जीवन शिक्षाये | गौर किशोर दास बाबाजी | BG 4.42 | वृन्दावन | 24 Nov 1993 | श्रील गोपाल कृष्ण गोस्वामी

The video opens with a devotional invocation and a recitation of Bhagavad‑Gita verse 4.42, interpreting the verse as teaching that true knowledge is a weapon that cuts through ignorance, just as a knife cuts vegetables. The speaker then shifts to a detailed homage to the great acharya Gaur Kishor Das Babaji, describing his status as a revered saint in the Vaishnava tradition and explaining that the day of his "Tirobhav" (death‑anniversary) is being celebrated. A biographical sketch follows: Babaji’s thirty‑year residence in Vrindavan, his relentless chanting of the Hare Krishna mantra (up to 128 malas or two‑hundred‑thousand repetitions per day), his austere lifestyle of living on discarded cloth and soil, his periods of seclusion in a "sandes" (hermitage), and his refusal of material comforts such as a dedicated bhajan‑cottage. The lecture explains the twin festivals of Avirbhav and Tirobhav, their theological meaning, and how devotees celebrate them with great enthusiasm. The speaker contrasts material wealth with spiritual wealth, arguing that true riches lie in the chanting of Hari’s name, and uses the metaphor of physical hospitals versus “spiritual hospitals” to illustrate the need for inner healing. Further, he offers guidance on marital relationships, urging couples to view each other as servants of Krishna rather than masters. Throughout, the talk emphasizes renunciation, self‑sacrifice, and the propagation of divine knowledge as the path to liberation.
Chapters
ओम नमो भगवते बासु रिवाय, ओम नमो भगवते वासु रेवायाओमनमोभागवते वासु देवाय। तो हम भगवत गीता का यह श्लोक पढ़ेंगे और साथ में क्यूँकी आज गोल किशोर दास बाबा जी का तीर भाव दिन है। तो गोल किशोर दास बाबाजी के बारे में भी हम चर्चा करेंगे। गोल्ड किशोर दास बाबाजी 1 महान आचार्य हैं हमारी सम्प्रदाय में और आज उनका तीर भाव महात्सव है। ज्ञान संभूत ज्ञान से मन नाम यम योगम chatna ndhsगुrushritkm sregrnbishnans s्rीरuपम सहागनगुनaतntmsm cेतnयadeवम, श्री राधा कृष्णा पदा सहा गना ललिता, श्री विशाखा नितम, हे कृष्ण करुणा सिंधु दीन बंधु गोप गोपी कंत नाम सुधि गोरा बानु सुति देवी मानी हरी जाए, श्री कृष्ण प्रभु हरे कृष्ण। इस प्रकार श्रीमद भागवत गीता के चतुर्थ अध्याय दिव्य ज्ञान का भक्ति विनानततातपर्पुण हुआ। ज्ञान संभूता ज्ञान सनित चित व नाम म स्विष्ट भारत। तो भगवान इस श्लोक में ये बता रहे है की जो संशय वगैरह उत्पन होता है उसे हम ज्ञान के हथियार से उसे हमें काट देना चाहिए। जैसे