श्रील प्रभुपाद का अमेरिका के लिए प्रस्थान | HH Gopal Krishna Goswami |27.08.2018 | ISKCON Vrindavan

In this devotional lecture, HH Gopal Krishna Goswami recounts the events leading up to Srila A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada’s departure for the United States in 1965. The talk begins with a brief overview of Prabhupada’s early life, his family’s spiritual inclinations, and the formative influence of his father, Gopal Monde, who emphasized service to saints and devotion to Krishna. It then details Prabhupada’s intensive work on publishing the Bhagavata Purana in three volumes, the financial hardships he faced, and the network of patrons and devotees who provided crucial support. The speaker describes the bureaucratic hurdles of obtaining a passport, visa, and sponsorship letters, including the role of an Indian merchant family (the Agrawals) and the Indian Consulate in New York. The narrative follows Prabhupada’s arduous journey from a third‑class train in Delhi to the port, the sea voyage, and his arrival in New York and Boston, where he began preaching the message of Krishna consciousness. The lecture emphasizes the prophetic vision of Srila Bhaktisiddhanta Sarasvati Thakura, the divine instruction to spread the teachings worldwide, and the sacrifices made by Prabhupada and his followers. Concluding remarks urge listeners to emulate Prabhupada’s dedication, study and distribute the Bhagavata, and continue the mission of spreading Krishna consciousness globally.
Chapters
हाई कृष्ण, तो आज के दिन ओगस तेरा 1965 हमारे परम गुरु भक्त ननदसवमीपरपल। कहाँ गये थे? क्या करे से गए थे? कहा? अमेरिका तो आज हम संक्षेप में इस लीला की चर्चा करेंगे। आप पहले भी सुन बैठे हो। कई बार भगवान उनकी लीला भक्तों की लीलाओं का भाव क्या रहता है। जितना सुनो उतना ही कम है। कभी आपको लगता है हर नाम हम लेते हैं, थक गए नहीं, जितना लोग उतना ही कम है। शिलप्रावपद प्रकट हुए थे इस पृथ्वी पर, छेद महाप्रभु जी की भविष्य वाणी को पूरा करने के लिए। छोटी आयु में ही उनके पिता घोर मोंडे ने उन्हें धातमिज्ञान प्रदान किया था। और पिता की सदा यही इच्छा थी। you be a little, softer, there are। पिता की यही इच्छा थी कि मेरा बेटा बड़े और बैक। और पिता की यह इच्छा थी कि मेरा बेटा बड़ा कर क्या बने। माता की इच्छा थी मेरा बेटा इंग्लैंड जाए पढ़ने के लिए। और वहाँ न तो पिता ने छोटी आयु उन्हें हर प्रकार की शिक्षा दी। 