तन, मन, धन, सब भगवान को दे देंगे तो हम क्या करेंगे | BG 4.37 | 11 Sep 1995 | Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

In this extensive Hindi discourse, the speaker interprets Bhagavad Gita chapter 4, verse 37, emphasizing the ultimate surrender of body (tan), mind (man) and wealth (dhan) to the Divine. He explains that true knowledge (jñāna) described in the Gita is the supreme, flawless knowledge bestowed by God, distinct from ordinary human ideas. The talk weaves analogies—such as fire consuming wood, a soul shedding old bodies, and the futility of material pursuits—to illustrate the law of karma and the transient nature of worldly results. The speaker contrasts material education with spiritual learning, urging listeners to prioritize the latter, and stresses that only through divine knowledge can one escape the seven types of suffering. He recounts mythological examples (Krishna’s leelas, Indra’s anger, the role of deities) to show how divine will operates beyond human control. The lecture also contains prophetic visions about the future spread of the teachings worldwide, the establishment of many spiritual centers, and the eventual global chanting of the Hare Krishna name. Throughout, he calls the audience to surrender all possessions to God, practice bhakti, and internalize the Gita’s message for personal liberation.
Chapters
ओम नमो भगवते बासु देवाय, ओम नमो भगवते बासु देवाय, मनमो भागते बासु देवाय। तो हम चौथे अध्याय का 1 बड़ा प्रत्यक्ष लोग पढ़ेंगे हाय धन ऐसी 2 बनी धाम से रोजना की सब का मन म तथा दु भागवत गीता के श्लोक में 1 बहुत ही सरल उदाहरण दिया गया है। जिस प्रकार लकड़ी आँख के द्वारा जल जाती है और अंत में क्या बनती है रा, उसी प्रकार ये ज्ञान की अग्नि के द्वारा जो भी आपके पुण्य या पाप का कार्य हो, उसका जो परिणाम है वो जल जाता है। संसार में जो भी आप कार्य करते हो उसका परिणाम सबको भुगतना ही पड़ता है। आप कहोगे की हम तो बहुत धार्मिक हैं, आज से में 1 बार मंदिर जाते हैं, वर्त रखते हैं, संतों को दान देते हैं। और जब भी पूरे कान को कभी परिणाम भुगतना पड़ता है, जब तक आप अपने असली स्वरूप को नहीं समझोगे, जब तक आपको इस भौतिक संस्थान में भटकना पड़ेगा किसी न किसी योनि में जैसे बताया गया है। और आप सब ने बा सुन बैठे हो। 86 लाख के सम की यूनियन है, जैसे की समय लगभग सौ सौ सौ भक्त है, और कोई 2 भगते जैसे नहीं दिखते, सबका चेहरा अलग है, सबकी हैंड, राइटिंग अलग है, सबकी आवाज भी अलग है, यहाँ के सब तो लोगो की नहीं पूरे दिल्ली की आबादी की आप यह पूरे विश्व की आबादी को गेम आपको। शेयर ही 2 व्यक्ति दिखेंगे जिनका, 1 जैसा शुरू हो, 1 जैसा कंत हो, 1 जैसा दिखने के हम नहीं हो। देखो भगवान की महिमा तो मोटे संस्थान में व्यक्ति भटकते रहता है। जब तक वो भगवान के शरणागत नहीं। तो जब भगवत गीता में ज्ञान शब्द का उपयोग किया जाता है तो इस ज्ञान का क्या अर्थ? जैसे कि भगवत गीता के में भगवान कहते हैं राजविराज गुल। ये जो ज्ञान है, यह ज्ञान जो है, सब ज्ञानों का राजा है। तो इस बयान से ये है कि वो दिव्य