भगवान अपने शुद्ध भक्तों की किस प्रकार रक्षा करते हैं? | BG 18.56 | Dec 2004 | Gopal Krishna Goswami

Gopal Krishna Goswami explains how Krishna protects pure devotees through constant remembrance and surrender to a qualified guru. A shuddha bhakta needs no external rituals, only devotion. Stories from the Mahabharata and Puranas show the Lord's miraculous interventions: Draupadi's rescue, Duryodhana's downfall.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय, नम भगवते वासुदेवाय। हे कृष्ण। आप सबका हार्दिक स्वागत आज का विषय है। भागवत गीता के 2 श्लोक 56 और 57 पहले हम श्लोक नंबर 56 पड़ेंगे और उसके पश्चात श्लोक नंबर सतावन सकाम सदा बन पपनोीशाश्रोतापदम। इसका हिंदी अनुवाद इस प्रकार से है मेरे शुद्ध भक्त मेरे सुरक्षा में समय प्रकार के कार्यों में सलंगन रह कर भी मेरी कृपा ऐसी निति तथा अविनाशी धाम को प्राप्त होता है। और इसका के द्वारा भौतिक कलम। ऐसी रहित होने के लिए शुभ भक्त परमेश्वर उनके प्रतिनिधि स्वरुप गुरु के निर्देशन में कदम करते हैं। उसके लिए समय की कोई सीमा नहीं है। वो सदा 24 घंटे शत प्रतिशत परमेश्वर के निर्देशन में कार्यों में सलंगन रहता है। ऐसे भक्त पर जो कृष्ण भावना मृत में रक्त रहता है, भगवान अत्यधिक दयालु होते है। वो समय कठिनाइयों के बावजूद कृष्ण लोगो को प्राप्त करता है। भागवत गीता का संदेश मानव समाज के सुधार के लिए है और आज इस कलयुग में इस सन्देश की बहुत आवश्यकता है। भगवान यहाँ कहते हैं मेरे शुद्ध भक्त मेरे सुरक्षण में रहते है। समस्त प्रकार के कार्यों में संलंगन रहकर भी मेरी कृपा से नित्य तथा विनाश धाम को प्राप्त होते हैं। इसका यह अर्थ नहीं क्या। भगवान के शुद्ध भक्त हो तो आपको और कोई कार्य करने की आवश्यकता नहीं। केवल भजन आप भगवान के शुद्ध भक्त होकर भी इस संसार में रह सकते हो। साधारण व्यक्ति के समान भगवत गीता में भगवान उदाहरण देते हैं। 1 कमल का फूल का जो जल में है और जल को छूता नहीं। इसी प्रकार अगर हमने ये दिव्य ज्ञान को अनुकूल किया है और अगर हमारे सौभाग्य है यहाँ परमेशर के प्रतिनिधि द्वारा इस ज्ञान को प्राप्त करे तो इस शिक्षा के सहयोग से भौतिक समाज में रहते हुए हम भौतिक समाज के दोष से बच सकते हैं। यह शास्त्र का निर्णय है। पर में भक्ति स्वामी जी समझाते है कि ये अवश्य है की हम परमेश्वर के प्रतिनिधि गुरु के द्वारा भगवान के संदेश को समझने का प्रयास करें। हमारे वैदिक शास्त्र में इस विषय पर बल दिया गया है की अगर हमें आध्यात्मिक ज्ञान चाहिए तो हमें किसी प्रमाणिक गुरु के द्वारा इस शिक्षा को ग्रहण करना चाहिए। इस विषय पर बल दिया जाता है। और परम भगवान ने स्वयं उदाहरण भी दिया था। जैसे की जब भगवान श्री कृष्ण पृथ्वी थी अपने भाई बलराम के साथ तो दोनो भाइयों ने सुनी मुनि को गुरु के रूप में स्वीकार किया था और बड़ी निर्मता के साथ गुरु की सेवा भी की। जब भगवान श्री कृष्ण में दोनों ने भी पूरी को गुरु के रूप में स्वीकार किया। 