आत्मा का स्वरूप | Form of soul | BG 2.22 | 19 Oct 1996 | Mumbai | Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja

In this devotional lecture, Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja expounds on Bhagavad Gita Chapter 2, verse 22, elucidating the nature of the soul (ātma) and its relationship to the body. He uses the analogy of discarding old garments for new ones to illustrate how the soul, being eternal and immutable, merely changes bodies while remaining unchanged. The discourse emphasizes that the body is perishable, subject to birth, growth, decay, and death, whereas the soul is timeless, never born nor dying. He explains the Vedic concept of 84 lakh yoni (species) of existence, highlighting that the human birth is a rare and precious opportunity, attained through great difficulty and therefore deserving reverence. The lecture contrasts material knowledge, which is limited and flawed, with Vedic spiritual knowledge, which is perfect and leads to liberation. It outlines the various sources of human suffering—birth, disease, loss, desire, and mental agitation—and presents the Bhagavad Gita’s teaching of performing one’s duty (dharma) without attachment, surrendering to the Divine, and chanting the holy names (e.g., Hare Krishna mantra) as a means to purify consciousness and attain true happiness beyond material pursuits. Throughout, the speaker stresses the importance of understanding one’s true self, applying the Gita’s guidance in daily life, and using spiritual practice to transcend the cycles of birth‑death.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय नम भगवते बासु देवाय। आज हम आपको भागवत गीता के दूसरे अध्याय का बाइसवां लोक सुनाएंगे वसंती जनानी यथा विहाय नवानि गृणांति नरो पहानी तथा श्री रानी बिहाय जनानी अनियानिसम्याति नवानि देही। इस लोक का अनुवाद इस प्रकार से है। भगवान इस लोक में कह रहे हैं। जिस प्रकार 1 व्यक्ति पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्र स्वीकार करता है, उसी प्रकार ये आत्मा पुराने दे 1 दे को प्यार करके नया दे स्वीकार करती है। हम ज्ञान तिनरनदस्या, ध्ानंजनाशलक्या, चक्शुरनमृतनना जस्मा, श्री गुरवे नम हा, श्री चेतन्या मन वेस्ट, सपितनयनभुतले, सयम, रू, प, क, दाम, ददाति, स्वा पदतिक, श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्य, श्री रेतगदाहैशिवाशदि गो भक्त, विंदा, हरे, कृष्ण, हरे, कृष्ण, कृष्ण, कृष्णा, हरे, हरे, हरे, राम, हरे, राम, राम, रे, संशिजेनानीयथा, बहाया नवानी गनांति रो पानी तथा श्री रानी बिहाय जनानी अन्यान समयादि नवानि देही। भागवत गीता का जो उद्देश्य है वो पूरे मानव समाज के लिए है और भागवत गीता का उद्देश्य सबसे प्राचीन शिक्षा है। इस पृथ्वी पर यही उद्देश्य जो कि हम गीता में पढ़ते हैं, जो हम समझते हैं कि भगवान ने 5000 साल पूर्व दिया है। असल में योगेश भगवान ने लाखों साल पूर्व सूर्य देवता विवस्वान को दिया था। भागवत