चैतन्य महाप्रभु- रामानंद राय संवाद |CC Madhya 8.1-3 8 |8.6.97 |Delhi |Gopal Krishna Goswami Maharaja

The speaker presents and interprets the eighth chapter of the Chaitanya‑Mahaprabhu narrative, which records a dialogue between Chaitanya Mahaprabhu and the devotee‑scholar Ramananda Raya. The talk begins with a brief introduction to the chapter’s setting – Chaitanya’s pilgrimage to South India and his meeting with Ramananda Raya, a learned devotee and former governor of Tamil Nadu. The core of the lecture is a series of questions posed by Chaitanya Mahaprabhu and the profound answers given by Ramananda Raya. These exchanges illuminate several central teachings of Gaudiya Vaishnavism: 1. Bhakti as the supreme knowledge – all other (material, scientific, or artistic) disciplines are subordinate to devotion to Krishna. 2. Four categories of people who reject divine shelter – those who possess material knowledge but misuse it. 3. True wealth – the richest person is the one whose heart is filled with love for Krishna, not the one who amasses material riches. 4. The importance of sangati (association with devotees) – associating with higher‑knowledge devotees, peers, and even less‑learned devotees each offers distinct spiritual benefits. The speaker also weaves in illustrative stories from the Bhagavata Purana (e.g., the miserly rich man who renounces wealth after suffering) and contemporary observations about the commercialization of sacred sites (rivers, beaches). Throughout, the lecture stresses that spiritual teachings are meant for practical propagation: Ramananda Raya’s answers can be employed to inspire devotion and guide seekers away from material attachment. The talk concludes with a reminder that the ultimate goal of life is to become a sincere devotee of Krishna, cultivating bhakti, humility, and compassionate service.
Chapters
आज श्रीमद भागवत के वजाय हम चेतन अमृता के मध्य के आठवें अध्याय के कई लोग पढ़ कर आपको सुनाना चाहते हैं और इन पर हम थोड़ी व्याख्या करेंगे। ये मध्य लीगल के आठवे अधाई में ेतिनमहाप्रभु रामानंद राय का बहुत ही सुन्दर है। चेतना महा प्रभु तो आप क्या से जानते हो पर भगवान के अवतार हैं श्री कृष्णा, चेतना राधा, कृष्णा ने, अन्य और रामचंद्र रॉय। उन्हें शास्त्रों में अर्जुन का अवतार माना जाता है। और रामानंद राय भौतिक दृष्टि से तमिलनाडु के गवर्नर थे। पर वो हे भोत प्रिय भक्त। पर हम भगवान श्री कृष्ण के तो जब दक्षिण भारत की यात्रा की तैयारी कर रहे थे, उन्हें कहा गया था कि दक्षिण भारत जब जाओगे, वहाँ 1 बहुत प्रिय भक्त से मिलोगे जिनका नाम है रामानंद राय। और इस आठवे अध्याय में हम देखते है की क्षेत्रीय महा प्रभु अपने