की आप चाकू से सब्जी को काटते हो तो ज्ञान के हथियार से आप अज्ञानता को दूर कर सकते हो और ज्ञान नहीं हो तो फिर आप अज्ञानता को दूर नहीं कर सकते। कृष्ण सूर्य सम माया हयंदिकारा यहाँ कृष्ण ताहि ने महाधिकार जहाँ कृष्ण है वहाँ माया का प्रभाव नहीं रह सकता। जिस प्रकार जहाँ सूर्य हैं वहाँ अंधेरा पन नहीं रह सकता। तो इस जिसे दिव्य ज्ञान के नाम से बुलाया गया है। इस धाम में भगवान ये बता रहे है की किस प्रकार हमें अध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा जो हमारी अज्ञानता है उसको हमें दूर करना चाहिए। अध्यात्मिक वचन देने से पहले हम 1 प्रार्थना बोलते है ज्ञान ज्ञान श्री इसका अर्थ ये है की हम पैदा हुए थे अज्ञानता में, पर गुरु की दया से ये अज्ञानता दूर हो गई है और हम अपने स्वरूप को समझ पाए हैं। तो हम पैदा होते है अज्ञानता में होना पालते भी है अज्ञानता में जैसे की जब हम पैदा हुए थे हमें को को लिखना नहीं आता था, यह भी नहीं पता था कि 22 चर हैं। फिर माँ बाप ने शाल में भेजा तो वहाँ हमने ये सीखा। तो उसी प्रकार हमें अध्यात्म ज्ञान को भी अनुकूल करना चाहिए जिसके द्वारा हम इस अज्ञानता को दूर कर सके। सबसे बड़ी अज्ञानता का लक्षण क्या है ये सोचना की आप ये शरीर हो और जब आप ये सोचते हो की आप ये शरीर हो तो जब यही योजना बनाते हो के शरीर और इन्दियों को सुख पहुँचाया जाए और इससे ये सुख पहुँचाने के लिए व्यक्ति इन कार्यों में लीन हो जाता है। और इस प्रकार का जो असली उद्देश्य है उसे वो भूल जाता है। तो भक्तों का यह कर्तव्य है कि अध्यात्मिक ज्ञान को अनुकूल करे और आध्यात्मिक ज्ञान का वितरण करें। जैसे हम कह रहे थे आज हमारी परंपरा का 1 बहुत ही शुभ दिन है। आज के बाबा जी माराज का तिरोभाव महोत्सव है गर के दास बाबाजी महाराज कौन थे? कौन है गोर के बाबा जी महाराज, गौर के दास बागली महाराज भक्ति सुनंदी के गुरु महाराज हैं। तो वैष्णो के अनुसार अविरभाव महत्सव और तिरोभाव महोत्सव दोनो को बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। अविरभाव और तिरोभाव क्यूँकी जिस प्रकार ठाकुर भक्तिन जी ने कहा है वो व्यक्ति जो ये कहे की वैषनव मरता है वो गलत कह रहा है क्यूँकि जो वैषनव है वो हमेशा ही भगवान की सेवा में लीन रहता है। तो चाहे अविर्भाव महोत्सव हो या तिरोभाव महोत्सव भागते दोनो को उत्साह के साथ मनाते हैं, वर्ष रखते हैं 12 बजे तक। रुपाजी ने कहा की हमारे महान अचार्य के अविरभाव महोत्सव दोनो में हमें वर्ष रखना चाहिए। और भक्तों का ये विचार है कि भौतिक दृष्टि से तो जो उनका स्वरुप है हमारे सामने नहीं है। ये स्वरुप को बुलाते हैं प्रकृत रूप। तो भौतिक दृष्टि से, तो हम उनके प्रकृत रूप को नहीं देख पाते और वो भगवान के दिव्य धाम में भगवान की सेवा में लीन है। जैसे की आप सूर्य को दिन में देख सकते हो। फिर जब ये सूर्य बदल ऐसी छुप जाता है तो आप सूर्य को नहीं देख सकते। ठीक