ज्ञान जिसमे किसी प्रकार की अपुणतानहींहै, जिसमें किसी प्रकार का दोष नहीं है, जिसमें किसी प्रकार की कमी नहीं, जो वो ज्ञान जो कि परम भगवान के द्वारा हमें प्राप्त हो रहा है, ये जो भगवत देता का ज्ञान है, ये किसी साधारण व्यक्ति की कल्पना नहीं है। हमें इस भूल में नहीं रहना चाहिए कि सर ये किसी की कल्पना है। शर बिहार देव जी के नाम के 1 प्रसिद्ध व्यक्ति थे, जिन का हमारे ऐसे तो ज्यादा ज्यादा गहरा ज्ञान था और उनके द्वारा यह रचना की गयी, वह देव जी भगवान क्या बता है। भगवान अनेक रूपों में अवतरित होते है। हमेशा धर्म के ज्ञान की स्थापना करने और व्यास देव जी भगवान व्यास जी के रूप में काले हुए। क्यूँ कलयुग के दम पर उन्हें पता था कि कलयुग भी आरम्भ हो रहा है। कल युग से पहले लोगों की जो यादाश थी वो बहुत ही अच्छे थे और लिखने की भी आवश्यकता नहीं रहती थी। तो ज्ञान से देव जी ने हमें ये शास्त्रों का सार दिया है भगवत गीता में और हमें इस ज्ञान का लाभ उठाना चाहिए। तो ये है असली ज्ञान जिसके द्वारा आप अपने स्वरूप को समझ सको और जिसके द्वारा आप भगवान के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ सको। क्या है हमारा स्वरूप? आप अगर किसी साधारण व्यक्ति से पूछो तो वो यही कहेगा हमारा यह नाम है, ये पता है, ये हमारे खानदान है, हमारा गोता है। वगैरह पर गीता के दुसरे दिहाई में अनेक श्लोकों के द्वारा भगवान 1 ही विषय पर बल दे रहे हैं। और क्या है वह विषय की ये शरीर आपका असली स्वरूप में ही है। और 1 बहुत ही सरल उदाहरण भगवान देते हैं। जिस प्रकार साधारण व्यक्ति अपने पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्र स्वीकार करता है, उसी प्रकार यह आत्मा 1 शरीर को त्याग कर नया शरीर से प्राप्त करना पड़ता है। और भगवान यह भी कहते है कि 7 प्रकार के कष्टों से कोई व्यक्ति अपने आप को इस भौतिक संसार में बचा नहीं सकता। आप प्रसिद्ध प्रसिद्ध व्यक्ति के पास पहुँच जाओ, आप देखोगे कि वो उसे भी वो भी चिंतक हैं। हम सोचते हैं, केवल सारी चिंता हमारे ऊपर ही है। जो लोग ये मर्सिडीज गाड़ी चला रहे हैं, उनके पास कोई चिमटा नहीं है। 1 चिड़िया को भी जब चिड़िया को आप देते हो, खाने के लिए कुछ भी हो तो आपने इसे देखा होगा, अनुभव किया होगा चिड़िया 1 दाना खायेंगी, फिर चारों तरफ देखेगी क्या देख रही है? कोई दूसरा व्यक्ति तो नहीं आ रहा ये दाने को छीनने के लिए जो बाकी बच गया है, उसे भी चिंता है। तो इसी प्रकार भौतिक संसार में चाहे आप राजा बन जाओ या चाहे, आप स्धाननवरतीरहो चिंता ही चिंता है। इसीलिए भगवान ये निवेदन करते है स्वयं शास्त्रों के द्वारा और अपने प्रतिनिधियों के द्वारा, क्या कि हमें किसी न किसी रूप से उनके शरणागत हो जाना चाहिए। कई बार यह प्रश्न उठाया जाता है कि अर्जुन का दुभाग्य यह था कि उन्हें स्वयं भगवान का उपदेश किशन से सुना और हम कहाँ जाए ये उपदेश को प्राप्त करने के लिए। तो इसका उत्तर भागवत के प्रथम स्कन्द में हमें प्राप्त होता है। और इसका उत्तर यह है कि भगवान अपनी शिक्षा को छोड़ गए है इन शास्त्रों में। और जिस प्रकार सूर्य के द्वारा अंधेरा पन दूर होता है, जैसे की भी बिजली चले जाए, पावर फेलियर हो जाए तो आप 1 दूसरे को देख नहीं सकोगे। जो जिस प्रकार रोशनी, बिजली या सूर्य के द्वारा अंधेरा पन दूर होता है, उसी प्रकार शास्त्रों की शिक्षा के