सनातन गोस्वामी की विनम्रता | CC Madhya 20.99 | 24 Dec 2000 | New Delhi | Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

The video is a Hindi devotional discourse featuring multiple speakers (A, B, C) who recount the life and humility of Sanatan Goswami, a revered saint in the Gaudiya Vaishnava tradition, and then transition to a collective call for intensified distribution of sacred texts, especially the Bhagavad‑Gita. The speakers narrate anecdotes illustrating Sanatan Goswami’s modesty, his encounters with a Muslim ruler, imprisonment, renunciation, charitable deeds, and his teachings on bhakti and proper conduct. Following this biographical segment, the talk shifts to practical devotional work: urging devotees to increase the volume of book distribution during the December ‘Maharaj‑Mandal’ effort, describing a marathon‑style campaign, setting targets (e.g., 25 % progress, 32 % plan, 20 lakh copies), and emphasizing that spreading the Gita is the highest service (seva). The speakers repeatedly stress the need for sustained enthusiasm, community participation, and answering existential questions posed by the Swami (who asks about self‑identity and liberation). The overall message blends reverence for a saint’s example with a motivational appeal for collective action to disseminate scriptural wisdom for societal peace and personal liberation.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय, नम भगवते वासुदेवाय।
था, ज्ञान है, हाई स्कूल के बराबर, भाव का, ज्ञान है कॉलेज के बराबर और जञानहै। तो खैर हमे ये श्लोक लिखा है आजकल दिन हफ्ते ऐसी हमें आदि जिला का तो श्लोक जो लिखा है बोर्ड में ये मदेरिलासेक्शन ऐसी है
कि पतित
अधम कूपे परिपनायनुजनाम नीट, संगी, पति का अधम, बी, शया, कूपे परि गुना, जनम संग, पति का अधामगोभीशयाकूपे, परि नान, जनाना श्लोक का उच्चारण। सनातन को स्वामी जी कहते हैं और
इस
में स्वामी जी को भारती के सम्बन्ध में बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा दे रहे हैं। परिवार में जन्मा था और मेरी संगीत भी निम के लोग थे स्वयं पी हो सारा जीवन में, भौतिकता के कुए में, असम में जन्म हुआ था ग्रामीण खानदान में और वो अपने भाई रूपक के साथ बंगाल में वास कर रहे थे। इस समय तो बंगाल का 1 हिस्सा हिंदुस्तान में है और बंगला देश में, और कुछ समय पूरा बंगाल 1 ही भाग था, 1 ही भाग में भारत वर्ष था
और दिन रात कृष्ण कथा
करते थे बंग्लादेश में भी इस समय भी अनेक की के स्थान है यहाँ के वैशरामसंतोकी समाजी है, भजन कुटिर हैं अनेक स्थान है
जो रुपो रात दिन
रात कथा करते थे बंगाल में 520 साल पूर्व वहाँ से मुसलमान राजा बन गया 1 मुस्लिम व्यक्ति राजा बने का नाम था नवाब नवाब भुसेंशाराजा बने जो राजनीतिक ज्ञान अच्छा था उनके पास उन्होंने
