In this Hindi devotional talk, the speaker recounts a vivid episode from a Vrindavan festival that took place a year before the departure of Sevanti Sevanti Rupa Ji. The Maharaja, H.H. Gopala Krishna Goswami, despite being from a wealthy, internationally‑connected family and holding a senior managerial position abroad, personally carried two large buckets of prasād (vegetables and rice) onto a pilgrimage bus. The narrative details how the Maharaja, dressed in a simple dhoti, lowered the buckets to the road level, loaded them onto the bus, and performed the service with humility and devotion. The speaker emphasizes the Maharaja’s extraordinary compassion, his complete lack of enmity toward anyone, and his universal love for disciples and all beings. The talk contrasts the Maharaja’s worldly stature with his spiritual simplicity, highlights his non‑violent, inclusive attitude, and reflects on the deep emotional impact this sight left on the devotee. The anecdote serves to illustrate the Maharaja’s character: a great soul who transcended positional prestige through selfless service.
Chapters
पर गोपाल कृष्ण गोसाई महाराज जी 1 अन्यतम भक्त थे, भगवान के प्रति, प्रभु, पाजी के प्रति उनकी श्रद्धा थी, प्रेम था। तो स्वाभाविक है की अनंत अनंत, सदगुण, अच्छे अच्छे गुण उनमें थे तो सभी गुण तो गिना भी नहीं जा सकता है। लेकिन हम 1 छोटी सी घटना का वर्णन करते हैं। यह एग्जेक्टली सेवेंटी सेवन रूपा जी के डिपार्चर के 1 साल पहले की बात है, जो वृंदावन जो फेस्टिवल होता है। मैं 1 नया वक्त था, फुल टाइम, फुल टाइम लास, हाफ टाइम से गुरु महाराज और अपने भाई से मिलने के लिए आया था। तो 1 घटना ऐसी थी कि उस समय भी पहले बस के द्वारा परिक्रमा होती थी, भक्त जाते थे और बस में हम लोग प्रसाद भी उसी में लोड किया जाता था। अब जहाँ भी जाते थे जिस दिन द्वादश बने तो वह भक्त लोग प्रसाद खाते थे। तो स्वाभाविक था मैं भी बस में दुख ही गया, हमारे गुरु महाराज भी साथ थे। 1 दृश्य सामने आया की जो बॉकेट था, प्रसादन का बॉकेट सब्जी था, राइस था, उसको बस में लोड करना होता था। तो महाराज जी उसे महाराज नहीं थे सेवेंटी सेवेंटी सिक्स की बात करता हूँ बाल्टी लेकर दोनो हाथ में उनके बाल्टी था, नीचे सिलाना होता था, रोड साइड में लेकर उसको बस में लोड करना होगा। हम जानते नहीं थे, नाम तो सुने थे, हमारे गुरु महाराज भी थे। तो हमसे बताया इंट्रोडक्शन दिए कृष्ण महाराज जी का गोपाल कृष्ण जी हैं। यह जी ही कहा गया जी गोस्वामी के लिए नहीं हम कहते हैं। और उन्होंने बताया हमारे गुरु महाराज यह बताया की बहुत बड़ी धन परिवार से है, रष्टकटिकफैमिली से है और पश्चात देशों में अमेरिका में, कनाडा में 1 बड़ी भारी कंपनी के मैनेजर थे और प्रभु पाजी के वेस्ट जगह ऐसी अन्यतम जो इनेगिने जो शिष्य हैं उस समय बने। तो उसमे से 1 है और जी बी सी है तो वह हमारे वह छवि, आज भी बार बार वह छवि याद आती है दोनो में बकेट बाल्टी लिए हुए हम बढ़िया सी याद है, अभी भी याद आती है। धोती पहने थे और माना धोती पहने थे तो धोती का स्टैंड होता है, नीचे तक नहीं थोड़ा सा ऊपर ही रहता था। कुछ लोग धोती पहनते हैं न। तो थोड़ा सा नीचे तक नहीं ढका था, ऊपर तो ऐसा ही था। और ऐसे भी खोंस कर में हम अनुभव कर सके हम बिहार से बनारस की तरफ से है, धोती पहनते है तो कहाँ तक निचाई जाना चाहिए। तो उसे सरेंडर। तो वो सेवा, भाव व जीबी सी थे बहुत बड़े आदमी से, भौतिक दृष्टिकोण से देखा जाए, बड़े आदमी थे आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो बड़े आदमी थे पद पोजीशन की दृष्टि देखा जाए तो उसमे भी बहुत बड़े जी बी सी थे और सबके बाद प्रभुजी के अन्य शिष्यों में थे। तो यह 1 महाराज जी का जो सेवा, भाव और भक्तों के प्रति जो सहा स्नेह हमें कभी ऐसा अनुभव कभी भी मिलने को ऐसा नहीं लगता था, हमें ऐसा लगता था कि हम जितना डिजर्व करते हैं, जितना हमको स्नेह मिलना चाहिए, गोपाल की समारा, उसे कई गुना, और यह केवल मेरा अनुभव नहीं है अपने का इसके साथ 1 और मैं 1 गुण की। केवल चर्चा करता हूँ। महाराज का जो व्यक्तित्व है, व्यक्ति था, अच्छा व्यक्तित्व है, जिसको हम शब्द में कहते हैं कि किसी के प्रति हम नहीं देखे की ऐसे की महाराज 1 मैनेजमेंट में थे, तो स्वाभाविक होता है, कुछ कलह होता है बड़े बड़े लोगों में 1 दुसरे के बाद कुछ रसिया भी भाव होता है। लेकिन महाराज जी का जो गोपाल, महाराज जी का जो स्वभाव था, वे किसी के प्रति भी आक्रोश शब्दों का उच्चारण किया, अपने गुरु भाई के प्रति, चाहे, अपने शिष्य अथवा किसी के प्रति, ऐसा नहीं तो 1 दृष्टि से इस्कान में सर्वप्रिय अथवा हमें अपने लेवेल से कहना होगा? तो हम यह कह सकते हैं कि महाराज सकानमें, अजात, शत्रु, उनके नजर में, उनके दृष्टि में कोई किसी का तिरस्कार, हर शब्द बोलना, किसी कारण से ऐसे करेक्ट करने के लिए। दूसरी बात है कभी कभी, लेकिन उसके हित में, तो महाराज हम सोसाइटी के रूप के शिष्यों से 1 अजात शत्रु यह 1 गुण था आज।