7 साल की हाइयों में। पापा जी ने रथ याता की योजना के और मानोगे नहीं, ये रत जो प्रबल बना रहे थे, लगभग सौ प्रतिशत जगनपुरी के रत की नकल थी। और हर साल भीड़ बल से बढ़ते गए। वैसे बच्चों की इच्छा होती है खेले खिलौनों के साथ। बाबा जी जब 6 साल के थे, उन्होंने 1 ही चीज, मांगी, क्या राधा कृष्णा की मूर्ति, उनकी बचपन से भगवान की सेवा की जाए। जैसे प्रलाद मनाज। उनके खेलने कूदने में कोई रुची नहीं थी। उनकी रूची थी केवल कृष्ण। भक्ति में। तो प्रपज इस प्रकार खेलने के लिए तो बहुत कुछ है। इस प्रकार प्रपरपलेथेध्यात्मिक वादन में उनके पिता घोर, बोल, धे, बकयादा, संतों की सेवा करते थे। उनके घर में रोज 34 संत आते थे भोजन खाने के लिए। ऐसे उनके पिता ज्यादा धनी नहीं थे। पिता का नाम क्या था। गो मोंडे वो प्रापा के शब्दों में, कपड़े के व्यापारी थे। मिलर क्लास पर उनमें साधु को सेवा की बहुत इच्छा थी। और पापा जी ने कहा कि वो ये देखते भी नहीं थे। कौन असली साधु है, कौन नकली है, कौन भंग लेता है, कौन है, कोई भी साधु के वक्त में आ गया, उसकी सेवा करते थे। तो प्रापा जी स्कॉटिश कॉलेज, कैलकर में थे। उस समय गांधी जी के आंदोलन चल रहा था। देश को स्वतंत्र बनाने के लिए। प्रापा जी के 1 मित्र ने कहा, यहाँ 1 भोज प्रसिद्ध साधु है। मैं चाहता हूँ तुम चलो। उसे मिलने के लिए। पापा ने कहा, मैं तो कई संत को मिल चुका हूँ और मैं किसी से भी प्रभाग देवा। मैं किसी संत को नहीं मिलना। चाहता और प्रवाल के शब्दों में लगभग उन्हें घसीटा नहीं, ऐसा कभी नहीं मिले। पहले में ही प्रापाजीमिलेभगती साध्वी ठाकुर से अगीजेधाधाजीपहचान गए। ये हैं वो युवक जो कि मा प्रभु की भविष्य वाणी को पूरा करने में सहयोग देगा। क्या दी महाप्रभु की भविष्यवानी विश्व के खोलने में क्या फैलेगा तो वक्ती शेधातताजीने वैसे अपने कई प्रसिद्ध सन्यासियों को भेजा था। इंग्लैंड हुनदनंमेंभारतीयों के लिए सबसे महत्वपूर्ण देश इंग्लैंड था अमेरिका ने, पर बिना अधिक सफलता के वो वापस लौट आये थे। तो भागी ने कहा तुम पढ़े लिखे युवक हो, अच्छे अग्रेजी बोलते हो जाओ। पश्चिम देशों में। ये संदेश लेकर पापा ने कहा कौन सुनेगा हमारे सन्देश को। अब तो हमारा गुलाम देश है और देश को स्वतंत्र बनाने। 2 पापाजी गाँधी जी के आंदोलन के सदस्य थे और साने असी स्वतंत्रता है। जनममृत्रकेबंधन से मुक्ति प्राप कर। तो प्रापा जी ने स्वीकार किया कि भक्ति सिधाजकेजोआर्गुमेंट थे, उनकी विजय हुई है और प्रापाजीये मुलाकात हुई थी। 1922 में कहा कौन से चेयरमैन का तेजी से जवाब देना चाहे तो पापाजी के मन में यह भाव आ गया था, गुरु माने दिया है ऐसी परिस्थिति में थे कि वो नहीं कर पाए। पापा जी अलग अलग शेयर में थे। अलहाबाद में यहाँ की गुणियमत के भक्तों का सहयोग दिया उन्होंने। मंदिर खोलने में। 1932 में बॉम्बे में थे यहाँ की भक्ती सिधांदाजीने भेजा था अपने सन्यासियों को मंदिर खोलने के लिए। भक्ति। सीधा जी ने थोड़े समय में ही 24 केंद्र खोले थे भारत भर मा इत्यादि में सो। 