द्वारा हमारी अज्ञानता दूर होती है। आप सब अपना अनुभव कीजिए भक्तों को मिलने से पहले आप सभी उसी वातावरण में पले थे क्या हम ये शरीर है? है न? ये शरीर हमारा असली स्वरुप है। सुबह से रात तक शायद ही आईने के सामने 50 जाते होगे, अभी भी जाते होगे, और भी कम जाते होगे, सर पहले ज्यादा जाते होगे ये देखने के लिए कि हमारी कैसे दिखते है के द्वारा की ये जो भी है हमारा केवल थोड़े समय के लिए ही हमारा साथी। तो जिस प्रकार जैसे बच्चा बड़ा होता है, माता पिता की इच्छा रहती है, कि उसे भौतिक शिक्षा प्राप्त हो। इसलिए हम प्रयास करते हैं की बच्चों को अच्छे से अच्छे स्कूल में दाखिला मिले। आजकल ये बहुत ही अच्छा धंधा स्कूल खोलना और हस्पताल खोलना सब अच्छे से अच्छे स्कूल में अपने बच्चों को भेजना चाहते है क्यूँ? क्यूँकि सब माता पिता को ये चिंता रहती है की उन्हें अगर भौतिक शिक्षा ठीक रूप से प्राप्त नहीं होगी तो फिर बड़े होकर समाज में सफलता प्राप्त नहीं कर पाएंगे। तो जिस प्रकार हमें ये चिंता रहती है भौतिक शिक्षा की, उसी प्रकार हमें ये चिंता भी रहनी चाहिए की अध्यात्मिक ज्ञान भी हमें प्राप्त हो। आज भौतिक ज्ञान की तो चर्चा सब करते हैं और आध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा बहुत कम लोग कर रहे थे, बहुत कम लोग इतने बड़े बड़े है, महाविद्यालय है कहा देश दिया जा रहा है उनकी की हम भारतीय लोग इस शिक्षा, इस उद्देश्य को समझने का प्रयास करें। मुझे याद है और 56 महीने पहले जब मैं आपके इस बैठक में आया था तो आपको मैंने बताया था की आप के दिल्ली शहर में भी प्रभु जी ने बहुत प्रयास किया। लोग गीता के उद्देश्य को समझे स्वीकार करे, पालन करे इस पर निर्भर अपने जीवन को चलाए। तो हमें भूलना नहीं चाहिए की भौतिक ज्ञान में अनेक दोष है, अनेक कमियां है और केवल यह अध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा ही हमारी जो अज्ञानता है वो दूर हो सकती है। तो भगवत गीता के द्वारा हमें क्या देश मिलता है? क्या भगवान अर्जुन से ये कह रहे हैं, जाओ ये मत लो, ये कह रहे नहीं अर्जुन की तो इच्छा यही थी की नहीं लड़े भगवान करे नई नई युद्ध में लडू पर तुम लड़ो किस के लिए, मेरी प्रशंसा के लिए, हार जीत की चिंता करे बिना तो उसी प्रकार जिस आश्रम में भी आप हो जैसे की इस सभा में आप लोगों को देख कर ये महसूस होता है। कहीं? तो आप मे से ब्रह्माचारी हो जो स्कूल या कॉलेज में पढ़ रहे हो और आप में से कई हो जो गरीहस्ताशरमें हो, हस्ताशर पत्नी, बच्चों के साथ रहते हो और धंधा नौकरी वगैरह कर रहे हो। और वन दिखता नहीं है या और सन्यास जी भी हमारे अलावा कोई और देखता नहीं। तो चाहे आप ब्रह्मचारी हो या परिहस्त हो, आप चेतना महाप्रभु जी की दया के कारण जिस आश्रम में हो उस आश्रम में रहते हुए अपने जीवन को सफल बना सकते है। कई बार लोगो के मन में भय रहता है क्या की अगर हम शब्दों की संगत प्राप्त करेंगे, अमधहािकमार्गमें प्रवेश करेंगे तो हमें उनके समान संसार त्यागना पड़ेगा। हाँ और फिर यह तो बहुत ही कठिन मार्ग है। दूर से कठिन दिखता है और 1 बार आप देकर आ जाओ तो सरल बन जाता है। दूर से जब सुनते हो, इतनी माला का जाप करना है, नियम का पालन करना, वगैरह ये विचार आता है कि चीजों के बिगर हम रहेंगे कैसे? बचपन ऐसी 10 कब चाय पीते आये हो, बचपन से ये सब चीजे करते आये तो आपको जब उद्देश्य