1 महान संत स्वामी जी जिनसे आप अवश्य ही परिचित हो। स्वामी जी ने कहा है भक्ति सिंधु नाम के ग्रंथ में की सबसे पहले हमें गुरु की शरण लेनी चाहिए, फिर गुरु की सेवा करनी चाहिए, फिर गुरु से दिक्षा ग्रहण करना चाहिए। फिर गुरु से ये पूछना चाहिए की भक्ति में आगे बढ़ने के लिए मुझे क्या करने की आवश्यकता है। और अगर कोई त्यागना भी पड़े जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए तो उसे हमें घबराना नहीं चाहिए। हम अनेक उदाहरण के पढ़ते हैं। शास्त्र में संतों के अनेक उदाहरण है कि किस प्रकार उन्होंने गुरु को स्वीकार किया, गुरु के आदेश का पालन किया और जीवन में आगे बढ़। सके। आज से लगभग 500 साल पूर्व 1 भक्त थे जिनका नाम था नरमराज ठाकुर थे वो राजा के बेटे बड़े प्रसे भक्त थे और उन्होंने लोकनााजकोस्वामी को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया। लोक स्वामी पहले ने शिष्य के रूप में स्वीकार नहीं कर रहे थे से जब उन्होंने देखा की इन की बड़ी इच्छा है और बड़ी निर्माता के साथ सेवा कर रहे हैं, तो फिर उन्होंने इन्हें गुरु शिष्य के रूप में स्वीकार किया। तो माने गुरु की शरण लेनी चाहिए मालिक गुरु द्वारा ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। स्वामी जी कहते हैं वहाँ वे वो व्यक्ति गुरु बन सकता है जिसका मन बुद्धि इंदियों पूरा वर्ष, जिस व्यक्ति ने मन बुद्धि इंदियों को वर्ष में किया हो, वो व्यक्ति में यह योग्यता है शिष्य बनाने के लिए। तो भगवान यह कहते हैं मेरा शुध भक्त। मेरे संरक्षण में। तो भगवान कहते हैं गीता में कौन दे पति जान नाम है भक्त पेनशदेहेअर्जुन। तुम सारे विश्व को ये सूचना। 2 क्या मेरा भाग जो है कभी नष्ट नहीं होगा, ये नहीं की भग को किसी प्रकार की कठिनाइयाँ नुभव नहीं करनी पड़ती और ये अवश्य है। भगवान अपने भक्तों की सुरक्षा करते है जैसे की प्रदार्थ महराज को अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ भुगतनी पड़ी क्या था उनका दोष केवल उनकी श्रद्धा थी पर भगवान के प्रति और अनेक और उदाहरण है पर भगवान ने हमेशा अपने भक्तों की सुरक्षा की है। हाँ भारत में आप 1 कथा पढते हो की 1 समय द्रास जैसे होगे बने बड़ी सरलता के साथ प्रसन्न हो जाते है और सरलता के साथ क्रोधित भी हो जाते है। 1 समय दुर्वा गए थे अपने 10 हजार शिष्यों के साथ, गए थे दुर्योधन के घर और उनका बड़ा अच्छा स्वागत किया अच्छी देखभाल की और देखभाल के बाद दवा नि निकाल रहे थे दुर्योधन के घर से, तो उन्होंने पूछा की मैं तुम्हारे लिए कुछ कर सकता हूँ तुमने इतनी अच्छी देखभाल की है। मेरी ने कहा अगर आप चाहो तो मेरे भाई के घर भी हो, देश्रकोभीअपनीसंगत दीजिएगा जैसे आप जानते हो। ये दुर्योधन के हृदय में 1 ही विचार था किस प्रकार से पांडव भाइयों को नष्ट किया जाए। और उन्होंने सोचा अगर वहाँ जायेंगे खास कर के उस समय के पश्चात जब द्रोपदी ने प्रसाद खा लिया हो तो दवा ने अपमान महसूस करेंगे और शेयर युधिस्टर को शाप दे, तो उन्होंने कहा क्या जेस्टर जाइए