गीता के द्वारा हमें हमारे स्वरूप के विषय में ज्ञान प्राप्त होता है। आज अगर आप श्रद्धानत व्यक्ति से पूछो कि उनका असली स्वरूप क्या है? तो बहुत कम व्यक्ति ठीक उत्तर दे पाते हैं। भागवत गीता के दूसरे अध्याय को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है क्यूंकि इस अध्याय में हमें अपने स्वरुप के विषय में ज्ञान प्राप्त होता है। जैसे कि जब आप यात्रा में जाते हो विदेश, तो जब आप विदेश में जाते हो तो सबसे पहले वो आपसे पूछते हैं कि आप हो कौन? कहाँ से आ रहे हो, कहाँ जा रहे हो? तो आप अपना पासपोर्ट दिखाते हो, अपना नाम वगैरह बताते हो। तो उसी प्रकार के दुसरे ध्यान में भगवान ये स्थापित कर रहे हैं कि ये जो शरीर है, यह हमारा असली स्वरुप नहीं है। तो असली स्वरुप क्या है? असली स्वरूप है। आत्मा आत्मा को शरीर ढक रहा है। जिस प्रकार जो वस्त्र आपने और मैंने पहने हैं, वो हमारे शरीर को ढक रहा है। और आत्मा का क्या स्वरूप है? आत्मा के विषय में कहा गया है कि ये सनातन है, ये जो भौतिक शरीर, चाहे वो करोड़पति व्यक्ति का हो या गरीब व्यक्ति का, ये 6 अवस्थाओं या स्थितियों से गुजर कर जाता है, आदन में जन्म लेता है, अस्त्यस्ते बढ़ता है और अंत में यह बुरा होता है और फिर नष्ट हो जाता है। जब नष्ट होता है तो हम मानते है के व्यक्ति का देहांत हो गया। तो हम कहते है ये गुजर गया, इसकी मृत्यु हो गई, इसका देहांत हो गया। पर जो शरीर है वो तो वहाँ ही उपस्थित है। तो हम क्यूँ कहते हैं कि उसका देहांत हो गया? हम इसलिए कह पाते हैं क्योंकि वो उस व्यक्ति के हृदय में जो आत्मा थी, वो आत्मा छोड़ कर किसी और स्थान पर चली गई है। दूसरे शब्दों में आत्मा का जो स्वरूप है वो यह है कि उसका न तो कभी जन्म होता है, न ही उसका अंत आता है। यह आत्मा जो है, सनातन है तो आत्मा सनातन है, शरीर नश्वर हैं। शास्त्रों के अनुसार हम सब थोड़े समय के लिए एकत्रित होते हैं। पती, पत्नी, माता, पिता, भाई, बहन, मित्र के रूप में। पर समय के आने के साथ हम सब अस्तेस्ते जुदा हो जाते हैं। जैसे की कभी आप गाड़ी में यात्रा करते हो तो जब यात्रा करते हो तो 24 घंटे के लिए अनेक साथ ही आपके मित्र बन जाते हैं। पर फिर मंजल आने पर आप अपने रास्ते जाते हो और दूसरे अपने रास्ते जाते है। तो भागवत गीता के अनुसार हमें अपना अपनी असली स्वरूप, हमें अपना असली स्वरूप समझना चाहिए और अगर हम अपने असली स्वरूप को समझे तो फिर हम ये मानव जीवन का लाभ उठा सकते हैं। हमारे वैदिक शास्रों के अनुसार 84 लाख के सबकी यूनिया है जिसमे की मानव यूनि केवल 4 लाख की मानी जाती है। या दुसरे शब्दों में मानव शरीर जो है बहुत कठिनाई के साथ प्राप्त होता है, जिसका हमें दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। साधारण स्थिति में अगर कोई चीज हमें कठिनाई के साथ प्राप्त हो तो उसकी हम बहुत कदर करते हैं, सच बात है और अगर कोई चीज सरलता के साथ प्राप्त हो तो उसकी खास कदर नहीं होती। तो उसी प्रकार से ये जो मानव शरीर है ये हमें बहुत कठिनाई के साथ प्राप्त हुआ है। इसलिए हमें इसकी खास कदर करनी चाहिए। दूसरे शब्दों में हम सब अनेक और योनियों में गुजर चुके हैं। जल की योनी, स्थावर यूनी, कीड़े की यूनी, पक्षी की योनी की योनी और इन सब योनियों में