क्या वैष्णव के चरण छूने से उद्धार हो सकता है? | BG 11.09 | 12 Nov 2005 | Delhi | Gopal Krsna Goswami

यह व्याख्यान गुप्त कृष्णा गोस्वामी द्वारा 12 नवंबर 2005 को दिल्ली में आयोजित एक सभा में दिया गया है, जिसमें वे भगवद् गीता के एकादश अध्याय (विराट रूप) के श्लोकों को आधार बनाकर यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या वैष्णव (भक्त) के चरणों को स्पर्श करने से उद्धार प्राप्त हो सकता है। वे प्रथम में शास्त्रों के माध्यम से शांति की खोज का महत्व बताते हैं, फिर कृष्ण के विराट रूप का वर्णन करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि इस रूप को देखना केवल दिव्य नेत्रों (भक्तियों) से संभव है। मुख्य तर्क यह है कि केवल भक्ति (अनन्य भक्ति) ही परम सत्य को जानने और मोक्ष प्राप्त करने का साधन है; अन्य सभी साधन – धन, सामाजिक प्रतिष्ठा, विज्ञान, या कर्म – अस्थायी और भ्रमित करने वाले हैं। वे विभिन्न उदाहरणों (कृष्ण का बाल्यावस्था में विश्व को मुंह में देखना, संतों की जीवनशैली, आधुनिक समाज में भौतिकता) के माध्यम से यह दर्शाते हैं कि भक्ति के बिना कोई भी आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो सकती। व्याख्यान में शास्त्रों के उद्धरण, गुरु‑शिष्य संवाद, सामाजिक आलोचना, और श्रोताओं को शुद्ध भक्ति अपनाने के लिए प्रेरक आह्वान सम्मिलित हैं। अंत में वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि शुद्ध भक्ति ही भगवान को समझने, उनके स्वरूप को देख पाने, और वास्तविक शांति व मोक्ष प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग है।
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय नम भगवते वासुदेवाय भगवत। गीता के ग्यारहवे हाय का 1 स्ट्रोक आपको सुनाएंगे 1 समय हमारे गुरु जी को माता जी, आए वो कहने लगी की हम 1 सभा बुला रहे हैं। मैं विश्व की शांति के लिए आप भी आइएगा अपने विचारों को प्रकट कीजिएगा हाँ मन। हमने अनेक धर्म संस्थाओं के नेताओं को बुलाया है। गुरुजी ने कहा की अगर शांति चाहिए तो फिर हमें भगवान की वाणी पर निर्भर रहना पड़ेगा। अगर हम यही चर्चा करें आपके विचार से क्या होना चाहिए, हमारे विचार से क्या होना चाहिए तो आप शांति प्राप्त नहीं करोगे। जिस प्रकार साधारण समाज में हम सब सरकार के बनाये हुए कानून को स्वीकार करते हैं उसी प्रकार भगवान की शिक्षा हमें शास्त्रों द्वारा प्राप्त होती है। तो भगवान ने गीता के दहाई में अपना विराट रूप प्रकट किया अर्जुन को और उस दहाई में भगवान इस प्रकार से कह रहे हैं बनाया दोजननादि ना यहाँ तुम ना चुन, ना वे तुम चापंतपरचदहनदस्य धान अंजना चला गया। jक्मितयनादसमाई श्री ग्रबिन श्री चेताया मनोबेश्तनसावितनभूत ले स्वयम रुपा कदाममनातिस्वा बदंतिकम हे कृष्ण करना सिंधु भी बंधु जगत से हो रोका से कंचन राधे कृष्ण बानू से नामी श्रीकिशन चेतना हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम राम राम राम हरे हरे भक्ति सख्या हवा विधौरजुनाथुमदिष्टम तत्व ना प्रवेश हेयर जुन के अन्य भक्ति द्वारा। मुझे उस रूप में समझा जा सकता है जिस रूप में मैं तुम्हारे समक्ष खड़ा हूँ और इसी प्रकार मेरा सक्षात दर्शन भी किया जा सकता है। केवल इसी विधि से तो मेरे ज्ञान के रहस्य को सकते हो। तो भगवान ने अपना विराट रूप कट किया था अर्जुन को और जब अर्जुन ने भगवान के विराट रूप को देखा तो उन्होंने क्या कहा मुझे यह बात कर। 