पर 2 पुली को दोपहर का भोजन खाने के पश्चात क्यूँकी। जब द्रोपति जंगल में जा रही थी तो सूर्य के देवता ने उन्हें दिया था जिसके द्वारा जितने भी व्यक्ति आये सबको भोजन मिल जाता था। और केवल जब तक ने अपना भोजन नहीं खाया हो। और इसलिए उन्होंने कहा कि आप उधर जाना। पैर के भोजन खाने के जब पहुंचे अपने 10 हजार शियों के साथ ने उनका स्वागत किया। उनसे यह कहा, आइये भोजन खाइए। दुर्वासा ने कहा, हमें दोपहर की विधियों का पालन करने 2 स्नान करने गये और स्नान करके हम आते हैं भोजन खाने के लिए। सन्यासी अक्सर जिनमे 3 बार स्नान करते हैं। तो युिस्टनेजबद्ोपती से कहा यार करो 10 हजार लोगों के लिए। द्रोपती ने कहा यह तो सम्भव है, मैने का भोजन खा लिया है, कैसे सम्भव हो पायेगा और घबरा गई। द्रोपति और रोने का दुख केवल भगवान को ही जानता है। और अधिक मात्र में भगवान के शरणागत होता है। श्रीमत भगवत के प्रथम स्कंध में हमें कुंती देवी जी की प्रार्थना प्राप्त होती है। और कुंती देवी जी कहती है हे भगवान, आप मेरे कष्टों को बढ़ाओ, क्योंकि जितना आप मेरे कष्टों को बढ़ाते हो, उतना ही अधिक मैं आपके सगत होती हूँ। मैं आपके कमलों का स्मरन करती हूँ। जितना अधिक का स्मरन करुंगी, उतनी ही जल्दी मुझे। जनम के बंधन से छुटकारा प्राप्त होगा। तो भाग है, दुःख की स्थिति में भी नहीं घबराता। उल्टा भक्त यही सोचता है की ये जो कष्ट मुझे आ रहा है, भगवान की असीम कृपा से हजारों गुना कम हो गया है। इस विषय पर। 1 बड़ी सुन्दर कथा है। पुराण में जिसकी हम चर्चा थोड़ी देर में करेंगे। तो धोती घबरा कर रोने लगी। और उसी समय भगवान वहाँ पहुँच गए। भगवान ने कहा द्रोपती, मुझे भूख लगी है कुछ खाने के लिए। 2 द्रोपती ने कहा कुछ है ही नहीं, घर में खाने के लिए दोपहर का भोजन मैंने स्वीकार कर लिया है। भगवान ने कहा मैं विश्वास नहीं करता, लाओ वो बर्तन जिसमे तुमने भोजन बनाया था। और वो बर्तन भाई। तो भगवान को क्या 1 साख का पता मिल गया जो 1 बर्तन के साथ जुड़ा हुआ था। जैसे ही भगवान ने उस शाख के पते को खाया जो बनी सारे 10 हजार ब्राहमण जो थे उनको ऐसा महसूस हुआ, उनका पेट भर गया है, उन्हें आने लगा और भगवान की कोई नीला है। थोड़े समय पहले उन सब को भूख लग रही थी, ऐसे महसूस करने लगे। हमारा पेट भर गया है। और जैसे ज्यादा खाने से कई बार दिखा रहा था। तो मुनि ने कहा, अगर हम इस में युधिष्टर के घर जायेंगे और हम भोजन नहीं स्वीकार करेंगे, क्यूँकी पेट भरा हुआ है तो अपमान होगा, हमें भूलना नहीं चाहिए। वाह। ऐसी मुनि ने 1 समय, 1 गहरा सबक मिला था, तो उनकी इच्छा नहीं थी। कि प्रकार का अपराध करें? मुनि ने अपने से कहा, चलो हम यहाँ से चलते हैं, हम के घर नहीं जायेंगे। भगवान ने भीम सन से कहा जाओ, उनके शिष्यों का बला भी न कहा हो? भोजन तयार हैं। और चले गए थे। तो भगवान अपने भक्तों की सुरक्षा करते है। भगवान अपने भक्तों से कहते हैं मेरी शरण में आओ और घबराओ मत। 