भक्ति योग से भगवत प्राप्ति | BG 08.15 | 10 Mar 1997 | New Delhi | Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja

Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja explains Bhagavad-Gītā 8.15: a true bhakti-yogi who surrenders to the Supreme never returns to the material world. Birth, disease, and loss are temporary and transcended only through devotion, not through modern pursuits or technology.
Chapters
om namo agate bas deva ओम नमो भगवते baसdेवaमनमो भागते baसदेवaय
ये आठवें अध्याय का पंद्रह वां श्लोक है। काफी प्रसि स्लोक है। शायद आप मेरे बाद इसका उचचालनकरसको सरलता के साथ मुपतपनजनमामशश्वत। बंदी महात्मन इसका अनुवाद इस प्रकार से मुझे प्राप्त करके महापुरुष। जो भक्तियोगी हैं, कभी भी दुखों से पूर्ण इस अनित्य जगत में नहीं लौटते, क्योंकि उन्हें परम संसदी प्राप्त हो चुकी हो।
ज्ञान दासिया ज्ञान जन शाक्या चक्षु रन मिलता ना। 10 बाई श्री गुरवे नम हा, श्री चेतन्य मान विस्तमतापितामेन भूतले स्वयम रूपा दामयमरदातीस्वा ति काम बंद हम, श्री गुरु, श्री वता पदकमल, श्री गुरु, श्री रुप स सहागनादगुनातनवितम। तम सुझेवम सद वेतम सब धुतम परिजना सायत कृष्णा चेतना देवम, श्री राधा कृष्णा पदानसहगनाललिता, श्री विशाखा वित शा हे कृष्ण करुणा सिंधु दीन बंधु जग पाते गोपेश गोपिका कांता राधा करदा कचना गोरा गे राधे वृंदावन, श्री रान सूत देवी रन मे हरी पे जहा, श्री कृष्ण चैतन्य भुनीत्यनशिवासद, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे राम राम
हरे हरे। भगवान इस लोक में कहते है कि जो व्यक्ति मुझे प्राप्त करता है भक्ति योग के माध्यम के द्वारा, उसे इस भौतिक संसार में फिर नहीं लौटना पड़ता। इस भौतिक संसार को हमारे गुरु महज। 1 बड़ा जेल खाना बुलाते थे, जेल खाने में, चाहे अब धनी व्यक्ति हो या गरीब, कष्ट थोड़ा भुगतना ही पड़ेगा।
तो
यह भौतिक संसार के लक्षण है। क्या 1 तो कष्ट दूसरा हम सब प्रयास करते है। दुखों से दूर होने के लिए कोई व्यक्ति भी कष्ट की भीख नहीं मानता। हम अगर मंदिर जाए तो यही प्रार्थना करते क्या हमें दुखों से मुक्त करो और देखा जाता है कि कष्टों से कोई बच नहीं सकता। खास कर के साथ प्रकार के कष्ट जिनको आप सब सुन बैठे हो। जन्म मरण मुनाफा, बीमारी मन सताता है। दूसरे व्यक्ति सताते हैं, प्रकृति कष्ट देती है और हर चीज जो है वो स्थायी है। मतलब कि थोड़े समय के लिए है। आज आपका चेहरा सुन्दर है तो कल भी सुन्दर रहेगा, नहीं रहेगा। अगर आज आपकी से अच्छी है तो यह अवश्य नहीं है कि कल भी रहेगा। जो बुद्धिमान व्यक्ति है वो जानता है और समझता है की हर चीज स्थाई है। वो देख सकता है की चारो तरफ केवल कष्ट कष्ट है और वो ये प्रयास करता है। यह जानने का प्रयास करता है की किस प्रकार से मैं कष्टों से मुक्त हो सकता। जैसे की जब आप रोगी बन जाते हो, पीड़ित होते हो तो आप तुरंत डॉक्टर के पास पहुँचाना चाहते हो। किस ले अभी रोग पीड़ा को दूर करने के लिए। तो भगवान हमें उपाय दे रहे है। भगवान कहते हैं गीता में मेरे शरणगत हो जाओ, सर को मेरे शरणगत बदले में क्या लाभ है? आपको मैं तुम्हें बचाऊंगा। हर