे तो वो भी सम्भव नहीं हो सकता। तो जिस प्रकार भगवान ने अर्जुन को आदेश दिया की तुम इस युद्ध में लड़ो पर मन के द्वारा मेरा चिंतन करो, उसी प्रकार हमें भी इस भौतिक जगत में कार्य करना है। पर भगवान के चरण कमलों की शरण ग्रहण करनी है तो ही हम अपने जीवन को सफल बना पाएंगे। आज समाज में यह समझा जाता है कि अगर किसी भी रूप से धन की प्राप्ति हो जाए, अगर किसी भी रूप से संपत्ति बना ले तो हमारी सुरक्षा हो रही है और ये सम्पत्ति के द्वारा हमारी रक्षा की जाएगी। धनी व्यक्ति को भी मृत्यु के सामने झुकना पड़ता है, शक्तिशाली व्यक्ति को भी मृत्यु के सामने झुकना पड़ता है। क्यूंकि यह भौतिक जगत में जन्म मृत्यु जरा जो इसके सामने हर व्यक्ति को झुकना पड़ता है। अनेक रूप ऐसे हर व्यक्ति को दुख सहना पड़ता है। भौतिक जगत के 2 लक्ष्य हैं, 1 लक्ष्य खाल, आयाम, दूसरा, लक्ष्य, शा 1 तरफ से, तो भौतिक जगत में दुखी दुख है, अनेक रुप से दुख सहना पड़ता है। आप सबने देखा है कि जब बच्चा माँ के गर्भ से निकलता है, बच्चा जब माँ के गर्भ से निकलता है तो केवल वो रोते हुए ही निकालता है, हँसते हुए नहीं आपने यह जमाया है। रुस के द्वारा ये सूचना मिल रही है की जिंदगी भर रोना ही पड़ेगा। हम सोचते हैं कि नहीं नहीं हम हँस पाएंगे, पर अगर आप हँसना चाहते हो तो उपाय हैं, पर अगर आप वो उपाय की नहीं लोगे तो फिर रोना ही पड़ेगा। उपाय क्या है भगवान के चरण कमलों की शरण। जिस प्रकार अगर आप स्वतंत्र के साथ 1 देश में रहना चाहते हो तो ये अवश्य है कि आप देश के नियमों का पालन करो। जैसे की हमारे भारत देश को 1 स्वतंत्र देश माना जाता है। जो भी कार्य कोई व्यक्ति करना चाहे वो इस देश में कर सकता है। और इसके साथ आपके ऊपर यह जिम्मेदारी है के आप सरकार के नियमों का पालन करोगे। ठीक है न? अगर आप सरकार के नियमों का विरोध करोगे तो स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं उठता। उसी प्रकार से अगर हम परम सरकार के नियमों का पालन करेंगे तो ही हमें सुख की प्राप्ति हो सकती है। सुख की प्राप्ति भौतिक इंदिया तिप्ती के द्वारा नहीं हो सकती। श्रीमद भागवत में महाराज ऋषभ देव की कथा है। महाराज कृष्ण देव पूरे पृथ्वी के राजा थे और महाराज रिषभ देव के सौ पुत्र थे। तो महाराज कृष्णदेव अपने पुत्रों को बुलाकर 1 उपदेश दे रहे थे। शास्त्र में कहा गया है कि व्यक्ति को पिता नहीं बनना चाहिए, व्यक्ति को गुरु नहीं बनना चाहिए, व्यक्ति को पति नहीं बनना चाहिए, जब तक कि वह अपने शिष्य को, अपनी पत्नी को, अपनी लात को शुद्ध मार्ग में नहीं लगा सके। तो महाराज देव की यह जिम्मेदारी थी कि जो पुत्रों को उन्होंने जन्म दिया है उनको ये बताया जाए कि उनका स्वाभाविक कर्तव्य क्या है। तो महाराज कृष्णदेव ने अपने पुत्रों को बुला कर कहा ना हम देह दे भाजमिलोकेकस्तम का, भुज पुत्र का ये सत्व महाराज कृष्णदेव जी ने कहा हे पुत्र