1 बड़े प्रसिद्ध वैन और कवि है जिन्होंने प्रार्थना में कहा है बाजा हो मानसी नंद नंदन अभय चलना रविंद दे। वो कहते है, हे मेरे मन तू भय से भरा हुआ है। हम सब का मन भय से भरा हुआ है। और अगर तुम इस भय से रहित होना चाहते हो तो महाराज महाराज नंदा के जो पुत्र है उनकी शरण स्वीकार करनी चाहिए। जैसे की जिन्होंने परम भगवान की शरण स्वीकार की है वह स्थिति में संतुष्ट होते हैं और भौतिक वादी व्यक्ति की तुलना में जो अनेक प्रकार की योजनायें बनाते हैं, सुरक्षा के लिए हाला की कितनी भी सफलता प्राप्त करे हैं। भौतिक क्षेत्र में सदा निराश रहते हैं और चिंतित रहते हैं। तो भगवान कहते हैं मैं शुभ भक्त में समाज प्रकार के कार्य में सलंगन कर भी तो भगवान के जो शुद्ध भक्त है वो अनेक प्रकार के कार्य भी करते है। ये बड़ा शोक है भगवत गीता का जो की 9 वे अध्याय में प्राप्त होता है। अध्याय का 27 वर्ष लोक है। भगवान इसमें कह रहे है या कर से जो करते हो मेरे लिए करो हम सब कुछ न कुछ कर रहे हैं, कोई पढ़ाई करता है, कोई नौकरी करता है, कोई घर की देखभाल करता है, मेल करो, जो दान देते हो, हमें करो, जो खाते हो वो पहले मुझे भूख लगाओ। भगवान गीता में कहते है की हमे खाने से पहले भगवान को भोजन लगना चाहिए। इसे कहा जाता है प्रसाद प्रसाद का अर्थ है भगवान की कृपा। भगवान ने गीता ने ये भी कहा है पत्रम पुष्पम पोल। तो भगवान कहते हैं क्या हम स्वीकार कर सकते हैं और क्या नहीं स्वीकार कर सकते। भगवान कहते है प्रेम और भक्ति के साथ अगर तुम पता भी फूल भी करोगे तो मैं उसे स्वीकार करूंगा और भगवान हमारे प्रेम और भक्ति के भूखे हैं। तो भगवान ने कहा अगर हम खायें तो हमें खाने से पहले उन्हें भोग लगाना जाए। जब हम मंत्र के उच्चारण से भगवान को भोग लगाते हैं तो भगवान नेत्रों से और कानों से इसे स्वीकार कर लेते हैं। आप और हम किसी 1 अंग से 11 कार्य कर सकते हैं। सच बात है अगर हमने देखना है तो सिर्फ नेत्रों से देख सकते हैं। अगर आप ने सुना है तो सिर्फ कानों से सुन सकते हो। अगर आपने खाना है तो आप मुह से खा सकते हो। पर परम भगवान के विषय में भ्रम भ्रम में कहा है 1 योग्यता यह है की वो किसी अंग से किसी और अंग का कार्य भी कर सकते हैं। तो दूसरे शब्दों में भगवान नेत्रों से खा लेते हैं, कानों से खा लेते है, कानों से वो सुनते हैं भक्त की प्रार्थना मंदर के उच्चारण के द्वारा और नेत्रों से स्वीकार करते हैं। भोजन को और कुछ भोजन में भगवान की थुप मिल जाती है इस लिए हम उसे प्रसाद बुलाते हैं और प्रसाद खाने से हमारी जो शुद्ध नदिया है शुद्ध हो जाती है। चेतना महा प्रभु जी ने खास कर के यह कहा है की प्रसाद खाना चाहिए, प्रचार का वितरण करना चाहिए। भगवान कहते हैं जो खाते भी हो मुझे अर्पण करके खाओ तो वो भी दान। मेरे लिए को अलग अलग प्रकार के दान हैं और अलग अलग प्रकार के दान का अलग अलग प्रकार का लाभ है। पर अगर हम धन, शुद्ध, स्थान में दे। शुद्ध कार्य के लिए 10 का हमें सबसे अधिक लाभ प्राप्त होता है। और भगवान के दिन जो तपस्या करो वो भी मुझे प्राप्त करने के लिए करो। तो इस प्रकार आप अपने जीवन को सफल बना सकोगे। तो भगवान के जो शुद्ध भक्त हैं वो सदा भगवान की सुरक्षा में रहते हैं। भगवान ने कहा की हे और जो सारे विश्व को बताओ मेरा भक्त है वो कभी भी नष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति 24 घंटे भगवान की सेवा में लगा हुआ है प्रतिशत के भगवान शुद्ध भक्त हैं। 