चैतन्य महाप्रभु की दिव्य लीलाएं | Chaitanya Mahaprabhu | 10 Jun 2016 | Juhu | Gopal Krishna Goswami

The video presents a devotional discourse by Gopal Krishna Goswami on the divine pastimes (līlā) of Chaitanya Mahaprabhu, delivered on 10 June 2016 in Juhu. The speaker weaves together a series of anecdotes—ranging from the symbolic breaking of a vessel and the drinking of holy water, to the ecstatic love of the Gopis, to confrontations with skeptical scholars—to illustrate Chaitanya’s core message: true wealth lies in spiritual consciousness, not material accumulation. Throughout the talk, the guru emphasizes the purpose of Chaitanya’s incarnation as the salvation of fallen souls (patiṭa), the importance of humble devotion, and the transformative power of chanting the holy name. Repeated references to other saints, disciples, and miraculous events serve to reinforce the timeless relevance of Chaitanya’s teachings for contemporary seekers.
Chapters
krishna onnamtisagrishna sango pogastaporsham gas in pre yenthehetomadz कर वजन कर रहे हैं और ये उपदेश महराज निम्मी को दे रहे हैं। तो इस लोक में ये कहा जा रहा है कि कलियुग में ये कौन सा योग है। कलियुग में बुद्धिमान व्यक्ति ईश्वर के उस अवतार की पूजा करते हैं जो कि सदा संकेतन करते हैं। और यही भाव शास्रों के अनेक श्लोकों में प्रकट किया गया है कि चेतन महार कौन है? स्वयं भगवान हैं श्री कृष्ण, चेतन्या, राधा कृष्णा, नाहे। आन्या यही राधा कृष्णा प्रकट हुए किस रूप में, चेतन या महा प्रभुजी के रूप में? और हमारे शास्त्र में अनेक श्लोक हैं। आज तो हमने आपको केवल 1 ही स्लोक सुनाया है, जिसमें महाप्रभुजी के प्रकट होने का वर्णन किया जा रहा है। और यह भागवत का, स्लोक का उच्चारण कब हुआ था। आज से 5000 साल पूर्व। इसी प्रकार भागवत के सातवें स्कन्द में यहाँ की आपको प्रलाद महाराज का उपदेश प्राप्त होता है। प्रात महाराज भी कहते हैं कि महाप्रभुजी के विषय में कि आप अनेक रूप में प्रकट होते हो, पर कलयुग में आप छाना अवतार के रूप में प्रकट होते हो। छना अवतार का अर्थ है छुपा हुआ अवतार। दूसरे शब्दों में आप कलयुग में ये दावा नहीं करोगे कि आप स्वयं भगवान हो। तो कलयुग में प्रलाद महज कहते हैं भगत के साथ में, क्योंकि समय का भाव है, वो नहीं पढ़ा। जिसमे प्रलाद महाजी स्पष्ट कहते हैं कि कलियुग में आप प्रकट हो गए। छने अवतार के रूप में। यहाँ छुपे अवतार के रूप में चेतन महा स्वयं भगवान हैं और वो प्रकट हुए थे भक्त के रूप में। पापा जी उदाहरण देते थे कि अगर कोई अध्यापक किसी क्लास में विद्यार्थी के हाथ को पकड़कर उसे लिखना सिखाएं तो ये अर्थ नहीं कि अध्यापक विद्यार्थी बन जाता है। जब भगवान प्रकट होते हैं, वो अपनी देवी लीला साथ में प्रकट करते हैं। तो जिस प्रकार भगवान श्री कृष्ण प्रकट हुए थे, उन्होंने अपने भक्तो को स्वीकार किया था। माता, पिता, भाई, साथियों के रूप में जो सर भगवान के साथ लीला करते हैं, वो भी भगवान के भक्त होते हैं। जैसे इनानेकाक्ष जो प्रसिद्ध सुर कौन थे, जय और विजय थे, तो उसी प्रकार जब चेतना महा प्रभुजी प्रकट हुए, उनके सनातन साथी भी प्रकट हुए और चेतन्य महाप्रभु जी प्रकट होने से पहले उनके सनातन साथियों को उन्होंने भेज दिया था। उदाहरण के लिए माधवपुरी, ईश्वरपुरी, अद्वेता, चाया, हरराज, ठाकुर, ये सब महा प्रभु जी के प्रकट होने से पहले प्रकट हो गये थे। तो जगनाथ मिश्रा और सच्ची माता ये कौन बने थे? भगवान के माता थेनमातासोधाकेजगनद मिश्रा और सचिव माता। निवास कर रहे थे। नबुदेवधामे। आज से 500 साल पूर्व या 520 या 25 साल पूर्व नव धाम, जो था, विश्व का सबसे प्रसिद्ध स्थान था। आज तो आप सोचते हो कि विदेश के देश ज्यादा धनी हैं और 500 साल पूर्व विश्व का सबसे धनी स्थान कौनसा था भारत का और भारत का भारत में सबसे धनी स्थान था बंगाल का, तो, जगनाथ मिश्रा और सच्ची माता। इनकी 8 बेटियां हुई थीं, जिनका जन्म लेने पड़ी देहांत हो गया। और इनके प्रकट होने से पहले विश्व रूप इनके बड़े भाई प्रकट हुए थे। और फिर चेतन महाभुज प्रकट हुए थे। जब चेतन महार पबजी प्रकट हुए थे, उनके अनेक नाम दिए गए थे, उनमें 1 नाम था गोरहरे, उनका रंग क्या था, सुनहरा रंग का था, सधारण रंगनी और वो प्रकट हुए थे उस वातावरण में जबकि पूरा समाज हर नाम का उच्चालन कर रहा था। जब जगनाल मिश्रा में आये, जब भगवान प्रकट हुए तो उस समय 1 बड़े प्रसिद्ध जोषी थे वहाँ जिनका नाम था निलम बराज चक्रवती, वो थे सच्ची माता के पिता, तो उन्होंने बच्चे के प्रकट होने के पश्चात उनकी जन्मपत्री बनाई जैसे आजकल के रिवाज है शहर, जब बच्चे पैदा होते हैं तो माता पिता जन्भती बनवाते हैं। तो नंबर चक्रवती ने उनके हाथ को देख कर और ग्रहण को देख कर ये निर्णय किया कि यह जो लड़का है पूरे विश्व को संभालेगा, ये साधारण व्यक्ति नहीं और यही बालक अलग अलग युगों में प्रकट हो चुका है अलग अलग रंगों में, जैसे भगवान गीता के चौथे अध्याय में कहते हैं पर तनाया साधु नाम अलग अलग समय में, वो किस लिए प्रकट होते हैं। धर्म की स्थापना के यदा यदा ही धर्म से अलग अलग समय में मैं प्रकट होता हूँ। तो चेतन महान प्रभुजी प्रकट