भगवान जगन्नाथ की महिमा || Jagannath Puri Yatra || 20.01.2018 ||Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja

Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja discusses Lord Jagannath's glory and the spiritual power of pilgrimage to Puri. He shares stories of saints like Vidyapati and kings who sought the deity's vision, emphasizing that sincere devotion and saintly association lead to divine grace.
Chapters
या ये मान लो की अभी इस यात्रा के पश्चात हमने भारत के सारे धामों की यात्रा कर ली। और इस धाम में आने से इस धाम के आने से लाखों पाप मिट जाते हैं। और इसका यह मतलब नहीं कि आप सोचो कि हर साल यात्रा लगा देंगे, पूरा साल पाप करेंगे, फिर पुशोरमशेताके सारे पाप माप हो जायेंगे। पर किसी ने पूछा ये सुना जाता है। यह सुना जाता है कि रात यात्रा के समय अगर भगवान दर्शन ने तो सारे पाप सुभाब तो प्रॉपर ने कहा कि इसका यह मतलब है जंगलाजगदर्शन लेने से ध्यानी जाग्रति आरंभ हो जाती है और ध्यान जागती बड़े। तो अब ये समझ जाओगे की गलत काम नहीं करने चाह।
और यह नहीं कि हम हर साल
राज्यात जाओ, बाकी समझदार काम करो। तो धान में हम जाते हैं इस उद्देश्य के साथ कि संतों की संगत मिले, दिव्य ज्ञान प्राप्त हो और हमारे जीवन को सुधार रहे। इस भावना से हम नहीं जाते कि पाप बैठ जायेंगे, फिर 12 साल करें, जल्द काम, फिर धाम की यात्रा कर हमें धाम में आना चाहिए। इस भावना के साथ धाम में सांस
की संगत मिलेगी, उपदेश मिलेगा हम अपने जीवन को सुधारेंगे।
और
वैसे तो पूर्व क्षेत्र पुर्शोतम क्षेत्र
प्रसिद्ध है क्योंकि जगना जी विराजमान है और ये माना जाता है कि जगना
का मंदिर कम से कम 2000 साल पुराना है और इस युद्ध में भगवान
की उपासना की जाती है।
ररूभ्रह्मा भगवान पद ने
माध्यम के द्वारा, पर हम वैश्य भक्तों के लिए पुरुष सर धाम का 1 और महत्व है। शेतकेत्लधामजगनतपुरी धाम पुरी धाम के 50 नाम है। हम भक्तों के लिए जगनपुरी धाम का 1 और खास महत्व है।
वो यह है कि कितने महाप्रभु ने 24 साल बिताए।
इस धान में पहले 24 साल पहले
24 साल, महाप्रभु ने अब दे पर दूसरे स्थानों में बिताए प्रतिम 24 साल
झगनतपुरीथानमें बिताए और ये अंतिम 24 साल के पहले 6 साल थे, रहे यहाँ यहाँ से उन्होंने दक्षिण भारत की यात्रा
की धवन यात्रा के लिए और अपनी जिंदगी के आखिरी सब सिर्फ धान में ही रहे।
और कहानी
रोज ्ेतमेंमहाप्रभू आते थे जगरानी
का दर्शन लेने के लिए,
और फिर आजाद और सनादंगोसानोमिलते थे और शाम के समय अपने प्रिय भक्तों के साथ बैठकर केशलीलानतगोवनद्यादी सुंदर दूधियों का शन
इस चेतन, वह रो ने 24 साल बिताए।
इस पूरी भाव में और चेतन में बड़ी गहराई के साथ यमी का वर्णन है।
हम प्रयास करेंगे को वहाँ पर बिली की पूरी लामकाछोड़ाहै
आप सब हर राज्य
ठाकुर के समाज में हो, हो, आ
जाओगे शाम को हम हल राज ठाकुर जी के जीवन के परे
तो आराम
के लिए भगवतागारेगे ओम नमो भगते, वासुदेवा से, ओम नमो भगवते, वासुदेव
से नम
भगतेवasvaब,
robo
ka swagat ओ प्रभु महाराज को सब जानते हो। आज तो
भागवत का 1 लोट पढ़ेंगे भगत के साथ महा प्रभु की लीलाओं
का भी बन करेंगे। ठीक है
कौन सा
सदासे
a na batarya नया जोड़े रागो राजा से बात बा। my love म योर
क्लास हिंदी में चाहिए, अंग्रेजी में चाहिए
जो धीरे हे बहू। मैं आपका नस्वार के वक्त और आप मेरे मित्र स्वामी हैं। सेवक तथा स्वामी हमें कुछ भी नहीं चाहिए। आप स्वामी हैं और मैं आपका सेवक हूँ। हम दोनो के हम दोनों ने कोई अन्य सम्बन्ध नहीं ह।
माता