देखा की प्रजा को है बिल्कुल लगभग
सिंधु राजा है मुसलमान तो उन्होंने सोचा की अपने राज्य को चलाने के लिए मुझे ऐसे व्यक्ति को चुनना चाहिए सरकार चलाने के लिए जिनके प्रति का आदर हो और सदा तो उन्होंने खादी खोजा लोगों से पूछा कुछ स् सबने कहा कि जो आदर इन 2 भाइयों को समाज में मिलता है वो किसी और को नहीं मिलेगा आप इन लोग व्यक्तियों को निमंत्रण दीजिये सरकार बनाने के लिए।
तो पहले जब राजा ने इन 2 भाइयों से निवेदन किया ये जो भाई
थे उन्होंने इनका शिकार उन्होंने कहा तो राजनीतिक कार्यों में कोई रुचि नहीं है कथा
पर राजा ने उन्हें कहा नहीं नहीं तुम को 1 जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी और अगर तुम जिम्मेदारी नहीं उठाओगे तो
मंत्रों को में दूंगा से उन्हें जबरदस्ती यह नौकरी स्वीकार करनी पड़ी।
खैर राजा कभी हिंदो भाइयों के साथ
बहुत गहरा स्नेह है और राजा ने
भी उन्हें सुविधा को पूरी ली थी। पहले तो
स्वामी जी ने भी सरकारी नौकरी थोड़े समय की नौकरी की थी और फिर उन्होंने इस समय को पत्र लिखा था जिसमे उन्होंने कहा की मेरी रुचि नहीं है। इस नौकरी में महादजी ने कहा
और
थोड़ी देर काम करो तो काम करते गए। और इसी विचार से की ये सेवा है भगवान के प्रति। जैसे की ने 1 उदाहरण दिया था, इस उदाहरण उपयोग भागवत गीता की भूमिका में किया है उदाहरण हैं जिस प्रकार
1 विवाहित का अगर कोई प्रेमी हो तो भौतिक दृष्टि से तो कार्य करेगी
जैसे की वो बड़ी जिम्मेदारी से,
मन
के द्वारा क्या सोचेगी की क,
दूसरी प्रकार की महारज ने कहा
नौकरी करते समय तो न करो।
स्वामी ने नौकरी छोड़ दी थी। पहले और थोड़ी देर बाद गो स्वामी जी ने भी
जिम्मेदार नौकरी भी छोड़ दी थी।
असल में सबसे पहले सनातन गोस्वामी ने
राजा को यह सूचना भेजी थी की मैं बीमार हूँ में स्वामी जी की और के साथ बैठकर क्या कर रहे थे, भागवत का अध्ययन कर रहे थे, तो राजधानी बंगाल छोड़ कर युद्ध करने जाना था। दूसरे थानों में और वो बिल्कुल निर्भर था। पहले 2 भाइयों के ऊपर 1 भाई ने तो छोड़ दिया, अब बच्चे केवल 1 ही भाई।
तो राजा ने अपने डॉक्टर को भेजा
शनाधरकोस्वामी देखने के लिए की क्या कितनी गहरी बीमारी है, क्या इस प्रकार के इलाज की आवश्यकता है। तो जब वो आये स्वामी जी के
डॉक्टर दोनोंने क्या देखा देखा की स्वामी तो ठीक है, ठीक है, और वो
अनेक और के साथ क्या करना है भाग का अध्ययन कर रहे हैं।
तो फिर
जब ये सूचना पहुँची राजा बड़े क्रोधित हुए, उन्होंने को क्या किया, गिरफ्तार करके जेल में और फिर छोड़ कर चले गये। दूसरे स्थान में ले चले
सनानंस्वामीजेल में थे।
जब के समिति ने अपनी सरकारी नौकरी
जारी थी, तो उन्होंने जून की सम्पत्ति से
बड़े अच्छे तरीके से बात।
उन्होंने आदि सम्पत्ति
बाटी ब्राहमणों को जब
हम दान दें सर, हमें दान ठीक
सा में देना चाहिए। अगर दान ठीक सा में दे तो उसका हमें लाभ पहुँचता है जी को आकर्षित करने के लिए। 1 वैसा 1 मुसलमान जमींदार ने
जो
वो लाश को भेजा था, इस विचार