है न? तो सूर्य को ढक देता है। तो क्या कोई कह सकता है की सूर्य डूब क्या कह सकता है। बादल ने केवल सूर्य को ढक दिया है। तो उसी प्रकार जो महान आचार्य हैं वो जब अपने प्रकृत रूप को ले जाते हैं हमारी नरजो के पास तो यह नहीं सोचना चाहिए की वो मर गए पर ये सोचना चाहिए भगवान के धाम में भगवान की सेवा कर रहे हैं। जिस प्रकार बादल सूर्य को ढक देता है तो हम देख नहीं सकते उसी प्रकार हमारी नजरों के पास भगवान के धाम में महान चार्य सेवा कर रहे हैं। तो इसलिए अविर्भाव और तीर्व भाव दोनों महत् दोनो महोत्सम को बड़े उत्साह के साथ भक्त बनाते है। जब महान चाय का तिरोभाव महोत्सव हो तो हम भक्तों को उनके जीवन के कार्य का स्मरण करना चाहिए। जैसे की साधारण स्थिति में लोग बड़े पॉलिटिशन, फिल्मी कलाकार, खिलाड़ी वगैरह के जीवन के चरित्र के पढ़ने में रूचि लेते है। हमें महान चारों के जीवन के चरित्र को पढ़ने में रूचि लेनी चाहिए। जैसे की गोड़ के दास बाबाजी 1 बड़े महान त्यागी थे असल में वो मंजारी के अवतार है, मंजरी उन्हें कहते हैं जो की गोपियों का सहयोग देते हैं। भगवान कृष्ण की सेवा में को गौर की बाबा जी को महान चारियों ने मंजरी के अवतार माना है। तो गौर की शौदासबाबाजी उनकी पत्नी के देहान के पश्चात वो वृंदावन में थे। तो वृंदावन, नंद, ग्राम, वगैरह इन सब स्थानों में 30 साल के लिए हो या भजन किया वृंदावन के स्थान में 30 साल तक और दिन में 2 लाख बार व हर कृष्ण मंत्र का जप करते थे, 2 लाख बार, 2 लाख बार का अंदाजा, 128 माला दिन में हर राज ठाकुर दिन में कितनी बार जब करते थे, 3 लाख बार हर राज ठाकुर रोज, 3 लाख बार हर, 1 कृष्ण मंत्र जप करते थे। और घोर केशोदास बाबा जी 2 लाख व 128 वाला दिन में करते थे। और 128 माला निश्चित रूप, ऐसी रोज 128 माला का जाप करते थे। अंदाजा लगाओ हमारे भक्तों 16 माला करते है, बड़ी मुश्किल से है न पूछे आज से 16 माला हो गयी, हाँ हो गयी, अच्छी तरह किया की नहीं वो तो देखना पड़ेगा बावली 128 माला का जाप रोज करते थे, बहुत ही त्यागी थे भोजन के लिए, क्या खाते थे राजा कुन की मिटटी या जमुना नदी की मिट्टी। आप लोगो को मिट्टी दिया जाए प्रसाद में कल गुस्से हो जाते कुछ सेवा नहीं करेंगे, मिट्टी खाते थे यह जनना नदी की मिट्टी या कभी कभी वो 5 या 7 के घर जाते थे और वहाँ से थोड़ी थोड़ी भीग मानते थे। जैसे की जो मधु मक्खी होती है वो फुल में जाकर थोड़ी सैर इकट्ठा करती है। 1 फूल में जाती है, 1 बूँद शहद कर लिया, दूसरे फूल में गए, दूसरा बूंद दिया। ठीक है तो उसी प्रकार कोट के शो दास बाबा जी 5 या 7 के हस्त के घर रोज जाते थे और उनसे भीख मांगते थे थोड़े खाने का, ये था उनका जीवन, बिल्कुल भी सादा जीवन। तो 30 साल उन्होंने इस वृंदावन ब्रज के स्थानों में उन्होंने भजन किया और फिर वो 30 साल के बाद गए। नव्वे और नवद्विप में जाकर उन्होंने उन स्थानों की यात्रा की जहाँ के चेतन या महा