रामनंद राय ऐसे अनेक प्रश्न पूछ रहे हैं और रामानंद राय उन प्रश्नों का उत्तर दे रहे है। आप शायद यह जानना चाहोगे कि क्या कारण है? महाप्रभु स्वयं भगवान है की वो अपने भक्त के प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करें। अक्सर हम देखते हैं कि भक्त भगवान से प्रश्न पूछते हैं और भगवान उनका उत्तर देते हैं। ठीक है। जैसे अर्जुन ने भगवान से अनेक प्रश्न पूछे भगवत गीता में और भगवान ने उन प्रश्नों का उत्तर दिया, तो उसी प्रकार शास्त्र में हम देखते हैं की भगवान शिक्षा दे रहे हैं। तो यहाँ हम देख रहे हैं कि भगवान भक्त ऐसे प्रश्न पूछ रहे हैं और उनका भक्त उन प्रश्नों का उत्तर दे रहे हैं। राम भक्त थे, प्रभु स्वयं भगवान है। तो भगवान भक्त की महिमा को बढ़ाने का प्रयास करते हैं। भक्त ये चाहता है की वह भगवान का गुणगान बढ़ाये। भगवान ये चाहते है की वो अपने भक्त की महिमा को बढ़ाये। जैसे की भागवत के प्रथम सिकंद में हम भीष्मदेव की शिक्षा के विषय में पढ़ते हैं। जब भिष्म देव को ये वर्ल्ड प्राप्त हुआ था कि वो अपनी इच्छा के अनुसार इस जीवन को त्याग सके। अगर हमें आपको हमें वो वर्ल्ड प्राप्त हो तो शायद हम कभी नहीं त्यागने का प्रयास करें। तो भेष्मदेवजीजबउन्होंने देखा की उद्ेष्टरमाजराजपर बैठ गए है, तो उन्होंने यह निश्चित कर लिया था कि अब संसार त्यागने का समय आ गया है। तो उनके त्यागने के समय भगवान स्वयं वहाँ पहुँचे थे अपने सारे भक्तों के साथ, अनेक देवता देवियों के साथ। और भगवान ने युदेश्टरऐसी कहा महाराज से कहा की तुम पूछो विष्णदेव से की, जीवन का क्या कर्तव्य होना चाहिए, क्या लक्ष्य होना चाहिए। और फिर भरिष्मदेव ने भागवत धर्म के विषय में, भगवान की उपस्थित में भगवान उपस्थित होते हुए उन्होंने उन्हें यह शिक्षा दी। तो कहने का तात्पर्य यह है की भगवान हमेशा भक्त की महिमा को बढ़ाने का प्रयास करते है। जैसे की चेतन हाँ प्रभु, जब उन्हें पता लगा की नित्यनंद के ऊपर नित्यनंद के माथे पर 1 पत्थर फेंका था, माई ने, तो के दिन वहाँ प्रभु, वहाँ पहुँचे, अपने सुदर्शन चक्र के साथ। उन्होंने जगाई मदाय को बचाने का ये अवसर किसे दिया? नित्यनंद को चेतन्य महाप्रभु स्वयं बचा सकते थे उन्हें, और उन्होंने निंदा का गौरव बढ़ाया जैसे देखते है। महाप्रभु जी ने यह हरी नाम का प्रचार तो किया भारत में, में प्रचार करने का अवसर किसे दिया? पर। तो इसी प्रकार भगवान जो है हमेशा प्रयास करते हैं कि वो भक्त की महिमा को बढ़ाये और भक्त प्रयास करता है कि वो भगवान की महिमा को बढ़ाएं। ये जो वर्सा हुआ है महा प्रबु रामनंद राय का, ये हुआ था गोदावरी नदी के किनारे भारत में अनेक पवित्र नदियाँ हैं, जैसे प्रपी के शताब्दी के लिए शास्ति प्रापत को स्नान करवाया था। हमारे सेंटेनियल भक्त 45 साल गए और उन्होंने 1100 8 पवित्र नदियों का जल इकट्ठा किया। तो भारत में ऐसे कई पवित्र नदी है। हाँ इन सब के विषय में आप ज्ञान प्राप्त कर सकते है। उन्होंने 1 किताब भी छापी है सेंटेनियल ने, जिसमें शास जिस दिन नदियों से जल इकट्ठा हुआ था