रूप गोस्वामी को श्री चैतन्य महाप्रभु का उपदेश | CC M 19.152 | 20 Aug 1997 | Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

In this devotional discourse, Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī expounds the teachings that Sri Chaitanya Mahaprabhu gave to his disciple Rupa Goswami, as recorded in chapter 19 of the Chaitanya Charitamrita (verse 152). The lecture weaves together several narratives and analogies to illustrate Mahaprabhu’s core message: the bhakti‑seed metaphor. Mahaprabhu instructed Rupa Goswami to renounce his government post, distribute his wealth (10,000 gold coins, boats, etc.) among Brahmins, Vaishyas and relatives, and use the remaining assets to free Sanatan Goswami from prison. The central teaching is that once a devotee receives the seed of devotion, it must be nurtured like a plant—watered with association (satsanga), service, humility, and constant remembrance of Krishna. The speaker stresses the dangers of "Vaishnava offenses" such as ego, jealousy, and neglect of fellow devotees, illustrating them with stories of Moga, a jealous Brahmin, and the need to view oneself as the most fallen. He also highlights the importance of collective temple building, pure conduct, and the role of kirtan, arati, and prasada in fostering unity. Throughout, the discourse repeatedly urges listeners to adopt a gardener’s attitude toward bhakti, to serve the Lord and fellow devotees with love, and to avoid any attitude that could hinder the growth of the bhakti‑seed.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमो भगवते वसुदेवाय नम भगवते waसuदेवायाकश्रीमात भागवत की वज हम क्षेत्र के के 2 श्लोक आज पढेंगे ये पहला श्लोक जो हम पढ़ रहे हैं। ये क्षेत्र महा प्रभु जी की शिक्षा है रूपा को, स्वामी जी को और मध्य इलाके 19 अध्याय का है श्लोक नंबर वन फिफ्टी टू माली करे विजारोपन के जले sign ज्ञान चक्छु, 10 मई श्री गरबेनमहाश्रीचेतानया मानो वे सम सaपितaमेnaभuतने स्वयम रूप कदामयमसदातिस्वापदंति काम बंदे हम श्रीगुरु श्रीवतापदकमन श्री गुरु वैशनबमशश्रीरुपं सग्राजतमसहागना लगुना तंगतमतम सजेवम सदबेशमसवधुतm priजlasaitm kishna chetna dev श्री राधा krishna lalita श्रीष खान तम शा हे कृष्ण करुणा सिन्धु धीनबंदजगपतेघोपेचा कोपी का कांता के कंचन गुलागे राधे वृंदावनेश्वरी कृषभानु सुत देवी हरि श्री कृष्ण चेतन्या रहू नित्या नंद हरे क्रष्ण हरे कृष्णा कृष्णा राम इस अध्याय में जैसे हम कह रहे थे। क्षेत्र के महा प्रभुजी रुप स्वामी जी को बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा दे रहे है। इस रूपक स्वामी ने अपनी सरकारी नौकरी त्याग दी। राजा की इच्छा नहीं थी के वो अपनी नौकरी त्याग। रूपक को स्वामी ने त्याग दी। और जब उन्होंने त्याग पत्र दिया नौकरी त्यागी। उनके बाद धन तो बहुत था। 