धन्यवाद बोलेंगे हे कम। मैं आपका सेवक हूँ और आप मेरे स्वामी हैं। स्वामी का सेवक होने हमें नहीं चाहिए। हमें आप रूप से स्वामी हैं और मैं आपका सेवक हूँ। मैं हम दोनो में अन्य कोई सम्बन्ध नहीं है। आप लोगो ने कहा सर का कृष्ण से साक्षात। भगवान में कहते हैं बहुत सारा मार मैं सभी लोगों का स्वामी और भगवान की यह स्वभाव स्थिति है और है कि उनकी शरण में जाकर। यदि यह सम्बन्ध से सुख बना है, जब यह सम्मान बना है, सुखी बना है और अपने स्वामी को अपना। आदेश इस तरह ऐसी स्वामी को चाहिए विवरण सेवक की इच्छाएं पूरी न करता रहे। यदि वह ऐसा करता है तो असली स्वामी नहीं है। असली स्वामी को तो वह आदेश देता है। तुम्हें यह और असली सेवक तुरंत आ आदेश का पालन करता है। जब तक वर एवं आदि के मत ऐसा साबित नही हो जाता, तब तक आज नहीं मिल सकता। समय भगवान के विषय आकाशपरम मन दुबारे। इस जगह में फंसे हुए लोग इसे नहीं जान। न लो न हे वीरू। भौतिक क्षेत्री द्वारा मोहित होने से इस जगह का पेट हरचेत जीवन का 1 मानक लक्ष्य भगवान विष्णु के पास जाना है। आर नाम सर्वे श्याम विश्णु, आराराम परम रसमापरतपरदेी हरियाणा स्वा नाम। भगवान ने अब विपत्ती देने को बताते है की जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य भगवान को प्रसन्न करना है और वह तभी प्रसन्न हो सकते हैं जब उसका साथ परसन्न होता है। अत महाग शिक्षा देते है की मनुष्यों को लाज का भी साहस होना चाहिए। प्रदा महाराज ने भगवान दर्शिनेरीऐसी प्रार्थना की कि वे उन्हें अपने अपना सेवक बना रहे हैं। भक्ति की ही बात है भगवान को अपना आदेश वह बनाना चाहता है। क्यूँ भगवान ऐसे स्वार्थी भक्त का स्वामी बनने से इनकार कर देते हैं। भगवती भगवान कहते हैं ये मात्र से जो इस तरह मेरी तरह करता है, उसी के अनुसार मैं उसे पुरस्कार ा वोटिंग वाली सामान लेता है। वोटिंग ला की हर वर्ड जब तक व्यक्ति ऐसी दूसरी अवस्था में रहता है, तब तक उसे भगवान वापस जाने का लाभ नहीं नहीं पता।
omega tins sicेtनamaनoveस बंदे हम क्रष्णा करना सिंधू दिया, 2 जगह हो पैसा हो सकता कंचन
से
उपज ना जाए श्रीकृष्ण चेतन हवोनचला हर रेरइंसनारेहेराम हरे रा।
तो ये भाव हम भक्त में होना चाहिए।
तो लाल बना क्या कह रहे हैं?
हे प्रभू के निश्वास सेवक हूँ और
आप मेरे नीति स्वामी हो साब कितने भक्तों में यह भाव है
तो ये भाव हमें अनुकूल करना चाहिए। आप भागवत में पढ़ते हो कि प्लान
माज यहाँ नकाशो थे।
उन्हें अनेक प्रकार के कष्टों को सहना पड़ा। क्यों उन्हें 1 ही दोष था? क्या उनका आकर्षण था। भगवान के पति जब वो माता के घर में थे, उन्होंने दिव्य ज्ञान प्राप्त किया था। शांत होने के द्वारा उनके पिता हिलाने का। स्कूल ने उन्हें 1 प्रकार की कठिन स्थिति में दारा पहाड़ों से देखा।
जेल साबुन घेरा आती चले। उन पर।
पर भगवान ने उनकी रक्षा की। कहते हैं ला के कृष्णा मानक है। माने कृष्णा आते थे, जिसको भगवान बचाना
चाहे, कोई
जिसको ना चाहे, उन्हें बचाना चाहे।
तो प्लान ये ने कहा भगवान से मुझे इस प्रकार की कठिन स्थिति में रहे हो। और अंत में उनके पिता का वध हुआ।
परम भगवान के द्वारा गान प्रकट हुए। 1 अद्भुत रूप में रसिगदेवजीके रूप में
आधे पुरुष आधे पशु। तो भगवान ने नपरा से कहा पिछले,
अध्याय में मेरे काले पला। तुम्हें
अनेक प्रकार की कठिनाइयों को सहना
पड़ा और मांगो, मेरे
क्या बार चाहिए। उपला क्या कहा? लाल ने उत्तर में कहा, मुझे आप से कोई वार्ड नहीं चाहिए। जो सेवक यह उम्मीद रखता है। इस सेवा के बदले में मुझे कुछ
बहुत लाभ प्राप्त होना चाहिए, नफा प्राप्त होना चाहिए।
वो सेवक में योग्या है। व्यापारी
जो गुरु उपदेश दे, इस भावना के साथ कि मुझे कोई लाभ प्राप्त हो। वो भी
व्यापारी है।
सपना ने कहा की अगर आप मुझे
वर देना चाहते हो तो ये वर्ड दीजिए कि मेरे हृदय से सारे भौतिक
आकर्षण समाप्त हो जाए।
आप में से कितने भक्तों की अच्छा है। यह आपके हृदय से बहुत आकर्षण सुना है। हम धाम में आये हैं, धाम में। हमें जानना चाहिए इस उद्देश्य के साथ कि हम भगवान के शरनागत हो सके। और भगवान के शरणागत होने का अर्चन क्या है। बहुत आकर्षण। हमें यह चाहिए, ये चाहिए, वो चाहिए। इस कारण हम भगवान के शरणागत नहीं हो पाते।
परलाल ने कहा कि अगर आप मुझे
कोई वर्ड देना चाहते हो तो ऐसा वर्ड दीजिये की मेरा भौतिक आकर्षण है।
सब समाप्त हो जाए। तो आज के इस लोक में पला बड़ा महत्वपूर्ण उपदेश दे रहे हैं।