2 वह तो अपने आप को अपना मित्र समझ रहा था। और अब मैं यह स्वीकार करता हूँ की आप ही हो साक्षात भगवान और केवल ये मेरा विचार नहीं पर नाज मुनि जी सा व्यास दे सब का यही निर्णय है क्या आप हो? और अर्जुन ने क्या देखा भगवान के विराट रूप में सारे देवताओं को, सारे विश्व को उन्होंने देखा कहा भगवान के विराट रूप और इस विराट रूप को देखने के लिए भगवान ने उन्हें दिव्य नेत्र दिए थे। जैसे की हमारी आँखें कमजोर हैं, चश्मे का उपयोग करते हैं। तो भगवान के दिव्य रूप को दर्शन प्राप्त करने के लिए हमारे में आध्यात्मिक योग्यता की प्राप्ति होनी चाहिए। भगवान ने अर्जुन से कहा ये विराट रूप पहले किसी ने नहीं देखा है और तुम्हें यह विराट रूप दिखाने के लिए मैं खास नेत्र दे रहा हूँ। और उस विराट रूप के दर्शन प्राप्त करने के बाद अर्जुन के हृदय में कोई शंका नहीं बची की ये परम भगवान तो जैसे की 1 समय जब भगवान छोटे थे, मित्रों के साथ खेल रहे थे, तो भगवान जब अपने आप का तारीफ करते हैं तो उनका जो व्यवहार रहता है स्धरणप्रानीमात्र के सम्मान और अपनी योग माया शक्ति के द्वारा, वो किसी को पता लगने नहीं देते। यही है परम महा जैसे की ब्रज में 1 दिन बच्चे खेल रहे थे भगवान कृष्ण ने अपने मित्रों को हरा दिया तो मित्रों ने आकर माता से शिकायत की की आपके बेटे ने तो मिट्टी खा ली है। और माता ने जब सुना कि बेटे ने मिट्टी खाई है तो माता घबरा गई मिटटी खाने से, तो जब भगवान घर लौटे तुम की माँ ने पूछा तुमने क्या मिट्टी खाई है? आज खेलते समय उन्होंने कहा नहीं माता मैंने तो मिट्टी नहीं खाई, उन्होंने कहा नहीं मुझे सूचना पहुंची है कि तुमने मिट्टी खाई है नहीं नहीं ये मित्रों ने गलत शिकायत की मेरी क्यूँकि मैंने उनको हरा दिया था तो वो भी 1 बदलाव भी खैर माता को पूरा विश्वास नहीं हुआ तो माता ने क्या कहा खोलो अपना मुह दिखाओ मुझे अंदर मिटटी है या नहीं और जब बेटे ने मुह खोला तो क्या देखा उन्होंने सारे विश्व को उनके मुंह के अन्दर तो जब भगवान जब छोटे बच्चे के रूप में थे 55 की उम्र में 3 साथ 34 साल के जब उन्होंने सारे पृथ्वी को दिखा दिया अपने मुह में अपनी माँ को जब उनकी माँ ने देखा सारे विश्व को सब देवता देवियों को अपने बेटे के गले में आज जब खांसी होती है, टानसुन होता है, डॉक्टर के पास जाते हो तो आप मुंह खोलते है तो डॉक्टर अन्दर क्या देखता है। सा माता ने देखा पूरे विश्व को सब देवता देवियों को तो न आश्चर्य चकित हो गयी क्या मेरा बेटा है यहाँ कोई देवता है? वे सारे देवताओं को उसके गले में देख रही हूँ सारे विश्व को अनेक ब्रह्म को देख रही है है जब वो छोटे से बच्चे के रूप में प्रकट कर सकते हैं तो भगवान के लिए विराट रूप प्रकट करना अपने