1965 में भक्ति सिधानी बॉम्बे आए थे ठाकुर जी की स्थापना करने के लिए। और उनके शिशु ने कहा यह भे बाबू सबसे ज्यादा सेवा उसने की है। यह केंद्र की स्थापना में, उससे हमें इस मंदिर का प्रेजिडेंट बना देना चाहिए। बाकी से धान जी जैसे है वैसे ही रहने। 2 ठीक समय पर मौत सेवा करेंगे। 1936 में भारतीय सिदानरजीकेप्रगट होने से पहले उन्होंने 1 पद से दादा भक्ति प्रॉपर है। प्रॉपर ने कहा आपके इतने सन्यासी शिष्य हैं जो आपके लिए इतनी सेवा कर रहे हैं। मैं आपके लिए कुछ नहीं कर रहा। मुझे कुछ आदेश दीजिये की मैं आपकी सेवा कर। सकू की दादाजी ने वही कहा जो की उन्होंने कब बोला था। 1922 में तुम पढ़े लिखे युवक हो के तिन महाप्रभु संदेश को अंग्रेजी भाषा में प्रगट करो और इसके पश्चात नाइंटीन थर्टी सेवन जनवरी को हल्की से दादाजी और प्रगट हो गए। तो प्रपात के मन में यही भाव था गुणों के आदेश को सफल बनाना अलग अलग स्थानों में प्रभाजी थे। जहां जी में उन्होंने लीग ऑफ डिबोडीसकी स्थापना की थी। जिसका उद्देश्य इसके समान था। प्रापा जी यही सोच रहे थे कैसे इस गुरु के आदेश को सफल बनाया जाए। और पापा जी वृंदावन हाय रहने के लिए यहां की उन्होंने ंत्रों का प्रकाश नरम किया। बैक टू गॉड हैडमेकपत्रीका छ बजे छापते थे, रहते थे वृंदावन में थर्ड क्लास के डब्बे में दिल्ली जाते थे उधार लेकर किताब छापते थे बैक गोल और फिर उसे क्या करते थे। उसके बाद मारते थे। 1 समय प्रभा जी बड़ी तेज धुप में बैक पत्रिको गाय तो ने ठोकर बार कर गिरा दिया तो प्रापा छोड लगी। जैसे ही होश में आये फिर उन्होंने पुछा हराम कर दे तो बाजी मन में यही था। गुरु ने कहा था गंधों का प्रकाशन करो। 1965 में राधा कुल वहां बाकी सिरादी हजारों शीशे की परंपरा ले जा रहे थे। वहाँ प्रापर जी को मिले और बाकी सिधांत जी ने 1 मृदंग की तस्वीर खींची और कहा अगर भगवान तुम्हें तो सफलता दे तो क्या करना, क्या करना, ग्रंथों को प्रकाश करना और वेतन करना। ये था प्रॉपर का आदेश तो प्रॉपर ने पैक का छापी, फिर किसी ने प्रॉपर जी को कहा फिर छोटी छोटी किताब छापते हो, बड़ी किताब छापो छोटी, किताब लोग फेंक देते है। फिर प्रापा जी ने श्रीमान भागवतम 3 भागों में छापी। पहले भाग में जब छापी प्रापत उसमें छिपी बड़ा मंदिर में थे में कितने भक्त छिपी बड़ा मंदिर गए हो जी आपको खुशियों की जानकर ही 45 साल पहले इसको अंधेरी ने छिपी वाला मंदर खरीद लिया था और आज वहां बहुत ही सुन्दर स्कॉल का मंदिर बन रहा है तो प्रापा जी छिपीगोडामंदर में रह कर टूटा हुआ टाइपरेटर था प्रापा के पास उसे उसका सहयोग लेकर भागवतम वोलिवर का अनुवाद कर रहे थे बहुत ही कठिनाई से छापा पापा जी को धन की आवश्यकता थी। तो गए दालमिया जी के पास। दालमिया जी 1 धार्मिक खानदान था इनका बड़ा