दिया जाता है। इन चीजों से बचना चाहिए। मन कहता है? हम कैसे बचे? इन चीजों से विचार तो आता है, पर जब आप प्रयास करते हो भगवान की शिक्षा का पालन करने के लिए भगवान जो आपके हृदय में विराजमान है, ये आपको नहीं होना चाहिए। भगवान हर व्यक्ति, हर प्राणी महत्व के हृदय में विराजमान है। किस रूप में, परमात्मा के रूप में और परमात्मा के रूप में? भगवान क्या कर रहे हैं? सर बस से चहनदसानी, महा, स्मृति, ज्ञान, अपहानमचाहअपोहाना, स्मृति वो हमें स्मृति की शक्ति भी देते हैं और अहाना उनको भूलने की शक्ति भी दे रहे है। जो व्यक्ति भगवान को भूलना चाहे तो भगवान हमें ऐसी बुद्धि देते हैं की वो बड़ी आसानी से हो जाए। और जो उनका स्मरण करना चाहे तो उनको ऐसी बुद्धि देते हैं कि वो स्मरण कर पाए। जो स्मरण करना चाहे उनको तो बुद्धि देते हैं कि वो भक्तों के संग में आ जाए, किसी न किसी प्रकार से उनका परिचय हो जाय। भगवत गीता के असली उदेश्य के साथ और जो भूलना चाहिए भगवान को, उनको भगवान वैसे संगत में भेज देते हैं। यहाँ के केवल सबकी दिलचस्पी क्रोध लोग सरिया अधिकारियों में है। काम जो हृदय में क्यूंकि भगवान विराजमान हैं वो हम सबकी इच्छाओं को समझ लेते हैं। भगवान के लिए कोई कार्य असंभव नहीं है। आप 1 जगह 1 स्थान में ही रह सकते हो और भगवान 1 ही समय, हर स्थान में रह सकते हैं। जब भगवान श्री कृष्ण इस पृथ्वी पर थे, हाँ साधारण लीला, थोड़ी प्रकट की, उन्होंने दिव्य लीला, प्रकट की। क्यूँकि उन्हें पता था कि भविष्य में अनेक व्यक्ति ये दावा करेंगे क्या हम भगवान क्या बता रहे है तो उनकी हम परीक्षा लेंगे कैसे? 1 सरल क्वेश्चन पूछ कर बस लंबा प्रश्न नहीं आप इंतिहान में बैठते हो तो आपको लम्बा क्वेस्टिनेर वगैरह मिलता है? 20 क्वेश्चन 25 क्वेश्चन सरल प्रश्न आप क्या भगवान की दिव्य लीला जो उन्होंने प्रकट की उसकी तुलना कर सकते हो। पर सौ हम गोबर दान का परिक्रम करते थे। मोटर में तो मोटर में ही परिक्रमा करते करते हैं। हमें लग गया कितना समय कोई 40 मिनट, 50 मिनट मोटर में पैदल जाओ तो 6 घंटे 7, 22 किलोमीटर। और भगवान ने उठाया उसे बड़ी सरलता के साथ बाएं हाथ की छोटी उँगली के नाखून की शक्ति पर पर जब भगवान ने गोवलनानफ्रवद उठाया, इंदल देवता बहुुत क्रोधित थे? देवता देवियों में कई बार क्रोध आ जाता है भगवान में कभी किसी प्रकार का दोष प्रकट भी होता था भगवान श्री कृष्ण ने और देवता देवियों में कई बार हो जाता है। तो इंद्र देवता क्यों क्रोधित हो गए थे? क्यूँकी भगवान श्री कृष्ण ने अपने पिता माता उन के द्वारा अनेक वि कासियों पर यह प्रभाव दिखा दे दिया था? क्या कि जो सराना यज्ञ कर रहे हो इंदिरा की प्रशंसा के लिए उसकी आवश्यकता नहीं है। में भगवान कहते हैं के जो वरदान देवता देवियों द्वारा आ रहा है वो मैं ही दे रहा हूँ। और तुम मूर्ख व्यक्ति सोचते है की देवता देवी दे रहे। 