तुम ये जीवन का उपयोग पशुओं के समान मत करो। पशु जो है ये जीवन का उपयोग करते हैं। खाने, पीने, सोने, भोग विलास के लिए। तो प्रश्न उठता है, हम करें क्या? जीवन के द्वारा को दिव्य पुत्र का तुम तपस्या उठाओ। भगवान की प्रशंसा के लिए आज भौतिक वादी व्यक्ति भी तपस्या उठाता है परन्तु तपस्या उठाते है भौतिक सफलता प्राप्त करने के लिए है की नहीं। जैसे ही अगर कोई पॉलिटिशन भी इलेक्शन में जीतना चाहे तो वो भी 2 दिन बाद सत्यागर करता है। भूख हड़ताल करता है, जेल में जाता है, है की नहीं। आपको धन कमाना हो तो आप को भी गधे के समान परिश्रम करना पड़ता है। सबा 4 बजे लोकल ट्रेन में भरी हुई रहती है, कोई उठना थोड़ी जाता है, पर जबरदस्त आपको उठना पड़ता है आपके उस में भी फैक्ट्री नाइटसूट में भी चलती होगी। रात का कोई काम करना चाहता है। कभी भी जबरदस्ती जाना पड़ता है तो ह भौतिक शोक के लिए तपस्या उठाने को तैयार है। पर आध्यात्मिक शोक के लिए ठीक नही क्यूंकी। अज्ञानता के कारण, अज्ञानता के कारण हम भूल रहे हैं की ये शरीर नाशवान है, समय के साथ ये शरीर नष्ट हो जाएगा और आत्मा का ना तो कभी जन्म होता है न ही मृत्य न जायते। मेवा कदा तो आत्मा नष्ट नहीं होती, शरीर जो है वो नष्ट हो जाता है। तो जो बुद्धिमान व्यक्ति है वो महाराज देव के आदेश का लाभ उठाता है। महाराज विष्णदेव आगे उपदेश देते हुए कहते हैं 9 नाम प्रवता गुरु थे। विकर्मा ये दिंदियप्रियतप्रणोती देव जी कहते हैं कि जो व्यक्ति इंडिया त्रिप्ति के कार्य में लिप्त हो जाता है वो व्यक्ति मूर्ख है। आप कहोगे स्वामी जी आप तो हमारा अपमान कर रहे हो। हम सब इन्दिया त्रिप्ति के विचारों में लिप्त है। मुर्ख इसलिए है क्योकि जब तक आप भगवान की शरण में नहीं आओगे, जब तक आप भौतिक सुविधाओं की शरण लोगे, जब तक आपको दुख की प्राप्ति होगी, सुख की प्राप्ति नहीं। तो महाराज रिशवदेव कहते हैं की वो तो मूर्ख व्यक्ति है जो की ये सोचता है की के द्वारा सुख की प्राप्ति हो सकती है। जैसे की जब बच्चा छोटा होता है तो वो ये सोचता है की मुझे खेल पड़ने की जरुरत नहीं है। तो अगर माँ बाप उसको जबरदस्ती नहीं पढ़ाये, उसको खेलने कूदने दे? तो अंत में क्या होगा? अंत में बच्चा बड़े हो कर निकम्मा निकल आएगा, ठीक है न? और अगर आप जबरदस्ती बच्चे को पढ़ाओगे तो फिर बड़े होकर कुछ ज्ञान प्राप्त होगा, जिसका वो लाभ उठा सकेगा। तो उसी प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान के लिए भी हमें दुख उठाना पड़ता है। ये हम नहीं सोच सकते कि बिना किसी तपस्या के हम अध्यात्मिक लाभ उठा सकते हैं। यह सम्भव नहीं है। बिना किसी तपस्या के हम आध्यात्मिक लाभ उठा सके, अध्यात्मिक लाभ अगर हम उठाना चाहते है तो तपस्या अवश्य है। तपस्या का अर्थ है की इंडिया, तिप्ती विचारों को त्यागना। इंदिया। तिप्ती के विचारों को त्यागने का अर्थ है कि वो कार्य नहीं करना जिसके द्वारा