विश्वास था वैदिक संस्कृति में। पापाजी ने उनके सेक्री से कहा आप सेठ जी को बोलो ये भागवत छापने में मदद ले। सेठ जी ने कहा मैनेज कुप दिखाओ हनमान प्रसाद पौधा जी को आप से जानोगे। पौदार जी बड़े धार्मिक विचार व्यक्ति थे, गोरखपुर के गीताप्रेस की स्थापना उन्होंने की थी। वो पोलार्ज बड़े प्रभावित हुए उनके कहने पर ₹5000 का चन्दा दे दिया किसने गोरखपुर ने, दावे जी ने 5000 का चंदा दिया किताब छापने लिए। तो when is points living class to is prakar भागवत हम प्रथम सगन पहला भाग छापा था, फिर प्रापा जी को दूसरा भाग छापा। तीसरे भाग के लिए चलना के पापाजी बॉम्बे आये, बॉम्बे आये वहां मिले किसी ने कहा था उन्हें बॉम्बे में 1 बड़ी धार्मिक औरत है जिसका नाम है शिवा जी मुरार जी पापा जी उनके दफ्तर में गए। सर ने कहा वो बड़ी व्यस्त है, वो नहीं मिल सकती। रामपाल जी ने 5 घंटे के लि उनके दफतर के आगे बैठे रहे। सीढ़ी में रामा ने सोचा जब वो जाएगी यहां से ही जाएगी कि शाम को जब जा रही थी, उसने देखा 1 साधु बैठे उन्होंने सकरी से पूछा कौन है ये साधु सैकरीन गा है, ये साधु वृंदावन से आया है। मुझे धन चाहिए भागवत को छापने के लिए। शिवीबनारजीरापर के बाद पहुँचे स्वामी जी आप को क्या चाहिए। स्वामी जी ने कहा मैं यह भागवतम छाप रहा हूँ इसलिए आर्थिक सहयोग से ये उन्होंने कहा कल आना तो अगले दिन गई, बाबा जी गये बड़ी प्रभावित हुई मैंने जो लेकर मुझे भागवतम सुनाओ 2 हफ्ते के लिए रोज। पापा जी के घर जाते थे भागवतम सुनाने गए तो ये इस प्रकार अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए करने के साथ बाबा जी ने प्रथम स्कंध को 3 भागों में प्रकाशित किया बोली और जब 3 बोले में छप गए जो प्रापा जी सोचते थे और मेरे पर हथियार है विदेशियों को प्रचार करने के लिए। क्यूंकि ऐसे ही थोडी प्रपद अमेरिका आ सकते थे। आज अगर लोग आपकी संस्था की इज्जत करते हैं। एकादनयेहै ग्रंथों को देखते हैं। तो प्रापा जी ने सोचा और प्रॉपली सोचते रहते थे, विदेश कैसे जाऊँ उन में इंग्लैंड का खास स्थान था। भारतीय के लिए। तो प्रावती इंग्लैंड नहीं जाना चाहते। अमेरिका जाना चाहते थे। पहले पापा जी सोच रहे थे अमेरिका जाओ तो कौन से, रास्ते से, ससना, पड़ेगा टोक्यों से जाऊँ, यह योरप से जाओ तो यह प्रपात विचार कर ते थे हमे कैसे जाया जाए और मैंने जाना कोई आसान काम नहीं था। उन दिन भारत में भारत से विदेश जाना, मोल्ड फोरमेलिटी नियमों का पालन करना पड़ता था। और पैसे पा जी के बिल्कुल धन नहीं था। जब वो वृंदावन में भी थे, वृंदावन से दिल्ली थर्ड क्लास डब्बे में जाते थे। आप लोग जाते हो थर्ड क्लास में और यहाँ से मथुरा टंगे में जाते थे। वो ज्यादा सस्ता था तो जाते हो तो प्रापा जी गए, सोचे थे कैसे जा जा है और जाने के लिए वीजा भी चाहिए। 