प्रकार के पाप के परिणाम। तो भगवत गीता भागवत गीता में हमारे वैदिक शास्त्रों का सार हमें प्राप्त होता है। अगर आप भगवत गीता को ठीक रूप से समझ लो तो वैदिक शास्त्रों के सार को समझ ले। तो भगवत गीता के द्वारा भगवान हमें यह उपदेश देते हैं कि हमें किसी न किसी रूप से उनके शरनगर्होजाना चाहिए और इसका ये अर्थ नहीं। कई बार लोग गीता के अर्थ को गलत समझ बैठते हैं। कई बार लोग यह सोचते है की गीता का अर्थ यह है कुछ काम मत करो माचिस, मत जलाओ दिया, मत जलाओ जंगल में जाओ, पहाड़ो में रहने लग जाओ। भगवान कहते हैं मेरी खुशी के लिए करो हर्ची, जैसे भगवान कहते हैं। 1 पांचवे बिहार के श्लोक में याद करो सी या 10 नासी सी, यह तपस्या सी। कौन से भगवान कहते हैं जो भी तुम करो, मेरे लिए करो, जो तपस्या उठानी है, जो यज्ञ करना है, मेरे लिए कर, जो दान देना है, मुझे दान। 2 जो खाना है, मुझे पहले अर्पण करो। भगवत गीता के अनुसार अगर आप प्रसाद नहीं स्वीकार करो तो आप केवल पाप खा रहे हो। तो भगवत गीता में यह भी देखते है की भगवान ने अर्जुन से कहा तुम युद्ध में लड़ो और मेरी खुशी के लिए लड़ो, 10 मार्च सर्वेश के युद्ध, हार और जीत का सोचे बिना इस युद्ध में तुम लड़ो। और जब आप ज्ञान के साथ कार्य करोगे तो गीता में बड़ा सुन्दर उदाहरण दिया गया है। जैसे कमर के फूल में, जल में होते हुए भी जल को छूता नहीं है। तो भगवत गीता का मूल उद्देश्य यह है कि किस प्रकार से हम जिसका कार्य करके अपने जीवन को सफल बना सकते है और भगवान हमें क्या कह रहे हैं? जैसे इस लोक में की जो व्यक्ति भक्ति योग के द्वारा मुझे प्राप्त करता है वो फिर से इस भौतिक संसार में नहीं आता। इस भौतिक संसार को हम कुंता जगत के नाम से पुकारते हैं और कुंता जगत में चाहे आप। अमेरिका में जन्म लो चाहे, रशिया में लोग चाहे, भारत में लोग चाहे आप, करोड़ पति के खानदान में लो चाहे, 1 गरीब व्यक्ति के खानदान में लो, आप अपने आप को कष्टों से नहीं बचा सकते। आज 1 समस्या हल कर लोगे कल, 1 नई समस्या प्राप्त हो जाएगी। हम लोग सोचते थे भारत में क्या टेक्नोलॉजी आएगी, कलर टेलिविजन आयेगा, सब समस्या वगैरह हल हो जाएगी। क्या समस्या हल हुई है कि नहीं? 10 साल पहले ऐसी जाना ही समस्या लोगों की और बढ़ते ही जाएगी। कल युग के हर दिन दिन बीतने के साथ जो समाज के कष्ट है वो इतने बढ़ते जायेंगे। जो बुद्धिमान व्यक्ति हैं वो भगवत की भविष्यवाणी है। लोग शहरों को छोड़ कर जंगल में भाग जाएंगे तो भगवत गीता का जो उपदेश है, उसका हमें लाभ उठाना चाहिए। राजा विद्या, राजा गोया, ये जो ज्ञान है, ये सब ज्ञानों का राजा है। आज समाज की समस्या क्या है कि हम भौतिक ज्ञान प्राप्त करने के तो बहुत इच्छुक है। हम विदेश में जाना चाहते हैं शिक्षा प्राप्त करने के लिए। वगैरह पर जो आध्यात्मिक ज्ञान है, उसकी हमें कुछ कदम ही नहीं है। ज्ञान में हम बिल्कुल रूचि ही नहीं लेते है। तो महा जी ने कहा है व की। आज लोग यह नहीं जानते क्या की असली सुख का क्या साथ भगवत गीता का जो ज्ञान है, बहुत प्राचीन ज्ञान है। आप इसकी गिनती भी निकाल सकते। सबसे पहले यह ज्ञान सूर्य के देवता विवस्वान को भगवान ने स्वयं दिया था करोड़ो करोड़ो करोड़ो