प्रभु जी ने अपनी दिव्य लीला को प्रकट किया था, उन सब स्थानों में गए जहाँ के के में महाप्रभु ने दिव्य लीला को प्रकट किया था। और जो बाबा जी इतने त्यागी थे कि वो बिल्कुल एकांत में भजन करते थे। भगवान का अक्सर आप और हम जब किसी स्थान से गन्दी बो आए तो हम वन जाना पसंद नहीं करते हैं कि नहीं आप लोग आश्रम में रहते हो, ऐसे कभी गन्दी बो आती है, जल्दी कराओ, दरवाजा बंद करो और गोर की श्रदा। बाबा जी संडास में रहते थे। 1 समय 6 महीने के लिए वो संडास में रहे, छ महीने के संडास में रहे। और उन्होंने वहाँ भजन किया। तो सरकार के प्रतिनिधियों ने कहा आप के लिए हम 1 भजन कुटीर बना देते हैं। उन्होंने कहा नहीं मुझे भजन कुटीर की आवश्यकता नहीं, मेरे पास तो है भजन कुटिर। तो उन्होंने वही संडास को भजन कुटीर बना दिया और 6 महीने के लिए निरंतर और दिन रात किया। तो क्या कारण है कि गो के 10 बाबाजी ऐसे स्थानों में जॉब करते थे जहाँ कोई जाना भी पसंद नहीं करे? क्यूंकि वो ये नहीं चाहते थे कि कोई उनके भजन में उनको आकर डिस्टर्ब करे? वो चाहते थे बड़े शांति के साथ हरी नाम का जप करे, यह नहीं की हम जब कर दे और 10 10 मिनट में कोई आये बात करने के लिए करते हैं। 2 माला करते है तो थोड़ा 5 मिनट कर दे, 10 मिनट बाद करते है। गो के बाबुजी ये नहीं चाहते थे की कोई भी उनके भजन के समय में टोका टाकी करे चर्चा करे, तो वो 6 महीने के लिए उन्होंने लबिटसंदसमेंरहे और भजन का 6 महीने के ले और फिर भजन करते थे के पास बैठकर युवा इतनी गन्दी बू आती थी की वो चाहते नहीं थे कि कोई भी उनको तंग करे। कपड़े क्या पहनते थे, कभी उन्होंने बाजार से कुछ खरीदा नहीं। वो कपडे जो लोग फेंक देते थे, वो ही कपड़े को उठा कर लेकर धो के, फिर वो पहनते थे, समझ रहे हो जो कपड़े लोग फेंक देते थे, उसको उठाते थे, कचरे के लम्बे से धोते थे, फिर उसी से अपने शरीर को ढकते थे। और खाने के लिए क्या जो पुराना रिजेक्टेड, क्ले का, मिट्टी का जो बर्तन था, उसमे से खाद। जो लोग फेंक देते है न, जैसे कुछ उसको उठा कर उसमे अपना खाना खाते थे। तो ये था उनका त्याग तो 1 समय 1 डॉक्टर कैलकटा का, उसकी इच्छा हुई की नवदीप में 1 हॉस्पिटल बनाया जाए। जैसे हम भारत में देखते हैं कि जो धनी व्यक्ति हैं वो अपने धन को दिखाने के लिए हॉस्पिटल बनाते हैं। विद्यालय पाठशाला तो गोड़ के शास बाबाजी को जब पता लगा की ये डॉक्टर हॉस्पिटल बनाने के इच्छुक हैं, तो उसने डॉक्टर से कहा, इसकी कोई आवश्यकता नहीं। अगर आपने कुछ बनाना है तो ऐसी चीज बनाओ जहाँ से लोगों को हरी के नाम का ज्ञान मिला। तो 2 प्रकार के हॉस्पिटल बनते हैं। चेतन के अनुसार 1 है भौतिक हॉस्पिटल, दूसरा है, आध्यात्मिक हॉस्पिटल, अंतर क्या है? भौतिक हॉस्पिटल में हम जाते हैं रोग पीड़ा को दूर करने के लिए, वहाँ अध्यात्मिक ज्ञान नहीं मिलता। ये जो मंडल है, जैसे की प्रॉपर चेतन में कहते हैं कि इस कौम के जो मंडल है वो मंदर