10 हजार सोने के सिक्के थे 10 हजार और रूपा को स्वामी सनातन स्वामी गरीब नहीं थे, 10 हजार सोने के सिक्के के इलावा 10 हजार, 2 नाव, 1 ने 2 नाव उनको लेनी पड़ी जिसमे अपनी संपति को नाव में रख कर वो ले गए थे। फिर उन्होंने आधी सम्पत्ति बाँट दी, ब्राह्मणों को और वैश्म को 25 पर्सेंट और बात दिया, रिश्तदारों को बाकी 25 परसेंट रखा अपने लिए क्यूँ की। उन्हें पता था कि भविष्य में ये राजा उनको कर्ज देगा और फिर ये सम्पत्ति का उपयोग किया किसने सनातन गोस्वामी ने जेल से निकलने के लिए सनातन गोस्वामी को जेल में रखा था। तो उन्हें ये विश्व देनी पड़ी जेल जेल की पर को जेल से भागने के लिए कुजुपकसामिकीआकर मिले चेत्रय महाप्रभु जी को कहा। प्रयाग में प्रयाग में 10 दिनों के लिए क्षेत्रिय महाप्रभु जी ने चेतन रूप गोस्वामी को शिक्षा दी। और ये जो भक्ति रस सिंधु ग्रंथ है जिसकी रचना रूपक स्वामी जी ने की है ये आधारित है चेतन्य महाप्रभु जी की शिक्षा के ऊपर जो की उन्होंने स्वामी जी को दिया था। प्रयाग में महाप्रभु जी ने पहले तो कहा प्रबंध प्रमी कोनो, वानजी गुरु, कृष्ण कृपा, पाय, भक्ति, लता भी अनेक अनेक अनेक योनियों में गुजरने के बाद भाग्यशाली व्यक्ति है जिसके हृदय में ये भक्ति का बीज प्राप्त होता है। पत जी ने उदाहरण दिया जैसे कई बार पहाड़ की छोटी सी कोई लकड़ी का टुकड़ा नीचे आ रहा होता है पानी के प्रभाव से और आते आते। कई बार किसी पत्थर के कोने में वो रुक जाता है। तो जब भक्ति बीज रात हो जाए तो उसके बाद क्या करना चाहिए? वो उपदेश रूप गोस्वामी जी हमें यहाँ दे रहे हैं, वो कह रहे हैं जब किसी व्यक्ति को भक्ति बीज प्राप्त हो जाता है तो उसे चाहिए कि वो माली बनकर उस बीच को अपने हृदय में भोये जब भक्ति का बीज प्राप्त हो जाए। वो तो बहुत भाग्यशाली व्यक्ति है। हमें भूलना नहीं चाहिए की गीता में भी भगवान कहते हैं भावना जन्मनाम, अंत, ज्ञान, मान, सर्वमिति, महात्मा भाग्यशाली व्यक्ति है। भक्ति का बीज प्राप्त होता है। फिर भक्ति के बीज को पानी पिलाना पड़ेगा। जिस जब किसी व्यक्ति को भक्ति के बीच प्राप्त हो जाए, उसे चाहिए की वह माली बनकर, उम्र बीच को अपने हृदय में बोये। तो अगर हम माली बनकर इस बीच को नहीं बोयेंगे तो फिर ये भक्ति का बीज उगेगा नहीं। इसलिए इस विषय पर बल दिया जाता है की अगर हम चाहते है की भक्ति का जो बीज है, ये अंकुरित हो तो ये बीज को पानी पिलाना पड़ेगा। पानी पलाये बिना ये बीज पानी पिलाने का क्या अर्थ है? पानी लाने। पिलाने का अर्थ है जी। कहते हैँ भक्तों के संग में रह कर कितना का लाभ उठाना तातपरेमेंप्रवपाजी को समझाते हैं। कहते हैं भक्तों के संग में रहकर, शव लाभ उठाना, न के साथ प्रपात ने यह भी जोड़ा है ठाकुर जी की सेवा करना। पापा जी तारे उदाहरण देते हैं कि अगर कोई व्यक्ति सोचे की वो हरिदास ठाकुर की नकल कर सकता है तो इस कार्य में वह सफल नहीं होगा। राज ठाकुर जी को तुलसी के पौधे