हुए और जैसा की आपने इस लोक में सुना, उन्होंने ये हरी नाम की महिमा का प्रचार किया। तो निलमरचक्रवती ने 1 तो यह निर्णय किया कि लड़का पूरी सृष्टि को संभाला, इसे इसका नाम होगा विश्वंभर। तो भगवान को अनेक नाम दिए गए थे, उनका सुनेहरा रंग था, उन्हें गौरहरी बुलाया जाता था, उन्हें विश्व मे बुलाया जाता था। चक्रवती ने सूचना तो दी कि यही बालक अलग अलग अवतारों में प्रकट हुआ है, पर 1 विषय की सूचना उन्होंने नहीं दी, माता पिता को क्या था वो कि भविष्य में यह बालक सन्यास लेगा ये ये सूचना उन्होंने माता पिता को नहीं दी, फिर अद्वेता पत्नी सीता देवी, उसने नाम दिया निमाई। तो भगवान के अनेक नाम थे जैसे भगवान श्री कृष्ण ने शुरू से ही अदभुत लीला, पकड़ की, निमाई ने भी शुरू से ही अद्भुत लीला, पकड़ के हम केवल 23 लीलाओं की चर्चा करेंगे। जैसे 1 समय मा, 1 छोटा सा ही था, 1 झेलू सांप कोबरा के सिर पर नाच रहे थे, माता पिता सब घबरा गए, झेलू शाम कहीं काट नहीं ले जल सामने कुछ थोड़ी देर, वो नाचे उसपर भगवान नाचे थे कालिया पर, और फिर वो छोड़ कर चले गए, उनके माता पिता ने देखा कि उनके घर में फर्श पर भगवान विष्णु के चरणों के लक्षण का छापा आ रहा है। तो माता पिता ने सोचा शायद घर में जो दामोदर गोपाल का बिगड़ा है उन्होंने चलना शुरू कर दिया है और ये दामोदर गोपाल के चरणों के लक्षण का छापा आ रहा है। प्रिंसिपल और फर्स प्रोफेसर जी, माता ने देखा नहीं नहीं ये तो मेरे बेटे के चरणों में है। तो उन्हें लगा कि मेरा बेटा जो है जैसे की उनके पिता ने कहा था अलग अलग युगों में प्रकट हो चुका है। जब भगवान कृष्ण भी प्रकट हुए थे, गाड़गमुनेनेसूचना दे दी थी की ये बालक अलग अलग युगों में प्रकट होता है। फिर 1 समय 1 ब्राहमण यात्री आया जगनाथ मिश्रा के घर में रहने के लिए, जगनाथ मिश्रा ने उनका स्वागत किया, आदर दिया और कहा भोजन बना ग्रामीण अक्सर भोजन खुद बनाते हैं। और जब ग्रामीण ने भोजन बनाया भोग लगाने लगा था तो शेताननिमाइने क्या क्या आकर उसे चख लिया और झूठा कर दिया। तो ब्राह्मण ने कहा चलो भगवान की इच्छा, आज मैं भूखा हूँ। ब्राह्मण जो है किसी को दोष नहीं देता, समाज में हम दोष देते। तुम्हारे कारण यह हुआ। ब्राह्मण ने भगवान की इच्छा मैं आज भोजन नहीं खाऊँ। और जन ने कहा नहीं नहीं नहीं आप हमारे मन आपको खाना ही पड़ेगा भोजन तैयार किया किया जा। बसा ने बड़ा अपराध महसूस किया, बेटे को 2 किलोमीटर की दूरी पर 1 कमरे में बांध दिया, वह बंद कर दिया और अतिथि से कहा अब मैंने अपने बेटे को बंद कर दिया कमरे में किसी हालत में आपके भोजन को झुटा नहीं करेगा। और फिर से भोजन की जाए। लगभग आधी रात हो गयी थी घर के सारे सदस्य सो बैठे थे और ब्राहमण ने जगन के निवेदन पर फिर से भोग लगा। भोग लगा रहा था। फिर से जब भोग लग रहा था, कौन उधर पहुँच गया, फिर पहुंच गया पिता 2 किलोमीटर की दूरी पर आपको कमरे में बंद कर दिया। तो माई बालक ने कहा ये भोग तुम कैसे हो, मुझे तो लगा हो। बालक ने कहा विष्णु, विष्णु, विष्णु, क्या अपराध। और उसी समय माई ने अपना कृष्ण भगवान का रूप प्रकट किया और जब जब उसने कृष्ण भगवान का रूप प्रकट किया ब्राह्मण आश्चर्य हो गया देखकर भगवान ने ब्राह्मण से ब्राह्मण को खास आदेश दिया किसी हालत में किसी को यह सूचना नहीं देना तुमने इस रूप का दर्शन दिया है क्यूकी? अगर सबको पता लग जाता कि निमाई स्वयं भगवान हैं तो लीला में वो आनंद नहीं आता। इसलिए भगवान की योगमाया शक्ति द्वारा उनके प्रिय भक्त भी उन्हें पहचान नहीं पाते। तो इस प्रकार भगवान की अनेक लीलाएं हैं। जब भगवान 1 समय चोरों ने भगवान को चुरा लिया था, उनका शरीर सजा हुआ था हीरे, मोती और गहनों के साथ, तो चोरों ने उठा लिया भगवान के घर के आंगन से भाग रहे थे इस भाव से की दूरी पर पहुंच कर घर को चुराने और भगवान की देवी लीला ऐसी थी जहाँ वो दूर भागते थे, वो पहुँच जाते थे निमाई के घर पर, तो कई बार उन्होने प्रयास किया दूर भागने के लिए देखा कहाँ पहुँचे है निमाई के दरवाजे पर। फिर उन्होंने बच्चे को वाहन छोड़ दिया और छोड़कर भाग गए। जब माई छोटे थे उन्होंने 1 समय अपने मित्रों के साथ खेल रहे थे तो कई पिल्लों को घर ले आये पपीडॉक ले। तो इस लीला का वर्णन जितने मंगल में है। सच्ची माता ने कहा हम तो ब्राहमण हैं तुम पीले को घर में कैसे ले आये। मां ने कहा अगर तुम इस पिल्ले को घर में नहीं रखोगे तो मैं भी घर में नहीं रहूंगा। और दूसरे मित्रों ने शिकायत की। निमाई ने सबसे खुबसूरत पिल्ले को उठा लिया और हमारे बदसूरत पिल्ले छोड़ दिए। तो 1 दिन निमाई जब गए थे गंगा में स्नान करने के लिए। तुम की माता सच्ची ने पीले को छोड़ दिया। वे पीला घर से घूमते घूमते शैल के बीच में पहुँच गया। माई गंगा में थे, उनके मित्र भागे भागे आये। निमाई निमाई, निमाई। तुम्हारी। माँ ने पीले को घर से निकाल दिया है। निमाई बड़े क्रोधित हुए माई ने अपने सारे साथियों को भेजा ढूंढो ये पिल्ला कहाँ है? और साथियों ने ढूंढा और पिल्ला कहा था। शेर के बाजार के बीच में 2 पैरों से नाम नाच रहा था। 