24 घंटे भगवान की सेवा में लगे रहते है। आप कहोगे स्वामी जी क्या भगवान के शुद्ध भक्त सोते नहीं? 67 घंटे सोने के लिए भी चाहिए होते है और उनका सोना भी भक्ति में देना चाहता है। क्यूकी सोने के द्वारा उनमे ये योग्यता आती है की बाकी 18, 19 घंटे भगवान की सेवा में वो जुड़े रहे हैं। तो इसलिए यह कहा जाता है की भगवान के शुद्ध भक्त 24 घंटे भगवान की सेवा में रहना चाहते हैं और किसी स्थिति में भगवान की सेवा से जुड़ा नहीं रहना चाहते। जिस प्रकार मछली किसी स्थिति में जल से जुड़ा नहीं रहना चाहती, उसी प्रकार भगवान के शुद्ध भक्त भगवान की सेवा से जुड़ा नहीं रहना चाहता। भगवान कहते हैं जो भक्त इस भाव से सेवा करेगा वो अवश्य ही मेरे दिव्य धाम में लौटेगा। भगवान के दिव्य धाम के विषय में कहा गया है प्रत्येक वस्तु शास्वत है, है और ज्ञान में होती है। यह जगत है कौनसा लोक। भगवान के दिव्य धाम को लोक कहा जाता है। कुंता का अर्थ है यहाँ कष्ट कष्ट हो? वा कुंता का अर्थ है यहाँ कोई कष्ट नहीं, कोई दुःख नहीं, कोई समर्थ नहीं। भगवान कहते हैं मेरा है। और हमारा दुर्भाग्य क्या है की भगवान हमें निमंत्रण दे रहे हैं, उनके दिन लौटने के लिए हम कहते हैं नहीं, नहीं, हम यहाँ ही सुखी है। ये है हमारा दुर्भाग्य। तो आज का अगला श्लोक। इस प्रकार से जैसे हमने कहा था, शोको पर प्रवचन दिया जायेगा। म बुद्धि योगम पसरे त्याग माचितासरतमहवा। इस लोक का नुवाद इस प्रकार से है सारे कार्यों के लिए मुझ पर निर्भर रहो और मेरे संरक्षण में सदा कर्म करो। ऐसी भक्ति में मेरे प्रति भूणहत्या सचेत रहो। तो भगवान कहते हैं की सारे कार्यों पर हमें उन पर निर्भर लेना चाहिए। अब इसका ये अर्थ नहीं क्या प्रयास नहीं करें। भक्त क्या सोचता है की परम भगवान हर चीज़ के स्वामी हैं और हम जो है केवल उनके दास है। इसलिए निर्देश के अनुसार भक्त कार्य करता है। जो सन्देश आदेश कुल परंपरा द्वारा आता है। तो भगवान कहते हैं सारे कार्य के लिए मुझ पर निर्भर हो तो हमें प्रयास करना है और साथ में भगवान की कृपा पर निर्भर रहना है। अंगरेजी में कहते हैं हे 2। हेल्मस भगवान, उनका सहयोग देते हैं, जो स्वयम प्रयास करते हैं। युद्ध में अर्जुन ने आर में इनकार कर दिया था। युद्ध में लड़ने से अर्जुन ने कहा, मैं, इस युद्ध में कैसे लडू? सारे, आदमी साजन सामने उपस्थित हैं, मैं के सामने लड़ने को तैयार नहीं के पिता छोटी सी आयु में राष्ट्र राजा नहीं बन पाये। भतीजे छोटे थे तो वो राज्य की देखभाल कर ले थे, और विचार से आरंभ हुआ था, बड़े होने पर ये राज्य पांडे को लुटाया जायेगा। जब उम्र के हो कर दिया कुछ ऐसी पांडव, भाइयों ने कहा अगर पूरे विश्व को रखना चाहते हो, कम से कम 5 गाँव, तो हमें दे। 