सामने बैठकर जाप करते थे। हमें यह में ठाकुर जी की सेवा का जो माध्यम है वो भी साथ में जोड़ा हुआ है। जिन्होंने ग्रामीण देश की सेवा करते हैं, आरती करके, भगवान के लिए भोजन बना के भगवान श्रृंगार करके और सारे भक्त ठाकुर जी की सेवा कैसे करते हैं? उनकी आरतियों में उपस्थित होकर जब हम भगवान की मंगल आरती में आते हैं, भगवान के आरतियों में आते हैं तो वो भी 1 रूप से हम भगवान की मूर्तियों की सेवा कर रहे हैं। इसलिए प्रौपर्जी ने ये जो माध्यम, ये गुरु महान चारियों ने माध्यम दिया है। तो सनम किर्तन ये भक्ति के बीज को पानी पिलाना, ये बहुत महत्वपूर्ण है। अगर हम इस भक्ति के मार्ग में आगे बढ़ना चाहते हैं। अब हम सब यह सुन बैठे है। ये कोई पहली बार नहीं है की आप सुन रहे हो, ये आप हजारों बार सुन बैठे हो। रिक्शा लेने से पहले भी हम सुन बैठते हैं। फसोस की बात यह है की हम इसके महत्व को नहीं समझते। तो पा जी कहते हैं गुरु प्रसाद की गुरु जो है वो दया दयालु इस दृष्टि से है की वो ये शिक्षा देता है। शिक्षक को क्या शिक्षा शिक्षा जिसके द्वारा से ए शवनमकृतनम का लाभ उठाकर भर्ती के मार्ग में आगे बढ़ सके। तो भक्ति के बीज को प्राप्त करना ही काफी नहीं है और इसको पानी भी पिलाना चाहिए। नहीं नहीं तो ये जो भक्ति का जो बीज है ये ये अंकुरित नहीं होगा। और ये शवनमकृषणमकाजो माध्यम है का अर्थ यह नहीं की हम हरिनाम ले और इसका यह भी अर्थ है की कृष्ण कथा में भी साथ में रूचि ले। कहने का यह है की हमें कृष्ण कथा कृष्ण के नामों में ही रूचि लेनी चाहिए। तो ही हमारा जो भक्ति का जो बीज है ये आगे बढ़ेगा। नहीं तो इस मार्ग में हम आगे नहीं बढ़ सकेंगे। तो इस लोक मैंने इसलिए चुना है क्यूँकि ये बहुत, बहुत, बहुत ही महत्वपूर्ण नहीं है में रूची लेंगे। अगर हम रुचि नहीं लेंगे तो फिर किन कार्यों में रुचि लेंगे? अत्या हरा पाया जन लोलियम। भक्ति विनती का अर्थ क्या है? ह नष्ट हो जाना, सनम कितने मैंने रुचि नहीं लोगे तो दूसरे कार्यों में रूचि लोगे और इन कार्यों के द्वारा जो भक्ति का बीज है वो नष्ट हो जाएगा। इसलिए ये शवनम कितना बहुत महत्वपूर्ण है। अभी शाम केतन के साथ हमें वैन अपराधों से भी बचना चाहिए। इसलिए मैं 1 और श्लोक आपको सुनाना चाहता हूँ। माँ का पता कहते है की किस प्रकार भक्ति के बीज को पानी पिलाने से जो धरती का बीज है, उगता है, उठता है और अंत में लोक वृंदावन में जाकर भगवान के चरणों में शरण लेता है। पर ये सब देने के बाद क्षेत्र में महा कह रहे है की वैष्णव अपराध के द्वारा ये जो भक्ति का लाभ है वो हाथ से फिसल जाता है। कहा है कि अगर हम वैष्णव भक्ति करते हुए वैष्णा प्राप्त करे तो जिस प्रकार 1 पागल हाथी सुन्दर बगीचे को नष्ट कर देता है, कुछ नम्बर प्रकार हमारी जो भक्ति है वो भी नष्ट हो जाती है। तो हम सब को व्यवहार में वन अपराध से डरना चाहिए। व अपराध का अर्थ क्या है? यह नहीं कि केवल गुरू, अपराध ऐसी 1 दुसरे के व्यवहार से भी बहुत सावधानी से व्यवहार रखना चाहिए। जो भी भक्त जो भी हो उसको