मित्र अर्जुन के लिए कोई कठिन था या नहीं था? तो भगवान कह रहे हैं केवल अन्य भक्ति द्वारा ही तुम मुझे समझ सकते हो। ये है आज के प्रवचन का मुख्य उद्देश्य विषय। क्या अन्य भक्ति द्वारा। तो ये विचार भागवत गीता के अनेक श्लोकों में किया गया है। ये तो हम ग्यारहवें अध्याय पढ़ रहे हैं। इस समय आप पढोगे वहाँ भी यही उपदेश प्राप्त करोगे। अन्य भक्ति द्वारा। तो भगवान क्यों कह रहे हैं अन्य भक्ति द्वारा। क्यूंकि आप बुरा नहीं माना। आज धर्म के प्रचारको की कमी नहीं है। सूने कोने में, भारत में भी मंदिर है। कभी उपदेश सुनो अन्य भक्ति पर बल बहुत कम मिलेगा कहेंगे जाओ, मंदिर जाओ मा टेको कार्य कर। अन्य भक्ति। अन्य भक्ति का क्या है। अन्य भक्ति का अर्थ है 1 मात्र जीवन का लक्ष्य। यह है भगवत रात। भगवान ने भागवत गीता में बड़े स्पष्ट रूप से यह स्थापित किया है की केवल भक्ति द्वारा ही तुम मुझे जान सकते हो। और कोई हमारा धनी व्यक्ति सोचते है की हमारे पास धन है, हमें मंदर जाने की क्या जरुरत आप सब बैठे हो, वैसे तो आप लोग ठीक देखते हो और में करोड़ पति बहुत कम मंदिर है, कोई करोड़पति यहाँ उपस्थित होगा तो बताएंगे नहीं डर लग जाता है, चंदे जायेंगे स्वामी आप देखोगे की जब वो धन हो तो हम इतना मंदिर नहीं जाते, कथा करवा लेते है, संतों को दान दे देते है और ज्यादा समय नहीं मिलता, भौतिक शिक्षा हो तो भी भगवान के शरणगत होने की इच्छा प्रकट नहीं करते। हम सोचते हैं विज्ञान तो यह कहता है। संत महात्मा को चोर कहते हैं। और आज विज्ञानियों का योग्य है। हम तो उनमें विश्वास करेंगे। तो अगर हम सोचते है की हम भगवान को भौतिक इंदियों द्वारा या भौतिक धन द्वारा, यह भौतिक विज्ञान द्वारा समझेंगे तो हम सफल रहेंगे। इस कार्य में शास्त्र में बड़े स्पष्ट रूप से बताया गया है की भक्ति 1 साधन है जिसके द्वारा तुम मुझे समझ सकते हो। और ये सबसे सरल साधन है। समझो आपने अपने नाक को साफ़ करना हो तो अब रुमाल निकाल कर। सीधा हाथ यहाँ लगाओगे है न? अगर आपको आपके डॉक्टर कहे की आप डरेक्टलीहाथमत लगना हाथ को पहले सिर के पीछे से घुमाना, फिर लाना नाक साफ़ करने के लिए, तो आपको ये क्या सदल दिखेगा आपको योगिक सिद्धि प्राप्त करनी पड़ेगी करने का ठीक है। बातरूम जो है वहाँ कोई भी ज्यादा देर, रहना नहीं चाहता। अब बातरूम में जाकर पर्फ्यूम लगा 2 तो आपका दिल करेगा, बातसूममें सोने का नहीं करेगा तो ये बहुत ही संसार जो है ये तो 1 जेल खाना है हाँ जेल खाना और उसमे आप भी कह दी हो, हम भी कह दी, सब कहते हैं जेल खाने। इस दृष्टि से कोई भी स्वतंत्र नहीं है, जो स्वतंत्रता है। बहुत छोटी क्या बाई तरफ चल सकते हैं, दाईं तरफ चल सकते। अगर आप सोचो की हमने बीमार नहीं होना, लोग पीड़ा नहीं होने, नहीं होने देंगे, नहीं चाहिए हमें कोई बीमारी क्या बीमारी, आपको कहेगी ठीक है, साथ नहीं चाहिए तो आप काम नहीं सुझाते, जायेंगे नहीं आप कहो हमे मृत्यु नहीं चाहिए? और चाहिए भी तो ठीक है। 