के साथ क्यूँकी प्रकार सी हरी दास को रिश्ते में जोड़ेगी और हरी हो जाएगी।
हिला ठाकुर की पवित्रता का पड़ा वैश् ने तीसरे दिन स्वीकार कर लिया कि मैं यहाँ क्यों आई हूँ, मुझे किसने भेजा है। और वो खरीदा की पवित्रता से इतनी
प्रभावित हो गयी थी की उन्होंने निहारी नाम का चालन आरम्भ कर दिया और यह बीड़ा कर लिया की न्होंने देवी 3 बार करना है। तो उन्होंने जाकर अपनी सम्पति बात दी थी और उन्होंने भी अपनी संपति दबा दी। ब्रामणो।
तो स्वामी जी ने आधी सम्पति पनी बाट दी ब्राहमण के पास,
उन्होंने रखा रिश्तेदारों के लिए, उन रिश्तेदारों को बाटा और 25 ने रखा भविष्य में। अगर कोई आवश्यकता पड़ी मजबूरन कार्य के लिए, तो 1, 25 पर्सेंट का लाभ उठाया स्वामी जी ने। 1 बनिये के पास की है संपत्ति। और फिर वह किसी प्रकार से
तो
भागवत दूसरे में समझाते है।
किस प्रकार अलग अलग दान का अलग
अलग प्रकार का परिणाम होता है या लाभ होता है।
उदाहरण के लिए समझो कोई वक्ति दान
दे, किसी को भी जो दान दोगे उतना ही आपको मिलेगा समझो आप दान। 2 किसी ग्रामीण को तो आपको हजार गुना अधिक लाभ मिलता है, या हजार गुना ज्यादा बदले में वापस आता है। और अगर आप वेद कहा गया है कुछ सब व्यक्ति के लिए जो की 24 घंटे भगवान की शुद्ध सेवा में जुड़ा हुआ है, उसका दान 2 बदले में साफ़ होता है। ये है श्रीमद भागवत।
तो स्वामी
को करके ने धन्यवाद दिया
को सूचना मिल गयी थी कि वहाँ
पहुँच रहे है कहाँ
कहाँ
तो उनकी भावना थी की खेत मे महा बाबुजी को जा कर मिले।
दोनों ने पहले तो निवेदन किया था की हमें छूट 2 जाने 2 भाई तुम जाओगे तो राजा ने पकड़ लेगा, तुम सुधर नहीं जाते हाँ तो ओके तो उनके पास सोने के सोने के
थी के स्वामी जी स्वामी ने किसी
पर ऐसी जेल से कुछ देकर वहाँ
से निकले जेल से वो जा रहे
थे कहा महा को मिलने के लिए
और रास्ते में 1 सेवक उसके साथ
था जिसका नाम था उसे
1 सेवक साथ में था जिसका नाम था इशान के पास अपने डेट में 8 सोने के सिक्के थे और रास्ते में वो
रुके साथ हो गयी थी के जमींदार के घर में जिसके घर में
1 बड़ा प्रसि जोशी भी था और वो जोशी
दूसरे के चेहरे को देख कर ही अंदाजा लगा लेता था। ये कितनी संपत्ति है इसके पास?
तो जब सुना स्वामी जी इस व्यक्ति के घर में रहने के लिए आये तो जोशी ने कह दिया था इस
जमींदार से, यह बड़ा धनी यात्री है इसके पास 8 सोने के सिक्के हैं।
तो ये जमीन की बड़ी देखभाल कर रहे थे।
बड़े बहुत ही आदर दे को और
क्यूँ की राजनीतिक कार्यों का जी को शक हुआ
जैसे आज को मत करे
दादा थोड़ा शक नहीं हो जाता।
आपको जरूर चाहिए ऐसी पूछा। अरे भाई तुम धन तो साथ नहीं
रख रहे
झूठ बोल दिया कि है
आज के बजे उसे तो उस में कुछ हम साथ लेकर कुछ होटल के
मालिक को दे दिया
हो।
हो के मालिक असल में शर्मिंदा हो गए। उसने कहा तुम्हे लूटने वाला था, मुझे सूचना मिली है कि तुम्हारे ने खुद मुझे ये सोने के सिक्के दे दिया।
तुम नहीं लोगे मेरे से तो रास्ते में कोई और मुझे मार कर ले लेगा। दूसरे तो जबरदस्ती से देकर स्वामी जी निकाले
