कौन से नियमो द्वारा हम शीघ्र भक्ति में आगे बढ़ सकते है? | BG 5.26 | 14 Dec 1994 | Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

Gopal Krishna Goswami explains Bhagavad Gita 5.26 on rapid advancement in devotion. Anger is the primary obstacle; you need disciplined practice and specific rules, not shortcuts. The story of saint Haridas Thakur shows how steadfast devotion survives trials.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय, म नमो भगवते वासुदेवाय। स। तो इस समय हम भगवत गीता के 5 वें दहाई का 26 वर्ष लोग आज पढ़ेंगे राम क्रोध तो भ्रम निरवाना पना। oh my ganman sma, shri sm rupam पदaंतiकm ndehamshregrusriota plan, a na, sri rupam, sadajtmshagnarguna dndtmthmsdevam sdvetmsbdutan, prignasitasuna sri litaशrीरशाखान, krishna karuna sindu cnta nasa, मेरे काम क्रोध विमुगदानयतिनामयाता चेतसा अभी तो बंग निरवाना। आज पूरे भारत में गीता जयंती को मनाया जा रहा है, हम भी 3 दिन के लिए क्षेत्र में थे। 3 दिन पहले, रविवार को गीता जयंती के सम्बन्ध में बहुत ही 1 अच्छा कार्यक्रम हुआ था कि क्षेत्र यूनिवर्सिटी में, जिसके जिसका उद्घाटन गवर्नर मंडल जी ने किया था। तो अक्सर लोग ये सोचते हैं कि गीता का उद्देश्य केवल 5000 साल पुराना है। यह यह शिक्षा केवल 5000 साल पूर्व ही भगवान ने भी, पर ये सच है कि 5000 साल पूर्व भगवान ने ये उपदेश अर्जुन को दिया और ये उपदेश केवल 5000 साल पुराना नहीं पर रोडो साल पुराना भगवान ने सबसे पहले देश दिया था सूर्य के स्वामी evsवफेरियोगदेश विवस्वान से अस्त, अस्त वी पर पहुंचा मनु को को, तो सूर्य के देवता सूर्य के स्वामी विवस्वान को युगेश भगवान ने दिया था। 12 करोड़ साल पहले, कोई इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकता और ये ज्ञान हम केवल संतों द्वारा ही प्राप्त कर सकते है। तो सबसे पहले ये ज्ञान भगवान ने दिया था 12 करोड़ साल पहले। और फिर से ये ज्ञान आया महाराज, महाराज इक्शवाकू का राज्य कब था? इस पृथ्वी पर, श्ेतयोकेआमे तो खेत योग्य बीता है 20 लाख साल पहले। तो दूसरे शब्दों में सूर्य लोक में को यह ज्ञान दिया था भगवान ने, 12 करोड़ साल पहले और इस पृथ्वी में यह ज्ञान प्राप्त होगा, प्राप्त हुआ है 20 लाख से भी अधिक समय से, और जब भी है अगर गीता को पढ़ो ऐसे दिखता है कि उपदेश भगवान ने कल ही दिया है। तो गीता में सारे वैदिक शास्त्रों का हमें साथ रात होता है। और गीता के द्वारा हम ये समझ सकते हैं कि हमें क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए। तो भगवत गीता के पांचवे काम क्रोध को कर्म योग कहा गया है। और इस लोक में भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति मुक्ति चाहते हैं, अनेक प्रकार की मुक्तियाँ होती हैं जिनकी चर्चा इस समय नहीं करेंगे। पर मूर्ति का सरल शब्द में अर्थ यह है जन्म मृत के बंधन से छुटकारा जन्म मृत्यु का जो बंधन है, उसके द्वारा हर प्राणी मात्र को अनेक प्रकार के कष्ट भुगतने पड़ते हैं। साधारण स्थिति में भी समाज में हर व्यक्ति इस प्रकार की योजना करता है की वो अपने आप को कष्टों से बचाए। जैसे कि आजकल लोग पानी उबला पानी पीते हैं या फिल्टर पानी पीते हैं। क्यूँ क्यूंकि लोगो को पता है कि आजकल पानी गन्दा होता और गंदे पानी से आपको बीमारी हो जाएगी। आप जब खाना खाते हो, बड़ी सावधानी से खाते हो, अगर आप को शक हो कि खाने के द्वारा आपकी सेहत खराब हो जाएगी, स्वीकार नहीं करोगे। अगर आपको पता हो, इलाके में आ जाओगे तो कोई चोरी कर लेगा या कुछ नुकसान पहुंचा देगा तो नहीं जाओगे। ठीक है तो हर व्यक्ति प्रयास तो करता है