गुजरने के पश्चात हमें यह मानव देह प्राप्त होता है। साधारण स्थिति में भी हम देख सकते हैं कि मानव दे और पशु की जिंदगी में अंतर है। अंतर क्या है? मानव मानव शरीर के द्वारा हमें अनेक नियमों का पालन करना पड़ता है। जैसे कि सरकार भी जब नियम बनाती है, आप लोगो के लिए बनाती है, जो मुंबई के पशु वगैरह हैं उनको उनसे यह उम्मीद नहीं की जाती कि वो नियमों का पालन करेंगे। अगर आप लाल बत्ती के होते हुए सड़क के दूसरी तरफ जाओ तो आपको पुलिस पकड़ लेगी और अगर कोई जानवर जाए तो उसको पुलिस कुछ भी नहीं कहती। तो अनेक उदाहरणों के द्वारा आप देख सकते हो कि जो मानव शरीर है ये जिम्मेदारी का शरीर है तो गीता का क्या उद्देश्य। गीता में हमें वैदिक शास्त्रों का सार प्राप्त होता है। वैदिक शास्त्र विधि शब्द जो है उसका अर्थ है ज्ञान। तो आप कहोगे? जो ज्ञान हमें पाठ, शाला और महाविद्यालय में प्राप्त हो रहा है उस ज्ञान और वेद ज्ञान में क्या? अंतर अंतर यह है कि भौतिक ज्ञान में सबसे पहले तो 4 प्रकार के 2 शिया कमियाँ है। अध्यात्मिक ज्ञान में किसी प्रकार का दोष नहीं है, न ही किसी प्रकार की कमी है। इसलिए हम इस अध्यात्मिक ज्ञान को सनातन धर्म के नाम से भी जानते है। तो भौतिक ज्ञान में अनेक दोष हैं। और आज भौतिक ज्ञान हमें पाल महाविद्यालयों के द्वारा प्राप्त हो रहा है। इनके सहयोग से हमें यह ज्ञान नहीं मिल रहा कि किस प्रकार हम अपने आप को कठिनाई या इस कठिन स्थिति या जन्म मृत्य का जो बंधन है उससे हम अपने आप को निकाल सके। हर व्यक्ति भौतिक समाज में खुशी चाहता है। हर व्यक्ति आनंद चाहता है, कोई व्यक्ति नहीं है जो कठिनाई या कष्ट चाहता है। आपने और हमने ये इच्छा नहीं पर पशु में भी यही इच्छा रहती है। पशु भी यही चाहते हैं। सुख आनंद और जो मानव योनी है वो भी यही चाहते हैं। पर ध्यान से देखा जाए तो कहाँ है सुख हम सब प्रयास करते हैं। जब जवानी रहती है सेट ठीक रहती है, धन होता है जेब में, तो हम यही सोचते है। ये भौतिक जीवन के द्वारा केवल सुख सुख प्राप्त होगा। इच्छा के बिना हमें 7 प्रकार के कष्टों को भुगतना ही पड़ता है, कोई नहीं चाहता पर हमें जबरदस्ती इन क्लेशों के सामने झुकना पड़ता है। क्या है ये कष्ट? 1 प्याला कष्ट हमें महसूस होता है जन्म के द्वारा। जहाँ बच्चा जन्म लेता है तो आपने देखा होगा कि वो केवल रोते हुए इस जन्म इस जगत में आता है। इसका क्या सन्देश है कि माता के घर में बड़ी कठिन स्थिति में रहते हुए जब बच्चा जन्म लेता है तो रोते हुए बाहर निकलता है। कोई बीमार नहीं होना चाहता चाहे डॉक्टर हो या आपका अपना हॉस्पिटल हो, कोई बीमार नहीं होना चाहता, कोई बुरा नहीं होना चाहता। अगर आपके पास कोई ऐसा जादू हो की आप बुडापे रोक सको तो सभी आपके गिराक बन जाए और कोई मिट्टी के सामने झुकना नहीं चाहता। इन 4 कष्टों के अलावा हमारा मान ने रूपों से हमें कष्ट देता है। जब आप देखते हो क्या के पास कोई सुविधा है जो आपके पास नहीं है का मन सताता है। जब किसी मित्र या का देहांत होता है तो फिर भी मन हमें सताता है। तो निक रूप से मन हमें सताता है और मन बेचैन रहता है। मन में भय है। 1 बड़े महान भक्त ने कहा है बाजा बुरे माना श्री नंद नंदन चरना तुम भय से भरे हुए हो। आप किसी देश के प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के पास जाओ उसके मन में भी कितना भय है। 