मैं आपका निश्वास सेवक हूँ। तो ये है सबसे उत्तम भाव। आप मेरे नित्य स्वामी हो। सेवा स्वामी होने के अतरिक्त हमें कुछ नहीं चाहिए। हमारा यह भाव होना चाहिए। हम सदा भगवान की सेवा करते रहे है।
और इस विषय पर साथ प्ले के आलम में पापाजी ने चेतन का 1
प्रसिद शो का वर्णन किया है। रुप
चेतना महापरब कौन है, स्वयं भगवान हैं। श्री कृष्ण, चेतना, राधा, कृष्ण व है।
और चेतन। महा लोगों ने हमें क्या दिया है शुद्ध भर्ती का उपदेश, जिसका अनुमान पोपली ने किया है।
महा लोगों के उपदेश ुवीदाउंकावर्णन है।
और भागवत चेतना क्या है।
शर्भर्तितोचेतनभाप ने हमें शुर्धभक्ति का उपदेश दिया है।
यहाँ
कह रहे हैं, यह स्वाभाविक भाव होना चाहिए।
हम भगवान की सेवा के
निस्वार्थ निश्काम भाव से।
तो प्लान बनाये। हमें शुद्ध भक्ति का ज्ञान दे रहे
हैं, जो कि भागवत में प्राप्त होता है। और दातपेमेंहैप्राबाजी आगे कहते हैं के का उपयोग, भोक्ता ला।
हम सब में ये भावना होनी चाहिए। पर भगवान जी भोक्ता का तो ये होना चाहिए। हम सब का भाव। व्यासदेव ने अनेक ब्रेनिक सास की रचना की थी।
उनके पश्चात ही संतोष नहीं था, ब्याज
पर विचार कर रहे थे। इतने ग्रंथो की रचना की है।
साल और प्रस्तुत की विधान में जब भी उन्हें लगा था, गिरजा में कुछ कमी है। ना दमली पहुंचे। उन्होंने कहा, उन्हे शुद्ध भर्ती का वर्णन नहीं किया, क्योंकि उन्होंने उन्होंने श्रीमद भागवतम किया। तो श्रीमद भागवतम जिसे सबसे उत्तम ग्रंथ माना जाता है, उसमें शुद्ध भक्ति का भाव है। शुद्ध भक्ति का ज्ञान सापशकहोगेपरयेज्ञान कैसे प्राप्त हो। इसलिए साल सनकी आवश्यक है। जैसे ये जो उत्सव है छोटा 3 उत्सव है। और इसका उद्देश्य क्या है कि कोई साधु संगत प्राप्त हो और
भक्तों की
संगत में रहोगे तो दिव्य ज्ञान प्राप्त हो रहा है। इस के मे साधु संघ को बदल गया है। 7 क्या खा गया है साधु संग साधु संग है। भक्तों की संगत में रहोगे तो जीवन
को सफल मुनाफा होगा।
के में कथा परतेोशितिरमापिंग भाग थे शिवानंद सैन शिविंदर सेन भक्तों की भक्तों के साथ आने थे
मा परों को मिलने के लिए। और
1 कुत्ता
उनका पीछा कर दे गया।
इस दिन मनियारी थी साथ में जुड़ गया। तो उन्होंने नाम लेना था रिया के
पास जाने के लिए
जो नाम वाला
था, उसने कहा, कुत्ते कम नहीं बिठा
सकते तो से कुछ हवाई संगट में आ रहा है तो छोड़ नहीं सकता है। उन्होंने ज्यादा पैसा दे दिया है।
और खुद से और 1 दिन शिवन अंदर सैन मार गए थे उन्होंने लौटने में देर हो गई ने उनका नौकर था, वो
उनका सेवक था।
उसने कुत्ते को भोजन नहीं कराया, जिसके कारण जो को कुता
घर से चल पड़ा। तो शिव से नायक देख।
उन्होंने पूछा का हो ता? और
अमूल से खाना खा कुशाल कराना भूल गए थे।
और वो चलेगा पालनी कहाँ चलेगा
सेन ने
10 साथियों को भेजा, उसे ढूंढने के लिए, 17 को ढूंढे थे किसी को मिलाने पर जिन सेन साथी आये,
वहाँ पर बू को मिलने के लिए कहा।
कहाँ आये मिलने के लिए पूरी धा
मे जो पूरी धाम आये वहाँ पर मिलने के लिए। उन्होंने क्या देखा? उन्होंने देखा वहाँ प्रभु के पास पहुँच गया था वहाँ प्रभु उसे नारियल फेंकरे से खिलाने के लिए।
और वो कच्चा नारियल खाना था। तो
कु भक्तों की संगत का लाभ उठाकर भाग बन गया। हरे कृष्ण मंत्र के लगा और फिर
थोड़े दिनों बाद कुत्ता दिखेंगी। किसी को मकान के धाम चले गया था।
तो कई बार यह उदाहरण दिया जाता है। यह बता दें कि साल का प्रभाव
पहले तो सोचना ठाकुर।
वहाँ पग।
1 और लीला का वर्णन करते हैं।
जब वह पब छोटे थे, अपने मित्र के साथ खेले थे। उन्होंने वहां का सबसे खुबसूरत बिल्ला था
उसे उठाते या
वहाँ के दोस्तों ने कहा, तुम सबसे खुबसूरत पिल्ला ले गये घर और सारे बदसूरत पिल्ले हमारे लिए
छोड़ दिए हैं, ये ठीक नहीं है।
और सच्ची माता ने कहा कि
हम
सब ब्राह्मण हैं, तुम्हारे घर में पिल्ला थोड़ी रहा सकते हो, ले जाओ बार मारी छोटे थे। मां ने कहा, अगर आप किले को बाहर करोगे, मैं भी भाग जाऊँगा
तो माँ के पास कोई उपाय नहीं था।
1 भगवान स्नान करने गए थे।
उनके मित्रों ने कहा, निमामा मा ने पिल्ले को घर से निकाल दिया है। जमाए बड़े दुखी हुए तो भैया ढूंढो और फिर उन्होंने पिल्ले को देखा।