अपने आप को कष्टों से बचाने के लिए, पर प्रयास करते हुए भी हम अपने आप को बचा नहीं सके। तो यहाँ कहा जा रहा है पर भगवान के द्वारा जो रोज तथा समाज भौतिक इच्छाओं से रहित है तो आध्यामिक के छ शत्रु हैं। और जब तक हम इन से शब्दों को वश में नहीं लाये, अध्यात्मिक जीवन बहुत कठिन हो जाता है। भागवत में कहा गया है वो ही चीज जिसके द्वारा कोई बीमारी होती है, अगर उसका ठीक रूप से उपयोग किया जाए तो वह बीमारी का कारण बन जाती है। जैसे की दूध के द्वारा आपका पेट खराब होता और आप दूध को जब के रूप में उपयोग करते हो तो वो आपके खराब पेट का इलाज कर देता है। उसी प्रकार मन नंदियों का जब आप का पयोग करते हो तो यही मन निंदी आपको नरक में पहुंचाती है। और जब आप इन मनोरिंदियों का शुद्ध उपयोग करके भागवत सम्बंधित कार्य में उपयोग करते हो तो यही मन हिंदी आपको मुक्ति दिलाती है या जन्म मृते के बंडल से छुटकारा दिलाती तो छे शत्रु है जिनका परिचय हमें छात्रों से प्राप्त होता न ही हमें परिचयन का प्राप्त होता है। हमे ये शिक्षा भी गीता से मिलती है की शत्रु कहाँ छुपे हुए हैं। जैसे की के लिए आपको पुलिस वाला समझ कोई चोर को ढूंढ रहे है। सबसे पहले तो तलाश चोर कहाँ भागे हैं, फिर उनका पता लग जाए समझो वो शहर में है, फिर वो ये पता लगाना चाहेंगे, चन्डीगढ़ कौन से इलाके में है, कौन सी सेक्टर में है, कौन सी कोठी में ठीक हैं न वे वहाँ जाकर पकड़े। तो उसी प्रकार भगवत गीता के द्वारा हमें सबसे पहले तो ये ज्ञान मिलता है, कौन हमारे शत्रु हैं जीवन के, फिर ये ज्ञान मिलता है कि ये शत्रु कहा निवास कर गए। तो कम prod अनेक प्रकार का भौतिक विचार है। और जब हम इन विचारों को नहीं प्राप्त कर पाते, फिर क्या परिणाम होता है? हम क्रोधित हो जाते हैं? आप सब का व्यास होगा ये बच्चा घर में कब होता है? जब उसे कुछ चाहिए हो और माता पिता को सुविधा नहीं देते तो का जब तक बहुत विचार सुविधा प्राप्त होते जाए, हम खुश रहते है। और जब हमारी काम भावना को हम पूरा नहीं कर सकते, फिर हम क्रोधित हो जाते हैं? और जब हम क्रोधित हो जाते हैं तो फिर हम कुछ देखते नहीं क्रोध में आकर व्यक्ति दूसरे का कतल कर देते हैं और क्या क्या नहीं करते? तो क्रोध यह भी हमारा अध्यात्मिक जीवन का शत्रु है? 2 प्रकार के क्रोध होते हैं, 1 है भौतिक क्रोध, 1 है अध्यात्मिक क्रोध यहाँ चर्चा की जा रही है? भौतिक क्रोध आध्यात्मिक क्रोध का अर्थ है कि जब देखो भगवान के भक्तों की कोई निंदा करे, जब आप ोजित फिर लोग लोग का क्या? अर्थ लालच, बहुत लालच की कोई सीमा नहीं है, जितना ही प्राप्त हो उतना ही हमें कम नजर आता है नारदमुनि जी ने। इसलिए भागवत के सातवें स्कंध ने कहा है कि आप भूखे व्यक्ति को संतोष कर सकते हो, क्या ही व्यक्ति को संतोष कर सकते हो, जल देकर और लाल क्रोधित व्यक्ति को भी संतोष कर सकते हो। और लालची व्यक्ति को आप कभी क्रोध कभी संतोष नहीं कर सकते। ये सत्य है। अब समाज में हो लोग इतने धनी है। आगे 20 पीड़ियों के लिए धन जोड़ दिया कभी भी सेठ जी ने। दफ्तर जरूर कमा जाना है और थोड़ा धन जरूर कमाना है तो लो फिर माँ का क्या? हम समझ नहीं पाते कि हमारा असली स्वरुप क्या है? इसका ज्ञान ही अहंकार है। अहंकार के कारण हम भगवान या संत उनकी शिक्षा को स्वीकार नहीं करते। जैसे कि आजकल भौतिक समाज में खास करके जिन्होंने भौतिक शिक्षा प्राप्त की है, काले वो भगवान की शिक्षा को स्वीकार नहीं करते। बड़ी सरलता से उनके मन में यह विचार रहता है के हमारे पास पूरा ज्ञान है और हमारे पास हर प्रशन का उतर। तो भगवान भगवान कह रहे है कि जो रोज तथा समझ भौतिक इच्छाओं से इसे रहे तो काम रोज लोग। मन मतले के कारण हमारे हृदय में 1 अनेक