साल अस्त अस्त। ये ज्ञान राजाओं के द्वारा मनु मनु से 1 श्वा्कूराजा तक पहुँचे। आजकल तो हमारे जो नेता हैं, वो ध्यान बिल्कुल रूचि ही नहीं लेते लेते नाम के लिए। प्राचीन समय के जो नेता थे, वो राज ऋषि होते थे, राजा भी थे और ऋषि भी थे। जैसे परिक्षित, महाराज, पूरे, पति के राजा भी थे और ऋषि भी थे। तो ज्ञान आया महाराज 1 श्वाकहूतक जिनका राज्य था, इस पृथ्वी पर के आदर में लगभग 20 लाख साल। तो आज हमारा भाग्य यह है की वो ही ज्ञान हमें आज पढने का मौका मिल रहा है। पर सोच की बात क्या है, इसका लाभ नहीं उठा। तो भगवान कहते हैं की भक्ति योग के द्वारा तुम मुझे प्राप्त कर सकते हो। भगवत गीता में भगवान कर्म योग का वर्णन करते हैं, ध्यान योग का वर्णन करते हैं, शंख योग का वर्णन करते हैं। और अंत में वो ये कहते हैं की भक्ति योग के द्वारा तुम मुझे प्राप्त कर सकते हो। तो भक्ति योग का क्या? भक्तियों का अर्थ है की मन बुद्धि के द्वारा, शरीर के द्वारा। अब भगवान की सेवा करो। प्रेम के साथ भगवान ने आपको हिन्दिया दिए है, मन दिया है, दिया है, शरीर दिया है। इन सब का उपयोग करो भगवान की सेवा में बस। चीन समय में 1 राजा थे, जिनका नाम था महाराज। अम्बरीश। राजा होते हुए भी बड़े निम्न भाव से सेवा करते थे। कानों का उपयोग किया, भगवान का गुणगान सुनने के लिए, पैर का उपयोग किया, भगवान के मंदिर में चल कर जाने के लिए, हाथों का उपयोग किया, भगवान के मंदिर को साफ़ करने के लिए, अपने सिर का उपयोग किया। भगवान के सामने। इसको झुकाने के लिए। तो ये जो मन इन्द्रियां बुद्धि है, शरीर है। इन सब का। जब हम भगवान की सेवा में उपयोग करते हैं तो इसे इसे भक्ति योग कहा जाता है। महाप्रभु जी ने कहा है कि भक्ति आरम्भ होती है। कैसे भगवान के दिव्य नामों का गुणगान करके प्रलाद महाजी, हमें नवधा भक्ति का ज्ञान देते हैं। वो 1 बड़े प्रसिद्ध भक्त गोविंद दास कहते हैं कि ये जीवन जो है, किसी समय भी समाप्त हो सकता है। कई बार हम सुनते हैं कि किसी का देहांत हो गया। तो हम कहते है क्या अचानक ही हो गया। हम सोचते है अचानक क्यूँ? क्यूँकि हम मन के, हम सब के मन में विश्वास बैठा है। क्या की मृत्यु आएगी तो हमें पूछ के ही आएगी, हमारे ये है, हमारी मुर्ग के साथ में 1 कथा है। 1 राजा था जो युद्ध में लड़ते हुए, उसकी मृत्यु हो गई। उस राजा की अनेक पत्नियां थी। जब पत्नियों को पता लगा कि उनके पति का देहांत हो गया तो रोने लगी, सब के सब पत्नियाँ और इतनी जोर से रो रही थी की उनका रोना यमराज जी तक पहुँच गया। यामराजीने देखा ये पत्नियां सब रो रही है, शरीर को जलने की इजाज़त नहीं दे रही। तो यमराज जी वहाँ उस सभा में आये। 1 बालक के रूप में। क्यूँकि बालक तो किधर भी पहुँच जाता है। तो यमराज जी उस सभा में पहुँचे बालक के रूप में। और कहने लगे देखो ये रोरी है। ये सोचती है कि उनका मरा हुआ पाती फिर से जीवित बन जायेगा। वो ये नहीं जानते कि रोते रोते उनका भी जीवन समाप्त हो जायेगा। और यमराज ने बालक के रूप में इन औरतों को शिक्षा दे की आप रोड़े क्यूँ आपके रोने से क्या आपका पति जीवन बन जाएगा। आप ये नहीं जानते कि आपका भी समय जा रहा है। तो जब उन औरतों ने यमराज के द्वारा ये