सबसे सर्वश्रेष्ठ भक्ति कौन सी है? | BG 12.09 | 20 Dec 1998 | New Delhi | Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

In this Hindi devotional lecture, Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī expounds on Bhagavad‑Gītā chapter 12, verse 9, describing the supreme form of bhakti as unwavering contemplation of the Divine. He acknowledges the difficulty of maintaining constant thought of God and introduces the nine practical devotional practices (navadha bhakti) – listening (śravaṇa), chanting (kīrtana/ucchāraṇa), remembrance (smaraṇa), offering prasāda, performing āratī, serving the deity, and related rituals. The talk interweaves scriptural references, anecdotes (e.g., Pralad Mahāj’s teaching), and philosophical points about the soul versus the body, the illusion of māyā, and the need for devotion to overcome it. Śrīla Goswāmī relates these teachings to everyday life, contrasting material employment with devotional service, urging listeners to integrate bhakti into their work, and emphasizing non‑attachment. He provides concrete ritual guidance (timings for āratī, mantra recitations, offering food as prasāda) and calls the audience to action: distributing the Bhagavad‑Gītā (mentioning a campaign of 1.5 lakh copies) and spreading devotional practice. Throughout, audience members (Speaker A and C) ask clarifying questions, which are answered with supportive explanations. The lecture blends scholarly exegesis, practical instruction, motivational encouragement, and community mobilization.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासु। देवाया
ये भागवत गीता के बारहवें बिहार का नौवां स्लोक है अथाचितमसmhaथोम सी mईष्थिहमअभ्यास योगेन तथो मम मिचापतोधननजयa। ये श्लोक है भागवत गीता के बारे बिहार का और इस अध्याय का नाम है भक्तियों।
वैसे।
तो पूरे गीता का उपदेश है भक्तियोग। पुलिस अध्याय में भगवान भक्तियोग के अनेक तरीके के विश्व में हमें उपदेश दे रहे हैं। सबसे पहले तो भगवान ने इस अध्याय में यह कहा है कि तुम अपने चित को अविचल भाव से मुझ पर स्थिर रख। भगवान कहते हैं कि सबसे ऊँची भक्ति वो है। जब तुम अविचल भाव से मेरा चिंतन करो, मन मन भाव सदा मेरा चिंतन करो। भगवान ऐसे दिहायमेयउपदेश दे रहे हैं और अनेक और लोगों के द्वारा भी यही उपदेश दे रहे हैं कि हमें अविचल भाव से उनका चेत करना चाहिए, उनका चिंतन करना चाहिए। और अगर सच्चाई से पूछा जाए और कहा जाए? तो हम ये देखते हैं कि विचल भाव से भगवान को चित करना सदा इतना सरल नहीं है। सच बात है, हम आपको कहें कुछ मत करो। केवल भगवान का चिंतन करो। 24 घंटे, 2 घंटे, 1 घंटा, आधा घंटा मुश्किल है तो और उस स्थिति में पहुँचने के लिए थोड़ा परिश्रम भी करना पड़ता है। जैसे कि भगवान महराजजी नवधा भक्ति का ज्ञान देते हैं। श्रीमद भागवत में नाद महराज के पिता ने उनसे पूछा बेटा ये बताओ कि तुम आज 5 शाला में क्या पढ़ कर आये हो? पिता ने अध्यापकों को कहा था के मेरे बेटे को ये सिखाओ कि विष्णु
सबसे सर्वश्रेष्ठ नहीं है।
पर मैं हूँ। तो पिता ने उम्मीद की थी कि बेटा कहेगा आप हो? सर्वश्रेष्ठ आपकी शरण मुझे लेनी चाहिए। और उसकी बजाय बेटे ने कह दिया शव न कितना विष्णु स्वर्ण पाद सेवनम अचनबंधमदसमसख्यम आत्मनिवेदन। उन्होंने कह दिया नवधा भक्ति का ज्ञान? तो शरणम कृतन जानते हैं? शरणम का अर्थ है सुनना। केतन का मतलब है उच्चारन करना और विष्णु। स्मरणम का अर्थ है भगवान का चिंतन करना और विष्णु स्मरण।
भगवान ने।
प्रलाद महाज ने कहा तीसरे नंबर पर, पहले पर नहीं, दूसरे पर नहीं, पर तीसरे पर। उन्होंने ये नहीं कहा श्रम विष्णु स्मरणम श्रवनम कितना। उन्होंने कहा श्रवनम कितना विष्णु स्मर नाम।
तो इससे हमें यह ज्ञान मिलता है
कि विष्णु स्मरण की स्थिति पर पहुँचने के लिए पहले स्वमन और कितन के द्वारा परिश्रम प्रयास करना पड़ेगा।
तो इस श्लोक में भगवान कहते है की अगर तुम मेरा चित
भाव से
नहीं कर सकते सदा तो फिर क्या करो?