प्रकार की भौतिक इच्छाएँ उपस्थित हैं। और इन भौतिक इच्छाओं के कारण हमारा जो हृदय है, गोले के समान बिल्कुल काला है। तो इसलिए अगर हम अध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करना चाहते हैं, उन्नति करना चाहते हैं तो ये नहीं की आप इच्छाओं से बेहतर नहीं। भक्तों में भी बहुत इच्छा रहती है, भौतिक वादियों के हृदय में भी इच्छा रहती है। अंतर केवल यह है कि भक्तों की इच्छा निर्बल है भगवान की शिक्षा के ऊपर और भौतिक वालियों की इच्छा निर्भर है। इंडिया की सुविधा के। तो जैसे की भक्तों की इच्छा रहती है की हर पानी मात्र भगवान की शिक्षा को स्वीकार करे। इसलिए भक्त जो हैं घर घर जाकर प्रचार करते है। भक्तों की इच्छा रहती है कि लोग चाहते के विपरित कार्य नहीं करें। भक्त की इच्छा रहती है कि कोने कोने में भगवान का मंजर बने। क्यूंकि जो मंदिर है यही से आध्यात्मिक हॉस्पिटल है, यहाँ की हम जाते हैं और दिव्य ज्ञान को प्राप्त करने के लिए। तो भगवान ये नहीं कहते है की इच्छाओं से रहित हो जाओ। जैसे कि गीता में भगवान कहते है पतला पुष्प, पन में भक्त प्रजा। भगवान ये नहीं कह रहे। तो भूखे जरूर कहते है की वो क्या स्वीकार करेंगे और क्या नहीं करेंगे। फिर आगे कहते हैं स्वरुप स्वरूप से मतलब की जो अपने स्वरूप को समझ ले। आज बड़े बड़े पी जी लोगों से आप पूछो, मिलो पर आप उनसे पूछो कि आपका असली शुरू किया है तो आप ठीक उत्तर नहीं दे पाएंगे। क्या है हमारा जो सोलो? क्या हम शरीर है? क्या ये शरीर हमारा असली स्वरूप है? इस विषय में ज्ञान ता के दूसरे में यहाँ बताया किस प्रकार शरीर नश्वर है, आत्मा सनातन है और कर्म के अनुसार हम नया नया दे हम स्वीकार करते हैं। गीता में बड़े कहा गया है कि जिस प्रकार हम हमारे पुराने वस्त्र को त्याग कर नई वस्तु को स्वीकार करते हैं। उसी प्रकार यह आत्मा 1 भेड़ को त्याग कर नया स्वीकार करती है जो कि निश्चित किया जाता है। कर्मों के अनुसार फल आत्मसमय है तो आत्मसमय होना बहुत अवश्य है। अगर आप आध्यात्मिक जीवन में उनकी करना चाहते हैं। आजम स्माय नियमो का पालन रूप को स्वामी जी इसका उद्देश्य देते हैं। भक्ति रस अमृत सिंधु में जिसे कहा जाता है वेदी भक्ति, वही बेकार है नियम। जिस प्रकार आप सडक पर भी चलते हो तो आपको नियमों का पालन करना पड़ता है। आप बिना वस्त्र के सड़क में नहीं चल सकते। अगर आप मोटर भी चलाते हो तो आपको नियमों का पालन करना पड़ता है। ये थोड़ी की आप सड़क के जिस चलाना चाह मोटर चला सकते हो। तो उसी प्रकार भक्ति के मार्ग में आगे बढ़ने के लिए भी नियमों का पालन करना पड़ता है। मै ये नियम हमें बेशक कड़वे दिखे। पर ये अवश्य है क्या? अगर आप नियमों का पालन करोगे तो त में यही नियम जो आपको हाल में कडवे दिखते हैं, बाद में मीठे लगेंगे। जिस प्रकार दवाई खाने से रोग पीड़ा दूर होती है उसी प्रकार ये आध्यात्मिक दवाई के द्वारा यह बहुत बीमारी है। जिसके कारण हम अनादि काल से तड़पते आ रहे है, वो हो जाता है। तो भगवान कहते हैं आत्म सही है और सभी के लिए निरंतर प्रयास करते रहते हैं। तो अगर आपके आपको भक्ति चाहिए तो निरंतर प्रयास करना पड़ेगा। यह नहीं सोचना चाहिए कोई शोर्ट कट या छोटा रास्ता आपको मिल जाएगा। कई बार लोग कहते हैं भगवान जेहिपर लम्बा रास्ता नहीं चाहिए, छोटा रास्ता चाहिए। स्वामी जी कोई ऐसा मतलब नहीं है की जल्दी दर्शन हो जाए। भगवान कई बार लोग से कहते हैं तो भगवान के दर्शन के लिए हमें तैयारी करनी पड़ती है। शासन 1 उदाहरण है 1 बड़े महान संत हरिदास ठाकुर है, हरिदास ठाकुर ने जन्म लिया था मुसलमान खानदान और फिर उन्होंने हरी के नाम को अपना लिया था। और दिन में 3 लाख का लोग हरी के नाम का वो उज्जन करते थे। 