शहरके बीच में बड़े वसा के साथ नाच रहा था।
वो हर धुन पूरा पहुंच गया।
कहने लगा देखो दिमाग मा
सब के
सामने, सब को बाय बाय करते करते भगवान के धाम। तो अगर आप सोचोगे हमें पिला रख सकते हैं।
वाइन। फिर आपको यह गारंटी देना पड़ेगा की आप भी उसे शुद्ध भक्त बना दे। अगर नहीं बना सकते तो परते लगगए।
तो सादुल संग ये ज्ञान का हमें
निज काम भाव से सेवा कर ली जाए।
यह ज्ञान कैसे प्राप्त होता है साधु संघ के द्वारा। इसलिए उत्तम भक्तों की संगत जहाँ तक को प्राप्त करना चाह, भागवत के चौथे स्कल में अब दुर्वमणाजकी कथा पढते हो। जब भगवान ने कहा दुर्मणाजहैमंगो मे क्या।
वर्ड धुन ने कहा अगर आप चाहते
हो तो उत्तम भक्तों की संगत।
2 उनकी संग दोगे ज्ञान प्राप्त होगा, जिसके पालन से जन्म मृत के बंधन
से छुटकारा प्राप्त हो सकेगा। तो इस आज के लोक में
ये
कहा जा रहा है कि हमें निष्काम भाव से ये स्वार्थ बिना भगवान की सेवा करनी चाहिए और हमेशा यही भाव रखना चाहिए। ये भाव नहीं कि हम 1 भगवान बन जाएंगे।
कृष्ण भक्त इस काम आते, इस विषय
पर केतमेचतरवितकागया है केश बना के भागते हैं। 19 काम भाव से सेवा करते हैं।
और जो जिस काम भाव से सेवा
करते हैं और सदा शांत रहते है,
हर स्थिति में शांत रहता है।
और भुक्ति मुक्ति सीधी का भी जो
अनेक
बहुत इच्छा को लेकर चलते हैं शाक भाव से। और सदा शान।
तो दातबरेप्रपरजी कहते हैं कि हमें यह स्वीकार करना चाहिए। तो परम भगवान सब असली उपभोक्ता है।
और अगर यह हम स्वीकार करें ऊपर भगवान भोगता है तो ये है सबसे उत्तम भगवान भाव और ये है असली सुख का साना।
भाजी आगे कहते हैं तरल गुरु कहता
है, ऐसे करो, ऐसे करें, वो हैं सबसे उत्तम भाव।
बाबाजी कहते हैं भगवत भागवत मनामनी कहते
हैं 3 प्रकार के शीशे होते हैं,
1 हैं जो समझ जाता है भगवान
का क्या भाव है, गुरु का क्या भाव है के कहे, बिना
शासन, क्या
का सर्वदा पता वा
सब धनों को
जोड़ता सेवा में
ये पढते ही वो पार कर दूसरा श्रेणी का भक्त है, उसे कहा जाता है ऐसे करो, ठीक है।
वैसे करे का भक्त कौन है?
चाहे आप कुछ भी बोलो, वो करेगा
मन मन में भाव। तो हमारे में
ये भाव होना चाहि। क्या? एम सेवा में ये होना चाहिए भाव, हम सेवा में जुड़े, हम सदा भगवान
के दास भाव होना चाहिए सेवा का सनातन का स्वामी। oबगs्वामीउनके भाई अनुपम
वहां के बड़े भक्त, उन का भाई नुपम राम, भगवान राम का भक्त है। द
बड़ा होकर आमदी के सेवा कर। और rupoसनाtन भगवान कृश्ण की भक्त है।
snatn
भाई 1 समय उस समय ी बंगाल के राजा
के राज्य के शासन
पर दोनों की रुची थी।
महा बाबुजी के साथ जुड़ा
रजनगs्वामीआनेजे चेते ने महा बाबू को मिलने कहा पुली में जैसा मैंने कहा आप।
हम उन्हें 24 साल काटे थे।
पुरी में
आने थे।
झारखण्ड जंगल से गुजर कर
रास्ते में उन्हें बस की बीमारी हो।
पूरे शरीर में बसी पस था। फुंसी फुंसियों में पस और बजबूभीआईतोसनादंगा स्वामी
में बड़ा विलंबता का भाव था।
वो सोचते थे।
अब तो मेरा शरीर बिल्कुल निकम्मा बन
गया है, कुंजियों से भरा हुआ है, बस है।
इसमें। मुझे
जगनपुरी लोड पहुँचने पर जगनाजीकादर्शन लेकर
आत्मा हत्या कर लेना है। mac बटा
ये भाग के साथ gsवाmiकभीगएमंद के अंदर। तो जब सुना गोस्वामी पहुंचे,
हरीराज खातों
के पास 6 दिन मा को भी
पहुंच गए और माँ बहू ने दास को गले लगाया।
जब सुनाता को गले लगाने गए, सुनाता ने कहा नहीं, नहीं, नहीं मुझे मत
छोड़ो मेरा शरीर
हो पस से भरा हुआ है। मुझे मत छोड़ो जरूरी महा प्रभु ने यहाँ के भगवान अपनी अद्भूत विलाप। दूसरे शब्दों में चेतन महापापी समझ गए थे।
सनातन को स्वामी के मन में क्या भाव था।
महा बाबू ने कहा ये शरीर तुम्हारा
नहीं है, तो तुम क्यों से आता
हत्या, कर सकते हो। शरीर मेरा है मैंने, यह शरीर का उपयोग करना है।
धन के संदेश का प्रचार, बढ़ाने का। ये होना चाहिए हम सब का भाव। ये शरीर हमारा नहीं है, ये शरीर
है भगवान का चेतन।
मा बाप के पास।
माँ भगो ने उनसे पूछा कौन से
रास्ते से आए थे?