2। उन्होंने कहा अंत में युद्ध के लाओ और कोई उपाय नहीं था, पर अर्जुन ने कहा की मैं इस युद्ध में नहीं लडूंगा, यह भगवान बंद कर अर्जुन के रथ को ले गए। दोनों सेनाओं के बीच में जब अर्जुन ने देखा की सामने कौन कौन उपस्थित हैं, उन्होंने कहा मैं इस युद्ध में नहीं बन सकता। और भगवान ने कहा शक्ति के रुप में तुम्हारा ये कर्तव्य बनता है की तुम इस युद्ध में लड़ो। हे अर्जुन का सोचे, बिना मेरा चिंतन करते हुए, बी द्वारा मेरा स्मरण करते हुए, तुम इस युद्ध में लड़ो। तो ये जो संदेश है। भगवान ने अर्जुन को दिया, यह सन्देश हम सब के लिए है, पूरे मानव समाज के लिए है। और हम सबको जो भी हम कार्य करे यह करना चाहिए। भगवान पर निर्भर रहते हुए। और अगर हम भगवान पर निर्भर रहते हुए हर कदम को करेंगे तो भगवान कहते हैं की अवश्य ही तुम मेरे धाम लौटोगे। अगर हम भगवान का चिंतन करते हर कार्य नहीं करेंगे तो हमें भौतिक विषयों का चिंतन करना पड़ेगा। और अगर भौतिक विषयों का चिंतन करेंगे तो फिर हम जीवन के लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर सकेंगे तो भगवान के जीत कार्य करो। कई बार लोग गीता को गलत समझ बैठते है जीता यह नहीं कह रही तुम आसी बन जाओ, जीता यह नहीं कह रही की परिश्रम नहीं करो, प्रयास नहीं करो। भगवान ने जो योग्यता दी है, कम योग्यता का हमें उपयोग करना चाहिए। भगवान की सेवा में वो है। असली भाव भक्त का और भक्त हर स्थिति में सुख दुख में भगवान का ही स्मरण करता है। कष्ट भुगतना भी पड़े। वो तो भगवान की असीम कृपा है की थोड़ी छोटी मात्रा में कष्ट भुगतना हो। जैसे की 1 समय 1 राजा थे, उनमें 2 उंगलियाँ कट गयी थी। तो उनका जो प्रधान मंत्री था बड़ा धार्मिक था लौट कर। उन्होंने प्रधान मंत्री से कहा मेरी 2 उंगलियाँ कट गयी है, क्या कारण है? भगवान ने ये कष्ट मुझे क्यूँ दिया। प्रधान मंत्री ने कहा भगवान जो करते हैं भक्त की भलाई के लिए करते हैं। तो उन्होंने अपमान महसूस किया। राजा ने कहा इसे जेल में डाल। 2 में तो कट गई है, प्रधान मंत्री है मेरे ऊपर, राजा गए थे शिकार करने के लिए, प्रधान मंत्री सा जाता था, प्रधान मंत्री जेल में थे। तो राजा अकेले गये, जंगल में चोरों ने उन्हें पकड़ लिया। और जो चोर थे वो राजा को देवी के चरणों में अर्पण करने जा रहे थे। तो ने राजा के शरीर को सजाया को सजा कर पहले स्नान किया फिर सजाया। और जैसे ही उसको अर्पण करने जा रहे थे तो उन्हों ने देखा की इसकी 2 उंगलियां नहीं हैं। का ये नियम है की का कोई अंग न हो तो उसे कुछ नम्बर व्यक्ति को काली के चरणो में अर्पण नहीं करते। सो इन डाकू ने कहा अरे अभी ये इससे हम कुछ नहीं कर सकते, बाबा इसके 2 उंगलियाँ नहीं है। छोड़ दी राजा बहुत खुश हो। राजा सोचने लगा की जो प्रधान मंत्री ने कहा था, कहा था की भगवान जो करते हैं भक्त की भलाई के लिए करते हैं। तो राजा वापस महल में पहुँचा। राजा ने कहा छोड़ 2 प्रधान मंत्री को प्रधान मंत्री से कहा कि जो आप ने कहा ठीक कहा था भगवान जो करते हैं भक्त की भलाई के लिए करते