और होटल के मालिक के थोड़े
के झूट का दिया था उसने
गोस्वामी जी न्होंने वापस घर भेज दिया।
रास्ते में
गोस्वामी जी रुके उनकी बहन के पति के घर में जिनका नाम था श्रीकांत।
श्रीकांत के पास काफी सम्पत्ति थी, राजा
ने उससे 3000 सोने के सिक्के दिए थे घोड़ों को खरीदने के लिए।
तो शिकार जब उनके घर में रुके, जब श्री काम के घर में रुके क्यूंकि राजा से छुक छुक कर जा
रहे थे और मिलने के लिए
की दाढ़ी उग गयी थी।
जैसे मोहल्ला की मुसलमानों की दाढ़ी उग जाती है।
वगैरह तो शरीका ने कहा
अरे भई
बना लिया है आपने
छोड़ो ये सब
मेरे स्वामी ने सरकारी नौकरी क्या थी। जहाँ उनको हजारों सोने के मिल रहे थे। उनकी कोई रुचि नहीं थी। उन्होंने 1 के रूप में चंद्रशेखर के आगे वहाँ जाकर, वह द्वार पर खड़े हो गए।
और वह प्रभु
स्वामी गए है।
जो उन्होंने चंद्रशेखर को कहा वहाँ जाके देखो। वहाँ 1 शांत खड़ा है चंद्रशेखर जब
बाहर आये उन्हें कोई,
उन्हें तो 1
ही संग दिखे मुसलमानो जैसे दाढ़ी के साथ। सुन ने ये सोचा 1 मुसलमान व्यक्ति हैं।
सुन ने जाकर कह दिया की कोई नहीं है वहाँ केवल 1 मुसलमान।
मला जी
जी ने कहा वो सर्जन जो वहाँ खड़े हैं, माला नहीं और
बड़े प्रसिद्ध भक्त है। फिर वो अंदर आये।
स्वामी महाकवि ने गले में बड़े प्रेम
के साथ भर सनातन साथी है।
और जब चंद्रशेखर ने देखा की कितने प्रेम से भगवान है, श्री कृष्ण के राधा स्वयं भगवान है। देखा कितने प्रेम से के साथ महा ने गले लगाया है।
ये देख कर वो आशिक हो गए
जरूर व्यक्ति को खास
है।
स्वामी जी समझ गए क्या
उनके नए सागर की ओर देख रहे थे, तो
समझ गए महा समुझे इस महंगी चादर
से खुश नहीं है। आखिर स्वामी जी ने सब धर्म, संपत्ति सब ज्यागी उन्होंने निर्णय किया था। मैंने तो मधुकरी के द्वारा जीवन बिताना है। मधुकरी का मतलब आप ग्रामीणों के घरों से, रोटी के घर से, घर से में, और उन्होंने पहनी भी बड़ी महंगी
गंगा के किनारे वहाँ 1 बुरा व्यक्ति
रा कंबल के साथ।
और स्वामी जी ने कहा की हाँ के महंगे कम्बल के बदले में मुझे
आपका फतावा कम्बल दे। 2 और कुछ व्यक्ति ने क्या
कर
लिया क्या आप 1 महंगा कम्बल फटा हुआ है है। उन्होंने स्वीकार कर लिया स्वामी जी के महंगे कार किया, स्वामी पहुँचे थे,
कपड़े
गन्दे हो गए थे, फट गए थे, थी। तो ग्रामीणों ने कहा की हम आपको नए अच्छे लाल
ने ही मुझे देना है।
तो पुराने वस् के उन्होंने पुराने बर्तन
से अपने कपड़े बनाए जितने महाबली बहुत प्रसन्न हुए थे। ये देख कर की सनातन गोस्वामी ने
स्वीकार कर ली।
चेन महाकोबुजीने इस प्रकार से कहा स्वामी
को स्वामी जी के द्वारा यह संदेश हम सबको प्राप्त हो रहा है।
चेतन महा कोबुरी ने कहा 1 अच्छा डॉक्टर इस मही का इलाज करता है तो वो बीमारी का जो कारण है उसे नहीं रहने देगा, शरीर में अगर वो डॉक्टर बीमारी को के कारण को रहने देगा तो फिर से बीमारी हो जाएगी, इलाज नहीं होगा। तो कहने का यह था की जब हम भर्ती के मार्ग में प्रवेश करते हैं तो हमें किसी प्रकार के भौतिक