नहीं, आध्यात्मिक हॉस्पिटल है। यहाँ के जाने से भगवान के प्रति जाग्रति होती है, आध्यात्मिकता के प्रति उत्साह हमारा बढ़ता है। जैसे की समझो हमने हॉस्पिटल बना दिया है। उदाहरण के लिए और उस हॉस्पिटल में हम विमान व्यक्ति को ठीक कर देते है, जो आम जिसको कैटरेक की बिमारी है, कैट परेशन कर दिया, दिल की बीमारी उसको ठीक कर दिया। तो जब से ठीक हो जाती है तो लोग फिर क्या करते हैं? फिर से इंडिया चिपटी में है, तो आपने उसका सहयोग दिया या उसको फंसा दिया, क्या किया, फँसा दिया क्यूँ की अच्छे शरीर से, फिर वो व्यक्ति पाप करेगा और जितना ज्यादा पाप करेगा उतना ही ज्यादा बंधन में फंसे रहेगा, जैसे की आप किसी बैंक से कर्जा लेते हो, जितना ज्यादा कर्जा लोगे उतना ही आपको चुकाना पड़ेगा। तो उसी प्रकार जब हम शास्त्र के विपरित कार्य करते है, उसकी तुलना आप कर्जे के साथ कर सकते हो। जितना ज्यादा आप शास्त्र के विपरित कार्य करोगे, जिसको हम वी कर्म कार्य कहते हैं, उतना ही ज्यादा आपको सजा भुगतनी पड़ेगी। तो इसलिए अगर कोई व्यक्ति बहुत ही हॉस्पिटल बनाना भी चाहे तो इसको ऐसा हॉस्पिटल बनाना चाहिए जहाँ की भौतिक सुविधा के साथ आध्यात्मिक सुविधा भी हो की लोग यह समझ जाए की अच्छा शरीर हुआ है, इसका उपयोग किस प्रकार से करना चाहे। और जो रोग पीड़ा कष्ट है वो भी क्यूँ हमें प्राप्त होता है। रोड ने यह शिक्षा दी है। डॉक्टर को तो भक्ति, श्राम, सास्वती, जैसे आप सब जानते हो, उनको शिक्षा तो उनके पिता ठाकुर भक्ति विनोद जी ने दी तो जब भक्ति शिरामनदीकीदिक्षा का समय आया तो उन्होंने अपने पिता से पूछा की यार मैंने शिक्षा लेनी है किससे लूम रिक्षा। पिता ने कहा असल में वक्त सिकंदर स्रावी ठाकुर बहुत ही पड़े लिखे थे आध्यात्मिक दृष्टि से और भौतिक दृष्टि से। उन्हें अपने समय का सबसे प्रसिद्ध स्ट्रोमन माना जाता है। इतने पड़े लिखे थे आज भी हम लोग। जब उनके ब्रह्म समित्या ब्रह्मा समित के टीके को पढते हैं तो हर लाइन को समझने के लिए अंग्रेजी में विक्ली पकड़नी पड़ती है। उनकी अंग्रेजी इतनी कठिन है की जिंदगी मात्र भाषा की है, वो भी समझ नहीं पाते। तो इतने पढ़े लिखे थे भक्ति सिना, दीदी और आध्यात्मिक दृष्टि से भी पढ़े लिखे थे। तो भक्त बाबा जी बिल्कुल दृष्टि ऐसी अपना नाम लिखना भी जानते थे। पर भागवत गीता कंठस्थ ध्याते ज्ञान उड़ा था। पर भौतिक ज्ञान बिल्कुल नहीं था। तो जब गोल के श्रदा बाबुजी के पास पहुँचे भक्ति से राजा सासवती ठाकुर ये कहने लगे की मेरे पिता जी ने कहा है की आपसे वृक्षा लेने के लिए। तो गोल के सरदार बाबुजी ने कहा नहीं मैं नहीं ले सकता, तुम्हे तुम इतने पढ़े लिखे हो, मैं कल मैं तुम्हें शिक्षा कैसे दे। तुम तो इतने बड़े खानदान के लड़के हो। तो भक्ति वापस आये अपने पिता के पास, कहने लगे गोल के शो दास बाबा जी ने हमें शिक्षा देने से इनकार कर दिया। विनोद जी ने कहा जाओ फिर से, तो भक्ति सदा फिर से आये प्रार्थना की बाबा जी से की दिक्षा दे। 