उपदेश्य सुना फिर उन्हें समझ आया क्या के शरीर नश्वर है और हम सब ने झुकना है मृत्यु के सामने कोई नहीं बच सकता। इस संसार में सबसे बड़े की क्या बात है की हर पल, हर व्यक्ति देख रहा है की हजारों हजारों लोग मृत्यु की तरफ जा रहे हैं। और वो क्या सोचता है कि मुझे मृत्यु के सामने नहीं झुकना पड़ेगा और अगर झुकना भी पड़ेगा सब मृत्यु में से पूछकर आगे मेरा लाइफ बताएगा आना चाहिए। और उसी भावना से हम अंत तक परिश्रम करते जाते हैं। पर गोविन्द दास जी कहते हैं कि जिस प्रकार 1 कमल के फूल पर अगर पानी का बूंद हो किसी समय भी वो पानी का बूंद निचे गिर सकता है तो इसी विषय के पूर्व कहते है इसी प्रकार किसी समय भी यह जीवन समाप्त हो सकता है। तो क्या है उपाय बाजा हरी पादा किसी न किसी रूप से हरी के शरनागत हो जाओ होता है जीप के साथ अगर हम जीप का उपयोग करते हैं मेंढक के जैसे कैंकैंकैंककैकरने में और आजकल तो सेलुलर फ़ोन आ गया है। आजकल तो कै कैंप बढ़ गया है और आजकल तो हर बोर्ड क्या प्राइस और सस्ती हो गई है। और और 22 साल थे और सस्ती हो जाएगी क्यूँ क्यूंकि वो चाहते हैं कि अब ज्यादा कैं
लोगों को यह
चिंता नहीं है वो जो सेलुलर फोन है उसमे कैंसर होने का बड़ा उचा चांस है। जब ये सेलुलर फ़ोन पहले निकाले थे अमेरिका में तो कई साइंटिस्ट ने छाप दिया था सेलर फ़ोन्स के लिए, तो कैंसर तो मोटर लगा मोटर वाला कंपनी जो सेलर फ़ोन बनाते उनका स्टॉक एकदम गिर गया अमेरिकन स्टॉक एक्सचेंज में तो सब कंपनियों का 9 का मोटा सबका स्टॉक गिर गया। फिर सब ने ऐसा जादू किया कि भविष्य में किसी ने ऐसी रिसर्च फाइंडिंग छापी नहीं। सारे विश्व में लोग सेलर फ़ोन उठाते है और वो सेलर फ़ोन उठाना हेल्थ के डे कर लोगो को इस विषय की चिंता नहीं है। तो आजकल कैनकन जो है वो बढ़ गई है। तो भगवान कहते ही जीत का हमें उपयोग करना चाहिए किस के लिए भगवान का गुणगान करने के क्या कहा इस महा मंत्र बुलाया गया है। सारे विश्व में लोग बड़ी आसानी से इसे अपना रहे हैं और इसका लाभ उठा रहे हैं। पापा जी से 1 समय किसी ने पूछा कि स्वामी जी, आप कुछ जादू यही सोचते हैं कि कोई कोई गुरु है, सन्यासी है तो जादू भी जानेगा। पापा जी ने कहा कि नहीं कोई जादू नहीं जानते। पर 1 जादू मैंने जरूर किया है, क्या मैंने हजारों बच्चों को ब्राह्मण बना दिया है। जो व्यक्ति बचपन से ही पाप के कार्य में जुड़े हुए थे, उन्हें आज ब्राह्मण बना दिया है। ये नहीं कि 2 पैसे का जीन वृंदावन बाजार बन गए वो 2 पैसे की जिन की कदर नहीं करते। ग्रामीण बनना। गुणों के आधार पर तो गुणों के आधार पर व्यक्ति ग्रामीण बनता है। जैसा की आजकल देश में जातिवादी की बहुत चर्चा है। लोग पहले क्या पूछते हैं, कौन सी जाति के तुम नौकरी लगे है। शास्त्र में कहा गया स सादी सुदा है। इस खाली योगा में अगर कोई व्यक्ति यह सोचे की हम ब्राह्मण जाति के हैं, ब्राह्मण जाति के बन सकते हो। गुणों के आधार पर यह ब्राहमण खानदान में जन्म लिया और गुण नहीं है तो ब्राहमण बुलाओ हमारे गुरु जी और उनके गुरु जी की सादाजी, इस विचार का बहुत विरोध किया। 