गंभीर सजा भुगतनी पड़ेगी। जैसे की ये कहा जाता है, वैदिक शास्त्र में, परम ब्रह्म, परम धाम, पवित्र, परम भाव के भगवान जो हैं वो सबसे पवित्र व्यक्ति हैं। तो अगर आप उस पवित्र व्यक्ति को समझना चाहते हो तो आपको भी पवित्र बनना पड़ेगा। अगर आप किसी और व्यक्ति को देखना चाहते हो तो रौशनी में ही देख सकते हो। अंधेरे में आप 1 दुसरे को नहीं देख सकते। तो उसी प्रकार जब हमारे मन में भौतिक विचारों की भावना रहती है तो हम 1 दुसरे को ठीक नहीं देख सकते हो। भगवान कभी समझ नहीं सकते। जब व्यक्ति नशे में हो तो वो 1 दुसरे को ठीक नहीं देख सकते। 1 दुसरे दुसरे व्यक्ति को पहचान नहीं सकता। तो उसी प्रकार जब तक ये भौतिक नशा हो, जब तक हम 1 दुसरे को पहचान नहीं सकते। तो यह अवश्य है कि जो पाप के कार्य हैं, उन से हम अल्पित रहें। विदिकशात्रमें बताया जाता है कि 6 प्रकार के प्रपात के कार्य हैं। 1 है मास, अंडा, मछी, वो नहीं, खाना दूसरा है, नशे की चीज को ग्रहण नहीं करना तीसरा है। कोई पराई सी से सम्बन्ध नहीं रखना चौथा है, किसी प्रकार का जुआ नहीं खेलना। अगर हम ये 4 प्रकार के पार के कार्य से अल्पित रहेंगे तो ही हम पर भगवान को समझ पाएंगे। तो वेद शास्त्र में ये बताया जाता है कि मानव जीवन के द्वारा धन के नियमों का पालन करना अवश्य है। तो इस कारण भगवान भगवत गीता के तीसरे अध्याय में यह बोलते हैं की विष्णु की परसंचशाकेलिए कार्य करना आवश्यक है, नहीं तो व्यक्ति जन्म मृत्यु के बंधन में से रहेगा। और जैसे हमने आपको कहा था, जन्म मृत्यु के बंधन में केवल दुख की प्राप्ति है, सुख की प्राप्ति नहीं है। भौतिक जगत में केवल असलियत की झलक दिखती है, सच्चाई नहीं है। जैसे की जब आप सिनेमा देखने जाते हो, जब आप सिनेमा देखने जाते हो, तो आपको पता रहता है ये जो सिनेमा आप देख रहे हो। हालाँकि ये दिखता बिल्कुल असली है, ये असली नहीं है, है की नहीं। जब आप टेलिविजन में आपका कार्यक्रम देखते हो, तो आपको पता है की जो कार्यक्रम आप देख रहे हो असली नहीं है, वो कार्यक्रम देखता असली है, पर वो असली नहीं है। उसी प्रकार से ये जो भौतिक जगत के जो नियम हैं वो सब दिखते असली है, जो प्रबंध है, देखता असली है, पर वो असली नहीं है। और आगे शास्त्र में ये बताया जाता है की जो कार्य आज आपको सुख देता है वो ही कार्य कल आपके दुःख का कारण बन जाएगा। ये आप मत भूलिए। आज आपकी इंद्रियां जवान है तो आप इनका उपयोग करते हो इियापीकेलिएआर समय के साथ ही इन्द्रिया आपकी कमजोर बन जाएंगे। जैसे की आज आपके जो आँखें हैं वो तेज है। तो आज अब आंखें तेज होती है तो दिन में 66 फिल्में देखते हो आप जब ऐसे विडियो आया है लोग 3366 सिनमा देखते हैं, घर बैठे बैठे हैं की नहीं और समय के साथ यही आँखें आपकी कमजोर हो जाएंगी। ठीक है न, होंगे की नहीं, और फिर क्या बुरे व्यक्ति क्या कहते है बेटा हम तो आँखों से देख ही नहीं सकते है की नहीं। और