90 सौ साल बाद जवान है, 80 साल में भी जवान समझता तो मृत्यु की आप को छोड़ दे दी, नहीं तो दुख हर चीज स्थाई है। आज कोई चीज खबसूरत है, फिर वही चीज बदसूरत बन जाती है। हमारे बॉम्बे मंडल में अनेक फिल्मी कलाकार आते हैं। वही जो 1 दिन बड़े खूबसूरत के जवान थे, आज देखो तो बूढ़े, सफ़ेद, बाल, कई तो गंजे हो गए। तो हमें भूलना नहीं चाहिए की भौतिक संसार समाज में आप कितना भी प्रयास कर लो, आपको असली सुख की प्राप्ति भी मिलेगी, आप सोचते होगे। केवल अगर हम ज्यादा धनी होते, इत्यादि तो हमें ही सुखी होते, पर तो भगवान कह रहे है। अनन्य भक्ति द्वारा ही आप मुझे समझ सकते हैं कि 1 मात्र भक्ति को हमारा उद्देश्य बनाना चाहिए। तो आप यह सोचोगे की हम भक्ति को कैसे हमारा उद्देश्य बनाए। हमारी अनेक जिम्मेदारी है, परिवार है, बंदा है, इत्यादि। हम इन सब को कैसे छोड़े। भगवान ये नहीं कहते की छोड़ो भगवान गीता के द्वारा केवल हमें ये उपदेश देते हैं कि तुम अभी चेतना को पढ लो। कैसे आज हमारी चेतना ज्ञान के कारण हमारी चेतना क्या रहती है। ये शरीर हमारा असली स्वरुप है, चिपटी जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। और जब आप चेतना बदलते हो तो फिर ये विचार आता है क्या? भगवान हर चीज के स्वामी और हम केवल उनके द्वारा जो सुविधा प्राप्त हुई है वो है हमारे पास। और इससे हमें भगवान की सेवा में उपयोग करना चाहिए। आज लोग लक्ष्मी को नारायण से दूर जाना चाहते हैं, जैसे की रावण सीता को राम से दूर ले जाने का उन्होंने प्रयास किया। तो इस वार्ता में शांति की प्राप्ति नहीं हो सकती। अगर हम भगवान को समझना चाहते हैं तो अनन्य भक्ति जो की गीता का मुख्य उद्देश्य है, उसको हमें समझने का प्रयास करना चाहिए। गीता में वैसे ज्ञान योग का वर्णन है, ध्यान योग का वर्णन है, कर्म योग का वर्णन है। और अंत में क्या है निर्णय? तो भारतीयो का अर्थ क्या है? प्रेम के साथ भगवान की सेवा करना। जिस प्रकार 1 माता प्रेम के साथ अपने बच्चे को पालती है, तो उसी प्रकार प्रेम के साथ भगवान की सेवा करना। भौतिक समाज में हम जबरदस्ती 1 दूसरे की सेवा करते हैं, जैसे की आप नौकरी करते हो, आप नौकरी क्यूँ करते हो? क्यूंकि आप नौकरी नहीं करोगे? तो आमदन नहीं, आएगी घर में आमदन नहीं, आएगी, घर में तो रोटी, कपड़ा मकान कहाँ से आयेगा? जबरदस्ती आपको नौकरी करनी ही पड़ती है। आप नौकरी करते हो, प्रयास करते हो मालिक को खुश करने के लिए। और मालिक हमेशा यही कहता है। तुम तो निकम में हो, कम में हो, ये ये कमियाँ हैं तुम्हारे में। मालिक सोचता है अपनी तरफ से कि हम तो उसको अच्छी शंकर दे रहे हैं नौकरी। यही सोचता यहाँ की सरकार जरूरी वान कितनी मिलने की संभावना है। प्रयास करते हैं, बच्चों को फल देते हैं, बच्चे बड़े होकर क्या कहते हैं? आपने कुछ किया ही नहीं, बुरा नहीं माना। क्या हमारे लिए कोई स्थान थोड़ी किया? आपने अपना कर्तव्य निभाया मैं, शिक्षा, देवी नमस्ते भी न रास्ते जाओ, हम अपने रास्ते जा। तो आज बौद्धिक समाज का बौद्धिक समाज में कोई भी किसी से संतोष नहीं है। जैसे की महात्मा गाँधी जी ने देश की आजादी के लिए वो त्यागा प्रयास किया, हर 1 व्यक्ति इससे संतोष नहीं था, तो उसने क्या