आदर देना चाहिए। जितना महाप्रभु जी ने हमें कहा है देना ना तो मना देना कितना भी सदा ही बिल्कुल ऐसी भक्ति करो। अगर हम 1 दुसरे को आदर्श देंगे फिर और अगर हम 1 दुसरे के गुणों को देखेंगे फिर हम देखेंगे की वैष्णों का जो सम्बन्ध है वो बहुत मीठा रहेगा। वन अपराध से बचना जरूर चाहिए। जब अपराध किया अमृश महाराज मुनि को भगवान के चक्कर से बचने के लिए उन्हें दौड़ना पड़ा। अंत में वो जब भगवान के पास आये तो भगवान ने क्या कहा की मेरे भक्त बहुत है, मैं उनके हृदय में निवास करता हूँ और वो मेरे हृदय में निवास करते हैं। तो वैष्ण अपराध से हमें ज़रूर बचना चाहिए, वैन अपराध से आप कैसे बचोगे। अहंकार के कारण हम सब ये सोचते है की हमें पता है क्या होना चाहिए, कैसे करना चाहिए और हम किसी और को सुनने के लिए। इसलिए प्रभु जी कहते थे, खास कर के संस्था में यहाँ की अनेक भाग इकट्ठे रहते है की हमें 1 दूसरे के गुणों को देखना चाहिए, कमियों को नहीं। अगर हम 1 दुसरे की कमियों को देखेंगे तो ये सोचेंगे क्या की हम दूसरों से ज्यादा अच्छे है। और जब आप ये सोचते रहोगे की की आप दूसरों से ज्यादा अच्छे हो तो आपके मन में फिर अहंकार आ जाएगा और अहंकार के कारण फिर भक्ति के मार्ग में कोई न कोई अर्चन आ जाएगा। तो हम सब को यही सोचना चाहिए की मैं सबसे पतित हूँ। नरोतम ठाकुर की अगर आप रचनाओं को पढ़ो तो आप देखोगे की लगभग हर रचना में नरमराज ठाकुर जी कह रहे हैं कि मेरे से ज्यादा पतित कोई है ही नहीं। कहते है की नहीं मौसम पा के पति पवन हेतू तवा वतारा मौसम प्रभु न पाये। ब्यारा अब आये हो पतितों के उधार के लिए, पर मेरे से ज्यादा पति कोई है ही नहीं। कृष्णदास कविराज जी कहते है की अगर कोई मेरा नाम भी ले लेगा तो उसके सारे गुण नष्ट हो जायेंगे। अगर तुम नाम भी ले लेगा तो सारे गोड नष्ट हो जाएगा। तो अब हम भक्तों को ये सोचना चाहिए की हम इसको कैसे अपनाये। अपने व्यवहार में हम सब को ज्यादा मीठा कैसे बनाए। इसलिए मैंने चुना है। क्यूँकि ये अवश्य है कि मंदिर को आगे बढ़ाने के लिए भक्तों का संग बहुत मीठा हो। सबसे पहले तो इस मंदिर को आगे बढ़ाने के लिए यह आवश्य है कि हम श्रम नाम कितना के महत्व को समझे। जब तक हम श्रवण कृतन के महत्व को नहीं समझेंगे, इतनी बड़ी बिल्डिंग बनाने का कुछ लाभ नहीं होगा। क्यूकी? ऐसे बड़ी बड़ी बिल्डिंग है। तो बहुत व्यक्ति बना रहे है क्या वो इलाका है? वो छतरपुर छतरपुर में 1 बहुत बड़ा मंदर है, सब वहाँ जाते हैं दर्शन लेने के लिए। ठीक है न? अच्छी बात है और वहाँ से श्रवन कितना पर बल नहीं दिया जाता तो लोग प्रभावित होंगे हम सबके श्रवन कितन के द्वारा। और श्रम कितना का समय क्या? कौन सा समय है, सुबह का समय। मंगल। हमारा मान ने कहा कि मंगल आरती के भगत पंद्रह 17 भक्त आश्रम में विश्राम कर रहे थे, पंद्रह या 17 भक्त 2015 या 17 भक्त। मंगल आरती में नहीं आयेंगे, भगवान की सेवा नहीं। जब आप मंगल आरती में आते हो तब भगवान की सेवा भी करते हो। क्यूँकि? पिछले शो में प्रॉपर्टी ने स्पष्ट कहा की