जब आँखों से देख सकते थे तो हमने आँखों का उपयोग किया 10 चीजों को देखने के लिए, उसी प्रकार हमारे जो कान है। जब कान से हम सुन सकते हैं तो अक्सर हम क्या सुनते है फिल्मी धून है की नहीं, भगवान की धुनें नहीं, भगवान की धून 10 मिनट के लिए सुनते हैं तो तंगा जाते हैं। जब हम भगवान के कार्यक्रम में जाते हैं तो शुरू से घड़ी देखना शुरू कर देते हैं, है न देर हो रही है, देर हो रही है और जब सिनेमा देखना शुरू करते हैं तो घड़ी को देखते ही मैं सच बात है। जब धर्म का भी कोई कार्यक्रम होता है तो फिल्मी धुनों को बजाया जाता है और यही काम आज आपको सुख दे रहे हैं। समय के साथ इतने बहरे हो जायेंगे लोगों को कहना पड़ेगा ऊचा बोलो सुनाई नहीं देता और 1 दिन की ऊँचे बोलने से भी कान से सुनाई नहीं देगा है की नहीं तो वही जो आपको सुख दे रहे हैं, कल आपको दुःख देंगे, सुख दे, कल दुख देंगी। यही पाँव जिनके द्वारा आप आज अनेक स्थानों में चल कर जाते हो वो ही पाँव कल आपको दुःख पहुँचायेंगे? तो कहने का अर्थ यह है की भौतिक जगत में जो प्रबंध, जो सुविधा, जो अंग, जो इंद्री आज आपको सुख पहुँचाती है, वो ही कल आपके दुःख का कारण बन जाएगी। इस कारण सावधानी के साथ इस जीवन का उपयोग करना चाहिए। हर जीवन का उपयोग सावधानी के साथ क्यू की जीवन किसी समय भी समाप्त हो सकता है। इस बैठक में कोई व्यक्ति है जो की ये कह सकता है की उसका जीवन कोई कंपनी, आपको बीमा भेजे जिसके द्वारा आपकी मृत्यु नहीं होएगी तो सभी खरीद लोगे बीमा, अगर कोई बीमा भेजे का सामना करना पड़ेगा। बीमा को खरीद लोगे ठीक है न क्योंकि दुख को कोई सहना नहीं चाहता आपके पास बेशक कितना भी बड़ा मेडिकल कवरेज क्यों न हो, पर बीमार होना चाहते हो, बीमार कोई नहीं होना चाहता, पर बीमार होना ही पड़ता है। जहाँ बड़े होने लगते हैं, सफेद बाल आने लगते है। तो हम पूरी कोशिश करते हैं। यह सफेद बालों को छुपाने के लिए है की नहीं। तो जो चीज आपको आज सुख देती है वो ही चीज कल दुख देगी। जब आपकी शकल जवान है, चेहरा अच्छा है, बाल काले हैं तो वो ही आपको सुख देते है। वही बाल जब सफेद हो जाएंगे, दांत गिरने लग जायेंगे, वो ही वो शरीर आपको दुःख देगा। तो भौतिक जगत में जो श्री, जो सम्मान, जो सुविधा आज आपको सुख देती है, वो ही प्रमाण काल आपके दुख का कारण बन जायेगा। इस कारण छात्र में यह भी बताया जाता है की ये भौतिक जगत में केवल दुख ही दुख है। पदम, पदम या विपदा नाते शाह कदम कदम पर खतरा है। कोई व्यक्ति ये नहीं बता सकता कि उसका अंत कब आएगा। तो इस कारण हमें सावधानी के साथ चलना चाहिए। भक्त के हृदय में पूरा विश्वास रहता है की हर स्थिति में मेरे परम पिता मेरी रक्षा करेंगे। जैसे की प्रलाद महाराज की कथा है। प्रलाद महाराज का तो नाम आप सबने सुना है। प्रलाद महाराज के जो पिता थे वो बड़े नास्तिक थे। पर प्रलाद महाराज में केवल भक्ति की भावना ही थी। तो प्रलाद