भक्ति में भी सबसे ऊंची कोटि की भक्ति कौन सी है? BG 7.19 | 7 Jun 2004 | Mumbai Gopal Krishna Goswami

Gopal Krishna Goswami explains Bhagavad Gita 7.19 on the highest form of devotion. The purest bhakti is nishkama, offered without expecting material reward. He teaches the mantra Om Namo Bhagavate Vasudevaya and stresses that a guru, scripture, and spiritual community are essential for cultivating selfless devotion.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय, म नमो भगते वासु। देवाय कृष्ण। आज का विषय है भगवत गीता के साथ भी दहाई का, उन, लोक का संस्कृत, इस प्रकार ऐसी है भव नाम, ज्ञान व अंत ज्ञान। मम देव सवमिट का महात्मा सदुलहा बहुत ही प्रसिद्ध लोग हैं। इसका अनुवाद इस प्रकार ऐसी है अनेक जन्म जन्मांतर के बाद जिससे सचमुच ज्ञान होता है, वो मुझको समझ कारणों का कारण जानकर मेरी शरण में आता है, ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ होता है। भागवत गीता का उपदेश पूरे मानव समाज के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। आज सारे विश्व में अशांति फैल रही है और हम शांति प्राप्त कर, सकेंगे, सुख प्राप्त कर सकेंगे। भगवान के गत हो कर ये साथी दहाई के 1900 इस लोक में भगवान कह रहे हैं अनेक जन जन मंत्र के बाद जैसे सचमुच ज्ञान होता है वो मुझे चमत्कारों का कारण जानकर मेरी शरण में आता है। पिछले 4 लोगो में आप सुनते आये हो कि प्रकार के व्यक्ति भगवान की शरण स्वीकार करते हैं। 1 है जो दुखी है या पीड़ित है, दूसरा है, जो इच्छा लगता है या कोई भौतिक सुख सुविधा प्राप्त करने के लिए तीसरा है, जो जिज्ञासु है और चौथा जो ज्ञानी है। दूसरे शब्दों में जिसके पास अध्यात्मिक ज्ञान है, बुद्धि है, जिसके द्वारा उन बीड़ किया है, भरम भगवान की शरण लेने के इलावा और कोई उपाय नहीं है, भगवान ने समझाया है। साथ में 4 प्रकार के व्यक्ति मेरी शरण में आते है, 4 प्रकार के व्यक्ति नहीं आते। कई भगवान की शरण न आते हैं, क्यूँ की वो दुखी हैं, पीड़ित हैं। कई आते किसी प्रकार की भौतिक इच्छा को पूरा करना चाहते हैं, कई आते हैं, विव्याचुहैकहते है, चलो देखो क्या है, भगवान का सन्देश और चौथे हैं जो की ज्ञान के आधार पर भगवान के शरण स्वीकार करते हैं। तो भगवान कहते हैं ये चाह के 4 जो है, ये पुन्यात्मा है, क्योंकि कम से कम वो मेरी शरण में तो आ रहे हैं भगवान के नाम में, भगवान के विग्रह में, भगवान की शिक्षा में, भगवान की लीला में, इतनी ताकत है कि हम किसी भी विचार से भगवान के प्रति आये, इसका हमें लाभ भी है और नुकसान नहीं। 1 महान संघ ने कहा है की भक्तियों का जो मार्ग है, इतना प्रभावशाली है कि अगर कोई व्यक्ति इस मार्ग में आँख बंद करके भी दौड़ेगा तो वो नीचे नहीं करेगा। दूसरे शब्दों में ज्ञान या ज्ञान से किसी भी माध्यम के द्वारा हम भगवान की सेवा में जुड़े, उसमे लाभ भी है हमारा सम्बन्ध भगवान के साथ किसी भौतिक इच्छा को प्राप्त करने के लिए। पर जब हम भगवान की शिक्षा का पालन करे, चाहे भौतिक इच्छाएं हो। अंत में इस विधि के पालन का यह लाभ होता है की हमारा अशुद्ध हृदय जो है शुभ बन जाता है। जैसे की आपने ध्रुव। महराज की कथा सुनी होगी महाराज के पुत्र थे और उनके पिता की 2 पत्नियाँ थी। 