उनके विषय में ज्ञान है। आज कल हम देखते है की ये पवित्र नदियों के किनारे भी इंडिया छिपी वगैरह की सुविधा बढ़ाई जा रही है। जैसे जगनपुरी में 1 बहुत ही सुन्दर बीच है यहाँ, नदी है यह। महाप्रभु जी रोज जाते थे स्नान करने के लिए और यहाँ के क्षेत्र में महाप्रभु जी ने हरिदास के शरीर को उठा कर वहाँ स्नान करवाया। हमारे वैष्णव भक्त जो है वो वहाँ जाते है उसे तीर्थ का स्थान मानकर। पर आजकल बड़े बड़े व्यापारियों ने वहाँ फाइस्ट, होटल, शराब सब बीच के किनारे शुरू कर दिया है। बड़े अफसोस की बात है। तो ये जो वर्कला हुआ था केतना महाप्रभुजी और रामनंद राय का, ये हुआ था गोदावरी नदी के किनारे के महा प्रभुजी ने प्रश्न पूछे हैं। और रामनंद राय ने उत्तर दिया है। तो 1 श्लोक बोर्ड है। ब्लड में लिखा है इसको आप जताइए प्रभु कहे कौन विद्या मध्य सारा को राया कहे क्रिष्ण बीन विद्या नहीं आरा ग्राम स्या jan anjana sharka cकsurnmtnatsmaई श्री grबenमhश्रीचेतन्या mनvesतmanभutले symरuपाकदमयदती श्वापदंदिकाम बंदे हम श्री गुरु sriwtaपदकmlnश्rी guron श्रीरुपा सगजता रहा गना रगुनतंगतमसमसजेवम सद वेतम सब धुतम परिजन सैत कृष्णा चेतन्य देवम श्री राधा कृष्णा प्रदान सहा गना ललिता श्री वुशाखानथमशा हे कृष्णा करुणा सिंधु रण बंधु जगत्पते गो पेशा गोपिका कांता राधा कांत ते तबका कचना गोरांगी राधे वृंदावनेश्वरी रिशब सुते देवि रन माने हरि जय श्री कृष्णा चेतन्या धहुनेप्यानंदा श्रीय बेटा गजादर युवा सभी भक्त बिन्द हरे कृष्ण हरे कृष्ण हरे राम राम प्रभु कहे कौन विद्या विद्या माद सारा कहे कृष्ण भक्त भी विद्या नहीं आ। चेतन के श्लोक सरल बंग्ला भाषा में है, भागवत के श्लोक संस्कृत भाषा में है और कई श्लोक चेतन में संस्कृत भाषा में भी है। तो ये था चेतन्य महाप्रभु जी का सबसे पहला प्रश्न। अवसर पाकर महाप्रभु ने पूछा सभी प्रकार की विधाओं विद्याओं में कौन सर्वधिक महत्वपूर्ण है? और रामनंद ने क्या कहा? कृष्ण भक्ति की कोई अन्य विधि महत्वपूर्ण नहीं है। तो भागवत गीता में भी भगवान कहते हैं राज विद्या राजा गुम, ये जो ज्ञान है, ये सब ज्ञानों का राजा है। तो इस तार में परवपा हमें समझाते है की मौलिक शिक्षा, शिक्षा, के द्वारा हम ये ही ज्ञान प्राप्त करते है की इंडियन दिप्ती को कैसे बढ़ाया जाए और आध्यात्मिक शिक्षा के द्वारा आप अपने असली स्वरूप को समझ पाते हैं। हम ये नहीं कह रहे की होती विद्या प्राप्त नहीं करनी चाहिए। आखिर हम सभी भौतिक विद्या का उपयोग करते हैं। भगवान के प्रचार में भगवान की सेवा में असली अर्थ यह है कि भौतिक विद्या के साथ अधिक विद्या अवश्य ही प्राप्त नहीं तो इस भौतिक विद्या का कुछ खास महंत ठाकुर। भक्ति नोदी ने कहा है कि जिस प्रकार 1 व्यक्ति के सिर में अगर 1 भारी पगड़ी हो तो वो जल्दी डूब जाएगा तो सी प्रकार अगर तिक विद्या का उपयोग नहीं किया जाए। भगवत सेवा में तो ये बड़ी निकल हो जाती है। जैसे जल विज्ञानी क्या कर रहे हैं उन्होंने अनेक सुविधाएं बना ली है जिसके द्वारा आप लोग नुकसान दे सकते हो, डिस्ट्रक्शन देश