3 लाख दूर दूर से लोग आते थे उनके दर्शन को प्राप्त करने के लिए। 1 समय वहाँ के जो जमींदार था वो था मुसलमान। तो उसने कहा कि मुझे इतना आदर समाज में नहीं मिलता जितना कि हरिदास को मिलता है। दूर दूर से लोग आते हैं हरिदास को सलाम करने के लिए, यहाँ इज्जत देने के लिए, और मेरे पास कोई आता ही नहीं है। और मैं मुसलमान हूँ यह मुसलमान खानदान मे जन्म लेते हुए हरी नाम को अपना लिया है। तो उसने यह सोचा कि हरिदास का किसी प्रकार से उसको हमें फसाना चाहिए, लोग इसे बड़े संत मानते है। पर मै फसाऊँगा के सा fir m s was a भगवान गीता में कहते हैं पर हर के हृदय में उपस्थित हूँ और जो उसका कारण भी म। जो व्यक्ति नास्तिक बनता है वो बुद्धि भी भगवान देते हैं, जो आर्थिक बनता है वो बुद्धि भी भगवान ही देते हैं। इच्छा के अनुसार भगवान हमें बुद्धि देते है। तो हरिदास की झोपड़ी में पहली वो ये भावना से आई थी कि हरिदास को किसी रिश्ते में जोड़ा जाए। हरी दास उसके चेहरे को देखते ही पेचाना किस लक्ष्य के साथ वो पहुंची है। वो झोपड़ी में हरी दास ने कहा की मुझे मेरा माला समाप्त करने। 2 बाद में तुम्हारी इच्छा में रात बीत गई। हरिदास ने कहा आज माला समाप्त नहीं हो पाई, क्या नाना कल तुम्हे मैं जरूर संतोष कर दिया। अगले दिन वैसाईबड़ीउमीदलेकर। अगले दिन हरिदास ने यही कहा आज माला समहत नहीं हुई, कल ना कल कल तुम्हें मैं जरूर संतोष करूँगा। पर वैसे का भाग्य क्या था। शोध भक्त की संगत मिली और शोध भक्त के द्वारा हरिनाम सुनने का मौका मिला। परिणाम ये हुआ किया और तीसरे दिन वर्ष ने भी हरिदास के साथ जमा शुरू कर। तो हरiदासहरिदासकये मुसलमान राजा ने 22 बाजारों में पीटा था, इतना पीटा, इतना पीटा कि जो व्यक्ति को पीट रहे थे उनके हाथ का 22 बाजारों में पीटा किस लिए 1 ही भाग था। हरि राम को तुम छोड हमें पता है कि यह रूस में भी कम्युनिजम था कई साल पहले ये नाइनटीन सेवंटी सेवंटी सेवन सेवंटी 8 की बात है तो उन प्रचार की कोई थी। तो जब हमारे पहले भगत पकड़े गए थे तो उनको साइबेरिया में जेल में ले गये थे अपने साइबेरिया नाम सुना वह विश्व में लगभग सबसे ज्यादा ठंड होती है। वहाँ उनको रखा जेल में और बिल्कुल ठंडे जेल में कुछ हीटिंग नहीं कुछ नहीं अंदाजा लगा और उनको ये लोग को पुरानी ठंडी डबलरोटी खाने को मिलती थी, वो मास भी देते थे पर हमारे भारत को खाते नहीं थे। तो कई कई साल उनको जेलों में ऐसे रोज कहते थे नाम का बंद कर 2 लो हम छोड़ देंगे और वो लोग नहीं माने तो हरिदास का 22 बाजार में पीटा। तो ये यही हरीदास जब 1 और समय माया देवी की इच्छा थी कि हरिदास की परीक्षा ली जाए तो माया देवी आई बड़ी खुबसूरत रूप के साथ वह बड़ा प्रयास किया हरी दास को आकर्षित करने के लिए और वह भी असफल करते है। तो ये hridsक्यूकिदिनरात जप माला करते थे। 3 बार रोज तो बुढे आयु मे इनका स्वाद ठीक नहीं था। तो 1 दिन चेतमेवहापपटी पहुँचे वहाँ और कहने लगे आप हरिदास ठाकुर इतनी ऊँची कोटी के भक्त थे, वो रहते थे जगनाथ पुरी में तो जगनाथ पुरी में। ये प्राचीन विवाद है की अगर आपने हिंदू कुल में जन्म नहीं लिया तो अंदर प्रवेश नहीं कर सकते। हमारे गुरु जी इसका बहुत विरोध करते, हमारे गुरु जी कहते थे भगवान के भक्तों को अंदर जाने से नहीं रोकना चाहिए। खैर ये अलग बात है। तो हरिदास ठाकुर भगवान के मंदिर के अंदर कभी नहीं गए। पर जगनाथपुर मंगल के पास उन्होंने 11 झोपड़ी बनाई थी भजन कुटीर जहाँ बैठकर वो भजन करते थे और वहाँ से देख सकते थे मंदिर के कैलाश को उसे दर्शन प्राप्त करते थे और भगवान है रोज जाते थे। हरिदास के दर्शन को देखो जब आप की भक्ति इतनी ऊँची कोटी की हो तो भगवान आपको देखने आते हैं। आपको भगवान को देखने की