महाराज जी को पिता जी ने अनेक प्रकार की कठिन स्थितियों में डाला, ओ बोलते हुए तेल में दाल, उनको झाड़ पिलाई क्यूँ। प्ला महाराज का क्या दोष था? यही दोष था की भगवान के प्रति उनके हृदय में भक्ति की भावना थी। प्रलाद महाराज भगवान की इच्छा कर भक्ति करना चाहते थे, उनके माता पिता उनको कहते थे नहीं, नहीं, तुम भक्ति नहीं कर सकते, तुम भक्ति नहीं कर सकते। तो प्रात महाराज के पिता ने अनेक प्रकार के कार्य किए, जिसके द्वारा उनको नुकसान आये, उनकी मृत्यु हो जाए। पर हर स्थिति में भगवान ने अपने भक्त की रक्षा की। उसी प्रकार भगवान अर्जुन को कहते हैं कौन तेरा प्रति जानी न में भक्त प्रणश्यति कि मेरा जो भक्त हैं वो कभी भी नष्ट नहीं होएगा, मेरा जो भक्त है उसकी मैं हमेशा उसकी रक्षा करूंगा। तो भगवत गीता में भगवान कहते हैं माँ सुचा सब धर्मों को छोड़ कर, मेरे शरण में आओ, मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा। अब इसका ये अर्थ नहीं की अगर आप लोग बरिस्ता आश्रम में हो की आप सब बरिस्ता को त्याग कर मंदिर में आ जाओ। ब्रह्माचारी बनो और न सका। ये अर्थ नहीं। उसका ये अर्थ है कि हम श्रद्धा के साथ परम भगवान के दिव्य चरण कमलों की शरण लें। किसी न किसी व्यक्ति के चरण कमलों की शरण तो हमने लेना है। जैसे की जो कम्युनिस देश है, उन देशों में लोग भगवान को स्वीकार नहीं करते। पर वहाँ जो देश के नेता हैं उनके चरण कमलों की शरण लेनी पड़ती है। पर वैदिक शास्त्रों का यह कहना है कि उस प्राणी मात्र की शरण लो जिस में किसी प्रकार की अपूर्णता नहीं है, जिसमें किसी प्रकार का दोष नहीं है। साधारण प्राणी मात्र में 4 प्रकार के दोष है। 1 दोष है कि वह गलती करता है, दूसरा दोष है की उसमे छलने की इच्छा हम उत्तर नहीं जानते। जी भी उस रूप से करेंगे जैसे हमारे पास उत्तर है। तीसरा की हमारी हिंदिया पूरण है और अगला की हम गलतियाँ करते हैं। सो हर प्राणी मात्र में 4 प्रकार के दोष है पर परम भगवान में किसी प्रकार का दोष नहीं है। इस कारण शास्त्र में कहा गया है कि सर्वव्यापी ज्ञान केवल भगवान द्वारा ही उत्पन हो सकता है, इसका कोई साधारण व्यक्ति उत्पन नहीं कर सकता। तो कहने का तात्पर्य यह है कि ये जो आध्यात्मिक ज्ञान हमें आज प्राप्त हो रहा है उस आध्यात्मिक ज्ञान और भौतिक ज्ञान में अंतर है। अंतर यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान सुख का भंडार है और भौतिक ज्ञान दुख का सागर है। भौतिक जगत में अनेक रूपों से दुख सहना पड़ता है। तो वैदिक शास्त्र में परिक्षित महाराज, परीक्षित महाराज ये पूरी पृथ्वी के राजा थे। 1 दिन वह जंगल में थे तो 1 ब्राह्मीण लड़के ने उन्हें शाप दिया। ग्रामीण लड़के ने ये शाप कर कहा कि 7 दिन के पश्चात उनकी मृत्यु हो जाएगी। 