उन्होंने कहा मैं तो दोपहर के समय
गर्मी जून के महीने में, पुरी के रेट में चलना
असम्भव है, कोई नहीं देखेगा आपको सुना समय गर्मी में वाँ क्यूँ क्यूंकि वो जाते नहीं थे।
किसी जनरल पुरी मंदर के पुजारी को आज किसको के साथ प्रेम है।
राबजी कह रहे हैं, हम केवल भगवान के दास नहीं, गान के दासों के दास।
यह होना चाहिए।
भाव हम चेतन महाबूब। इसलिए 1 बड़ा महत्वपूर्ण उपदेश दिया है, जो आप से शाह सलहे इसे शो
में प्राप्त करते हो। क्या है जरूर पीछे हमारी न मना लेना। अगर आप सदा भगवान का कीर्तन करना
चाहते हो में क्या भाव होना चाहिए?
ना
विनमबतकाभावअाव को सबसे प्रतीत मानना चाहिए।
सबको आदत।
2 का की आदत
चेतन महावर का
ये है उद्देश, ये उद्देश हमें प्राप्त होगा साल से। इसलिए चेतन महाफला 5 महत्वपूर्ण विषयों पर बल दिया, जिनमें सबसे पहला क्या था साधु।
तो हम जहाँ भी रहे हैं, वह भाव ही रहना चाहिए कि हमें साधु संगत मिले और ये साधु संगत प्राप्त करते हैं। 2 साधन से 1 है भक्त साधु,
दूसरा है ग्रंथ साधु।
जैसे हम भक्तों के वेतन की सेवा पर बोल देते हैं। आप में से कितने भक्तों ने पिछले महीने में, आर्थर के महीने में, ग्रंथ की सेवा में सहयोग दिया?
तो? 1 भक्त साधु 11 ग्रंथ साधु हम क्यों प्रचार करते हैं कि महा सनाथ, मैंने, तुम्हारे को का उपयोग करना है? प्रचार करने।
तो क्या सन्देश मिलेगा की namak
भगवान के नाम को।
4
गुना कृष्ण,
सनातन गोस्वामी ने कहा
कि अगर नाम 10
मई नाम का
उचारण करें, अपराधो से बचते हुए शुद्ध भक्ति प्राप्त हो सकते हैं। तो हर नाम का लाभ तो हर स्थिति में है। गम अपराधों से बचकर नाम का उच्चारन करेंगे तो यह नाम का पूरा लाभ पहुंचा है।
राज ठाकुर दिन में 3 लाख बार जॉब करते थे और परमजीत करते हैं। दास की नकल करना असंभव है। 16 माला ध्यान से करे तो उसका यान पूरा
तो साधु संग के द्वारा
ही नाम की महिमा का ज्ञान हो। भाई नाम का लाभ तो हर स्थिति में है।
पर पूरा लाभ उठाने लिए हमें दसनाम
अपराधों से आगे माँ ब ने क्या कहा? भागवत का ग्रंथों का अध्ययन। पापाजी ने बहुत परीक्षण के साथ इन ग्रंथों का अनुवाद किया। और इन ग्रंथों के द्वारा हमें क्या
करना है, अध्ययन नहीं करना है।
दूसरों को भी अध्ययन का है। इन ग्रंथों में है दिव्य ज्ञान।
भगवान प्रकट हो गए हैं और उनकी
वाणी हमें प्राप्त है।
कहाँ श्रीमत।
तो हमें अध्यात्मि के लिए जो लोग किसी न किसी ग्रंथ का ध्यान करते हो। अच्छा भा
तो है ग्रंथों में है भगवान की वाणी।
भगवान का उद्देश। आगे मा बाबू ने क्या कहा?
भगवान के आंचविग्राकी उपासना, श्रद्धा और आदर के साथ आप को
अनेक रूपों में प्रकट करते हैं। ये भगवान में अंतर है। आपके रस में कई प्रसिद्ध मंदिर हैं
जैसे रमना में
राजा की चोर को
बिना ऐतिहासिक स्थान है और ये मूर्तियाँ कहा जाता है। भगवान राम के समय के हैं और
राज भगवान अपने आप को राधा गोपीनाथ
के रूप में प्रकट किया है।
उनके भग महान पूरी की इच्छा थी कि अगर उन्हें ये खीर चखने का मौका मिल जाए तो अपने गोपाल विगरा के लिए भी इसी प्रकार की खीर बनाई। और ये भावना प्रकट हुई। जब भगवान को भूख लग रहा था तो
कुछ के में न वन से चल पड़े।
पर भगवान ने क्या किया? पुजारी को आदेश दिया। सपने में ये बाजार में 1 बार पूरे नाम का प्रसिद्ध भक्त हैं।
1 का प्याला उसे जाज दे।
2
तो उसके पश्चात नाना नाम क्या बन लिया या फिर छोड़?