1 दिन 5 साल का बालक ध्रुव पिता की गोद में बैठने का प्रयास कर रहा था, जबकि उनकी सौतेली माँ ने उन्हें नीचे गिरा दिया और कहा तुम पिता की गोद में नहीं बैठ सकते, क्योंकि तुमने मेरे घर से जन्म नहीं लिया। छोटा बालक था, सत्या खून था, राजा का बेटा था। आखिर, तो उन्हें यह अच्छा नहीं लगा। उन्होंने इस घटना को अपमान महसूस किया। वो रोते रोते गए अपनी माता के पास। और माता से। जब उन्होंने कहा, इस घटना के विषय में। व माता ने कहा बेटा मैं तो सहयोग नहीं दे सकती, पर भगवान दे सकते हैं। तुम्हारा सहयोग। राज ने कहा माता भगवान। तो मैं कहाँ खोजूं, ये घटना बीती थी हजारों साल पूर्व। तो माता ने कहा बेटा सुना जाता है की जंगल में आप भगवान को प्राप्त कर सकते हो। बेटे ने कहा ठीक है, मैं जाता हूँ जंगल में भगवान को ढूंढने के लिए, जैसे वो घर से निकल रहे थे, भगवान ने अपने शुद्ध भक्त मनी जी को वहाँ पहुँचा दिया। भगवत गीता में भगवान कहते हैं सर बस मैं हरे के हृदय में विराजमान हूँ महात्मा के रूप में और मेरे द्वारा भगवान का स्मरण करने की शक्ति प्राप्त होती है। और मेरे ही द्वारा व्यक्ति मुझे भूलता भी है। भगवान हृदय में विराजमान है। जैसे की आप अगर किसी बगीचे से गुजर कर जाते हो तो फुल को सुनने से पहचान लेते हो। किस प्रकार का फूल है? सच बात है। उसी प्रकार भगवान हरि के हृदय में, परमात्मा के रूप में वे राज मान है। और वो हमारी इच्छाओं को समझ लेते हैं। जब भगवान देखते है की सचमुच ही हम उन्हें खोजना चाहते हैं, उनको प्रसन्न करना चाहते हैं, उनकी सेवा करना चाहते हैं, तो हमें उसी प्रकार की संगत प्राप्त हो जाती है जिसके द्वारा हम निभा सके। और जब भगवान देखते है की हम भगवान को भूलना चाहते हैं तो फिर हमें उसी प्रकार की सुविधा संगत प्राप्त होती है जिसके दौरान हम अहान भगवान को भूल सके। भगवान हरि के हृदय में उपस्थित हैं। परमात्मा के रूप में। महाराज की इच्छा थी की अपनी सौतेली माँ को 1 सबक सिखाया जाए। उनकी इच्छा प्रकट हुई की मुझे 1 बहुत विशाल राज्य प्राप्त होना चाहिए और मैं यह राज्य को प्राप्त करूँगा। भगवान के सहयोग से नारद मुनि जी पहुँचे। वहाँ नारद मुनि जी ने कहा हे बालक। तुम कहाँ जा रहे हो? बालक ने कहा मैं तो भगवान को खोजने जा रहा हूँ। जंगल में मुनि जी ने कहा दुआ, ये तो भगवान को खोजने की उम्र नहीं है, ये तो खेलने कूदने की उम्र है। बुरी उम्र में भगवान को खोजना। रुआ ने कहा अगर आप मेरी मदद कर सकते हो तो मुझे उपाय दीजियेगा भगवान को खोजने के लिए। अगर आप इस विषय में सहयोग नहीं दे सकते तो मुझे अकेला छोड़। 2 जाने। 2 मुनि ने देखा की भक्त ये बालक बिल्कुल भगवान को खोजने के लिए, तो फिर उन्होंने उन्हें उपाय दिया। 1 दिया मंत्र मंत्र का अर्थ है जिसके उच्चारण से मन को शांति आये। अनादि काल से हमारे संत महात्माओं ने हमें मंत्र दिए है। जिनके उच्चारण से व्यक्ति शांति प्राप्त कर सकता है। 