को नष्ट कर सकते हो विज्ञानी ने दिया है तो आप होते वीडिया का दुरुपयोग किया जा रहा है में भगवान कहते हैं की 4 प्रकार के व्यक्ति मेरे शरणागत नहीं होते, कौन हैं ये 4 प्रकार के व्यक्ति? न म, न, मुड़ आया, पर गाना, श्रम, भगवान आया, पढ़ा ग्यारा, इनसे उन व्यक्तियों का वर्णन है जिनके पास भौतिक ज्ञान तो है, भौतिक शिक्षा है और भौतिक शिक्षा का ही दुरुपयोग कर रहे हैं इस भौतिक शिक्षा का दुरुपयोग कर रहे हैं। इस कारण भगवान के शणनगतनहींआजभौतिक समाज में भी हम यही देखते हैं। जिनके पास भौतिक शिक्षा है वो क्या सोचते हैं ये हमारे पास सब प्रश्नों का उत्तर है और वो भगवान की शरण नहीं देते। असल में ये जो की महा ध्यान में है यह बड़ा सुन्दर बड़ा सुन्दर ज्ञान है। और रामानंद राय ने जो प्रश्नों का उत्तर दिया है हम इन प्रश्नों का उत्तर का उपयोग कर सकते हैं के प्रचार के लिए। क्यूंकि खेत ने, महाप्रभु जी ने वैसे लोग पूछे है ऐसे वैसे प्रश्न पूछे है जो भी कोई साधारण व्यक्ति पूछता है। और रामानंद राय ने बड़े सुन्दर उत्तर दिए है इन प्रश्नों का। तो महाप्रभुजी के प्रश्न के उत्तर में कहा गया है कि सबसे अवश्य शिक्षा या ज्ञान वो है जिसके द्वारा हम भक्ति का ज्ञान प्राप्त कर सकते है और उसके बिना सारा ज्ञान अधूरा है। पर देते थे 1 जीरो देखो, 2 जीरो देखो 10 जीरो, इनका कुछ महत्व नहीं है पर अगर आप साथ में 1 जोड़ दोगे तो इन दिनो की कुछ कदर रहेगी। उसी प्रकार होति विद्या, होति शिक्षा, होति ज्ञान का हम जब उपयोग कर सकते हैं। अगर से कृष्ण भक्ति के भगवान ये सेवा में उपयोग करे। आगे इस शो के थार्यमेंप्रापजि भागवत के साथे के नव्दवभक्तिकेदोष लोगों का उन्होंने वर्णन किया है। लाल जी के पिता ने उनसे पूछा था बेटा ये बताओ की आज तुम स्कूल में क्या सीख कर आये हो। लाल धयात्मिकशिक्ष अपने माता के घर में प्राप्त कर ली थी नरादमुनी जी के द्वारा और उनके पिता का यह प्रयास था कि वो भौतिक शिक्षा प्राप्त करें को शिक्षा दे रहे थे। कौन शुक्रचार्य के 2 बेटे उनको ये आदेश दिया गया था कि तुम कृष्ण भक्ति के ज्ञान को, भुला के बात को, ये चिंता थी के बेटे की रूची है भर्ती में, तो 1 दिन बेटे ने पूछा, बाप ने बेटे से पूछा ये बताओ की आज तुम स्कूल में क्या पढकर हो बाप तथा दु बुद्धी का। और जब उसने अपने बेटे को अपनी गोद में बिठाया और बड़े प्रेम से पूछा बताओ आज तो स्कूल में क्या सीख कर आये हो? प्रलाद ने क्या कहा ने इन 2 श्लोकों का वर्णन किया जिनका वर्णन किया है इस श्लोक के साथ। केतु हाजी ने कहा ये पिता, ये जो नव भक्ति का ज्ञान है, ये है सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा और इतना। क्रोध आया यह सुनने पर उन्होंने अपने बेटे को उठा कर नीचे फेंक दिया। तो ये नवदाधक्तीका जो ज्ञान है उसका हम सब को उपयोग करना चाहिए। गोविंद दास जी कहते हैं पर बुरे मन प्रार्थना में की ये जो जीवन है किसी समय भी समाप्त हो सकता है और हमें किसी न किसी रूप से हरी की शरण लेनी चाहिए और हरी की शरण हम कैसे लेंगे जी भक्ति का वर्णन करते