श्रवण किरन का अर्थ क्या है? स्व नाम कितना और ठाकुर जी की सेवा करना। तो ठाकुर जी की सेवा। हम करते हैं उनके उनका गुणगान करके, उनके सामने प्रणाम करके, उनके सामने नाच के, उनके सामने ताली मार के। तो वो कितना जैसे हमने कहा है। हम सबकी इच्छा है कि मंदिर में ही इस जाप करे। क्यूंकी इसका सबसे अधिक प्रभाव होता है। इसके द्वारा। भक्ति जो है, भक्ति का बीज जो है, वो उगेगा और अंत में जाकर। लोक वृंदावन में देने की संभावना है, पर भक्ति के मार्ग में भी आ सकती है। अगर हम सावधानी से भक्ति के मार्ग में नहीं चलेंगे प्रपात तो बहुत ही सरल उदाहरण देते थे, क्या या दाढ़ी बनाते, व सावधानी से दाढ़ी नहीं बनाओगे तो कट जाएगा। मो तो केवल भक्ति के मार्ग में प्रवेश करने से ये आवश्य नहीं है की अब भगवान के धाम लौट जाओगे। भक्ति के मार्ग में चलते हुए जो अनेक नियम है, जो 2 है, अपराध है, उन से भी हमें बचना चाहिए, इरा नहीं होनी चाहिए। अगर हम देखे की कोई भक्त भक्ति के मार्ग में आगे बढ़ रहा है की आग प्रकट कर रहा है तो ये देखकर हमें खुश होना चाहिए। यह नहीं कि हमारे हृदय में दूसरे की सफलता को देखकर इस हो। फिर हमें 1 दुसरे को आदर देना चाहिए, सबको आदर देना चाहिए। 1 बड़ा अच्छा तरीका है की आप सब 1 दुसरे को जब सुबह मिला 1 दूसरे को प्रणाम करो, 1 दूसरे को धनाबाद करो, यही नहीं की केवल सन्यासी जी को, सन्यासी जी को तो करना चाहिए। यह शास्त्रों का कहना है। पर आप 1 दूसरे को 1 दूसरे को भी प्रणाम करो, आप 1 दुसरे के गुणों को देखो और जब 1 दुसरे को पुकारो तो नाम के साथ प्रभु शब्द को जोड़ो यह बहुत फल पाते हैं। आप इन बातों को लाखों बार सुन बैठे हो। अफसोस की बात है कि लाखों बार सुनी इसका का उपयोग भी कर। प्रभु का क्या मास्टर हमारे स्वामी किसको स्वामी स्वीकार करना नहीं चाहते आकार के कारण हम सोचते हे प्रभु बनना चाहिए सबका हमादूस तो प्रयास करना पड़ेगा। तो 1 दुसरे को प्रभु बुलाना चाहिए, 1 दुसरे को प्रणाम करो, 1 दुसरे के गुणों को देखो और अगर कमियों को देखो तो आँख बंद कर लेना चाहिए। नहीं अगर कमियों को देखो तो निमृत विचार से वो आप सुना सकते हो ये नहीं कह रहे हम अगर किसी कमियों को देखो तो आँख बंद कर लो। नहीं गलत नहीं समझना पर अगर आप 1 दूसरे के गुणों को देखोगे फिर आपकी भक्ति आप दुसरो को खुद खुद आदर। दोगे ये भक्त कितने सालों से सेवा कर रहा है ठीक है सेवा तो कर रहा है तो थोड़ा तो है कम से कम थोड़े सालों इतने सालो से सेवा कर रहा है। और हम हमें भी अपने आचरण के द्वारा बड़ा सुन्दर व्यवहार करना चाहिए और वैष्णव अपराध वैश्नव निंदा से डरना चाहिए। किसी को यह नहीं सोचना चाहिए की अगर वैष्णव अपराध करके भी बच जाऊँगा। चेतना महा प्रभु जी ने मोगा से क्या कहा था 1 समय उन्होने स्वीकार कर लिया स्वयं भगवान है ा ने स्वीकार नहीं किया मोगा महाप्रभु जी की निंदा करता था जब चेतन महाप्रभु जी खाना खाते थे सर्व चारिया के घर में तो 1 दिन अंदर आकर मोगा ने देख लिया अक्सर जब केतन प्रभुजी खाना खाते थे मोगा