2
भक्तों के ने की चुराई। भगवान के अनेक रूप हैं। 1 है राजा कृष्ण। आपके
पूरी से थोड़ी दूरी पर साक्षी
गोपाल का भी प्रसिद्ध मंत्र है। यहाँ तो साक्षी गोपाल दास है।
असली साक्षी गोपाल का मंत जब
उस गृह ब्राहमण से कहा गया कोई प्रमाण है क्या? मेरे पिता ने तुम्हें कहा था कि मेरी बहन का विवाह होगा।
तुम्हारे साथ उस गरी ब्राहमण ने कहा है कौन गोपाल विग्राह
धनी ब्राहमण के
बेटे ने सोचा वो पत्थर की मूर्ति
साक्षी बनेगी।
असम्भव ठीक है। दिया गोपाल विगराहगा दवाई देने के लिए
ब्राहमण दौड़ते दौड़ते वापस पहुँचा। बिंदा आवाज गोपाल मिग्रा को प्रणाम क्या कहा मेरी इज्जत का प्रश्न है।
अब आइए
साक्षी बनने के लिए।
गोपाल मिग्रा ने कहा मैं तो
चल नहीं सकता। इतनी दूर कैसे चलूंगा वृंदावन से
उस भाग। अगर आप बोल सकते हो तो चल भी सकते हो।
भगवान में हार स्वीकार कर ली। भगवान साक्षी बन गया है। भगवान के अनेक बोलते है। आपका पुरी धाम परसिद्ध जगना जी के
मूर्तियों के जा
1 दिन महाराज जमना के महल में 1 ब्राहमण या brahmin he raja is prithvi पर
1 बहुत
ही खूबसूरत दिख रहा है। इसका नाम है नील मारा और ये
बिगड़ा इतना खूबसूरत है, तुम देखोगे तो प्रसन्न हो जाओ और ये क्या कर
चल पड़ा राजा की इच्छा थी इस विग्रह का दर्शन।
पर
राजा ने अपने ग्रामीणों को भेजा। विषों के कोने कोने में घर घर जाकर पूछो नील माधव का दर्शन प्राप्त
हुआ है कि मे सारे ब्राहमण गए
विश्व के हर कोने में
और सब लौट गए।
किसी को कोई सूचना नहीं मिली। 1 ब्राहमण नहीं लौटा।
विद्यापती इसने कहा कि मैंने पूरा प्रयास करना है।
इस मूर्ति को को विधापति रहने लगा।
जंगल में जहाँ के दुश्मन, राय और भाग के साथ जिसके विश्वास हो, उसकी 1 बेटी थी।
ललिता
और विद्यापति ने अनुभव किया कि
उसका ससुर रोज चले जाता है।
रात को कई बार 1 दिन, 2
दिन बाद आता है। जब लौटता है तो उसके शरीर से
इतनी अच्छी सुगंध आती थी, कैसा लगता था उस से? तो उसने अपने पत्नी से पूछा तो
मेरे पिता कहाँ जाते हैं जाते हैं जंगल में, मैं बता नही सकती। क्यों जाते हैं। परी तुम्हारा पति बताई है।
विरदेबतकहाजंगल के कोने में।
1 बहुत लिरा जिसका नाम है नील
माधव और मेरे पिता ढल जाते हैं उसकी सेवा करने को और कैसे जाते हैं।
वो मैं नहीं बता। पाती ने कहा कि नील माधव का
दर्शन मिल सकता है, मुझे पत्नी ने
नहीं मैं, बेटा कभी नहीं मानूंगा है। पति कहने पर पत्नी ने पिता से पूछा।
पिता ने कहा कि ठीक है 1 शर्त पर मैं अब चायपति की आँखों
को बंद कर दूंगा।
पति के साथ जा पहुंचेंगे नील माधव के पास जब वहाँ दर्शन दे सकते
हैं
और पति ने अपने पति को वर्षों के बीच सरसों के दाने 1 कपड़े में लपेट कर दे दिए तो वो रास्ते में फेंकते गए।
जब नील माता के पास पहुंचे तो केसस्नउनकी आँखें खोड। विजापत ने नीलमाधव को दर्शन लिया। इतने प्रसन्न हुए कि वो समझने लगे
की हाँ अब मैं समझा।
मेरे राजा की क्यूं इच्छा थी। इस मूर्ती का दर्शन साफ करने और विद्यापति ने देखा बा बात हो कितनी
सेवा कर रहा था वहां पहुंचकर तलाब
के पानी से उनका स्नान करवाया।
अभी से फल तोड़कर भगवान भोग उड़ाया
और फूल तोड़कर भगवान ने हार बनाया