1 तो उन्होंने मंत्र दिया। उमन भगवते वासुदेवाय। फिर उन्होंने ये भी बताया की भगवान का रूप कैसे, मिट्टी और पानी से बनाया जाए, जिसका उन्हें चिंतन करना चाहिए। दूर महाराज ने जंगल में जाकर मधुवन जंगल ब्रज में है, वहाँ जाकर तपस्या आरंभ कर दी। पहले महीने हर 30 से दिन खाते थे। क्या फल जो की बंदर खाते हैं। जंगल में अगले महीने हर दिन खाने लगे, 6 दिन में 1 बार, 3 बार दिन में खाते है और 6 दिन में 1 बार खा रहे थे। सूखा घास, तीसरे महीने में घास खाना भी बंद कर दिया। के जल्द पड़े थे। इस प्रकार अपनी तपस्या को बढ़ाते गए, मंत्र का करते गये और फिर उन्हें भगवान। भगवान, उनकी तपस्या से और भावना से इतने खुश हो गए थे। भगवान ने स्वयं अपने आप को प्रकट किया, उनके समाज और दर्शन दिया और राज को फिर राज्य भी प्राप्त हुआ। यहाँ की उन्होंने 36 हजार सालो के लिए राज्य का ये घटना बीती थी। तो कहने का सात्रिय यह है की चाहे हम सकाम भाव से भी भगवान के प्रति शरणगत होने का प्रयास करे। अगर हम भगवान की सेवा में जुड़े रहेंगे, अगर हम मंत्र का उच्चालन करते रहेंगे तो हस्ते अस्ते हृदय की शुद्धि प्राप्त होगी। जिसके द्वारा अंत में क्या भगवत भक्ति ही जीवन का असली लक्ष। यहाँ भगवान कह रहे हैं आज के नाम, जन्म के बाद अनेक जन, जनमत के बाद व्यक्ति शुद्ध भक्ति को प्राप्त करता है। आध में हम भगवान के शरनागत होते हैं, चाहे किसी भावना से, पर अगर हम जुड़े रहे। भक्ति का इतना गहरा प्रभाव है की जीवन की समाप्ति से भक्ति का लाभ समाप्त नहीं होता। भौतिक स्थिति में उदाहरण के लिए मान लो आपने 10 लाख रूपये जोड़े है। बैंक में तो यह नहीं की आपके अगले जीवन में आपका बैंक 11 लाख से शुरू होगा वो 10 लाख यह ही रह जायेंगे और आपके और चले जाओगे। पर भक्ति के विषय में चाहे हम थोड़ा भी करे, 1 पर्स भी करे वो 1 पर्सन आपके साथ जाएगी। मान लो की आपने इस जिंदगी में 1 पर्सेंट भक्ति की है। तो अगला जीवन आप आरम्भ करोगे, 2 पर्सेंट के साथ मान लो आपने 50 पर्सेंट किया है तो ये 50 परसेंट आपके साथ जाएगा। जन्म जंतर बहुत सी जन्मित के पश्चात वो भाग्यवान व्यक्ति है कौन जो ये जानता है कि मैं हूँ समस्काणों का कारण तो बेशक आर मे हम किसी भौतिक कारण व भगवान के प्रति आकर्षित हूँ। भगवान कहते हैं घबराओ मत चाहे। 1 भौतिक चीजें भी चाहिए मेरे पास आओ और मेरे पास जुड़े रहो। अगर आपको धन भी चाहिए मेरे पास आओ। तो इस लोक में शुद्ध भक्ति की स्थापना की जा रही है। दूसरे शब्दों में यह बताया जा रहा है की जो व्यक्ति यह स्वीकार करे, ये परम भगवान हर चीज़ के कारण है। ऐसा व्यक्ति बहुत ही दुर्लभ है। दुर्लभ का फेक कठिनाई के साथ कठिनाई से जो चीज प्राप्त होती है तो कोई साधारण व्यक्ति कहेगा दुर्लभ है। यह मार्ग तो हमें इस मार्ग को क्या स्वीकार करने का प्रयास करना चाहे तो सफल होंगे ही। अगर हम प्रयास करेंगे श्रद्धा के साथ तो तो फिर सफलता की बहुत अच्छी संभावना है। भगवान गीता में कहते हैं