के घर में तो सर्व चारिया डंडा लेकर खड़े रहते थे। द्वार पर की आम होगा अंदर नहीं आ जाए उनके खाते समय पर 1 दिन उनको अपनी पत्नी का सहयोग देना पड़ा और मोगा ने अंदर आकर देखा हाँ 15, 20 सब्जियाँ दाल वगैरह चेतने महाप्रबुजीके में पड़ी हुई थी समोनोबदचायाकी पत्नी बनाती थी खाते थे बिल्कुल थोड़ा तो मोगा ने कहा देखो किस प्रकार का सन्यासी है तो मोगा को बहुत गहरी बीमारी हो गयी कोलरा मरने वाले थे प्रभुजी गए उनके पास और अपना हाथ रखा उनके हृदय में, और उन्होंने कहा जब तक तुम्हारे हृदय में इर्षा रहेगी भगवान वहाँ नहीं रहेंगे। जैसे आपको गद्दे कमरे में रहना अच्छा लगता है आपके कमरे के आगे कोई कचरा फेंक दे रावण सोना पसंद करोगे नहीं करोगे तो इसी प्रकार इर्षा नहीं रखनी चाहिए और इर्षा को कैसे निकालोगे इन सब से बचने के लिए 1 ही उपाय है और केला भक्तों के सुन्दर व्यवहार रखने के लिए, 1 दुसरे के गुणों को देखो, 1 दुसरे को आदर, 21 दुसरे का उत्साह बढाओ हम सबको 1 दूसरे का उत्साह बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए, प्रपा भक्तों का उत्साह बढ़ाने का प्रयास करते थे, उत्साह बढ़ाने का यह अर्थ नहीं। अगर आप काम कर रहे है तो कुछ बोले नहीं। 1 साथ ठाकुर सेवा करते हैं, आरतियों में उपस्थित होकर, फिर 1 साथ और क्या करते हैं, प्रसाद स्वीकार करते हैं या 1 साथ प्रयास करें। यह नहीं कि हम अलग समय, खायेंगे वो अलग समय, कई बार, कभी कभी इमरजेंसी में मजबूरन, वो अलग बात है, वैसे प्रयास करना चाहिए। प्रसाद प्रसाद का भोजन जो भगवान को अर्पण किया हो, वो भी अगर हम प्रसाद दिखाए 1 साथ। तो इस प्रकार भक्तों में, भक्त में यूनिटी पड़ेगी 1 गुरु ने प्रॉपर्टी उदाहरण देते थे। आप लकड़ी के 1 टुकड़े को लो और किसी को 2 आप आसानी से तोड़ सकते हो, जल लकड़ी के छड़ियाँ, अगर आप लकड़ी के छड़ियों को लेकर तागे से बांध। 2 किसी को बोलो तोड़ने को तोड़ सकेगा नहीं तोड़ सकेगा। तो इसलिए हम सब को अगर हम वैश्नव व्यवहार बढ़ाने का प्रयास करेंगे, ज्यादा सुन्दर बनायेंगे, वैशन सम्बन्ध बढ़ाने का प्रयास करेंगे। फिर ये एकता जो है वो पढ़ेंगे, फिर आप 1 दूसरे का उत्साह बढ़ाओगे और 1 दुसरे के उत्साह बढ़ाने से ये देखोगे की सब भगवान के धाम लौटने की योजना बना रहे हैं। तो जैसे चेतन्य महाप्रभु जी ने मोगा से कहा इर्षा हृदय से निकालो 1 और कथा है चेतन 1 ब्राह्मण था जिसके हृदय में इर्षा थी श्रीनिवास के प्रति, तो 1 दिन उन्होंने के घर के सामने ये समान रख दिया, शराब वगैरह ये दिखाने के लिए कि दुर्गा का उपासक है और भगवान कृष्ण का ही इस को अगले दिन सुबह शिवाजी ने अपना दरवाजा खोला, दोनों ने देखा की अपने दरवाजे के आगे क्या था दुर्गा की सेवा का सब समान। शराब की बोतल वगैरह दोनों ने पड़ोसियों को बुलाकर कहा देखो मैं दुर्गा का उपासक हूँ, और किसी ने विश्वास नहीं किया। खैर थोड़ी देर बाद जिस ब्राह्मण ने यह किया था उसको बहुत गहरी बीमारी होगी की वो गए क्षेत्र महा प्रभु जी के पास यह कहने के लिए की मुझे माफ़ कर 2 मा