Glorification of Srila Prabhupada | 09 Sep 2005 | New Delhi | Srila Gopal Krishna Goswami

In this Hindi devotional lecture delivered by Srila Gopal Krishna Goswami in New Delhi on September 9, 2005, the speaker extols the life, sacrifices, and spiritual mission of A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada, the founder of the International Society for Krishna Consciousness (ISKCON). He recounts Prabhupada’s arduous journey—from his early struggles in India, the perilous sea voyage to the West, multiple heart attacks, and relentless publishing efforts—to spread Krishna consciousness worldwide. The talk weaves prophetic references to Chaitanya Mahaprabhu and foretold future leaders, emphasizing that Prabhupada’s work fulfills ancient spiritual predictions. The speaker urges devotees to intensify personal practice (chanting, meditation), to preach the Hare Krishna mantra, and to establish temples, cultural centers, and educational programs, thereby preserving and propagating the teachings for future generations. Throughout, the lecture blends scriptural citations, historical anecdotes, and heartfelt appeals, aiming to inspire commitment, service, and the continued expansion of the movement.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय नम भगवते बaसदेवaयa। hey krishna the ecialopropalon this most special bias puja day। a bec you offer my most, someo, the besence devine lotus feet in your dealings you manifested all the qualities of an to char your every that word an example was based on the cases, the spite toland of followers compatable living conditions copies, donations and setra you all was main a humble thebody of the supreme lord in a poor man could easily approach for guidance। he did not let optical struct your determination to servies personal master even all age and sickness did not slow down your preaching and translation actuatieswhen the word slept you got of predicted the bucidanteprpos books of guided thousans on the pather volution to the pather devotional service you bucheon the perpose continue guy hemanti for the next sens thousand years the termination repeat is comparable to the mode of grand father isma who while pers by many aros remain in perfect meditation and instructor king in for many days, so de wotialotchetania link to close point water that no rises a food of love of god and as a senser follow lorgupania you instructed the members of iscon to increase the number of washnovesthe following appears in chatane chat amrita adiviassevennigty to esure puri to log tania my dear child continue dancing chanting and performing sumcitenanasociation with the bodies for them or go out and preach thevally of chanting krista nam for by this process, you will be able to deliver all folloing sols so property about is also year disha on this species day। i beg for you call this murti so that i may be a tiny instument in expanding log tania sumgasandmovement me। he only hope or suffering humanity, i feel br fortunate to have the opportunity to glarifaryouinesoc eseinovotherris numbers king the excusimy for this for offering which im writing in moscow after long struggle, we are finally upteinland and this is very important city। please let s the begin bill that nice temple and a cultural center