भक्त में तो हमेशा भावना रहती है और भगवान आपके पास आते है। जैसे की मरा जब जंगल में गए, जंगल में गए, भगवान की खोज में, क्यूंकि उन्हें भगवान की सहायता की आवश्यकता थी, सौतेमी माँ ने उनका अपमान कर दिया था। राज की तपस्या देखकर भगवान इतने प्रसन्न हुए कि वो छोटे से लड़के थे, कभी भी भगवान उतर आए और धामराज को उन्होंने अपना दर्शन दिया। तो भगवान भक्तों की तपस्या से बहुत ही प्रभावित होते हैं। तो चेिनभाप्रबुति रोज जाते थे हरि राज ठाकुर को दर्शन देने के लिए, तो 1 दिन हरिदास का श्वास बुरी उम्र में ठीक नहीं है। तो चेतन महाप्रबंध ने हरिदास से कहा haridas तुम इतना जप माला करते आये, जिंदगी भर, अब थोड़ा विश्राम करो। और हरी दास ने कहा नहीं मैं जब काम नहीं कर सकता क्यूँकि अगर मैं अपना प्रयास कम कर लूँगा तो माया मुझे पकड़ ले। तो उन्होंने बुढिया यु भी बीमारी होते हुए भी अपनी भक्ति कम नहीं की। तो हमने ये उदाहरण आप लोग इसलिए दिया क्योंकि इस लोक में कहा जाता है बड़े स्पष्ट रूप से निरंतर प्रयास करते हैं। तो हमें जो भक्ति हम करते है, हमें निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। यह नहीं कि थोड़े समय के लिए हमने प्रयास किया, फिर हम विश्राम करेंगे, फिर हम फिर से करेंगे, निरंतर प्रयास करना चाहिए और हम निरंतर प्रयास कर सकते हैं। क्योंकि भक्ति का परिणाम जो है वो बहुत मीठा होगा। भौतिक वादी व्यक्ति कभी ये सोच नहीं सकते कि किस प्रकार हम 1 ही मंत्र 4 दिन रात करते हैं, भौतिकवादी व्यक्ति कभी सोच नहीं सकते क्या मैं की किताब भागवत गीता को बार बार पढते हैं, क्योंकि वो ये नहीं समझ पाते कि इन नामों में और इन जो शिक्षा है, क्योंकि इनका स्वरूप आध्यात्मिक है। और भौतिक ही व्यक्ति कभी थकता नहीं है। या दुसरे शब्दों में जितना नाम लोगे उतनी ही इच्छा होगी और लेने की जितना आप चाह को पढ़ोगे, उतनी इच्छा होगी और पढने की ये जो ग्रंथ है, इनका अंत आप देख भी नहीं सकते। कभी आप यह टनल में जाते हो और आप दुसरे कोने को देख भी नहीं सकते। सड़क की सड़क सड़क होती है। तो उसी प्रकार इन शास्त्रों में जो ज्ञान है, यह ज्ञान को प्राप्त करने के लिए हमें प्रयास करना पड़ेगा। यह नहीं सोचना चाहिए की बैठे बैठे गीता का उद्देश्य भी हमें समझ आ जाएगा प्रयास करना चाहिए। तो जो लोग निरंतर प्रयास करते हैं उनकी मुक्ति निकट भविष्य में सुनिश्चित है। तो भगवान इस लोक में बता रहे है किन व्यक्तियों के लिए मुक्ति सम्भव है। अब समझे न मुक्ति कोई इतनी आसान चीज नहीं है। आजकल हम देखते हैं कि लोग जाते हैं महात्माओं के पास, महात्मा जी को मंत्र देते हैं और सब चौथे बस अभी इस मंत्री के द्वारा, मंत्र के द्वारा में म मुक्ति मिल जाएगी। अगर आपको मुक्ति चाहिए तो इस श्लोक में जो भगवान कहते है इसका तो पालन करना ही पड़ा, तो ही मुक्ति प्राप्त करने की संभावना हो सकती है। लोक के काटे में पापा जी ये भी बताते हैं की हमें किसी न किसी रूप से भगवान का चिंतन करना चाहिए, भगवान का स्मरण करना चाहिए। इस लोक में मछली, कछवा तथा पक्षी केवल दृष्टि, चिंतन तथा सर से अपने संस्थानों को पालते है। तो मन जो है मन का महत्वपूर्ण खान है। अध्यात्मिक वादी के लिए भागवत की के छठे तिहाई को ध्यान योग के नाम से बुलाया जाता है। और अगर आप ये अध्याय ध्यान से पढ़ो तो यह देखोगे कि भगवान बार बार कह रहे हैं बन को दी। तो मंच को बचे। भगवान कहते हैं मन को अपना बंधु बनाओ, शत्रु नहीं। कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने भंग को छीन लिया उसके लिए आध्यात्मिक जीवन सरल बन जाएगा और जिन को नहीं जीता, उसके लिए अध्यातिक बन जाएगा। भगवान कहते हैं जिसने मन को जीत लिया उसके लिए