आकर्षण को नहीं रखना चाहिए और केवल उन कार्यों को स्वीकार करना चाहिए जो भक्ति के अनुकूल हो और जो भक्ति के प्रतिकूल हो उन्हें हमें जागना चाहिए। जैसे की सनातन गोस्वामी जी को शिक्षा देते हुए क्या कहा के जो शमा गति के नियम है उनकी चर्चा की और ना गति का पहला नियम क्या है उन से कहा करना जो की भर्ती के लिए अनुकूल हो और जो भारत के लिए प्रतिकूल हो, किसी हालत में भी नहीं करना।
तो चेले महाब्रबुजी से रामनंद रॉय ने स्वामी जी ये ज्ञान की भी मान रहे हैं। और ये कहते है की मैंने तो
1 बड़े नीच खानदान में जन्म लिया,
उन्होंने नीच खानदान में जन्म नहीं लिया था, खानदान दिया था बड़े ऊँचे खानदान में, और क्यूँकी जबरदस्ती उन्होंने
यह नौकरी शिकार की थी। और जैसे की समझाया है उन्हें जबरदस्ती उन के पास सेवा करना पड़ा जो की उन्होंने अपने आप को भी बड़ा
माना, इतना पति माना था की न जगना पूरी मंडल के अंदर भी कभी नहीं कहे।
भगवान जगना जी का दर्शन देने क्यूँ
की हम विवाद है की केवल जो
हिंदू धर्म के हैं वो ही जगनापुर मंडल के अंदर प्रवेश कर सकते।
जो सनातन को स्वामी जी ने सोचा
की एरिया में राजा के साथ सेवा कर रहे हैं, नौकरी कर रहे हैं, उन्होंने अपने आप को बड़ा पचीस माना और वो अंदर दर्शन के नहीं।
तो यहाँ जिस प्रकार सनातन को स्वामी
जी शिक्षा की भीक मांग रहे हैं,
हमें भी शिक्षा की भीक मांगने चाहिए। लोग में को स्वामी जी कहते हैं। तो जिस प्रकार स्वामी जी ने बड़ी
निमृत के साथ महापरबुजीऐसी पूछ रहे है, जान की भी मांग रहे हैं, उसी प्रकार हम भक्तों को भी परम भगवान की शिक्षा स्वीकार करनी चाहिए। गुरु के दूध में अर्जुन ने क्या कहा?
अब मुझे ये समझ नहीं आ रहा
की मुझे क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहे?
क्या है मेरा अध्यात्मिक? तो इस सिटी में मैं आपसे भी मांग रहा हूँ, क्या? क्या मुझे मार दीजिये? और फिर भगवान ने इस का उद्देश
किया।
तो यहाँ हम देख रहे हैं
जी
वो भी भीख मांग रहे हैं। जिस महात्मबुजीऐसी ज्ञान इस समस्या को हल
करने का जो उपाय है, उस विषय में प्रश्न पूछ रहे हैं।
तो इन छात्रों के द्वारा ये ज्ञान मिलता है कि हम समस्या का हल कर सकते हैं। केवल भगवान की वाणी को स्वीकार करे
और जो की हमें गुरु परंपरा द्वारा को अगर हम समय को हल करना
चाहते हैं तो 1 ही उपाय है।
वो उपाय यह है की परम परम भगवान की शिक्षा को स्वीकार कर।
भगवान की शिक्षा जो गुरु परंपरा द्वारा आ रही है, ये नहीं की कोई व्यक्ति दावा कर ले कि भगवान क्या बता रहे।
शिक्षक शिक्षा को गुरु परंपरा द्वारा आरी है उस शिक्षा को हमें शिकार करना।
और अगर हम उस शिक्षा को यह जरूर स्वीकार करें फिर उन शिक्षा का
हमारे ऊपर प्रभाव होगा।
तो स्वामी जी ने
महावरी द्वारा बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा की
महातोवजीनेकहा उन्होंने 1 कथा सुनाई, 1 हमें 1 गरीब व्यक्ति था, जो की ही सोचता था की मै
निराश रहता था, तो 1 शुरु
न्हें, 1 जोची मिला जोशी ने कहा अरे भाई, तुम उदास क्यों नजर आ रहे हो?
क्या कह रहा है? उसने कहा की मैं गरीब हूँ इसलिए उदास हूँ।
तुम जानते नहीं की तुम्हारे पिता तुम्हारे ये सम्पत्ति छोड़ गए है। कहाँ छोड़ गयी है, सम्पति बताओ कहाँ कहाँ? और ये सम्पति अगर तुम्हें चाहिए तो तुम्हारे घर का जो पूर्व पूर्व दिशा है, ईस्टर फ्लाइट, वहाँ होना नोदंफाइटमेंनहीं सदन में नहीं। और वे
अपने घर के और खोदोगे
तो तुम्हे असली संपत्ति मिलेगी। तो महाकमीने समझाया पुर दिशा का क्या डाटता है पर से और सूर्य की
रोशनी से सारा अंधेरा बंजर है, दूर हो जाता है।
सूर्य की रोशनी से अंधेरा बंद दूर होता है। सूर्य सूर्य धिकार जहाँ कृष्ण है
वहाँ
माया का प्रभाव नहीं रहेगा।
जैसे की जहाँ सूर्य है, अंधेरा नहीं होता।
दूसरे शब्दों में इस महा ने यह सन्देश दिया है की अगर हम भी कृष्ण भक्ति स्वीकार करेंगे तो वो है।
उस जोशी ने कहा भाई, तुम दुखी
नजर आते हो, ये सोचते हो की
तुम गरीब हो, गरीब नहीं हो।
तुम्हारे सरकार माले सम्पति छोड़ रहे है, पर वो सम्पति छुपी हुई है,
छुपी है कैसे मिलेगी मुझे सम्पति बताओ वो
सम्बधि दबी हुई है। हमारे घर के पूर्व दिशा की तरफ, उस तरफ भी खोदोगे तो सम्बधि मिलेगी दूसरी दिशा में मत खोलना।
तो उसी प्रकार अगर हम कृष्ण भक्ति
को स्वीकार करें तो वो ही है आपकी धन और सम्पत्ति।
और हम हमें क्या प्रयास करना चाहिए कि किस प्रकार से हमें भक्ति को स्वीकार करे और बड़ी गंभीरता के साथ हमें भर्ती विधियों का पालन करना चाहिए।
ये जो अभी शोक हमने पढ़े भी देखते हैं। सुनकर स्वामी जी पूछ रहे है की मै ये 3 प्रकार के कष्टों से कैसे निकलूंगा, कैसे निकलूंगा, यह 3 प्रकार
के कष्ट तो कौन से हैं ये
3 प्रकार के कष्ट। आधिभौतिक अध्यात्म में इन 3 प्रकार के कष्टों के अलावा 4 प्रकार के कष्ट है।
तो यहाँ के 3 प्रकार के कष्टों की चर्चा
है। कष्ट मन के द्वारा, मन के द्वारा,
हम अनेक प्रकार के कष्ट है।
समझो उदाहरण किसी रिस्तेदार या मित्र का
कोई देहात हो जाए, कुछ पे आपका मन भी आपको सताता है।
अगर आप देखो की किसी के पास कोई सुविधा है जो आपके पास नहीं
है तो भी आपका मन आपको सताता है।
अगर मान लो किसी ने आपको नहीं
जो, आपके खयाल से आपको मिलना चाहिए, फिर भी आपका मन सताता है।
तो मन जो है सब हमें सताते रहता है। और अगर आज मन खुश भी हो जाए।
किसी कार्य की प्राप्ति के द्वारा, कल वो उदास हो जाता है, तो मन
द्वारा कष्ट हम सब को भुगतना पड़ता
है, प्रकृति का कष्ट बाहर आ जाती हैं, सूखा हो जाता है। और फिर दुसरे व्यक्ति के द्वारा, ये
है ये 3 प्रकार के कष्ट।
दूसरे व्यक्ति द्वारा हमें अनेक प्रकार के कष्ट भुगतने पड़ते हैं।
और कहा गया है की जब तक ये 7 प्रकार के कष्ट में फंसे रहेंगे,
जब तक नहीं तो।
इसलिए हम स्वामी जी कहते है की हमे समाज में लोग कहते हैं मैं इतना आदमी हूँ, का लिखा हूँ और मैं ये भी नहीं जानता कि मैं हूँ कौन। अभी इसके दौरान ये नहीं सोचना चाहिए की इस दौरान उन्हें यह सूचना मिलती
है की उनकी निम्रता, उनकी निम्रता, हम
देख रहे हैं की वो स्वयं क्या रहे है, ये भी नहीं जानता।
हूँ कौन?