हैं तो इस लोक में भी प्रॉपर भक्ति का वर्णन करते है और हम सबको इसका लाभ उठाना चाहिए। तो हर व्यक्ति ये पाना चाहता है, हर व्यक्ति यह चाहता है सब से आदर दें तो प्रयास करते हैं धन प्राप्त करने के लिए, गद्दी प्राप्त करने के लिए कि सब यशस्वी बनना चाहते हैं। तो महा प्रभु का यह प्रश्न है। सम यशस्वी कार्यो में सर्वधिक कौन सा है और इन्होंने क्या कहा वो व्यक्ति जो भगवान कृष्ण के भाग के रूप में विख्यात है वो ही सर्वाधिक जाय वो है। असली यशस्वी व्यक्ति जैसे की भारत में अनेक धनी व्यक्ति है और हर देश में अनेक धनी व्यक्ति हैं। पर 1 देश के धनी व्यक्ति को दूसरा व्यक्ति नहीं। जानता जी ने कहा है कि कोई धनी व्यक्ति लोग उसे अपने गाँव में, अपने शहर में, अपने देश में ही जानेंगे और भगवान को जो हक है उसे लोग हर कोने में जानते हैं जैसे की आज पृथ्वी के किसी कोने में चले जाओ लोग प्रभु पात को जानते हैं। कोई 2 हफ्ते पहले हम 1 भग के साथ न्यू यॉर्क के 1 सड़क में किसी को मिलने जा रहे थे तो 1 अफ्रीकन आदमी आया कोई अफ्रिका के छोटे देश से हमने देश का नाम भी नहीं सुना था। कभी तो हमारे पास कहने लगा मैं प्रभु पात को जानता हूँ। खुद ही उसने खाना हमने कहा प्रभु पात को कैसे जानते हो के के को पढ़ा है अपने छोटे में तो अगर व्यक्ति एसपी बनना भी चाहे तो से एस एस पी बनने का साधन क्या है वो है की वो भगवान का भक्त बने, भगवान के भक्त बनने से 80 को प्राप्त कर सकते हो। के महाप्रब राम ने कहा है कि जो व्यक्ति भगवान का भक्त बने अभी हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम भक्ति के मार्ग में प्रवेश कर रहे है क्यूंकि हम यशस्वी बनना चाहते हैं। आखिर हमें भूलना नहीं चाहिए कि भागवत में तो हित की भक्ति पर बल दिया गया है। हम इस भावना से भक्ति को स्वीकार नहीं करते कि हम यशस्वी बने या धनी बने या बड़े, प्रसिद्ध बने या हमारे। हाथ मे बहुत ताकत आ रहा। हमें कोई ऊंची गद्दी मिली नहीं। पर कहने का तातपर्य यह है कि भौतिक समाज में सब प्रयास करते हैं। ये बनने के लिए बड़े मशहूर बने। हर व्यक्ति चाहता है कि इतिहास में मेरा नाम लिखा जाए। कोई व्यक्ति किसी देश का नेता बनता है, राष्ट्रपति बनता है। वो यही चाहता है की वो ऐसा कार्य करे कि लोग उसको याद करे। जो भगवान का भक्त है, वो है व्यक्ति और जो भगवान का भक्त है, उसे लोग सारे विश्व में जानते है। तो अनेक श्लोकों के द्वारा प्रपी ने इस श्लोक में 3 पन्नों का 4 पदों का तात्प्रिय लिखा है और इन 4 पन्नों के तात्पर्य प्राप्ती अनेक श्लोकों के द्वारा 1 विषय को स्थापित कर रहे हैं। क्या जो कि रामनंद रॉय ने कहा है कि जो भगवान का भक्त है वो है असली सुथरी व्यक्ति। तो हमें यही प्रयास करना चाहिए कि हम किसी न किसी रूप से भगवान के असली भक्त बने। और यही माध्यम है भगवान को प्रसन्न करने का। और यही है जीवन का असली लक्ष। अगला प्रश्न यह था की सम्पत्ति वाणों में सर्वोच्च कौन है। तो हर व्यक्ति सम्पत्तिवान बनना चाहता है। हर व्यक्ति सारे विश्व में विश्व के किसी कोने में जाओ। हर