की जो व्यक्ति प्रयास करते है, मुझे समझने के लिए उनमें जो कमी भी है उसे मैं दूर कर देता हूँ। जो गुण हैं उन्हें मैं रखता हूँ। जैसे की हम भगवान की बाल लीला के विषय में सुनते हैं। भगवान अभी बाल लीला करते थे। वृंदावन ब्रज में तो कईयों के मंदिर में घर में जाकर मन चुराते थे और पड़ोस की गोपियाँ शोधा माता के पास आती थी। शिकायत करने के लिए। आपका बेटा तो बहुत सारी है, हमारे घर से आकर मक्खन चुराता है। यह सोदा माता कहती थी, क्या हमारे घर में क्या मक्खन की कमी है? वो आपके घर से क्यूँ चुराए। पर शिकायत की ये शोध ने सोचा और मुझे 1 रस्सी लेकर मेरे बेटे शेतान लड़के को बांधने। 2 तो बात है ने 1 वीर रस्सी और जब रस्सी बांधने का प्रयास किया अपने बेटे को रस्सी के साथ रस्सी थोड़ी छोटी निकली तो उँगली फिर 1 रस्सी को किसी 1 और रस्सी के साथ जोड़ा तो भी वो छोटी निकाली, फिर 1 और रस्सी के साथ जोड़ा, वो भी छोटी निकाली तो माता निराश छोड़ी थी, सोच रही थी मैं इतना प्रयास कर ली बेटे को बांधने के लिए क्या अपनी शरारत बंद कर दे। पर हमेशा छोटी। फिर बेटे ने देखा कि माता निराश हो रही है, बेचैन हो रही है। तो बेटे ने माँ को बांधने दिया अपने आप को। तो कहने का अर्थ ये है जब भगवान देखते है की हम सचमुच ही उन्हें समझना चाहते हैं, उनके सरनगत होना चाहते हैं तो पूरा सहयोग देते हैं उस भक्त का की वो इस क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सके तो असली लक्ष। हमारा ये होना चाहिए कि हम उस स्थिति पर पहुँचे, यहाँ के हम परम भगवान के शरणागत हो जाए। और यही समझे की समस् कारणों के कारण कौन है। परम भगवान ब्रह्मा जी जिन्होंने सृष्टि का निर्माण किया ब्रह्मा जी ने। प्रार्थना जिसे हम समिति में प्राप्त करते हैं, उसने कहा ईश्वर फार्मा, कृष्ण का काना कहते हैं। ब्रह्मा जी की अनेक ईश्वर हैं, ये ईश्वर करते हैं जिसे किसी और आरोप वर्ष हो। जैसे की सरकार लोकल लेवल में भी सरकार है और पेडल सेंट्रल लेवल में भी सरकार है। तो अनेक ईश्वर हैं। पर में ईश्वर जिसके सब अधीन है वो केवल 1 ही है। और सर्व करना करना वो सब के कारण हैं, उनका कोई कारण नहीं है। तो भगवान बेशक आनन में हम कम बिचारते भगवान के अगर हम भगवान की शास्त्र की विधियों का पालन करते जायेंगे। तो सरकार भाव से हस्ते हस्ते। हम पहुँचेंगे निष्काम भाव पर और इस लोक में निष्काम भाव को प्रस्तुत किया जा रहा है। क्यूँकि निष्काम भाव के द्वारा भगवान के गत होना सबसे सर्वश्रेष्ट है, यह सबसे अच्छा है। बेशक हम सकाम भाव से पहले आरम्भ करें और अंतिम लक्ष्य ये होना चाहिए की हमें निष्काम भाव से भगवान की शरण स्वीकार करनी है। चेतन मीता की रचना 1 बड़े महान भक्त कृष्ण राज, कवि राज ने की थी। आज से 500 साल पूर्व इस क्षेत्र ने 76 में हमें चेतना महाप्रभु जी के दिव्य कार्य, कलापों, विलाओं और शिक्षा प्राप्त होती है। क्षेत्र की रचना 90 साल की आयु में आरंभ की। तो इस बड़े प्रसिद्ध ग्रंथ में 1 श्लोक है। इस प्रकार का कृष्ण भक्त नेसकामाअतएवशंता भुक्ति मुक्ति सिधि कामी