1 समय जब भक्ति स्रेधांदाजी नबद्वीप में पहुँचे थे, परिक्रम लेकर अपने शिष्यों के वहाँ के ने पत्थर फेंके उन सारी दुकानें नवदीप बंद कर दी। क्यूँ क्यूँकि भक्ति सदादाजीहमारेपदम गुरु पर प्रचार कर रहे थे। क्या जैसे जब भक्ति नंद स्वामी हमारे गुरुजी ने प्रचार करके अपने विदेशी भक्तों को ब्राह्मण बनाया। हमारे ब्राह्मण जाति वाले लोग कह रहे थे अरे देखो भक्त नंद स्वामी हमारा धर्म नष्ट कर रहे है। विदेशियों को ब्राह्मण बना दिया। जैसे ही जगनाथ पुरी में भगवान जगनाथ का जो प्रसिद्ध मंत्र है, वहाँ विदेशी ब्राह्मण को, विदेशी भक्तों को अंदर नहीं जाने देते। जगनाथ का अर्थ पूरे जगत के स्वामी है। वो तो सबके भगवान है, वह हमारे पंडित जी वह कहते हैं नहीं, नहीं, विदेशियों के लिए नहीं। ये बड़े अफसोस की बात है। यह धर्म का दुरुपयोग किया जा रहा है, शास्त्रों का दुरुपयोग किया जा रहा है। हम लोग इस विचार के विरोध में है। व्यक्ति ब्राह्मण बनता है, सत्य बनता है, वैसा बनता है, सुधा बनता है अपने स। इसलिए इस संस्था में कोई भी व्यक्ति प्रवेश कर सकता है। चाहे वो धनी हो, गरीब हो, मुसलमान हो, हिंदु हो और सबके लिए 1 ही नियम है दीक्षा प्राप्त करने के लिए, ब्राहमण दिक्षा प्राप्त करने के लिए, जो भी तालीम प्राप्त करेगा उसे दीक्षा प्राप्त हो सकती है। तो हमें यह हरि नाम को अपनाना चाहिए, किसी न किसी रूप से हरी नाम का उच्चालनकरना चाहिए और ये हरि नाम महारज ने कहा है कि आप इतनी दया दयालु हो, क्या आपने अपनी पूरी शक्ति डाल दी है? इन दिव्य नामों में, भगवान के नाम में और भगवान में कोई अंतर नहीं है। और अब जब भगवान के नाम का उच्चालन करो तो आप उसके द्वारा असली आनंद को अनुभव कर सकोगे तो भक्ति योग आरम्भ होता है जीव के साथ और हर व्यक्ति इसका लाभ उठा सकता है। जीप के द्वारा हम भगवान के दिव्य नाम का उच्चारण करते हैं और जीव के द्वारा हम कृष्ण प्रसाद ग्रहण करते हैं। हमें यह नियम बना लेना चाहिए कि हम खाएंगे तो केवल कृष्णा प्रसाद। भगवान गीता में क्या कहते है, पतन पुष्प में तुम प्रेम और भक्ति के साथ अगर मुझे जल भी अर्पण करोगे, पता भी अर्पण करोगे। भगवान क्या कहते हैं, उसे मैं स्वीकार करूंगा। तो इसलिए कृष्ण भक्तों का यह नियम है कि हम न केवल प्रसाद ग्रहण करना है। और चेतन ने आगे क्या कहा कि सीम भागवत कीता पड़ो भागवतम पड़ो इन ग्रंथों में भगवान की वाणी है। जी ने बड़ी परिश्रम के साथ, कठिनाई के साथ इन ग्रंथों का अनुवाद किया। इसलिए कि हम भगवान की वाणी को समझ सके। जैसे आप पाठशाला में जाते हो। पढने के लिए टेक्स बुक टीचर, वही समझाता है बोर्ड में। तो इसी प्रकार पर, अर्थ और गहराई से सरल भाषा में आप सब जिस स्थिति में, जिस आश्रम में, आश्रम में रहते हुए भक्ति में भी आगे बढ़िएगा, हमारा प्रॉपर जी यही कहते थे कि जिस स्थिति में स्थिति छोड़ने की जरुरत नहीं है, केवल अपनी चेतना को बदला चेतना के बदलने का क्या ये सोचना की हम भगवान के दास है। जैसे हम सब के नाम के आगे दास जुड़ जाता है। तो कई बार नई व्यक्ति कहते है कि तुम्हारे मन में सभी मिस्टर दास है। तो हमें उन्हें समझाना पड़ता है कि दास का मतलब है भगवान के सेवक दास और दासियाँ। तो ये चेतना बदल दिया की हाँ भगवान के सेवक है। भगवान हर चीज़ के स्वामी है, वो हर चीज़ के मालिक हैं। और