किया? गोली चला दी। तो ये है भौतिक समाज का विवाह। आप कितना भी प्रयास करो दुरसों को संतुष्ट करने के लिए, और आप सफलता प्राप्त नहीं करो, प्रयास करते हुए यही प्रेम की भावना भगवान की तरफ अर्पण करने के लिए, जिसके द्वारा आपकी गर्मियों को संतोष प्राप्त भौतिक समाज में हम सब प्रयास करते है 1 दुसरे को संतुष्ट करने के लिए। और जब मानव समाज के द्वारा ये संतोष प्राप्त नहीं होती तो हम अपना प्रेम कहाँ दे देते हैं? कुत्ते विडियो को भारत में भी राज हो गया है? का 1 लक्षण क्या है? बड़ी मोटर दूसरा लक्षण क्या है? विदेशी कुत्ते रखना? ये बहुत बड़ा धंधा है। विदेश से कुत्ते लाते हैं, भारत में बेचते है और धनी लोग खरीदते हैं। जरा दिखाने के लिए, देखो हम कितने धनी हैं, वो ही प्रेम भगवान को दे सकते है। और विदेशो में तो बहुत ही कुत्ते के लिए पढ़ना बहुत बड़ा फैशन है। वह टीवी में रोज आपको। हर 5 में एडटिजमेंटदिखता है। ये खाना खरीद और तुम्हारे कुत्ते के लिए सेल बढ़ जाएगी ये खाना खरीदा, इसमें विटमिन ज्यादा है यह खरीद और खरीद। तो यही प्रेम की भावना, यही मानव जीवन जिसका हमें उपयोग करना चाहिए, भगवान की सेवा में, हम उपयोग कर लेते हैं उन चीजों की सेवा में, जेल के द्वारा। आज में हमें वो रोना। तो भगवान कहते है अगर तुम मुझे समझना चाहते हो तो नानी द्वारा ये तो मुझे समझ सकते है। तो अगला प्रश्न यह है, ठीक है। हम भर्ती के मार्ग में प्रवेश करना चाहते है। और भर्ती में प्रवेश करने के लिए क्या कोई कीमत भी है? आप किसी महंगी वस्तु को बाजार में खरीदने जाओ तो आपको दम भरना पड़ता है। ठीक है न? तो भगवान को प्राप्त करने के लिए या भर्ती के मार्ग में प्रवेश करने के लिए भी पूरी कीमत भरनी पड़ेगी। क्या है वो कीमत भगवान की शिक्षा का पालन करना पड़ेगा। आज हमे सोर की टिकट भी चाहिए और भगवान चाहिए। हमारे गुरु जी में कहते थे पीपल गोट, किंग, दम, विदाउट गॉट हमें सुख चाहिए सोरह का और भगवान हमें नहीं चाहिए, उनकी शिक्षा हमें नहीं चाहिए। तो ये सम्भव नहीं हो सकता। तो भगवान को समझने के लिए ये भक्ति का, मार्ग का ज्ञान हमें सारे शास्त्र में प्राप्त होता है। जैसे की श्रीमद भागवत, श्रीमद भागवतम, बिल्कुल। अंत में भगवत गीता पर हमें महाभारत में प्राप्त होती है। गीता तो महाभारत का 1 छोटा सा हिस्सा है जी ने सारे शास् का सक्षेप में निर्णय कर लिया था वेदांत में जब भी उन्हें निराशा महसूस हो रही थी तो वो 1 दिन पहुंचे गुरु जी के पास और सारे वती नदी के किनारे, उन से उन्होंने पूछा कि मैंने इतने ग्रंथों की रचना की है, कोई मुझे सतुष्मसूसनहीं हो रही है क्या कारण उन्होंने कहा की आपने केवल का वर्णन है। तो ये शुद्ध भक्ति का उददेश्य भक्त स्वामी प्रभु का जो कि हमारे संस्थापक चार्य है ले गये। सारे विश्व में ये तो सुन बैठे किस प्रकार भारत का प्रयास किया और 70 साल की आयु में 1 पानी जहाज में कार्गो शिप में पहुँचे। जैसे माल गाड़ी होती है न, वैसे माल उठाने के जहाज भी होते है और हवाई जहाज भी होते हैं। जी अमेरिका गए है कार्गो शिप में जिसमें केवल पैसेंजर