शोक, दुख, धन, गरीबी सब का सामना वो बड़ी सरल समानता के साथ कर सकते है। जैसे की आप किसी धनी व्यक्ति को देखते हो, कोई खूबसूरत वस्तु को देखते हो, आप के मन में क्या इच्छा भावना प्रकट होती है, हमें भी वो चीज प्राप्त हो जाए। आजकल भारत में 11 नई मोटर। तो सब यही चाहते हैं, हमें भी नई मोटर मिलनी चाहिए, हमें भी नया मॉडल आ रहा है, हमें भी चाहिए। तो फिर वो वो मॉडल नया प्राप्त करने के लिए खेलो परीक्षा करो भाई करो है। तो मन जब देखता है की किसी और की संपत्ति होती है की हमारे। इसलिए चोनक्यपंडेत ने आध्यात्मिक वादियों को इस प्रकार का उपदेश दिया। चिनहज्ञापंजेका कहना है कि दूसरे की सम्मति को कचरे के समान समझा। और अब दूसरों से वैसा व्यवहार करो। जैसा कि आप चाहते हो कि दूसरे आपके साथ व्यवहार करें। और हर 1 औरत को अपनी पत्नी के आलावा अपनी माता समझा। फिर आप कभी भी गलत रास्ते में नहीं पा सकते। फिर का कहना है दूसरे की सम्पत्ति को कचरे के समान समझो। तो दूसरों की सम्पत्ति देखो। तो ये मत सोचो। अब हमें क्या करना चाहिए? उन सम्पति प्राप्त करने के आप कचरा? कचरे के रूप में मानव जब आप दुसरे के घर के कचरे को देखते हो, क्या दूसरे के घर के में, कचरे में रुची नहीं रे? फेड दूसरों से व्यवहार कैसे करना चाहिए? चना पंडित जी कहते हैं वैसा व्यवहार करो दूसरों से, जैसे आप चाहते हो कि दूसरे आप से करे। तो आप क्या चाहते हो? सब आप से, आदर से बात करें, कोई आपकी चुगली नहीं करे, कोई आपकी बस्ती नहीं करे। ठीक है न? तो दूसरों से भी आदर से बात करो, सूसू से भी संबंध रखो बड़े। आदर के साथ फिर कभी झगड़ा होगा? नहीं। फिर भौतिक समाज में हम किसी और सुन्दर, स्त्री वगैरह को देखते हैं। तो आकर्षित हो जाते हैं। और वो कहते हैं कि अपनी पत्नी के लावा जो भी तुम अपनी माता और बहन के समान ये उद्देश्य जो के बंदे देते हैं। अध्यात्मिक वादियों को, भौतिक वादियों को नहीं। बहुतिक वादी तो इतने नशे होते है की वो भेद भाव नहीं कर सकते। तो भगवान कहते हैं। मन बडा बाबा मन भर जाजीमनमोजकोमान के द्वारा मेरा चिंतन करो, मेरा समानन करो, मेरे सामने प्रणाम करो। भगवान गीता में अर्जुन को कहते हैं श् हे और जो तुम इस युद्ध में लड़ो, पर इस युद्ध में तुम लड़ो, मेरा चिंतन करते हुए मेरा मन। तो भगवान बार बार यह कह रहे हैं। छठे अध्याय में कहते हैं फिर अठारहवे अध्याय पूरी गीता का सार है तो फिर अकारीवादिहाई में भी इस विषय पर तो मन को किस प्रकार से आप जी सकोगे है? मन को बंधू बनाना। इस समय तो हम रा शत्रु है। आप क्लास में बैठे हो, मन के घर में जा रहा है, घर में क्या हो रहा है, कल करने, क्या धन्धे में क्या करना है, कल ये सौदा कैसे करना है की नहीं? पर सौ में कहा जाना, बच्चों को छुट्टियों में कहा न जाना है? तूफान जो है, भटकते रहता है। और जो ने कहा, हे ग। मन को वश में लाना, वायु को वश में लाने से भी ज्यादा करता है तो प्रयास करने से असम्भव कार्य सम्भव हो जाता है, कठिन कार्य सरल हो जाता है या ष्णराजगविराजके द्वारा की। अगर महा हु जी की शिक्षा का पालन करे तो कठिन की सरल हो जाती है। अगर फॉलो नहीं करे तो सरल चीज भी कठिन हो जाती है। और चेतन भाव पबूजी की तरह से लंगड़ा व्यक्ति पहाड़ों को पार कर सकता है। अंदाजा लगाओ लंगड़े व्यक्ति को पहाड़ों के पार जाना अंदर व्यक्ति देख सकता है, भरा व्यक्ति सुन सकता है, गूंगा व्यक्ति बोल सकता, ये सब सम्भव हो सकता है। तो प्रयास करने से हर क्षेत्र में आप सफलता प्राप्त कर सकते है। बहुत 1 जीवन में भी आप देखते हो कि जब लोग प्रयास करते हैं तो अच्छे नंबर इत्यादि प्राप्त कर लेते हैं तो उसी प्रकार अध्यात्मिक जीवन के लिए भी प्रयास करना चाहिए। फिर यहाँ मन को जीत पाएंगे। भगवान के देवा नाम के उच्चारण के द्वारा मन को वश में लाने में सहयोग होता है। ज्यादा भगवान के ग्राम को पढते हो, कि को पढते हो उसका स्मरण करो इसके द्वारा भी मन का बना है मान के तान ए तो वहाँ से उसको निकाल कर किसी न किसी प्रकार से भगवान की शिक्षा के आधार पर लगा तो इस प्रकार से आप मन को शुद्ध बना दोगे और मन को शुद्ध बनाने से आप आध्यात्मिक जीवन में आप उन्नति कर सकोगे। इसलिए कहा गया है उसे भौतिक क्लेशों का अनुभव नहीं होता तो जो व्यक्ति मन द्वारा भौतिक भगवान को प्राप्त कर ले तो भौतिक क्लेशों को भागवत ने 1 उदाहरण दिया जाता है 1 समय व्यक्ति धंदा था तीरों को तेज करना तो उसकी दुकान थी तीरों को तेज करने के तीरों को तेज करना था इतनी सावधानी से की उसकी दुकान के आगे से राजा गुजर दिया के बैन के साथ और उसने उसे पता नहीं लगा अब समझे क्यूंकि वो ध्यान था चीजों को तेज करने में तो शुरू से बार मैच देख रहे है उनसे बात भी करने जाओ बाद में आना सिनेमा देखा है अच्छी सेना में लग गया तो क्या कहता है? तो बहुत चीजों में, तो उसी प्रथा कहा जा रहा है की अगर किसी व्यक्ति ने बात को दे दिया तो फिर बहुत प्लेटो का अनुभव भी नहीं होता है क्यूंकि? बहुत सुख अनुभव कर रहा है भगवान का सरन कर बुतिक से कभी लोग भग, पीड़ा लोग पीड़ा अनुभव होगी कभी तो भौतिक जीवन तो केवल कष्ट देगा। जिस व्यक्ति ने वह मन को जीत लिया है तो वो बहुत पेशों को अनुभव नहीं कर पाए। तो अध्यात्मिक जीवन के शत्रु है। ये उपस्थित हैं कहा मन में, इंदियों में और हमारी बुद्धि में। आपको याद होगा मैंने आदम में कहा था ये शेष शत्रु भगरीता बताया गया की शत्रु कौन है और ये कहाँ निवास करते है तो मन में निवास करते हैं काम। तो 2 वो मत रिया हिंदियों में निवास करते है काम लो, लो, वो मत मत या और बुद्धि में भी वास करते हैं। यह शेर तो बुद्धि को शुद्ध बनाना है, मन को शुद्ध बनाना है, इंडिया को शुद्ध बनाना, फिर अध्यात्मिक गाड़ी आगे चले गए। जो धर्म प्रचारक ये शिक्षा देते है की जो गणना करो, भगवत प्राप्ति प्राप्त हो जाए, संत होगी जब तक आप बात को शुद्ध नहीं बनाओ को शुद्ध बनाओ, बुद्धि को शुद्ध नहीं बनाओ, जब तक आप भगवान को प्राप्त नहीं कर सकते। जिस प्रकार साधारण जीवन में आपको असली आनंद आता है, असली चीज के द्वारा नकली चीज़, आपको अच्छी नहीं लगती, आप सोना खरीदने जाओ, कोई आप से धोखा देकर, असली की वजह नकली दे दे तो आपको कितना गुस्सा आता है। आपको साधारण सभा में, हर चीज में असली माल चाहिए। तो उसी प्रकार जब आप खुशी की खोज में हो तो असली खुशी प्राप्त हो, नकली खुशी नहीं तो ये कृष्णा भक्ति के द्वारा जो है असली खुशी हो। और हमें यह नहीं सोचना चाहिए की ये ज्ञान शिक्षा केवल सन्यासियों के लिए है, ये शिक्षक पूरे मानव समाज के लिए है। भगवान जब कहते हैं भगवान को केवल सन्यासी और 4 भगवान कहते हैं। कारवानी क र का नतीजा मुझे अर्पण करो नतीजा पर नजर। हम क्या अक्सर के सोते है, पर हमे तुम्हारा कार्य है केवल करदेना मेरे 4 के ऊपर, यह उसका परिणाम है। वो मेरी खुशी। तो जितना हम भक्तों की संगत प्राप्त करेंगे, जितना हरिनाम करेंगे, जितना हम इन शास्रों का अध्ययन करेंगे, उतनी ही भावना बढ़ेगी कि आप भी इन नियमों का पालन करो, उतनी भावना बढ़ेगी की आप भी बिल्कुल आत्म स्व स्वामी के साथ चलो और फिर ही आप आगे बढ़ सकोगे। अध्यात्मिक जीवन में तो इस ज्ञान की आज विश्व में बहुत कमी है। आज आप देख रहे हो सारे विश्व में अनेक प्रकार का प्रकार के कष्ट है। और अगर हम इन कष्टों से छुटकारा चाहते हैं तो 1 ही उपाय है। वो उपाय क्या है कृष्ण भक्ति के ज्ञान का वे तो जैसे हमने आपको सुबह कहा था, कई भक्त