हैं। राजा ने कहा यह बताओ आपका भगवान में इतना पक्का विश्वास है। भगवान ने मेरे द्वारा तुम्हें जेल में क्यूँ भिजवाया? तो प्रधान मंत्री ने कहा की आप समझते नहीं कि अगर आप मुझे जेल में नहीं डालते तो मैं भी आपके साथ जाता, जंगल में शिकार करने। और अगर मैं आपके साथ जाता तो मुझे भी वो पकड़ लेते और क्यूँ की मेरे सारे अंग शरीर के हैं तो मुझे मार देते। तो जेल में डालने के द्वारा, भगवान ने मुझे बचा लिया। तो इस प्रकार अनेक कथाएं है, मिला है भक्तों की जिन के द्वारा हमें यह सन्देश मिलता है की भगवान जो करते हैं अपने भक्त की बधाई के लिए ही करते। तो भगवान कहते हैं इस अध्याय में भगवान फिर से बड़े फास्ट तरीके से भक्ति योग के साधन पर बल दे रहे हैं। और भगवान कह रहे हैं सारे कर्मो के लिए, मुझ पर निर्भर रहो और मेरे सुरक्ष में सदा कर्म करो तो हमें सदा कार्य करना चाहिए। इस भाव से हम ये कर रहे हैं भगवान की खुशी के लिए और जैसे आप सुन बैठे हो क्या खुशी के लिए है क्या नहीं, क्या करना चाहिए? क्या नहीं। यह ज्ञान हमें भगवान के प्रतिनिधि के द्वारा प्राप्त होता है। इसलिए प्रतिनिधि द्वारा शिक्षा ग्रहण करना अवश्य है। चेतन्य महाप्रभु जी सनातन को स्वामी को शिक्षा दे रहे थे, महाप्रभु भगवान है तो स्वामी जी 1 समय से शाह के राज्य में बड़ी नौकरी निभाते थे और फिर वो त्याग कर वो वृंदावन में आये। तो चेतन महापजिन्होंने शिक्षा दी थी। उन्होंने कहा जो है जो भक्ति के लिए अनुकूल होता है उस कार्य को स्वीकार करता है और जो प्रतिकूल है उससे वो त्यागता है और वो निर्भर रहता है। भगवान की कृपा पर, उसे पता है की मेरी सुरक्षा केवल परम भगवान द्वारा ही हो सकती है। ईश्वर कृष्ण कृष्ण भगवान परम भगवान है और सब बाकी उनके सेवक है तो हमारी सुरक्षा पर भगवान के द्वारा ही हो सकती है। और वो निम्रता को अनुकूल करता है। तो सारे कार्यों पर भगवान पर निर्भर रहना। सारे कार्यों के पीछे यह भाव होना चाहिए की इस कार्य का उद्देश्य है भगवान की प्रशंसा मान लो अब विद्यार्थी हो। आपकी इच्छा क्या बहुत बड़े विज्ञानी बनो बनो। विज्ञानी बड़ी से बड़ी डिग्री प्राप्त करो। बड़ी से बड़ी। यूनिवर्सिटी ऐसे आरोप विज्ञान द्वारा ये साबित कर के भगवान की इच्छा के बिना 1 हज का पत्ता भी हिल नहीं सके। तो जो भी कार्य करना चाहते हो इससे करो। इस भाव से का लक्ष्य है। भगवत प्राप्त तो ये नहीं कि भक्त बेकार जाता है, भक्त शिक्षा प्राप्त करता है। भगवान के प्रतिनिधियों के द्वारा। कई बार लोग पूछते हैं और इस विषय की चर्चा करते हैं। े वो कहते है की भगवान के समक्ष थे ने प्रश्न पूछा, भगवान ने उत्तर दे दिया, छुकदेवस्वामीऐसी प्रशन पूछे, छुक देव। गोस्वामी ने प्रश्न का उत्तर दे दिया। आज कहाँ है भगवान? अर्ज ने? तो प्रश्न पूछे। अर्जुन के पास कई बेचैन विचार थे। उन्होंने भगवान से प्रश्न पूछा। भगवान ने उनके विचारों को उनके प्रश्नों का उत्तर दिया। और अर्जुन ने कहा नहीं, ज्ञान दूर हो गयी है। तो साधारण व्यक्ति कई बार पूछता है। हमारा तो सा नहीं