तो
जिस प्रकार स्वामी जी ने शिक्षा
प्राप्त की, प्रश्नों का उत्तर प्राप्त किया,
उसी प्रकार हमें भी प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करना चाहिए। यह सोचना क्या प्रश्न पूछेंगे हमारी देती हो जाएगी।
ये सोचना है। पूछो स्थान पर पूछो स्वामी जी श्री कहते हैं भक्तों में 6 प्रकार का व्यवहार होना चाहिए। इसका
1 है दाती, उनकी कम लोग जिनका आपसे अधिक अध्यात्मिक ज्ञान हो। जो समस्या है, शंका है पूछो और उनसे पूछो।
इनसे जो की आपसे ज्यादा एडवांस हो
दृष्टि में तो मन के विद्यालयों को प्रकट करना, मन की समस्या को हल
करने का उपाय, ये इसका हमें लाभ उठाना चाहिए। पापा जी ने
कहा है कि जो हुई है उसका 1 उद्देश्य क्या है के छ प्रकार के रिश्ते में जुड़े चाहिए।
जुड़ने की सुविधा तो है, न की
संखाय है, समस्या है, प्रशन है।
उनके उत्तर को प्राप्त करके पूछो। और हम देखते हैं शास्त्र में की जो बड़े बड़े संत महात्मा हैं, वो
भी प्रश्न पूछ रहे हैं। 7 गो स्वामी जी प्रश्न पूछ रहे हैं, पूछ रहे हैं, वे प्रश्न पूछे,
जब महात्मा पूछ सकते हैं तो हमारी क्या? तो हमें भी पूछना चाहिए। इन प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करना चाहिए।
क्यूँकि ये जो समस्याएं हैं वो हमेशा
हमें बता दे जायेंगे।
तो जिसे महा बहु जी ने स्वामी
जी को उपदेश देते हुए कहा था
इस प्रकार अनेक योनि में गुजर रहा है, अनेक में गुजरने के पश्चात उसका किसके साथ
भक्त को भगवान जी गुरु भक्ति ली।
तो ये भक्ति भी जब हृदय में साबित होता है तो भारती भर्ती के बीच को उगाने के लिए क्या करने की आवश्यकता है? भगवान नाम का करना जितना हम चिरतन करेंगे भजन करेंगे उतना ही भर्ती के बीच ने भर्ती के बीच को गाने के लिए थोड़ा प्रयास करना पड़ेगा। यह नहीं सोचना की भरती का ज्ञान मिल गया तो खुद खुद उगेगा नहीं प्रयास करोगे भर्ती के बीच को गाने के लिए दोगे प्रयास नहीं करोगे।
तो भर्ती के गा के माध्यम के द्वारा।
और आगे ने क्या कहा? उन्होंने कहा कि ये भक्ति का जो बीज है,
2 चीजों का लाभ उठाना चाहिए, 1 है बावा संगत
दी है, 1 सेकंड का चौथा हिस्सा, 1 से चौथे हिस्से में भी अगर को शुल्क भक्तों की संगत में लगी आपको भर्ती
का ज्ञान में लगा जिसको आप जिसका अनुकूल कर सकते हो तो साधु संग का लाभ उठाओ।
और इसके अलावा उन्होंने कहा की अपराध
से
अपराध के द्वारा किस प्रकार भक्ति जो है न हो सके। उन्होंने उदाहरण दिया जज सुन्दर बगीचे में
अगर कोई पागल हाथी अंदर आ जाए
तो सुन्दर बगीचा जो है पागल हाथी के कार्य से,
तो भक्ति के मार्ग
में प्रवेश करने के पश्चात हमें अपने
आप को
अपराधों से बचना चाहिए, सावधान
रहना चाहिए की अपराधों से बचें और
हो सके भक्तों की संगत का लाभ लाना चाहिए।
अगर भक्तों की संगत में रहेंगे तो
ये लाभ होगा कि बार बार हमें याद रहेगा क्या की भर्ती की आवश्यकता और धरती का पालन करने की।
जैसे की महा बाबुजी से स्वामी जी
प्रश्न पूछ रहे हैं, उसी प्रकार हमें अपने ज्ञान को दूर करने के लिए प्रश्न पूछते रहना चाहिए के महा बाबुजी
ने कहा ह कहो क्या पापाजी कहते थे में लोगो की जो यादाश इतनी कमजोर है भूल, इसलिए बाबा जी ने