1 रूप से परिक्षित महाराज बड़े भाग्यशाली थे कि उनको ये कहा गया था कि 7 दिन के पश्चात उनकी मृत्यु होगी। तो परिचित माजी ने उस समय के महान ऋषि मुनियों को नामा चिराना के मन में मुठ बुलाया और तब से यह प्रश्न पूछा कि जिस व्यक्ति की मृत्यु होने वाली है उसे क्या करना चाहिए और शुकदेव को स्वामी जी के वासी देव जी के पुत्र थे। उन्होंने कहा कि हे प्रभु आपको तो कृष्णा के स कथा सुननी चाहिए। तो परिचित मना जी ने शुकदेव स्वामी जी से 1 प्रश्न पूछा कि कोई साधन है जिसके द्वारा लोग इस कलयुग में अपने आप को जन्म के बंधन से बचा सकते हैं और शुकदेव को स्वामी जी ने कहा कलेदोसेनिदेराजन। आज सी ए क महागुना केरतनदेवकृष्णस्या मुक्त संगशपरम्रजेट और चुखरेवकोस्वामीजी ने कहा गले से न दे राजन आज का महा गुना केरतनदेवकृष्णत्या मुक्त संग पर रजत की इस कलियुग में दोषों की नदी बह रही है और इस कलयुग में 1 भाग्यशाली चीज है वो है कृष्ण का किरतन, गाने का शौक हम सबको है। तो अगर आप गाना चाहते हो तो भगवान के नाम का गुणगान कीजिए। तो इस कलियुग में कृष्ण के कीर्तन में जो ताकत है, जो शक्ति है, वो किसी और प्रकार की भक्ति में वो लाभ नहीं प्राप्त हो सकता। तो शुकदेव को स्वामी जी ने प्रेषित महा जी को कहा की कलयुग में तो दोषियों की नदी बह रही है और इस कलियुग में 1 भाग्यशाली चीज अवश्य है वो है कृष्ण का कीर्तन और कृष्णा के कीर्तन के द्वारा सुख की प्राप्ति हो सकती है। तो आप सब धर्म प्रेमी जो आज इस बैठक में उपस्थित हो। आप सबको हम कुछ सन्देश देना चाहते हैं। हम आपको यह सूचना देना चाहते है की आप ये कीमती मानव जीवन का उपयोग करो। भगवत भक्ति के लिए आप ये कीमती मानव जीवन का उपयोग करो। भगवान भगवान के सम्बंधित ज्ञान प्राप्त करने के लिए बच्चों के समान इंडिया के कार्य में लिप्त मत हो जाओ। और आज हम सोचते है की पश्चिम देशों में लोग सुखी है, पर चाहे यह दुनिया के किसी कोने में भी चले जाओ, भौतिक सुख नहीं प्राप्त हो सकता है। इस भौतिक जगत में हम पश्चिम देशों में भी प्रचार करते हैं और आपको विश्वास के साथ समझा सकते है। तो हम चाहते है की आप सब इस पूरी इस सभा का लाभ उठाए लाभ का सन्देश है उसको स्वीकार कीजिए। तो भगवान उनके नाम में किसी प्रकार का अंतर नहीं है। भौतिक स्थिति में अगर आपको प्यास लगी हो तो पानी, पानी में अंतर है, अगर आपको भूख लगी हो तो भूख खाने में और खाना शब्द में और खाने में अंतर है की नहीं। अगर आपको भूख लगी हो, हम कहे खाना, खाना, खाना, खाना खाना, उसे तो भूख नहीं मिटेगी प्यास, लगी और पानी, पानी, पानी, पानी, पानी, उसे तो प्यास नहीं बुझेगी आपको पैसा चाहिए, पैसा, पैसा, पैसा कह के तो संतुष्ट नहीं प्राप्त करते। और भगवान का जो दिव्य नाम है, वो हर रूप से पूरा है, वो अधूरा नहीं है। भौतिक नाम भौतिक शब्द अधूरे हैं। तो इस कारण जब आप भगवान का नाम लेते हो तो आप भगवान की संगत प्राप्त कर लेते हो, क्यूँकि भगवान में उनके नाम में किसी प्रकार का अंतर नहीं है। तो हम भगवान के दिव्य