1 भौतिक उदाहरण दे सकते हैं जैसे की आप कोई कम्पनी चला रहे हो तो आपका मैनेजर कुछ सैंक्शन कर देता है तो मैनेजर सेंक्शन कर देता, क्या? क्यूंकी उसने सेठ से परमिशन ले लिया है। अगर सेट साहब उसको इजाज़त नहीं देते तो मैनेजर कुछ भी नहीं कर सकता है। ठीक है। तो उसी प्रकार भगवान जब सेंक्शन करते है जब देवता देवों द्वारा वरदान प्राप्त होता है। य इसी लिए कहा गया है देव देवियों को परम भगवान के समान कभी नहीं समझना चाहिए। ये 1 नाम अपराध है। तो इंद्र ने देखा की ब्रज वासियों ने सालाना या क्या बंद कर दिया है। राज ने कहा अपने बेटे से अरे भाई हम तो किसान हैं, तुम कहते हो इंदिरा के लिए यज्ञ बंद कर, 2 इंद्रा के लिए यज्ञ बंद कर देंगे तो पानी कहाँ से प्राप्त होगा केमिकल वगैरह नहीं थे और भी केमिकल के द्वारा थोड़ी उनका उत्पादन होता है। वर्षा नहीं आई तो बस प्यार से रोके। तो उन्होंने कहा की ये हम नहीं कर सकते, ये मेरे प्यारे बेटे तुम गलत सलाह दे रे हो। माता पिता को पता नहीं था की परम भगवान है। भगवान की योग माया शक्ति के द्वारा उनके माता पिता मोहित हो गए थे इस विषय के ऊपर, वो तो सोचते थे कि ये तो साधारण बेटा है, जरूर थोड़ी दिव्य शक्ति जरूर है। इस में यशोदा माता प्रार्थना करती थी, भगवान से मंत्रों की रचना करती थी क्या की मेरे बेटे को कोई राक्षस, कोई नुकसान तो उन्हें तो यह पता नहीं था ये कौन है उनका बेटा है। बेटे के कहने पर उन्होंने सलाना यज्ञ बंद कर दिया ने क्या कहा? उन्होंने सोचा कि मुझे ब्रज वासियों को सबक सिखाना है क्या सबक इतने गुस्से से बारिश बढ़ी की जो बारिश जो पानी गिरता था जैसे तलवार होती है न? तलवार तलवार जैसे था। अभी तो आप पानी में भीगते भी हो तो से भीग जाते हैं, है न? आपका शरीर तो नहीं करता के क्रोध में जब बारिश आरी थी बड़े बड़े पत्थर जितना बोला था, जो चल रे हो, सड़क में कोई ऊपर ऐसी ईंट फेंक दे तो जाएगा। तो ये जो बारिश री थी बड़े बड़े पत्थर जितना खोजा था और तलवार जैसे तेज थी। और उस स्थिति में 12 क्षत्री से तो काम नहीं चलता। ठीक है न? जब पूरे ब्रज में तेरी ऐसी बारिश करने लगी तो 50 तो काम नहीं बनता। तो भगवान ने क्या उपाय किया गोवा पर्वत को छत्री बना दे। 22 किलोमीटर की पृथ्वी को कुछ समय तो ज्यादा था, अभी 22 किलोमीटर बच गया है। पर्वत कहा जाता है दिन दिन छोटा हो रहा है। तो उसको छत्री के रूप में उठा दिया। साधारण व्यक्ति का कार्य तो नहीं है। तो हजारों सालों से भक्त गोदान पर्वती परिक्रम करते हैं जो ऐसे अनेक उदाहरण हैं। मुनि जी गए थे द्वारका द्वारका में, भगवान थे अपनी 16 हजार 100 8 पत्नियों के साथ। ऐसे में कई बार आप लोग भी सुनते होगे। उसकी 2 पत्नी है, किसकी 3 है। सुना जाता है कि सवदेवरीविया वगैरह जो मुसलमान देश हैं, वहाँ के जो राजा है, उन के बहुत ही बतिया पत्नियाँ जरूर है सर पत्नियां तो अलग अलग महल भी दे दिया होगा, है न उनके पास, भगवान का दिया हुआ पेट्रोल तो भगवान नहीं दिया पर वो राजा जो है सब पत्नियों के साथ 1 साथ तो नहीं रह सकता। 1 पत्नी के घर 1 दिन 1 अगली की पत्नी के घर अगले दिन जब नारद मुनी जी गए द्वार का तो उन्होंने क्या देखा कि भगवान ने सब पत्तियों को अलग अलग महल दिया है और वो सारे महलों में उपस्थित है मुनि जी ने देखा की 1 महल में भगवान गाती मंत्र कर रहे, दूसरे महल में गये तो देखा भगवान अपने बच्चों के साथ खेल रहे, तीसरे महल में गए तो देखा कुछ और कार्य कर थे तो उन्होंने कहा कि नानीजी तो पता था हमेशा के भगवान इंद्रा जी ब्रम में आ गए थे ये छोटा लड़का कौन है? फिर इन्द्र जी ने भी जब देखा की वो सफलता प्राप्त नहीं की तो उन्होंने भी स्वीकार किया क्या परम भगवान जी के हृदय में कभी नहीं था उन्हें तो पता था ये परम भगवान है ऐसे अनेक उदाहरण हैं। तो हम ये बताना चाह रहे हैं कि भगवान को श्रद्धारणपुरुषनही है