व्यक्ति सम्पत्तिवान बनना चाहता है। महाप्रभु जी ने पूछा की सब सम्पत्ति वाहनों में सबसे उत्तम कौन हैं और कि रामननदरवायने क्या उत्तर दिया जो राजा तथा कृष्ण के प्रेम में सबसे बड़ा धनी वही है जिसके हृदय में भगवत प्रेम हो के द्वारा आप केवल अपने आप को संतोष नहीं कर सकते। श्रीमद भागवत में 1 बड़ी अच्छी कथा है। ग्यारहवे सिंध में 1 बहुत सम्पतिवान व्यक्ति था, बहुत धनी और साथ में वो व्यक्ति बहुत कंजूस हुई था। वो ना तो इंडिया कित्ती में रूची लेता था, न किसी को अपनी सम्पति खर्च नहीं देता था। उसकी पत्नी उससे आकर पैसे मांगती थी, बच्चे मांगते थे, बच्चों को भी वो पैसा नहीं देता था। कोई भी मांगता था, किसी को पैसा नहीं देता था। पर था बहुत धनी। यह भागवत की कथा है। तो बहुत धनी व्यक्ति था और था, कंजूस और बचपन में उसे ध्यात्मिकशिक्षा प्राप्त हुई थी। जैसे बचपन में आध्यातमिक शिक्षा प्राप्त हुई थी, फिर वो बुरी संगत में गिर गया। तो ये जो, ये जो धनी व्यक्ति था, सब उसके दुश्मन बन गए। भागवत के 11, 11 में कहा गया है कि धनी व्यक्ति के अनेक दुश्मन होते है। हम तो सोचते हैं कि सब उनके बंद होते है, पर दुश्मन भी होते हैं। क्यूँ हर व्यक्ति यही सोच रहा है कि उसका धन कैसे छीना जाए। सरकार भी यही सोचती है। हम उसके धन को टैक्स के रूप में कैसे ले? जो चोर है, वो भी धनी व्यक्ति के पीछे ही जाते हैं, गरीब के पीछे तो नहीं जाता। गरीब व्यक्ति अपना दरवाजा खुलने लग कर सो जाता है। और धनी व्यक्ति को चौकीदार रखने पड़ते है, सोते रखने पड़ते है, बड़ी बड़ी दीवार बनानी पड़ती है। वगैरह तो ये इस धनी व्यक्ति के कई दुश्मन थे, साथ में घर वाले भी दुश्मन बन गए क्योंकि वो किसी को 1 कोरी देता था खरे के लिए तो 1 दिन उनकी पत्नी, बच्चे, रिश्तेदार, सब मिलकर। सब ने धनी व्यक्ति के सारे धन को लूट लिया और वो धनी व्यक्ति भिखारी बन गया सारा धन उसको उन्होंने छीन लिया साथ में चोरों ने, सरकार ने, सब ने मिल कर सारे धन को छीन लिया। जब उस धन को चुराया सबने मिलकर आर में, तो ये धनी व्यक्ति बहुत दुखी हुआ, पछताने लगा मेरा सारा धन छीन लिया सरकार ने और ये चोरों ने, पत्नी ने, बच्चों ने, सबने तो पछता रहा था, दुखी हुआ और उस दुःख के द्वारा उसमें प्यार की भावना आ गयी और वो इस ने अपने जीवन को मुकुंदा के चरणों में अर्पण कर दिया और वो भगवान की भक्ति में बिल्कुल जुड़ गया हो गया। फिर वो भगवान की भक्ति में लीन होकर 1 स्थान से दूसरे यात्रा कर रहा था दिन रात भगवान का भजन कर रहा था, जहाँ वो जाता था। लोग उसे ताना देते थे, कहते थे अभी तुम भिखारी बन गए क्योंकि तुम्हारा धन सब फेल हो गया, तुम्हारा धन छीन लिया लोगों ने, इसलिए तुम बेकार बन गए। जब भी वो कहने लगा बिल्कुल सेन चीन का उदाहरण था जो वो खाने जाता था, कुछ तो बच्चे आकर वहाँ पिशाब करते थे, उसको छेड़ते थे, ताना मारते थे। जब भी वो भगवान के चरणों में ही लीन था। बिल्कुल घर इसी प्रकार भागवत और उदाहरण है। 