नाम के उच्चारण के द्वारा जो भौतिक, ग्रुप, विचार, अनादि काल से हृदय में उत्पन है, उनको हम नष्ट कर सकते हैं। भगवान के दिव्य नाम के उचार के के उच्चारण के द्वारा भक्ति की भावना हृदय में उत्पन कर सकते है। भगवान के नाम के उच्चारण के द्वारा जो विचार, जिनके कारण हम बेचैन हैं, कई बार लोग हमें स्वामी जी मैं बेचैन क्यूँ हूँ, सामी जी मन की शांति नहीं आती, स्वामी जी हमने इतनी पूजा की तो भी हम बेचैन रहते हैं। इसका उत्तर क्या है? कारण क्या है? कारण यह है की हम बेचैन बन जाते हैं। जब मन में अनेक प्रकार की भौतिक इच्छा हो, हम बेचैन बन जाते हैं, जब चर्चा से अधिक हमें धन की प्राप्ति करना चाहिए, हम बेचैन हो जाते हैं। जब मैं 1 तरफ ऐसी भक्ति भी चाहती है, दूसरी तरफ ऐसी हर प्रकार की भौतिक सुविधा चाहते हैं, ठीक है न? इसी कारण हम बेचैन हो जाते हैं। तो अगर आपको मन की शांति चाहिए तो अहंकार को नष्ट करो, मन की शांति चाहिए तो इंदिरा को त्याग, मन की शांति चाहिए। तो भगवान के चरण कमलों की शरण लो और भगवा देश की तो ही सुख की प्राप्ति हो सकती है। तो भगवान उनके नाम में किसी प्रकार का अंतर नहीं है। भगवान के दिव्य नाम के उच्चारण के द्वारा असली सुख की प्राप्ति हो सकती है, भगवान के दिव्य नाम के ही असली धन की प्राप्ति हो सकती। और ये जो धन है, ये जो सम्पत्ति है, ये सदा आपके साथ ही रहेगी। जो भौतिक धन है, वो तो आपको यहाँ ही त्यागना पड़ता है, आप वश्यकता ऐसी अधिक परिश्रम कर सकते हो भौतिक धन के लिए और ये जो भौतिक धन है, इसके द्वारा नाद खाएगा, न कल, ये जो भौतिक धन हैं, हम आवश्यक से अधिक कमाते हैं किसके लिए अपने लिए थोड़ी पेट में तो केवल 2 रोटी जाएगी चाहे कितना भी धन कमाओ और दूसरों के लिए। और जब दुसरो से पूछा जाय की पत्नी जी, माता जी बच्चे इनके सजा है उसको भुगतने को तैयार हो छोटा सा हिस्सा क्या कहते हैं? वो लोग क्या कहते हैं? नहीं नहीं नहीं अंदर थोड़ी कहते है करने को जो वाल्मीकी अपने माता पिता, पत्नी, बच्चों के पास गए, यह कहने लगे कि मुझे अभी पता लगा है, मुझे दुगनी पड़ेगी ठीक है, ज्यादा हिस्सा न भुगत लूंगा थोड़ा सा तो आप भुगतना सबने इनकार कर दिया है। तो आज हम मूर्ख व्यक्ति के समान 1 जीवन का उपयोग कर रहे हैं। पर हमें सावधानी से इस जीवन का उपयोग करना है। शास्त्र के आधार पर और छात्रों का क्या कहना है? दे शाम युक्त नाम बजतपरतिपूर्वका के प्रेम के साथ भगवान की भक्ति करो तो प्रेम के साथ अगर हम भगवान की भक्ति करेंगे तो ही हम सुख की प्राप्ति कर सकते हैं और भगवान की भक्ति आरम्भ होती है। इस कलयुग में जी के द्वारा। इस कारण जीत के द्वारा भगवान के दिव्य नाम का उच्चारण करो। मन के द्वारा भगवान के आदेश की कल्पना करो, उनका स्मरण करो। आंखों के द्वारा भगवान के सुन्दर रूप को स्वीकार करो उसका दर्शन प्राप्त करो। इस प्रकार इंद्रियों का उपयोग भगवान के सम्बंधित