सकाली। अशंता यह श्लोक सरल बंगला भाषा में है, बंगला भाषा बड़ी मीठी भाषा है और समझना कठिन नहीं है तो इस लोक में कृष्णदास कविराज कहते हैं? कृष्ण भक्त ने स्कामा जो कृष्ण भगवान के भक्त निष्काम है, जो निष्काम भाव से भगवान के चरनगतहोनेका प्रयास करते है वो हमेशा शांत रहते हैं। कृष्ण भक्त निष्काम शांत है वो हमेशा शांत रहते हैं और इसकी तुलना में दूसरे हैं अध्यात्मिक वाली जैसे भुक्त जो की मन का पालन करते हैं। और इसके बदले में कोई सुख सुविधा चाहिए, मुक्ति जिनको मुक्ति चाहिए। सिंधी आज प्रकार के योगिक सिंधिया है। आज इस कलयुग में इन योगिक सिंधियों को प्राप्त करना असम्भव है। पर प्राचीन समय में 8 प्रकार की योगिक सिद्धियां थी। जैसे 1 सिंधी है प्रप्ति सिंधी, प्रप्ति सिंधी के द्वारा आप 1 स्थान में रह कर अपने आज को किधर भी पिला कर, किसी वस्तु को उठा सकते हो। तो प्राचीन समय में कईयों को योगिक सीरिया चाहिए थी। 1 रुप से कई योगिक सिधिया आज विज्ञान ने प्राप्त कर ली है। किसी छोटी मात्रा और जिन्हें किसी प्रकार का भौतिक सुख चाहिए। ये सब जो है सदा अशांत रहते है। दुसरे शब्दों में सकाम भाव से जब आप जोड़ते हो, भगवान के प्रति अच्छा है। न जुड़ने से हजारों गुना अच्छा है। पर सकाम भाव से आगे है। निष्काम भाव से भगवान की शरण स्वीकार करो। निष्काम भाव स्थिति है जो की इस लोक में बताई जा रही है। जिसमें भक्त की यही इच्छा रहती है की मैं निरंतर सदा 24 घंटे भगवान की सेवा में जुड़े रहे। इसका यह अर्थ नहीं क्या आपको घर छोड़ने की आवश्यकता है या नौकरी या धंधा या नहीं? उदाहरण के लिए मान लो कोई व्यक्ति भी बच्चों के साथ रह रहा है तो किस प्रकार से निष्काम भक्ति करेगा। उसे ये सोचना चाहिए की पूरे खानदान में अध्यात्मिक वातारण होना चाहिए। अगर हम धन कमा रहे हैं तो अवश्य ही धन द्वारा आवश्यकताओं को प्राप्त करना है और आवश्यकता से अधिक जो भी सम्भव हो उसे हम भगवान की सेवा में लगा सकते हैं। जितनी मात्रा में सम्भव हो और बच्चे हैं, पत्नी है, सबको अध्यात्मिक ज्ञान देना है। जैसे की श्रीमद भागवत के पांचवे स्कन्द में भगवान रिशवदेव, भगवान विश्व देव, भगवान के अवतार है। भगवान अलग अलग समय में अवतरित होते हैं। सदा सदन के नियमों की स्थापना करने के लिए। तो आज ऐसी 5 हजारों हजारों साल को 1 राजा थे महाराज नाविक जिनकी पत्नी का नाम था मेरु देवी तो महाराज नाभि, मेरो देवी 1 यज्ञ कर रहे थे। इस भावना से की हमें भगवान जैसा 1 पुत्र प्राप्त हो। भगवान उनकी यज्ञ ऐसी तपस्या से बहुत ही प पसंद थे। उन्होंने कहा की अगर तुम्हे मेरे जैसा पुत्र चाहिए तो ये तो सम्भव है। भगवान जैसे कौन हो सकता है? तो मैं ही तुम्हारा पुत्र बन जाता हूँ। तो उनके खानदान में उन्होंने अपने आप को प्रकट किया। देव के रूप में। विश्व देव का संस्कृत में अर्थ सबसे प्रसिद्ध, सबसे अच्छा, तो विशदेव भगवान ने बहुत ही महत्व पूर्ण उपदेश्य दिया है जो की हम भगवत प्राप्त कर सकते है। तो विश्व देव भगवान कहते है की व्यक्ति को माता बनना चाहिए, पिता नहीं बनना चाहिए, गुरु