फिर तुम भक्ति योग की विधि विधानों का पालन करो।
तो भगवान करे भक्तियों की विधि विधानों का पालन करो। तो अगला प्रश्न यह है कि क्या हैं भक्तियों की विधि विधान? विधि विधान क्या है?
क्या है विधि?
जैसे हम वैधी भक्ति की चर्चा करते हैं। आप सब को जो इस समय बैठे हुए हो, अक्सर आते हो जो पहली,
दूसरी बार आये वो तो प्रचार के लिए चले गए।
पर आप सब जो यहाँ इस समय उपस्थित हो, वादा आते हो।
तो आप ने सुना होगा।
वैधी भक्ति यहाँ भगवान उपयोग करने, विधि
विधानों शब्द विधि विधानों से क्या अर्थ
विधि विधानों से भक्ति की विधि विधानों, भक्तियों की नियमों का पालन कर।
भक्तियों का क्या अर्थ भक्तियों का अर्थ
है प्रेम के साथ भगवान की सेवा में जुड़ना।
अभी अगर मैं आप सब से पूछूँ खास कर के आप पुरुषों से की आप क्या करते हो?
सब कहोगे हम नौकरी करते हैं, धंधा
करते है, है तो आप नौकरी करते
हो किसी के पास। आप कहते हैं हम हफ्ते में 40 घंटे, 35 घंटे नौकरी करेंगे।
और उसके बदले में हमें इतनी तनखा
मिलनी चाहिए, सच्चाई से देखा जाए न। जो व्यक्ति नौकरी कर रहा है, उसका
स्नेह है मालिक के लिए, न ही
मालिक का स्नेह है, नौकर के लिए सच बात है। बेशक हम शेख हैं। करें बेचेगा आपको जनवरी फर्स्ट को अच्छा न्यू ईयर ग्रीटिंग आ जाए, मारे हैप्पी दिवाली ग्रीटिंग आ जाए, बेचे आपको दिवाली
में बोनस दे दे।
और असलिए तो ये है वो आपको खनका दे रहे है क्यों की आप मेहनत कर रहे हो और आप उनको सलाम करते हो क्यों की आपको पैसा मिल रहा है। अगर पैसा नौकरी छोड़ 2 तो वो गिराक आपके हाथ से चले जाए। तो न आप उसकी परवाह करोगे, न वो आपकी परवाह करेगा। सच बात है।
तो ये तो है भौतिक सम्बन्ध।
जब तक हमें 1 दूसरे से कुछ
लाभ मिलता है, हम नमस्ते सलाम इत्यादि करने को तैयार रहते हैं।
आरोप भक्तियों का अर्थ है प्रेम से सेवा करना। क्या कारण है की आप अपने मालिक की परवाह नही करते हैं? मालिक आप की परवाह नहीं करता। क्यूंकि ये रिश्ता जो सम्बंध जो है, प्रेम पर आधारित नहीं है, यह सम्बन्ध आधारित है। कुछ लाभ पर हमें हमारा स्वार्थ, हमे क्या मिलेगा? आपको क्या मिलेगा? भक्तियों का का अर्थ है कि आप प्रेम के साथ सेवा करो। भगवान की पर असलियत में देखा जाए। उस प्रेम की स्थिति में पहुँचने के लिए भी हमें थोडा प्रयास करना पड़ेगा, परिश्रम करना पड़ेगा तो ही हम उस प्रेम की स्थिति में पहुँच पाएंगे। तो भगवान कहते हैं हेयर जोन। सबसे पहले तो भगवान अर्जुन को अर्जुन ने पूछा सर्वशेष किस प्रकार से हम आपको प्रश्न कर सकते है? भगवान ने कहा बिना अभी चल भाव से मेरा चिंतन करो, 24 घंटे में मेरा चिंतन करो। तो अर्जुन ने कहा ये तो इतना सरल नहीं है, ये तो इतना