नहीं होते केवल सवारी नही के समान हो। जब प्रोप जी अमेरिका पहुँचे और वहाँ के दूसरे स्वामियों ने जब सुना की ये तो भक्ति का ज्ञान दे रहे हैं स्वामी जी, तो ये सब 1 सभा में पहुँचे हमारे गुरु जी के पास और कहने लगे स्वामी जी आप बहुत पुराने विचारों के हो, अब अमेरिका को नहीं समझे। अभी आप नए हो, हम तो पुराने कई फालसिया है भर्ती यहाँ कोई नहीं सुनेगा अमेरिका में आप धोदीपुरतातीललगाना छोड़ 2 आप खुद पतलून कमीज पहनना शुरू करो। हमारे जैसे वो लोगो को ये मत कहो महसवगैराछोड़नाहै। स्वामी जी के मन में पूरा विश्वास था कि भगवान की वाणी को अगर सत्य रूप से दिया जाए तो विश्व के लोग इसे स्वीकार करेंगे। तो हमें यह नहीं सोचना चाहिए की शुभ भक्ति का ज्ञान बहुत कम लोग लेंगे तो हमें देना ही नहीं चाहिए, नहीं आखिर आज इस संस्था के लगभग 500 केंद्र है, सारे विश्व में लोग दे रहे है ये तो नहीं कि केवल आपको हम शुद्ध भक्ति का उद्देश्य देते है और अमेरिका में, रशिया में कहते है। हाँ कई बार हमारे भारतीय लोग पूछते है स्वामी जी क्या विदेशों में भी उन्होंने अंडा मास छोड़ दिया है, क्या विदेशों में भी क्या चला है, चाय पीना छोड़ दिया, क्या प्यार वो नहीं खाते के हमक्या सोचते है की मेडिकल हो गया है तो धरती के द्वारा जो आनंद सुख आपको प्राप्त होता है वो किसी भौतिक कार्य के द्वारा प्राप्त नहीं हो सकता। 1 बड़े महान संघ थे, आज से 500 साल पहले, बंगाल न करना संत थे बड़ी ऊँची पुटी की, भगवान की भक्ति में थे, संतोष थे दूर दूर से लोग आते थे उनको आदर देने के लिए, और वो संत के पास कोई रहने का ठिकाना भी नहीं था, वो खुद निवास करते थे 1 ब्रिक्स के नीचे और खाने के लिए उनके 12 शिष्य थे, जो भी मांग कर लाते थे, चावल वगैरह को, उनकी पत्नी उपाती थी, उनको खिला देती थी। तो 1 दिन यह खबर राजा तक पहुंच गई की तुम्हारे राज्य में 1 बड़े ऊँचे पोटी का संत है, और उसके पास न रहने का ठिकाना है, न खाने की व्यवस्था, तो राजा को बहुत लजा मेरे राज्य में इतनी ऊँची पुटी का, संत के पास रहने का ठिकाना नहीं है। राजा आया उस संघ के पास, राजा ने संघ से पूछा मैंने सुना है की आपके पास देने का ठिकाना नहीं है, आप निराश हो बोलो मैं आपके लिए 1 महल बना देता हूँ ने कहा कौन कहता है मैं निराश हो, मैं खुशी के साथ इस गुड्स के नीचे निवास कर रहा है, आपको किसी ने गलत सूचना दी है, मैंने सुना की आपको खाने की भी ठीक सुविधा नहीं है। उस ने कहा कौन कहता है मेरे जाते हैं, थोड़ा भी मान कर ले जाते है, अपनी पत्नी को मुझे खिला देती है। कौन कहता है की आने की सुविधा नहीं है। तो राजा आश्चर्य चकित हो गया, ये देख कर कैसे संत इतना संतोष है और मैं इतने बड़े महलों में रहता हूँ और मैं हमेशा निराश हो जाता हूँ। तो जो व्यक्ति भगवान के शरणागत हो जाए वो भी अपनी संतोष को प्राप्त कर सक। जिन महापबूजीजोपरम भगवान के अवतार हैं, उन्होंने हमें 1 साधन दिया है जिसके द्वारा हम इस भर्ती के मांग में आगे बढ़ सके। शुरू में तो अनन्य भक्ति प्राप्त नहीं होगी और भक्तों की साधु, साधु, संगत, साधु, संगत, सर्व