2 हाथ ऊपर उठा कर हरे कृष्ण मंदिर का उच्चारण कर रहा था और उसके शरीर से नेत्र से आंसू बह रहे थे। शुद्ध भक्ति के लक्षण प्रकट हो रहे थे। पूरे शहर में यह सूचना पहुंच गई। निमाई के घर में जो पिल्ला था वो नाचा और गारा है, हरि नाम का उच्चारण कर रहा है पूरा शहर वो भाग के आया। सबने देखा निमाई का चमत्कार और कहा ये तो भगवान होगा। यह लड़का उसने पिल्ले से नाम करवाया और सबके सामने भगवान के धाम से सुंदर रथ आया पिल्ले को लेने के लिए। और पिल्ला उस रत में चढ़ कर सबको बाय बाय बोले भगवान के धाम। ता। तो अगर आप ये सोचो की भविष्य में निमाई ने पिल्ला रखा तो हम क्यों नहीं रख सकते। तो आपको ये जिम्मा लेनी पड़ेगी के दिनों में उस पिल्ले को शुद्ध भक्त बनाओ पढाई करो। तो इस प्रकार निमाई अनेक लीलाएं हैं जिनके द्वारा स्पष्ट होता है कि निमाई स्वयं भगवान हैं और उन्होंने शुरू से ही अनेक अद्भुत लीलाओं को भी प्रकट किया। जब वो केवल 8 साल के थे तो उन्होंने 1 संस्कृत महाविद्यालय में प्रवेश किया। यहाँ की उन्होंने गंगाधर पंडित से संस्कृत भाषा की शिक्षा ग्रहण की। गंगाधर पंडित उस समय के बड़े प्रसिद्ध संस्कृत के पंडित थे। 2 साल में निमाई ने पूरे रूप से संस्कृत भाषा पर पूरा ज्ञान प्राप्त कर लिया और उस समय ना में भारत के जितने प्रसिद्ध संस्कृत के विद्वान थे, सब का निवास स्थान था नंबर 10 साल। 2 साल की उम्र। 2 साल में निमाई बड़े प्रसिद्ध पंडित बन गए। इसके लिए उनका 1 और नाम क्या था। निमाई पंडित पंत को हो जिनके पास ना चरित्र है, न आचरण है और पंडित का मतलब है जिसका संस्कृत भाषा में ज्ञान हो, जिसका आचरण हो, शास्त्र पर आधारित, उसे आप पंडित बुला सकते हो। तो 10 साल की आयु में माई उस समय उस समय के लगभग सबसे प्रसिद्ध पंडित बन गये थे और उन्होंने अपनी संस्कृत की 1 पाठशाला भी खोल दी। यहाँ की वो बच्चों को शिक्षा दे ते थे। तो निमाई पंडित उस समय के सबसे बड़े विद्वान माने जाते थे। उस समय 1 बड़े प्रसिद्ध संस्कृत के विद्वान थे, जिनका नाम था केश और कश्मीर वो थे। दिकविजे। उन्होंने भारत के सारे बंधनों को हरा दिया था। उनका नाम सुनते ही दूसरे पंद घबरा जाते थे। दिग्विजय को पता था कि नवदीप स्थान में अनेक प्रसिद्ध विद्वान हैं। उन्होंने यह भी सुना था 1 बालक है, वहाँ 10 साल का बड़ा प्रसिद्ध विद्वान माना जाता है। तो केशर कश्मिरी ने सूचना भेजी कि मैं आपके शहर के सबसे प्रतिनिधि से चर्चा करना चाहता हूँ। और ने सभा बुलाई सारे पंडित घबरा गये के सामने खड़े होने के लिए। सारे पंदित ा। हम तो सामने नहीं जायेंगे। फिल्म ने ये निर्णय किया। हमारे शहर के के सबसे छोटे पंडित हैं, उनको आगे कर दिया जाए। ये भाव था कि अगर केश कश्मीर ने छोटे पंडित को हरा भी दिया। तो कह सकेंगे आखिर इसने हमारे शहर के बच्चे को हराया। और अगर किसी प्रकार से छोटे पंडित ने उन्हें हरा दिया तो हम कह सकेंगे अगर छोटे पंडित उसे हरा सकता है। हमारी तो बातें छोड़ो तो माई गंगा के तट पर विद्यार्थियों को शिक्षा दे रहे थे। जबकि केश और कश्मिरी वहाँ पहुँचे। केश और कश्मीरी ने कहा आप ही हो वो निवाई पंदित जिनका गुणगान सुनते हैं। तो निमाई ने कहा लोग मुझे पंदतमानते हैं, पर मैं अनपढ हूँ। ये थी उनकी विनम्रता और कैश। के सुर ने कहा सुनाइए आप उदाहरण दीजिये संस्कृत भाषा के ज्ञान का। नाई ने कहा, मैं तो 1 पंक्ति भी ठीक नहीं बोल सकता। आप सुनाई। तो केश कश्मीरी ने 1 घंटे में सौ लोगों का उच्चालन किया, गंगा की प्रशंसा करते हुए। और फिर उन्होंने माई से पूछा तो तुम्हें कैसे लगा। माई ने कहा बहुत अच्छा। निमाई ने सौ लोगों का उच्चारन कर दिया। जब केशरकिश्मिनी ने सौ लोगों का उच्चारन आश्चर्य चकित हो गए। उन्होंने कहा, मैंने तो वायु की तेजी पर इन श्लोकों का उच्चारण किया था। तुमने इन्हें कंथस के कैसे कर लिया। जो व्यक्ति 1 बार सुनने में ही कंथस कर ले, उसे क्या कहते हैं। स्वामी ने शुकदेव को स्वामी के मुंह से भागवत। 1 ही बार सुनी वही भागवत। उन्होंने कंठस्त कर ली। 18 हजार लोग नमश्ानियामें संतों को सुनाया तो निमाने जो कमजोरियां थी उनकी राजा में उनकी चर्चा की। न प्रश्नों का तो निमाई ने दिए थे उत्तर नहीं दे पाए। निमाई के जो विद्यार्थी थे वो हसने लगे। क्यूंकि केश कश्मीरी उनके दिहाबकके प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाया। तो निमाई ने क्या किया? विद्यार्थियों को रोक दिया। हंसने से आखिर निमाई हमें सुनी चेन का उपदेश दिया है। विनम्रता से हमें सेवा करनी चाहिए। के कश्मीरी ने जब देखा की उनके विद्यार्थी केशर कश्मीर की हसी उडा रहे हैं, क्यूंकि केशर कश्मिरी के प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाया। माई ने विद्यार्थियों से कहा आज कैशेकशमीरथकेहु हैं, वो दूर से आये कल उत्तर देंगे। उन्होंने विद्यार्थियों को रोक दिया। हंसी उड़ाने से। तो इससे हम भक्तों को बड़ी महत्वपूर्ण शिक्षा मिल रही है कि हमे भी किस प्रकार से विनम्रता का भाव रखना चाहिए। 1 दूसरे के व्यवहार के साथ, संतो के साथ विनम्रता का भाव रखोगे तो भगवान की कृपा प्राप्त होगी। अहंकार का भाव रखोगे तो भक्ति छूट जाएगी। और माया का उदाहरण है। हमारी आँखों के सामने, तो कैसे कश्मीरी जब घर लौटे, उस रात को कैशे कश्मीरी थे सरस्वती देवी के भक्त? तो उन्होंने सरस्वती देवी से प्रार्थना की। उन्होंने कहा हमेशा आपने मेरी सुरक्षा की है। पर आज जब वो छोटे लड़के ने मेरी रचना में कमजोरियां सुनाई तो आप आप के द्वारा मुझे ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ। सरस्वती सरस्वती ने कहा वो बालक निमाई पंदित स्वयं भगवान हैं, मैं उनके समक्ष तुम्हारा सहयोग नहीं कर सकती। अगले दिन कश्मीर लौटे, हमाईपन्दिलके चरणों में अपने जीवन को समर्पण किया, उनके शिष्य बन गए। तो इस प्रकार निमाई ने सबको प्रभावित कर दिया था। भक्ति के प्रति। जब निमाई अपने स्कूल चला रहे थे तो रोज स्कूल जाते समय रास्ते में 1 भाग था, जिसका नाम था खुला बेचा श्रीधर उसकी दुकान के सामने गुजरते थे। आप भक्तों के लिए। खुला बेचा श्री दार अच्छा उदाहरण हैं। खुले बेचे श्रीद का बड़ा सादा धंदा था, क्या था धंदा केले के पतों के प्याले बनाते थे और केले बेचते थे। माय का उनके साथ बड़ा गहरा स्नेह था। 