1 प्रॉपर जी की जान बचाने के व्यक्ति थे अग्रवाल नाम के, जो व्यपारी थे, जिनका 1 बेटा था। अमेरिका बटलर में बटलर पेनसिलवेनिया बटलर 1 छोटा शहर है अमेरिका में, जहां सेकेंड वार वार के समय सरकार जीप बनाती थी जीप युद्ध में लड़ने के लिए, और वहाँ 1 स्टील की फैक्ट्री थी यहां गोपाल अग्रवाल 1 इंजीनियर सा, उसके पिता थे अग्रवाल, जो कि मथुरा में रहते थे। तो 1 दिन प्रापा जी मिले बाई चांस इस अग्रवाल को आपका बेटा अमेरिका में है। हाँ बोलो क्या सेवा चाहिए। मैं अमेरिका जाना चाहता हूँ, मुझे निमंत्रण चाहिए, स्पोंसरशिप लेटर चाहिए। तो वान ने हो जायेगा। अगवाल ने कई संतों का सहयोग दिया था अमेरिका जाने में, तो अग्रवाल ने अपने बेटे को लिखा 1 ऐसी भक्ति न स्वामी है जो की बड़ा प्रसिद्ध संत हैं। अमेरिका चाहता है चेतन मा प्रभु संदेश का प्रचार कर के तुम कृपा करके उसके उसको 1 स्पोंसरशिप लेटर दे। 2 स्पोंसरशिप लेटर का मतलब है 1 पत्र, जिसमें वो कहेगा ये भक्तीनंदस्ामी जब अमेरिका आयेंगे उनकी पूरी जिम्मेदारी मैं लेता हूँ, उनका सारा खर्चा मैं दूंगा पत हो, विदा मिल जाता है। जल्दी सो ने उम्मीद नहीं की थी या गवा अपने बेटे को लिखेगा। 2 महीने बाद फाब पत्र आया इंडिया के एक्सटर्नल फेमिस्ट्री से, जिसमें उन्होंने कहा स्वामी जी, आपके नाम पर स्पोन्सरशिप पत्र आ गया है अमेरिका से, अब आओ पासवर्ड बनाे पढ़ा हैरान हो गई क्यूंकि? प्रपा ने कहा मैंने तो सोचा ही नहीं था। अग्रवाल अपने बेटे को कहेगा बेटा काम ये काम करेगा। तो प्रपा जी ने गोपाल। अग्रवाल ने इंडियन काउंसिल को न्यू यॉर्क में ह लिख के दिया। वकील ने स्वामी को 2 महीने के लिए अमेरिका आने। 2 जो भी खर्चा आएगा 2 महीने के दौरान वो मैं दूंगा। तो पार पापाजी ने पासपोर्ट बनाया, पासपोर्ट तो बन गया। फिर प्रभा जी को 1 पी फॉर्म चाहिए था उन्हे में पी फॉर्म मतलब कि उसे वो फॉर्म हो। आप ये दिखाते हो। इस व्यक्ति का भारत मे और कर्जा नहीं है। यानि आप कर्जा, वगैरह उठाकर भाग जाओ। तो परवाज पी फॉर्म के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में अप्लाई किया तो उन्होंने वहाँ के अधिकार का स्वामी जी आपको फुल लगा क्यूँ ये जो मंत्र आपका 1 व्यक्ति ने दिया है आप धर्म के नाम के लिए संस्था का होना चाहिए। लेट मी सी और बस बॉस का नाम था राह। प्रापा जी मुराह को मिलने गये प्रापा हा फाइल भेज देना। राह को राह प्राजी मिलने आये और कहने लगे स्वामी जी आपका काम हो गया। तो प्रभा जी बड़े खुश हुए तो पासवर्ड मिल गया। क्या बच्चा भी टिकट और वीजा था। प्रापा जी को 3 महीने का वीजा भी मिल गया। 