सरल नहीं है, सम्भव है, सरल नहीं है। साधारण व्यक्तियों के लिए। तो आगे कैसे बढ़ा जाए। ये तो भगवान नहीं कह रहे की अभी तुम अभी चल भाव से मेरा चिंतन नहीं कर सकते तो तुम बेकार के रह गए। इस बार भी भगवान ये उपदेश दे रहे हैं की किस प्रकार से हम किसी न किसी रूप से जुड़ सके। जैसे वो कहते हैं सबसे उत्तम स्थिति है जब आप उनका चिंतन करो, अगर उनका चिंतन नहीं कर सकते तो भगवान कहते हैं भक्तियों की विधि का पालन करो। भगवान कहते अगर तुम भक्तियों की विधि का पालन नहीं कर सकते तो मेरे लिए काम करो। अगर तुम मेरे लिए काम नहीं कर सकते, तो अपने नतीजे का जो परिणाम है, वो मुझे अर्पण करो। अगर वो भी नहीं कर सकते तो ज्ञान स्वीकार करो, पर कुछ न कुछ तो करो। मेरे लिए तो यह कहा जा रहा है भक्तियोग के विधि विधानों। तो भक्तियों के विधि विधान का अर्थ है भक्तियों की विधि। नियमों का पालन करना। तो क्या है भक्तियों की विधि। सबसे पहली विधि तो यह है कि आप जी के द्वारा क्या करो?
हाँ, भगवान के दिव्य नाम का उच्चालन करो। हरि नाम का साथ में। यह है जीव के द्वारा, कानों के द्वारा भगवान के नाम को सुनो, भगवान के सम्बंधित कथा को सुना, उपदेश को सुनो, जी के द्वारा भगवान का गुणगान करो और प्रशाद स्वीकार करो। ये बहुत अवश्य है कि जीप के द्वारा हम प्रसाद भी स्वीकार करें। वैसे तो आप सब खाते ही हो। ध्रुव महाराज की कथा पढ़ते हैं। भगवत के चौथे स्कंध में, उन्होंने तो खाना ही बंद कर दिया। पहले महीने हर तीसरे दिन खाते थे और फल जो की जानवर खाते हैं, बंदर खाते हैं, जंगल में दुसरे महीने हर छठे दिन खाने लगे, क्या सूखा, घास, तीसरे महीने 9 दिन में 1 बार पानी पीने लगे, चौथे महीने ये भी बंद कर दे। अगर हम आप से कहें ये पालन आपको करना है तो आप शायद भूल कर भी ये मंदिर में वापस नहीं लौटा, दर्शन के लिए लौट जाओगे पर उपदेश के लिए नहीं।
तो चेतन महा।
प्रभु जी ने तो हमें कहा 3 चीजें दी उन्होंने, खाओ नाचो है, नाचो गाओ और खाओ। और नाचो किसके लिए भांगड़ा डांस नहीं, ऐसे भी वो बहुत नाचते हैं, भांगड़ा करते हैं, मणिपुरी डांस करते हैं, बाल रूम डांस करते हैं, है। वैसे भी लोग गाते हैं। पर नाचो किसलिए भगवान का किर्तन करते हुए गाओ क्या भगवान का किर्तन और खाओ क्या? कृष्ण प्रसाद।
तो भक्ति की 1 विधि यह है