for your pleasure, you are in sigin? जैसे महामद ने कहा था अक्सर मैं राज पूजा के समय बॉम्बे में रहता हूँ, क्यूँकी प्रॉपर जी ने कहा था की बॉम्बे इज माई ऑफिस और आपके देली ह प्रभु की वाणी थी आज से 500 साल पूर्व पृथिवी नगरादीग्रामसर्वध प्रचार मोरोन नकी भविष्य वाणी थी के विश्व के हर कोने में ये हरी नाम पहुँचेगा ठाकुर जी जिन्हें चेतन महा देवी शक्ति माना जाता है, उनकी भविष्यवाणी थी कि बहुत ही जल्द 1 प्रसिद्ध सेनापति प्रकट होगा जो की कृष्ण भक्ति को पहुंचाएगा विश्व के हर कोने में तो वहाँ प्रभु जी की भविष्यवाणी थी और ठाकुर आर 1935 40 50 तक कृष्ण भक्त भारत के बाहर नहीं पहुँची थी। कई गोलिया सन्यासी ने मुझे कहा है कि वो सोच रहे थे की चेतन महार पबजी की भविष्य वाणी तो है पर कल इतनी तेजी से बीत रहा है कि यह संभव नहीं होगा। भक्ति सिधांत ने भी अपने 23 सन्यासियों को भेजा था इंग्लैंड में जर्मनी में कृष्ण भक्ति की स्थापना के लिए, पर ज्यादा सफलता के बिना वो भारत लौट गए थे। तो गुड़िया सोचते थे की भविष्य वाणी सत्य नहीं निकलेगी, पर भारत को पूरा विश्वास था निकलेगी, इसलिए बिल्कुल पहली 1922 में भारतीय सिधांत आदेश दिया था की तुम ले जाओ चेतना महा प्रजी सन्देश को विश्व के हर कोने में तो जैसे आप जानते हो, प्रॉपर को अत्यंत संघर्ष करना पड़ा, खास कर के आपके दिल्ली शहर से पापाजी का बड़ा गहरा संबंध था क्यूंकि दिल्ली भारत की राजधानी थी और पापाजी जब वृंदावन में राधा दामदरमंदरमें निवास कर रहे थे तो बकरा वृंदावन से दिल्ली आते थे अपने ग्रंथों को प्रकाशित करने के लिए, धनी करता करने के लिए, और फिर इन ग्रंथों का वितरण करने के लिए भी। तो प्रपोज को पूरा विश्वास था की अगर हम प्रयास करेंगे तो महाप्रभुजी की भविष्य वाणी सत्य निकलेगी। 10 दिन पहले हम लोग ने शायद 1 हफ्ते से 10 दिन पहले जिस दिन रूपक सम भाव व्यवस्था, वो दिन था जब कि प्रापा जी भारत से गए थे अमेरिका के लिए जालुतजहाजकेदवारा तो नील मृत में आप पढ़ते हो की 1 में से भ्रष्टाचार या संगीतकार थे प्रापा जी समय मिले थे लखनऊ में या प्रॉपाजीराजभवन में कार्यक्रम करने के लिए गए थे तो ये भ्रटाचारी संगीत का था कहीं ऊँचे कोटी का वैष्णव नहीं था। और जब प्रापा जी कैलकटा आये क्योंकि प्रापा जी ने जाला दूर जहाज कैलकटा से पकड़ा था तो उस समय उनकी जान बचाने का कोई व्यक्ति नहीं था और ये भाचार्य परपज के लिए 34 कार्यक्रम रेंज किए थे और वो कई अखबारों में गया था इस सन्देश के साथ की छापो ये स्वामी जी अमेरिका जा रहे हैं, भागवत का सन्देश लेकर किसी ने छापा ने 1, बंगाली पत्रिका ने 1 छोटा सा लेख छापा और जब उन्होंने मांगा की प्रापा जी की फोटो को देन छापने के लिए तो उन्होंने जो पासपोर्ट फोटोग्राफ थी वो दिया और 4 ने कहा की हम टैक्सी में गए थे प्रॉपाजीकोछोड़ने के लिए, और कोई नहीं था कोई पापाजी को नमस्ते यह भाई भाई बोलने के लिए तो प्रापा जी ने काफी संघर्ष किया और रास्ते में 2 बार हार्ट अटैक हुआ था अमेरिका पहुँचने से पहले 1 दूसरे हार्ट अटैक के बाद प्रॉपर सोच रहे थे केबिन की योजना सफल होगी और उन्हें अमेरिका पहुँचते ही लौट जाने का प्रबंध करना चाहिए पर फिर उसी रात प्रभाजी का सपना आया जिसमे राधा रानी जी ने कहा की तुम्हारी यात्रा सफल होगी। और पापा जी ने देखा की भगवान कृष्ण खुद नाव को चला रहे है जिसे पापाजी नाव में बैठे हैं। तो प्रौपर जी की इच्छा थी कि कृष्ण भक्ति की स्थापना हो सारे विश्व में और प्रापा जी की इच्छा थी की खास कर के भारतवासी इस संस्कृति को गहराई के साथ अपनाये, प्रापा जी को दुख होता था ये देखा कि भारतवासी अपनी संस्कृति से दूर जा रहे हैं तो आप सब भक्त जो की इसको के साथ जुड़े हो भारत में आपके आपके ऊपर खास आदेश है महा प्रज आदेश है। जो व्यक्ति भारत भूमि जन्म ले उसे अपना उद्धार करना और दूसरों का और साथ में चेतन जी का भी आदेश है की भारतवासी इस संस्कृति को स्वीकार