1 बार महान भक्त गोविन्द दाज्जी कहते है अगर आप किसी रूप से भगवान कृष्ण के शरनगतहोजाओतोअपने आप को आप इस भय की स्थिति से बचा सकोगे तो भौतिक संसार में चाहे कितना भी प्रयास करो आप अपने आप को कष्टों से नहीं बचा सकते। जब आप रोगी होते हो, पीड़ित होते हो तो आप क्या करते हो, आप डॉक्टर के पास जाते हो अपनी बीमारी का इलाज करने के लिए। उसी प्रकार आज जो हमारी रोग पीड़ा है उससे बचने के लिए 1 ही उपाय है। जैसे गीता में भगवान कहते है सब धर्मों को छोड़ कर मेरे हो। मैं तुम्हें बचाऊंगा। तो भगवत गीता का जो उपदेश्य है इसे हमें किसी प्रमाणिक गुरु के सहयोग से समझना चाहिए। कई बार लोग सोचते हैं कि गीता का उपदेश यह है समाज को त्यागो, घर त्याग, धंदा त्यागो और जंगल पहाड़ में चले जाओ। निवास करने के लिए। गीता के अनुसार कर। कर्म करने से तो कोई बच नहीं सकता। कुछ न कुछ कार्य तो हर व्यक्ति को करना ही पड़ता है। तो भगवान कहते हैं मेरी खुशी के लिए कार्य करो करवानी। वन इस कार माफलेशोकलाचना जो फल है, वो मुझे अरपन करो। जैसे भगवान ने अर्जुन से कहा तुम इस युद्ध में लड़ो, हार और जीत का सोचे बिना, सुख और दुख का सोचे बिना मेरी खुशी के लिए इस युद्ध में तुम लड़ो। तो गीता का उद्देश यह है की मानव जीवन को इस प्रकार से निभा की भौतिक समाज में रहते हुए आप भौतिक समाज की जो दोष है, उनसे अपने आप को बचा सको उदाहरण दिया जाता है। जैसे कमल का फूल जल में होते हुए जल उसे छू नहीं पाता, उसी प्रकार मानव जीवन में रहते हुए उस प्रकार से रहना चाहिए कि हम जो दोष है, कमियां हैं। भौतिक समाज की, उन से हम अपने आप को बचा कर रखे, उनसे हम अपने आप को दूर रखें। यह बहुत महत्वपूर्ण है। अगर हम मानव जीवन का ठीक लाभ उठाना चाहते हैं। जैसे हम कह चुके हैं, छुराजिला योनियां हैं, जिसमें सिर्फ 6 लाख योनिया मानव की है। दूसरे शब्दों में ये जो कठिन मानव शरीर हमें प्राप्त हुआ है, अगर हम इसका सुदुपयोग नहीं करेंगे, अगर हम इसका दुरुपयोग करेंगे तो इसका यह परिणाम होगा की हमें भी ये दूसरी योनियों में जन्म स्वीकार करना पड़ेगा और उन योनियों के द्वारा हम जन्म वृति बंधन से छुटकारा प्राप्त नहीं कर सकेंगे। केवल मानव योनि के द्वारा ही ये शिक्षा प्राप्त कर सकते हो कि किस प्रकार से आप अपने आप को जन्म मृत के बंधन से आप बचा सकते हो। तो भगवत गीता के द्वारा भगवान कह रहे हैं किस प्रकार से अपने जीवन को आप शुद्ध बना सकते हो। जैसे भगवान कहते हैं पतलमपसपमपलमतोयियो में भक्त प्रयोजती खाए बिना तो कोई रह नहीं सकता। खाने की आवश्यकता है। भगवान कहते हैं पत्ता फल, जल, मुझे अर्पण करो, प्रेम के साथ और मैं उसे स्वीकार करूंगा। तो हमें यह शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए जिसके द्वारा भगवान के प्रति हम से प्रेम बढ़ा, सके और पैदा कर सके। आज हम सब सोचते तो हैं कि हमारे हृदय में प्रेम है, भावना है। पर ध्यान से देखा जाए तो प्रेम नहीं है, भावना नहीं है। सुबह से रात तक सारे विश्व में हम यही प्रयास करते हैं कि किसी न किसी रूप से हमें इंदियतृप्तीया भौतिक सुख की सुविधा प्राप्त हो। पर ये भौतिक सुख की सुविधा केवल जब प्राप्त हो सकेगी, जब हम