24 घंटे के शो कश्मीर केवल हरी नाम का उच्चालन करते थे। बस जो उनके पड़ोसी थे, उनको रात को नींद नहीं आती थी, क्योंकि कैश कश्मीरी अपने कमरे में इतनी जोर से जॉब करते थे। पूरी रात को उनके पड़ोसी कहते थे। लगता है भूखा है और भूत सता रहे इसे। इसलिए इसे नींद नहीं आ रही। तो रोज केशव कश्मीरी की दुकान में जाते थे और ऐसे पहले पूछते थे किले का क्या भाव है? तो बोलते थे 1 पैसा न, 1 पैसा डर्जन। आज मिलेगा के सिनेमा कहते थे, 1 पैसा दर्जन तुम बहुत ना कमा रहे हो, मुझे पता है तुम्हारे घर में बहुत धन है। तो केश कश्मीरी कहता था? केश कहते थे तुम आ के मेरे घर में देख लो, क्या धन है? माई कहता था, 1 दिन पुरे विश्व को तुम्हारा छुपा हुआ धन दिखाऊँगा। तो खुले बच्चा श्रीधर फिर कहता था, तुम दुकान में क्यों आते हो? रोज मेरा सिर खाने के लिए किसी और की दुकान में चले जाओ। ना कहता था, नहीं, तुम अच्छे स्टडी सप्लाई हो, तुम्हें मैं क्यों छोड़ के जाऊँ। तो इस प्रकार खुले बच्चा शी का खास सम्बन्ध था। खोल जो शीरा उनकी छोटी सी आमदन थी। आखिर केले के प्याले का कितना कमा सकते हो? और 1 छोटी आमदन का। 50 प्रतिशत वो खर्चते थे। किसकी सेवा में, गंगा गंगा की सेवा में? और 1 दिन मायने ने कहा ये 50 प्रतिशत, तो तुम खर्च हो, गंगा की सेवा में, आखिर गंगा कहाँ से बह रही है? मेरे चरणों से जब खोला श्रीधर ने सुना, उन्होंने कान बनकर, विष्णु, विष्णु, विष्णु देखो कितना अपराधी हैं, गंगा उसके चरणों से भरी है। इस प्रकार श्ीदारबड़ा गहरा सम्मान था, चेतन महा प्रभु के साथ और रोज नियमित रूप से खोले बजे श्रीधर की दुकान में निमाई आते थे। आगे बढ़ने से पहले, स्कूल में जाने से पहले, खुले बजे श्रीधर के घर में 1 छोटा सा कमरा था और वो कमरे में कोई छत विनी थी। जब बारिश आती थी तो खुले बचा श्री दीवार के साथ जुड़ जाता था कि वो भीगे नहीं। उनके पूरे घर में 1 ही बर्तन था। वह बर्तन इतना टूटा हुआ था कि चैतन्य भागवत में वृंदावन ठाकुर कहते हैं कि कोई चोर भी उसे छोड़ेगा नहीं। और इस स्थिति में 50 प्रतिशत खर्च से थे किस कार्य में। तो आप भक्तों के लिए यह अच्छा उदाहरण है, परिषद नहीं कर सकते कुछ, तो हमने हमें करना चाहिए भगवान की सेवा में। तो इस प्रकार निमाई ने संस्कृत का ज्ञान प्रकट किया। वो श्रीवास आंगन में शिवा ठाकुर के घर में उन्होंने अपने प्रचार का कार्य आरम्भ किया। पहले बचपन में निमाई शैतानी की लीला प्रकट की, फिर वो बने संस्कृत के विद्वान, फिर उन्होंने दूसरों को हराया इस विषय में। और फिर उन्होंने अपना समकितनडोलनआरम्ब किया, कहा शिवा संग में शिवा संगन हमारे मायापुर के मंदिर के थोड़ी दूरी पड़ी है और शिवा संघन में कीव उन भक्तों को आने की इजाजत थी जो क्षेत्नीय महाप्रभु के प्रिय भक्त और सारी रात किर्तन होता था। 1 समय 1 स्थान है आम घाट। कुछ दिन पहले अमित परिक्रम में थे तो आम घाट में चेतन महा प्रभु कीर्तन करते थे भक्तों के साथ और भक्त छ 78 घंटा किर्तन करने। व जब महा प्रभु कीर्तन करते थे भक्त के साथ, तो 89 घंटे किरतन, 1 साथ होता था। यही नहीं आधा घंटा कितने और थक गए लोग, 89 घंटे, 1 साथ नॉन स्टॉप तो 1 दिन बड़े किचन के पश्चात भक्त थक गए थे। भक्तों ने कहा भूख लग रही है माई पंडित ने फिर 1 अपनी देवलीला पकड़ के, उन्होंने 1 आम का बीज बोया जो मिनटों में 1 बड़ा पेड़ बन गया और पेड़ में 200 पके हुए आम थे कितने 2 से और 1 आम इतना भारी था कि भूखे व्यक्ति की पूरी भूख को मिटा देता था। दूसरे शब्द में 1 आम बस था 1 भक्त के भोजन के लिए, और ये आम जो थे बिल्कुल, मीठे, लाल और पीले हरे नहीं और इनामों में कोई घुटली बनी थी ना चमड़ा और 1 साल के लिए रोज, इस भीड़ से 200 आम निकालते थे और रोज रात को कीर्तन करने के पश्चात भक्तों का। 1 भंडारा होता था आम का और सब 11 आम खाते थे। और 1 के बाद वह पेड़ प्रगट हो गया। कुछ दिन पहले तो शिवा आंगन में छे तिन बहार पर न किर्तन के आंदोलन आरम्भ किया दूर दूर और केवल उन भक्तों की इजाजत थी जो महाप्रभु के प्रिय भक्त हैं क्यों? क्योंकि चेते महाप्रभु जब अपने दिव्य लीला प्रकट कर रहे थे, नाच रहे थे, गाने थे ये सुविधा देखने की केवल उनके प्रिय भक्तों को ही दिया जा रहा था। 