2 गोल के शो दास बाबाजी ने फिर इनकार कर दिया, कहा नहीं मैं तुम्हें शिक्षा देने के योग्य नहीं हूँ जो वापस आए तो वापस आ कर। जब भक्ति श्ीदामदजीनेअपने पिता भक्त जी को सुनाया भक्ति जी बहुत क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा फिर से जाओ जब तक वो तुम्हे स्वीकार नहीं करे। शिष्य के रूप में घर वापस मत आना। तो मक्की सनांदज गए घूम के शोर राजजी के चरणों में प्रणाम किया और कहा अगर आप मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार नहीं करोगे तो मैंने आत्म हत्या कर लेनी है गंगा में स्नान कर के वहाँ छलांग मार कर अपने आप को डुबा देना है। तो जब गोल किशोदा देखा की मैं इतनी गहरी भावना है उनसे लेने के लिए, तो फिर उन्होंने उनको शिष्य के रूप में स्वीकार किया। गोल किशोदा बाबा जी शिष्य बनाने के लिए इच्छुक नहीं थे, उनके 1 ही शिष्य थे कौन की जैसे की शाख में हम लोक दास महाराज के बारे में पढ़ते है। लोकनाद महाराज बड़े प्र चारिया है जिनके केवल 1 ही शिष्य थे। कौन धरमराज ठाकुर नरोतमदास ठाकुर, वैसे तो 1 राजा के पुत्र थे, इकलौते पुत्र और उनके पिता की इच्छा नहीं थी की वो चेतना महा प्रभुजी के अंदोलन के साथ जुड़ जाए। पर उनकी रूचि थी। तो नरमराज ठाकुर कई बार गए लोकनाथ दास जी के पास परीक्षा के लिए। लोक दासी ने कहा अरे भाई तुम तो इतने विद्वान और ज्ञानी मैं तुम्हे का कैसे दू। तो लोकनाथ दास जी जब वृंदावन में थे तो वो संडास करने जाते थे, भर 1 स्थान में रोज 1 दिन सोचा मुझे देखने। 2 कौन है वो व्यक्ति जो आकर ये सब साफ़ कर देता है? तो 1 दिन संडास करने के बाद वो झाड़ियों के पीछे छुप गए, उन्होंने देखा की नंदा सैको उधर आकर वो चट्टी को साफ़ कर दे जब उन्होंने देखा की ये भावना है फिर उन्होंने उन्हें शिष्य के रूप में स्वीकार किया तो इसी प्रकार हम देखते हैं के रूप गोस्वामी जी जब जीव को स्वामी जी आये असल में जीव गोस्वामी जी गए तो सनातन को स्वामी जी से शिक्षा की भीक मांगने के लिए गोस्वामी जी ने उन्हें रूप गोस्वामी के पास भेज दिया रूप स्वामी जी ने केवल जल्दी जब उनकी परीक्षा ले जीव गोस्वामी सबसे बड़े संस्कृत के विद्वान थे उन्होंने 6 लाख लोगों से अधिक की रचना की है, उनका पूरा भारत में नाम था स्वामी जी ने उनसे छोटे छोटे काम करवाए, बर्तन साफ़ करवाया जमीन साफ़ करवाए भीक मांगने के लिए भेजा दिया बाद में उन्होंने गोल के थे जिनका नाम था भक्ति सिनादरसारथवदी ठाकुर तो गोड़ के दास बाबाजी बहुत ही त्यागी थे। 