की आप केवल प्रसाद स्वीकार करोगे। तो आप सब जो घर में खाते हो, आपको निश्चित रूप से यह निर्णय करना चाहिए कि आपने केवल प्रसाद ही स्वीकार करना है। प्रसाद का क्या, जो भोग भगवान को लगाया जाए। भगवान की खुशी के लिए जो खाना बनता है तो क्या प्रसाद का क्या अर्पण कर सकते हो। आजकल सुना है भारत में कई लोग उदास हो गए थे, क्यूँ? क्यूंकी प्याज का भाव बढ़ गया? प्याज का भाव बहुत बढ़िया और आप लोग ने अनुभव किया की प्याज का भाव बढ़ गया तो प्याज नहीं खाते। क्या खाते है पत्र पुष्प फल तो यो में भक्ति पर जो प्रेम और भक्ति के साथ अगर कोई जल और पत्ता भी अर्पण करे तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ। तो हमें प्रसाद खाना चाहिए। खाने से पहले भगवान को भोग लगाना चाहिए। भगवान को भोग कैसे लगते है। जब आप पका रहे हो तो ये मत सोचो की आप की जबान के चस्के के लिए बना रहे हो। ये सोचो की ये तो भगवान के लिए आप बना रहे हो। प्रसाद घर में 1 ऑल्टर रखो, मूर्ति, रखो, मूर्ति नहीं तो कम से कम भगवान की तस्वीर रखो, प्रपात की तस्वीर रखो। पंचायत की तस्वीर रखो और खा कर खाते कर। यही भावना रखो की भगवान के लिए बन रहा है और भगवान के चरणों में अर्पण करो। मंत्रों के उच्चालनके साथ पहले गुरु मंत्र बोलते हैं, 3 बार, फिर प्रापात मंत्र बोलते है, 3 बार, फिर चेतना महा, प्रभुजी का मंत्र बोलते हैं, 3 बार, फिर राधा कृष्ण का मंत्र बोलते हैं 3 बार और फिर हर कृष्ण। अगर आप दुसरे मंत्रों को नहीं जानते तो हर 1 कृष्ण मंत्र का उच्चारण कर। भगवान को पहले अर्पण करो, फिर जब खाओगे तो ये शुद्ध खाना होगा, प्रसाद होगा। प्रसाद का मतलब है भगवान की दया
और भक्ति की विधि में यह भी गिना जाता है।
क्या भगवान की प्रशंसा के लिए सुबह के समय आरती करो। हमारे मन में।
तो आप जानते हो कितने बजे आरती होती है।
मंगल आरती मंदरों में है साढ़े 4,
कई स्थानों में साढ़े 4 और कई स्थानों में सवा 4। अब मानोगे नहीं, रूस में सवा 4 होती है। हालांकि इस समय रूस में यहाँ से 50 गुना ज्यादा ठंड है। खासकर के बीज में 200 गुना ज्यादा पर हर मंडल में रूस में सवा 4 बजे मंगल आरती होती है। सवा 4 साढ़े 4 नहीं बाकी थान में साढ़े 4 है। तो सब 4 साढ़े 4 बजे। अभी हम कहेंगे आप, साढ़े 4 बजे के स्वामी आपने, हमें फंसा दिया, साढ़े 4 बजे तक जाग नहीं सकते। खैर, अगर साढ़े 4 बजे जाग नहीं सकते तो साढ़े 5 बजे थोड़ी छूट दे देते हैं। आपको छूट साढ़े 5 बजे जाग जा पर मंगल आरती करो। घर में 1 समय बना लो, साढ़े 566 के बाद नहीं। अब भगवान क्यों उठाओ। भगवान को सम सदा दावा प्रार्थना है, वो करो, फिर भगवत भी थोड़ा पढ़ो सुबह दफ्तर जाने से पहले जल्दी से भगवत पर लो। 