और वहाँ पेड़ में 1 पक्षी था।
तलाब में गिर गया
और देवी रूप
प्राप्त करके भगवान के दाम लौट गए।
सोचने लगा मुझे भी इस लार में
हत्या हत्या कर लेगी।
भगवान के दाम लौटूंगा और फिर भगवान ने कहा तुम आए थे नील वालों
को ढूंढने के लिए।
अभी सूचना 294 तुम्हारे राजा को यह
नींद माधव प्रगट हो गए। राजा लौटा अपनी सेना के साथ। इस स्थान पर उन्होंने देखा नील माधव
हैं, हनी प्रगट हो गए। जब वो पहुंचे, वहां उन्होंने देखा नील
माधव का दर्शन प्राप्त होगा। वहाँ है नी नील माधव की मूर्तियां। फिर दिव्य वानी द्वारा उन्हें सूचना मिली ये नील माधव प्रकट होंगे। दरूब्रहमाकेरूप चला में
लकड़ी का बड़ा लंबा टुकड़ा फैल रहा था।
इसमें विवि लक्षण से उनका वर्णन किया
गया था रिजर्व वाणी के द्वारा।
तो राजा ने इस लकड़ी के टुकड़े को उठाने का प्रयास किया। सेना के सहयोग से असम्भव थे,
उन्हें संदेश मिला तुम उनके भक्तों को लाओगे
विद्यापति उनके सहयोग से उठा सकोगे।
तो उनके सिर से वो लकड़ी के
बड़े टुकड़े को उठाकर रख धोने के रते बिठाकर कीरतन करते हुए राजा के बयान में लाए
और राजा के बयान में लाये।
राजा ने कई स्कल्टरर्स को निमंत्रन दिया भगवान का रूप बनाओ। आकर सब असफल थे, जैसे कार्य आराम
करते थे, उनके हथियार ही टूट जाते थे।
फिर भगवान आये विश्वकर्मा के रूप में। विश्वकर्मा से पढी तो के मकान नहीं बना रहे हैं। पर आपके मकान नहीं बनायेंगे जो भगवान प्रकट विश्व क्रम के रूप में। भगवान ने कहा।
विश्व क्रम ने कहा मैं भगवान का रूप बनाऊंगा और 1 शर्त पर
पंद्रह दिन के लिए पंद्रह।
रन में पंद्रह दिन के लिए 21 दिन के।
किसी ने अंदर नहीं आना। और कोई अंदर आएगा काम लोग। तो विश्व मन कार्य शुरू कर दिया अपने हथियारों के साथ। और इतनी गहरी इच्छा थी भगवान का दर्शन प्राप्त करने के लिए अपने कानों को दरवाजे के साथ जोड़ दिया था।
और वो विश्वकर्मा का ठिक ठिक ठिक ठिक ठिक सुन रहे थे और बड़े गुस्सा के साथ 1 बड़े उत्सा के
साथ उस दिन की राह देख रहे थे जब कि भगवान
ो हम लोग बॉम्बे झू में
2 दिन पहले ही हमने फॉर्टी यूनिवर्सिटी बनाई थी।
रा
लोग ने इंटरनेट में देखा था,
लगभग सौ प्रापर के शिष्य अमेरिका और
विदेशों से आए थे। ये सौ भक्त थे जिन्होंने बॉम्बे मंडल में सेवा की थी।
शुरू में
विश्व जनिकस्कानोमें रह रहे हैं।
तो बड़ा सुंदर चार्ज का सर था जिसमें सौ बाबाजी के सिर से सौ से भी ज्यादा और हजारों हजारों।
तो जब बॉम्बे का मतलब यू का
मनना था, जो प्राबाजीभीअपने
5 मंजिल के
फ्लैट में गए थे, पापाजी का स्थान
तैयार हो गया था और बिल्ड मंदिर पुरा क्या नहीं हुआ? तो नीचे पत्थर का काम चल रहा था।
टेक टेक, टेक, टेक, टेक टेक टेक प्रापा जी। तो भक्तों ने प्रापा से कहा आप
डिस्टर्ब तो नहीं हो रहे, ये कर रहे हैं। पापा ने कहा
दिस इस किर्तन
जो
आवाज निकाल रही है, पत्थरों की ये किर्तन हैं।
क्योंकि ये आवाज निकलती है किस लिए। अमान का मंदिर बनाना।
तो उसी प्रकार बना जिंद
टिक टिक, टिक टिक टिक सुन रहे थे। उन्हें तो ये किरतन लग रहा था और बड़े उत्साह से देख रहे थे। गरजगनाजीका दर्शन कब मिलेगा भगवान का दर्शन? उन्हें पता नहीं भगवान का दर्शन कब?
मिलेगा?