अब उपस्थित है जो सुबह की क्लास में उपस्थित हैं थे। मैंने सुबह आप लोगो को समझाया था कि दिसम्बर के महीने में कीताजंतीकेसमय हमारी संस्था के सारे भक्त जो मंदिर में रहते हैं, जो घर में रहते हैं, आप जैसे सब ये जिम्मेदारी उठाते हैं, प्रयास करते हैं कि अधिक से अधिक मात्रा में इन ग्रंथों का वितरण करने का प्रयास कर रहे है तो आप सब से मैं यह निवेदन करना चाहता हूँ की आप सब प्रयास कीजियेगा इन ग्रंथों को बांटने के लिए भगवान कहते है अठारवें दिहार में सब से परे वो भक्त है जो मेरा ज्ञान देता है, दूसरों को ठीक है न, सब में वो है सस्ती और भगवान कहते ही वो व्यक्ति ये ज्ञान दूसरों तक को चाहता है, उसे शुद्ध भक्ति के रूप प्राप्त हो जाती है तो जो चीज कठिन है, वो सरल बन जाती है भगवान मंद की शरण तो आप सब जो धंदा करते हो, नौकरी करते हो, घर में हो प्रयास करो इन ग्रंथों को बाटने के लिए और भगवान आपके हृदय में विराजमान है परमात्मा के रूप में तो जब आपकी इच्छा यह होगी की हाँ, मैं भी भगवान की शिक्षा का प्रचार करना चाहता हूँ फिर भगवान आपके बुद्धि, आपको बुद्धि देंगे किस प्रकार आपको चर्चा करनी चाहिए, किस प्रकार बर्ताव करना चाहिए, किस प्रकार आप दूसरों को प्रभावित कर सकोगे आप देखोगे की जब आप की निश्चित कर लो कि आप ने गुरु पर पर भगवान के आदेश का पालन करना, सब भगवान आपको, भगवान, आपके जीप के द्वारा भगवान आपको बुद्धि देंगे आपको यह बताएंगे क्या बोलना चाहिए, क्या नहीं बोलना चाहिए जैसे जब बच्चा ड्राइविंग करता है तो उसके पिता पास बैठकर स्टेरिंग पकड़ते हैं, सिखाते हैं गाड़ी चलाने तो इस प्रकार जब हम ये भावना प्रकट करते हैं कि हमें सेवा करनी है तो भगवान हमें बुद्धि देते हैं किस प्रकार से सेवा को हम निभा सकते हैं केवल पहला कदम हमें उठाना है बस, बाकी सब कदम भगवान उठाने पर आप पहले कदम उठाने से डर जाते कोई तो समझ हम डर जाते हैं भगवान के शरणागत होने से, ज्यादा पास जाने से, दूर से ठीक है भक्ति ज्यादा नहीं जाना चाहते हैं क्योंकि हम सोचते हैं कि ज्यादा पास जाएंगे तो कुछ न कुछ चले जाए तो आप सब भक्तों से यह निवेदन है की आप गीता को पढ़िए, भगवत को पढ़िए के आप ने आप को इस प्रकार का उपदेश दिया है हर 1 पिषनभंदगतयाद करो रोज भागवत गीता और भागवत हम को पड़ा, भगवान की अर्चा विग्रह की पूजा करो, संतों की, संघ का लाभ उठाओ और इस प्रकार इस आशय में हो उ म आश्रय में रहते थे अब भक्ति के मार्ग में होने की तो कृपा करके इस शिक्षा का लाभ उठाओ और जीवन को सफल बनाओ हर कृश्णा हा, क्रिश्ना हारना हमारे हाहिहररहलेडमारल हाले।
More from PRASAD

Rare Pastimes & Timeless Lessons of Guru Mahārāja | Stories Every Disciple Should Hear

ISKCON Legends- pure devotees meet-HH Jayapataka Swami, HH Gopal Krishna Goswami, HH Radhanath Swami

Jagannātha Ratha-yātrā Through Śrīla Prabhupāda's Mercy | 29 April 2006 | Nairobi, Kenya

Lord Jagannātha's Appearance Pastime | 21.07.2019 | ISKCON Calgary | Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

The Ācārya Teaches by His Own ExampleGuṇḍicā Mārjana by Guru Mahārāja #shorts

Guṇḍicā Mārjana – Lord Jagannātha's Pastime | 21.7.2019 | ISKCON Calgary |Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

H.H. Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī Mahārāja - Exemplary Sādhana and Deity Worship # shorts

भगवान की कृपा कैसे प्राप्त होगी ? | 11 Jan 2014 | Punjabi Bagh | Srila Gopal Krishna Goswami

Material Education vs Spiritual Education | Srila Gopal Krishna Goswami #shorts