नहीं। जब तक वो अपनी उलाद शिष्य को ये ज्ञान ही दे सके जिसके द्वारा वो जन्म मृत्य के बंधन से मुक्त है। दूसरे शब्दों में, जैसे हम माता पिता के रूप में समझते हैं, ये हमारी जिम्मेदारी है। बच्चों को अच्छी शिक्षा दे, अच्छी तालीम दे, उसी प्रकार इस भौतिक, तालिम और शिक्षा के साथ हमें यह प्रयास भी करना चाहिए क्या हम ने उनके रूप के विषय में समझाए, उनका कर्तव्य क्या है। और अगर हम छोटी सी आयु से ही ये ज्ञान देना आरम्भ करें तो फिर ये अनुभव होगा की बच्चे पढेंगे बड़े, अच्छे चरित्र के साथ अपनी भौतिक जिम्मेदारियों को समझते हुए और अपनी धाक जिम्मेदारियो को भी समझते हो। तो ये है देवजी का उपदेश्य। तो हमें यह स्थिति पर आना है की यह समझना की परम भगवान हर चीज़ के कारण है। यह है भक्त और भक्त की दृष्टि में अंतर। अब भक्त ये सोचता है की जो सबूत मुझे प्राप्त हो रही है, वो मेरे प्रयास के कारण मुझे प्राप्त हो रही है। भक्त ये सोचता है भगवान के कृपा से मुझे प्राप्त हो रही है। भक्त ये नहीं सोचता को प्रयास नहीं करना, सब भगवान ही करेंगे नहीं। भगवान ने अर्जुन से क्या कहा, तुम लो किस लिए? मेरी खुशी के लिए? 1 और जीव का सोचे बिना तुम मेरे निवास बनो, मेरा चिंतन करते हुए इस युद्ध में लगा। उसी प्रकार हम सब निष्काम भाव से भगवान के शरणागत हो सकते हैं। वो भाग्यशाली व्यक्ति है जो यह समझ पाता है कि परम भगवान हर चीज़ के कारण है। ऐसा व्यक्ति बहुत ही दुर्लभ है। परिवर्तन के लिए साधु संत की बहुत आवश्यकता है। ये जो शुद्ध भक्ति का ज्ञान है, ये शुद्ध भक्ति का ज्ञान कैसे हमें प्राप्त होता है, शास्त्रों के द्वारा, गुरु के द्वारा और साधु के द्वारा। शास्त्र का अर्थ है भगवान की वाणी। दूसरे शब्दों में हमें यह भूलना नहीं चाहिए की श्रद्धा फ्री मात्र की वाणी में और भगवान की वाणी में महान अंतर है। हमारी वाणी में अनेक प्रकार के दोष है। भगवान की वाणी में किसी प्रकार का दोष नहीं है। इसलिए आज भी हम भगत गीता पढ़ रहे है। आज भी हम भागुतगीताकी चर्चा कर रहे हैं। जब क्षेत्र महा प्रभु जी इस पृथ्वी पर आये थे, 500 साल पूर्व, वो भी गीता का उपदेश दे रहे थे। और यही उपदेश भगवान ने अर्जुन को भी दिया था। 5000 साल पूर्व, और यही उपदेश भगवान ने दिया था। सबसे पहले सूर्य के विवाह भी। दूसरे शब्दों में ये उद्देश्य है। यह दिव्य है इसमें किसी प्रकार की पूर्णता यह कमी नहीं। इसी लिए आज भी हम इस गीता का लाभ उठा सकते है, सुन सकते है, पढ़ सकते है। आप सब ने गीता के श्लोको को कितनी बार पढ़ा होगा। पर कभी कोई ये नहीं कहता की मैंने 1 बार सुन लिया, 1 बार पढ़ लिया और सुनने में आनंद नहीं। साधारण स्थिति में आप अखबार पढ़ते हो, पढ़ने के बाद फेंक देते हो, मैगजीन पढ़ते हो, पढ़ने के बाद फेंक देते हो, या बेच देते हो, या रखते हो, और भगवान की वाणी को जो हम गीता, बाइबल, कुरान, ग्रंथ, इत्यादि ग्रंथों में यह सब जितना ही पढ़े, उतना ही कम है, जितनी बार पढ़ेंगे, उतनी अधिक मात्रा में हम उसे समझ पायेंगे। तो इसलिए हमें शास्त्र द्वारा यह जिस काम भक्ति