भगवान, तो उनके द्वारा जो हमे ज्ञान प्राप्त होता है उस ज्ञान को हमें बड़े सावधानी के साथ समझना चाहिए और ये असली ज्ञान है और यह ज्ञान जैसे की इस लोक में बताया गया है यह ज्ञान के द्वारा ही भौतिक कर्मों के समस्त फलो को हम जला सकते हैं ने इस बात पर संतुष्टता प्राप्त नहीं करने चाह तो पापी नहीं हमने बाज छोड़ दिया उन्हे कार्य करोगे या पाप का कार्य उन्हें कार्य करोगे तो क्या नतीजा होगा आपको जरा वीजा मिल जाएगा सौर ब्लॉग में पहुंचने तक यह अगला जीना जिजानमआपलेलोगे बिरला जी के खानदान में या किसी और बड़े सेट के खानदान में बस उससे ज्यादा नहीं समझी और सोरगलोगतकभपहुँच जाओ। जैसे कि इस पृथ्वी में अनेक ने अलग अलग देशों में अलग अलग सुविधा है। जैसे की आप जानते हो अमेरिका में बहुत भौतिक सोच तो हर भारतीय अमेरिका जाना चाहता है भारतीय नहीं सारे विश्व का यही बीमारी है रशिया में भी अमेरिका के वीजा के लिए लाइन में खड़े रहते है 10 10 घंटा तो जैसे की हम देखते है की भौतिक संस्थान में भी है अलग अलग स्थानों में अलग अलग सुविधा है। दिल्ली में भी कई इलाके बड़े अमीर तो जो स्वर्ग है वहाँ ज्यादा सुविधा है। इस भौतिक संसार भगवान गीता में कहते हैं भुवना आप ब्रह्मा जी के लोगो तक भी पहुच, सत्य लोग तक भी पहुँच जाओ वहाँ भी आप अपने आप को 7 प्रकार के कष्टों से नहीं बचा सकते। तो इसलिए भगवान कहते हैं कौन थे न? जन्म का अर्थ है फिर से जन्म, न फिर से अगर आप जन्म नहीं प्राप्त करना चाहते केवल 1 ही उपाय मेरे। इसलिए गीता के में भगवान क्या कहते है सर्वा हम तो अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावना संघ के प्रचार के द्वारा हम आपको ये नहीं कहते की आप केवल अभी पुण्य कार्य करो। आपके कार्य से जरूर ज्यादा उचित है और हम आपको ये कहते है की आप भगवान के शरण हो जा। तन मन धन से 1 बड़े महान संत हमारे संप्रदाय में है। ठाकुर भक्ति। तो ठाकुर भक्त, लोग जी जैसे थे, वैसे तो न न, वो भक्ति विनोदा सचिन ननद नाम ने गौरव शक्ति सुरूपाय रूप नूराबड़ाएथे। उनको आदर देते हुए कहा गया है क्या आप तो छेदिया महाप्रभुजी की देवी शक्ति हो और जो सिद्धांत रूप स्वामी उनके साथियों ने दिया है, उसके आधार पर आप चल रहे हो। तो ठाकुर। भारतीय नो ने प्रात में कहा है मन देह गेह यचुरमोराहप्रभु मैं अपने मन, धन, सम्पत्ति सब को आपके चरणों में अर्पण करता हूँ और आप इसका उपयोग कीजिए तो आप स्वामी जी कह रहे हैं तन मन धन सब भगवान को अर्पण करता। हमारे पास क्या रह जाएगा? भगवान को दे दिया तो हमारे पास क्या रहेगा आपके पास है क्या? 1 करोड़ रुपए आपके हैं। आपके कहाँ है आपकी स्वतंत्रता? अगर किसी व्यक्ति के पास स्वतंत्र हो तो सारे समशान घाट बंद हो जाए, उनका दिवाला उड़ जाए, उन क्यूँ की कोई भी मरना नहीं चाहेगा और सारे डॉक्टरों का भी दिवाला उड़ जाए। कोई बीमार भी रोग, पीड़ा रोग पीड़ा, कोई नहीं चाहता, कोई बुरा नहीं चाहता तो अगर ध्यान से देखा जाए। हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है, हम सिर्फ सोचते हैं कि हमारे हाथ में बहुत कुछ कुछ नहीं, 2 दिन के लिए श्री प्राप्त होता है। फिर सबको इसे नमस्ते कहना ही पड़ता है। इसलिए जब यमराज ने से पूछा यह बताओ किस विश्व में सबसे बड़े आश्चर्य की क्या बात नजर आती है, उन्होंने क्या कहा की हर में आप देख सकते हो की लाखों व्यक्ति मृत के