1 समय 1 ब्राह्मण था जो केवल दूध और फल पर पला था। ब्राहमण शिवा पंडित के पास गए और कहने लगे मैं देखना चाहता हूँ महाप्रभु जी की लीला। शिवा ठाकुर ने कहा नहीं नहीं नहीं, ये केवल उनके भक्त को इजाजत है। और राम ने बड़ी विनती की शिव मान गए तो जब चेतन महाप्रभु नाच रहे थे, 1 दिन उन्होंने नाचना बंद कर दिया। उन्होंने कहा यहाँ कोई है जिसे नहीं होना चाहिए। शी वास, एकदम घबरा। उन्होंने कहा 1 ब्राह्मण है, जो बड़ा तपसी है, जिसने केवल दूध और फल खाया, जिंदगी भर। इसकी बड़ी इच्छा थी कि वह आपके दिव्य लीला का दर्शन प्राप्त करे ने कहा, केवल दूध और फल खाने से थोड़ी मेरा भक्त कोई बन जाता है। जब तक भक्ति योग नहीं करेगा, भाग नहीं बनेगा। फिर महाप्रभु ने खास कृपा प्रकट की ब्राहमण के सिर पर अपना पाँव रखा। वो ब्राहमण हरे कृष्णा का उच्चालन करने लगा और भाग जाएगा। इसी प्रकार 1 समय जब महा प्रभु अपना दिव्य लीला प्रकट कर रहे थे, किर्तन करते करते रुक गए। शिवा ने अपने सास को बिठा दिया था। 1 टोकरी के नीचे छुपा कर के देखे ला। शिवाज ने कहा, हाँ, मैं, मैं मेरी सास को ले आया था दिखाने के लिए। इस महा पर लाइन प्रकट की। वहाँ तो उसी शिवा संगन में 1 ब्राह्मण था, जिसके हृदय में इर्षा दवेश था, श्रीवास के प्रति ब्राहमी सोचता था। शिवाज को इतना आदर मिल रहा है तो उसने क्या किया? उसने शराब, और और वस्तुओं को शिवाज के दरवाजे के सामने रख दिया और कहा, और ये दिखाने के लिए के शिवा ढोंगी भक्त हैं, कृष्ण भक्त नहीं, ये तो दुर्गा का भक्त है। जब शिवाज ने दरवाजा खोला, अगले दिन सुबह और शाम और ये सब चीजों को देखा तो शिवाज ने कहा, देखो पड़ोसी, मैं तो पाखंडी भक्त हूँ, मैं तो दुर्गा का भक्त हूँ, कृष्ण का नहीं। लोगों ने विश्वास नहीं किया। सब ने मिलकर गोमुत्र से साफ कर दिया। उस थान को, इस ब्राहमण को खोल की बीमारी हो गई। 2 दिन में निमाई के पास गए, मुझे माफ कर 2 मैंने आपके विषय में द्वेश एशिया प्रकट की थी। निमाई ने कहा, तुम्हारे अपराध के कारण, तुम्हें हजारों सालों के लिए, नरक में जाना चाहिए, रहने के लिए। और निमाई ने कुछ नहीं किया। कई साल बीत गए, माई सनाज ग्रहन करके लौटे थे। ये ब्राह्मण फिर से उनके पास गया। और जब माई ने कहा, तुमने आगे माफी मांगनी है तो कहाँ जाओ शिवास के पास? तो इस घटना से हमें सूचना मिलती है कि हम भक्तों को वैषनाअपराधसी डरना चाहिए। वहाँ रहुगा भागवत के पांचवे में कहा, मुझे इंद्र के थंडरबॉल से डर नहीं, पर मुझे क्या चीज का डर है वैन अपराध करने से। और इस विषय में चीते ने, महाप्रभु जी ने उनकी माता का उदाहरण दिया। चीत ने महाप्रभु के भक्त कहते थे, आप सब पर दया कर रहे हो, पर अपनी माता पर दया क्यों नहीं? मेरी माता ने अपराध किया है। क्या था माता का अपराध? माता के हृदय में क्रोध था? क्यों उनके बड़े पुत्र विश्वरूप घर से चल पड़े थे? और माई ने भी सन्यास ग्रहण किया, तो उनके मन में यह भाव था। ये अधवेताचाया की शरारत है। अद्वेता चारियो ने मेरे बेटे के दिमाग को बदला है। तो जब अद्वेतचायाकोये सूचना दी जाती थी, वो कहते यह कैसे सम्भव है? सच्ची माता तो विश्व भर की माता है। वो गलत भाव कैसे रख सकती है? और ये कहते कहते भक्ति भाव में वो अधवेदकचढ़ाभिहोश हो गए। तो सच्ची माता पीछे से आई और के चरणों की धूल को लेकर माथे पर लगा तो महा प्रभु ने देखा माँ प्रभु बड़े प्रसन्न हुए और कहा मेरी माता को भागवत प्रेम प्राप्त होगा। तो इस उदाहरण से हमें क्या सूचना मिलती है। महाप्रभु ने अपनी माता का उदाहरण दिया तो हम भक्तों को जो पति है कितना सावधान रहना चाहिए कि अज्ञानता से भी हम वैष्णा अपराध नहीं करें, क्योंकि वैठना अपराध का बड़ा भयंकर परिणाम होता है। खासकर के जो भाग गंभीरता से आगे बढ़ना चाहते हैं, इस विषय में सावधान रहते हैं। जब चेतन महा ने अपना सम आंदोलन आरम्भ किया तो कइयों ने उनका विरोध किया जिनमें कई मुसलमान भी थे। मुसलमानों ने कहा कि ने मायने सब कितने आंदोलन आराम कर दिया है, हम सारे मुसलमान हिंदू बन जाएंगे। रोको रोको रोको। उस समय मुसलमानों का राज्य आरम्भ हो गया था। हुसैन शाह बंगाल के राजा थे, वो चंद काजी ने राजा के अधिकारी थे, चंद काजी जो था, फेनाटिक था फेनाटिक को हिंदी में क्या कहते हैं वादी ऐसे उन्हें अवतार माना जाता है। करवादी आज के जमाने से बात करो, उनसे तुलना नहीं करनी चाहिए। तो छान कजी को मुसलमानों ने सूचना दी। रोको रोको तुम ने माइक के आंदोलन को नहीं रखोगे तो सारे मुसलमान हिंदू बन जायेगा। जो 1 मुसलमान था दाढ़ी वाला, वो बार बार जान काजी से कहता था रोको माइक आंदोलन को बंद करो। तो जान काजी ने 1 दिन कहा तुम रोज जाके कहते हो रोको ने माइक के आंदोलन को जब भी मैं तुम्हें देखता हूँ तुम्हारे मुँह में हरे कृष्ण मंत्र होता है। ये क्या है रोको रोको रोको। तो मुसलमान ने कहा ये बात सच है जब से मैंने माय के हरि नाम को सुना है ये हरे नाम मेरे जीप ऐसे निकलता ही से और 1 तरफ से तो मुसलमानों की शिकात थी की निमाई मुसलमानों को हिंदू बना देगा। दूसरी तरफ से जो हमारे हिंदू ब्राह्मण थे वो निमाई का विरोध कर रे थे। उन्होंने कहा ये क्या बनावटी धरम निमाई पंडित ने पैदा कर दिया है, ये तो हमारे शास्त्रों की शिक्षा के बिल्कुल विरोध का है। तो उन्होंने कहा की वो चाँद काज़ी को शिकायत की कि माइक अंदोलन को रोको हमारे धर्म के बिल्कुल विरोध का धर्म है। तो चांद काजी ने अपने सिपाहियो को भेजा, जनकजी ने सिपाहियों को भेजा और कहा छोड़ 2 उनके मृदंग को और इन हिंदुओं को धमकी 2 की अगर उन्होंने ये सब के दान नहीं रोका तो हम सार को जबरदस्ती मुसलमान बना देंगे तो जान काजी के पुलिस वाले आये, सबके मिलंगे तोड़ दिए, कईयों को गिरफ्तार करके कहा अगर भविष्य में तुम लोगों ने यहाँ किर्तन किया तुम सबको हम मुसलमान बना देंगे या जेल में डाल देंगे ने महा प्रभु