का ज्ञान प्राप्त करते हैं, फिर साधुओं के द्वारा। साधु का अर्थ है वो व्यक्ति जो की शास्त्र के धार पर जीवन को बिता रहा है, जिसका आचरण शुद्ध है, जो की आचरण अपने आचरण के द्वारा शुद्ध धर्म के नियमों को प्रकट कर रहा है। और जिसके हृदय में 1 ही मुख्य विचार है। किस प्रकार से हर व्यक्ति को सुखी बनाना? साधु जो है अपने मन का उपदेश नहीं देता, साधु जो है, भगवान की वाणी का वितरण करता है। और साधु की संगत से पापी से पापी व्यक्ति का उधर हो सकता है। साधुओं की संगत की आवश्यकता है। इसीलिए इसी के में कहा गया है साधु संत, साधु संत, सर्वस्य, मात्र साधु संगत, सर्व या लाभ मार्क अर्थ है 1 सेकेंड का चौथा हिस्सा। अगर आपको थोड़े से स्नो थोड़े से समय के लिए भी साधु की संगत मिल जाए तो इसमें आपका उदार हो सकता है, आपका परिवर्तन हो सकता है। आज से 5000 साल पूर्व 1 राजा थे जिनका नाम था महाराज परीक्षित, उनकी राजधानी थी हस्तिनापुर में जिसे आज हम दिल्ली के नाम से जानते हैं। और इस राजा को 1 ग्रामीण लड़के ने श्राप दिया था। इस 7 दिन के पश्चात आपका अंत आ जायेगा। राजा ने अनेक साधुओं को बुलाया, गंगा के तट, पर और इन सब माताओं से 1 ही प्रश्न पूछा। जिस व्यक्ति का अंत आने वाला है उसे क्या करना चाहिए। ध्यान से अगर देखा जाए तो हम सब को यह प्रश्न पूछना चाहिए। सच है की नहीं इस विश्व में कोई स्थान नहीं है जहाँ की किसी ने देखा हो की किसका अंत नहीं आया, चाहे आप अमेरिका में हो या भारत में या विश्व के किसी कोने में। हम सब जानते है की श्री ने जन्म लेकर समय के साथ नष्ट हो जाना है, अंत आने वाला है। उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए तो अलग अलग संतो ने अलग अलग उपाय दिया पर वहाँ शुकदेव स्वामी जी भी उपस्थित थे। शुक्र देव को स्वामी जी कौन है। व्यास देव जी के पुत्र व्यास देव जी भगवान के अवतार है जिस अवतार में उन्होंने वैदिक शास्त्रों की रचना की। शुकदेव स्वामी जी के पुत्र है और आत्मज्ञानी व्यक्ति थे। पैदा होते ही घर से रवाना हो गए थे और शुकदेव स्वामी ने कहा आपको किचन के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। और फिर उन्होंने इस श्रीमद भागवत का उपदेश दिया जिसके द्वारा हम भगवान के उपदेश, भगवान की शिक्षा और शुद्ध भक्ति के विषय में ज्ञान प्राप्त करते हैं। श्रीमद भागवत के सिकंद पढ़ते है की वेद शास्त्र की रचना की थी जिसके प्रस्तुत सत्र में महाभारत की रचना की। कम समझ सके जब भी वो निराश थे, संतुष्ट नहीं थे तो 1 दिन सासवती बैठे हुए थे, सोच रहे थे क्या है निराशा बेचैनी का कारण? जैसे सोच रहे थे, वहाँ पहुँचे उनके गुरु जी मुनि मुनि ने कहा कि तुम निराशा का यह कारण है कि तुम ने भक्ति के विषय में अधिक ज्ञान नहीं दिया और फिर उन्होने श्रीमद भागवत की रचना की। प्रथम सिकंद ऐसी बारहवे सेकंड तक इस विषय पर बल दिया गया है और भगवान श्री कृष्ण के विषय में ज्ञान प्रात करते हैं। पश्चात भाग्यवान व्यक्ति है जो की यह स्वीकार करता है क्या मैं हूँ हर चीज जैसे हम भागवत गीता के दूसरे