तरफ जा रहे हैं। और जब भी हम सोचते हैं कि हमें वहाँ नहीं करना पड़ेगा, तो ये है हमारा दुर्भाग्य। हम आपको कह रहे थे की आप चाहे किसी भी आस में क्यों न हो, क्षेत्र महाप्रभुजी ने आध्यात्मिक जीवन बहुत ही सरल बना दिया है। बहुत ही सरल। इस सरल क्या हो सकता है। क्या है सरल मार? ये हरे नाम का उच्चारण करो तो सारे विश्व में लोग क्यूँ को परे है। क्यूँ इस सन्देश का लाभ उठा कर भक्ति नोट जी के विषय में कह रहा था की भक्त जी ने ही हमे उद्देश्य दिया की हमें सब कुछ भगवान के चरणों में अर्पण करना चाहे। उन्होंने यह भी कहा था 3 चीजों की उन्होंने भविष्य वाणी की थी। 1 उन्होंने कहा था कि 1 दिन ऐसा 1 व्यक्ति आयेगा जो सारे विश्व में चेतने महापवोकासन्देश ले जाएगा। कौन था वो व्यक्ति? दूसरी भविष्यवाणी उनकी ये थी ठाकुर भर्ती नोजी की उन्होंने लगभग सौ ग्राम की रचना की। वैसे ठाकुर भारती जी ब्रिटिश सरकार के समय मजिस्ट्रेट थे और ब्रिटिश सरकार के समय। भारतीय लोगों को इससे ऊँची जिम्मेदारी नहीं दी जाती थी, ऊँचे से ऊँची जिम्मेदारी थी मजिस्ट्रेट के, उसके ऊपर सब साहब होते थे। इंग्लैंड से तो ब्रिटिश सरकार की नौकरी करते हुए, मजिस्टर होते हुए भी उन्होंने सौ ग्रंथों की रचना की। कम नहीं है। पहले वाले तो ये थी की 1 महान संत आयेगा जो की चेतन महाप्रभु जी के उपदेश को विश्व के कोने कोने में ले जाएगा। फिर उनकी दूसरी भविष्यवाणी यह थी की 1 दिन विश्व के कोने कोने में करतल बजायेंगे बजायेंगे और हरे नाम का उच्चारन करेंगे वो भी आज सच आ गया है आज विश्व का कोई कोना नहीं है जहाँ की आपको इस काम का केंद्र प्राप्त नहीं है लगभग 500 केंद्र है रेशों के हर कोने में और उनकी तीसरी भविष्यवाणी यह थी की 1 दिन मायापुर आप में से कई शब्द सीधा मायापुर गए हो। 1 दिन श्री राम मायापुर जो की चेतना महाप्रभु जी का जनम थान है वहाँ रूस ही लोग आयेंगे, अमेरिका लोग आयेंगे, जर्मन लोग आयेंगे, जापानी लोग आयेंगे और वो सब बेंगोली भक्तों के साथ मिलकर नाचेंगे और गाएंगे और केरदनकरेंगे वो भी सच आ गया। तो चेतना महाप्रभु जी की जो और जितने महाबली के स्वयं भविष्य वाणी की तो विश्व के कोने को नाम का चलन करेंगे। तो महा जी ने अध्या दुर्भाग्यशाली है का नाम ही ना चाहते हम सोचते हैं कि हमें सब कुछ पता है, हमें सी प्रकार के उद्देश्य की आवश्यकता नहीं। इसलिए कई बार जब आप अपने मित्रों से प्रचार करते हो, क्या कहते हैं वह भी चुनाव और कई तो आपके ऐसे मित्र होंगे, कल देखते हैं तो भाग जाते हैं। कहीं से होंगे मित्र दिल का टेलीफोन आया, क्या कहते है क्यूकी सुनना नहीं चाहते और भक्तों का यह कर्तव्य बनता है, चाहे कोई सुने या नहीं सुने वो हमेशा सुनाने को तैयार रहे जैसे कि छोटा बच्चा दवाई तो देने को तैयार नहीं रहता। क्या माँ बाप बच्चे को दवाई देने से पहले दवाई लोगे तुम बच्चा तो हमेशा नई नई माँ। जबरदस्ती काम देती है तो उसी प्रकार भक्तों के भक्तों की इच्छा रहती है। जहाँ तक हो सके भगवान को उपदेश दिया जाए। क्यूंकि वो जानते है की अगर कोई व्यक्ति असली सुख चाहता है, शांति चाहता है, सफलता चाहता है, सुरक्षा चाहता है, तो यही 1 उपाय है और इसके अलावा और कोई उपाय नहीं है, तो आप भक्तों से यही निवेदन है। क्या आप महाप्रभु की शिक्षा का लाभ उठाइए सरल शिक्षा है। हरे कृष्ण याद कीजिये। गीता वतन को पढ़िए भक्तों की संगत