3 महीने के बीज अब क्या बच गया है। जिसके बाद प्रापा जी जाते थे, वो कहते थे इस बुरी उम्र में जाओगे मर जाओगे। सर्दी में कइयों ने कहा इतना पैसा खर्च कर, विदेश जाने का क्या फायदा। हमारे देश में प्रचार करो, देश में क्या प्रचार की कमी है। जिसके पास गए लगभग सब ने कहा की हमारे पास बहुत महंगाई है, इतना दान देने की शक्ति नहीं है। किसी ने पापा जी से कहा बॉम्बे में वो श्रीमती मराज जी जिसने आपका सहयोग दिया था, भगवत छापने में, उसके जहाज चलते हैं पानी के, उससे क्यों नही आप बॉम्बे आये, बॉम्बे आये। श्रीमद मराज दफतर में पहुँचे और उनके दफ्तर में पहुंचे, उनके सकी का नाम था सी। चोकसी ने कहा। 1 वह स्वामी जिसका आपने सहयोग दिया था भागो छापने में, वो आया है फिर से से कुछ भी मांगने के, अब वो अमेरिका जाना चाहता है, वो चाहता है कि आप सहयोग। 2 तो चोकसी को प्रॉपर जी ने सिखा दिया था कि तुम मैडम को कहना मेरे में बड़ा उत्साह है विदेश जाने के लिए, भगवान का प्रचार करने के लिए, तो पापा जी मिले। श्रीमती मुरारी से मुरार जी ने कहा आप 70 साल की आयु में जाओगे, इतनी बड़ी आयु में कोई जान पहचान नहीं आपका क्या करोगे उधर जाकर। आप भारत में ही रहो और हमे भागवत सुनाओ नहीं गुरु का आदेश है के संदेश को विश्व के हर कोने पर चाहिए। मुझे जरूर जाना है स्वामी जी आप मर जाओगे उधर इस उम्र में जाओगे। इतनी ठंडी है, बरफ है कोई जान बचाना नहीं है। पापा जी ने बड़े दिल भाव से कहा नहीं कुछ नहीं होगा मुझे घबराओ मत जब श्रीमती जी ने देखा की पापा जी का इतना गहरा भाव है। अच्छा स्वामी जी मैं से भेज देती हूँ पर पानी के जहाज में कार्गो शिप में पानी के जहाज के भी कई कई टाइप हैं ताज महल से होता है साधारण पानी के जहाज सबसे घटिया है। खरगोश लोग माल गाड़ी देखते हो माल गाड़ी में कभी बम्बे जाते हो ने कहा रो जाते है मेरा उसमें आप को टिकट दे सकती हूँ। पर बनने का मंजूर है दोस्ते खरगोश शिप में वो जहाज के कैपिटल थे अरुण पांड्या बड़े धार्मिक विचार के और श्रीमती मोराजी ने प्रबंध किया 500 रुपए दिए अपने सेक्रेटरी को पापाजी के लिए, गरम कपड़े खरीदने के लिए और दलिया प्लेन में शिप में रखा और कैप्टन को बोला कि स्वामी जी की देखभाल करना और वह पूरे जहाज में 1 ही कमरा था पैसेंजर के लिए, वो कमरा था प्रा फल का और कैप्टन पांड्या उसकी पत्नी, उसकी पत्नी बड़ी उश्ण थी उनकी पत्नी के पास जोशी की योग्यता थी तो न्होंने पापाजी की बड़ी देखभाल की और केवल 40 रुपए के साथ और 200 सेट भागवत के प्रथम स्कंद के पापाजी चले पापाजी बॉम्बे से आये क्या खता, वैसे तो प्रापा जी की बोल जान पे जान थी, क्या किताब क्या कहता सनिया जी के रूप में और लखनऊ में 1 संगीतकार थे। भटाचार्य तो प्राबाजीेराजपाल के घर में गए थे लेक्चर देने के लिए। यहाँ वह भट्याचारियको मिले थे। तो भटटाचार्य ने प्रभाजी का सहयोग दिया प्रभाजी के साथ सब अखबारों में गए। ये सूचना के साथ इस स्वामी अमेरिका जा रहे हैं दिन महाप्रभु संदेश का प्रचार करने के लिए कई अखबारों में गए। समय के लिए। स्वामी जी ये खबर कोई नहीं पड़ेगा, उन्हें छापने से इनकार कर दिया। 