है। भगवान तो हमारे समक्ष नहीं करे। तो हमें यह लाभ कैसे प्राप्त होगा? ये है भगवान की वाणी और अगर हम भगवान की वाणी को यथलुतस्वीकार करे। और अगर हमे ये यथलुतसंदेशउप्रतिनिधि द्वारा प्राप्त हो तो हमें भुला प्राप्त होगा के अर्जुन को प्राप्त हुआ था ने भगवान से ज्ञान प्राप्त किया था। दूसरे शब्दों में, अगर हम 1 गीता का अध्ययन करें और उनके शुद्ध भक्तों द्वारा गीता के सन्देश को समझे तो इसके द्वारा हम समझ सकेंगे की हमारा असली कर्तव्य। क्या है? भगवान का असली सन्देश क्या है? यह अवश्य है की भगवान के संदेश को यथा रूप स्वीकार करे। या रूप का अर्थ है उस भाव से जिस भाव से भगवान ने दिया और जल भाग से अर्जुन ने स्वीकार किया। ये नहीं, हमें सोचना चाहिए। भगवान की वाणी को पढ़ कर अपने विचारों को जोड़ सकते हैं। और ये है गीता का सन्देश नहीं माफ़ करना। ये अगर आप डॉक्टर की दवाई के दिवार इलाज कराना चाहते हो तो डॉक्टर की दवाई को नुक्ते के अनुसार लेना पड़ेगा, नहीं तो उसका लाभ नहीं पहुँचेगा। उसी प्रकार अगर हम गीता के सन्देश का लाभ उठाना चाहते हैं तो हमें ये सन्देश यथरु्करकरनाचाहिए भगवान के प्रमाण प्रतिनिध सन्देश को स्वीकार करना चाहिए और शिक्षा का पालन भी करना चाहिए। शिक्षा का पालन किए बिना कैसे लाभ? आएगा मान लो। आपके पास सबसे अच्छी दवाई है, आप उसको स्वीकार नहीं कर रहे। ताकि बीमारी। गीता कई बार हम ले लेते हैं, घर में रखते है, पर उसको पढ़ते नहीं, ये गलत है। हमे गीता पढ़ना चाहिए। अखबार पढ़ने के लिए समय है, दिन पढ़ने के लिए समय है। गीता पढ़ने के लिए थोड़ा समय लेना चाहिए। अगर हम किसी की आवश्यकता मानते हैं तो हम किसी न किसी समय निकालते हैं। उसके लिए मान लो। हमारे शरीर के किसी अंग कुछ हो जाए तो हम कुछ नहीं करेंगे। उसका सुधार करने के लिए। उसी प्रकार हमें बुद्धि को लगाना चाहिए। इस गीता के सन्देश को समझने के लिए और गीता का सन्देश है पूरे मानव समाज के लिए। भगवान ने गीता में कहा, बीतापिता, मैं जो हूँ, हर युवी का पिता हूँ। और आज सारे विश्व में हम देखते है की गीता के सन्देश के आधार पर लोग अपने जीवन को सफल बना रहे हैं, तो भगवान कह रहे हैं, यहाँ की हमें उन पर निर्बल रहना चाहिए और हर कार्य करना चाहिए, इस विचार से कि हम उनकी प्रशंसा के लिए कर रहे हैं। अब प्रश्न ये है सारे कार्यों के द्वारा भगवान पर कैसे निर्बल रहे। यह सम्भव होगा जब हम महा मंत्र का लाभ उठाकर। हृदय की सुरति के लिए प्रयास करे। में 1 बड़ा सरल साधन दिया है। हरे राम, हरे राम, हरे राम के महा मंत्र मन को शांति आये। महा का अर्थ सबसे प्रसिद्ध, यह महामंत्र 1 साधन है, माध्यम है हृदय को साफ़ करने के लिए। और जैसे हमारी चेतना शुरू होती है, उतनी ही मात्रा में हम पदम भगवान पर अधिक निर्भर रहेंगे, और उतनी ही मात्रा में हम जीवन के लक्ष्य क को प्राप्त करने के मार्ग में। सनहतीकरेंगे हाय, कृश्णा हार, कृष्णा हार, किष्णा, क्रिष्णा हारे, हा हा र राम राम ने हाल।
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