कार्य में कीजिये। तो ये जो महामंत्र है उसमे 16 शब्द है। विधि शास्त्र में मंत्र शब्द का उपयोग किया जाता है। मंत्र शब्द का अर्थ है जिसके द्वारा मन में शांति आये और महा का अर्थ सबसे महान। तो वेद शास्त्र में अनेक मंत्रों का वर्णन है। पर केवल 1 ही मंत्र को महामंत्र के रूप में बताया गया है। वो है यह हर 1 कृष्ण मंत्र। तो सरल शब्दों में यह हरे कृष्ण महा, मंत्र का अर्थ है हे भगवान, हे प्रभु, आप कृपा करके हमें अपनी शरण में रखिये, आप कृपा कर के हमें अपनी सेवा में लगाइए, इससे ज्यादा बेहतर कोई प्रार्थना हो सकती है आपके हृदय में। परम भगवान को ये कहना आप कर के हमें अपने चर में रखो, आप कृपा करके हमारी रक्षा कीजिए। तो हम आप सब को ये कहना चाहते हैं धर्म प्रेमियों की, आप अपने जीवन का ठीक उपयोग कीजिये। आप सब में धर्म की, धर्म का विचार है। इसलिए आप सभा में उपस्थित हो और सावधानी के साथ यह जीवन को चलाए। जीवन किसी समय भी नष्ट हो सकता है और भविष्य निश्चित होगा। कर्मों के आधार पर। इस कारण ये वश्य है की आप गृहस्त जीवन में ला कर भी अपने जीवन को सफल बनाओ। गृहस्त जीवन में रहकर भी भगवान के चरण कमलों की शरण ले सकते हो। गृहस्त जीवन में रह कर भी आप अपने अशुद्ध विचारों को त्याग सकते हो, हस्त जीवन में रहकर भी आप भगवत प्राप्ति कर सकते हो। क्योंकि भगवत भक्ति की प्राप्ति भगवत प्राप्ति होती है। भगवान चरणकमलों को के आदेश के द्वारा स्वीकार करके। तो आप सब धर्म प्रेमी। आपका। हम 1 आध्यात्मिक संपत्ति देना चाहते हैं, वो है कृष्णा का नाम आप। सब को यह प्रार्थना करना चाहते हैं कि आप ये बेहस स्थिति में रहिये पर भगवान को केंद्र बिंदु बनाए। आज हमारी भौतिक इंडिया तेतरी के विचार केंद्र बिंदु बन पाये है इसके कारण अनेक प्रकार के दुख ही दुख सहना पड़ता है और अगर आप इस जीवन का उपयोग करो भगवान के चरण कमलों की शरण देने के लिए चरण कमलों की शरण के नाम की 4 द्वारा प्राप्त होती है तो आपको अत्यंत सुख की प्राप्ति होगे और ये सुख के द्वारा आप बहुत विचार त्याग पाओगे तो आप सब धर्म प्रेमी आप से यही प्रार्थना है हर प्रकार के इंडिया के विचारों को त्याग और कृष्ण महा मंत्री के उच्चारण के द्वारा भगवान के चलन की लीजिये बहुत शरीर किसी समय भी नष्ट हो सकता है इस कारण यह मानव जीवन का उपयोग किया जाना चाहिए। भगवान के चरण कमलों की शरण लेने के लिए कई बार लोग ये तोते हैं भगवान के चरण कमल के केवल बूढ़े व्यक्तियों के है नहीं हम सब बूढ़े है क्यूँकि बूढ़ा तो वो व्यक्ति है जो की मृत्यु के निकट हो तो चाहे 4 साल का व्यक्ति हो या 60 साल का हर व्यक्ति के निकट है ठीक है तो हम सभी बड़े है अत किसी किसी समय भी आ सकता है इस कारण हमें भगवान के दिव्य नाम का उच्चार जरूर करना चाहिए। हारे क्रिश्ना हारेिशनाक्रिश्णा हारे हारे हाय रे हारे।
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