के सारे भक्त घबरा गए, अरे सबको मुसलमान बना देंगे, सब गये भागे भागे भागे भागे आए। महा प्रभु ने कहा मैं देखता हूँ ये चान काजी की क्या हिम्मत है। आज शाम को तुम सब आओ टॉर्च लाइट लेकर, टॉर्च लाइट, समदर, शा शा लेकर, टॉर्च लाइट लेकर, तुम सब आउट और हम सब जायेंगे और सब अपने घरों को सजाओ और हम सब जायेंगे मोर्चा में। चंद काजी के महेल में। वो तो पूरे शहर में यह सूचना फैल गई कि निमाई आज 1 मोर्चे को लेकर जा रहा है। चंद काजी के घर तक। और पूरा शेर आ गया, सबने अपने घरों को सजाया, बगीचों को सजाया, सब तौर से लेकर सवाए मृदंग किर्तन करते हुए। इतनी बड़ी सभा हो गई, 1 किलोमीटर, 2 किलोमीटर लंबा, 2 माइल लंबा, इन लाखों लोग जुड गए। वैसे तो हम हिंदुस्तान में कहते हैं कि महात्मा गांधी founder of the nonwाilanmovet, पापा जी कहते हैं की क्ल महाप्रभु हो, स्टार the पीसफुल नॉनवाइलnमoent, ये उन्होंने किया था 500 साल, तो चीतन्यमहाभक्तो को लेकर, टॉलाइकेसाथ रात के समय मोर्चा में जा रहे थे, चन काजी ने दूर से सुन लिया, प्रभु आते हैं, मोर्चा, वो घबरा गए, घबरा गए, सारे अधिकारी चयन काजी के घर में, महल में छुप गए। जब महा प्रभु उनके घर में पहुचे, पहले तो कोई सामने न प्रभु के भक्तों ने तोड़ना शुरू कर दिया। फिर चनका जी आये, चनका जी से महाप्रभु की चर्चा हुई, चन काजी ने कहा तुम्हारे ससुर मेरा नंबर चक्रवर्ती तो मेरे बचपन के दोस्त हैं, तुम मेरे भतीजे के समान हो। और अगर किसी स्थिति में चाचा मामा को गुस्सा आए तो भतीजा से लेता है। और भतीजे को अगर गुस्सा आए तो चाचा मामा से लेता है। तो हवा तो घर की बात है। तो फिर दोनों की चर्चा हुई धरम के विषय में। और महा प्रभु ने कहा ये कैसा धर्म है जिसमें गाय की सुरक्षा नहीं की जाती, जब गाय तो आपकी माता के समान है। तो मा प्रभु ने कहा उस धर्म में की क्या कदर, यहाँ की गाय पर हत्याचार किया, उपदेश दिया तो 4 कादी स्वीकार किया हमारे धर्म, हमारे धर्म, नए धर्म में उनमें कमी है। विनवा ने ये कहा आप मुझे ये विश्वास दीजिये, भविष्य में, खासकर के नवदिवस्थान में, किसी हालत में आप, कोई किसी हालत में आपका, कोई प्रतिनिधि, हरि नाम को नहीं रोकेगा। तो केशव कृश्मी ने कहा मैं ही अधिक जिम्मेदारी तुम्हें देता हूँ, मैं तुम्हे 1 और सूचना देना चाहता हूँ। जिस दिन मैंने अपने प्रतिनिधियों को भेजा था, तुम्हारे भक्तों के मृदंग को तोड़ने के लिए, उन्हें गिरफ्तार करने के लिए, उस रात को मुझे सपना आया जिसमें 1 भयंकर शेर प्रकट हुआ और उसने अपने तेज नाखून से मेरी छाती को चीर लिया। देखो ये निशाने भक्त ने निशाना देखे तो समझ गए भगवान थे। और उस शेर ने कहा अगर भविष्य में तुमने कभी भी इस सब कितना डोलन को रोका तो मैं तुम्हें। मैं उस रात से इतना घबरा गया कि मैंने जो गलती की। तो भक्तों ने कहा वो शेर कौन थे, कौन थे? भगवान जी ने आगे यह कहा कि मेरे जो अधिकारी हैं उन सबने आकर यह शिकायत की कि जब वो गए हमारे सम रोकने के लिए तो सबकी दाढी में आग लग गयी। सारे मोल। जाते थे। रोगो रोगो, रोगो आग लग। जानकारी ने कहा मैं तुम्हें यह विश्वास दिलाता हूँ के आगे भविष्य में मेरी कोई भी पीढ़ी आपके आंदोलन को नहीं रोकेंगे। तो इस प्रकार क्षेत्र मे आप उन्हें चनकाजीजऔरसबउनके। प्रतिनिधि को किया भक्ति और 89 घंटे लगातार कितन करने के पश्चात के महा प्रभु कहाँ गए? खुले श्रीधर के घर में कितने बर्तन थे, टूटा हुआ बर्तन तो महा प्रभु के घर गए और पानी पीने लगे हो। इस लोटे से खोला भी शीला ने कहा प्रभु आप क्या कर रहे हो? ये मेरा झूठा लोटा है इससे आप पानी पी हो। और माँ लोगो ने कहा मैं पानी पी रहा हूँ। इस लोटे से अपने शुद्ध जीवन को शुद्ध बनाने के लिए मैं तुम्हारे बर्तन से पानी पी कर अपने आप को पवित्र बना रहा हूँ। हाँ प्रभु ने कहा था न मैं 1 दिन प्रकट करूँगा पूरे समाज को तुम कितने धनी हो? तो सारे भक्तों ने देखा असली धन क्या है? असली धन है, बहुत धन नहीं, हम सोचते हैं किसी प्रकार से भौतिक धन कमा लें, बहुतिक सुविधा प्राप्त कर लें। तो इसमें सफलता है। पर आध्यात्मिक वाली जानता है असली धन क्या है? यह आध्यात्मिक धन इस प्रकार चेतना। तो चेतन महाप्रभु ने जब प्रचार आरम्भ किया तो सब जगह लोगो को प्रभावित कर दिया था। यह चेतन महाप्रभु ने सन्यास भी ग्रहण किया। चेतना महाप्रभु 1 समय गोपी गोपी गोपी बाहर प्रकट कर रहे थे। गोपियों का जो भाव है, सबसे उत्तम भाव है, इसकी तुलना कोई कर नहीं सकता। बहुत वादी व्यक्ति सोचते हैं। गोपियां भगवान के सेलियां थी, सेलिया नहीं थी। गोपियों के मन में केवल 1 ही भाव था। धन मन धन से भगवान की सेवा। तो जितने गोपी गोपी गोपी गोपी गोपी गोपी गोपी गोपी गोपी गोपी कह रहे थे। तो 1 संसद का विध्यार्ती आया कहने लगा क्या गोपी गोपी कह रहे हो? कृष्ण कृष्ण बोले, क्या गोपी गोपी गोपी का नाम ले रहे हो? महा प्रभु जिस स्थिति में थे वो समझ नहीं पाया कि जैसे महा प्रभु ने कहा जो गोपियों का भाव था, इसकी तुलना कोई नहीं कर सकता, गोपियों का भाव है। तो। तो फिर ने डंडा लेकर उस व्यक्ति का पीछा किया। वो व्यक्ति भाग गया और वहाँ हजार विद्यार्थी थे। तो वहाँ पहुँच कर उसने हा अरे निमाई पंडित, हम उसको पंडित मानते हैं। और आज डंडे से आया था। मुझे मारने के लिये। तुम सब नहीं होते। तो मैं मर जाता। तुम सब ने बचा दिया। तो सब भक्तों ने, विद्यार्थियो ने कहा हा ये निमाई पंडित दिखता। तो बड़ा विज्ञान, ज्ञानी और चरित्र उनका ठीक दिया। और लड़कों ने कहा निमाई को तुम भविष्य में आओगे डंडे के साथ तो हम तुम्हें ठीक कर देंगे। तुनेही सोचने लगे मैं प्रकट हुआ हूँ किस लिए? पदों के उधार के लिए है कि नहीं? श्री कृष्ण चेतना प्रभु दया कर। मोरे तुम बिन के दयालु जगत समझा रे। 