बुक डिस्टिब्यूशन पर बल दिया और कहा की ग्रंथों को बातो तभी आप लोग जैसे जानते हो। हर साल दिसंबर के महीने में हमारे भक्त प्रयास करते है की अधिक से अधिक मात्र में ग्रंथों को बाटने के लिए और
शुरू हो गयी है, पर स्मार्ट नहीं हुई। अभी 25 पर्सेंट का
6 हफ्ते 2 दिन अभी तक बीते हैं।
क्या तो 8 दिन के अभी भी कई बार देखा जाता है।
शुरू में तो उत्साह होता है, फिर 2 के बाद उत्साह कम हो जाता है।
भक्तों से निवेदन है की अंत तक
रखे मैं कल ही इंग्लेंड से आया। कल रात को तो इंग्लैंड में सरे खत्म कर देते हैं। 8 बजे सवाल बढ़े और सारा मंदिर सवा बजे के बाद आपको 1 भक्त मंदिर में नहीं देखा, पूरे मंडल में
5 सब जा रहे हैं। सुबह से क्यूँकी वो प्रयास करे।
अधिक से अधिक मात्र में तो मंडल उपस्थित है।
सब से निवेदन है की इस मैराथन
के अंत हमारी हार्दिक इच्छा है की प्रचार करते जाओ। सारे जिंदगी भगवान भगवान के प्रचार से ज्यादा अच्छा कोई सेवा नहीं है। खास कर के ये महल का प्रयास है। कम से कम 1 से सारे रात तक हमें करते रहना चाहिए। यह नहीं सोचना भी गए हैं और कल मैं भी ऐसी बात कर रहा था, तो उन्होंने कहा की अभी तक 32 हमारी यह योजना है बचपन की लगभग 20 लाख है। और मुझे पूरा विश्वास है की सम्भव हो पायेगा। आज हम सब साथ में जुड़ेंगे के साथ इस कार्य को सफल बनाने के
लिए ये निवेदन है।
भक्तों से कृपा करके महीने के सुनाती ये प्रयास करते जाए। लोगों को गीता का उपदेश देने के लिए, गीता पहुँचाने के लिए, क्यूँकी चिंता की शिक्षा के द्वारा ही हम सुख शांति प्राप्त कर सकेंगे। जैसा की यहाँ हम देखते हैं की सुनाते स्वामी प्रश्न पूछ रहे हैं। ये प्रश्न तो हम सबको पूछना चाहिए।
सनातर स्वामी आत्मज्ञान ही व्यक्ति हैं। वो पूछ रहे हैं कि मैं इन समस्यों से कैसे निकाल सकता हूँ?
और आज अफसोस की बात क्या है?
जो सचमुच ही पतित व्यक्ति है, वो
इस का पाप करने का प्रयास ही नहीं करते।
जो सचमुच प्रजा है उनमें नहीं।
हम जीवन के लक्ष्य को समझे यह समझे की कैसे हमें कष्टों से छुटकारा प्राप्त हो सकता है। वो प्रश्न तो कोई पूछता ही न। तो भक्तों को इस ज्ञान की आवश्यकता है। यह प्रयास करना चाहिए की अधिक से अधिक भाषा में समाज के सुख के लिए हमें प्रयास करना चाहिए। इस ज्ञान को आगे बताने के लिए।
जैसे की
ठाकुर से कहा इन की
टीवी देख कर मुझे बहुत दुख हो चूका है। हीरा ने कहा प्रभु चिंता मत करो,
हरी राम के पालन से, आज वो हरी चालन करेंगे, अपराध से बचते हुए। इसके उधर होगा। तो इस ज्ञान का वितरण करना है और ज्ञान का वितरण हो पायेगा गीता के वितरण के द्वारा। और जिस प्रकार स्वामी जी अपने प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने का प्रयास कर
रहे हैं, हमें भी इन्ही प्रश्नों का
उत्तर प्राप्त करना चाहिए। मैं बता कैसे कष्टों से छुटकारा मिल सकेगा। तो हमें भी यही पूछना चाहिए।
हमें यह पूछना चाहिए कि है कौन? कह दिया स्वामी ने? मैं हूँ हाँ को? मैं कौन हूँ।
महारज ने कहा की हम सब का प्रथम कर्तव्य क्या है की हम भगवान
के
और ये ज्ञान हमें गीता के द्वारा क हो रहा है। कृपा करके इस यान को पढ़िए में कांता हार
क्रिष्णा हार कर किशन क्रिश्ना हलहहहललहलेनरहले ह ले।
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