करे और इससे आगे पहुंचाए हैं। उनके विषय में पापा जी ने कहा है कि लोग भविष्य के 10 हजार सालो के लिए इन ग्रंथों को पढेंगे, कई बार सारे विश्व में प्रचार करो भक्त मिलते हैं। जो कहते हैं हमारा दुर्भाग था, हम प्रौपर्जी को नहीं मिले। पर हर व्यक्ति पर जी की संगत का लाभ उठा सकता है। हर व्यक्ति उनका दर्शन प्राप्त कर सकता है। अगर हम उनके ग्रंथों की शिक्षा का लाभ उठाये। जैसे की जबश्वप्रापाजी ने श्रीमद भागवत प्रथम स्कंद को अर्पण किया। अपने गुरु महाज को। उन्होंने कहा ही लिव्स फॉर, एवर, बाई डिवाइन, इंस्ट्रक्शंस फॉलो लेजर की आप हमेशा जीवित रहते हो अपनी शिक्षा के द्वारा, और जो आपका शिक्षक हैं वह आपकी शिक्षा का पालन करके आपकी संगत प्राप्त करता है तो हमारा सिद्धांत वृति सिद्धांत नहीं है। पर जब भी हर व्यक्ति, प्रापक शिक्षा, उनकी संगत, उनकी कृपा को आज भी प्राप्त कर सकता है। अगर वो श्रद्धा से उनकी शिक्षा के आधार पर चले प्रॉपर्टी चाहते थे, कि संस्था के भक्त उनके ग्रंथों का अध्ययन करें। प्राप्ति चाहते प्रापर्टी चाहते थे की इस संस्था के भक्त उनके ग्रंथों का अध्ययन करें। प्रॉपर्टी की इच्छा थी की उनके ग्रंथों का वेतन हो। इस भावना के साथ के लोग इन ग्रंथों को पढेंगे और फिर अपने जीवन को सुधारेंगे। तो प्रॉपर जी की कृपा से प्रचार बढ़ रहा है। जब प्रौपर्जी प्रकट हुए थे, प्रॉपर जी प्रकट हुए थे। आज से लगभग इस साल 30 साल पूर्व नवम्बर, नाइनटीन सेवंटी सेवन में प्रापा जी अ प्रकट हुए थे। और जब प्रापा जी जिस समय प्रकट हुए थे, इस कान के शायद 140 या 100 डेढ़ सौ बंदर थे। पर प्रापा जी की कृपा से, उनके प्रतिनिधि, उनके शिक्षा के आधार पर चल रहे हैं तो से कृष्ण भक्ति का प्रचार बढ़ रहा है। खास कर के भारत में और हमारा प्रयास रहना चाहिए कि हम उस प्रकार का आसन रखे जिसके द्वारा प्रद और स्कान की शोभा बढे। लोग यह उम्मीद करते हैं की स्कॉन में कुछ खास स्टेन होगा। सफाई का स्टैंड, ठाकुर, सेवा का स्टैंड, केतन का स्टैंड, भक्तों के आश्रम का स्टैंड, प्रचार का स्टैंरड। तो हम सबको इस स्टैंड में आकर अपना कार्य करना चाहिए। जैसे दूसरे भक्तों ने कहा है कि हमें एशिया से बचना है। कई भक्तों ने कहा कि किस प्रकार हमें अच्छी साधना रखनी चाहिए। जैसे प्रॉपर जी ने कहा प्योरिटी, द, फोर्स और प्योरिटी की प्राप्ति हो सकती है। अच्छी साधना के द्वारा। तो आप सब से यही निवेदन है कि आप प्रॉपर चिकित शिक्षा के आधार पर चलने का प्रयास करो। प्रापा जी ने यह स्थापित किया है की आज इस आधुनिक युग में भी इस कृष्ण भक्ति का उपयोग कर सकते हो। तो ये आपसे निवेदन है। प्रापक ऐसे संघ थे जो कि प्रकट हुए थे। चेतन महाप्रभ भविष्य वाणी को सत्य बनाने के लिए प्रॉपर जी वो सेनापति थे जिनके विषय में भक्ति न ठाकुर जी ने हमें सूचना दी थी और प्रापा जी की महिमा दिन पर दिन 1 रूप से बढ़ती जा रही है। आज विश्व के किसी कोने में भी जाओ और किसी से पूछो आप ने भक्ति नंद स्वामी प्रापा जी का नाम सुना है तो आपको लोग केंगे है कई साल पहले मैं निया की गली में चल रहा था तो 1 ब्लैक काला व्यक्ति आया भागा भागा कहने लगा आई नो प्रभु मैंने पूछा कैसे उसने कहा की मैंने उनकी किताब पड़ी थी में तो आप सब से यही निवेदन है कि प्रापाजीकेशिक्षा के आधार पर चलिए प्रापा जी ने लगभग हर प्रश्न का उत्तर दिया है। इन ग्रंथों में कई बार हमारे भाग सोचते है की प्रापा बड़े एलिमेंटरी हैं हमें कोई खास एडवांस रासा की आवश्यकता है। मेरे ख्याल से प्रापा जी ने हमें सन्देश दिया है जितना हमें चाहिए भगवा धाम लौटने के लिए पापाजी ने कहा कि दिस बुक सही न फॉर द नेक् ट्रेन थाउजनयर्स और हमें श्रद्धा से इन गंथों को पढ़ना चाहिए और इस शिक्षा को अपनाना चाहिए। अपने जीवन को सफल बनाने के लिए चला प्रापक हाई कृष्णा कृष्णा हरे कृष्णा हरे हरे ले रहा हाल हमारे हाल।
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