1 समय 1 नए विवाहित पति पत्नी उनसे मिलने के लिए, तो गोड़ के दास बाबाजी उन्होंने उन्हें सिखाया कि जो पत्नी है वो है कृष्ण दासी वो भगवान कृष्ण की नौकरानी है तो पति को ये सोचना चाहिए की मेरी पत्नी नौकर नहीं पर वो कृष्ण दासी है और पत्नी को ये सोचना चाहिए की मेरा जो पाती है वो भी कृष्ण दास भगवान कृष्ण का सेवक है। तो गोड़कीश्रदासजी ने ये कहा की तुम लोग ये सोचो की तुम दोनों भगवान का सेवक हो, यह नहीं सोचो ये पत्नी तुम्हारी नौकर है ये सोचना पत्नी तुम्हारी भगवान की नौकर है। तो गोल दास बाबाजी अत्यंत त्याग क्या कारण है की नो जी ने ये निवेदन किया अपने प्रिय पुत्र ऐसी की तुम जाओ गोड की शोध से दिक्षा लो। भक्ति भक्ति जी ने यह प्रार्थना की थी क्षेत्र महाप्रभुजी ऐसी की कोई ऐसी दिव्य शक्ति आये जो की क्षेत्र महाप्रभुजी की शिक्षा जो ठीक मार्ग पर स्थापित हुए उसके वितरण में सहयोग करे क्यूँकि चेतन्य महाप्रभु जब संसार छोड़ कर गए हसते हसते जो उनका शुद्ध सन्देश था उसे लोगों ने बदल दिया था और फिर ये ठाकुर भक्ति विरोधी की महिमा है की उन्होंने फिर से ये सन्देश की स्थापना की। और जब भक्ति शिराजी ठाकुर भक्त जानते हो मैजिस्ट्रेट थे और क्यूंकी वो जगनापुर में मैजिस्ट्रेट थे इसलिए जो जगना रथयात्रा निकलती थी उनके घर के यात्र रुकता था और 1 समय जब वो उनके घर के सामने रुका था तो भक्ति राम बहुत ही छोटे थे माता की गोद में थे उनकी माता ने अपने बेटे को भगवान जगना के चरणों में रखा तो भगवान जगनाथ का हाथ उनके गले पर गिर गया तो अनेक लक्षण थे जिनके द्वारा ठाकुर भक्त जी को पता था कि जो बेटा है साधारण बेटा नहीं पर भगवान ने भेजा है उनकी प्रार्थना के उत्तर में, तो ठाकुर भक्त जी ने अपने बेटे को भेजा कि बाबाजी के लिए क्यूंकि वो उनकी भक्ति से त्याग से बहुत ही प्रभावित है। तो गौर के श्रोता बाबाजी से जो भी मिलने आता था उनसे वो 1 ही संदेश देते थे। क्या की असली धन केवल हरे कृष्ण मंत्र है और सब जो है वो नकली धन है। आज अज्ञानता के कारण हम ये सोचते है। धन, दौलत, सम्पत्ति, पत्नी, बच्चे ये सब हमारी सुरक्षा करेंगे, यही है हमारे असली धन और इसलिए हम योजना बनाते हैं। यही सोचते है। आज इतना है होना चाहिए। इसलिए ना मुनि जी ने युधिष्टर मनाज जी से कहा की भूखे व्यक्ति को तुम संतोष कर सकते हो, खाना देकर, प्यार से व्यक्ति को संतोष कर सकते हो, जल देखकर, क्रोधित व्यक्ति संतुष्ट हो जाता है, चिल्लाने के बाद कभी भी क्रोधित होते हो, चिल्लाते हो, दूसरे आरोप और चिल्लाने के बाद गुस्सा ठंडा हो जाता है। जो व्यक्ति है उसे आप कभी संतुष्ट नहीं कर सकते। ये है मुनि जी का कहना। इसलिए हम भौतिक समाज में देखते हैं। इतने करोड़ व्यक्ति आगे के 10 पीढ़ी तक धन इकट्ठा हो गया है। पर जब भी जब उनसे कहते हैं सेठ जी जरा जब्त करो, अभी समय नहीं है तो सेठ जी के पास धन कमाने के लिए समय है। पर असली धन कमाने के लिए समय नहीं है। तो गोकिसोदाजबाबुदी ने ये बताया की असली धन जो है वो ये हरि नाम है, ये असली धन। तो हम भक्तों को यह नहीं भूलना चाहिए की यही है असली धन। गोविंद बजा होरेमनाप्राथनामे। क्या कहते हैं कि जीवन किसी वक्त भी समाप्त हो सकता है बाजार पर हमें किसी न किसी माध्यम के द्वारा हरी के शरणागत बन जाना चाहिए क्यूँ की ये जीवन किसी समय