हर चीज का उपयोग करना चाहिए उनकी खुशी के लिए। अगर इस विचार के साथ जीवन को चलाओगे, फिर आप जीवन को सफल बना सकोगे। और अगर आप यह सोचोगे कि आप स्वामी हो, आप मालिक हो, आपको हर 1 चीज का आनंद भोगना चाहिए। तो आप जन्म मृत के बंधन में फंसे रहोगे। आज यहाँ इस योनी में जन्म लोगे और अगला जीवन किसी और भगवान कहते हैं, बड़े स्पष्ट रूप से की मेरी खुशी के लिए कार्य करो, मन के द्वारा मेरा चिंतन करो, मेरी उपासना करो, मेरे भक्त बनो। और इस भगवान कहते हैं, कौन ते प्रति नहीं, न मैं भक्त प्रशति। भगवान ने अर्जुन से कहा जाओ, तुम सारे विश्व को सुना। 2 क्या ये जो मेरा भक्त है, वो कभी नष्ट नहीं होगा। भगवान यह भक्तों की भावना के अनुसार अपने आप को प्रकट करते हैं। जिस श्रद्धा ऐसी हम भगवान की तरफ जायेंगे मात्र में हम भगवान को समझ सकेंगे। तो आप सब भक्तों से यही निवेदन है कि आप कृपा करके गंभीरता के साथ भगवान श्री कृष्ण की शिक्षा को स्वीकार कीजिये। इस शिक्षा के द्वारा ही आप अपने जीवन को सफल बना सकोगे। और यही है असली सुख का साधन। पर जाने से पहले कितना प्रयास कर रहे थे दिल्ली में, ये कृष्ण भक्ति की स्थापना करने के लिए प्राप्ती रहते थे। राधा दामदलमंदलमें वृंदावन में पाते थे, दिल्ली अपने ग्रंथों को छापने के लिए और छाप कर इन ग्रंथों को बाटने भी जाते थे। कहां जाते थे बाटने गवर्नमेंट लाइबरेरी में, बुक स्टोर्स में? और 1 जो हमारी पत्रकार है, बैक टू गॉड है, उसको प्रापा जी छापते थे और खुद जाते थे कनॉट प्लेस में, कॉफी से इन सब इलाकों में बांटने के लिए खुद अंदाजा लगाओ और सब उस समय तो प्रापा जी के साथ कोई शिक्षा भी नहीं था। तो सब काम खुद ही लिखते भी खुद थे, दिल्ली भी आते थे, लोगों से, पैसे भी, मांगने के लिए, कागज खरीदने के लिए, फिर छपाई भी खुद करते थे, फिर बढ़ते भी खुले थे, वन मैन ऑपरेशन और पापा जी को पूरा विश्वास था कि चेतन्य महाप्रभु जी जैसे हमने कहा था चेतना महाजी भगवान है, तो उनकी भविष्यवाणी थी क्या विश्व में जितनी भी नगर है, गाँव है, हर जगह मेरे देहरी रिव्यू नाम का उच्चालन होगा। तो असल में हमारे वैष्णव भक्त भी कोई 3 साल पहले तक विश्वास नहीं कर रहे थे कि ये भविष्यवाणी कभी सत्य निकालेंगे, सब यही सोचते थे कि मा की भविष्यवाणी तो है पर इस कलयुग में वो सच नहीं निकलेगी क्योंकि 470 साल तो बीत गए थे जितने बाबूजी की भविष्यवाणी हुई थी 510 साल पहले, वो पापाजी देशो में जाने से पहले, तो यह हर नाम की महिमा वगैरह केवल भारत की सीमा तक ही फैली थी। तो कई वैषणव सोच रहे थे की यह भविष्य वाणी कभी सच नहीं निकलेगी, पर पहुपाजीको पूरा विश्वास था अपने गुरु राज के आदेश में और चेतन महाप्रभु जी की भविष्यवाणी में, तो इस विश्वास के साथ उन्होंने प्रयास किया और भगवान के नियम को बिल्कुल नहीं पता और जिसका यह परिणाम हुआ कि लोगों ने स्वीकार किया और अभी भगवान की दया से फैलते जा रहा है, हर जगह आज विश्व का कोई कोना नहीं है जहाँ के लोग इसे स्वीकार नहीं कर रहे। तो आप सब के हम आभारी हैं कि आप सब यहाँ पधारे हो। कृष्ण
क्रिष्णा किष्णा क्रिष्ण ह हाल लहहलेनामाराहले हाले।
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