1 परीक्षा थी पिंगला नाम की उस वर्षा ने अपने आप को बड़ा सजाया था लोगों को आकर्षित करने के लिए, पर उसे कोई 1 दिन गिरा नहीं मिला। जो व्यक्ति सामने से गुजरता था वो सोचती थी कि यह व्यक्ति मेरा गिराक बनेगा, पर कोई गिराक नहीं बना। तो जब वो रात को घर लौटी तो उसे बड़ा अफसोस हुआ, क्या सारा दिन मुझे कोई गिरा नहीं मिला, कुछ कमाई नहीं हुई पर उस सोच के द्वारा, उसके हृदय में त्याग की भावना पर। फिर वो भगवान के शरनागत हो गए। उसी प्रकार ये जो धनी व्यक्ति था वो 1 अवंती देश का ब्राह्मण था, अवंति देश बिहार में प्राप्त होता है तो वहाँ का ब्राह्मण था। फिर उसने भगवान का अनेक गुण गान किया, अनेक श्लोक के द्वारा, और 1 मंत्र की रचना की जिसकी रचना हर सन्यासी करता है। जाती मंत्र करने से पहले यह था की सब सम्पत्ति वाहनों में सबसे प्रथम ऊँचे कोटी का कौन सा है। तो जिस व्यक्ति के हृदय में हफ्ते की भावना है वो व्यक्ति बिल्कुल संतोष रहता है। हर स्थिति में हम सोचते है की अगर हमें धन प्राप्त हो जाए तो हमारी सब समस्या हल हो जाएगी। नहीं आप अनेक धनी व्यक्तियों से मिलिए सबकी चिंता है, सबके पास चिंता है किसी न किसी रूप से हम भगवान की शरण भगवान के शरणागत हो जाए तो ही हम संतुष्ट होंगे। जैसे की हम पढ़ते है। चेतन में कथा चेति महा प्रभु जी के 1 भक्त थे जिनका नाम था खोलबेचश्रीदा बहुत दृष्टि से तो वो बहुत ही गरीब थे, सब 1 ही धोती थी उनके पास, उसे भी अनेक के थे पर भगवान की भक्ति हरी नाम नहीं थे। 1 समय जब माँ प्रभु जी ने उन्हें कहा मांगो क्या सुविधा चाहिए तुम्हे तो उन्होंने ये कहा की अगर आप मुझे कोई सुविधा देना चाहते हो, कोई वर्ड देना चाहते हो तो ये वर्ड लीजिये की हर जन में मैं आपका स्वर्णन कर सकू और आपका साथ प्राप्त कर सको। तो भक्तों को ये भूलना नहीं चाहिए की असली संपत्ति है भगवत प्रेम और वो असली संपत्ति को प्राप्त करने का हमें प्रयास करना चाहिए। चेतन हाथ बुझी ने पूछा की सब प्रकार के दुःखों में सबसे ज्यादा कष्ट कौन सा दुःख है। अगर आप साधारण व्यक्ति से पूछो ये प्रश्न पूछोगे तो क्या देगा हमे धन प्राप्त हो रहा हो तो दुःख की स्थिति में है दिन। वहाँ प्रभु जी ने कहा है कि भक्तों की संगति नहीं मिलना, ये सबसे अधिक कष्ट की स्थिति है भक्त के लिए। इसीलिए शास्त्र में कहा गया है साधु संग, साधु संग, सर्वशास्त्र काया लव मात्र, साधु खां लावा मात्र, लाभ मात्र का अर्थ है 1 सेकंड का चौधवा हिस्सा, 1 सेकंड के चौदहवे हिस्से को आप मार भी नहीं सकते अपने घर के द्वारा। तो केतना महातबुजीने पूछा है किस प्रकार का कष्ट सबसे अधिक है और उन्होंने उन्होंने क्या कहा? रामनंद राय ने कृष्ण भक्तों से जुड़ा रहना, ये कष्ट देना ऐसा नहीं है। तो कृष्ण भक्तों की संगत में रहना बहुत महत्वपूर्ण है। अगर आप ध्यान जीवन में उन्नति करना चाहते हो, ये बहुत आवश्यक है। क्यूंकि कृष्ण भक्तों की संगत के द्वारा भक्ति की भावना बढ़ती है और कृष्ण भक्तों की संगत से जुड़ा हो तो भक्ति का जो उत्साह है वो कम हो जाता है। इसीलिए जब भी हमे मौका मिले, भक्तों की संगत का लाभ उठाने का, उसका हमें पूरा लाभ उठाना चाहिए। कृष्ण भक्तों की संगत हम कैसे प्राप्त करते हैं कीर्तन के द्वारा। 