का लाभ उठाओ, अपने घर में मंडल बनाओ, वैसा वातावरण रखो घर में जिसके द्वारा पत्नी, बच्चे सब अब ध्यान से ज्ञान को अनुकूल कर पाए और इसका यह परिणाम होगा। सनातन असली सुख भगवान गीता में कहते हैं कि जो व्यक्ति इस मार्ग में लीन हैं वो बिल्कुल प्रसन्न है शांत और जो इस मार्ग में लीन नहीं है तथा बेचैन आशा तो यह मार्ग प्राउपाजीकीदया सी प्राप्त हो रहा है। शैनीकिसीभारतीने ऐसा कार्य किया है जो कि पापा थोड़े समय में ही कर पाए और न ही कर पाए। वैसे योजना बना गए की ये और बढ़ते ही जा रहा। जब प्रापाजीपृथ्वी छोड़कर गए तो इस संस्था के लगभग 140 मंडर थे और आज लगभग 500 और ये बढ़ते ही जायेंगे। क्यूँ? क्यूँकि क्षेत्र ने महावि भविष्य, मानी क्षेत्र में महाप्रभु प्रापा जी, सब के प्रॉपर जी कहते थे ईमानदारी के साथ सब इसी लिए जब प्रापा जी ने भागवत का अनुवाद किया था रूप के नाम से उसको प्रकाशित किया क्यूँ क्यूँकि अगर हम भगवान के सन्देश का लाभ उठाना चाहते हैं तो बिना बदले हमें करना चाहिए तो इस दवाई का प्रभाव पड़ेगा अगर हम भी लेंगे पढ़ेंगे को जोड़ देंगे फिर इसका असर नहीं पड़ेगा भारी है कि आप इस कार्य में रूची ले रहे हो तो रूचि बढ़ाई ये मत समझना की थोड़ा जब सोमवार को हाथी लगा दी बस आपकी जिम्मेदारी खत्म नही आप की जिम्मेदारी खत्म नहीं होगी जैसे की भौतिकवादी व्यक्ति प्रयास करते जाता है अंतत 1 पैसा और कमा रहे हैं तो आतंकवादी व्यक्ति में भी लालच रहता है क्या लालच है की यह प्रचार अंत तक किया जाए जैसे हमारे गुरु जी अंतिम दिनों में उनका जब स्वास्थ इतना अच्छा नहीं था जभी भी उन्होंने ग्रंथों का अनुवाद प्रचार कभी नहीं किया क्यूँकि भक्त की यही भावना रहती है जैसे प्रलाधमराज तलाक के पिता उनको घेर खिलाई से फेंका उनको पीटा क्यूँ 2 ही दोस्त या 1 तो भगवान कृष्ण के भक्त थे स्वयं दूसरे और भगवान कृष्ण का ज्ञान दूसरों को देते थे 1 तो उनके पिता को अच्छा नहीं लगता था कि वो मेरी वजह विष्णु की पूजा करता है दूसरा विष्णु का उद्देश्य दूसरों को दे रहा है और जरूरी डरे नहीं तो उसी प्रकार इस्कॉन के भर खास कर के विदेशों में कइयों को जेल में जाना पड़ा जैसे आज हमें रूस में भी कई भक्तों को जेल में जाना पड़ा कईयों का देहांत हो गया जेल में तो वो डरे नहीं उनके मन में यह शक्ति थी, भावना थी निश्चित भावना भगवान का प्रचार हमने जरूर करना तो खैर इस देश में तो आप लोगों के ऊपर किसी प्रकार का भय नहीं है आप का विधान का प्रचार कर सकते थोड़ी लज्जा कभी कभी आती हो लोग देखने के में प्रचार करते हुए और उसकी आप चिंता मत करो, प्रचार करो, घर घर जाओ घर घर जा कर लोगों को कहो ये आपकी असली संस्कृति ये आपका असली ज्ञान ये है असली धन बाकी सब तो नकली है, झूठा है जहाँ ना वही रहो और अपनी चेतना को बदलो क्या ये सोचना की आप हर चीज के मालिक हो ये सोचो की भगवान शिव हर्ष के मालिक है ये सूचना के हम सब्जी के भोक्ता है ये सोचना की भगवान भोगता है और जिस प्रकार पेट में हम ऐसे सारे अंगों में ताकत आ जाती है उसी प्रकार भगवान शिव कृष्ण की सेवा के द्वारा आपके सारे इंडिया संतुष्ट हो जाती है इसका 4 कीजिये और ये सन्देश को लोगों तक और इस प्रकार आपका धन होगा और दुसनकाभीसुधार होगा हारे क्रिष्णा हारे शना क्रिष्णा हारे हारे हारे हारे नाम राहर हारे।
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