तो 2 हफ्ते बाद उन्होने देखा ठीक ठीक आवाज बंद हो गई, बड़े दुखी हो गए। उन्होंने अपने बंदियों को बुला कर पूछा अब क्या करना चाहिए? ठीक ठीक आवाज नहीं आने की विश्वकर्मा
मर नहीं गया, हमने ने कुछ खाने
के लिए नहीं दिया, पीने दिया, कुछ
नहीं पिया कहीं मर गए।
उन्होंने राय मांगी। पत्नियों ने तो कहा, मंत्रियों ने कहा नहीं नहीं, हमें अन्दर नहीं जाना चाहिए। शो क्या मैं ने हमें कहा था, अंदर हो जाएंगे। गुंडीचा, जो की उनकी पत्नी का नाम था।
गुडीचा ने कहा नहीं देखो
मरते।
जब राजा ने प्रवेश किया, अंदर एकदम
वेशक प्रगट हो गए। और राजा ने क्या देखा जगन सबद रहा। बाल को थोड़ी सी धारण रखिये रूप को देखे
तो ऐसा दिखता है कि
रूप थोड़ा अधूरा है।
तो राजा शोक में था।
मैं क्यूँ अन्दर आया।
लगता है कि विश्व का ने अपना
कार्य समाप्त नहीं किया।
राजा शो कर रहा था नारदमुनी, वहाँ
पहुँचे नहीं, ये प्रभाविक है। भगवान की इच्छा थी कि इस दारू ब्रह्मा के रूप में की उपास न हो। ये जो रूप आप जगना सुबह बालाओं
का देख रहे हो, ये रूप इस
रूप में पूरन की उपासना होगी।
पूरे चलिएगा। और फिर ब्रह्माजी ने मूर्तियों की स्थापना की।
ऐसे अनेक लीलाएं हैं भगवान जगनाथ के प्रकट होने के लिए।
संक्षेप में आपको 1 वर्जन बनाया है।
तो जगना सुवाद भगवान का रूप है। और इस रूप की उपासना आपके जगनाथूरी में हजारों सालो से हो रही है। और प्रापाजीकहते थे झगड़ा वीज लॉड द। यूनिवर्स पूरे विश्व के जंगलपुर के रथयातरा तो बड़ी प्रसिद्ध है। और आज की कृपा से विश्व के कोने कोने में जगना जी घूम रहे है। विश्व के कोने कोने में जनाजे दर्शन लोगों को मिल रहा है।
नाइनटीन सिक्सी सेवन में पाबजिकएकसिशेथी
मालती दासी जो बॉम्बे में भी आई थी इस उत्सव के लिए। तो मालती दासी 1 दुकान में गई थी।
इंडियन दुकान में, वहाँ वो इंडियन डॉल्स बेच रहे थे।
अब कि इंडियन गुड़िया तो 3 अलग अलग टोपियां थी। 1 में थे बाल 1 में जगन 1 में, पर इंडियन गुड़िया के नाम
पर बेचा जा रहा था वे, महती ने देखा इंडियन डॉल्स।
take proper founds doll in that indian indian store me bat antenor homगिa, this is not job, this is lot of the universe। और फिर पापा ने कहा उनके साथ 2 और गुड़िया होनी चाहिए। माल की राशि वापिस गई वो दुकान
में और दूसरी 2।
फिर प्रॉपाजी ने तीनों को अपने टेबल में रखा।
जगनाथ सुभद्रा भाला प्रापा जी ने पूरी
कथा सुनाई भगवान जगनाथ जी के प्रकट होने की।
तो मैंने संक्षेप में आपको सुनाया
स लॉ स। और फिर इस्कॉन के सेंसर को मंडल
में पापाजी ने पूछा भक्तों से तुम
में से किसी में कार्विंग की कला है। मालती के पति का नाम था श्याम
सुंदर, व भी बॉम्बे आया था उस
सब के लिए, वो प्रशिक्षक से केमिकल इंजीनियर था। प्रापा जी, आइकanकाrडतोप्रापाजी के निर्देशन में बड़ी जगह सुबह बलराम की मूर्तियां बनाई गई जो कि सेंटर्स को वंदन की स्थापना हुई है। और पहली रात यासा निकली थी सपन
के भक्तों के द्वारा, नाइंटीन सिक्टी सेवन में है।
ये रियासा विश्व के कोने कोने में निकली है। तो प्रौपाजीसारे विश्व में जगनाजिकमहिमाओं का ज्ञान उपदेश दिया है। और आज सारे विश्व में रियासा निकाल ली है।
कम से कम 200 शेयर हैं। जहां के रथिासाीजगन
चेतन महाबम ने कहा साधु संग नाम केतन भागवत, गीता का
शो नाम और भगवान के आंचल
श्रद्धा के साथ। और आदर के साथ। ये श्रद्धा यह भगवान हैं। यह नहीं, ये तो लकड़ी की मूर्ति है। भगवान प्रकट हुए हैं। झगड़ा सहम, सुबह, बाल, राहू के रूप हैं, भगवान प्रकट हुए हैं, राधा कृष्ण
के रूप में, भगवान प्रकट हुए हैं। गोनेतायकेरूपमें तो छल आदर के साथ और
धान में रहो अपने घर को धाम बनाओ, जहाँ की आध्यात्मिक वातन हो। तो चेतना महा प्रभु ने इस कलियुग में
भगवत प्राप्ति बहुत सरल बना दिया है।
और आज आपका भाग्य है कि आप उस थान में पहुँचे हो जहाँ महा प्रभु जो की सबसे सब अवतार में सबसे दयालु हैं, उन्होंने 24 साल का
देखे तो जगह पुरी मंदिर के बिल्कुल निकट हैं।
सर्ब चाय तो चेतन सन्यास लेकर आ रहे थे, जगनाजीका दर्शन देने के लिए तेजी के साथ चल रहे थे, क्योंकि उनकी उनकी इच्छा थी, वो अकेले जाकर जगनाजी के दर्शन में। और भगवान जगनाजी का दर्शन लेते ही इतना आनंद नुभव।
एक्ससी को लगभग बेहोश हो गए और
गिरे बिल्कुल जगना जी के सामने, जो द्वार बंद होना था, क्योंकि
मां को भोग लगना था, तो
विशाल का टाइम हो गया, शुरू हो गया है। पहले सब शांति से सुन रे थे। मुझे लगा भूख लग रही है। ठीक है, यह कथा बाद में बनायेंगे। वो कागज कागज 2 तो ये दिन दयालु हैं। पुजाई ने दीवार बंद करना था तो चिंता में क्या करें? ये बड़ा खुबसूरत नियासा गिरा हुआ है, सो रहा है। चाय जोकि मायावादी भाव के थे, उपस्थित
थे,
उन्होंने देखा, सांस नहीं, लेता, जिंदा है। पर उसे सन्यासी और घर ले गया। मैं कैसे उधार हुआ, कल बताऊँगा।
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