1 साथ बैठकर भगवान का उदेश्य, सुना भागवत के द्वारा, 1 साथ बैठकर भगवान का प्रसाद करना, भगवान की सेवा करना, 1 साथ के भागवत के चौथे स्कंध में धुर महराज जी को मुनिजी कहते हैं कि 3 प्रकार की संगत हमें प्राप्त हो सकती है। 1 हे उन भक्तों के साथ जो कि हमारे से ज्यादा ज्ञान रखते हैं। दूसरा उन भक्तों के साथ जिनका ज्ञान हमारे समान है। तीसरा जो कि हमारे से जिनके पास मार से कम ज्ञान है। तो मुनि जी ने कहा कि जब हमें उन भक्तों की संगत का मौका मिले जिनका हमारे से अधिक ज्ञान है, तो हमें उसके द्वारा प्रसन्न हो जाना चाहिए। क्यूँ? क्यूँकि उनके ज्ञान के द्वारा, उनकी शिक्षा के द्वारा हम अध्यात्मिक मार्ग परिवर्तन कर सकेंगे और हमें उस संगत के द्वारा, उस शिक्षा के द्वारा वगैरह को वश में ला सकेंगे। जब आपको उन भक्तों की संगत मिले जो आपके समान हो तो भक्त को प्रसन्न हो जाना चाहिए। क्यूँ? क्यूँकि कुछ स्थिति में भक्त कृष्ण कथा कर सकता है और कृष्ण भगवान का गुणगान कर सकता है और जब आपको वैसा कोई भक्त मिले जिसके आपसे कम ज्ञान है जिसके पास तो हमें द दयालु हो जाना चाहिए उसको फिर हमें दया दिखानी चाहिए और आप दया कैसे दिखाओगे यह असली ज्ञान देकर अगर आप केवल कोई भौतिक सुविधा 2 किसे तो वो असली दया नहीं है असली दया जब है असली दयालु व्यक्ति वो है जो कि लोगो को ये ज्ञान देता है क्या ज्ञान जिसके द्वारा हम जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सके वो है असली दयालु व्यक्ति तो भक्तों की संगत का हमें पूरा लाभ उठाना चाहिए। 1 समय 1 भक्त था जिसने प्रापा जी से कहा की मैं भक्तों की संगत में नहीं रहना चाहता मैं 1 त में रहकर हरिराज ठाकुर के समान जब करना चाहता हूँ। पापा जी ने उन्हें समझाया बहुत नहीं नहीं तो मंदिर में ही रहो भक्तों के साथ रहो उस में हर भक्त के इतने दोष समझ लिए थे उसने कहा कि मैं किसी मंदिर में नहीं रह सकता खैर पापा जी ने उसे दे दी और मायापुर में वो जा कर रहने लगा बिल्कुल एकांत में और थोड़े दिनों के बाद वो वहाँ से भाग गया तो कहने का अर्थ यह है कि जब भी हमें मौका मिले भक्तों की संगत प्राप्त करने का उसका हमें पूरा लाभ उठाना चाहिए, खास करके जब हमें उन भक्तों की संगत का मौका मिले जो बिल्कुल दीर्ध हो कर गुरु के आदेश का पालन कर रहे हैं। स्वामी जी उपदेश में कहते हैं कि जो भी हरिनाम का जप कर रहा है उसे हमें आदर्श देना चाहिए और संगत उनकी प्राप्त करनी चाहिए जो कि बिल्कुल दि होकर गुरु के आदेश के अनुसार नियमों का पालन करते हुए भक्ति के मार्ग में भक्ति के मार्ग में चल रहे हैं। कहने का अर्थ यह है कि जो भी हरी नाम का उच्चारन करे उसे हम आदर देते हैं और आध्यात्मिक जीवन को आगे बढ़ाने के लिए उन व्यक्तियों की संगत रखनी चाहिए जो स्वयं होकर इस मार्ग में चल रहे हैं और अगर हम उन भक्तों की संगत में रहेंगे कि फिर हम आध्यात्मिक परिवर्तन कर सकेंगे। हरे कृष्ण रा।
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