किसी न किसी रूप से प्रयास करें। भगवान के साथ हमारा सम्बंध जोड़ने के लिए आज हम प्रयास करते हैं, परिश्रम करते हैं सुबह से रात तक धन कमाने के लिए। सारे विश्व में लोग धन के मोहित हैं। हम यह नहीं कहते कि धन को त्यागना चाहिए और धन का सुदुपयोग करना चाहिए, दुरुपयोग नहीं। आज धन के इच्छुक सब है, क्यूंकि धन साधन बनता है, भौतिक इंजट्रिप्तीके कार्य के लिए। थोड़ी की स्थिति ऐसी है क्या कितना भी प्रयास कर लो, आप इन्हें कभी भी संतुष्ट नहीं कर पाओगे। हमारे वैदिक शास्त्र में 1 सरल उदाहरण दिया गया है इस विषय के ऊपर, जैसे कि जब आपको चमड़े की बीमारी हो तो आपको खुजली करने की इच्छा होती है। तो चाहे आप कितना भी खुजली कर लो, जितना आप खुजली करोगे, उससे बीमारी बढ़ेगी घटेगी, नहीं। तो इंदियों के विषय में कहा गया है कि हमें अ्शुदिंदियों को शुद्ध बनाना है, उसका दुरुपयोग मत करो, पर उसका सुदुपयोग करो। हम सब को खुशी चाहिए। हम सोचते हैं सिनेमा देखेंगे, सिनेमा देख कर। क्या आपका जीवन कुछ बदला है? पूना, पूना, चर्वित, चरवा नाना प्रलाद। कहते हैं। आज हम चर्बेहुएदने को फिर से चला रहे हैं। जैसे बॉम्बे में लोग गन्ने के रस को निकालते हैं, फिर गन्ने को फेंक देते हैं। दूसरा व्यक्ति आता है, उसी गन्ने को, उठाता है रस निकालने के लिए। और रस नहीं निकालता। तो उसी प्रकार चाहे आप किसी से भी प्रयास करो। असली सुख की वो, जब आप अनुभव कर सकोगे, जब आप अपनी चेतना को बदला चेतना। आज हमारी चेतना क्या है? हम, ये शरीर है और शरीर के इन के मालिक हम हैं। इसलिए हर कार्य का उपयोग करना है। बहुत। जब आपकी चेतना शुद्ध बनती है साधु संगत के द्वारा, हरि नाम के द्वारा, जब ये स्वीकार करते हो, क्या भगवान हरजीत के स्वामी हैं, हम सब के भी अंश हैं। और हमारा कर्तव्य यह है कि हम किसी न किसी रूप से भगवान के साथ जोड़ने का प्रयास क करे? तो भगवान का उद्देश्य यह नहीं है कि अब समाज त्याग हो। भगवान का देश यह नहीं है कि आप घर, बार, गलत सब त्याग हो, परन्तु यह उद्देश्य है कि अब पने जीवन को शुद्ध बनाओ, पवित्र बनाओ। और ये सम्भव हो सकता है। भगवान के विभिन्न नामों के द्वारा। जिस प्रकार कमल का फूल जल में होते हुए जल को छूता नहीं है, उसी प्रकार हमें भौतिक समाज में रहते हुए भौतिक समाज की जो कमियाँ हैं, दोष है, उनसे बचने का प्रयास करना है। तो भगवान के तो अनेक नाम हैं। आपके हमारे 1 नाम होते है, 2 होते हैं, 3 होते हैं। पर भगवान के लाखों लाखों, लाखों नाम है। पर व हमारे वैदिक शास्त्र में लाखों मंत्रों का उच्चारन है। पर 1 मंत्र को महामंत्र के रूप में बताया गया है। यह इस कलियुग में खुशी का साधन तो हैं। ये हरे कृष्ण मंत्र, हरे कृष्ण मंत्र के द्वारा हम भगवान से प्रार्थना करते हैं। क्या हरे कृष्ण मंत्र में सोमा शम है? हरे कृष्ण, हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण, हरे, हरे, हरे रामा, हरे रामा रामा रामा, हरे रे हम भगवान से प्रार्थना करते हैं। हे प्रभु, आप हमें हमारी रक्षा कीजिये आप हमारे अपने चरणों में रखिये। और इस दिन नामों के उच्चारण से जो हिरदे में मैल है। जैसे बादल के होते हुए आप सूर्य को नहीं देख सकते, धूम के होते हुए आप आईने में अपने चेहरे को नहीं देख सकते। पर धूल जब दूर हो