भी हमें त्यागना पड़ेगा। तो गो के शोध बाबा जी ने अपने उदाहरण के द्वारा ये बताया क्या की किस प्रकार हमें सदा हरी नाम का जप करना चाहिए। जैसे हम आपको बता रहे थे दिन में 128 माल करते थे तो 128 माल करने के लिए लगभग सारा समय ही चले जाता है। इससे हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। स्वामी जी ने कहा है की अगर मेरे पास हजारों हजारों काम है, वो तो भी मैं संतुष्टता के साथ भगवान के नामों का जप नहीं कर सकता। हमारी स्थिति तो ऐसी है कि हमारे पास केवल 1 ही है और 2 कान है, स्वामी भी मांगते है हजारों जीव का और हजारों खानों का आरोप हम 1 जीव का भी उपयोग नहीं कर पाते। ये है हमारा दुर्भाग्य। तो गोड़ किशोर दास बाबा जी ने ये कहा था की जब मैं शरीर को त्याग दूंगा, मेरे शरीर को गलियों में न दे के गलियों में घसीट कर ले जाना, ये था उनका आदेश। तो जब गौर किशोर दास जी ने शरीर को त्याग तो कई का ये विचार था की उनकी इच्छा के अनुसार उनके शरीर को घसीटा जाए। न बजे की गलियों में भक्ति दादाजी ने रोक लिया नहीं, और भक्ति श्री राम जी ने उनके तीर भाव महोत्सव में बहुत बड़ा 1 कार्यक्रम का प्रबंध किया और फिर उन्होंने खुद उनके लिए 1 बड़ी अच्छी समाधि बनाई। मायापुर में गोल केशोदास बाबु जी को तो आज ये महान सं अचार्या गोट के शो 10 का तिरोभाव महत्सव है। जैसे हमने बताया था, आरम्भ में गोल किशोदा बाबूजी को मंजरी माना गया है। मंजरी के अवतार थे वो तो और जैसे तारे थे सिरभाव दोनो जो दिन है वो 1 जैसे है भक्त के लिए क्यूँकि भक्त समझता है कि हर स्थिति में भगवान के शुद्ध भक्त है वो सेवा में लीन है। इसलिए अविरभाव तिरोभाव दोनो महत्सव को भक्त बड़े धूम धाम से मनाते हैं तो हम भक्तों को क्या करना चाहिए। हम भक्तों को को किशोर दास बाबा जी से प्रार्थना करनी चाहिए। क्या प्रार्थना की कृपा करके हमें उनकी आशीर्वाद दया प्राप्त हो की हम भी निश्चित रूप से हर नाम को हमारे जीत के साथ जोड़ सके जैसे की उन्होंने जोड़ा था। जिस उत्साह के साथ उन्होंने हर नाम को स्वीकार किया, जिस प्रकार उन्होंने त्याग अनुकूल किया, अपने जीवन में हमें भी उनके चरणों में चलना चाहिए। हम जो भक्त जो है महान चारियों के उदार आचरण के द्वारा प्रभावित होते हैं और प्रयास करते हैं की हम भी उस प्रकार के त्याग को अनुकूल कर सके। तो हम भक्तों को गोर किशोदा बाबाजी से ये प्रार्थना करनी चाहिए। इस शुभ दिवस पर उनके त्योरा महत्सव के दिन पर की हमें भी किसी प्रकार से उनके आशीर्वाद प्राप्त हो की हम भी होकर उनकी शिक्षा का लाभ उठा सके और हम भी उनकी शिक्षा के अनुसार हरि नाम को हमारे जीव के साथ जोड़े और हमारे भी त्याग उत्पन हो। जब तक त्याग उत्पन नहीं होगा, जब तक वे राज्य को हम कट नहीं करेंगे, आप आध्यात्मिक मार्ग में आगे नहीं बढ़ सकोगे। हाय कृश्ण हम ना विशाल हाल केशेगरिशना।
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