1 राजा के पुत्र थे। मैं क्या कहते हैं? चेतना महा प्रभु मेरे पर कृपा कीजिए तो मेरा के दयालु जगत संसार है, आप से ज्यादा दयालु कोई है ही नहीं। चेतना महा प्रभु खास प्रकट हुए किस लिए? पतितों का उद्धार करने के लिए? और आगे वो कहते हैं हाँ प्रभु नित्यनंद प्रेम कृपा कर के आगे वो प्रार्थना करते हैं, हे भगवान नित्यनंद, आप सदा आनंद आनंद में हो नंदा और मैं जो हूँ अत्यंत दुखी हो। दूसरे शब्दों में, भगत में हमेशा विनम्र का भाव होने के कारण वो अपने आप को पतित मानता है। तो और नरमराज ठाकुर कहते हैं अगर आपको नीति नंदा की शरण मिले तो आनंदी आनंद प्राप्त होगा और नीति माध्यम से चेतन महापरब की कृपा प्राप्त हो सकती है। आगे कहते है दया करो, सीतापति, अदवेतगुसायपबाले पाई चेतना। फिर वो कहते हैं चाय आप मेरे ऊपर दया कीजिए अद्वेता चाडिया। और हाई राज ठाकुर दोनों निवास कर रहे थे शांतिपुर में और शांतिपुर में। अध्वेताचारियनेजब समाज की स्थिति देखी तो अध्वेताचार्या ने देखा की इन पतितों का उधार केवल भगवान कर सकते हैं, हम उधार नहीं कर सकते। तद्वेदाचारीऔरहरिदा सागर चारी के दौर शालीग्राम थे, जिनकी पूजा करते थे। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की हे भगवान, आप स्वयं प्रकट हो पतितों का उद्धार करने के लिए। और अद्वेता चारिया की प्रार्थना के उत्तर में भगवान प्रकट हुए। किस रूप में चेतना महार के रूप में व द्वेत चारिया और उनकी पत्नी सीता देवी। उन्होंने जब भगवान प्रकट हुए थे, उनके माता पिता को भी म शिक्षा दी थी। 1 समय जब भगवान पैदा हुए थे, उन्होंने अपने माता के स्तन से दूध पीना इनकार कर दिया। उनकी माता बेटा दूध नहीं पी रहा तो गए की पत्नी सीता देवी के पास। सीता देवी ने कहा क्योंकि आपने दीक्षा ग्रहण नहीं की है, इसलिए आपका बेटा आपके स्थान का दूध नहीं पी रहा। सच्ची माता ने तुरंत ही दीक्षा ली। चाय से बेटे ने दूध पीना आरम्भ कर दिया। तो शुरू से ही देवी ने भगवान को, भगवान के मामा को तो कहते हैं अदवेदाचाहिदया कीजिये आपकी कृपा से ही मुझे, भगवान ने नंदा और चेतना महा प्रभु की कृपा प्राप्त होगी। हा प्रभु। आगे नर्मदा ठाकुर कहते हैं वो प्रार्थना करते है। स्व रूप सुना न। 6 गो स्वामी है, ने गुरु थे, लोकनादाजगोस्वामी लोकनदाजगोस्वामी के थे, कौन थे तो प्राथना करते है दया करो, शीर, चहाया प्रभु, शीरमाल, रामचंद्र संगमा के नोतमदाजनिरतमदास के 1 बड़े प्रिय मित्र थे रामचंद्र कविराज, जो गियास में थे और गरीब थे, खास धन नहीं था, पर 24 घंटे जुड़े हुए थे भक्ति में, तो उनसे प्रार्थना करते हैं मुझे सदा रामचन्द्र कविराज के संग। दूसरे शब्द में हमारे मन में भाव होना चाहिए कि हम सदा भक्तों की संगत में रहे। तो चेतन महा प्रभु सत्य दयालु अवतार है। जो प्रकट हुए थे, इसलिए पतितों का उद्धार करने के लिए उन्होंने जैसे चेतन हा गया है। भक्ति का जो खजाना था, उसके ताले तोड़ दिए। खजाने के ताले को खजाने में क्या था। हरीराम और चेतन ने खुले रूप से ये हरिनाम सबको बाटा। दूसरे शब्दों में, बिना किसी भेदभाव के चेतना महा प्रभु जी ने यही नाम का उपदेश दिया। कैसे पूरे मानव समाज? चेतना महा प्रभु की वाणी थी। सर्वर प्रचार नाम विश्व में जितने नगर है, गाँव है, सब जगह क्या होगा? ये हरि नाम पहुँचेगा चेतन। महाप्रभु जी स्वयं भगवान चेतन। महाप्रभु ने देखा ये विद्यार्थियों का स्वभाव किस प्रकार से वो उनकी निंदा कर रहे हैं। लकड़ी लेकर उनसे लड़ने को तैयार हो गए। ये सारे विद्यादि डंडे लेकर आगे और कहा निमाई से अगर भविष्य में तुमने ऐसा किया तो तुम्हें पीट देंगे। तो निमाई ने सोचा मैं तो प्रकट हुआ हूँ पतितों का उद्धार करने के लिए। मैं यह देख रहा हूँ कि ये लोग मे से लड़ना चाहते हैं, इनसे मैं अपराध करा रहा हूँ। निमाई ने निर्णय किया की मुझे सन्यास ले लेना चाहिए। क्यों? क्योंकि भारतीय समाज में माया वाली सन्यास ही हो, उसकी भी इज्जत होती है। और माँ। प्रभु ने कहा कि वो इज्जत करेंगे। तो इसलिए उन्होंने सन्यास ग्रहण कर लिया, सन्यास ग्रहण किया किससे के भारती और सन्यास लेते ही महा प्रभु। जगना जी का दर्शन देने के लिए। जैसे जगना जी के मंदिर की ओर जा रहे थे, वो कह रहे थे जगह जगह जगह जगह जगह जगह जगह उनके मन में था। अब मुझे मेरे प्रिय भगवान का दर्शन प्राप्त होगा। भक्त के मन में भगवान के विग्रह में कोई अंतर नहीं, तो उनके मन में यह भाव क्या आया? अब मुझे भगवान का दिव्य दर्शन प्राप्त होगा। और इस खुशी में वो दौड़ते दौड़ते गए कहा जगतु जगना जी का दर्शन लेते। जगना जी का दर्शन लेते ही वहाँ बेहोश हो गए और बेहोश हो गई और गिर गए। जगना जी के सामने पुजारी ने दरवाजा बंद करना था भोग लगाने के लिए जो पुजारी के सामने समस्या थी, मैं क्या करूँ? सुनाल रंग था। तो सर्व बचाया का घर बिल्कुल पड़ोस में ही है जगनपुर मंे। तो पुजारियों ने सर्व चारिया पहुँचे। सर्व बरेचार्यवैसेतो बेहस्पत के अवतार हैं और बहुत ऊँचे कोडी