1 श्लोक, 2 श्लोक। अगर सुबह किसी कारण समय नहीं मिलता, तो फिर शाम को पढ़ लो और भागवत गीता भी साथ में पढ़ा 1 लोग, 2 लोग इसके द्वारा आपका आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ेगा। आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ने से आप ये निर्णय कर सकोगे। क्या सत है, क्या सत है, क्या सच है, क्या झूठ है, क्या आवश्यक है, क्या आवश्यक नहीं है। अज्ञानता की स्थिति में आप ये निर्णय नहीं कर सकते। ठीक है न? ज्ञान के साथ आप निर्णय कर सकते हो। तो ज्ञान कैसे बढ़ेगा? वैसे तो महाविद्यालय में जाकर ज्ञान प्राप्त कर सकते हो। पुरुष ज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान में अंतर है। जैसे आज हमने आपको भागवत श्लोक पढ़ कर सुनाया। और ये श्लोक तो हम पढते आ रहे है। करोड़ो सालो से कोई थोड़ी की, इसका उच्चारण कल किया था भगवान? ये तो करोड़ो साल प्राचीन ज्ञान है। और जब जब आप पढो तो ऐसा लगता है की ज्ञान कल ही दिया गया था। तो आप इस अध्यात्मिक ज्ञान को अनुकूल करो और इसके अलावा साधु संग का लाभ उठाओ। जैसे आप हफ्ते में 1 बार मंदिर आते हो, ज्यादा हो सके तो ज्यादा पर रविवार को आओ साथ में थोड़ा प्रचार भी करो। आखिर भगवान कहते हैं सब भक्तों में सबसे प्रिय कौन है, सब भक्तों में सबसे प्रिय कौन है? जो मेरा प्रचार करता है, तो उससे ज्यादा प्रिय भक्त हुआ है, न होगा, न हुआ है, न होगा आखिर किस का प्रचार, आप किस की महिमा बढ़ा रहे हो, आप परम भगवान की महिमा बढ़ा रहे हो, उनका गुणगान कर रहे हो तो उनका गुणगान, उनका प्रचार, उनकी सेवा करते हुए अगर बस्ती भी देनी पड़ी तो उसमे कुछ नुकसान नहीं है। वैसे हम सोचते हैं। अगर कोई हमारा अपमान करे तो हम बड़ा बुरा महसूस करते हैं। कहते हैं की हमारा हमारी इस और बस्ती हो गयी है, तो इसके बाद भी नहीं करेंगे। पर भक्ति के मार्ग में आदर अपमान हार जीत, सर्दी, गर्मी, इससे हम प्रभावित नहीं होते। अगर विजय प्राप्त कर ले तो क्या सोचते हैं? ठीक है, आज जीते हैं, कल हार भी सकते हैं। अगर आपकी मन की इच्छा प्राप्त हो भी गयी। मन की इच्छाएं 2 प्रकार की हैं। 1 तो है मन की इच्छा। इनत्तिभौतिक सुख के लिए। दूसरी है भगवान की सेवा के विषय में। जहाँ तक इंडिया तृप्ति का प्रश्न है, भौतिक, वादी व्यक्ति, तो यही चाहता है। इंडिया तृप्ति की। सुविधा मिलते जाए, मिलते जाए और सुविधा प्राप्त हो। तो जब वो सुविधा प्राप्त हो तो हम संतुष्ट दिखते हैं। जब प्राप्त नहीं हो तो हम निराश हो जाते हैं, क्रोधित हो जाते हैं, अपमान महसूस करते हैं। आरोप। अध्यात्मिक जीवन में जब आप प्रवेश करते हो तो इस प्रकार का सुख, दुख, आदर अपमान की हम चिंता नहीं करते। भगवान की सेवा में अगर कोई हमें हमारा अपमान भी कर दे तो हम बुरा नहीं मानते।
आखिर हम ये शरीर थोड़ी है। अदर अपमान, तो जब महसूस करते हो, जब ये शरीर को अपना स्वरूप आप समझते हो, जब आप आईने के सामने खड़े हो कर, यही देख कहते जाओगे देखो मैं अभी कितना सुन्दर बन गया हूँ। मेरा यह शरीर ही असली मेरा स्वरूप है। फिर आपको आदर अपमान से चिंता हो रहेगे। पर जब आप ये सोच लो, जिवेरेसुरुपाय, कृष्ण नित्य