शास्त्र का लाभ मात्र अगर आपको 1 पल के लिए भी साधु की संगत मिल जाए तो आपके जीवन में आप आगे बढ़ सकते। तो कैसे बढ़ोगे अगर आप चालू की संगत के उपदेश का दाता कई बार हम सोचते हैं, हम सर्दों के चेहरे को देख लेंगे चरम। छूधेंगेउसिहमारा उधार हो जाएगा, बुरा नहीं मानना, संत के चेहरे देखने में उधार नहीं रोएगा और सब की शिक्षा को कानों द्वारा स्वीकार करने में उदार होगा। चेहरे पर आप सब की तस्वीरें देख सकते हो और जब तक आप भगवान कृष्ण या उनके पतियों की शिक्षा का पालन नहीं करोगे, आप आगे नहीं बढ़ सकोगे तो भगवान 11 दिया है इस मार का वर्णन शास्त्र में है जैसे की भगवान ने कहा और महा स्वामी जी ने कहा की ये राजा कल में तो दोष ही दोष है और करी में 1 सुख कार्य है क्या कृष्णा केल्टर तो किसना का किलर जैसे आप सब यहाँ उपस्थित हो। हमें याद है की यहाँ आये थे पहले 2 साल 3 साल पहले और आपके कार्यक्रम में शुरू हुआ था की प्रेरणा से और 12 भक्तों की प्रेरणा से 4234 भाट थे, अस्ते अस्ते आपके भक्तों की संख्या बढ़ गयी, आपने प्रेरणा भी बढ़ी कैसे क्यूँकि आप लोगो ने प्रयास किया, हर हफ्ते आप यहाँ आपने शुरू किया, भक्तों की संख्या का लाभ उठाना शुरू किया, मंदिर में पहुँचना आय किया और इस प्रकार आपकी प्रेरणा जो है आपके बढ़ तो कहने का तातपर्य यह है क्या प्रयास करोगे फिर भगवान जो की आपके हृदय में विराजमान हैं वो आपको बूढी देंगे जिसके द्वारा आप आगे बढ़ सकते, भगवान हरि के हृदय में विराजमान हैं, वो हमारी बुद्धि हमें को याद करने की, सेवा करने की शक्ति देते है और उनके द्वारा हम भूलते भी, भूलने की शक्ति भी वहाँ से या तो आप सब भक्तों में तो अध्यात्म में रुची है इसीलिए आप सब यहाँ पहुँचे। तो ये कितने महा भगवान की उन्होंने तो और भी सरल बना दिया है। इस युग में हरी के नाम का उचा, हरे के नाम का उचार, तो हर व्यक्ति इसका क्या परिणाम होता है चेतन ने कहा है जिस प्रकार आइने की धूल को दूर कर सकते हो, साफ़ कपड़े के साथ, उसी प्रकार हिदेकी जो मैल है, काम को लोग वो मल के रूप में उसको आप मिटा सकोगे, यह हर नाम की ये कोई नया मंत्र नहीं है, न ही इसकी कल्पना की ये प्रशासन में हज़ारों सालों से आ रहा है, हजारों संतों ने इसका उपयोग किया है और सारे विश्व में लोग नाम के उत्साह से आगे भारत के मार्ग में तो भगवान को समझने का प्रयास हमें करना चाहिए। हम सब फिल्मी कलाकारों की कहानिया पढ़ते है, पॉलिटिशन की कहानिया पढ़ते हैं। तो किशन लीला में रूचि नहीं लेते, फिल्मी लीला में रूची लेंगे कोई खिलाड़ी है उसकी लीला में रूची लेंगे ने क्या क्या, उसने क्या किया? और कृष्णा लीला में क्या है, उसमे हमारी रोटी, नहीं तो हमें कृष्ण लीला में रूचि लेनी चाहिए। जो सास में उपदेश्य है, उसको पढ़ने का प्रयास करना चाहिए। तो आप सब भक्तों से ये छोटा सा निवेदन हम करना चाहते हैं की आप कृपा करके भक्ति के महादीप का पूरा लाभ उठाइए और अपने जीवन को सफल बनाए। हाई किश्ना हाई क्रिष्णा हाई करे हाल हाहाहा हाल।
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