के मायावादी सिद्धान प्रचारक थे। पहले वो रहते थे में जब बंगाल में मुसलमान राजा आया तो उन्हें वहाँ से निकालना पड़ा और वो आये का जगनादपुरी में यहाँ की ओडिशा के 1 बड़े धार्मिक राजा थे। मनाज प्रता पुरु जिसने उन्हें रहने का स्थान दिया। तो जब सर्व चाहे वहाँ आये, उन्होंने देखा वहाँ के सारे शरीर के सारे अंग बिल्कुल नहीं हिल रहे। पर फिर उन्होंने 1 रूई रखी नाक के सामने वो रूह थोड़ी हिल गई। तो वो समझ गए की ये निमाय अभी तक जिंदा है। मर गया ने लोग भक्तों को कहा उठा कर ले जाओ इसे कहा मेरे घर में तो चेतन महा होश पडे थे भक्ति भाव ने में और सर बोले चाय का कोई ज्ञान नहीं था, इनको होश में कैसे लाया जाए? तो ने माईने। तो थोड़ी देर में वहाँ भगवान नित्यनंद पहुँच गए, भगवान नित्यनंद पहुँचे, उन्होंने मंदिर में पूछा यहाँ कोई सुनार का सन्यासी आया था। तो नित्य नंदा ने सुन लिया कि चर्चा होती थी की 1 सुनार का बड़ा खुबसूरत सी आया था। वो देखते ही जगराजयकोबेहोशहो गया और उसे उठा कर ले गए है कहा जी वहाँ पहुँचे अपने भक्तों के साथ और उन्हें पता था भगवान को होश में कैसे लाना? तो उन्होंने क्या किया, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा का कीर्तन किया। और जैसे किर्तन किया महा प्रभु होश में आ गए और नाचने लगे गाने लगे। सर चाय। इस कथा को देखकर बड़े प्रभावित हो गए। सर चाय के 1 रिश्तेदार थे जिनका नाम था गोपी ना, द चर्या और गोपी नादा चारिया। उनके बदन लौ थे पत्नी का भाई गोपी चर्या के मन में पूरा विश्वास था चेतिया महाप्रभु स्वयं भगवान है। और जब वो ये कहते थे चर्या से, तो सर्व चाय कहते थे हाँ भगवान नहीं हो सकते हो, भगवान नहीं, भगवान संभव नहीं सरोरचायनेजनितनंद भगवान। सब ने कीर्तन किया और महाप्रभु होश में आ गए। तो बड़े प्रभावित हुए। पर उन्होंने यह भी देखा सर चाय की आयु इस समय लगभग 80 साल की थी, तो वो निमाई पंदित के दादाजी की उम्र के बराबर थे। तो सर चाया सोचने लगे निमाई इतना खुबसूरत युवक है, कहीं माया में न गिर जाए, कोई उसे फंसा नहीं ले। तो सरवबोरेचारे ने कहा मुझे निमाई की सुरक्षा करने 2। तो उन्होंने कहा तुम बैठो निमाई पंडित, मैं तुम्हें विधान दुत्रा का उपदेश देना चाहता हूँ। और 7 दिन के लिए 7 रातों के लिए लगातार विधान सूत्र की ओर व्याख्या करते गए। और निमाई चुपचाप व्याख्या फिर आठवे दिन के आठवें दिन सर्वर चालिया ने पूछा तुम इतने 1 हफ्ते से दिन रात विदांत 1 नही पूछा समझ, मै क्या बोल रहा हूँ? तो निमाई ने कहा विधान 10 सूत्र का जो सन्देश है, सूर्य की रोशनी के समान बिल्कुल साफ है। पर जैसे अगर आप सूर्य की रोशनी को बादल से ढक 2 तो रोशनी नहीं देखेगी, उसी प्रकार आपने अपनी व्याख्या देकर। विधान दर सूत्र के असली संदेश को ढक दिया है। और इसलिए पहले फिर आगे भागवत के 1 प्रसिद्ध श्लोक है आत्माराम श्लोक उस पर चर्चा हुई और निमाहने उसी आत्मराम श्लोक को सर्व वोटर चाहिए ने 9 अलग अलग तरीकों से समझाया, तो निमाई ने कितने तरीकों से सर्व वोटर चाहिए ने 9 तरीकों से समझाया और फिर उन्होंने पूछा इनसे माई से कैसा लगा? तुम्हें रिया ने ऐसे समझाओ आत्मा लोक को श्लोक को सर ने 64 अलग तरीकों से समझाया कितने 64 समझाया किसी को भी रिपीट नहीं किया। जब सर्च ने 600 तरीकों से 1 श्लोक की व्याख्या सुनी वो आश्चर्य हो गया। उन्होंने कहा यह तो केवल भगवान कर सकते हैं। और उन्होंने तुरंत सिर ने निमाई पंदर के शरनागत होकर उनसे ज्ञान की भीख मांगी और उन्होंने सौ श्लोकों की चर्चा की निमाई का गुणगान करते हुए सौ श्लोकों की चर्चा की और फिर माई ने उन्हें खास दर्शन दिया, अपना सद बुज रूप प्रकट किया। मैं जाती हा सद्मुजकीपेंटिंग हैं तो सदबूजरूपमेंआप क्या देखते हो? छे हाथ 2 हाथ थे भगवान कृष्ण के, 2 थे, रामचन्द्र जी के 2 से 6 दिन तो 6 दिन बार पाबुजी। हालांकि गुप्त अवतार हैं। छुपे वतार उन्होंने ये दावा नहीं किया कि वह स्वयं भगवान है। जब लोग कहते थे आप भगवान कृष्ण हो, वो अपने कानों को बंद कर लेते थे। 3 बुना कभी यह नही कहा कि मैं भगवान हूँ। पापा जी ने अनेक समय ये समझाया है हमें कि चेतना महा प्रभुजी के संदेश में, चेतन या महा प्रभु के संदेश में कोई अंतर है, कोई अंतर नहीं है। वो हुए छना बता, छुपे हुए अवतार के रूप में चेतन या महा के खास। आदेश क्या है यह नाम का? चेतन ने अपना सद बूझ का रूप प्रकट किया। किसके लिए चाया ने सौ स्तुतियों द्वारा छेत्रिय गुणगान किया, स्वीकार किया कि वह स्वयं भगवान तो इस प्रकार चेतन या महा प्रभुजी की अनेक लीलाएं हैं। कहा जाता है चेतन या महा प्रभुजी की कृपा से अंधा व्यक्ति देख सकता है, लंगड़ा व्यक्ति पहाड़ों के पार जा सकता है और गूंगा व्यक्ति बोल सकता है। बहरा व्यक्ति आप सबको के तिन महाप्रभुजी के शरणागत होते हुए चेतन्य महाप्रभु से ये प्रार्थना करनी चाहिए कि आप दीर्ध होकर भक्ति में जुडो और आपके हृदय में है। नाम के प्रति प्रेम बढ़े चेतन्य महाप्रभु हुए थे। पति को उद्धार करने के लिए। व प्रापा जी उनके प्रतिनिधि थे, जो ले गए। चेतन्य महाप्रभु जी के संदेश को विश्व के कोने कोने में और हमें यह प्रार्थना करनी चाहिए क्षेत्र महाप्रभु जी के प्रिय बने। और यह संभव है। अगर आप पवित्रता के साथ आई नाम का उच्चालन करो। चेतन महा प्रोगो की है।
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