1 छोटे अखबार ने कहा पापा जी ने 1 बुकलेट छापी थी माय मिशन की, हम ठीक हैं, छाप देंगे तो क्या कर। जहाज में चलने से पहले प्रभु जी मायापुर धाम में आये, वहाँ भक्ति सीदांदाजीके समाज में उन्होंने प्रणाम किया और भक्ति सीधांदाजीसे। प्रार्थना की कृपा करके उनकी योजना सफल रहे। और फिर पापाजी चले हाँ पहुँचे। कैलकेदाजवोकैलकदा पहुँचे हगे स्तेला 1935। 9 बजे सुबह वो जहाज चला कहाँ से और जहाज में 1 ही से था। जैसे हम प्रभा जी के बाद केवल 40 रुपए थे और उन्हें छोड़ने के लिए कोई नहीं आया। टैक्सी में प्रभा जी वहाँ पहुँचे थे और आज के दिन प्रभा जी चले थे भारत से उनके शिमल भगदन को लेकर और वो चले थे कहा अमेरिका के लिए। फिर उस समय प्रभा की आयु थी सिक्स्टी नाइन, उनका 70 वा जन्म दिन उन्हें जहाज में मनाया। और प्रभा जी अपने साथ 6 दिन चर ले गये थे जहाज में पढ़ने के लिए। भक्ति से राधाजी भी 6 दिन चर्तित पढ़ते थे। और पापा जी भी जितने पढ़े थे। और रास्ते में तेरहवे दिन को हार्ड अटैक आया। 2 दिन लगातार। बाबा जी को लगा कि शायद ये योजना सफल नहीं होगी। 3 महीने का वीजा था, पापा जी चले थे इस विचार के साथ 2 महीने में वापस आ जाएंगे जी के 2 दिन लगातार हार्ड ट्रैक, फिर प्रापा जी को भगवान 1 सपना आया। भगवान ने कहा जिसे उन्होंने देखा भगवान नाव चलाते हैं, नाव में बैठे हैं कौन और सारे देवता। और भगवान कहते है तुम्हारी योजना सफल हो गयी। तो पापा जी सप्टम्बर में 35 दिन की यात्रा के पश्चात न्यूयॉक में बोस्टन पहुँचे। व बोस्टन पहुँचे। उन्होंने देखा वहाँ का वातावरण देखा की लोग दे के साथ डूबे हुए हैं। माया के कार्यों में बाबाजी ने सोचा कौन सुनेगा। इस सन्देश को उन्होंने कविता भी लिखी और अंत में उन्होंने कहा राज रानी की कृपा से सम्भव कार्य भी संभव हो सकता है। प्रॉपरली न्यूयॉर्क आय न्यूयॉर्क में 1 साल के परेशन पश्चात। उन्होंने इस कौन संस्था की स्थापना की और पहले केंद्र का निर्माण किया। तो आज वो शुभ दिन हैं जब 1965 में जी से केवल ₹40 के साथ क्या क्या चले थे। महाप्रभु के आदेश को सफल बनाने के लिए हमें इस शुभ अवसर पर प्रापाजी का अभार प्रदर करना चाहिए की प्रापाजी ने इतना त्यागा, इतनी कठिनाई सहनी पड़ी हम सब भक्तों के लिए हमें यह निर्णय करना चाहिए में प्रापा जी के शिक्षा के आधार पर चलना है उनकी शिक्षा की ही जाए का प्रचार करे और हमारा ये निर्णय होना चाहिए कि जो भक्ति के लिए अनुकूल है वह स्वीकार करना है जो प्रतिकूल है उसे ने कहा की जो कीवनीभरणीपड़ेभरो कृष्ण भक्ति को मन के सुने 2 आप सब जन से यही निवेदन है शिक्षा का लाभ उठाइए और भगवतम को पढिए भगवतम को बाटिए इस प्रकार अपने जीवन को सफल बनाइए। हरे कृष्ण i wahi wa दा न हुआ कोई प्रशन है हाँ बहुत सी लाइट सुनाई नहीं दे रहा ओके हाई कृश्णा।
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