प्रभु जी ने उसे माफ़ नहीं किया, वो धरे गए, फिर अंत में महा प्रभु जी ने उन्हें भेजा शिवा के पास, फिर उनकी जो बीमारी है, इंशा इन सब से बचना चाहिए। और इन सब से आप बचोगे अगर आप अपने हृदय में समझो की आप सबसे पति हो, आप सब से कम में हो, अगर आपको कैदे निकम में हो तो आप क्या महसूस करते हो, अपमान है न, पर आपके मन में यह सोचना चाहिए की मैं बिल्कुल निकम्मा हूँ, मेरे में 1 बूंद भक्ति का प्रेम नहीं है, और वैष्णों के आशीर्वाद से, गुरु के आशीर्वाद से, साधु के आशीर्वाद से, यह भक्ति में मैं आगे बढ़ूँगा। तो आप सब भक्तों से ये मैं निवेदन करना चाहता हूँ की इस मंदिर के भक्त 1 दुसरे के गुण को देखे, 1 दुसरे को प्रणाम करे रोज और 1 दूसरे का उत्साह बढ़ाने का प्रयास करे और किसी के प्रति इशा वगैरह रखने की कोई आवश्यकता नहीं है और ये सोचो सचमुच कोई नहीं है, कोई योग्यता नहीं है और निमृत विचार से अगर आप सेवा करने का प्रयास करोगे तो आप देखोगे की इसके द्वारा आप की भक्ति भी आगे बढ़ेगी और दूसरों की भक्ति भी और जो मंदिर का वातारण है वो ज्यादा सुन्दर बनेगा और फिर सुन्दर मंदिर सुन्दर वातावरण लोगों को प्रभावित कर सकेगा जैसे की 1 समय मैंने पापा जी को 1 नई पुस्तक दिखाई दी छापकर तो प्रपज ने पुस्तक को देख कर कहा आज बोक्स क्वालिटी इनसाइड क्वालिटी आउटसाइड मतलब यह था प्रापाजीका कहना की हमारे ग्रंथों की जो छपाई है, ये भी ऊँची क्वालिटी की है और जो अंदर मैटर है वो भी बहुत ऊंची क्वालिटी का है तो उसी प्रकार हमें यहाँ मंदिर तो भगवान की ऐसी प्रापा की तरह ऐसी सुन्दर बहुत बन रहा है, भक्तों को भी बहुत सुन्दर बनना है और जब भक्त भी सुन्दर होंगे, मंदिर भी सुन्दर होगा तो क्या परिणाम होगा वह कौन सा था, पापाजी ने मंदिर में कहा था हेवननअ्द पी पर स्वत कहते थे, ये जो मंदिर है, ये बॉम्बे दली, लन्दन, न्यूयार्क में नहीं है, पर ये धाम में है, वकुंतधामकावातवरण बनाना पड़ेगा और ये बात रन बनाने के लिए कोई भारतीय आदमियों को बुलाने की आवश्यकता नहीं है, धन की आवश्यकता नहीं है किस चीज़ की आवश्यकता है आचरण शुद्ध, साधना और फिर भी आप अपने जीवन को सुधारोगे और बुरे वातवरण को सुधारोगे नहीं तो हम भक्ति में आगे नहीं बढ़ सकेंगे। शायद उस दिन मैंने आपको कथा सुनाई थी, भक्त या सुनाई थी और बम्बे में भक्ति सुरांधजीने कथा सुनाई थी की शादी की बारात नदी के पास जाना था, सारी रात नाव चला रहे थे, वो नाव हिली नहीं मन ते क्यूँ क्यूँकि लंगर लगा हुआ था। तो जब तक हमारा लंगर लगे रहेगा, ये भक्ति की नाव आगे नहीं चलेगी और अब ज्यादा समय नहीं बचा आप ये उपदेश बहुत बार सुन बैठे हो, पर अब तो बहुत कम समय बच गया है तो हम जल्दी से ये जो बहुत लंगर है, इसको उठाना है और इस शिक्षा का पालन करना है भक्ति के आनंद को महसूस करने के लिए और बिल्कुल वकुंधानकावातण यहाँ स्थापित करने का प्रयास करना चाय। हर क्रश, हर क्रिष्णा, हार क्रिष्णा क्रिश्ना ह हे हर लहलेनारहलेहले।
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