के आप, तो भगवान के नित्य दास हो।
ये है आपका असली स्वरुप। और ये शरीर तो नश्वर है। असली स्वरुप है आत्मा, जिसका ना तो कभी जन्म होता है, न ही मृत्यु। तो जब आप आध्यात्मिक स्थिति पर कार्य कर रे हो तो आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ने से आप आध्यात्मिक स्थिति पर कार्य करोगे। क्षेत्र ने महाप्रभु जी ने कहा हमें जो भक्ति के लिए अनुकूल हो, उस कार्य को स्वीकार करना चाहिए और जो भक्ति के लिए प्रतिकूल हो, उसे त्याग देना चाहिए। तो इस आधार, इस नियम के आधार पर हमें जीवन को आगे चलाना चाहिए। तो भक्तियोग की जो विधियां हैं, इतनी कठिन नहीं है। खैर, आगे भी 1 और नियम है। पर आर्म के लिए। अगर आप केवल इन नियमों का पालन करो, जाप करो। गीता पढ़ो मंगल आरती करो, घर में जो खाओ, भगवान को भोग लगाओ, शास्त्र पड़ो, भक्तों की संगत का लाभ उठाओ और जो धंधा नौकरी कर, रे, वो करते जाओ। इस में कुछ खराबी दिखती है, आपको नहीं।
और इसके द्वारा आपकी हृदय की शुद्धि
पड़ेगी, इंजिया की शुद्ध होगी। और आप यह समझने लगोगे क्या की किस प्रकार से आप असली सुख प्राप्त कर सकते हो। जैसे प्रलाद महाजी ने कहा, आज लोग ये नहीं जानते कि असली सुख प्राप्त करने का क्या साधन है। तो आप सब जानकार इस कौन से सम्बन्ध जुड़ा है। आप सब भाग्यवान हो। क्यूँकी आप यह पहचान गए हो की असली साधन क्या है? अब केवल भक्तों से यह विनती है कि बिल्कुल दीर्ध होकर आप इस स्मार्ट पर जुड़े रहिये। क्यूंकि ये नहीं कि अगर आपने यह स्वीकार कर लिया, यह समझ लिया तो माया किसी प्रकार से आपको विचलित करने के प्रयास नहीं करेंगे। माया का तो काम ही यह है। क्या है माया का काम? भक्ति से खींचना। भक्तों ने कहा मैं आपको भक्ति से जोड़ना माया का काम है। आपका भक्ती से खींचना और भक्ति से खींचने के लिए माया अनेक रूपों से आपको आकर्षित करने का प्रयास करती है।
तो अगर आप इन विधियों का पालन करोगे।
अगर आप इस शिक्षा का लाभ उठाओगे तो आप माया के प्रभाव से बच सकते है। जैसे की आज ठंड है, कल भी ठंड थी।
तो मैं देखता हूँ की आप सब
ने ठंड से बचने के लिए स्वेटर पहना हुआ है, चादर पहनी हुई है, टोपी पहनी हुई है, स्काफ पहना हुआ है, है क्यूँ? ठंड से बचाने के लिए और बारिश के मौसम में बारिश से बचने के लिए आप छाता का उपयोग करते हो।
तो उसी प्रकार माया से बचने के लिए भी उपाय है कि हम इसका लाभ नहीं उठाये। तो फिर भगवान क्या कर सकते हैं? भगवान के प्रतिनिधि क्या कर सकते हैं इसका लाभ उठाइए। और जैसे मैं कह रहा था, भगवान
कहते है की सब भक्त में सबसे प्रिय वो है जो की मेरा प्रचार भी करता है।