जाती है तो आप अपने आईने आईने में अपने चेहरे को फिर से देख सकते हो तो उसी प्रकार ये जो भौतिक धूल जिसके कारण जिसे हम अज्ञानता बुलाते हैं, जिसके कारण आप अपने आप को नहीं पा सकते इस धूल को दूर करने की आवश्यकता है और इस धूल को आप दूर कर सकते हो। कैसे भगवान के दिव्य नामों के उच्चारण के द्वारा यहाँ उपस्थित हो विनती करने आये हैं की किसी न किसी रूप से जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य है उसके लिए आपको समय अवश्य ही देना चाहिए। आपके स्वामी जी हम आप की बात मानते हैं पर आप जानते नहीं की आज के जीवन में हमें कितना संघर्ष करना पड़ता है और समय न ही है। करें क्या? देखिये जब कोई रोग पीड़ा बीमारी आप पर गिरती है तब समय पवाइंटमेंट कैंसल करके अपने शरीर को ठीक करते है। पहले ठीक है न? तो उसी प्रकार जो महत्वपूर्ण कार्य है उसके लिए तो हमें समय निकालना ही चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण क्या कार्य है धन, सम्पत्ति, रिश्तेदार सब यहाँ ही रह जाएंगे। आपके साथ केवल जो अपने पुण्य करण किया है वो भी आपके साथ जाएगा और कुछ नहीं जायेगा। तो इसलिए महान ऋषि, मुनियों ने, श्रीमद भागवत, भगवत, गीता इत्यादि ग्रंथो ने यही कहा है कि किसी न किसी रूप से अध्यात्मिक ज्ञान जरूर बहुत ज्ञान के साथ आपने भौतिक शिक्षा प्राप्त करनी है। तो करो पी एच डी, करो, डबल पी एच डी करो। हमारी संस्था में हजारों भक्त हैं जिन्होंने पी एच डी एम ए वगैरह किया है। पर साथ में आप जीवन का जो उद्देश्य प्राप्त करने का माध्यम है उसके सम्बन्ध में जो शिक्षा है उसको भी समझने का प्रयास करो। तो परम भगवान श्री कृष्ण अलग अलग समय में उपचारित होते है और क्षेत्र मे महा प्रभु जी के रूप में पारित हुए हैं। महाप्रभु जी ने क्या कहा है भागवत का अध्ययन कर। भागवत भगवान की वाणी है। भगवान को अपने दिव्य धाम चले गए है पर वो अपनी वाणी को छोड़ गए है। इन शास्त्रों में तो जब हम इन शास्त्रों को पढ़ते हैं तो हमें यह समझ आता है कि मानव जीवन का किस प्रकार से हमें उपयोग करना चाहिए। साथ सब धनम प्रेमियों के भारी है कि आप सब अपना मूल्य समय देकर। यहाँ पदरे आपसे यह मिलती है कि मानव जीवन का जो महत्व है उसको मत भूलो और जो भगवान का आदेश है उसको मत ठुकराओ और भगवान का आदेश क्या है के किसी न किसी रूप से ये भगवान के नाम का उच्चारण करके आप अपने जीवन को आगे बढ़ाओ। का सब से यही विनती है की आप हरे कृष्ण मंत्र को अपनाइए थोड़ा 1 माला जाप कर लोग 1 साथ जाप करेंगे अभी और गीता को भी पढ़ो। 1 श्लोक पढ़ो 2 श्लोक पढ़ो पढ़ो और आप देखोगे कि कार्यों की न तो कोई भौतिक कीमत है। इन भगवान का नाम लेने के लिए, गीता पढने के लिए कोई कीमत नहीं भरनी पड़ती पर केवल गीता प्राप्त करना तो छपाई की कीमत पर इन कार्यों के द्वारा निराशा दूर होगी, शांति की प्राप्ति होगी और आप असली खुशी को अनुभव कर सकेंगे। दुर्भाग्य की बात यह है यह सब शिक्षा संतों के द्वारा, ग्रंथों के द्वारा प्राप्त होती भी है और हम इसका लाभ नहीं उठाते। तो आप सब से यही प्राथना है शिक्षा का लाभ उठाइये और असली सुख को महसूस कीजिए हाले कृश हाई, क्रिष्णा हार किशना, क्रिष्णा हारे हारे नाम रामललाल।
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