ध्यान में सुनकर आये है। आत्मा सनातन है, शरीर नश्वर है तो अगर हम इस ज्ञान को अनुकूल करना आरम्भ कर दे। सूर्य ज्ञान भक्ति का जो ज्ञान है इसके द्वारा केवल लाभ ही है और नुकसान नहीं और महात्मा महात्मा से ऐसा व्यक्ति बहुत ही दुर्लभ है। आज समाज में हम देखते हैं की लोग करते है, महात्मा हो गए हैं और महात्मा के लक्षण क्या है। महात्मा का था सदा भगवान की सेवा में जुड़ा हुआ है, 24 घंटे भगवान की सेवा में जुड़े रहना चाहता है। 1 पर एक्शन का भी दुरुपयोग नहीं करना चाहता जैसे की 1 महान संत के पंडित ने कहा है क पीना ले होती ही चनक के पंडित से आप सब शायद परिचित होंगे। उनकी उनकी शिक्षा बहुत ही प्रभावशाली है, महत्वपूर्ण है। तो चने पंडित जी ने कहा की 1 क्रम का भी अगर आप 2 रूपयोग करोगे तो सारे विश्व के धन से उसे वापस खरीद कर नहीं ला सकते। 1 पल भी दूर उपयोग करे मान लो आपने अपने जीवन का 20 साल बर्बाद कर दिया कल काम में और आप किसी को कहो ये लोग 10 करोड़ रूपए मेरे वो 20 साल वापस लेकर आओ कोई रात सकेगा नहीं ला सकेगा। इसलिए शास्त्रों का यह निर्णय है की हमे 1 क्षण का भी दुरुपयोग नहीं करना चाहिए, हमें सदा सावधान रहना चाहिए और समय का सुदुपयोग करना चाहिए और दुरुपयोग नहीं तो जो महात्मा है वो 1 पल का भी दुरुपयोग नहीं करना चाहते वो हर पल, हर सुविधा का उपयोग करना चाहते हैं। भगवान की सेवा में क्यूँकी वो ये स्वीकार करते हैं की परम भगवान भोक्ता है वो ही हर चीज के स्वामी हैं और हमारी खुशी है उनकी खुशी में। जैसे कि जब आप भूखे होते हो तो आप के शरीर के सारे अंग कमजोर हो जाते हैं, पर जब आप खाना दाल के पेट में तो सारे अंको में ताकत आ जाती है। उसी प्रकार के 1 मात्र साधन के द्वारा, कृष्ण भक्ति के द्वारा, निष्काम भक्ति के द्वारा, आप अपने बुद्धि इंद्रिया सबको संतुष्ट कर पाओगे। इसलिए ये निष्काम भक्ति ही भगवत का निचोड़ है और गीता में भी भगवान अंत में यही स्थापित करते हैं की निष्काम भक्ति ही सबसे सर्वश्रेष्ठ है तो यही हमारा उद्देश्य होना चाहिए और अगर हम भक्ति के विडियों का पालन करते जायेंगे, शुद्ध साजों की हमें संगत प्राप्त हो और खास कर के जिनके ह्रदय में यही विचार है। संसार का उद्धार साधु के हृदय में ये विचार रहना चाहिए कि समाज का सुधार कैसे हो। आज समाज में शुद्ध संतों की आवश्यकता है जो की हमें मार्ग दर्शन दे सके, जो कि ये बता सके की पति पर जब पाप का भोजा बढ़ेगा तो उसका हमें परिणाम भी भुगतना पड़ेगा। जैसे आज की स्थिति में हम देख रहे हैं कितनी दुर्घटना बीती है, जिनका मूल कारन क्या है का बोझा पढ़ते जा रहा है तो भगवान इस लोक में यह स्थापित कर रहे हैं। नई हूँ हर चीज़ का कारण और सर्व श्रेष्ठ भक्त कौन है जो यह स्वीकार करता है की भगवान हर जीत के कारण है इसलिए मुझे हरजीत का उपयोग उनकी सेवा में करना चाहिए और निष्काम भक्ति सबसे सर्वश्रेष्ठ है और हमें प्रयास करना चाहिए कि हम निष्काम भक्ति पर पहुँच जाएंगे। हाई क्रिशन क्णाहािश हाल हह ह ह ल।
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