आप सब भक्त जानते होगे की इस दिसम्बर के महीने में, इस्कॉन के भक्त सारे विश्व में क्या करते हैं, है गीता वितरण का मैराथन करते है। तो बॉम्बे में पिछले 3 हफ्ते से मेलफोन चल रहा है, जिसमे हमारे मंदिर के भक्त तो भाग ले रहे हैं और जो हमारे गृहस्थ भक्त हैं। आप जैसे वो भी जुड़े है और पंद्रह दिन में ही डेढ़ लाख गीता
बात
तो देखो, डेढ़ लाख गीता बाटी तो कम से कम 3 लाख व्यक्ति तो उसको पढेंगे है। 3 लाख व्यक्ति आज पढेंगे और कल 6 लाख वो 6 लाख फिर आगे और प्रचार करेंगे। जैसे आप का परिचय कैसे हुआ के साथ किसी ने आपका परिचय करवाया, उस व्यक्ति उस किसी को किसी और ने परिचय करवाया, किसी किसी को किसी और ने परिचय करवाया, सच बात है तो उसी प्रकार आप लोग अगर 1 गीता भी बांटोगे तो 1 गीता कम से कम 23 व्यक्ति को पढेंगे। इन 23 में 1 व्यक्ति तो प्रभावित होगा वो 1 व्यक्ति आगे दुसरे को भी 1 गुण देगा, वो व्यक्ति फिर आगे दूसरे को भी देगा। तो इस प्रकार आपके 1 गीता बाटने से कम से कम सौ 200 व्यक्ति इस जीवन को सुधारेंगे छोटी सी यह भी विनती करना चाहता हूँ। ये साल 1 समस्या है कि जितनी गीता होनी चाहिए उतनी नहीं है। दूसरे शब्दों में गीत गीता बहुत तेजी से बढ़ गयी है। हमने हिंदी में 2 लाख छापी थी और 2 लाख हो गयी है। सब इतनी गीता तो नहीं बची पर अनेक और किताबें भी है। मैं आप सब भक्तों को यह निवेदन करना चाहता हूँ की आप मोहन मिलिए और जो भक्त बाटना चाहते हैं, गीता आप बाटिए घर जाकर, बाटिए, अपने मित्रों से भारतीय जिनकी जान, पहचाने बाटिए, गीता, कृष्णा बुक, अनेक ग्रंथो को क्यूँ नहीं। हमारे पास 12 किताबें नहीं, लगभग 90 किताबें, पा जी ने लगभग 90 से ज्यादा किताबों का अनुवाद किया। और इस प्रकार आप भगवान के प्रिय भक्त बनोगे। आप भगवान गुरु परंपरा के आशीर्वाद स्वीकार करोगे और आपकी भक्ति में ज्यादा डिटर्मनेशन ज्यादा देर। भावना से आप भक्ति कर। सकोगे। वो है जीवन का लक्ष। हम भक्ति के द्वारा ये नहीं कह रहे की आपको घर छोड़ना पड़ेगा, नौकरी छोड़नी, पड़ेगी, धंधा छोड़ना पड़ेगा नहीं। कई बार लोग घबरा जाते हैं की भक्तियों का अर्थ हमें ये सब त्यागना पड़ेगा नहीं। केवल आप अपनी चेतना को शुद्ध बनाओ और चेतना को शुद्ध बनाने का यही साधन है। जैसे भगवान कहते हैं अगर तुम सदा मेरा चिंतन नहीं कर सकते तो भक्ति योग की विधियों का पालन करो। तो आप सब भक्तों से यही निवेदन है की आप भक्तियों की विधियों का पालन करो और इस प्रकार अपने जीवन को सुधारने का प्रयास क।
हर कशना
हारे, क्रिश्ना हारे
किशना, क्रिष्णा
हारे हारे र हले।
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